Post – 2018-03-24

चमकता हुआ अंधेरा
(इस लेख में पहले लिखे लेखों के आंकड़ों का उपयोग करूंगा)

आपने अभी इस बात पर सोचा है जान दिया है ध्यान दिया है की अंधेरे के लिए हमारी भाषा में कोई अलग शब्द नहीं है हमने अंध की बात की थी और बताया था उसका अर्थ सोमरस (पाहि मध्वो अन्धसः) भी होता है मादक पेय (अमन्दत मघवा मध्वो अन्धसः) भी होता है और यदि जल (यद्वा समुद्रं अन्धसः) है तो कांति तो होगी ही। अन्धस उसी श्रृखला का शब्द है जिसमे अद, उद, इद, इंद, इंदु, अन्न, आदि आते हैं । यह अलग से कहने की जरूरत नहीं कि इन सबका अर्थ जल है और आप कह सकते हैं कि इंदु= चंद्रमा का अर्थ जल है, या उसकी संज्ञा जल की कांति पर आधारित है।

अंधेरे के लिए एक दूसरा शब्द तम है इसका प्रयोग ऋग्वेद में भी अंधकार के लिए हुआ तम आसीत तमसा गूढ़ं अग्रे, आरम्भ में अंधकार अंधकार में लिपटा हुआ था । परंतु तमकना, तामा / ताम्बा (ताम्र), तांबूल, तामरस से स्पष्ट है इसका अर्थ चमकने, दमकने या लालिमा है। इसकी विकास प्रक्रिया कुछ टेढ़ी है। मत, मद, मध्, मदु, मधु श्रृंखला में आता है । इसमें भी प्रत्येक शब्द का एक अर्थ जल है। मत वर्ण विपर्यय से तम बना है जल की चमक वाला भाव इसमें बना रह गया है जिसे ललौहे पदार्थों के लिए रूढ़ किया गया और फिर विरोध से अंधकार के लिए ।

मसि = स्याही या रोशनाई बनाने के लिए कालिख का प्रयोग किया जाता है। मसें भीगना =दाढ़ी मूंछ की रोमारेखा के लिए प्रयोग में आता है। जैसा कि रोशनाई से प्रकट होता है, इसमें भी रोशनी या प्रकाश का भाव है, न कि अंधेरे का । रोशनी उसी रुष से व्युत्पन्न है जैसे रोष। मस का अर्थ है ‘चमकने वाला’। इसी का मस और मास दोनों रूपों में चंद्रमा के लिए प्रयोग होता है। मास महीने के लिए रूढ़ हो चुका है जिसका अर्थ है चंद्रमा की एक परिक्रमा। मस और मास फारसी में मह और माह बन जाते हैं जिनका अर्थ चाँद होता है पर माह महीना के लिए रूढ़ सा है। अंग्रेजी में मास प्रतिरूप मंथ, मून से निकला। फारसी में चाँद के लिए महताब का भी प्रयोग होता है। सामान्यतः ताब का प्रयोग ताप और प्रताप के लिए होता है पर मह के साथ प्रयोग में आने पर इसमें गर्मी चमक बन जाती है।

यदि हम संस्कृत और अंग्रेजी में चंद्रमा के लिए प्रयुक्त चंद्र्मन पर ध्यान दें तो पता चलेगा इसमें तीन शब्द हैं। चन्+ द्र+मन् इन तीनों का एक अर्थ पानी है, दूसरा चमक है और तीसरा चंद्रमा (चन >चान, तर/तार का प्रकाश वाला भाव तर+णि और तारा की दिशा में स्थिर हुआ और मन को अंग. मून में लक्ष्य किया जा सकता है) कहें हम चंद्रमा कहते समय हम चाँद के तीन पर्यायों को मिला कर एक शब्द बना लेते हैं । परंतु चंद्रमा की संस्कृत रूपावली में मस् का प्रवेश हो जाता है चंद्रमा- चंद्रमसौ – चंद्रमसः और अब प्रकारांतर से चार शब्दों का एक साथ प्रयोग करते हैं।

अन्धकार का एक पर्याय है तिमिर । इसमें प्रयुक्त तिम का अर्थ जल है जिससे तिमिंगल = मत्स्य, महामत्स्य निकला है। इसका प्रकाश का भाव टिमटिमाना, टीम-टाम, टीमल- सुन्दर, में बचा रह गया है. (असमाप्त)

Post – 2018-03-24

चमकता हुआ अंधेरा
(इस लेख में पहले लिखे लेखों के आंकड़ों का उपयोग करूंगा)

आपने अभी इस बात पर सोचा है जान दिया है ध्यान दिया है की अंधेरे के लिए हमारी भाषा में कोई अलग शब्द नहीं है हमने अंध की बात की थी और बताया था उसका अर्थ सोमरस (पाहि मध्वो अन्धसः) भी होता है मादक पेय (अमन्दत मघवा मध्वो अन्धसः) भी होता है और यदि जल (यद्वा समुद्रं अन्धसः) है तो कांति तो होगी ही। अन्धस उसी श्रृखला का शब्द है जिसमे अद, उद, इद, इंद, इंदु, अन्न, आदि आते हैं । यह अलग से कहने की जरूरत नहीं कि इन सबका अर्थ जल है और आप कह सकते हैं कि इंदु= चंद्रमा का अर्थ जल है, या उसकी संज्ञा जल की कांति पर आधारित है।

अंधेरे के लिए एक दूसरा शब्द तम है इसका प्रयोग ऋग्वेद में भी अंधकार के लिए हुआ तम आसीत तमसा गूढ़ं अग्रे, आरम्भ में अंधकार अंधकार में लिपटा हुआ था । परंतु तमकना, तामा / ताम्बा (ताम्र), तांबूल, तामरस से स्पष्ट है इसका अर्थ चमकने, दमकने या लालिमा है। इसकी विकास प्रक्रिया कुछ टेढ़ी है। मत, मद, मध्, मदु, मधु श्रृंखला में आता है । इसमें भी प्रत्येक शब्द का एक अर्थ जल है। मत वर्ण विपर्यय से तम बना है जल की चमक वाला भाव इसमें बना रह गया है जिसे ललौहे पदार्थों के लिए रूढ़ किया गया और फिर विरोध से अंधकार के लिए ।

मसि = स्याही या रोशनाई बनाने के लिए कालिख का प्रयोग किया जाता है। मसें भीगना =दाढ़ी मूंछ की रोमारेखा के लिए प्रयोग में आता है। जैसा कि रोशनाई से प्रकट होता है, इसमें भी रोशनी या प्रकाश का भाव है, न कि अंधेरे का । रोशनी उसी रुष से व्युत्पन्न है जैसे रोष। मस का अर्थ है ‘चमकने वाला’। इसी का मस और मास दोनों रूपों में चंद्रमा के लिए प्रयोग होता है। मास महीने के लिए रूढ़ हो चुका है जिसका अर्थ है चंद्रमा की एक परिक्रमा। मस और मास फारसी में मह और माह बन जाते हैं जिनका अर्थ चाँद होता है पर माह महीना के लिए रूढ़ सा है। अंग्रेजी में मास प्रतिरूप मंथ, मून से निकला। फारसी में चाँद के लिए महताब का भी प्रयोग होता है। सामान्यतः ताब का प्रयोग ताप और प्रताप के लिए होता है पर मह के साथ प्रयोग में आने पर इसमें गर्मी चमक बन जाती है।

यदि हम संस्कृत और अंग्रेजी में चंद्रमा के लिए प्रयुक्त चंद्र्मन पर ध्यान दें तो पता चलेगा इसमें तीन शब्द हैं। चन्+ द्र+मन् इन तीनों का एक अर्थ पानी है, दूसरा चमक है और तीसरा चंद्रमा (चन >चान, तर/तार का प्रकाश वाला भाव तर+णि और तारा की दिशा में स्थिर हुआ और मन को अंग. मून में लक्ष्य किया जा सकता है) कहें हम चंद्रमा कहते समय हम चाँद के तीन पर्यायों को मिला कर एक शब्द बना लेते हैं । परंतु चंद्रमा की संस्कृत रूपावली में मस् का प्रवेश हो जाता है चंद्रमा- चंद्रमसौ – चंद्रमसः और अब प्रकारांतर से चार शब्दों का एक साथ प्रयोग करते हैं।

अन्धकार का एक पर्याय है तिमिर । इसमें प्रयुक्त तिम का अर्थ जल है जिससे तिमिंगल = मत्स्य, महामत्स्य निकला है। इसका प्रकाश का भाव टिमटिमाना, टीम-टाम, टीमल- सुन्दर, में बचा रह गया है. (असमाप्त)

Post – 2018-03-23

हमारी भाषा (९)
उल्टा-सीधा एक समान

फिकरा तो पहेलियों से संबन्धित है । बच्चे आज भी बुझाते होंगे। रबर, नमन जैसे शब्द और १२१ या इसी से मिलती जुलती संख्याएं बतानी होतीं। मनोरजन होता था।

भाषा में यदि एक ही शब्द के सीधे उल्टे दुहरे अर्थ हों तो मनोरंजन नहीं होता। उलझन पैदा होती हैं । बीज वपन में वपन का अर्थ बोना हो और केश वपन में काटना हो, वप्ता के दो आशय हो जायं, बोने वाला और काटने वाला तो उलझन तो पैदा होगी। पूत का अर्थ पवित्र हो और साथ ही सड़ा हुआ भी हो और फिर उसी का अर्थ पुत्र भी हो, तो सर पीटने की नौबत तो आएगी ही। किसी एक मामले में ऐसा हो तो क्षम्य भी है, यदि ऐसे शब्दों की संख्या बहुत अधिक हो तो इसके पीछे कोई विवशता तो होगी ही कि हम इस सीमा को लांघ न पाएं और इस उलझन से बचने केलिए उस शब्द का एक ही आशय में व्यवहार करने की आदत डाल लें और यथासंभव दूसरे अर्थ में प्रयेग बन्द कर दें, फिर भी उसकी छाया बनी रह जाय।

इस बाध्यता से भाषाविज्ञान की एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान होता है। यह है वाक् और अर्थ की नैसर्गिक अभिन्नता जिसे कालिदास ने वागर्थ की संपृक्तता कहा है। इसका बोध वैदिक काल में बहुत स्पष्ट था, कवियों में बना रहा, पर वैयाकरणों में यदि लुप्त नहीं तो इतना दबा रह जाता है कि हैरानी होती है। कतिपय दूसरी बातें भी हैं जिनसे लगता है कि संस्कृत के विद्वान लोक से कट गए थे, जब कि काव्यधारा का ऐसा विलगाव गुप्तकाल के बाद ही हुआ, जब कि लोक उस परंपरा से जुड़ा रहा जिसका प्रमाण तुलसी हैं दो कालिादस से भी अधिक मार्मिकता के उसी बात को दुहराते हैंः गिरा अन्ल जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। पश्चिमी परंपरा में उसकी पुराणकथा के दबाव में यह माना जाता रहा कि जिस चीज को आदम ने जो नाम दे दिया वही उसकी संज्ञा बन गई, अर्थात् भाषा मनुष्य की मरजी से रची गई है, मनुष्य वस्तुओं, क्रियाओं और विशेषताओं के लिए शब्द विशेष का प्रयोग करने में पूरी तरह स्वतंत्र था ।

यह लंगड़ी सोच थी। इससे कई तरह के प्रश्न खड़े होते थे जिनकी अनदेखी कर दी गई। उदाहरण के लिए (१) नयी संज्ञाओं के लिए सभी भाषाओं में स्व-व्य (CVC) के कुछ लघु विन्यास उपलब्ध थे, उनका उपयोग करने की जगह लम्बे और उच्चारण में क्लिष्ट विन्यासों का चयन क्यों किया गया ? इसके विस्तार में न जाकर हम इतना ही याद दिलाना चाहेंगे कि किसी भी अन्य भाषा के एकाक्षरी या द्वयक्षरी (अल, आल, इल, किल जैसे)शब्दों को जे उसकी प्रकृति से भी मेल खाते हों सामने रख कर देखें कि मनचाहा चुनाव करने की स्थिति में उनका उपयोग संभव थ । (२) भिन्न आशयों और व्यंजनाओं के लिए पृथक शब्दों का चयन क्यों नहीं किया गया। किसी वस्तु के लिए एक संज्ञा पर्याप्त थी, उसके लिए एकाधिक पर्यायों का क्या आवश्यकता थी? (३) समनादी (homophonic) शब्दों का सहारा क्यों लेना पड़ा ? आदि। इनके समाधान भाषा को पूर्णत: मानव रचित मानने कि स्थिति में तलाशना जरूरी हो जाता है पर इसे छेड़ना भानमती का पिटारा खोलने जैसा था जिससे तुलनात्मक भाषाविज्ञान का चरित्र ही बदल जाता और सारे नतीजे उलट जाते।

ऋग्वेद का महत्व यह है कि इसमें ऐसे शब्दों की संख्या काफी बड़ी है जिनमें नैसर्गिक आशय बना रह गया है जिसका सामना होने पर हम चकित रह जाते हैं। अन्न= जल, और अनाज; अन्ध= जल, रस, सोम रस, और दृष्टिहीन; को = जल, ईश्वर, कौन; घृत= जल और घी; अमृत= जल, अमरता दायक; पीयूष =जल, अमृत, कोई पेय; मधु= जल, सोमरस, शहद; घर्म = पानी, पसीना, ऊष्ण, धूप; तेल = पानी(इस बात का कोई संकेत नहीं है कि तिलहनों की खेती होने लगी थी जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि वे तेल का सेवन करते थे। पर बाद में तेल के रूढ़ अर्थ से हम परिचित हैं); तिल्विल = नम या सिंचित; रेत =जल, मूत्र,और रेतस्; विष = जल और विष; धन= जल और धन; पुरीष =जल और मल; अर्क =जल और प्रकाश। मूत का प्रयोग नहीं हुआ है, पर जीमूत =जीवन दायक जल में स्पष्ट कि इसका एक अर्थ जल था। संख्या और बढ़ाई जा सकती है।

पाश्चात्य अनुवादकों ने जिन्होंने सायण से मदद भी ली थी और जलर्थक प्रयोगों से अवगत थे अर्थ का अनर्थ करने के लिए जान बूझ कर बाद के रूढ़ अर्थ को ही लिया है ताकि आशय भोंड़ा लगे। हम उनके अनुवाद और अनर्थ पर बात नहीं कर रहे हैं अपितु इस बात पर कि जल की ध्वनियों से भाषा की उत्पत्ति हुई।

Post – 2018-03-23

हमारी भाषा (९)
उल्टा-सीधा एक समान

फिकरा तो पहेलियों से संबन्धित है । बच्चे आज भी बुझाते होंगे। रबर, नमन जैसे शब्द और १२१ या इसी से मिलती जुलती संख्याएं बतानी होतीं। मनोरजन होता था।

भाषा में यदि एक ही शब्द के सीधे उल्टे दुहरे अर्थ हों तो मनोरंजन नहीं होता। उलझन पैदा होती हैं । बीज वपन में वपन का अर्थ बोना हो और केश वपन में काटना हो, वप्ता के दो आशय हो जायं, बोने वाला और काटने वाला तो उलझन तो पैदा होगी। पूत का अर्थ पवित्र हो और साथ ही सड़ा हुआ भी हो और फिर उसी का अर्थ पुत्र भी हो, तो सर पीटने की नौबत तो आएगी ही। किसी एक मामले में ऐसा हो तो क्षम्य भी है, यदि ऐसे शब्दों की संख्या बहुत अधिक हो तो इसके पीछे कोई विवशता तो होगी ही कि हम इस सीमा को लांघ न पाएं और इस उलझन से बचने केलिए उस शब्द का एक ही आशय में व्यवहार करने की आदत डाल लें और यथासंभव दूसरे अर्थ में प्रयेग बन्द कर दें, फिर भी उसकी छाया बनी रह जाय।

इस बाध्यता से भाषाविज्ञान की एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान होता है। यह है वाक् और अर्थ की नैसर्गिक अभिन्नता जिसे कालिदास ने वागर्थ की संपृक्तता कहा है। इसका बोध वैदिक काल में बहुत स्पष्ट था, कवियों में बना रहा, पर वैयाकरणों में यदि लुप्त नहीं तो इतना दबा रह जाता है कि हैरानी होती है। कतिपय दूसरी बातें भी हैं जिनसे लगता है कि संस्कृत के विद्वान लोक से कट गए थे, जब कि काव्यधारा का ऐसा विलगाव गुप्तकाल के बाद ही हुआ, जब कि लोक उस परंपरा से जुड़ा रहा जिसका प्रमाण तुलसी हैं दो कालिादस से भी अधिक मार्मिकता के उसी बात को दुहराते हैंः गिरा अन्ल जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। पश्चिमी परंपरा में उसकी पुराणकथा के दबाव में यह माना जाता रहा कि जिस चीज को आदम ने जो नाम दे दिया वही उसकी संज्ञा बन गई, अर्थात् भाषा मनुष्य की मरजी से रची गई है, मनुष्य वस्तुओं, क्रियाओं और विशेषताओं के लिए शब्द विशेष का प्रयोग करने में पूरी तरह स्वतंत्र था ।

यह लंगड़ी सोच थी। इससे कई तरह के प्रश्न खड़े होते थे जिनकी अनदेखी कर दी गई। उदाहरण के लिए (१) नयी संज्ञाओं के लिए सभी भाषाओं में स्व-व्य (CVC) के कुछ लघु विन्यास उपलब्ध थे, उनका उपयोग करने की जगह लम्बे और उच्चारण में क्लिष्ट विन्यासों का चयन क्यों किया गया ? इसके विस्तार में न जाकर हम इतना ही याद दिलाना चाहेंगे कि किसी भी अन्य भाषा के एकाक्षरी या द्वयक्षरी (अल, आल, इल, किल जैसे)शब्दों को जे उसकी प्रकृति से भी मेल खाते हों सामने रख कर देखें कि मनचाहा चुनाव करने की स्थिति में उनका उपयोग संभव थ । (२) भिन्न आशयों और व्यंजनाओं के लिए पृथक शब्दों का चयन क्यों नहीं किया गया। किसी वस्तु के लिए एक संज्ञा पर्याप्त थी, उसके लिए एकाधिक पर्यायों का क्या आवश्यकता थी? (३) समनादी (homophonic) शब्दों का सहारा क्यों लेना पड़ा ? आदि। इनके समाधान भाषा को पूर्णत: मानव रचित मानने कि स्थिति में तलाशना जरूरी हो जाता है पर इसे छेड़ना भानमती का पिटारा खोलने जैसा था जिससे तुलनात्मक भाषाविज्ञान का चरित्र ही बदल जाता और सारे नतीजे उलट जाते।

ऋग्वेद का महत्व यह है कि इसमें ऐसे शब्दों की संख्या काफी बड़ी है जिनमें नैसर्गिक आशय बना रह गया है जिसका सामना होने पर हम चकित रह जाते हैं। अन्न= जल, और अनाज; अन्ध= जल, रस, सोम रस, और दृष्टिहीन; को = जल, ईश्वर, कौन; घृत= जल और घी; अमृत= जल, अमरता दायक; पीयूष =जल, अमृत, कोई पेय; मधु= जल, सोमरस, शहद; घर्म = पानी, पसीना, ऊष्ण, धूप; तेल = पानी(इस बात का कोई संकेत नहीं है कि तिलहनों की खेती होने लगी थी जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि वे तेल का सेवन करते थे। पर बाद में तेल के रूढ़ अर्थ से हम परिचित हैं); तिल्विल = नम या सिंचित; रेत =जल, मूत्र,और रेतस्; विष = जल और विष; धन= जल और धन; पुरीष =जल और मल; अर्क =जल और प्रकाश। मूत का प्रयोग नहीं हुआ है, पर जीमूत =जीवन दायक जल में स्पष्ट कि इसका एक अर्थ जल था। संख्या और बढ़ाई जा सकती है।

पाश्चात्य अनुवादकों ने जिन्होंने सायण से मदद भी ली थी और जलर्थक प्रयोगों से अवगत थे अर्थ का अनर्थ करने के लिए जान बूझ कर बाद के रूढ़ अर्थ को ही लिया है ताकि आशय भोंड़ा लगे। हम उनके अनुवाद और अनर्थ पर बात नहीं कर रहे हैं अपितु इस बात पर कि जल की ध्वनियों से भाषा की उत्पत्ति हुई।

Post – 2018-03-23

हमारी भाषा (९)
उल्टा-सीधा एक समान

फिकरा तो पहेलियों से संबन्धित है । बच्चे आज भी बुझाते होंगे। रबर, नमन जैसे शब्द और १२१ या इसी से मिलती जुलती संख्याएं बतानी होतीं। मनोरजन होता था।

भाषा में यदि एक ही शब्द के सीधे उल्टे दुहरे अर्थ हों तो मनोरंजन नहीं होता। उलझन पैदा होती हैं । बीज वपन में वपन का अर्थ बोना हो और केश वपन में काटना हो, वप्ता के दो आशय हो जायं, बोने वाला और काटने वाला तो उलझन तो पैदा होगी। पूत का अर्थ पवित्र हो और साथ ही सड़ा हुआ भी हो और फिर उसी का अर्थ पुत्र भी हो, तो सर पीटने की नौबत तो आएगी ही। किसी एक मामले में ऐसा हो तो क्षम्य भी है, यदि ऐसे शब्दों की संख्या बहुत अधिक हो तो इसके पीछे कोई विवशता तो होगी ही कि हम इस सीमा को लांघ न पाएं और इस उलझन से बचने केलिए उस शब्द का एक ही आशय में व्यवहार करने की आदत डाल लें और यथासंभव दूसरे अर्थ में प्रयेग बन्द कर दें, फिर भी उसकी छाया बनी रह जाय।

इस बाध्यता से भाषाविज्ञान की एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान होता है। यह है वाक् और अर्थ की नैसर्गिक अभिन्नता जिसे कालिदास ने वागर्थ की संपृक्तता कहा है। इसका बोध वैदिक काल में बहुत स्पष्ट था, कवियों में बना रहा, पर वैयाकरणों में यदि लुप्त नहीं तो इतना दबा रह जाता है कि हैरानी होती है। कतिपय दूसरी बातें भी हैं जिनसे लगता है कि संस्कृत के विद्वान लोक से कट गए थे, जब कि काव्यधारा का ऐसा विलगाव गुप्तकाल के बाद ही हुआ, जब कि लोक उस परंपरा से जुड़ा रहा जिसका प्रमाण तुलसी हैं दो कालिादस से भी अधिक मार्मिकता के उसी बात को दुहराते हैंः गिरा अन्ल जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। पश्चिमी परंपरा में उसकी पुराणकथा के दबाव में यह माना जाता रहा कि जिस चीज को आदम ने जो नाम दे दिया वही उसकी संज्ञा बन गई, अर्थात् भाषा मनुष्य की मरजी से रची गई है, मनुष्य वस्तुओं, क्रियाओं और विशेषताओं के लिए शब्द विशेष का प्रयोग करने में पूरी तरह स्वतंत्र था ।

यह लंगड़ी सोच थी। इससे कई तरह के प्रश्न खड़े होते थे जिनकी अनदेखी कर दी गई। उदाहरण के लिए (१) नयी संज्ञाओं के लिए सभी भाषाओं में स्व-व्य (CVC) के कुछ लघु विन्यास उपलब्ध थे, उनका उपयोग करने की जगह लम्बे और उच्चारण में क्लिष्ट विन्यासों का चयन क्यों किया गया ? इसके विस्तार में न जाकर हम इतना ही याद दिलाना चाहेंगे कि किसी भी अन्य भाषा के एकाक्षरी या द्वयक्षरी (अल, आल, इल, किल जैसे)शब्दों को जे उसकी प्रकृति से भी मेल खाते हों सामने रख कर देखें कि मनचाहा चुनाव करने की स्थिति में उनका उपयोग संभव थ । (२) भिन्न आशयों और व्यंजनाओं के लिए पृथक शब्दों का चयन क्यों नहीं किया गया। किसी वस्तु के लिए एक संज्ञा पर्याप्त थी, उसके लिए एकाधिक पर्यायों का क्या आवश्यकता थी? (३) समनादी (homophonic) शब्दों का सहारा क्यों लेना पड़ा ? आदि। इनके समाधान भाषा को पूर्णत: मानव रचित मानने कि स्थिति में तलाशना जरूरी हो जाता है पर इसे छेड़ना भानमती का पिटारा खोलने जैसा था जिससे तुलनात्मक भाषाविज्ञान का चरित्र ही बदल जाता और सारे नतीजे उलट जाते।

ऋग्वेद का महत्व यह है कि इसमें ऐसे शब्दों की संख्या काफी बड़ी है जिनमें नैसर्गिक आशय बना रह गया है जिसका सामना होने पर हम चकित रह जाते हैं। अन्न= जल, और अनाज; अन्ध= जल, रस, सोम रस, और दृष्टिहीन; को = जल, ईश्वर, कौन; घृत= जल और घी; अमृत= जल, अमरता दायक; पीयूष =जल, अमृत, कोई पेय; मधु= जल, सोमरस, शहद; घर्म = पानी, पसीना, ऊष्ण, धूप; तेल = पानी(इस बात का कोई संकेत नहीं है कि तिलहनों की खेती होने लगी थी जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि वे तेल का सेवन करते थे। पर बाद में तेल के रूढ़ अर्थ से हम परिचित हैं); तिल्विल = नम या सिंचित; रेत =जल, मूत्र,और रेतस्; विष = जल और विष; धन= जल और धन; पुरीष =जल और मल; अर्क =जल और प्रकाश। मूत का प्रयोग नहीं हुआ है, पर जीमूत =जीवन दायक जल में स्पष्ट कि इसका एक अर्थ जल था। संख्या और बढ़ाई जा सकती है।

पाश्चात्य अनुवादकों ने जिन्होंने सायण से मदद भी ली थी और जलर्थक प्रयोगों से अवगत थे अर्थ का अनर्थ करने के लिए जान बूझ कर बाद के रूढ़ अर्थ को ही लिया है ताकि आशय भोंड़ा लगे। हम उनके अनुवाद और अनर्थ पर बात नहीं कर रहे हैं अपितु इस बात पर कि जल की ध्वनियों से भाषा की उत्पत्ति हुई।

Post – 2018-03-22

यदि यह सच है कि एनैलिटिका से चुनाव जिताने की जुगत भिड़ाने के लिए साठ हजार करोड़ का सौदा हुआ है तो जीतने की स्थिति बन जाए तो उसकी भरपाई कौन करेगा? बाहुबल हो या जाति-धर्म के गठजोड़ हों या धूर्तता का सहारा हो, लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार हैं और इस अविश्वास की उपज हैं कि जनता उन्हें पसन्द नहीं करती। लोकतंत्र के प्रति समर्पित और बहुलता के साथ एकप्राण भारतीय समाज को बोटी बोटी करके पोपशाही की तैयारियां करने वाले भारतीय बुद्धजीवियों को इतने प्रिय क्यों है? राक्षस के प्राण दूर देश के तोते में बसने की कहानी तो बचपन से सुनता आया था पर साहित्य के तोतों के प्राण राक्षस में कैसे जा बसे? आज की कांग्रेस का चरित्र तो ऐसा ही है।

Post – 2018-03-22

यदि यह सच है कि एनैलिटिका से चुनाव जिताने की जुगत भिड़ाने के लिए साठ हजार करोड़ का सौदा हुआ है तो जीतने की स्थिति बन जाए तो उसकी भरपाई कौन करेगा? बाहुबल हो या जाति-धर्म के गठजोड़ हों या धूर्तता का सहारा हो, लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार हैं और इस अविश्वास की उपज हैं कि जनता उन्हें पसन्द नहीं करती। लोकतंत्र के प्रति समर्पित और बहुलता के साथ एकप्राण भारतीय समाज को बोटी बोटी करके पोपशाही की तैयारियां करने वाले भारतीय बुद्धजीवियों को इतने प्रिय क्यों है? राक्षस के प्राण दूर देश के तोते में बसने की कहानी तो बचपन से सुनता आया था पर साहित्य के तोतों के प्राण राक्षस में कैसे जा बसे? आज की कांग्रेस का चरित्र तो ऐसा ही है।

Post – 2018-03-22

यदि यह सच है कि एनैलिटिका से चुनाव जिताने की जुगत भिड़ाने के लिए साठ हजार करोड़ का सौदा हुआ है तो जीतने की स्थिति बन जाए तो उसकी भरपाई कौन करेगा? बाहुबल हो या जाति-धर्म के गठजोड़ हों या धूर्तता का सहारा हो, लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार हैं और इस अविश्वास की उपज हैं कि जनता उन्हें पसन्द नहीं करती। लोकतंत्र के प्रति समर्पित और बहुलता के साथ एकप्राण भारतीय समाज को बोटी बोटी करके पोपशाही की तैयारियां करने वाले भारतीय बुद्धजीवियों को इतने प्रिय क्यों है? राक्षस के प्राण दूर देश के तोते में बसने की कहानी तो बचपन से सुनता आया था पर साहित्य के तोतों के प्राण राक्षस में कैसे जा बसे? आज की कांग्रेस का चरित्र तो ऐसा ही है।

Post – 2018-03-21

हमारी भाषा (8)
वन अर्थात् काटना

पेड़ पौधे हमें आहार देते हैं, ऑक्सीजन देते हैं, हमारी उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं, पानी बरसाने में उत्प्रेरक का काम करते हैं, और हम पेड़ों को काटते हैं, जलाते हैं। कैसी कृतघ्नता है! पर है तो है। वन का एक अर्थ ‘पेड़’ है, दूसरा ‘जंगल’ है, . तीसरा अर्थ ‘काटना’। वनोति का अर्थ है ‘काटता है’। वन का अर्थ जल है इसे तो आप वन्या और इसके बंगाली रूप बान = ज्वार से ही समझ सकते हैं। पर मैं अभी तक यह तय नहीं कर सका की वन जल की किस अवरोध से उत्पन्न ध्वनि का अनुकार है। वृक्ष सुनने पर अवश्य लगता है किसी शाखा को झटके से पकड़कर तोड़ने या जैसा कि भोजपुरी में कहते हैं छिनगाने ( छिन्न करने) से उत्पन्न के वृश्च या इससे मिलते-जुलते रूप से बना है। इसी से बना है बिच्छु जिसके लिए संस्कृत वृश्चिक शब्द प्रचलित है । ऐसा लगता है की वृश्चिक बाद का संस्कृतीकरण है और मूल रूप बिच्छ ही रहा होगा। चुनने के लिए हिंदी में छांटना शब्द का प्रयोग होता है जो काटने का अनुपूरक है। छांटना धारदार हथियार से कुश आदि काटने के से उत्पन्न ध्वनि का अनुकरण लगता है। भोजपुरी में बीछना छांटने के आशय में प्रयुक्त होता है। यह अधिक स्वाभाविक लगता है की मूल ध्वनि बिच्छ ही बदल कर वृक्ष बनी हो और उसके लिए वृश्च धातु कल्पित की गई । मूल ध्वनि जो भी रही हो इतना तो निश्चित है कि इसका नामकरण भी काटने से संबंध रखता है।
काटने का कोई निश्चित प्रयोजन होता है, अतः काटना, छीलना निर्माण से भी जुड़ा होता है। कटि का अर्थ जोड़ होता है न कि कटा हुआ । हमारा पाला आगे चलकर ऐसे बहुत से शब्दों से पड़ेगा जिनमें किसी शब्द का एक अर्थ काटना है तो दूसरा बनाना, कल – काल- कला। इसलिए वृक्ष संभवता छाया देने या ऊपर से घेरने के अर्थविस्तार से ‘पिटारी’ के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। वक्ष वृक्ष का ही प्रतिरूप है। अंग्रेजी में इससे मिलते जुलते दो शब्द हैं एक वक्ष की ध्वनि से प्रेरित बॉक्स और दूसरा अर्थ से प्रेरित चेस्ट । वहां यदि गायब है तो वह है मूल स्रोत का संकल्पनात्मक विकास। यही वह पिटारी है जिसमें हमारे सबसे मूल्यवान अंग ह्रदय और फेफड़ा रखे गए हैं। और सच कहिए तो या पेटी से अधिक पिजड़ा, पंजर । पिजड़े को बनाने के लिए अस्थियों का प्रयोग हुआ है इसलिए अस्थिपंजर, जिसमें दो पक्षी निवास करते हैं एक है आत्मा और दूसरा है जीव। कवि की उद्भावना में वृक्ष और पंजर दोनों विराजमान रह सकते हैं और इसलिए आवश्यकता होने पर कवि वृक्ष के ऊपर से एक डाल पर बैठे हुए दो पक्षियों की बात करता है तो दूसरे में एक पिजड़े में बंद आत्मा की बात करता है जो मृत्यु के समय पिजड़े को तोड़कर बाहर निकल जाता है। इसको लेकर एक बड़ी अच्छी ऋचा ऋग्वेद में हैः

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते ।
तयोः अन्यः पिप्पलं स्वादु अत्त्ति अनश्नन् अन्यो अभि चाकशीति ।। 1.164.20

इसका सटीक चित्रण हड़प्पा की एक मुद्रा पर हुआ है। इस पर हम पहले लिख चुके हैं अतः इसके विस्तार में न जाएंगे।

हम सूखे काठ पर पत्थर के औजार से चोट करें तो उससे ठक् या कठ् ध्वनि निकलती है। काठ उसी ध्वनि से बना है। जब हम किसी चीज को कठोर कहते हैं तो अर्थ होता है ‘सूखे काठ जैसा’। जब कठिन कहते हैं तो आशय होता है ‘लकड़ी की गांठ की तरह चीरने (हल करने ) में दुष्कर’ । जब कड़ा कहते हैं आशय होता है पत्थर जैसा। एक ही आशय में प्रयुक्त दो पर्यायों के अर्थ में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है, इसे हम नहीं समझते और यह मान लेते हैं कि एक के स्थान पर दूसरा प्रयोग में लाया जा सकता है। कठिन और कठोर के साथ कड़ा की तुलना में अधिक मजबूती का भाव होता हैं । औजार बनाते समय पत्थर को पत्थर से टकराकर तोड़ना अधिक आसान था जब कि सूखे हुए काठ को पत्थर के औजार से काटना-तराशना अधिक कठिन। धातुयुग आने के साथ स्थिति उलट गई। इस तरह कई बार शब्द के अर्थ में इतिहास की छाया भी दृष्टिगोचर होती है। जब हम ‘कड़ाके की ठंड’ की बात करते हैं तो आशय होता है ऐसी ठंढ जिससे पानी पत्थर में बदल जाए, इसलिए ओले के लिए उपल शब्द का प्रयोग होता है । कड़ाके का संस्कृतीकरण करका में देखा जा सकता है.

वृक्ष के लिए एक अन्य शब्द पेड़ है। इसमें भी पेटी वाला भाव है। पहले मुझे लगता था इसका कुछ नाता तमिल पेरुमै – बड़प्पन, ऊँचाई से हो मकता है, पर स्वयं तमिल में पेड़ के लिए मरम का चलता है। मेरी मनोबाधा छाती के लिए पिटारी के आशय के जुड़ जाने के कारण थी, पर पेटी के ऊपर पेटी क्यों नहीं रखी जा सकती जब प्रकृति की बनावट ही ऎसी है तो।

Post – 2018-03-21

हमारी भाषा (8)
वन अर्थात् काटना

पेड़ पौधे हमें आहार देते हैं, ऑक्सीजन देते हैं, हमारी उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं, पानी बरसाने में उत्प्रेरक का काम करते हैं, और हम पेड़ों को काटते हैं, जलाते हैं। कैसी कृतघ्नता है! पर है तो है। वन का एक अर्थ ‘पेड़’ है, दूसरा ‘जंगल’ है, . तीसरा अर्थ ‘काटना’। वनोति का अर्थ है ‘काटता है’। वन का अर्थ जल है इसे तो आप वन्या और इसके बंगाली रूप बान = ज्वार से ही समझ सकते हैं। पर मैं अभी तक यह तय नहीं कर सका की वन जल की किस अवरोध से उत्पन्न ध्वनि का अनुकार है। वृक्ष सुनने पर अवश्य लगता है किसी शाखा को झटके से पकड़कर तोड़ने या जैसा कि भोजपुरी में कहते हैं छिनगाने ( छिन्न करने) से उत्पन्न के वृश्च या इससे मिलते-जुलते रूप से बना है। इसी से बना है बिच्छु जिसके लिए संस्कृत वृश्चिक शब्द प्रचलित है । ऐसा लगता है की वृश्चिक बाद का संस्कृतीकरण है और मूल रूप बिच्छ ही रहा होगा। चुनने के लिए हिंदी में छांटना शब्द का प्रयोग होता है जो काटने का अनुपूरक है। छांटना धारदार हथियार से कुश आदि काटने के से उत्पन्न ध्वनि का अनुकरण लगता है। भोजपुरी में बीछना छांटने के आशय में प्रयुक्त होता है। यह अधिक स्वाभाविक लगता है की मूल ध्वनि बिच्छ ही बदल कर वृक्ष बनी हो और उसके लिए वृश्च धातु कल्पित की गई । मूल ध्वनि जो भी रही हो इतना तो निश्चित है कि इसका नामकरण भी काटने से संबंध रखता है।
काटने का कोई निश्चित प्रयोजन होता है, अतः काटना, छीलना निर्माण से भी जुड़ा होता है। कटि का अर्थ जोड़ होता है न कि कटा हुआ । हमारा पाला आगे चलकर ऐसे बहुत से शब्दों से पड़ेगा जिनमें किसी शब्द का एक अर्थ काटना है तो दूसरा बनाना, कल – काल- कला। इसलिए वृक्ष संभवता छाया देने या ऊपर से घेरने के अर्थविस्तार से ‘पिटारी’ के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। वक्ष वृक्ष का ही प्रतिरूप है। अंग्रेजी में इससे मिलते जुलते दो शब्द हैं एक वक्ष की ध्वनि से प्रेरित बॉक्स और दूसरा अर्थ से प्रेरित चेस्ट । वहां यदि गायब है तो वह है मूल स्रोत का संकल्पनात्मक विकास। यही वह पिटारी है जिसमें हमारे सबसे मूल्यवान अंग ह्रदय और फेफड़ा रखे गए हैं। और सच कहिए तो या पेटी से अधिक पिजड़ा, पंजर । पिजड़े को बनाने के लिए अस्थियों का प्रयोग हुआ है इसलिए अस्थिपंजर, जिसमें दो पक्षी निवास करते हैं एक है आत्मा और दूसरा है जीव। कवि की उद्भावना में वृक्ष और पंजर दोनों विराजमान रह सकते हैं और इसलिए आवश्यकता होने पर कवि वृक्ष के ऊपर से एक डाल पर बैठे हुए दो पक्षियों की बात करता है तो दूसरे में एक पिजड़े में बंद आत्मा की बात करता है जो मृत्यु के समय पिजड़े को तोड़कर बाहर निकल जाता है। इसको लेकर एक बड़ी अच्छी ऋचा ऋग्वेद में हैः

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते ।
तयोः अन्यः पिप्पलं स्वादु अत्त्ति अनश्नन् अन्यो अभि चाकशीति ।। 1.164.20

इसका सटीक चित्रण हड़प्पा की एक मुद्रा पर हुआ है। इस पर हम पहले लिख चुके हैं अतः इसके विस्तार में न जाएंगे।

हम सूखे काठ पर पत्थर के औजार से चोट करें तो उससे ठक् या कठ् ध्वनि निकलती है। काठ उसी ध्वनि से बना है। जब हम किसी चीज को कठोर कहते हैं तो अर्थ होता है ‘सूखे काठ जैसा’। जब कठिन कहते हैं तो आशय होता है ‘लकड़ी की गांठ की तरह चीरने (हल करने ) में दुष्कर’ । जब कड़ा कहते हैं आशय होता है पत्थर जैसा। एक ही आशय में प्रयुक्त दो पर्यायों के अर्थ में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है, इसे हम नहीं समझते और यह मान लेते हैं कि एक के स्थान पर दूसरा प्रयोग में लाया जा सकता है। कठिन और कठोर के साथ कड़ा की तुलना में अधिक मजबूती का भाव होता हैं । औजार बनाते समय पत्थर को पत्थर से टकराकर तोड़ना अधिक आसान था जब कि सूखे हुए काठ को पत्थर के औजार से काटना-तराशना अधिक कठिन। धातुयुग आने के साथ स्थिति उलट गई। इस तरह कई बार शब्द के अर्थ में इतिहास की छाया भी दृष्टिगोचर होती है। जब हम ‘कड़ाके की ठंड’ की बात करते हैं तो आशय होता है ऐसी ठंढ जिससे पानी पत्थर में बदल जाए, इसलिए ओले के लिए उपल शब्द का प्रयोग होता है । कड़ाके का संस्कृतीकरण करका में देखा जा सकता है.

वृक्ष के लिए एक अन्य शब्द पेड़ है। इसमें भी पेटी वाला भाव है। पहले मुझे लगता था इसका कुछ नाता तमिल पेरुमै – बड़प्पन, ऊँचाई से हो मकता है, पर स्वयं तमिल में पेड़ के लिए मरम का चलता है। मेरी मनोबाधा छाती के लिए पिटारी के आशय के जुड़ जाने के कारण थी, पर पेटी के ऊपर पेटी क्यों नहीं रखी जा सकती जब प्रकृति की बनावट ही ऎसी है तो।