Post – 2020-04-22

#शब्दवेध(17)
कट्

चट में यदि जिह्वा की सक्रियता दिखाई देती है तो कट में दांतों की। और यदि इनकी चक्रवर्ती आवर्ती हो जाए तो यह किट (किटकिटाना) बन जाता है। क्रोध का भाव आ जाए तो ट च में बदल कर किचकिचाना हो जाता और तनिक ध्यान दें तो खीझ का इससे नाता (भौतिक क्रिया का मनोभाव में परिवर्तन भी दीख जाएगा। यहाँ एक मामूली परिवर्तन हुआ है और वह है श्वसन क्रिया का बढ़ जाना – अर्थात् अल्पप्राण ध्वनियों का महाप्राणन। लेकिन यह तो मानना ही होगा कि घोष-महाप्राण शब्द में कहीं आए, वह मूलतः कौरवी या बाँगड़ू का नहीं हो सकता और उसकी तलाश हमें पूरबी में करनी होगी। भो. में लौटने पर हमें खीझ की जगह ‘खुझ्झि’ और खीझने वाले के लिए ‘खुझ्झी’ का प्रयोग चलता है। यद्यपि ‘झ्झ’ सुनने में ‘ज्झ’ प्रतीत होता है पहले ‘झ्’ का महाप्राणन आरंभ हो इससे पहले ही दूसरे झ का उच्चारण आरंभ हो जाता है परंतु इसका कारण यह हो सकता है कि हमारा उच्चारण खड़ी बोली से, जिसमें हजारों साल के अभ्यास के बाद भी स्वरयुक्त दो महाप्राण ध्वनियां साथ साथ आएँ तो पहले या दोनों के महाप्रणन का लोप हो जाता है (भूव+भूव=भभूव> बभूव; धधकल> दहकना), बहुत प्रभावित है।

दाँत (दंत) का काम है काटना, दाढ़ (दंष्ट्र) या चौभर का चबाना (भो. चाभल >चबाना जिसका सं. ब को व बना कर और र-कार का अंतःक्षेप करके किया जिसका वकारयुक्त रूप हम देख आए हैं चाव/चाह बन कर एक नए अर्थ में प्रयोग में आने लगा और चर्वण/चर्वणा – चबाने और रसास्वादन (रस चर्वणा) दोनों अर्थों में प्रचलित रहा। बोली के स्तर पर र-कार युक्त रूप नहीं चलता था इसे अंग्रेजी के chew से समझा जा सकता है जो पुनः चव/ चाव की याद दिलाता है जो सं. > च्यव बनता है और च्यवन-प्राश में बचा रह गया है।

आप दाँत कटी रोटी के संबंध की या हम-नेवाला की बात करते समय इसके अर्थ पर तो ध्यान देते हैं, बिंब पर शायद ही ध्यान देते हो। इसका बिंब उसी रोटी (फल, नेवाले) काे काट कर खाना और बाकी दूसरे को खाने को दे देना। स्टीव जॉब्स ने इसका अर्थ समझाने के लिए ऐपल का प्रतीक चिन्ह तैयार किया था।

हमने दाँत से उत्पन्न कट् ध्वनि और इसके शब्द-विकास और अर्थ-विकास पर चर्चा करनी थी और दाँत की क्रिया की और मुड़ने लगे। कट की ध्वनि दाँत से तो पैदा होती है और इसका काम काटना और छेदना भी है, और इस नाते इसका विस्तार किसी ऐसी वस्तु तक हो सकता था जो काम के मामले में सगा है पर जिससे कोई आवाज स्वतः पैदा नहीं होती। कट >कंट>काँटा/सं. कंटक और क्रिया काटना, कटीला, काट= 1. विफल करने वाला उपाय या प्रतिवाद; 2. बनावट । विचित्र बात यह कि काँटे की अपनी क्रिया के लिए चुभने का प्रयोग होता है पर इसके नाम करण में उससे सहायता नहीं ली गई और इससे भी विचित्र यह कि यह चूभने से इतना मिलता है। कट में हीनार्थक इ-कार लगाकर > कीट/ कीड़ा/कीड़ी > सं. कृमि ।

काटने की अप्रियता- कटु/ कड़वा, वह वचन/उक्ति हो या स्वाद, जिसका विस्तार सरसों के तेल तक होता है क्योंकि सभी खाद्य तेलों में तीखापन इसी में होता है।

कठिन, कठोर का प्रथम दृष्टि में संबंध काठ से है, परन्तु कठेस – अधपका फल जो मुलायम न हो, सीधे दाँत से काटने से संबंध रखता है।

किसी टहनी या ऐसी ही किसी चीज के टूटने, उसे तेजी से काटने से कट की ध्वनि पैदा होती है, इसलिए यदि काटा जाय और ठीक यही ध्वनि पैदा न हो तो भी उसके लिए इसका प्रयोग हो सकता है – कटार/ कटारी – काटने के अनेक औजारों में से एक के आकार भेद; काट/ कटाव, किसी धारा का , कट्टा – बंदूक की नली को काट कर तैयार रिवाल्वर, कट्टा- आधी बोरी या छोटी बोरी; अधकट्टी सब समझ में आते हैं पर कटरा को समझने में इस कारण कुछ उलझन होगी कि हम इसे बाजार समझ लेते हैं जब कि यह बाजार का एक हिस्सा है जो किसी एक सेठ के कारोबार या अधिकार को प्रकट करता है- कटरा गिरधारी लाल। हट्टा-कट्टा में हट्ठा हठीला के सं. हृष्ट का अपभ्रंश लगता है और कट्टा – कड़ा- दृढ़ का रूपभेद। कट्टर – दृढ़, अडिग. जिसे काटा न जा सके, विचलित न किया जा सके। कटि – कमर; *कट्टा> गट्टा (कल्ला, कलाई) कटने का नहीं इसके विलोम जुड़ने का भाव प्रकट करता है क्योंकि काटना, तराशना कुछ गढ़ने-बनाने के लिए ही किया जाता है, इसलिए कला किसी पूर्ण का खंड, सोलहवां हिस्सा और कला कलित या निर्मित कृति।

Post – 2020-04-22

चीन विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बनने के लिए कुछ भी कर सकता है। क्षतिपूर्ति की धमकी पर उसका यह जवाब कि अमुक अमुक ने भी ऐसा किया था पर क्षतिपूर्ति नहीं दी थी इस आरोप की स्वतः पुष्टि है।

Post – 2020-04-21

#शब्दवेध(16)
चट्
स्वादिष्ट लेह्य पदार्थ का स्वाद ग्रहण करते समय जिह्वा की गति, स्पर्श और झटके से अलग हटने से चट् की आवाज आती है जिसके कारण इस क्रिया को चाटना और सुस्वाद लेह्य को चटनी, और खाद्य को चाट; किसी लाभ के लिए, अपने से अधिक प्रभावशाली व्यक्ति को प्रसन्न करने के लिए उसकी झूठी प्रशंसा या सेवा करने वाले को चाटुकार कहते हैं। अति स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए चटपटा/चटपटी का प्रयोग होता है और लोलुप व्यक्ति को चटोर और उसकी आदत को भी चाट तो कहते ही हैं।

पर स्वादिष्ट पदार्थ की लालसा को चाव कहते हैं जो जीभ से न निकलकर जबड़ों से किसी रसीले पदार्थ का रस और स्वाद ग्रहण से उत्पन्न है ध्वनि *‘चाभ’ से संबंध रखता है, जिसके लिए भो. में चाभल और चूभल/चूसल प्रयोग में आते है, जिनमें सूक्ष्म अंतर है। चाभ का भ कौरवी क्षेत्र की बोली के प्रभाव में, जिसमें पहले घोष महाप्राण (झभघढध) का अभाव था, पहले ब में बदला, फिर उसका संस्करण व में होने पर चाव बना जिसमें सहायक होने के कारण दाढ़ के दाँतों को भो. चउभर कहते हैं। चूभना को संभवतः दाँत गड़ाने के आशय से जोड़ कर देखने के कारण कौरवी में इसका प्रयोग भो. में प्रचलित खुभने के लिए और केवल चूसने का प्रयोग चूभने के लिए होने लगा। चूसने से जूस (रस/रसा) निकला जिसका सं. यूष = रस, रसा > योषा = सुखदा के रूप में हुआ।

जो भी हो, चट का विशेष अर्थ हुआ चिपकना जो उस बोली के प्रभाव से जिसमें च का उच्चारण स के रूप में हौता था, सट में अधिक स्पष्ट है, क्योंकि इसका नामधातुक रूप सटना = चिपकना, जुड़ना और संज्ञा सटना = वह आवरण जो किसी किताब या कापी पर उसकी सुरक्षा के लिए चढ़ाया जाता है आज भी प्रयोग में आता है। सटना का मूल रूप चट ही था, यह इसके विलोम उचटना और उचाट और उच्चाटन से स्पष्ट है और साथ ही यह भी स्पष्ट है कि इसका आर्थी विकास चाट>चाव>चाट>चट के क्रम में हुआ है।

चट की ध्वनि केवल जिह्वा से पैदा नहीं होती; किसी भी पतली या चपटी चीज से तेजी से टकराने से पैदा होती है, चाहे वह आपकी हथेली का किसी के गाल से टकराना हो या चप्पल के पिछले सिरे से एँड़ी से। परन्तु इस तर्क से तो चप्पल को चट्टल कहा जाना चाहिए था, (जो संभवतः गो प्रजाति के खुर की आवाज के आधार पर चैटल/ कैटल और बाद में गुलामों को ढोर के समान मान कर उनके लिए प्रयोग में लाया जाता रहा।)।

इसका एक कारण तो यह है कि भारत के आर्द्र मौसम में जूते से गीला हो जाने पर उससे पैदा होने वाली दुर्गंध से बराव के कारण भारत में उपानह या पादत्राण का चलन बहुत पहले से होते हुए भी, दुर्गंध से बचने के लिए अधिकांश लोग नंगे पाँव रहते थे, जो भारतीय जलवायु में संभव ही नहीं पानी और बरसात को ध्यान में रखते हुए, सुविधाजनक भी था। कुछ लोग खड़ाऊँ/ पादुका या पौआ (जिसमें खड़ाऊँ की खूटी की जगह रस्सी के फंदे लगे रहते थे) का प्रयोग करते थे। कनवास और रबड़ के उपयोग के बाद और विलायती जूतों के चलन के समानांतर पौए ने चटपटी का रूप लिया और फिर इसमें सुधार करते हुए चप्पल का चलन बढ़ा। चप्पल का प्रयोग कुछ बाद में आरंभ हुआ इसलिए चट्टल विकल्प सुलभ न था। खट/खड़ के नाद के कारण खड़ाऊँ, पाँव के रक्षक के रूप मे पादुका, पादत्राण, पनही, उपानह। इसलिए पाँव के रक्षक का विकल्प भी न था।

दूसरा कारण यह कि प्रकृत नाद अनेक रूपों में सुना और वाचिक रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता था। जिस ध्वनि को चट रूप में सुना जा सकता था उसे चप और थप रूप में भी सुना जा सकता था। संभव है आरंभ में यह बोलियों की भिन्नता के कारण रहा हो, पर उनके एकमेक हो जाने के बाद जिसे चाँटा कहा जाता था, उसी के लिए चपत और थप्पड़ का भी प्रयोग बिना किसी संकोच किया जा सकता था यद्यपि इनमें ध्वनिभेद से जुड़ा सूक्ष्म अर्थभेद भी था। आप चपत प्यार से भी लगा सकते हैं, सावधान करने के लिए चाँटा भी जड़ सकते हैं, पर थप्पड़ के पीछे एक मात्र प्रयोजन आहत और अपमानित करना ही हो सकता है।

चपत का चपाती से क्या संबंध है, यह आपको तभी पता चलेगा जब यह समझ लें कि जिसे आप चपाती कह कर खाते हैं वह चपाती नहीं रोटी है और जिसे रूमाली रोटी कहते हैं वह रूमाली चपाती है। चपाती वह है जिसे चाक और वेलन का आविष्कार होने से पहले या इनके अभाव में लोई को उँगलियाों के दबाव से फैलाते और हथेलियों से समतल बनाते हुए तैयार करते थे, जिसके लिए हथपोइया का प्रयोग होता था। यदि इसे तवे पर न सेंक सीधे आग पर सेंकना होता तो आकार छोटा ही रहता जिसे भो. टिकरी = टीके की शक्ल का, कहते थे। रोटी के साथ आप को अं. के रोट, रोड, रोटरी, रोटेशन की याद आई होगी। दोनों का जातक एक ही है पर इसका मूल रोड़ा – नदी की धारा से टूट और घिस कर गोलाकार हुए बट हैं जिन्हें लौग आज तक बाबा बटेश्वर या शिव के रूप में पूजते और जलस्रोत के निकट रखते रहे हैं। इस विकास पर उचित प्रसंग में चर्चा करेंगे।

यहाँ इतना ही कि चट का संबंध चटाई, सटने-सटाने या जोड़ कर तैयार किया विस्तर है तो चट्टान को भी सपाट और समतल शिलाखंड होना चाहिए। चट्टा लगाना जोड़ कर सजाना है।

सटने, जुटने, परस्पर गुँथे होने के भाव का विस्तार जटा, जूट, झूँटा, झोंटा आदि में हुआ है।

चट, पट्, खट से जुड़ी आकस्मिकता से आकस्मिकता सूचक अव्ययों – चट, पट, खट, झट, चटुल आदि – का जन्म हुआ है। जो शब्द या शब्द शृंखला मुझसे, स्थान सीमा के कारण, छूट रहा/रही होगा/होगी उसे आप अपनी सूझ से पूरी करेंगे।

Post – 2020-04-21

कई बार चुप रहना अपराध लगता है। किसी अन्य विषय पर बोलना भी। पर यदि सभी लोग उसी विषय पर बोलने लगें तो? शोकार्त क्षणों में भी अपना काम करते हुए उनको अपना काम करने दें जिनको इसे करना है, यह एक मात्र विकल्प है।

Post – 2020-04-20

#शब्दवेध(15)
कड़वी घूँट

मुख से निकलने वाली दूसरी ध्वनियों और उनसे बने शब्दभंडार की चर्चा से पहले कुछ आधारभूत बातों को समझ लेना जरूरी है जिसके बिना हमारी कुछ बातों को समझने में कठिनाई होगी।

हमारे मुख से अनेक प्रकार की ध्वनियाँ निकलती है जिनमें से कुछ का अनुश्रवण और वाचिक अनुकरण ही शब्द का रूप ले पाता है। दूसरी ध्वनियाँ हमारे परिवेश की असंख्य ध्वनियों की तरह बेकार चली जाती हैं – उनका हमें संज्ञान तक नहीं होता ।

हम प्राकृत नाद को अपनी ध्वनिमाला की सीमा में ही सुन पाते हैं, इसलिए दूसरी भाषाओं में उन्हीं नैसर्गिक ध्वनियों को जिस रूप में सुना और वाचिक उच्चारण किया गया है, वह उसी ध्वनि के हमारे अनुश्रवण और उच्चारण से भिन्न तो होता ही है। हमारे लिए उ़नका वाचिक शब्द भी एक सीमा तक नाद में बदल जाता है, जिसे हम अपनी अपनी सीमा में सुनते और नए सिरे से अनुनादित करते हैं।

एक अंग्रेज या अमेरिकी ही नहीं भारत के विभिन्न प्रांतों के अंग्रेजी जानने वाले व्यक्ति एक ही लिखित शब्द का अलग अलग उच्चारण करते हैं। दूसरी भाषाओं के शब्दों को सुनने और बोलने में अपनी बोली के प्रति गहन अनुराग के कारण, कम से कम अपने वैभव काल में, जितना भ्रष्ट उच्चारण ग्रीक लोग करते थे, उतना किसी दूसरी भाषा का व्यक्ति नहीं कर सकता।

भाषा सीखने के लिए अपनी भाषा की आसक्ति को भी त्यागना होता है, और नए सिरे उस भाषा को सुनना बोलना सीखना होता है। यह एक साधना है जिसमें लंबा समय लगता है, यद्यपि सुनने और बार-बार विफल होने के बाद भी सही उच्चारण तक पहुंचने को आधुनिक श्रव्य दृश्य साधनों ने, पहले की तुलना में, अधिक आसान बना दिया है।

यहां हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि:
(1) भाषा यदि प्राकृतिक नाद के वाचिक अनुकरण से पैदा हुई है तो यांत्रिक सोच के अनुसार भाषाएं एक जैसी होनी चाहिए, परंतु एक जैसी नहीं है, इसका कारण यह भिन्नता ही है।

(2) आदिम समुदायों के पास स्पष्ट वाचिक उच्चार या उनकी ध्वनिमाला उससे बहुत अधिक सीमित थी जो हमें देखने को मिलती है। कारण उनकी अपनी ध्वनियाँ (क) निष्प्राण और अघोषित -कचटतप- हो सकती थी; (ख) सप्राण और अघोषित -खछठथफ- हो सकती थी: (ग) निष्प्राण और घोषित -गजडदब- हो सकती थी या; (घ) सप्राण और घोषित -घझढधभ- हो सकती थी और (ङ) अनुनासिकों में से किसी एक का ही प्रयोग प्रत्येक बोली में होता रहा हो सकता था।

(3) हमने देखा कि चवर्ग का प्रवेश भारोपीय में बाद में हुआ। ठीक यही बात टवर्ग के विषय में कही जा सकती है।

(4) निष्कर्ष यह कि न केवल किसी वर्ग की अघोषता. सघोषता और महाप्राणन की दृष्टि से आज उपलब्ध सभी ध्वनियां किसी बोली में नहीं थीं, बल्कि स्थान की दृष्टि से सभी वर्गों (कंठ्य. तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य, और ओष्ठ्य) ध्वनियाँ भी नहीं थीं।

(5) जिस ध्वनिमाला को हम अपनी मानते हैं उसका विकास दसियों हजार वर्ष के दौरान विविध मानव यूथों के परस्पर मिलने से कई तरह के प्रयोग और पछाड़ के बाद हुआ है। एक दूसरे की ध्वनि को अपनाते हुए उन्हें सही उच्चारण के लिए बार-बार कठिन प्रयास करना पड़ता था। इस क्रम में प्रयत्न भी बदले और उच्चारण स्थान भी। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि जिस समुदाय की बोली में कोई प्रमुख ध्वनि थी, वह उसका उच्चारण किस रूप में या किन किन रूपों में करता था कि जिन गिनी चुनी वस्तुओं और क्रियाओं का उसके लिए महत्व था उनके लिए अलग-अलग ध्वनि-संकेत पैदा कर लेता था।

(6) भिन्न बोली वाले यूथ के साथ लंबे समय तक रहते हुए दोनों एक दूसरे की ध्वनि को अपनी श्रुति और वाचिक सीमा में सुनते और उच्चारण करते थे। सही उच्चारण सीखने में लंबा समय लग जाता था, इस बीच उच्चारण स्थान और प्रयत्न में भी, सही बने रहने की जी तोड़ कोशिश के बाद भी, मामूली विचलन आ जाती थी।
इसे एक काल्पनिक उदाहरण से समझने का प्रयत्न करें। एक बोली जिसकी प्रधान ध्वनि ‘भ’ थी, एक दूसरी बोली के संपर्क में आती है जिसकी प्रधान ध्वनि ‘च’ है। आरंभ में ‘भ’ प्रेमी समुदाय ‘च’ को ‘झ’ के रूप में सुनता और बोलता है, और दूसरा समुदाय ‘भ’ को ‘प’ के रूप में सुनता और बोलता है। ‘भ’ समुदाय को दूसरे का उच्चारण समझ में नहीं आता और उसकी उलझन या उपहास से दूसरे की समझ में आता है कि उससे कुछ चूक हो रही है। यही समस्या ‘भ’ समुदाय के साथ भी उपस्थित होती है। अपनी भूल सुधारते हुए वे जिस मुकाम से गुजरते हैं उसमें ‘च’ समूह ‘भ’ को लंबे समय तक ‘ब’ रूप में सुनता और बोलता है, परंतु ‘भ’ समुदाय पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाता और वह स्वयं ‘च’ को ‘ज’ में बोलने की आदत डाल लेता है, जिसके बाद भी दूसरे को वही शिकायत रहती है। संपर्क लंबा है इसलिए असंतोष के कारण या एक ही समुदाय में एक ध्वनि के दो तरह के उच्चारण प्रचलित होने के कारण, लंबी अवधि में ‘भ’ समुदाय च बोल लेता है, और च समुदाय भ उच्चारण कर पाता है। इसके साथ ही दोनों, जिनके पास केवल एक एक उपयोगी ध्वनि थी, अब छह ध्वनियाँ ही नहीं हो जातीं, बल्कि उच्चारण के आधार पर भीतर से दो भागों में बँटा हुआ समुदाय हैं सामाजिकता का पहला चरण पार करते हुए एक बड़े समुदाय में बदल जाता है जिसके भीतर कोई भेद नहीं रह जाता।

(7) इस मर्म को मैंने बिना किसी गुरु के दक्षिण भारत की भाषाओं को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा से नागरी लिपि में प्रकाशित बाल पोथियों और शब्दकोशों से सीखने के प्रयत्न में जाना। वर्णमाला, विशेषतः संयुक्ताक्षर,के लिए संबंधित भाषाओं के समाचार पत्रों प्रकाशित विज्ञापनों का और उच्चारण समझने के लिए आकाशवाणी से उन भाषाओं के समाचार सुनता, उनकाे टेप करके बार बार सुनता, स्वयं उच्चारण करके मिलाता फिर भी उच्चारण सही न हो पाता। अंत तक नहीं हुआ। तमिल की एक ध्वनि जिसके लिए अज्ञेय जी ने ‘ष़’ का चिन्ह अपनाया था, कुछ ऴ का प्रयोग करते हैं, मेरे लिए इतनी बड़ी समस्या बनी रही कि उसका उच्चारण तमिल भाषियों से सुन कर दुहराता तो लगता न उसे सुन पाया, न बोल सकता हूँ। तमिल (तमिऴ) शब्द की अन्तिम ध्वनि इसी की है।

यदि मैं एक बड़े और परस्पर जुड़े समुदाय के रूप में उस समाज में शामिल होता तो मेरे उच्चारण उसकी धविनमाला को प्रभावित करते। इसी प्रक्रिया से तमिल में मदुरै वैभव और संघम् संस्कृति के दर्प में उच्चारण की शुद्धता बनाए रखने की जिद के बाद भी अघोष अल्पप्राण ध्वनियों का शब्द के मध्य में आने पर सघोष उच्चारण आरंभ हुए। इसी क्रम में ध्वनिमाला गत दूसरे अनेक परिवर्तन आरंभ हुए लगत है और दूसरी बोलियाँ जिन्होंने लेखन में बहुत पहले से संस्कृत वर्णमाला अपना रखी है उनकी ध्वनिमाला संस्कृत से अलग पड़ती है5

Post – 2020-04-19

शब्दवेध(14)
स्फोट शब्द (3)

कल की पोस्ट में मैंने आरंभ किया, “शब्द का उच्चारण उस उपादान या स्रोत से निर्धारित होता है जिससे वह नाद उत्पन्न होता है जिसका वाचिक अनुकरण किया गया है। परंतु अर्थ उस वस्तु के गुण धर्म के अनुसार तय होता है जिसके लिए इसका प्रयोग किया जाता है ।” और फिर इसका विवेचन करने की जगह अपने विषय से भटक गया, इसलिए उसे वापस ले लिया।

होठों से वायु के वेग से बाहर निकलने से उत्पन्न ध्वनि जिसे हमने पक, फक, बक, भक रूप में प्रस्तुत किया, उसका पहली बार सार्थक प्रयोग इनमें से कौन सा था यह तय करना इस बात पर निर्भर करता है कि किस बोली मैं इसका पहली बार प्रयोग हुआ और दूसरों ने इसे किस रूप में सुना और उसका उच्चारण कैसे किया।

यहां हम कुछ भ्रमों के शिकार हो सकते हैं। पहला यह कि ये मनुष्य के सहज मनोभाव हैं, इनके साथ किसी तरह का सचेत प्रयत्न नहीं होता इसलिए इनको सार्थक शब्द नहीं कहा जा सकता। परंतु अन्य भाषाओं के लोग इनका प्रयोग नहीं करते। जन्मबधिर लोग इनका प्रयोग नहीं करते। यहां तक कि हंसना भी हम समाज से सुनकर ही सीखते हैं। सभी समाजों के लोग एक तरह से नहीं हंसते। हम किसी चीनी को उसी तरह मुक्त भाव से हंसते नहीं पाएंगे जिस तरह एक भारतीय को। एक निश्छल व्यक्ति की तरह किसी अपराधी या कपटी को हंसते नहीं पाया जा सकता। हंसी की अपनी भाषा है और यह मनोभाव और भाषा के अनुसार बदलती रहती है और इसे भी हम समाज से सीखते हैं।

हमने पीछे पकाना, पकवान, पाक, पक्व आदि को मुख से निकली पक् से उत्पन्न मान लिया। इसमें ध्वनि से अधिक ध्यान इस बात पर था कि मुंह से यह ध्वनि भी निकलती है और इनको खाया भी जाता है। परंतु दूसरी चीजों को खाने खाते समय जो ध्वनि निकलती है उससे पकवान खाने की ध्वनि अलग नहीं होती, मुंह किसी चीज को पकाने का काम नहीं करता। इसलिए इनका स्रोत संबंध आग से है जिसके जलने और बुझने में ऐसी ध्वनि होती है जिसकी नकल हम पक, भक्, बग रूप में करते हैं। इसलिए हमें इसको उस स्रोत में तलाशना होगा जिसमें इसकी क्षमता हो।

सबसे रोचक है पक/ पंग, भक/ भग/भंग, भंज के रूप में अनुकृत ध्वनि जो किसी चीज के फटने या फूटने से पैदा होती है। इस क्रिया में यदि वह टूट कर बिखरता नहीं, दरक कर रह जाता है तो दरार के लिए ‘भग’ का प्रयोग होता था और टूट जाने पर टूटे टुकड़ों को भाग कहते थे। इस स्रोत और कार्य व्यापार से एक प्रभावशाली शब्दावली का जनन हुआ है। ऐसा लगता है पंक का आदिम अर्थ चूर्ण या धूलि था जो पंश्-धूलिसात् करना में, पांशुल – धूलि से सना, मलिन में बदल गया और पंक कीचड़ के आशय में प्रयोग में आने लगा, परंतु पंगु= टूटा/कटा हुआ के लिए प्रयोग में आता रहा। पकड़ना इसी तरह मूलतः ‘टूटे हुए को जोड़ना’, ‘बिखरे हुए को समेटना’, ‘बाँधना’ के आशय में प्रयुक्त हुआ और बाद में हाथ में लेना लिए। ‘पग्गड’,“पाग’/ ‘पगड़ी’, ‘पगहा’ = का वाचिक अर्थ बाँधने वाला रहा लगता है; (हा प्रत्यय=वाला, जैसे भुतहा, मरकहा, लसरहा)। पंगा लेना =टकराना, न कि पंजा लड़ाना।

संक्षेप में कहें तो ‘भाग’ – लागत धन या श्रम के अनुसार उत्पाद या लाभ में उचित हिस्सा, ‘भाग्य’ – कर्म या श्रम के अनुपात में लाभ या उत्पादन में आगे चलकर मिलने वाला हिस्सा; भक्त – 1. बँटा हुआ, 2.हिस्सेदार; भगभक्त – हिस्से का बंटवारा करने वाला; भग – बटवारे का देवता या सूर्य/ अग्नि का एक रूप (भग एव भगवाँ अस्तु देवाः तेन वयं भगवन्तः स्याम । तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुरएता भवेह ।। 7.41.5; अग्निर्नेता भग इव क्षितीनां दैवीनां देव ऋतुपा ऋतावा।…3.20.4; त्रिधातु राय आ सुवा वसूनि भग त्रातर्धिषणे सातये धाः ।। 3.56.6) ; भगवान – जिसके पास अर्जित या उत्पादित संपत्ति एकत्र हो और जो भक्तों को उनकी पात्रता के अनुसार वितरित करे, (गृहिणी के लिए ‘भागवान’ उसके इसी दायित्व से जुड़ा संबोधन हो सकता है); भगवा – चीर या वस्त्र खंड; भगई – कपड़े की वह पट्टी जिसे जापान के सूमो पहलवान आदि पहनते हैं (अनुमानतः बौद्ध भिक्षु भी इसी तरह का चीवर धारण करते थे); भगवा – चीवरधारी। भगेविता – भागधेय ? (घर्मेव मधु जठरे सनेरू भगेविता तुर्फरी फारिवारम्।), भाक् – हिस्सा पाने वाला (यथा यज्ञभाक्)। फक् को हम फाँक, और *पंक के चूर्णीकरण वाले आशय में *फंक, फंकी -चूरा में और बक/ बग को बखरा – हिस्सा; बिखरना/ *बगरना – बिखरना (बगरो बसंत है), में लक्ष्य कर सकते हैं।

आग के अकस्मात जल उठने या बुझने से उत्पन्न ध्वनि पक्, फक्, भक, भग ने संभवतः इन तीनों स्रोतों में सबसे अधिक और दूसरे स्रोतों से समान ध्वनि के संभ्रमित करने वाते शब्दों का जनन किया है। किसी चीज को पकाने का काम आग ही करती है इसलिए पक, पक्का > पक्व; पकाना, पाक, पकवान, पकौड़ा. पकौडी, का सीधा संबंध आग के जलने बुझने की ध्वनि से और उस स्रोत (आग) से है जिसका विस्तार दूसरी किसी ऐसी चीज और उसकी क्रिया में किया जा सकता है जिसमें आग या दाहकता की संभावना हो या आग से संबंध हो, जैसे पाकशाला, पक्वाशय, पाचन, पाचक आदि। फा. पाक- पवित्र, पाकीजा अग्नि के पावक या सभी तरह के विकारों को भस्म करके शुद्ध करने वाले भाव से निकले विशेषण हैं। ऋग्वेद में इसका ज्ञानी और अकलुषित के आशय में प्रयोग हुआ है। पाक – ज्ञानी (पाकः पृच्छामि मनसा विजानन् देवानामेना निहिता पदानि। ऋ.1.164.5; किं ते पाकः कृणवदप्रचेताः, 10.7.6).

भग का आग के गुण से सीधा अर्थ आभा, आलोक, अरुणाभ, पीताभ आदि हो जाता है और गेरू, रामरज, हल्दी, केसर, पलाश के फूल में रंगे वस्त्रों के लिए भगवा का प्रयोग होता रहा है। कहते हैं गेरू का प्रयोग कृमिनाशक के रूप में उस युग में ही होने लगा था जब मनुष्य ने वस्त्र का आविष्कार नहीं किया था और यह केवल भारत तक सीमित नहीं था। इसके विकल्प रूप में प्रयोग में आने वाले दूसरे रंग भी कृमिनाशक हैं इसलिए साधु संत भी भगवा वस्त्र धारण करते रहे हैं। प्राण निछावर करने और सूर्यलोक को पहुँचने का इरादा रख कर केसरिया बाना धारण कर निकलने वाले राजपूतों की कहानियों से हम परिचित हैं। जरदुस्त्र का नाम क्या था हम नहीं जानते, जानते हैं भगवा वस्त्र (जरदवस्त्र) पहनने वाले के नाम से। रोमन राजाओं का पर्पल रोब या केसिरया राजवस्त्र भी इसके गौरव से जुड़ा है। संक्षेप में कहें तो यह पवित्रता का रंग है, गौरव का रंग है, ज्ञान और साधना का रंग है, शौर्य का रंग है। भगवा का उपहास करते समय हम इन सभी का उपहास करते हैं और इनके विरोधी गुणों की उपासना करते हैं।

वैदिक में भग का संस्कृतीकरण भर्ग के रूप में हुआ जो गायत्री मंत्र में मिलता है और ज्ञान के आलोक से भरने वाले सूर्य का द्योतक है, पर भृगु/ भार्गव में यह यज्ञविरोधी, औद्योगिक प्रयोजन में काम आने वाले अग्नि का द्योतक है।

Post – 2020-04-18

#शब्दवेध(13)

शब्द का उच्चारण उस उपादान यह स्रोत से निर्धारित होता है जिससे वह नाद उत्पन्न होता है जिसका वाचिक अनुकरण किया गया है। परंतु अर्थ उस वस्तु के गुण धर्म के अनुसार तय होता है जिसके लिए इसका प्रयोग किया जाता है । इस पहलू पर बहुत सावधानी से नजर रखनी होती है। तनिक भी असावधानी होने पर हमसे चूक हो सकती है। इसीलिए मैं स्वयं सावधानी बरतने के बाद भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पाता कि जिस नतीजे पर पहुंचा हूँ उसमें किसी तरह की खोट नहीं है।

मैंने आइंस्टाइन से दो बातें आज से 50 साल पहले सीखी थीं, मेरे लिए उनसे सीखने को इससे अधिक कुछ नहीं, परंतु इन दो उपदेशों ने मुझे शक्ति भी दी और अपनी ऊर्जा का सही इस्तेमाल करने का शऊर भी पैदा किया।

पहला मैं उनके उद्धरण के रूप में शेयर कर चुका हूं। परंतु जिस रूप में पढ़ा था, वह कुछ अलग था। पहली बार जब वह अमेरिका पहुंचे और अपना पदभार संभाला तो केयर टेकर ने उनके कक्ष में आकर पूछा, “किसी चीज की कमी तो नहीं है।” जवाब में उन्होंने कहा, “रद्दी की टोकरी बहुत छोटी है। यह बहुत बड़ी होनी चाहिए, मैं गलतियां बहुत करता हूं।”

उसी का नतीजा है मैं भी अपनी गलतियों से लज्जित नहीं होता, न ही यह मानता हूं कि उनमें से कुछ को मुझसे कम जानकारी का, यहां तक कि बहुत कम जानकारी का आदमी सुधार नहीं सकता।

यहीं मैं आइंस्टाइन से बड़ा सिद्ध होता हूं। उनकी गलती को कोई दूसरा सुधार नहीं सकता था 99 बार गलती करने के बाद भी सौवीं बार सही नतीजे उन्हें ही पहुँचना था, जबकि मेरे मामले में मेरे श्रोताओं या पाठकों में अनेक मेरी गलतियां सुधार सकते हैं, जैसे न्यूटन के अलावा कोई भी यह बता सकता था कि जिस खिड़की से बड़ी बिल्ली आ सकती है उस से छोटी बिल्ली भी आ सकती है, छोटी के लिए अलग खिड़की बनाने की जरूरत नहीं।

इसलिए बीच-बीच में मैं इस बात का अनुरोध करता रहता हूं कि आप लोग प्रशंसा करने की जगह मेरी गलतियों पर उँगली उठाएं, आलस्य बस या कहीं गलत सुझाव न दे बैठे इस डर से आपसे आपका दायित्व नहीं निभ पाता जबकि मैं अपने दायित्व के निर्वाह के विषय में शिथिलता नहीं बरतता। आइंस्टाइन का यह पाठ आपके भी काम आ सकता है। गलतियों से गुजर कर ही हम सही तक पहुँचते हैं। जो गलतियां नहीं करते वे कुछ नहीं कर पाते, दूसरों के किए को दुहराते रहते हैं। बस अपनी ओर से असावधानी नहीं होनी चाहिए, न ही मिथ्या ज्ञान प्रदर्शन के लिए ऐसा किया जाना चाहिए।

दूसरी नसीहत उनसे यह मिली जो बातें किताबों में उपलब्ध है उनका बोध होना चाहिए, उनको दिमाग में बंद करके दिमाग को कूड़ा घर बनाने की जरूरत नहीं। अधिकांश लोग अपने दिमाग को सबसे शानदार कूड़ा घर बनाकर ही काफी संतुष्ट अनुभव करते हैं।

जानने की लाख कोशिश करके केवल इतना ही जाना कि जानने के साथ अज्ञान का बोध भी बढ़ता जाता है, इसलिए किसी चीज को केवल उस सीमा तक ही जान पाया जिसके बाद मुझे इस बात का सही अनुमान हो सके कि उसके विषय में सही जानकारी कहां से प्राप्त की जा सकती है। इसलिए यह स्वीकार करते संकोच नहीं होता मैं किसी विषय का बहुत अच्छा ध्यान नहीं रखता, क्योंकि वह ज्ञान जी सो दिमाग में भरा जा सकता था उसे अपनी सही जगह पर रहने देना और जरूरत के समय वहां से निकाल लेना दिमाग को हल्का रखता है सोचने के लिए खुला भी।

ये दोनों बातें मैं नम्रता वश स्वीकार नहीं करता बल्कि यह मेरे जीवन सत्य हैं और इसके कारण मुझे बोलते समय परेशानी हो सकती है परंतु लिखते समय अपनी बात सही-सही पेश करने की स्थिति में रहता हूँ।

दो
इस भूमिका के बाद अब हम अपने विषय पर आएं। दो दिन पहले मुख से उत्पन्न होने वाली एक विशेष ध्वनि जो वायु के तेजी से बाहर निकलने की क्रिया से उत्पन्न होती है उसे मैंने पक, फक, बक, भक आदि रूपों में प्रस्तुत किया था और यह भी याद दिलाया था यही ध्वनि किसी चीज के फूटने ने किसी अन्य क्रिया के द्वारा भी उत्पन्न हो सकती है और ध्वनि में एक होते हुए भी स्रोत की भिन्नता के कारण स्वतंत्र शब्द है।

स्रोत की ओर से ध्यान हट जाने से बक – स्फोट या प्रकृत ध्वनि, बकना- कुछ भी कह देना; बक- वह पक्षी जो यह ध्वनि करता रहता हो; बकवास = व्यर्थ कथन (यह 2 शब्दों (बक+ वास=वाणी) के योग से बना योगिक शब्द है; बूकना (बढ़- बढ़ कर बातें करना); भो. बेकारि – आवाज फूटना > वाक्य ; बं. बोका = मूर्ख, जो अपना बात कायदे से रख न सके; भो. ब(उ)क; भकुआ- अवाक्> भकुआना; भकभेल्लर = नितान्त मूर्ख, भाखल = कहना> सं. *बक्षति;>वक्षति, भक्खल= खाना > सं. भक्ष, भक्षण; भूख > सं. *भुक्षा > भुक्षाभुक्षा> बुभुक्षा; भीख > भिखारी – भिक्खु; सं. भिक्षा/भिक्षुक/ भिक्षु आदि जिनको हम पहले गिना आए है।

यहां हमारे सामने दो समस्याएं हैं। पहला कि जिन शब्दों के संस्कृत रूप मिलते हैं, जिनको हम तत्सम कहने के इसलिए अभ्यस्त हैं, क्योंकि संस्कृत आचार्यों की धारणा यह थी कि प्राकृत भाषा संस्कृत से निकली हैं न कि एक विशेष बोली का संस्कृतीकरण हैं, जिनकी नकल पर सचमुच संस्कृत में सोचने वाले ध्वनि परिवर्तन से उन्हें प्राकृतिक बनाते रहे। इसका यह नतीजा निकाला गया यदि बोली के शब्द संस्कृत के प्रति रूपों से निकटता रखते हैं तो वे उनके तद्भव रूप हैं, अर्थात मूल संस्कृत है और बोली का रूप उनका बिगड़ा हुआ रूप। यही इस मान्यता का आधार बना कि प्राकृत, अपभ्रंश आधुनिक उत्तर भारतीय बोलियां संस्कृति में संस्कृत में क्रमशः आए विकार का परिणाम है।

यह खेल कुछ टेढ़ा है । इसके दो चरण हैं। पहला जिसमें बोलियों के निसर्गजात शब्द या नित्य कही जाने वाली ध्वनि (स्फोट) के अनुकरण से बने हुए शब्द, बोलियों की अपनी पूँजी हैं, जिनका क्रमिक संस्कृतीकरण या रूपान्तर कई भाषाओं के प्रभाव से गुजरने के कारण होता है। इन परिवर्तनों में पंडितों की भूमिका नहीं है। यह है पूर्वी बोली का सारस्वत क्षेत्र में पहुंचने तक ध्वनिमाला में हुए परिवर्तन का चरण। उदाहरण के लिए यह सभी मानते हैं मूल भारोपीय में और क-वर्ग था च- वर्ग नहीं था। अंतर केवल इतना ही है कि वे मानते रहे हैं यह अंतर उच्चारण स्थान में बदलाव के कारण आया। हम पाते हैं कि यह ध्वनि मगों की बोली की है जिनकी ध्वनि माला में कवर्गीय ध्वनियाँ नहीं थीं इसलिए वे देवों भाषा की ध्वनियों का उच्चारण अपने ढंग से करते थे। वे दंत्य स का उच्चारण भी च रूप में करते थे। आज की परिस्थिति में यह आश्चर्य की बात लगेगी कि देव भाषा ने दूसरी चवर्गीय ध्वनियाँ अपनाई परंतु तालव्य श को नहीं अपना सकी, और मगों ने क्रमशः दूसरी ध्वनियाँ अपनाईं परंतु दंत्य स का उच्चारण करने में चूक करते रहे।

इस बात के पक्के प्रमाण हैं सारस्वत भाषा में घोष महाप्राण ध्वनि या नहीं थी। हम क्रमशः एक ऐसी स्थिति में पहुंचते हैं जिस का सही अनुमान तमिल को ध्यान में रखकर किया जा सकता है। यह संभव है कि कुछ बोलियों में घोष ध्वनियों का भी अभाव था और कुछ में अघोष अल्पप्राण अर्थात वर्ग की पहली ध्वनियों का अभाव था। इसमें हम जितना भी भीतर प्रवेश करें उलझते जाने की संभावना बढ़ती जाएगी।

बोलियों की बहुत छोटी सी ध्वनिमाला से आदिम कृषि की अवस्था में काम चल जाता था। कृषि प्रौद्योगिकी विकास सामाजिक जटिलता के समानांतर हुआ है और इस बीच में कृषिकर्म अपनाने वालों की ध्वनि माला भी अधिक समृद्ध होती गई और आरंभिक आवश्यकता इनके योगदान से पूरी होती रही। इसके बाद औद्योगिक विकास का चरण आता है और जिस तरह यंत्रों और प्रसाधनों में जोड़-तोड़ करके नई चीजें बनाई जाने लगी भाषा के घटकों से नई आवश्यकताओं के अनुसार शब्द निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हुई और यहां से संस्कृतीकरण के उस चरण पर पहुंचते हैं जहां से बोलियां उनके लिए कच्चा माल प्रस्तुत करने वाले स्रोतों में बदल गई और नए ढंग के उपसर्ग अंतःसर्ग और प्रत्यय आदि जोड़कर कृत्रिम शब्दावली गढ़ी जाने लगी। यहां पहुंचकर नैसर्गिक ध्वनियों के घटक धातु के रूप में प्रयोग में आने लगे। यह प्रक्रिया वैदिक भाषा के निर्माण के समय तक पूरी हो चुकी थी यद्यपि इसमें ठहराव नहीं आया था।

Post – 2020-04-18

सिर्फ एक मामले में मैं आइंस्टाइन से कुछ बड़ा पड़ता हूँ।

Post – 2020-04-17

#शब्दवेध(12)
भाषा की उत्पत्ति

एक बार हमने प्राचीन भारतीय वैयाकरणों ( आचार्यों ) से भर्तृहरि के भाषा की उत्पत्ति विषयक अंतर की बात कर ही दी तो इसे स्पष्ट करना उचित लगता है। यह अंतर निम्न रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है:

प्राचीन आचार्य सृष्टि से पहले न केवल छंदबद्ध भाषा की उपस्थिति मानते थे, अपितु लिखित वेदों का भी अस्तित्व मानते थे। उनकी यह मान्यता अपना निषेध स्वयं करती थी, क्योंकि सृष्टि से पहले किसी चीज का अस्तित्व नहीं हो सकता था, फिर भाषा और वेद का कैसे हो सकता था। पूर्वाग्रह और स्वार्थ महान से महान पंडितों को कितनी नासमझी की बातें करने को प्रेरित कर सकता है इसका यह ज्वलंत उदाहरण है। पूरी परंपरा में किसी ब्राह्मण को इसमें कोई गलती दिखाई नहीं दी।

भर्तृहरि इसके विपरीत मानते हैं के सृष्टि नाद के साथ आरंभ हुई। यह सिद्धांत अकाट्य है। कारण यदि क्रिया है तो गति होगी और नाद भी होगा। इनमें से एक के अभाव में दूसरा संभव नहीं है। परंतु यह नाद या स्फोट है जिसके हमारे वाक्तंत्र द्वारा पुनरुत्पादन या अनुकरण से व्यावहारिक शब्द उत्पन्न होता है।

ऋग्वेद में, जिस रूप में मैं इसे समझ पाया हूं, भाषा के विषय में यह कहा गया है यह परिवेश में प्राकृत या निसर्गजात अस्पष्ट ध्वनियों के रूप में भाषा के घटक विद्यमान हैं। मनुष्य की भाषा उन्हीं में से सार्थक और उच्चारण में आसान नियत पदों का चयन है। ऋग्वेद में बार-बार सूनृता वाणी का हवाला आता है।

सरस्वती ‘सूनृता को प्रेरित करती और सद्बुद्धि को जगाती है, (चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्, ऋ. 1.3.11)। कशा या सटाकी के, हल्के आघात से पैदा होने वाली आवाज सूनृता है, (या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावती । 1.22.3)। उषा द्वेष से रहित, ऋत की पालक, ऋत से ही उत्पन्न, सुमनस्यता से भरा कलरव सूनृता है, (यावयत् द्वेषा ऋतपा ऋतेजाः सुम्नावरी सूनृता ईरयन्ती । 1.113.12)। स्तुति की वाणी, सूनृता है, (स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते । विभूतिरस्तु सूनृता ।। 1.30.5)। ब्रह्मणस्पति से सूनृता देवी को यज्ञ में आने के लिए प्रेरित करने की याचना की गई है, ( प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । 1.40.3) उषा सूनृतावती है, ( रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति ।। 1.92.14)। वायु की ध्वनि से सूनृता वाक की तुलना की गई है, (वायोरिव सूनृतानामुदर्के ता अश्वदा अश्नवत् सोमसुत्वा ।। 1.113.18)। जल के प्रवाह की क्रीड़ा करती ध्वनि सूनृता है, ( क्रीळन्त्यस्य सूनृता आपो न प्रवता यतीः । 8.13.8)। गाय के रँभाने की ध्वनि सूनृता है, (धेनुष्ट इन्द्र सूनृता यजमानाय सुन्वते । 8.14.3)।सतुतियाँ सूनृता हैं, ( ऊर्ध्वा हि ते दिवेदिवे सहस्रा सूनृता शता । जरित्रिभ्यो विमंहते ।। 8.45.12; मंहिष्ठामूतिं वितिरे दधाना स्तोतार इन्द्र तव सूनृताभिः ।। 10.104.5)। शायणाचार्य ने सूनृता वाक की परिभाषा करते हुए इसे ‘पशुपक्षिमृगादीणां भाषा कहा है। आदि में आप मनुष्यों की नैसर्गिक भाषा को भी शामिल कर सकते हैं, यद्यपि इसका प्रयोग स्तुतियों के लिए भी किया गया है। इसका प्रधान गुण है निष्कलुषता, माधुर्य और सत्यात्मकता जिसके कारण इसे ऋतंभरा वाक् भी कहा जा सकता है।

ऋग्वेद में परिमित पदों वाली चार प्रकार की वाणी का उल्लेख है – चत्वारि वाक् पारमिता पदानि। परंतु इन सभी को केवल मनष्वी लोग ही जान पाते हैं (तानि विदुः ब्राह्मणा ये मनीषिणः), क्योंकि इनमें से तीन अव्यक्त हैं इसलिए इनके संकेत सभी की समझ मे नहीं आते (गुहा त्रीणि निहिता न ईंगयन्ति), और चौथी मनुष्य के व्यवहार में आती हैं (तुरीया वाचं मनुष्या वदन्ति)। वाणी के ये चारों रूप क्या है इसे लेकर विद्वानों ने बहुत दूर की कल्पनाएं की है और सभी को केवल मनुष्य तक सीमित रखा है। यह विचार से शब्द में परिवर्तित होकर वाणी से प्रकट होने की व्याख्या है। जिन विद्वानों ने ये यात्राएं की हैं उनके सामने नतमस्तक होकर भी असहमति जताने का प्रलोभन होता है। क्योंकि यह सभी परिमित पद वाली वाणी के रूप हैं और वाणी से व्यक्त होने से पहले की अवस्थाएं (जैसे परा, पश्यन्ती आदि) इसमें शामिल नहीं की जा सकतीं।

ऋग्वेद में भाषा की उत्पत्ति के विषय में कहा गया है कि मनस्वी लोगों ने प्राकृतिक परिवेश की इन गूढ़ या अस्पष्ट ध्वनियों में से जो श्रेष्ठ या सबसे उपयुक्त था अरिप्र अर्थात् स्पष्ट था उसको प्रेम या सावधानी पूर्वक (प्रेणा) चयन किया। गुहाविः का अर्थ है गूढ़ता से बाहर निकाला, जिसके लिए हमने चयन किया का प्रयोग कामचलाऊ रूप में किया जो बहुत उपयुक्त नहीं लगता, क्योंकि पूरी भाषा एक साथ गढ़ी नहीं गई, अनुकारी शब्द क्रमशः भाषा का अंग बनते चले गए( बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत्प्रैरत नामधेयं दधानाः । यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः ।। 10.71.1)।

एक अन्य संदर्भ में भाषा की उत्पत्ति का सबसे प्रमुख स्रोत जल को बताया गया है। असाधारण शक्ति वाली वाणी (वागंभृणी) अपना परियय देते कहती है, यह ब्रह्मांड मेरा पैदा किया हुआ है और मेरा जन्म स्थान जल है, मैंने समस्त जगत को अपने में समाहित कर रखा है (अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे । ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणा उप स्पृशामि ।। 10.125.7), ।

इस रहस्य को समझ लेने के बाद, यह समझना आसान हो जाएगा सरस्वती को ही विद्या और ज्ञान की देवी क्यों माना गया। नदी शब्द अर्थ है जो नाद करती है। नाद के तो अनेक स्रोत हैं, परंतु प्रमुखता के कारण, भाषा की शब्दावली का प्रधान स्रोत होने के कारण जल और नदी को यह संज्ञा मिली।

हम इस बात को रेखांकित करना चाहते हैं कि पाश्चात्य जगत 200 साल भाषा की उत्पत्ति पर लगाने के बाद थक कर, इस समस्या को असाध्य मानकर, बैठ गया। हमारे प्राचीन आचार्यों ने भी इस मामले में सावधानी नहीं बरती, इसका उल्लेख हम लेकर आए हैं। परंतु वैदिक समाज ने उन से डेढ़ हजार साल पहले और आज से लगभग साढ़े पाँच हजार साल पहले इस समस्या का हल निकाल लिया था। हम आगे चलकर इसकी विस्तृत चर्चा करेंगे, यहाँ इतना ही कि भर्तृहरि मेरी सीमित जानकारी में पहले भाषावैज्ञानिक हैं जिन्होंने भाषा विमर्श को वेदिक चिंतन से जोड़ा, और हमें स्वयं इसका इतने विलंब से पता चला कि लंबे समय तक इस अथाह महासागर में थपेड़े खाते हुए किसी सहारे के लिए भटकते रहे और जिसे अपने जीवन का सबसे महत्पूर्ण कार्य मानता रहा वह लगातार टलता रहा।

Post – 2020-04-16

#शब्दवेध(11)
स्फोटक शब्द (2)

भारतीय चिन्तकों के अनुसार हिरण्यगर्भी अंडाणु के स्वतः फटने से भण् की ध्वनि उत्पन्न हुई, यही सृष्टि का आरंभ था। भण् की यह ध्वनि या स्फोट (किसी चीज के फूटने या फटने से उत्पन्न) या नाद सृष्टि का आरंभ था इसलिए इसे नाद ब्रह्म या शब्द-ब्रह्म कहा गया। हँसने के आदी लोग – जिनकी कई पीढ़ियां अतीत की आसक्ति से बचा कर रखने वाली नकारात्मक शिक्षा से पैदा की गई हैं- इस पर हंस सकते हैं, परंतु हम यह सोचकर विस्मित रह जाते हैं कि आधुनिक वैज्ञानिकों ने प्रलय (Big Cruch) की कल्पना गुरुत्व की उस पराकाष्ठा को माना जिसमें समस्त ब्रह्मांड सिमट कर शून्यवत रह जाता है, और माना कि दोबारा महा विस्फोट (Big Bang) से सृष्टि का आरंभ होता है। इस धारणा मामूली बदलाव यह कि गुरुत्वाकर्षण को सही कारण न मानकर इसे चरमप्रशीतन और महाउन्मेष के परिणामस्वरूप घटित होने वाली घटना माना जाने लगा है। [1]
[1] The Big Crunch is a hypothetical scenario for the ultimate fate of the universe, in which the expansion of the universe eventually reverses and the universe re-collapses, ultimately causing the cosmic scale factor to reach zero, an event potentially followed by a reformation of the universe starting with another Big Bang. The vast majority of evidence indicates that this theory is not correct. Instead, astronomical observations show that the expansion of the universe is accelerating, rather than being slowed down by gravity, suggesting that a Big Chill or Big Rip are far more likely to occur. Wikipedia Encyclopedia.

हमारे लिए महाध्वंस और महास्फोट ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय चिंता में इसे कालचक्र के रूप में ग्रहण किया गया है। महाप्रलय (महाध्वंस या बिग क्रंच) तथा महास्फोट (बिगबैंग), शून्यवत संकोच और फिर भी उसमें समस्त ब्रह्मांड का समाहित रहना और विस्फोट से ही व्यक्त हो जाना – इतनी प्राचीन भारतीय अवधारणा अत्याधुनिक विज्ञान की अवधारणा से शब्दशः कैसे मेल खाती है, किसने किससे प्रेरणा ग्रहण की है न तो इस विषय में किसी संशय की जगह नहीं, न ही इस विषय में कि अवधारणाओं की इतनी दूर तक समानता आकाश पतित नहीं होती।

हमने इस प्रसंग को इसलिए उठाया कि शून्य का महा-विस्फोट वस्तु जगत और नाद जगत का एकत्व भौतिक विज्ञानियों के लिए कोई समस्या पैदा नहीं करता। परंतु शब्द संज्ञान से जुड़ा हुआ है, विचार से जुड़ा हुआ है और दोनों का एक दूसरे के साथ अस्तित्व में आना, वस्तु (आदिकारण), क्रिया और नाद के एकीभाव को समझे बिना भाषा की प्रकृति को नहीं समझा जा सकता।

यह संभव है कि ऋग्वेद में पुरुष सूक्त ब्राह्मणों की जन्मजात श्रेष्ठता दिखाने के लिए बाद में जोड़ा गया हो, या कुछ भोंड़े रूप आदि कारण के आत्म विसर्जन या विस्फोट की अधकचरी समझ के कारण इसमें सृष्टि को नए रूप में कल्पित किया हो, परंतु हर हालत में ब्राह्मण होने के नाते भारतीय वैयाकरण पुरुष सूक्त की वर्णवादी व्याख्या करने के बाद इतने दुराग्रही हो गए कि भाषा पर विचार करते हुए इस बात का ध्यान ही नहीं रखा कि ऋग्वेद में भाषा की उत्पत्ति के संबंध में किस तरह के विचार प्रचलित थे। यह तब जब व्याकरण के गहन विमर्श में वे इस प्रयत्न में डूबे थे कि शताब्दियों के परंपरा विच्छेद के बाद वे उसका अर्थ समझ सकें।

इस आग्रह के कारण उनकी व्याख्या जहाँ लंगडी रह गई, वहीं वेदों के मर्मज्ञ भर्तृहर ने भाषा विषयक अपनी व्याख्या को प्राचीन चिंता धारा से जोड़ा और यह बताया कि जिससे जो ध्वनि निकलती है वही उसका शब्द है और उससे जिस अर्थ की प्रतीति होती है वही उसका अर्थ है, इसके अतिरिक्त अर्थ का अन्य कोई कारण नहीं (यस्मिन् तु उच्चरते शब्दे यदा योऽर्थः प्रतीयते। तं आहुः अर्थ तस्य एव नान्यत् अर्थस्य लक्षणम्।। वाक्पदीय 2.328)।

व्याख्या अवश्य कुछ दार्शनिक हो जाती है जिसके विस्तार में हम नहीं जाएंगे, परंतु संक्षिप्त परिचय यह है कि शब्द दो प्रकार के होते हैं, नित्य और कार्य साधक, कार्य साधक या व्यवहारिक शब्द के कई रूप हो सकते हैं। नित्य शब्द स्फोटात्मकः होता है, वही ब्रह्म स्वरूप है। शब्द का स्रष्टा। ( शब्दः द्विविधः. नित्यः कार्यश्च, कार्यः व्यावहारिकः, नित्यः स्फोटात्मकः। शब्द ब्रह्मात्मकश्च।)

अब हम अपनी व्याख्या पर आ सकते हैं, जो, यदि भर्तृहरि को समझने में हमसे भूल न हुई हो तो किसी क्रिया से किसी वस्तु से उत्पन्न होने वाली नैसर्गिकध्वनि, अपरिवर्तनीय है, उस वस्तु और क्रिया से इसका नित्य संबंध है, परंतु हम उसी को अपनी भाषा की ध्वनिमाला की सीमा में एकाधिक रूपों में अपने उच्चारण तंत्र से नकल करते हैं। यह उस ध्वनि का वाच्य रूप कहा जाएगा। हमारी व्यवहारिक शब्दावली उसके इसी रूप से तैयार होती है, परंतु अर्थ का स्रोत नित्य है। हम भर्तृहरि की स्थापना को इस रूप में रखना चाहते हैं कि मूल उपादान, क्रिया विशेष और उसके नाद में ही अर्थ निहित होता है और उस वस्तु के गुणधर्म, सादृश्य, विरोध, साहचर्य के आधार पर ऐसी दूसरी वस्तुओं, और सत्ताओं का नामकरण किया जाता है जिनमें से कोई भी उत्पन्न नहीं होती।

आश्चर्य केवल इस बात का है, कि इस सिद्धांत को इसकी तार्किक परिणति तक पहुँचाते हुए भाषा की उत्पत्ति और विकास, जिसमें भारोपीय की उत्पत्ति और विकास भी निहित है का कभी अध्ययन करने का प्रयत्न क्यों नहीं किया गया।

हमारी अपनी स्थापना सुनने में विचित्र अवश्य लगती है, परंतु यह हमारे परंपरागत चिंतन से जुड़ी हुई है, यद्यपि इसकी ओर हमारा ध्यान कुछ विलंब से गया।

जैसा हम पहले का अलग अलग स्रोतों से अलग अलग क्रियाओं से उत्पन्न होने वाली ध्वनियों में अंतर होता है, परंतु अपनी उच्चारण सीमा के कारण उनमें से अनेक को एक तरह ही सुन और बो ल पाते। सुनने में एक प्रतीत होने वाले शब्द अपने स्रोत के अनुसार अलग-अलग (समनादी या होमोफोनिक) शब्द होते हैं। परन्तु आज हम इसके विस्तार में नहीं जा सकते।