Post – 2015-10-26

क्षमा याचना सहित

“मैं मार्क्स के इस कथन से कभी सहमत नहीं हुआ कि ‘आज तक दार्शनिक जगत की व्याख्या करते आए हैं; जरूरत इसे बदलने की है।‘ इसमें यह निहित है कि सोच-विचार से बदलाव नहीं आता, केवल बाहुबल से ही ऐसा संभव है। इसकी अंतर्ध्वनि यह है कि दार्शनिकों को विश्व व्यवस्था को लेकर अब अधिक माथापच्ची बंद कर देनी चाहिए। उस विषय में जो अंतिम बात सोची जा सकती है वह सोच ली गयी है और तुम्हारे सामने है. समस्या केवल दार्शनिक की नहीं है, सभी बुद्धिजीवियों, कलाकारों की है। बुद्धि और कला से जुड़े सभी लोग अपनी कला और प्रतिभा को इसी ध्येय को समर्पित कर दें. उनका मूल्यांकन भी इसी आधार पर हो. सत्ता परिवर्तन के बाद ऎसी कोई बात न तो कही जाय न रचना के माध्यम से व्यक्त की जाय जिसमें जो कुछ भी हो रहा है उसकी आलोचना हो. यह धर्मतांत्रिक व्यवस्थाओं की ईशनिंदा के सम्मान दंडनीय होगा. जहां इस दिशा में संघर्ष किया जा रहा हो वहाँ पार्टी नेतृत्व की आलोचना न की जाय, न ही ऐसा कुछ कहा और किया जाय जो पार्टी की नीतियों के विरुद्ध या उससे हटकर हो. ऐसा करना निंदनीय होगा, क्योंकि दंडविधान अपने हाथ में नहीं है. सभी गतिविधिया राजनीति से परिचालित और उसी को समर्पित हैं. इससे एक पूर्वनिर्दिष्ट, संकुचित, एकायामी और बंजर सोच, बंजर कला, बंजर साहित्य पैदा होता है जो अपने स्वायत्त क्षेत्र को छोड़ कर ऐसे क्षेत्र का काम करने का भ्रम पालता है जो उसके माध्यम से हो ही नहीं सकता। इससे मार्क्स अंतिम दार्शनिक बन जाते है। दर्शन का काम व्याख्या करना नहीं, दुनिया को बदलना है। दुनिया को बदलने का कार्यक्रम मार्क्स ने दे ही दिया, अतः भावी दार्शनिकों को उसी का भाष्य और प्रचार करना है।“
“तुम्हारा अपना नजरिया एकायामी और गलत और किसी छद्म राजनीति से प्रेरित नहीं है?”
“मैं कभी अन्तिम सत्य नहीं बोलता। जितनी बार सोचता हू पिछली बात में कुछ सुधार करना पड़ता है, किसी विशेष क्षण में मैं केवल अपने जाने और समझे हुए का केवल वह कह पाता हू जो उस समय ध्यान में आता है। कुछ छूट गया तो उसी अनुपात में पूरा निष्कर्ष प्रभावित होगा। गलत भी हो सकता है. सही होने की कोशिश में बोलने वालों के पास अपना कुछ कहने को होता ही नहीं। मैं प्रयत्न करता हूँ कि मेरा विचार इकहरा न हो. इसका एक ही तरीका है – अन्य संभावनाओं की ओर ध्यान देना, दूसरे के पक्ष को समझने का प्रयत्न करना। मै बहस जीतने के लिए बात नहीं करता, गलत सिद्ध होने के लिए तैयार हो कर, उस विषय या समस्या की जो समझ है, उसे रखने का प्रयत्न करता हूँ। उसके बाद भी इकहरापन बना रहे तो दुहरा हो जाने से अच्छा है।“
“मैं अभियोग नहीं लगा रहा था, पर बात इतनी अटपटी लग रही है कि ऐसा सन्देह हुआ। तुम अपनी बात कहो।“
“जब दर्शन कार्ययोजना में बदल जाता है तो वह धर्म का रूप ले लेता है, जो पहले के धर्मो और विचार-दृष्टियों का निषेध करता है। उसका अंतिम दार्शनिक, कार्यदर्शन का प्रणेता हो जाता है। पूरे समाज को अपने दर्शन या विश्वदृष्टि को अमल में लाने और पूरी दुनिया में फैलाने का काम अपने अनुगामियों को सौंप कर वह मसीहा बन जाता है। विश्वविजय उस दर्शन को लादने के लिए होगा, प्रशासन उस दर्शन से चलेगा। लोक कितने नेक या बद है, प्रशंसा और पुरस्कार के पात्र हैं या निंदा और दंड के, यह उनकी उस दर्शन के प्रति निष्ठा से तय होगा। इसका कठोरता से पालन कराने के लिए एक तानाशाह मुल्लातंत्र पैदा होगा जो सही गलत का निर्णय करेगा। ऐसा कुछ भी कहने या करने की स्वतंत्रता किसी को नहीं दी जाएगी जो दर्शन की आधारभूत मान्यताओं से अनमेल हो। इसलिए समय बदलेगा, दर्शन के बुनियादी सूत्र नहीं। यह ठीक इसी रूप में प्रतिपादित हुआ हो या नहीं, परंतु इस स्थापना में यह निहित था। आगे चल कर हुआ भी वही। हम कह सकते हैं मार्क्सवाद दुनिया का सबसे नया, अनीश्वरवादी, पदार्थवादी धर्म है जिसकी मूल प्रकृति सामी है।
“”समी क्यों? ”
“क्योंकि सामी मत अपने प्रसार के लिए हिंसा का सहारा लेते रहे हैं. दूसरे सामी मत विचार से डरते रहे हैं. देखो हिंसा का सहारा लेने वाला विचार से डरता है. इसलिए हथियार और विचार में कौन अधिक ताक़तवर है यह भी तुम समझ सकते हो और विचार को मार्क्स ने धता बता दिया. दुनिया के किसी कोने में, कहीं भी यदि में में भिन्न व्यवस्था या भिन्न विचार बचा रहा तो वह इसके लिए खतरा है. इसलिए इसे पूर्ण विश्वविजय चाहिए. इतना ही नही इसी दर से वे पुराने ग्रंथों एंड ग्रंथागारों को नष्ट करते रहे. उनके मूर्त रूपों को नष्ट करते रहे. वे इतने से संतुष्ट नहीं हो पाते की यदि हमारा विचार श्रेष्ठ है तो उसे दूसरे स्वतः मान लेंगे. उसके सही होने पर उन्हें भरोसा नही. इसलिए वे उन्हें विश्वास कहते हैं. साम्यवाद भी एक विश्वास है.”
“तुम इस बात पर ध्यान नही दोगे कि यह तुम्हारा विचारक नही तुम्हारे भीतर का हिन्दू बोल रहा है?”
“हो सकता है वह भी बोल रहा हो, क्योंकि हिन्दू धर्म है विश्वास नहीं. वह विचार से डरता नहीं और अपने अस्तित्व के लिए उसे दूसरे विचारों को मिटाने की लाचारी नहीं अनुभव होती. हिन्दू शब्द को तो तुमने गाली बना रखा है उसे समझोगे कैसे.”
उसकी हालत देखते बनती थी.
“कार्ल मार्क्स इसलिए बहुत सफल, पर अपनी सफलता के अनुरूप बडे़, दार्शनिक नहीं सिद्ध होते, मास अपील वाले दार्शनिक अवश्य सिद्ध होते है। वह अपने उत्साह में विचार की क्रांतिकारी भूमिका को नहीं समझ पाये। उनकी सभी प्रतिज्ञाएँ गलत सिद्ध हुईं। उन्होंने अपनी सैद्धांतिकी की कमियों के अनुरूप एक गलत विश्वदृष्टि को श्लाघ्य बनाया। इसलिए मार्क्स सपाट चिंतक लगते हैं, न तो दार्शनिक के रूप में तत्वदर्शी, न आंदोलनकारी के रूप में दूरदर्शी।
“दूसरे दर्शनों से मार्क्सवाद का अंतर यह है कि उन्हें आप समझ सकते हैं, मार्क्सवाद को काम करते देख सकते हैं। कार्ययोजना के कारण ही यह दर्शन नहीं रह जाता, मज़हब बन जाता है। दर्शन आपकी अन्तश्चेतना में बदलाव लाते हैं और यह बड़े नामालूम ढंग से हमारे आचरण को बदलता है और इस तरह बिना हमारे लक्ष्य किए उनकी पहुँच की सीमा में बदलाव आते हैं। मज़हब सीधे हस्तक्षेप करता है और बदलाव के लिए बाध्य करता है। बाध्य करने के लिए जब हिंसा का सहारा नहीं ले पता तो छल और फरेब का सहारा लेता है।“
“उसने सिर पकड़ लिया। यार तुम जा किधर रहे हो? तुमने मार्क्स को किनारे लगा दिया और फिर भी अपने को मार्क्सवादी कहते हो। इससे बड़ा ढोंग क्या हो सकता है. “
“मेरी बात को समझने की कोशिश करो। राइट ब्रदर्स ने एक जोगाड़ किया। वह उड़ चला। वे असाधारण मेधा के व्यक्ति थे परन्तु उसी आधार पर उनको वैज्ञानिक नहीं मान लोगे। वे थे तो सायकिल ठीक करने वाले ही। उनके पास एक विजन था। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उड़ने का यन्त्र मात्र स्वप्न नहीं है. यह संभव है. यह छोटी बात नहीं है और यह बड़े से बड़े इंजीनियर के वश का नहीं था. आगे चल कर उससे दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई । उनके उडनयंत्र की कमियों को दूर करते हुए विमान अंतरिक्ष यान तक पहुँच गया, लगातार कमियों को लक्ष्य करता और उन्हें दूर करता. जो इतिहास और समाजशास्त्र को विज्ञान की श्रेणी में लेन को लालायित रहे हैं उन्हें विज्ञान से कुछ सीखना था पर उन्होंने तो इतिहास को भी धर्मशास्त्र बना दिया.
“ हम मार्क्स से दृष्टि ले सकते हैं और उन भूलों से बच सकते हैं जो मार्क्स से हुईं। मैं मार्क्सवादी इसी अर्थ में हूँ। उन भूलों के कारण मार्क्सवाद का भट्टा बैठ गया। उनसे बच कर देखो तो उसकी अपार संभावनाएँ हैं क्योंकि पूँजीवादी विनाश से बचाने की ताकत केवल मार्क्सवाद में ही है। यहाँ मैं केवल उन गलतियों को समझना ओर समझाना चाहता हूँ जिनसे उबरने का प्रयत्न जरूरी है।
“देखो सभी धर्म मानवकल्याण केा ही लक्ष्य बना कर चले हैं। ईश्वरवादी और अनीश्वरवादी या आत्मवादी और भौतिकवादी होने से उनका मूल चरि त्र नहीं बदल जाता, ध्येय अवश्य बदल जाता है। स्वर्ग जाने के स्थान पर धरती पर ही स्वर्ग उतारने की लालसा प्रेरक हो जाती है, परंतु जो उतरे उससे ही पता चलेगा कि यह स्वर्ग है या नरक। कम्युनिज्म पर अपनी टिप्पणी का अंत करते हुए हाब्सबाम लिखते हैं, ‘‘मैं इस सर्वे पर दो बातें कह कर इसे समाप्त करूँगा। पहला कि इस्लाम ने अपने पहले सौ साल में जितने बड़े भूभाग पर विजय पाई थी उससे भी तेजी से, इसने उससे भी बड़े भूभाग पर विजय पाई, फिर भी इस विशाल क्षेत्र पर इसका कितना सतही असर पड़ा।… कम्युनिज्म अवाम के धर्मान्तरण पर आधारित नहीं था अपितु लेनिन के शब्दों में हरावल दस्ते या अपने काडर पर आधारित धर्म था।… सभी शासक कम्युनिस्ट दल अपने चुनाव और परिभाषा से अभिजन अल्पमत थे।… फिर कम्युनिज्म सारतः एक विश्वास की चीज था जिसमें वर्तमान का मूल्य एक अपरिभाषित भविष्य का साधन बनने में था।…”
“तो तुम मुझे हाब्सबाम पिला रहे थे।“
“मैं हाब्सबाम से केवल इस सीमा तक सहमत हू कि मार्क्सवाद दर्शन से धर्म में परिवर्तित हो गया और उसमें धर्म की अनेक खामियाँ आ गईं, पर हाब्सबाम मार्क्सवादी नहीं हैं। मैं हूँ। हॉब्सबॉम की टिप्पणी में मार्क्सवाद के धर्म में बदल जाने की पहचान तो है पर यह समझने की कोशिश नही है कि यह दर्शन से धर्म बना कैसे. हॉब्सबॉम साम्यवाद क़े पतन को रेखांकित करते हैं पर पतन क़े सबसे प्रधान कारण को लक्ष्य नही कर पाते न ही अपने ऐतहासिक चरण पर इसकी अनिवार्यता का पूर्वाभास पाते है. इतिहास क़े अंत की बात करने वाले इतिहास की गतिकी को नहीं समझ पाते क्योंकि उनके पास इतिहास दृष्टि है ही नही. जो इतिहास में जितनी ही गहराई में जाएगा वह इतिहास की गतिकी को उतने ही कुहामुक्त रूप में समझ पायेगा. मुझे यह भ्रम है कि मैंने वेदों से भी आठ दस हज़ार साल पहले क़े अतीत को समझा है.”
“तुम्हारे अलावा दूसरा कोई.”
“दिखाई नही देता. हो सकता है कल पैदा हो.”
वह ठठाकर हँसा.

Post – 2015-10-25

“तुमने मार्क्स के चिंतन को यूरोकेन्द्री क्यों कहा, यह समझ में नहीं आया.”
“तुम जानते हो एक बार चेगुआरा नेहरू से मिलने आए थे और गांधी की तारीफ़ कर रहे थे. उस समय एक महिला पत्रकार ने उनका इंटरव्यू लिया था, जिसमें उसने पूछा था कि यदि आप को गांधी सही लगते हैं तो आपने हिंसा का रास्ता क्यों अपनाया. उनका उत्तर था, “यूरोप में अहिंसा की वैसी परम्परा नही है. यहाँ आंदोलन से परिवर्तन लाया जा सकता है. पश्चिम में सभी तरह के परिवर्तन हिंसा के बल पर ही हुए है.” मुझे उस पत्रकार का नाम तक याद नहीं, न यह याद है कि उसने किस पत्र में इसे प्रकाशित कराया था, इसलिए शब्द भी कुछ इधर-उधर हो सकते हैं, परन्तु यूरोप और मध्य-एशिया में ही नहीं, खाड़ी देशों में भी परिवर्तन, हिंसा के माध्यम से ही होते रहे हैं. भारत और चीन में बलप्रयोग के परिणाम आशाजनक नही रहे हैं, जबकि विचारों से धर्मपरिवर्तन तक होता रहा है जिसे बचाने के लिए लोग जान तक दे देते हैं. मार्क्स का परिवर्तन के लिए हिंसा का समर्थन यूरोपीय मानसिकता के अनुरूप था और इसकी कार्यकारिता भी वहीं तक सीमित थी. लेकिन मेरा अध्ययन इस मामले में बहुत कामचलाऊ है. ज़रूरी नहीं तुम भी इसे ठीक मानो.
“दूसरी बात यह कि उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था से, उसी के मज़दूरों को एकजुट करके क्रांति का सपना देखा. पूंजीवादी विकास तो केवल यूरोप में ही हुआ था. शेष संसार के लिए उनके पास कोई योजना ही न थी. वे कृत्क्रांति यूरोप के लिए कच्चा माल भेजने वाले हे रह जाते.”
“अरे भाई साम्यवाद का मतलब..”
“मैंने कहा न मेरा किताबी ज्ञान बहुत कम है, इसलिए किताबों में जो कुछ बताया और दिखाया जाता है उसको भी नहीं समझ पाता. मैं अपनी बात अपनी ज्ञानसीमा और अनुभवसीमा में कह रहा हूँ.”
“पर उनकी सबसे बड़ी गलती थी इतहास की गतिकी को न समझ पाना. वह मान बैठे कि पूंजीवाद सामंतवाद के बाद की या उसकी अगली अवस्था है.”
“तुम क्या समझते हो? अगली अवस्था नहीं है?”
“वह तो ठीक है परन्तु वह इसे भी नहीं समझ पाए।“
“तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न!”
“बाद में तय करेंगे। परन्तु, इसका ध्यान तो उन्हें रखना चाहिए था कि अगर यह इतिहास का एक चरण है और साम्यवाद इससे बाद का चरण है तो इस चरण को अपने चरम तक पहुँचने का अवसर तो देना है. आनन-फानन में उसे गिराकर उसकी जगह लेने के लिए तो न तैयार हो जाते। सच कहो तो उत्पीड़ित मानवता के प्रति उनकी गहरी सहानुभूति थी जिसके कारण वह अपना धैर्य खो बैठे और इस अधीरता ने उन्हें इतिहास की गतिकी को समझने में बाधा पहुँचाई.”
“पूंजीवाद औद्योगिक क्रांति की उपज है. बड़े पैमाने पर उत्पादन की संतान है. बडे पैमाने पर उत्पादन अर्थात् फालतू उत्पादन, उसके लिए बाजार चाहिए, जिसे कहते हैं, अपने कब्जे का बाजार, कैप्टिव मार्केट या उपनिवेश। इसके बाद भी इससे बेकारी पैदा होती ही है। एक छोटे से देश को पूर्जीवादी राह पर चलने पर बहुत सारे देशों का कच्चा माल, धन, और वहाँ भी बेकारी का प्रसार अनिवार्य है। यह समाजवादी चरण की अपेक्षाओं के अनुरूप नही है।
उत्पादन का यही तरीका समाजवाद ने भी अपना लिया इसलिए यह सामंती व्यवस्था को तो बदल सकता था, पूँजीवाद का मुकाबला नहीं कर सकता था, मुकाबला करने चलता तो स्वयं पूजीवादी तन्त्र अपनाना होता। कहें पूंजीवादी व्यवस्था के तन्त्र को तो उन्होंने बहुत अच्छी तरह समझा परन्तु साम्यवदी व्यवस्था में उन्हें समतामूलक वितरण ही समझ में आया पूँजीवाद के भी जीवट को तो समझा ही नही. जिस समय कोई व्यवस्था अपने उत्कर्ष पर हो उस समय उससे टक्कर लिया ही नहीं जा सकता, यह बात मार्क्स को भी मालूम थी, इसलिए साम्यवाद का एक तकियाकलाम रहा है कि पूंजीवाद अपने संकट के दौर से गुज़र रहा है, जब कि उसकी जीवंतता और जिजीविषा ऎसी कि जिस मज़दूर वर्ग के बल पर क्रांति होनी थी, उसे उसने पूँजीवादी लूट में छोटा साझेदार बनाकर पचा लिया. क्रांति कर चुके देश को भीतर से तोड़ दिया.”
“भई, वह तो गोर्बाचेव की नासमझी के कारण…”
मैंने उसके हस्तक्षेप पर ध्यान ही नहीं दिया या दिया तो गोर्बाचेव के नाम तक, ‘गोर्बाचेव ने तो उसे अधोगति से बचा लिया। वह उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में और उच्चतर जीवन की पूँजीवाद प्रसारित पूर्ति में विफल होने और अपनी पहल खोने के कारण बहुत पहले ही जमीन पर आ चुका था। तुम जानते हो, मेरा बेटा रूस में पड़ने गया था। मेरे सपनों के देश में। मेरे जोगाड़ से नहीं, स्वयं रूसी कोर्स ज्वाइन करने और अपनी प्रतिभा के बल पर अपनी अध्यापिका की नजर में आने के कारण। उसे वहाँ शिक्षा के लिए चुना गया तो वह नाच रहा था, जब कि वह फार्मेसी में ग्रैजुएट हो चुका था। उसने उसकी परवाह ही न की। पहले साल के बाद एक अप्रिय सूचना पर वह लौटा तो उसने जो कुछ बताया वह हैरान करने वाला था। वहाँ, अध्यापक तक उपहार पाना पसन्द करते हैं और इसे बुरा नहीं माना जाता। उसके साथ के रूसी लड़के कहते तुम लोग बन क्यों नहीं बनाते। बम बनाने का मतलब था परीक्षा से पहले हाथ पाँव आदि पर दर्ज करके और छिप कर उससे मदद लेना। वे बताते कि पढ़ें या न पढ़ें काम तो उन्हें मिल ही जाएगा। और अमेरिका के प्रति इतना आकर्षण कि घटिया से घटिया जीन मुँह माँगे दामों पर खरीदने को तैयार। नतीजा यह कि पढ़ने गए बहुत सारे बच्चे बिजनेस करने लगे। इस त्रासदी का और मामूली चीजों के लिए लगने वाली क्यू का जिक्र राज थापर ने अपने संस्मरण में भी किया है। मेरे बेटे के छह साल बर्वाद हो गए और वापसी के समय गोर्बाचेव के कारण जो स्थिति पैदा हुई उसमें यह पता करना तक मुश्किल था कि वह है कहाँ, आएगा भी या नहीं। तो गोर्बाचेव किसी का ऐजेंट नहीं था, उसने सड़ रही व्यवस्था को मिटने से बचाया। अमेरिकी एजेंट तो उसके बाद और उस फितरत के बल पर आया, जो गोर्बाचेव को हटाने के लिए अबोले जाहिर कर दिया गया कि अब अमेरिका को तुम्हारी जरूरत नहीं है।“
“अगले को पूँजीवाद की और मोड़ दिया.”
“अगला कौन?”
“क्या तुम्हे माओ का देश दिखाई नही देता या चाइनार प्रेजिडेंट आमादेर प्रेजिडेंट सुनाई नहीं पड़ता? सच कहें तो समय से पहले पूंजीवाद से हस्तक्षेप ने पूंजीवाद की शक्ति को बढ़ा दिया.”
“वह कैसे?”
“औद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी लोभ के समक्ष मज़दूर असहाय अमानवीय जिन्दगी जी रहे थे जिसका चित्रण अप्टन सिन्क्लेयर के उपन्यास जंगल में हुआ है।. पूरे यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति को लेकर भारी विक्षोभ था. सामंती व्यवस्था में भी वे उतनी अमानवीय स्थिति में न थे जितने उदीयमान पूंजीवादी व्यवस्था में. परन्तु एक भारी अन्तर यह था कि सामन्ती व्यवस्था में वे भूस्वामी से बधे हुए थे, बिखरे हुए थे,. वे एक साथ मिल कर शक्तिपुंज नहीं बन सकते थे जब कि पूंजीवादी व्यवस्था में वे एकजुट होकर अपने मालिक पर दबाव डाल सकते थे. इसी को लक्ष्य कर के मार्क्स ने सोचा कि इतिहास में मनुष्य समता के सपने तो जाने कब से देखता आया था पर उसे सचाई में बदलने के लिए सताए हुए लोगों की जो एकजुटता पहले संभव नहीं थी. आज वह सम्भव है. इसी को उन्होंने इतिहास का सार-सत्य समझ लिया और इसी के बल पर उन्होंने मान लिया कि अब पूंजीवाद की समाप्ति का और उस पुराने सपने को पूरा करने का सही अवसर आ गया है. संगठित जनता सत्ता परिवर्तन कर सकती है इसका विश्वास फ्रांस की क्रांतियों से हो ही चुका था.”
“इसमें गलती कहाँ थी भाई.”
“गलती यहाँ लगती है कि विचारों से तो लोग पहले भी समता की वकालत करते रहे, पर यह सम्भव नहीं हुआ था. इसलिए परिवर्तन में विचार की भूमिका को नगण्य मान लिया.” घोषित कर दिया कि दार्शनिक विश्व की व्याख्या करते आए हैं, अब समय आ गया है उसे बदलने का, जब कि यह समय अधिक मनोयोग से समस्या पर विचार करने का था। विचार की हत्या करके खून बहाया जा सकता है, इच्छित परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। मार्क्स का यह वाक्य जितना प्रेरक और सम्मोहक है, उतना ही भ्रामक और भटकानेवाला भी.”
वह हँसने लगा, “अच्छा कल बात करेंगे.”

Post – 2015-10-24

मार्क्सवादियों से तुम्हारी चिढ़ मार्क्स तक पहुँच जाती है. तुमने कल कहा, मार्क्सवादी इतिहास-विश्लेषण मार्क्स को भी माफ़ नहीं कर सकता.
इसमें चिढ़ने जैसी कोई बात नहीं. न मैंने कोई नई बात कही. मार्क्सवाद मार्क्सभक्ति नहीं है, विश्लेषण की एक पद्धति है. यह एक दर्शन है. इसकी शक्ति को समझने में स्वयं मार्क्स से भी भूल हुई.
क्या कहते हो? मार्क्स से भी भूल हुई?
ठीक कहता हूँ. और यह बहुत अनर्थकारी भूल थी. इसने दुनिया को झकझोरा अधिक बदला कम और इतिहास की दिशा को ग़लत मोड़ दे दिया.
मैं यह सोचकर रुका कि इस पर वह कुछ न कुछ बोलेगा ज़रूर, परन्तु वह किसी तरह विचलित नही दीखा, “बोलते जाओ मैं सुन रहा हूँ.”
“कई बार लगता है मैं पूरा मार्क्सवादी भी नही हूँ, कम से कम उस अर्थ में नहीं जिसमें, रक्त क्रान्ति के सपने देखे जाते हैं। मैं केवल उसके उस दार्शनिक सूत्र को ही अपने लिए पर्याप्त मानता हूँ, जिसे ऐतिहासिक और द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद कहा जाता है। भौतिकवाद की भी मेरी परिभाषा कुछ अलग है। मैं निपट पदार्थवादी नहीं अपितु पुद्गलवादी हूँ। चिन्मय भूतवादी। उन्नीसवीं शताब्दी के पदार्थवाद में विश्वास नहीं करता, जिसमें परमाणु जड़ है जिससे चित खमीर की तरह पैदा होता है अपितु बीसवीं शताब्दी के भूतवाद में जिसमे जिसमें अणु की सरचना में ही ऊर्ज या इलेक्ट्रान समाहित है और जिसमें ऊर्जा द्रव्य में और द्रव्य ऊर्जा में रूपांतरित हो सकता है. मार्क्स अपने समय के वैज्ञानिक विकास को देखते अद्यतन थे पर उनके चिंतन में यह तो नही कि आगे के मार्क्सवादी अपने समय के वैज्ञानिक विकासों से मुंह फेर कर उनके समय पर ही ठहरे रहेंगे. पश्चगामिता या प्रतिगामिता इसे ही कहते हैं, जिससे बाद के मार्क्सवादी उबर नहीं पाये.
“और इस तरह मैं मार्क्स को भी विचारक के रूप में यथावत स्वीकार नही कर पाता. तहाँ तक उनकी ऐतिहासिकता की बात है, मैं वहाँ भी उनसे टकराता हूँ. मार्क्स इतिहास की गतिकी और दिशा को समझने में भी चूके. इतिहास की समझ के बिना समाज और व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता, इसलिए ऐसे सभी लोग जो सामाजिक परिवर्तन के लिए कृतसंकल्प होते हैं, वे इतिहास के गलियारे में जाते अवश्य हैं. उन्हें स्वयं इतिहास की खोज भी करनी होती है और व्याख्या भी करनी होती है.”
“क्यों, इसकी क्या ज़रूरत? हमें बदलना है जो सामने दिखाई दे रहा है. जो वर्तमान है, और समझ रहे हैं इतिहास को. इसी से तो बचना है. पुरातनपन्थिता और प्रतिगामिता से.”
“यही तो चूक हुई या मूर्खता हुई हमारे मार्क्सवादियों से. पुरातन को समझना पुरातनपन्थिता नहीं है, पुरातन को जीने का प्रयास करना, उससे चिपके रहा जाना पुरातनपन्थिता है. ऐसे मार्क्सवादियों से इतिहास का भी सत्यानाश हुआ और वर्तमान का भी. तुम्हे चिकित्सा करने से पहले रोग का निदान करना होता है. केस हिस्ट्री में जाना होता है. इसके बिना ही दवा पर जुट जाओगे और उनसे सलाह लेकर दवा करोगे, जिन्होंने न बीमार को देखा न बीमारी के बारे में जानते हैं तो वही हाल होगा जो हमारे देश का और मार्क्सवादी दलों का हुआ. दवा बीमार और डॉक्टर दोनों की हालत बिगाड़ गई.”
“बात कुछ कुछ समझ में आरही है.”
“जो काम बीमार की केस हिस्ट्री करती है वही समाज के मामले में इतिहास करता है. मार्क्स इस विषय में सतर्क थे. अपने तई वह और ऐंगेल्स दोनों इतिहास और नृतत्व में गहरी रूचि रखते थे. उनके अध्ययन की व्यापकता चकित करती है. परन्तु वह काफी नही था. इतिहास सामाजिक शक्तियों और उन व्यक्तियों की जिनके माध्यम से यह सक्रिय होती है और जिन तरीकों से इसे हासिल किया जाता है इनको समझने की एक प्रयोगशाला है. परन्तु भौतिक विज्ञानों में भी जहाँ असंख्य शक्तियाँ किसी परिणाम को प्रभावित करती हैं उनमे भविष्य या परिणाम का पूर्वकथन प्रायः गलत होता है. जैसे कुछ समय पहले तक मौसम विज्ञान में होता रहा है. काफी हद तक यही अनिश्चितता चिकित्सा में भी बनी रहती है. इसलिए डाक्टर ‘कोशिश करता है.’ इतिहास का अध्ययन प्रॉक्सी से नहीं होता. हो ही नही सकता. इतिहास की समझ के मामले में इसीलिए उनसे भी चूक हुई और हीगेल से भी हुई थी. कई बार लगता है दोनों ही इतिहास का आशावादी या भविष्यवादी और सच कहो तो यूरोकेन्द्री अध्ययन कर रहे थे. मार्क्स ने तो भारत विषयक धारणा जेम्स मिल के इतिहास से ही बनाई थी जिसका विवेचन इतना नस्लवादी और कुतर्कपूर्ण है की ऑक्सफ़ोर्ड में आई.सी.ऐस. की तैयारी कर रहे प्रत्याशियों से, जिनको वह किताब पढ़ाई जाती थी, मैक्सम्युलर ने कहा था कि यदि तुम भारत को जेम्स मिल को पढ़ कर समझना चाहते हो तो समझ ही नही सकते. कोसंबी उन्हें सबसे प्रामाणिक मानते थे. ग़नीमत यह कि मार्क्स के ओरिएण्टल डेस्पॉटिज़्म की मान्यता की आलोचना कोसंबी ने प्राचीन भारत के सन्दर्भ में किया तो इरफ़ान हबीब ने मध्यकाल के विषय में. ऎसी स्थिति में जब कोई मार्क्स या एंगेल्स को प्रमाण के रूप में अपने को सही साबित करने के लिए उद्धृत करता है तो मुझे उसकी व्याख्या पर संदेह होता है. व्याख्या सही हो तो उसे किसी नज़ीर की ज़रूरत नहीं होती.”
“तुम किसकी बात कर रहे हो?”
“एक दो हों तब तो नाम लें. यह बता दूँ कि रामविलास जी और नामवर जी भी फँस जाने पर ऐसा ही करते हैं. जो भी हो न तो मार्क्स का इतिहास का ज्ञान भरोसे का है न उनकी इतिहास की व्याख्या. वह इतिहास से सीधे टकराये ही नही. जिन के माध्यम से उन्होंने इतिहास को समझा वे बेदाग़ नही थे.”
“तुम यह क्यों भूल जाते हो कि किन दारुण परिस्थियों में, कितने अभावों और दबावों में, उन्हें कितना काम करना पड़ा और उन्हें समस्त दुखी और उत्पीड़ित मानवता से कितनी सहानुभूति थी.”
“यहीं तो उनके समक्ष नतशिर हो जाता हूँ. उनकी ज्ञान-साधना और लोक-मंगल-कामना को तपस्या मानता हूँ और उनको ऋषि. और यह मत समझो कि उन्हें ऋषि कहकर उनका मान बढ़ा रहा हूँ. उन्हें ऋषि कहकर यह समझने में तुम्हारी मदद कर रहा हूँ कि ऋषि केवल वैदिक भारत में ही नही होते थे. तब तुम्हे यदि सप्तर्षि दिखाई देते थे तो आज शतर्षि मंडल मिल जाएँगे. हाँ साथ ही यह भी समझा रहा हूँ कि ऋषियों का कहा है, इसलिए ही कोई बात मान्य नहीं हो जाती.”
वह सहमत हो गया. बोला “दाग़ तो चाँद में भी है.”
मैंने कहा, “तुम्हारे मुंह घी-सक्कर ” पर आप जानते हैं, वहाँ न घी था न सक्कर, सिर्फ मुहावरा था और उस मुहावरे क़े साथ ही मुझे चाँद पर एक तुकबंदी याद आ गयी और मैंने सोचा उसे सुनाने का यही सही मौक़ा है, फिर भी पूछा, चाँद पर कुछ इबारतें मैंने भी लिखी हैं सुनना चाहोगे. अपनी ही असावधानी से मेरे चंगुल में आ चुका था वह और मैंने आव देखा न ताव, अपनी तुकबंदी को पूरी बुलंदी और फारसी अदायगी से पेश करने लगा.
चाँद में शीशे तो हैं रोडे हैं कुछ पत्थर भी हैं.
गौर से फिर देखिये कुछ आशिक़ों के घर भी हैं.
शांति कुछ ऎसी कि सन्नाटे से जी घबरा उठे
यह ग़नीमत जानिए कुछ आशिकों के सर भी हैं.
यूँ तो बसने के लिए आदम हैं आदम-ज़ाद है
और उनके ठीकरे हैं बोरिया बिस्तर भी हैं.
चाँद की कुछ रोशनी पड़ती ज़मीं पर है ज़रूर
अपने साये चाँद के भीतर भी हैं बाहर भी हैं.

Post – 2015-10-23

“कोई बात पूरी नही होती,” उसने भूमिका बनाते हुए कहा.
“अधूरापन ही विचार को ज़िंदा रखता है,” मैंने भी फ़िक़रा जड़ा.
उसने मेरे फ़िक़रे पर ध्यान नहीं दिया. अपने में खोया बोलता रहा, “कल मैं तुम्हारे उस वाक्य पर सोचता रहा, ‘सभ्यता का चरित्र वैश्विक है, इसलिए भारत में जो कुछ है वह पूरी मानवता का है.’ सभ्यता का चरित्र तो समझ में आया, परन्तु उतने प्राचीन चरण पर भारत में जो उत्कर्ष देखने में आता है, वह पूरी मानवता का है, यह जुमला समझ में नहीं आया और आया भी तो इस रूप में कि भारतीय सभ्यता के उत्थान में सुमेरिआ, मेसोपोटामिया और मिस्र का योगदान है. परन्तु उस दशा में यह बात समझ में नही आई, कि सभ्यता के प्रेरक घटकों का प्रवाह भारत से उन देशों की ओर था.”
ख़ुशी हुई कि पहली बार वह सचमुच गम्भीर था. मैंने कहा, “देखो, मैं केवल यह नहीं कह रहा था कि ऋग्वेदिक भाषा और संस्कृति का प्रवाह भारत से उन सभ्यताओं और असभ्य समाजों की ओर था, अपितु यह भी कि सभ्यता का जन्म भारत में हुआ और इसकी पहल से सुमेरी सभ्यता का, सुमेरी की प्रेरणा से मेसोपोटामियाई और मिस्री सभ्यता का उत्थान हुआ, परन्तु यदि कल इस बात को इतने खुले शब्दों में कहता तो तुम मेरी बात सुने बिना उठकर चल देते. तुम सोचते, इतनी भारतमुग्धता तो किसी मनोविक्षिप्त में ही हो सकती है. उससे सर क्यों मारना? आज तुम सुनने की मानसिकता में हो तो थोड़ा खुल गया.”
“अटपटा लग रहा है फिर भी इसे मान लें तो जो भारत का है, वह पूरी मानवता का कैसे हो गया? कहना तुम यह चाहते हो, कि भारत भूमि में ही कुछ ख़ास है, ‘गायन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्यास्तु ते भारत भूमिभागे’ वाले स्वर में’.” उसका चेहरा कुछ तमक आया था, फिर भी वह अपने को नियंत्रित करने का प्रयत्न कर रहा था.
“उस स्वर में तो नहीं, पर कुछ खास है, यह तो है ही. दुनिया के सभी क्षेत्रों में कुछ ख़ास है, और भारत में कुछ अधिक खास है.”
“क्या बकते हो तुम!” नियंत्रण की भी एक हद होती है. भाप का दबाव बढ़ जाने पर तो बॉयलर फट जाते हैं.
मैंने उसकी उत्तेजना का मज़ा लेते हुए उसे और कंफ्यूज करना चाहा, “सभ्यता के विकास में आपदाओं की भी एक भूमिका है. वे चाहे प्राकृतिक प्रकोप के कारण हों या मनुष्य की लापरवाही, उद्दंडता, कृपणता, निर्ममता, अज्ञान, कायरता, या सदाशयता से पैदा हों.”
इच्छित प्रभाव पड़ा. उसका पारा नीचे आ गया. हैरान होकर मुझे देखने लगा. इस हैरानी में प्रश्नाकुलता भी थी.
“भारत को प्रकृति ने रेगस्तान क्यों न बनाया जिसमे तेल के कुओं से पिघला हुआ सोना निकलता. रेगिस्तान तो अपने हिस्से आया पर उसमें तेल के कुंएं ही नदारद. दुख तो हुआ होगा इस पर . सीलन इतनी और गरमी इतनी कि लकड़ी में ही नहीं, आदमी के दिमाग में भी फफूंद लग जाती और वह सोचता नहीं दुहराता है. इस देश और हवा में उत्तर, सच कहें पश्चिमोत्तर से, और अंतिम सत्य यह कि सीधे यूरोप या उसके निकटस्थ क्षेत्र या दिशा से ऊर्जा लिए आने वाले कुछ ही समय में यहाँ की जलवायु के कारण खलास हो जाते रहे हैं, इसे आप मानते रहे हैं और इस पर आपसे बहस करूँ भी तो समय की बर्वादी ही होगी, इसलिए इस पर चुप रह जाता हूँ. मगर आप उस त्रासदी के समय इसकी महिमा को तो जानिए. यह हिमयुग की गहराती त्रासदी में पूरी दुनिया में सबसे उत्तम शरणस्थल था, या नही?
वह भौचक मुझे देखता रहा.
“अच्छा यह बताओ, यदि तुम्हें परिभाषित करना हो तो भारत को किसका देश कहोगे?”
वह मेरी और देखता रहा, फिर बोला, ‘तुम चाहते हो मैं इसे हिन्दुओं का देश कहूँ.”
“तुम निरे गावदी हो यार. कल्पना शक्ति है ही नही. दिमाग पर ज़ोर तो डालो. उसने दिमाग पर काफी ज़ोर डाला, पर उसमे से निकला, “तुम्ही बताओ.”
“मैं इसे मेलों का देश कहूँगा. जितने बड़े और जितने मेले, और जितने विचित्र मेल यहां लगते हैं, दुनिया में कहीं नहीं लगते. ठीक कहा?”
उसने हामी में सर हिलाया.
“पर एक मेला इतना बड़ा लगा था जिससे बड़ा मेला न कभी लगा न लगना चाहिए, और मज़े की बात उस मेले को मुझसे पहले न किसी ने देखा, न मेरी मदद के बिना देख सकता है.”
“समझा कर बताओ यार.”
“यह मेला विगत हिमयुग के गहराने के कारन लगा था, जब उत्तर के घबराए हुए लोग और जानवर सूरज की दिशा में और समुद्र की दिशा में पलायन करने लगे थे. उस आपदा में भारतीय भूभाग श्रीलंका से बहुत आगे तक फैला था. समुद्र काफी पीछे खिसक गया था.
“इस मेले के जुटान में ही हज़ारों साल लग गए थे. उत्तर की पर्वत श्रृंखला उत्तर की हवाओं के लिए दीवार थी. विशाल तट रेखा थी, वर्षा का औसत बहुत गिर गया था, पहले की आबादी पर आने वालों का बोझ. सूखे से खाद्य सामग्री का अभाव. ज़िंदा रहने के लिए भीषण मार-काट. अपने जत्थे को बचाने के लिए, और सम्भव है पेट भरने के लिए भी, नरहत्या तक को तैयार. तुम्हारी कपाल-कुण्डला, रक्तपायी काली उसी युग की प्रतीक है. कैलाश की चोटी पर विराजने वाला शिव जो हाथी का चमड़ा पहनता है, उन साइबेरियाई आगंतुकों का प्रतीक है. धरती का संतुलन बनाए रखने के लिए महागजों या दिग्गजों की कल्पना में मैमथों और मॅस्टोडानों की छाप है. ग़रज़ कि दूर उत्तर से लेकर बीच के और आसपास के अमंख्य मानव जत्थों का आगमन और रेलपेल. परन्तु अपनी विभिन्न परिस्थितियों में ज़िंदा रहने के लिए इन्होने जो तरकीबे निकल रखी थी उनका भी आगमन और लेन-देन भी होना ही था. समुद्र-मंथन कभी हुआ था और उससे क्या निकला था यह तो पता नहीं, परन्तु यह जो महामानव समुद्र मंथन इस भूभाग में हुआ था, उससे निकला था वह अमृत, जिसे चाइल्ड ने कृत्रिम उत्पादन और कृषि क्रांति कहा था और अपनी सतही और किंचित यूरोकेन्द्री दृष्टि के कारण अपने ‘निकट-पूर्व’ में केंद्रित मान लिया था. वह क्रांति इस भूभाग में हुई थी और राहत का दौर या उष्म काल के साथ दूर-दूर तक फैली थी. इसी की दूसरी अभिव्यक्ति स्थाई निवास, ग्राम, नगर और नगर संस्कृति का उदय भी इस देश में हुआ परन्तु इसमें विश्व मानवता की भागीदारी थी. अब हुई बात साफ़?”
वह हक्का बक्का, “इसके भी प्रमाण हैं?”
“होंगे क्यों नहीं. उसी महामंथन से इतिहास को बचाये रखने की अनेकानेक युक्तियाँ भी तैयार हुईं और हमने अपने इतिहास को ही नहीं उन युक्तियों क भी बचाए रखा. जो इसे नही समझ पाता वह न इतिहास को समझ सकता है, न अपने समाज को, न ही वर्तमान को. और ऐसा उचक्का यदि समाज को बदलने चलेगा तो समाज को, इसके मूल्यों, मानों, इतिहास और वर्तमान, सभी को झुलस कर रख देगा. मार्क्सवाद के नाम पर अनाड़ियों ने यही किया.”
“तुम तो अपने को खुद मार्क्सवादी कहते हो.”
“मैं मार्क्सवादी हूँ, पर अनाड़ी तो नही. दुर्भाग्य से इस देश में मैं अकेला मार्क्सवादी हूँ. दूसरे या तो भाववादी हैं या मोल-भव-वादी. मार्क्सवादी इतिहास-विश्लेषण मार्क्स को भी माफ़ नहीं कर सकता. इन पेशेवर सौदागरों की खबर तो लेगा ही. मैं अकेला पड़ जाता हूँ और मेरे सबसे बड़े दुश्मन अपने को मार्क्सवादी कह कर तमाशे खड़े करने वाले ही हैं.”

Post – 2015-10-22

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“तो तुम्हारा कहना है, दुनिया में जो कुछ अच्छा है वह सब भारत से गया हुआ है? भारत जगद्गुरु है?”
“मैं यह कहता हूँ की सभ्यता का चरित्र वैश्विक है, इसलिए भारत में जो कुछ है वह पूरी मानवता का है. और यह कहना चाहता हूँ कि इसे जितनी स्पष्टता से भारत ने समझा था, उतनी स्पष्टता से पूरे इतिहास में कभी किसी दूसरे ने नहीं समझा. आजतक.
“तुम तो पेंग भरते रहते हो. उछलते तो ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ गाने लगते हो और पीछे लौटते हो तो ‘न हमने कुछ कहा न हमने कुछ किया का राग’. पर अगले ही क्षण पेंग आगे और जैकारा शुरू.”
“गाने तुम गा रहे हो. जो समझते नही वे गाने गाते हैं. वह “सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ ” हो, या ” मो सम कौन कुटिल खल कामी हो.’ मैं तुम्हे सिर्फ इतना बता रहा हूँ की दूसरी सभ्यताओं के सपूतों ने अपने इतिहास को नकार दिया. उसका सत्यानाश कर दिया और हमारे ऊपर कटाक्ष करते रहे कि हमारे पास न इतिहास है, न इतिहास बोध, जब कि हम अकेले हैं जिन्होंने अपने इतिहास को बचाया और…”
“तुम कहो, हमने इतिहास को पूजा और उससे बाहर निकल ही नही सके, न ही निकलना चाहते है.”
“तुममे सुनने का धीरज तो होना चाहिए. हम अकेले हैं जिन्होंने इतिहास की गति और गतिकी को समझा और उसे सूत्रबद्ध किया. तुमने वह नीति वाक्य सुना है, ‘चक्रार पंक्तिरिव गच्छति भाग्य पंक्तिः’ जानते हो यह कितना पुराना है? नहीं जानते. यह ऋग्वेद से लिया हुआ है.”
“ऋग्वेद से?” उसे चौंकना ही था.
“हाँ, ऋग्वेद की इबारत अधिक स्पष्ट है, “ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रा अन्यम् अन्यम् उपगच्छन्ति राय: ‘ अरे ये धन-वैभव तो आज एक के पास है कल दूसरे के पास चला जाएगा. कहीं टिकता नहीं. पहिये के अरों की तरह घूमता रहता है. कभी एक अरा ऊपर आता है तो कभी दूसरा.’ पश्चिम ज्ञान और विज्ञान में सबसे अग्रणी होने का दावा करता है पर अहंकारवश इस सूत्र को जानते हुए भी समझने और मानने को तैयार नहीं होता. अपने या गोरी जाति के शाश्वत-वर्चस्व-सिंड्रोम से बहार निकल ही नही पाता.”
मैं सोच रहा था वह बीच में टोकेगा, परन्तु वह पहली बार ध्यान से सुन रहा था.
“जो इतिहास को जानता है, वह इतिहास से बंधता नहीं है. इसीलिए यह हज़ारों साल पहले से युगधर्म की बात करता आया है. जो कभी चलन में था, दूसरे युग या भिन्न देश में वर्ज्य हो सकता है. जो वर्ज्य था वह व्यवहार्य हो सकता है. परन्तु विश्व-गुरु-सिंड्रोम से यह भी ग्रस्त रहा है यह भी मानना होगा, क्योंकि सबसे पुराने विश्वविद्यालय यहीं थे, और उनमें पढने के लिए दूर-दूर से लोग खतरे उठाकर आया करते थे. ”
“जब तुम इतिहास को बचाने की बात कर रहे थे तब मैं सोच रहा था कि तुम्हें चीन क्यों भूल गया.”
“देखो, चीन पुराना देश है. उसकी संस्थाओं और उपलब्धियों को उस निषेधवादी विचार से नहीं गुजरना पड़ा जिस में धर्मोदय के साथ अपने ही इतिहास और अपने ही पुरखों को नकार ही नही दिया जाता है, उन्हें गर्हित, अंधकारपूर्ण ही नही बताया जाता है, अपितु उन्हें नारकीय यातना का पात्र तक मान लिया जाता है. उन्हें शैतान की गिरफ्त में मान लिया जाता है. और वह भी बुद्ध धर्म क़े संपर्क में आने क़े बाद भी.
“बुद्ध धर्म तो किसी को शैतान कहता नही.”
मैं मुस्कराता हुआ कुछ देर तक उसकी हैरानी का मज़ा लेता रहा. जब उसे खीझ होने लगी तो कहा, “देखो अभी तक तो तुम इस बात से घबराये हुए थे. मैं प्राचीन जगत के एक दौर की उपलब्धियों का ही श्रेय भारत को दे रहा हूँ तो तुम मानने को तैयार नही. परन्तु अब जब मैं कहने जा रहा हूँ कि दुनिया की अनेक बुराइयों की जड़ भी यहाँ तलाशी जा सकती है तो तुम झटपट मान लोगे, क्योंकि यही वह चीज़ है जिसे लोग बिना जाँचे परखे मान लेते हैं.”
“तुम यह क्यों सोचते हो की मैं क्या मानूँगा, क्या नहीं. मैंने तो सिर्फ इतना कहा कि बौद्धमत में”
“मत, मत कहो. धर्म कहो. पहली बार एक व्यापक और आज की शब्दावली में कहें तो सेक्युलर और वैज्ञानिक शब्द को बुद्ध ने संकीर्ण अर्थ में लेते हुए अपने मत को धर्म की संज्ञा दी.”
“चलो वही सही. पर मेरा प्रश्न..”
“आता हूँ उस पर. तुम यह तो मानोगे कि बौद्ध धर्म दुनिया का पहला मिशनरी धर्म है.”
वह आश्चर्य से मुझे देखने लगा तो, मैंने अपनी भूल सुधारी. मुझसे चूक हुई, पहला नहीं. मिशनरी धर्म जिसे तब धर्म नहीं, व्रत कहते थे और जो अपने आदर्श मूल्यों और मानों के प्रसार को समर्पित था, ऋग्वेद क़े समय में ही अस्तित्व में आ गया था. आखिर ‘सूर्यम दिवि रोहयन्त: सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तः अधिक्षमि’ और ‘कृणवामो विश्वमार्यम’ क़े पीछे तो मिशनरी भावना ही है.
“और मिशनरी धर्मों का एक अनिवार्य लक्षण है अपनी धर्मसीमा से बाहर क़े लोगों क़े प्रति घृणा पैदा करके दूसरों को अपने धर्म में दीक्षित होने को बाध्य करना.”
“ऋग्वेद में भी है यह?”
“क्यों नहीं है. अनीन्द्र (इंद्रा को न माननेवाले), अदेवयूं (देवों को न मानने वाले), अन्यव्रत और अनार्य (आर्य जीवनपद्धति न अपनाने वाले) लोगों क़े प्रति घृणा तो ऋग्वेद में भी है. पूरे भारोपीय क्षेत्र में उससे पहले का कोई धर्म, विश्वास बचा दिखाई देता है.”
वह भौचक. संभलने में कुछ समय लगा, “परन्तु, बौद्धधर्म तो अहिंसा का प्रचारक है.”
“अहिंसक भी हिंसकों से घृणा कर सकते हैं न? जितनी अहिंसा को उचित मानते हैं उससे आगे बढ़ी अहिंसा से घृणा कर सकते हैं न. जिनमे हिंसा पूर्णतः वर्जित नहीं है उनका कुत्सित चित्रण कर सकते हैं न?”
“लगा उसे मेरी बात समझ में नही आ रही है. मैंने कहा, “यदि तुम देखो कि बुद्ध महावीर की कितनी निंदा करते हैं और महावीर बुद्ध को कितनी खोटी खरी सुनाते हैं तो दांतों टेल उंगली दबा लोगे. और यह जो बौद्ध साहित्या में मिलता है की यज्ञ में अनगिनत गायों की बलि दी जाती थी, वह बौद्धधर्म के कारण बंद हुआ, या बौद्ध मत में दीक्षित होने से पहले अशोक चांडाशोक था और अपने आठ भाइयों का वध कर दिया था और कलिंग युद्ध में लाखों का संहार हुआ था, या अंगुलिमाल नामक डाकू का हृदय परिवर्तन हुआ था इन्हे ज़रा सोचते समझते हुए पढ़ना चाहिए. कम-से-कम इतनी समझ तो होनी ही चहिये कटी उँगलियों की सड़ांध उसे पसंद न रही होगी. मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि अपने को स्वीकार्य बंनाने कि लिए मिशनरी धर्म दूसरे धर्मों, और अपने उदय से पहले के विचारों और लोगों की निंदा करने के लिए उनमें बुराइयों का आरोपण करते और प्रचलित बुराइयों की अतिरंजना करते है.”
“लेकिन सनातन धर्म में तो किसी को अपनाने की प्रवृत्ति ही नहीं रही है. वे तो अपने सीमित दायरे से बाहर के भूभागों को भी अशुद्ध मानते रहे है.”
“तब तक, जब तक उसे जीतकर, या उसके शासक को मनाकर, उसमें वर्णव्यवस्था लागू न कर दी जाय.”
“परन्तु भारत से बाहर तो वर्णव्यवस्था पाई नहीं जाती.”
“पाई नहीं जाती, क्योंकि प्रभाव क्षीण पड़ने के बाद वह मंद पड़ते-पड़ते लुप्त हो गई, परन्तु वर्णव्यवस्था का प्रसार भी किया गया था और ईरानियों, गालों, रोमनों आदि में लम्बे समय तक बनी रही. दस्तूर भी तो आखिर ब्राह्मण ही हैं न.”
उसे विश्वास नहीं हो रहा था तो मुझे मेधातिथि की टीका का एक अंश दुहराना पड़ा, “यदि कश्चिद् क्षत्रियादि जातीयो राजा साध्वाचरणो म्लेच्छान पराजयेत् चातुर्वर्ण्यं वासयेत्, म्लेच्छान च आर्यावर्त इव व्यवस्थापयेत् सो अपि स्यात् यज्निया:, यतो भूमि: न स्यात् दुष्टा संसर्गात् हि दुष्यति. (यदि कोई क्षत्रिय या किसी अन्य जाति का सदाचारी म्लेच्छों को पराजित करके वर्णव्यवस्था स्थापित करे तो वह क्षेत्र भी यज्ञ के उपयुक्त हो जाएगा, क्योंकि धरती स्वयं दूषित नहीं होती संसर्ग से दूषित होती है).
उसे सब कुछ नया नया सा लग रहा था. मैंने आगे जोड़ा, “तो यह जो मिशनरी धर्म की बीमारी है, जिसे सेमेटिक कह कर एक दरबे में दाल दिया जाता है, उसकी जड़ भी भारत ही है. यह वहां दो खेपों में पहुंची. पहला खेप वैदिक, दूसरा खेप बौद्ध.
और दूसरी बुराई जुआ और सट्टेबाज़ी. यहीं से निर्यात हुई
और तीसरी रेस-कोर्स. हाँ इसमें इतना और जोड़ दो कि रेस में पहले रासभ ही जोए जाते थे. आखिर रास, रासभ, रेस, रैश में ध्वनि साम्य तो है ही.

Post – 2015-10-22

“तो तुम्हारा कहना है, दुनिया में जो कुछ अच्छा है वह सब भारत से गया हुआ है? भारत जगद्गुरु है?”
“मैं यह कहता हूँ की सभ्यता का चरित्र वैश्विक है, इसलिए भारत में जो कुछ है वह पूरी मानवता का है. और यह कहना चाहता हूँ कि इसे जितनी स्पष्टता से भारत ने समझा था, उतनी स्पष्टता से पूरे इतिहास में कभी किसी दूसरे ने नहीं समझा. आजतक.
“तुम तो पेंग भरते रहते हो. उछलते तो ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ गाने लगते हो और पीर पीछे लौटते हो तो ‘न हमने कुछ कहा न हमने कुछ किया का राग. पर अगले ही क्षण पेंग आगे और जैकारा शुरू.”
“गाने तुम गा रहे. जो समझते नही वे गाने गाते हैं. वह “सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ ” हो या ” मो सम कौन कुटिल खल कामी हो.’ मैं तुम्हे सिर्फ इतना बता रहा हूँ की दूसरी सभ्यताओं के सपूतों ने अपने इतिहास को नकार दिया. उसका सत्यानाश कर दिया और हमारे ऊपर कटाक्ष करते रहे कि हमारे पास न इतिहास है न इतिहास बोध जब कि हम अकेले हैं जिन्होंने अपने इतिहास को बचाया और…”
“तुम कहो, हमने इतिहास को पूजा और उससे बाहर निकल ही नही सके, न ही निकालना चाहते है.”
“तुममे सुनने का धीरज तो होना चाहिए. हम अकेले हैं जिन्होंने इतिहास की गति और गतिकी को समझा और उसे सूत्रबद्ध किया. तुमने वह नीति वाक्य सुना है, ‘चक्रार पंक्तिरिव गच्छति भाग्य पंक्तिः’ जानते हो यह कितना पुराना है? नहीं जानते. यह ऋग्वेद से लिया हुआ है.”
“ऋग्वेद से?” उसे चौंकना ही था.
“हाँ, ऋग्वेद की इबारत अधिक स्पष्ट है, “ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रा अन्यम् अन्यम् उपगच्छन्ति राय: ‘ अरे ये धन-वैभव तो आज एक के पास है कल दूसरे के पास चला जाएगा. कहीं टिकता नहीं. पहिये के अरों की तरह घूमता रहता है. कभी एक अरा ऊपर आता है तो कभी दूसरा. पश्चिम ज्ञान और विज्ञान में सबसे अग्रणी होने का दावा करता है पर अहंकारवश इस सूत्र को जानते हुए भी समझने और मानने को तैयार नहीं होता. अपने या गोरी जाति के शाश्वत-वर्चस्व-सिंड्रोम से बहार निकल ही नही पाता.”
मैं सोच रहा था वह बीच में टोकेगा, परन्तु वह पहली बार ध्यान से सुन रहा था.
“जो इतिहास को जानता है वह इतिहास से बंधता नहीं है. इसीलिए यह हज़ारों साल पहले से युगधर्म की बात करता आया है. जो कभी चलन में था, दूसरे युग और या भिन्न देश में वर्ज्य हो सकता है. जो वर्ज्य था वह व्यवहार्य हो सकता है. परन्तु विश्व-गुरु-सिंड्रोम से यह भी ग्रस्त रहा है यह भी मानना होगा क्योंकि सबसे पुराने विश्वविद्यालय यहीं थे और उनमें पढने के लिए दूर दूर से लोग खतरे उठाकर आया करते थे. ”
“जब तुम इतिहास को बचाने की बात कर रहे थे तब मैं सोच रहा था कि तुम्हें चीन क्यों भूल गया.”
“देखो, चीन पुराना देश है. उसकी संस्थाओं और उपलब्धियों को उस निषेधवादी विचार से नहीं गुजरना पड़ा जिस में धर्मोदय के साथ अपने ही इतिहास और अपने ही पुरखों को नकार नही दिया जाता है, उन्हें गर्हित, अंधकारपूर्ण ही नही बताया जाता है, अपितु उन्हें नारकीय यातना का पात्र तक मान लिया जाता है. उन्हें शैतान की गिरफ्त में मान लिया जाता है. और वह बुद्ध धर्म क़े संपर्क में आने क़े बाद भी.
“बुद्ध धर्म तो किसी को शैतान कहता नही.”
मैं मुस्कराता हुआ कुछ देर तक उसकी हैरानी का मज़ा लेता रहा. जब उसे खीझ होने लगी तो कहा, “देखो अभी तक तो तुम इस बात से घबराये हुए थे की मैं प्राचीन जगत के एक दौर की उपलब्धियों का ही श्रेय भारत को दे रहा हूँ तो तुम मानने को तैयार नही. परन्तु अब जब मैं कहने जा रहा हूँ कि दुनिया की अनेक बुराइयों की जड़ भी यहाँ तलाशी जा सकती है तो तुम झटपट मन लोगे, क्योंकि यही वह चीज़ है जिसे लोग बिना जाँचे परखे मान लेते हैं.”
“तुम यह क्यों सोचते हो की मैं क्या मानूँगा, क्या नहीं. मैंने तो सिर्फ इतना कहा कि बौद्धमत में”
“मत मत कहो. धर्म कहो. पहली बार एक व्यापक और आज की शब्दावली में कहें तो सेक्युलर और वैज्ञानिक शब्द को बुद्ध ने संकीर्ण अर्थ में लेते हुए अपने मत तो धर्म की संज्ञा दी.”
“चलो वही सही. पर मेरा प्रश्न..”
“आता हूँ उस पर. तुम यह तो मानोगे कि बौद्ध धर्म दुनिया का पहला मिशनरी धर्म है.”
वह आश्चर्य से मुझे देखने लगा तो, मैंने अपनी भूल सुधारी. मुझसे चूक हुई, पहला नहीं. मिशनरी धर्म जिसे तब धर्म नहीं, व्रत कहते थे और जो अपने आदर्श मूल्यों और मानों के प्रसार को समर्पित था, ऋग्वेद क़े समय में ही अस्तित्व में आ गया था. आखिर ‘सूर्यम दिवि रोहयन्त: सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तः अधिक्षमि’ और ‘कृणवामो विश्वमार्यम’ क़े पीछे तो मिशनरी भावना ही है.
“और मिशनरी धर्मों का एक अनिवार्य लक्षण है अपनी धर्मसीमा से बहार क़े लोगों क़े प्रति घृणा पैदा करके दूसरों को अपने धर्म में दीक्षित होने को बाध्य करना.”
“ऋग्वेद में भी है यह?”
“क्यों नहीं है. अनीन्द्र (इंद्रा को न माननेवाले), अदेवयूं (देवों को न मानने वाले), अन्यव्रत और अनार्य (आर्य जीवनपद्धति न अपनाने वाले) लोगों क़े प्रति घृणा तो ऋग्वेद में भी है. पूरे भारोपीय क्षेत्र में उससे पहले का कोई धर्म, विश्वास बचा दिखाई देता है.”
वह भौचक. संभलने में कुछ समय लगा, “परन्तु, बौद्धधर्म तो अहिंसा का प्रचारक है.”
“अहिंसक भी हिंसकों से घृणा कर सकते हैं न? जितनी अहिंसा को उचित मानते हैं उससे आगे बढ़ी अहिंसा से घृणा कर सकते हैं न. जिनमे हिंसा पूर्णतः वर्जित नहीं है उनका कुत्सित चित्रण कर सकते हैं न?”
“लगा उसे मेरी बात समझ में नही आ रही है. मैंने कहा, “यदि तुम देखो कि बुद्ध महावीर की कितनी निंदा करते हैं और महावीर बुद्ध को कितनी खोटी खरी सुनाते हैं तो दांतों टेल उंगली दबा लोगे. और यह जो बौद्ध साहित्या में मिलता है की यज्ञ में अनगिनत गायों की बलि दी जाती थी, वह बौद्धधर्म के कारण बंद हुआ, या बौद्ध मत में दीक्षित होने से पहले अशोक चांडाशोक था और अपने आठ भाइयों का वध कर दिया था और कलिंग युद्ध में लाखों का संहार हुआ था, या अंगुलिमाल नामक डाकू का हृदय परिवर्तन हुआ था इन्हे ज़रा सोचते समझते हुए पढ़ना चाहिए. कम-से-कम इतनी समझ तो होनी ही चहिये कटी उँगलियों की सड़ांध उसे पसंद न रही होगी. मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि अपने को स्वीकार्य बंनाने कि लिए मिशनरी धर्म दूसरे धर्मों, और अपने उदय से पहले के विचारों और लोगों की निंदा करने के लिए उनमें बुराइयों का आरोपण करते और प्रचलित बुराइयों की अतिरंजना करते है.”
“लेकिन सनातन धर्म में तो किसी को अपनाने की प्रवृत्ति ही नहीं रही है. वे तो अपने सीमित दायरे से बाहर के भूभागों को भी अशुद्ध मानते रहे है.”
“तब तक जब तक की उसे जीतकर या उसके शासक को मनाकर उसमें वर्णव्यवस्था लागू न कर दी जाय.”
“परन्तु भारत से बाहर तो वर्णव्यवस्था पाई नहीं जाती.”
“पाई नहीं जाती, क्योंकि प्रभाव क्षीण पड़ने के बाद वह मंद पड़ते-पड़ते लुप्त हो गई, परन्तु वर्णव्यवस्था का प्रसार भी किया गया था और ईरानियों, गालों, रोमनों आदि में लम्बे समय तक बनी रही. दस्तूर भी तो आखिर ब्राह्मण ही हैं न.”
उसे विश्वास नहीं हो रहा था तो मुझे मेधातिथि की टीका का एक अंश दुहराना पड़ा, “यदि कश्चिद् क्षत्रियादि जातीयो राजा साध्वाचरणो म्लेच्छान पराजयेत् चातुर्वर्ण्यं वासयेत्, म्लेच्छान च आर्यावर्त इव व्यवस्थापयेत् सो अपि स्यात् यज्निया:, यतो भूमि: न स्यात् दुष्टा संसर्गात् हि दुष्यति. (यदि कोई क्षत्रिय या किसी अन्य जाति का सदाचारी म्लेच्छों को पराजित करके वर्णव्यवस्था स्थापित करे तो वह क्षेत्र भी यज्ञ के उपयुक्त हो जाएगा, क्योंकि धरती स्वयं दूषित नहइन् होती संसर्ग से दूषित होती है).
उसे सब कुछ नया नया सा लग रहा था. मैंने आगे जोड़ा, “तो यह जो मिशनरी धर्म की बीमारी है, जीत सेमेटिक कह कर एक दरबे में दाल दिया जाता है, उसकी जड़ भी भारत ही है. यह वहां दो खेपों में पहुंची. पहला खेप वैदिक, दूसरा खेप बौद्ध.
और दूसरी बुराई जुआ और सट्टेबाज़ी. यहीं से निर्यात हुई
और तीसरी रेस-कोर्स. हाँ इसमें इतना और जोड़ दो कि रेस में पहले रासभ ही जोए जाते थेय. आखिर रास, रासभ, रेस, रैश में ध्वनि साम्य तो है ही.

Post – 2015-10-21

“तुम कहाँ की बात को कहाँ पहुँचा देते हो. मैं तो एक सीधा सवाल करना चाहता था कि वेद में…” वह रुक गया.
“तुम जानते हो कि कुछ प्रश्न सीधे नही किये जा सकते. संवेदनशील मामलों में जो लोग धड़ल्ले से बात कर लेते हैं वे यन्त्रमानव होते हैं और उनको कोई दूसरा चला रहा होता है.”
“चला तो उन्हें भी कोई और होता है जो कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील होते हैं और बात-बात में भड़क उठते हैं.”
“तुम ठीक कहते हो आवेग की प्रबलता और आवेग का अभाव दोनों स्थितियों में मनुष्य मनुष्य नहीं रह जाता. आवेग की प्रबलता हो तो वह पशु हो जाता है, विवेकशून्य – जुगुप्सु या डरावना या दयनीय प्राणी. यदि बुद्धि की इतनी प्रबलता हो जाय कि उसमें भावनाओं के लिए स्थान ही न रह जाय तो वह यन्त्रमानव बन जाता है.”
वह मुस्कराने लगा, “यन्त्रमानवों के बिना तो हमारा काम चल ही नहीं सकता.”
“चल तो पशुओं के बिना भी नहीं सकता. मैं मनुष्य की मनुष्यता की रक्षा की बात कर रहा हूँ. उसकी निजता की रक्षा की बात कर रहा हूँ.”
“तुम बातों को उलझा देते हो यार. साफ साफ क्यों नहीं बोलते?”
“देखो सभी जीवधारी सामाजिक या समूहबद्ध. यह उनके अस्तित्व रक्षा से जुड़ा प्रश्न है. इसी तकाजे से मनुष्य ने संस्थाएँ बनाई. सबके हित के लिए. परन्तु कुछ संस्थाएँ ऎसी होती हैं जिनके उद्देश्य उसके हित और आकांक्षाओं से भिन्न होते हैं. वे अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए लोगों को कई बहनों से अपने से जोड़ कर रखती हैं – अपने औज़ार के रूप में उनका इस्तेमाल करने के लिए. इनमें से कुछ संस्थाएं और व्यवस्थाये उन्हें पशु बनने को प्रोत्साहित करती हैं तो कुछ दूसरी यंत्रमानव बनाने का प्रयत्न करती हैं. मनुष्य बनाने में इनमें से किसी की दिलचस्पी नहीं. यह जिम्मेदारी मनुष्य को खुद उठानी पड़ती है- आत्मना उद्धरेत् आत्मानम् नात्मानम् अवसीदयेत्. और इसके लिए उसे पहले ऎसी संस्थाओं, व्यवस्थाओं और दलों से अलग होना पडेगा जो उसका एकांगी विकास करके अपना उपकरण बनाती हैं, परन्तु मनुष्य नही रहने देतीं.”
“तुम भटक रहे हो,” उसने कुछ खीझ कर कहा.
मैं अपनी ही रौ में बोलता रहा, “हमारे बुद्धिजीवियों की सबसे बड़ी समस्या है कि वे इन्ही संस्थाओं और दलों से चिपके रहे है या इनसे जुड़े किसी व्यक्ति द्वारा अनुग्रहीत रहे हैं. उन्ही के अनुसार अपने को स्वयं ढालते रहे हैं. उनके विषाद ज्ञान और अध्ययन के बाद भी उनके पशु या रोबोट बनाने की विडम्बना का कारण यही है. और यही कारण है कि एक बहुत कम पढ़े-लिखे और यहां तक कि अनपढ व्यक्ति के मुकाबले ये अधिक मूर्खता की बातें करते हैं क्योंकि वह मनुष्य है और इन्होने अपनी मनुस्यता खो दी है.
इसके चलते, जनता और बुद्धिजीवी के बीच की दूरी बढती जाती है और इसी अनुपात में साहित्यकार और बुद्धिजीवी की शक्ति घटती जाती है और वह सत्ता के केन्द्रों और संगठनों पर अधिक निर्भर होता जाता है. अब गर्व करने को उसके पास उससे मिले सत्कार और पुरस्कार और नेताओं और नौकर्शाहों से निकटता ही रह जाती है जब कि उसकी हैसियत अपने विचार और जनता में अपनी पहुँच के बल पर ऎसी होनी चाहिए कि राजनेता और नौकरशाह उससे या उसकी पुस्तकों से परिचित होने पर गर्व करेंi उन्हें गर्व करने के लिए विदेशी लेखकों और विचारको के पास दौड़ना पड़ता है. और हमारा लेखक विदेशी लेखकों जैसा बनने की कोशिश में न घर का रहता है न घाट का.
“देखो, मुझे डर है कि तुम आज फिर बहक जाओगे. मैं पूछता हूँ कि वेद में …”
“देखो, मैं चालीस साल से वेद पर काम कर रहा हूँ और यह जानता हूँ कि मैं अभी तक उसकी ऊपरी पापड़ी तक ही पहुँच सका हूँ और साथ ही यह भी जानता हूँ कि मुझसे पहले मेरी जानकारी में कोई दूसरा वहाँ तक भी नहीं पहुँचा था. ऋग्वेद विश्व सभ्यता के प्रथम शिखर की साहित्यिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक ऊर्जा की अभिव्यक्ति के नितांत क्षुद्र अंश का संग्रह है, फिर भी इसकी इतनी तरह की व्याख्याएँ हो सकती हैं कि इसमें से हीरे से लेकर कंकड़ तक कुछ भी निकाला जा सकता है. यही नहीं उसी को एक हीरा बता सकता है दूसरा कंकड़.”
“यार ऋग्वेद का नाम आते ही तुम इतने भावुक हो जाते हो कि जो कुछ नही जानता उसे भी लगता है इसका महिमामंडन किया जा रहा है.”
“जो कुछ नहीं जानता वही ऎसी बात कर सकता है और जो कुछ जानना नहीं चाहता वही उसको प्रमाण मान सकता है. अंधे अँधा ठेलियाँ दोऊ कूप पडंत. हमारे बुद्धिजीवी समाज में …अरे रुको. बुद्धिजीवी का मतलब जानते हो या नहीं?”
वह हंसने लगा, जानता हूँ . तुम्ही ने एक दिन बताया था, “बुद्धि बेचकर खा जाने वाले.”
“हाँ इन अक़्ल के धनी लोगों के पास अक़्ल होती तो है पर उसे इतनी तेज़ी से बेचते हैं कि उनके पास बचती ही नहीं. किसी से उधार लेने में शर्म भी आती है. ऐसे ही लोगों से तुम्हारा पाला पड़ा है. भई, यदि किसी विषय को नहीं जानते हो तो उसपर चुप तो रहो. सुनने की आदत तो डालो. ये वेद को क्या समझेंगे, मैंने जो लिखा है उसे तक नहीं समझ पाते फिर भी मुँह खोलने से बाज़ नहीं आते. विद्वान को जानना चाहिए कि कब और कहाँ चुप रहना चाहिए. यह बोलने से अधिक ज़रूरी है.”
“गई भैंस पानी में .” वह खीझ कर बोला. “तुम सीधे विषय पर क्यों नहीं आते?”
“विषय पर ही बात कर रहा हूँ. पहले वेद के विषय में जो उच्चाटन मंत्र लगातार दुहराया जाता रहा है उसे तो उतार दूँ कि तुम सुनने और समझने की स्थिति में आओ. पहले यह तो बता दू कि तथ्य कथन भी इतना अविश्वसनीय हो सकता है कि वह अतिरंजना लगे. कोई कहे कि प्रशांत महासागर में कुछ ऐसी गहराइयाँ हैं कि कैलाश पर्वत को भी उसमें डालो तो डूब जाये, इसे जो प्रशांत महासागर को नही जनता उसे यह अतिरंजना लगेगा और जिसने अपने गांव के पोखर को छोड़ कुछ देखा ही नही उसकी तो बात ही नहीं.”
वह भड़क उठा. हद करते हो. कौन सा तथ्य है तुम्हारे पास जो मेसोपोटामियन और मिस्री सभ्यताओं के रहते ऋग्वेद काल को प्राचीन सभ्यताओं का शिखर सिद्ध कर दे?”
“इसकी भाषा जो सीधे और कुछ टेढ़े भारत से युरोप तक फ़ैल गई जब कि उनकी भाषाएँ उनके दायरे में सिमटी रह गईं. इसकी रीतियाँ नीतियाँ, पोशाक विचार, स्वच्छता के सरोकार, यहां तक कि इसके मुहावरे जो भारत से ग्रीस तक फ़ैल गए.
हद करते हो यार. लगता है विषय पर बात आज भी नही हो पायेगी. ये तुम हर चीज़ को उलट क्यों देते हो. तुम तो उनमें से लगते हो जो कहते हैं कि पिरामिडों के ज्यामितीय सूत्र भी भारत से मिस्र पहुँचे.”
“मैं नही जानता वे क्या और किस आधार पर ऐसा कहते हैं पर प्रभाव विस्तार तो इस देश से ही हो रहा है. भाषा और संस्कृति की बात तुम्हारी समझ में नहीं आएगी, पर यह तो समझ में आ जानी चाहिए कि अनसिले वस्त्र से तन ढकने का प्रसार यूरोप से भारत की और नहीं हुआ हो सकता, भारत से यूनान की तरफ अवश्य हुआ है और इसमें मिस्र भी लिपट आता है. मैं उलटता नहीं हूँ. इतनी मेहनत से जिसे हज़ारों इतिहासकारों, भाषाशास्त्रियों और अनुसंधान संस्थानों द्वारा उलटा गया,उसे एक अकेले ही सीधा कर देता हूँ तो वे सभी ज़मीन पर आजाते हैं और घबराहट में चीखते हैं उधर मत देखना उधर मत देखना, देखोगे तो नंगा हो जाऊँगा. अपनी आँखों देखता हूँ. तुम भी देखो और अपनी आँखों देखने की आदत डालो.

Post – 2015-10-20

‘ अच्छा यह बताओ कि तुम किसी आदमी को बचाओगे या जानवर को.”
मैंने कहा “दोनों को”.
“यदि दोनों को न बचाया जा सके तो?”
“देखूँगा कौन मेरा है.”
“कोई तुम्हारा ने हो तो?”
“देखूँगा कौन संकट में है.”
“संकट का कारण आदमी हो और संकट में जानवर हो तो?”
“तो कहूँगा उसे छोड़ दो.”
“यदि वह न माने तो?”
“मेरे वश में होगा तो मैं जानवर को संकट से बचाने के लिए जो कुछ करना पड़े करूँगा, नहीं तो वहां से हट जाऊँगा.
“तुम तो पक्के जैन निकले: न हिंसा करूँगा, न करवाऊँगा, न तो उसे होते हुए देख सकूँगा. ‘न करेम, न कारवेम. करन्तम ‘पि न पस्सेम.’
“”तुम जानवर को बचाने के लिए मनुष्य पर बलप्रयोग कर सकते हो?”
“जानवर को बचाने के लिए नहीं, अंतरात्मा को बचाने के लिए.”
“कुछ समझा नहीं.”
“मैं तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ. एक बार लिंकन सूट बूट में सजे अपने क्लब जा रहे थे. रस्ते में एक गीज़र पड़ता था. तुम जानते हो, गीज़र के आसपास दलदल बन जाती है और उसमे कोई फँस गया तो बाहर निकल नहीं सकता. लिंकन ने देखा एक सूअर उसमें फँस गया है और छटपटाता हुआ निकलने की कोशिश में और फंसता जा रहा है. लिंकन ने घोड़े से उतरे पेट के बल फैल गए. सूअर की पूँछ पकड़ कर उसे बहार खींचा और फिर कीचड़ सने कपड़ों में क्लब पहुंचे तो उनकी हालत पर सवाल तो होने ही थे. उन्होंने पूरी घटना का उल्लेख किया तो सुनने वाले हंसने लगे, “आपने एक सूअर की जान बचने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी?”
“लिंकन ने जवाब दिया. सूअर को बचाने के लिए नहीं, अपनी अंतरात्मा को बचने के लिए. यदि मैं उसे उस तरह तड़पता छोड़कर चला आता तो मैं अपने को क्षमा नहीं कर सकता था.” मैं कुछ रुका परन्तु वह स्वयं कहीं खो गया था. मैंने कहा, “और सुनो., लिंकन पोर्क कहते थे.”
आज के माहौल में इस सीधी सी बात को समझना कितना कठिन है कि पशुवध और पशुवध के प्रदर्शन में अंतर है और इस अंतर का ध्यान रखा जाना चाहिए. जीवदया और जीवदया की आड़ में मनुष्य के उत्पीड़न में अंतर है और इस अंतर का सम्मान किया जाना चाहिए.”
10/20/2015 :9.45AM

Post – 2015-10-19

“वह कौन सा वेद है जिसमें गोवध पर मृत्युदंड का विधान है?” समाचार आज ही छपा था, और जिस पत्र में इस आशय का लेख छपा था उसका नाम भी दिया था . मैंने इसे पढ़ा था तो हँसी आई थी अब जब वह पूछ रहा था तो गुस्सा आरहा था. मैंने उसे झिड़का “कोई और विषय नहीं है बात करने को?”
“मैं तो नाम पूछ रहा हूँ और तुम नाराज़ हो रहे हो.”
“पाञ्चजन्य वेद.”
“अभी तक तो मैं चार ही वेदों को जानता था. यह पाँचवाँ वेद कहाँ से ढूँढ लाये, भाई.”
“तुम्हारी जानकारी चार ही वेदों की है तो मैं क्या कर सकता हूँ. तुमने क्या सूक्ष्म वेद का भी नाम नहीं सुना जिसकी जानकारी का दावा कबीर साहब करते थे.”
वह गड़बड़ा गया, “कबीर भले कहें “बेद कत्तेब को गम्म नाहीं’ परन्तु उनके चेलों ने जान लिया कि वेद क़े ज्ञान क़े बिना कोई प्रमाण पुरुष नहीं बन सकता इसलिए सूक्ष्म वेद का आविष्कार कर लिया. ज़रूरत पड़ने पर चार वेद से सोलह वेद बन जाते हैं यह तो तुम जानते ही होगे.”
उसे यह भी पता नहीं था.
“एक मूर्ख राजा था और उसी क़े दरबार में उसी के योग्य एक राज पंडित था. उसका ऐलान था कि जो कोई उसे बहस में हरा देगा वह उसके प्राण ले सकता है, परन्तु यदि हार गया तो उसे प्राणदंड मिलेगा. निर्णायक राजा था. जो भी पंडित आता उससे वह एक ही सवाल करता. ‘वेद कितने हैं?’ तुम्हारी तरह वे भी कहते, ‘चार’. वह कहता, ‘वेद आठ हैं.’ पंडित कहता, ‘यह हो ही नहीं सकता.’ वह, सवाल करता, ‘वेद स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग?’ उत्तर मिलता, ‘पुल्लिंग.’ वह राजा को समझाता, ‘जब चार वेद हैं तो चार वेदनियाँ भी तो हुईं. अब कुल संख्या आठ हुई या नहीं.’ राजा उसे विजेता घोषित कर देता और उस पंडित को फांसी दे दी जाती. राजा को गर्व था कि दूसरे विद्वान सिर्फ चार वेदों की जानकारी रखते है, जब कि उसका दरबारी पंडित आठ वेद जानता है. बात फैली तो आया एक नया पंडित. प्रश्न पूछा गया, ‘वेद कितने हैं.’ उसने कहा, ‘ सोलह’. राजा का माथा ठनका, ‘यह तो उसके पंडित से भी बड़ा पंडित लगता है.’ उसके राजपंडित ने कहा, ‘आठ’. नए पंडित ने पूछा, “कैसे?” उसने चार वेद और चार वेदिनियों का तर्क दुहराया.
नया पंडित राजा की ओर मुडा, ‘महाराज, जब चार वेद और चार वेदनियाँ साथ रहेंगे तो उनके लड़का और लड़की भी तो होंगे. इस तरह सोलह वेद हुए या नहीं. राजा को बात जाँच गई. उसने सोलह वेदों के जानकर तो अपना दरबारी पंडित बना लिया और पुराने पंडित को फाँसी चढ़ा दिया.
“तो जरुरत पड़ने पर लोग जितने वेद चाहें निकाल सकते हैं. पाँचवें वेद की बात तो बहुत पहले से लोग करते आए है. किसी कि लिए नाट्यशास्त्र पाँचवाँ वेद था तो किसी कि लिए कामशास्त्र, किसी तीसरे कि लिए महाभारत. इटली का सबसे पहला पादरी जो मदुरै आया था, नोबिलि, उसने पहले तो ईसाई बने तमिल ब्राह्मणों से संस्कृत सीखी और फिर बाइबिल कि चुने हुए अंशों का संस्कृत में अनुवाद किया और घोषित किया कि वह समुद्र पार से वह पाँचवाँ वेद लेकर आया है जो खो गया था, और इसी पाँचवें वेद का अनुवाद जब वाल्तेयर भी मुर्ख बन गए. और जानते हो इसका भी दोष मक्डोनल ने ब्राह्मणो के ऊपर दाल दिया. तो यदि इतनी बार पाँचवाँ वेद पैदा हो सकता है तो आज की ज़रूरत से पाञ्चजन्य वेद पैदा नहीं किया जा सकता?.” पूरी बात उसकी समझ में आई तो वह छतफाड़ ठहाके भरने लगा, एक दौरे कि बाद एक.

Post – 2015-10-18

“अरे, तुम तो अपनी खोल उतार कर पूरी तरह मोदी के साथ खड़े हो गए. मैंने फेस बुक पर तुम्हारी कबिताई पढ़ी तो दंग रह गया. कुछ दिन पहले तो तुम कह रहे थे साहित्यकार को सत्ता के निकट नहीं जनता के निकट पहुँचना चाहिए. तुम्हारा तो कायाकल्प हो गया.”
वह बोलता रहा और मैं मुस्कराता हुआ सुनता रहा. चुप हुआ तो पूछ, “कुछ और?”
“अब इसके बाद कहने को बचा ही क्या रह जाता है?”
“कहने को न इससे पहले तुम्हारे पास कुछ था, न अब है, न आगे हो सकता है. तुम ट्विटर युग के तोते हो. आदमी की आदतें भूल गए हो. जानते हो आज का साहित्यकार किस से अपनी भाषा सीख रहा है?”
“तुम्हारी मानें तो तोतों से.”
“तोतों से नहीं मक्कारों से. हमारे युग की शासिका भाषा एड्वर्ल्ड की भाषा है जिसमे माल बेचने वाले ऐसी फंतासी तैयार करते हैं जिसे सुनते समय तुम जानते हो यह झूठ है. इसकेलिए उनके लोभ का इस्तेमाल किया जाता है जिनकी कलाबाज़ी के पीछे तुम पागल रहते हो. इसकी स्क्रिप्ट लिखने वाला जानता है कि वह झूठ लिख रहा, परन्तु वह इस बात पर गर्व करता है कि वह अपनी प्रतिभा से सच को झूठ और झूठ को सच बना सकता है.इसे सुर देने वाला गायक जनता है कि वह पैसे के लिए अपनी तड़प उस इबारत में भर रहा है जिसका एक एक शब्द मक्कारी से भरा है, इसके लिए अपनी अदा समर्पित करने वाला जानता है कि वह उनके साथ धोखा कर रहा है जो उसकी एक झलक के लिए जोखिम मोल ले लेते हैं और यह भी जनता है कि वे इस धोखाधड़ी को भांप लेंगे.कहो इनके उत्पादक, प्रायोजक, लेखक, कवि, कलाबाज सभी को यह पता होता है कि इसे बार-बार दुहरा कर अवचेतन में उतार देने के बाद इस धोखे को भाँपने वाले इस धोखाधड़ी से अपने को बचा नहीं सकेंगे. वे एक रूसी की समस्या को इस तरह उछाल सकते हैं कि उसके सामने महामारी भी तुच्छ लगे, ऐसी समस्या कि जिसके सुलझे बिना जीवन ही व्यर्थ हो जाये. भाषा का इतना कमाल कि ज़रूरत पड़ने पर यह भी समझा सकें कि रूसी को बढ़ने दो, रूसी क्रांति रूसी बढ़ने से ही हुई थी. तुम इन लफ़्फ़ाज़, लोभियों को कला और साहित्य या साहित्यकार की चिंता से कातर समझ बैठते हो, तुम उन्हें बुद्धिजीवी मान बैठते हो जो सम्मान बटोरने की कला भी जानते हैं और सम्मान उछालने की भी कला जानते हैं और इस जुनून में सम्मान देनेवाली संस्था तक का सम्मान नष्ट कर देते हैं? तुम नही बुद्धिमान मान लेते हो जो जानते हैं कि यह धोखाधड़ी है पर दर जाते हैं कि वे उन्हें सम्मान का लोभी न मान बैठें और अपने विवेक को त्याग कर कहते हैं चलो भाई हमने भी फ़ेंक दिया. इसका भी जस बटोरलो.”
“मैं सोचता हूँ कि…” उसने कुछ कहने की भूमिका बनाई ही थी कि मैंने उसे दबोच लिया, “सोचना कब से शुरू कर दिया तूने. यह खतरनाक काम है. पहले मानने की आदत छोडो, समझने की कोशिश करो, फिर सोचने भी लगोगे. अभी तो मेरे समझाने के बाद भी तुम तोहमत लगाने की आदत तक नही छोड़ पाये. उस तुकबंदी तक को नही समझ पाये जिसके साथ एक चित्र और इबारत भी दी गई थी.”
“पर कविता तो…”
“पहले उस कविता में उठाये गए सवालों के जवाब तलाशो. जो बात तुम्हें अज्ञात कारणों से गलत और मुझे ज्ञात कारणों से सही लगती है उसे कहने की मुझे आज़ादी दो. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सबसे बड़ा शत्रु कौन है? जो तर्क और प्रमाणों के आधार पर कुछ कहता है वह या वह जो अभियोगों और लांछनों की भाषा से ऎसी उत्तेजना पैदा करता है कि संवाद संभव ही न रह जाय. संवेदनहीन कौन है जो दुखद घटनाओं को लुकाठा बनाकर आग लगाने और ऐसी संस्थाओं को भस्म करने को दौड़ पड़ता है जिनके बनाने में युग लगा जाते हैं या वह जो उन मर्मान्तक घटनाओं पर स्तब्ध रह जाता है?”