Post – 2018-03-21

हमारी भाषा (8)
वन अर्थात् काटना

पेड़ पौधे हमें आहार देते हैं, ऑक्सीजन देते हैं, हमारी उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं, पानी बरसाने में उत्प्रेरक का काम करते हैं, और हम पेड़ों को काटते हैं, जलाते हैं। कैसी कृतघ्नता है! पर है तो है। वन का एक अर्थ ‘पेड़’ है, दूसरा ‘जंगल’ है, . तीसरा अर्थ ‘काटना’। वनोति का अर्थ है ‘काटता है’। वन का अर्थ जल है इसे तो आप वन्या और इसके बंगाली रूप बान = ज्वार से ही समझ सकते हैं। पर मैं अभी तक यह तय नहीं कर सका की वन जल की किस अवरोध से उत्पन्न ध्वनि का अनुकार है। वृक्ष सुनने पर अवश्य लगता है किसी शाखा को झटके से पकड़कर तोड़ने या जैसा कि भोजपुरी में कहते हैं छिनगाने ( छिन्न करने) से उत्पन्न के वृश्च या इससे मिलते-जुलते रूप से बना है। इसी से बना है बिच्छु जिसके लिए संस्कृत वृश्चिक शब्द प्रचलित है । ऐसा लगता है की वृश्चिक बाद का संस्कृतीकरण है और मूल रूप बिच्छ ही रहा होगा। चुनने के लिए हिंदी में छांटना शब्द का प्रयोग होता है जो काटने का अनुपूरक है। छांटना धारदार हथियार से कुश आदि काटने के से उत्पन्न ध्वनि का अनुकरण लगता है। भोजपुरी में बीछना छांटने के आशय में प्रयुक्त होता है। यह अधिक स्वाभाविक लगता है की मूल ध्वनि बिच्छ ही बदल कर वृक्ष बनी हो और उसके लिए वृश्च धातु कल्पित की गई । मूल ध्वनि जो भी रही हो इतना तो निश्चित है कि इसका नामकरण भी काटने से संबंध रखता है।
काटने का कोई निश्चित प्रयोजन होता है, अतः काटना, छीलना निर्माण से भी जुड़ा होता है। कटि का अर्थ जोड़ होता है न कि कटा हुआ । हमारा पाला आगे चलकर ऐसे बहुत से शब्दों से पड़ेगा जिनमें किसी शब्द का एक अर्थ काटना है तो दूसरा बनाना, कल – काल- कला। इसलिए वृक्ष संभवता छाया देने या ऊपर से घेरने के अर्थविस्तार से ‘पिटारी’ के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। वक्ष वृक्ष का ही प्रतिरूप है। अंग्रेजी में इससे मिलते जुलते दो शब्द हैं एक वक्ष की ध्वनि से प्रेरित बॉक्स और दूसरा अर्थ से प्रेरित चेस्ट । वहां यदि गायब है तो वह है मूल स्रोत का संकल्पनात्मक विकास। यही वह पिटारी है जिसमें हमारे सबसे मूल्यवान अंग ह्रदय और फेफड़ा रखे गए हैं। और सच कहिए तो या पेटी से अधिक पिजड़ा, पंजर । पिजड़े को बनाने के लिए अस्थियों का प्रयोग हुआ है इसलिए अस्थिपंजर, जिसमें दो पक्षी निवास करते हैं एक है आत्मा और दूसरा है जीव। कवि की उद्भावना में वृक्ष और पंजर दोनों विराजमान रह सकते हैं और इसलिए आवश्यकता होने पर कवि वृक्ष के ऊपर से एक डाल पर बैठे हुए दो पक्षियों की बात करता है तो दूसरे में एक पिजड़े में बंद आत्मा की बात करता है जो मृत्यु के समय पिजड़े को तोड़कर बाहर निकल जाता है। इसको लेकर एक बड़ी अच्छी ऋचा ऋग्वेद में हैः

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते ।
तयोः अन्यः पिप्पलं स्वादु अत्त्ति अनश्नन् अन्यो अभि चाकशीति ।। 1.164.20

इसका सटीक चित्रण हड़प्पा की एक मुद्रा पर हुआ है। इस पर हम पहले लिख चुके हैं अतः इसके विस्तार में न जाएंगे।

हम सूखे काठ पर पत्थर के औजार से चोट करें तो उससे ठक् या कठ् ध्वनि निकलती है। काठ उसी ध्वनि से बना है। जब हम किसी चीज को कठोर कहते हैं तो अर्थ होता है ‘सूखे काठ जैसा’। जब कठिन कहते हैं तो आशय होता है ‘लकड़ी की गांठ की तरह चीरने (हल करने ) में दुष्कर’ । जब कड़ा कहते हैं आशय होता है पत्थर जैसा। एक ही आशय में प्रयुक्त दो पर्यायों के अर्थ में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है, इसे हम नहीं समझते और यह मान लेते हैं कि एक के स्थान पर दूसरा प्रयोग में लाया जा सकता है। कठिन और कठोर के साथ कड़ा की तुलना में अधिक मजबूती का भाव होता हैं । औजार बनाते समय पत्थर को पत्थर से टकराकर तोड़ना अधिक आसान था जब कि सूखे हुए काठ को पत्थर के औजार से काटना-तराशना अधिक कठिन। धातुयुग आने के साथ स्थिति उलट गई। इस तरह कई बार शब्द के अर्थ में इतिहास की छाया भी दृष्टिगोचर होती है। जब हम ‘कड़ाके की ठंड’ की बात करते हैं तो आशय होता है ऐसी ठंढ जिससे पानी पत्थर में बदल जाए, इसलिए ओले के लिए उपल शब्द का प्रयोग होता है । कड़ाके का संस्कृतीकरण करका में देखा जा सकता है.

वृक्ष के लिए एक अन्य शब्द पेड़ है। इसमें भी पेटी वाला भाव है। पहले मुझे लगता था इसका कुछ नाता तमिल पेरुमै – बड़प्पन, ऊँचाई से हो मकता है, पर स्वयं तमिल में पेड़ के लिए मरम का चलता है। मेरी मनोबाधा छाती के लिए पिटारी के आशय के जुड़ जाने के कारण थी, पर पेटी के ऊपर पेटी क्यों नहीं रखी जा सकती जब प्रकृति की बनावट ही ऎसी है तो।

Post – 2018-03-21

देखिए क्या चीज है इन्सान भी
खुद से लड़ता है खुदा की आड़ में।

Post – 2018-03-21

देखिए क्या चीज है इन्सान भी
खुद से लड़ता है खुदा की आड़ में।

Post – 2018-03-21

देखिए क्या चीज है इन्सान भी
खुद से लड़ता है खुदा की आड़ में।

Post – 2018-03-21

चांद फिर चांद बनके निकला है
रंग बाकी है आसमानों में!

Post – 2018-03-21

चांद फिर चांद बनके निकला है
रंग बाकी है आसमानों में!

Post – 2018-03-21

चांद फिर चांद बनके निकला है
रंग बाकी है आसमानों में!

Post – 2018-03-20

हमारी भाषा (७)

दर से दर्पण

दर से दर्द ही नहीं एक पूरी शब्द श्रृंखला जन्म लेती है जिसके शब्द केन्दरीय भूमिक निभाते हुए अपने गिर्द शाब्दावली का जनन करते हैं। इस प्रक्रिया को हम समझ सकते हैं, पर इस तरह उस समूची शब्दावली को संकलित करने का प्रयत्न करें भी तो बहुत कुछ छूट जाएगा।

इस बात का ध्यान रखना होगा कि जल के अनेक गुण है, जैसे द्रवत्व, तृप्तिदायकत, गति और उसकी दिशा, छायाग्राहिता, शीतलता आदि। इसके एक गुण या धर्म से पैदा शब्दावली पर ही ध्यान केन्द्रित करें और हठात दूसरे धर्म से प्रसूत शब्दावली से हठात पाला पड़ जाये तो विश्वास नहीं होगा कि इस शब्दावली की जननी भी वही ध्वनि है या हो सकती है। इसी तरह उदाहरण के लिए एक बार इस बात का कायल हो जाने के बाद कि तर तरु और तर्द (प्रतर्दन, ऋतस्य श्लोको बधिराततर्द) और दर दारु, दारण और दर्द का जनक हो सकता हौ ( तीखे दर्द में हम फटने का प्योग करते ही हैं – सर फटा जा रहा है), हम दर/ दरवाजा, सं. दरी – कंदरा, गुहा, दर्रा; दरकना, दारुण परन्तु दरिद्र का इससे कोई नाता है यह कुछ खींच-तान जैसा लगेगा। यह याद आने में कुछ समय तगेगा कि जल को सबसे बड़ा धन कहा गया है। धन के सभी पर्याय – द्रव्य, द्रविण, अर्थ, अप्न, नृम्ण, रेक्ण सभी जलवाची हैं। स्वयं धन का अर्थ जल है, इसलिए निर्जल क्षेत्र या रेगिस्तान के लिए धन्व का प्रयोग होता रहा है।

यदि कहें कि दल (पार्टी), दलाल, दलील, और दलित का भी उत्स दर/दल ही है तो झुंझलाहट सी होगी। पर दारण = दलन, >दाल,> दलहन,> दलिया का जनक है। दाल के दोनों हिस्से उस अनाज के भाग या पार्ट है, अत: नया होते हुए भी राजनीतिक संगठनों के लिए यह नाम उपयुक्त है यद्यपि यहा दल समूह सूचक है, न कि विभाजन परक। परनतु दलाल, दलील में दल पक्ष का, दलाल उन दोनों पक्षों के बीच मध्यस्त काऔर दलील उस तर्क के लिए प्रयुक्त है जो दलाल मंबंधित पक्षों को कायल करने के लिए देता है। यह बात दूसरी है कि यह प्ली या आर्गनमेंट के सामान्य अरथ में प्रयुक्त होती है। दलित का भी मूल आशय दले हुए का ही है, पर वह मनुष्य के लिए अव्यवहार्य होने के कारण पददलित के लिए प्रयुक्त है। यह अनाज के डंठल से अनाज को अलग करने का बहुत पुराना तरीका है जो बाद में बर्तन बनाने की मिट्टी को गूंथने और राब से शक्कर बना एजाने के लिए प्रयोग होता रहा।

हम आज की पोस्ट को पानी के चमक वाले पक्ष पर केन्द्रित करना चाहते थे, पर पीछे के इस खुमार ने काफी जगह घेर ली। दर >दर्श > आदर्श = आईना, के विषय में किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। तृष/ तृषा, की तरह दृश, दृक्/दृग, दृश्य,दर्शन, को भी आसानी से समझा जा सकता है पर दर्प = अहंकार नहीं, रौब, अधिकार जन्य आभा इसका मूल आशय लगता और इसी का संबंध दर्पण से हो सकता है। तर>तृप्त की तरह दर/दृप्त रूप भी भी कठिन नहीं। ऋ. में प्रयुक्त द्रापी (पगड़ी) पद से जुड़े दर्प का प्रतीक ही है (बिभ्रत द्रापिं हिरण्मयीम् वरुणो वस्त निर्णिजम्। परिस्पशे निषेदिरे। स्थिर पानी यदि आदिम दर्पण है और क्षुब्ध या तरंगित जल बिगड़ा शीशा तो दर्पण को अपनी संज्ञा भी जल के किसी पर्याय से मिलनी ही थी।

यद इस एक उदाहरण से हम यह समझा सके हों कि एक मामूली अनकारीध्वनि कितने विशाल शब्दभंडार का जनन कर सकती है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह कृदन्त (धातुओं से निर्मित संज्ञा) शब्दों के अर्थनिर्धारण में संस्कृत आचार्यों को कोई कठिनाई नहीं आती परन्तु अकृदन्त या तद्धित संज्ञाओं में उनकी उलझन का पार नहीं। सींगको सीग क्यों कहते है, इस पर यास्क की। अटकलबाजियां देखने लायक है। किसी धातु को क्यों वहअर्थ मिला यह भी उनकीसमझ से बाहर रह जाता है। अनुकारी स्रोत परध्यान जाने पर ये पहेलियां स्वत: सिद्ध हो जाती है।

Post – 2018-03-20

हमारी भाषा (७)

दर से दर्पण

दर से दर्द ही नहीं एक पूरी शब्द श्रृंखला जन्म लेती है जिसके शब्द केन्दरीय भूमिक निभाते हुए अपने गिर्द शाब्दावली का जनन करते हैं। इस प्रक्रिया को हम समझ सकते हैं, पर इस तरह उस समूची शब्दावली को संकलित करने का प्रयत्न करें भी तो बहुत कुछ छूट जाएगा।

इस बात का ध्यान रखना होगा कि जल के अनेक गुण है, जैसे द्रवत्व, तृप्तिदायकत, गति और उसकी दिशा, छायाग्राहिता, शीतलता आदि। इसके एक गुण या धर्म से पैदा शब्दावली पर ही ध्यान केन्द्रित करें और हठात दूसरे धर्म से प्रसूत शब्दावली से हठात पाला पड़ जाये तो विश्वास नहीं होगा कि इस शब्दावली की जननी भी वही ध्वनि है या हो सकती है। इसी तरह उदाहरण के लिए एक बार इस बात का कायल हो जाने के बाद कि तर तरु और तर्द (प्रतर्दन, ऋतस्य श्लोको बधिराततर्द) और दर दारु, दारण और दर्द का जनक हो सकता हौ ( तीखे दर्द में हम फटने का प्योग करते ही हैं – सर फटा जा रहा है), हम दर/ दरवाजा, सं. दरी – कंदरा, गुहा, दर्रा; दरकना, दारुण परन्तु दरिद्र का इससे कोई नाता है यह कुछ खींच-तान जैसा लगेगा। यह याद आने में कुछ समय तगेगा कि जल को सबसे बड़ा धन कहा गया है। धन के सभी पर्याय – द्रव्य, द्रविण, अर्थ, अप्न, नृम्ण, रेक्ण सभी जलवाची हैं। स्वयं धन का अर्थ जल है, इसलिए निर्जल क्षेत्र या रेगिस्तान के लिए धन्व का प्रयोग होता रहा है।

यदि कहें कि दल (पार्टी), दलाल, दलील, और दलित का भी उत्स दर/दल ही है तो झुंझलाहट सी होगी। पर दारण = दलन, >दाल,> दलहन,> दलिया का जनक है। दाल के दोनों हिस्से उस अनाज के भाग या पार्ट है, अत: नया होते हुए भी राजनीतिक संगठनों के लिए यह नाम उपयुक्त है यद्यपि यहा दल समूह सूचक है, न कि विभाजन परक। परनतु दलाल, दलील में दल पक्ष का, दलाल उन दोनों पक्षों के बीच मध्यस्त काऔर दलील उस तर्क के लिए प्रयुक्त है जो दलाल मंबंधित पक्षों को कायल करने के लिए देता है। यह बात दूसरी है कि यह प्ली या आर्गनमेंट के सामान्य अरथ में प्रयुक्त होती है। दलित का भी मूल आशय दले हुए का ही है, पर वह मनुष्य के लिए अव्यवहार्य होने के कारण पददलित के लिए प्रयुक्त है। यह अनाज के डंठल से अनाज को अलग करने का बहुत पुराना तरीका है जो बाद में बर्तन बनाने की मिट्टी को गूंथने और राब से शक्कर बना एजाने के लिए प्रयोग होता रहा।

हम आज की पोस्ट को पानी के चमक वाले पक्ष पर केन्द्रित करना चाहते थे, पर पीछे के इस खुमार ने काफी जगह घेर ली। दर >दर्श > आदर्श = आईना, के विषय में किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। तृष/ तृषा, की तरह दृश, दृक्/दृग, दृश्य,दर्शन, को भी आसानी से समझा जा सकता है पर दर्प = अहंकार नहीं, रौब, अधिकार जन्य आभा इसका मूल आशय लगता और इसी का संबंध दर्पण से हो सकता है। तर>तृप्त की तरह दर/दृप्त रूप भी भी कठिन नहीं। ऋ. में प्रयुक्त द्रापी (पगड़ी) पद से जुड़े दर्प का प्रतीक ही है (बिभ्रत द्रापिं हिरण्मयीम् वरुणो वस्त निर्णिजम्। परिस्पशे निषेदिरे। स्थिर पानी यदि आदिम दर्पण है और क्षुब्ध या तरंगित जल बिगड़ा शीशा तो दर्पण को अपनी संज्ञा भी जल के किसी पर्याय से मिलनी ही थी।

यद इस एक उदाहरण से हम यह समझा सके हों कि एक मामूली अनकारीध्वनि कितने विशाल शब्दभंडार का जनन कर सकती है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह कृदन्त (धातुओं से निर्मित संज्ञा) शब्दों के अर्थनिर्धारण में संस्कृत आचार्यों को कोई कठिनाई नहीं आती परन्तु अकृदन्त या तद्धित संज्ञाओं में उनकी उलझन का पार नहीं। सींगको सीग क्यों कहते है, इस पर यास्क की। अटकलबाजियां देखने लायक है। किसी धातु को क्यों वहअर्थ मिला यह भी उनकीसमझ से बाहर रह जाता है। अनुकारी स्रोत परध्यान जाने पर ये पहेलियां स्वत: सिद्ध हो जाती है।

Post – 2018-03-20

हमारी भाषा (७)

दर से दर्पण

दर से दर्द ही नहीं एक पूरी शब्द श्रृंखला जन्म लेती है जिसके शब्द केन्दरीय भूमिक निभाते हुए अपने गिर्द शाब्दावली का जनन करते हैं। इस प्रक्रिया को हम समझ सकते हैं, पर इस तरह उस समूची शब्दावली को संकलित करने का प्रयत्न करें भी तो बहुत कुछ छूट जाएगा।

इस बात का ध्यान रखना होगा कि जल के अनेक गुण है, जैसे द्रवत्व, तृप्तिदायकत, गति और उसकी दिशा, छायाग्राहिता, शीतलता आदि। इसके एक गुण या धर्म से पैदा शब्दावली पर ही ध्यान केन्द्रित करें और हठात दूसरे धर्म से प्रसूत शब्दावली से हठात पाला पड़ जाये तो विश्वास नहीं होगा कि इस शब्दावली की जननी भी वही ध्वनि है या हो सकती है। इसी तरह उदाहरण के लिए एक बार इस बात का कायल हो जाने के बाद कि तर तरु और तर्द (प्रतर्दन, ऋतस्य श्लोको बधिराततर्द) और दर दारु, दारण और दर्द का जनक हो सकता हौ ( तीखे दर्द में हम फटने का प्योग करते ही हैं – सर फटा जा रहा है), हम दर/ दरवाजा, सं. दरी – कंदरा, गुहा, दर्रा; दरकना, दारुण परन्तु दरिद्र का इससे कोई नाता है यह कुछ खींच-तान जैसा लगेगा। यह याद आने में कुछ समय तगेगा कि जल को सबसे बड़ा धन कहा गया है। धन के सभी पर्याय – द्रव्य, द्रविण, अर्थ, अप्न, नृम्ण, रेक्ण सभी जलवाची हैं। स्वयं धन का अर्थ जल है, इसलिए निर्जल क्षेत्र या रेगिस्तान के लिए धन्व का प्रयोग होता रहा है।

यदि कहें कि दल (पार्टी), दलाल, दलील, और दलित का भी उत्स दर/दल ही है तो झुंझलाहट सी होगी। पर दारण = दलन, >दाल,> दलहन,> दलिया का जनक है। दाल के दोनों हिस्से उस अनाज के भाग या पार्ट है, अत: नया होते हुए भी राजनीतिक संगठनों के लिए यह नाम उपयुक्त है यद्यपि यहा दल समूह सूचक है, न कि विभाजन परक। परनतु दलाल, दलील में दल पक्ष का, दलाल उन दोनों पक्षों के बीच मध्यस्त काऔर दलील उस तर्क के लिए प्रयुक्त है जो दलाल मंबंधित पक्षों को कायल करने के लिए देता है। यह बात दूसरी है कि यह प्ली या आर्गनमेंट के सामान्य अरथ में प्रयुक्त होती है। दलित का भी मूल आशय दले हुए का ही है, पर वह मनुष्य के लिए अव्यवहार्य होने के कारण पददलित के लिए प्रयुक्त है। यह अनाज के डंठल से अनाज को अलग करने का बहुत पुराना तरीका है जो बाद में बर्तन बनाने की मिट्टी को गूंथने और राब से शक्कर बना एजाने के लिए प्रयोग होता रहा।

हम आज की पोस्ट को पानी के चमक वाले पक्ष पर केन्द्रित करना चाहते थे, पर पीछे के इस खुमार ने काफी जगह घेर ली। दर >दर्श > आदर्श = आईना, के विषय में किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। तृष/ तृषा, की तरह दृश, दृक्/दृग, दृश्य,दर्शन, को भी आसानी से समझा जा सकता है पर दर्प = अहंकार नहीं, रौब, अधिकार जन्य आभा इसका मूल आशय लगता और इसी का संबंध दर्पण से हो सकता है। तर>तृप्त की तरह दर/दृप्त रूप भी भी कठिन नहीं। ऋ. में प्रयुक्त द्रापी (पगड़ी) पद से जुड़े दर्प का प्रतीक ही है (बिभ्रत द्रापिं हिरण्मयीम् वरुणो वस्त निर्णिजम्। परिस्पशे निषेदिरे। स्थिर पानी यदि आदिम दर्पण है और क्षुब्ध या तरंगित जल बिगड़ा शीशा तो दर्पण को अपनी संज्ञा भी जल के किसी पर्याय से मिलनी ही थी।

यद इस एक उदाहरण से हम यह समझा सके हों कि एक मामूली अनकारीध्वनि कितने विशाल शब्दभंडार का जनन कर सकती है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह कृदन्त (धातुओं से निर्मित संज्ञा) शब्दों के अर्थनिर्धारण में संस्कृत आचार्यों को कोई कठिनाई नहीं आती परन्तु अकृदन्त या तद्धित संज्ञाओं में उनकी उलझन का पार नहीं। सींगको सीग क्यों कहते है, इस पर यास्क की। अटकलबाजियां देखने लायक है। किसी धातु को क्यों वहअर्थ मिला यह भी उनकीसमझ से बाहर रह जाता है। अनुकारी स्रोत परध्यान जाने पर ये पहेलियां स्वत: सिद्ध हो जाती है।