Post – 2020-08-12
जो लोग मोदी के केन्द्र में आकर, केन्द्र में या उसके इर्द-गिर्द बने रहने के आदी दलों को हाशिए पर डालने से घबरा कर फासिस्ट आगया, फासिज्म आने वाला है का शोर मचाते आ रहें हैं, उन्हें पता है, फासिज्म किसी व्यक्ति के आने जाने से आता जाता नहीं है, ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं जो उसे अपरिहार्य बना देती हैं, ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं जब जनता यह सोचने लगती है कि कोई शख्त कदम उठाने वाला शासन आना चाहिए। यही कारण है कि अपनी कठोरता के बाद भी फासिस्ट सबसे लोकप्रिय नेता होता। फासिज्म न आए इसकी जिम्मेदारी जिन पर होनी चाहिए, वे ऐसी परिस्थितियाँ लगातार पैदा कर रहे हैं जिनमें फासिज्म एकमात्र रास्ता रह जाता है। विडंबना यह भी है कि ये वही लोग हैं जो तानाशाही के विविध रूपों को पसन्द करते, जनता को मूर्ख समझते है, इसलिए प्रकृति से अभिजनवादी और लोकतंत्र विरोधी होते हैं, विधि-विधान सहित संविधान की अवहेलना करते हैं और जनवादी होने का दावा करते हैं, संविधान की दुहाई भी देते हैं और न अपने को पहचान पाते हैं न अपने समाज और समय को क्योंकि उनकी दुहरी निजता होती है जिसे लैग ने (द डिवाडेड सेल्फ) रीयल सेल्फ और फाल्स सेल्फ का विभाजन कहा है। ये शिज़ोफ्रेनिया के मरीज होते हैं, असाधारण प्रतिभाशाली और आदर्शवादी (बर्ड्स ऑफ पैराडाइज) होते हैं, पर सामाजिक रूप में गैरजिम्मेदार और कम भरोसे के। वे स्वयं अपने, अपने देश और समाज के शत्रु होते हैं।
Post – 2020-08-11
#शब्दवेध(98)
सभ्यता का प्लावन
हमारे सामने एक टेढ़ी समस्या है जिसका ओर-छोर हमें भी दिखाई नहीं देता। यह समस्या अज्ञानजन्य नहीं हैं, ज्ञान के अलग-अलग स्रोतों के बीच तनाव से पैदा हुई है। जिस वास्तविकता से आतंकित हो कर भाषावैज्ञानिक ऊहापोह आरंभ हुआ, वह था रंगभेदी सोच और औपनिवेशिक सरोकारों से किसी न किसी तरह संस्कृत की श्रेष्ठता का नकार। इससे प्रबु्द्ध अंग्रेजों और दूसरे यूरोपीयों में संस्कृत अध्ययन की पैदा हुई रुचि के बाद यातना और उत्पीड़न के माध्यम से प्रचारित की जाने वाली ईसाइयत की तुलना में हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता का और संवेदनशील ईसाइयों के हिंदू मूल्यों से लगाव का नया संकट पैदा हो गया।
पहले संकट को टालने के प्रयत्न में संस्कृत और संस्कृत भाषी ब्राह्मणों को भारत में घुसपैठिया बताते हुए विलियम जोंस ने उसके मूलनिवास की जो खोज शुरू की उसके अंत में उन्होंने घोषित किया की वह बोली तो ईरान में नोआ की एक संतान द्वारा जाती थी, पर अब उसे तलाशा नहीं जा सकता था। यह नई खोज नहीं थी, अपने तीसरे भाषण में ही वह जानते थे कि भारत को छोड़ कर वह भाषा अन्यत्र मिलेगी ही नहीं इसलिए अपने उस महावाक्य में उन्होंने जोड़ दिया था कि शायद वह साझी भाषा बची ही न हो some common source, which, perhaps, no longer exists। भले वह बची न रह गई हो पर उस मरी हुई भाषा और खोए हुए भूगोल से एक नया विज्ञान पैदा हो गया जिसे ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषाविज्ञान की संज्ञा दी गई। यह विज्ञान ऐसा है जो आज तक उसी खोज में लगा हुआ है जिसकी खोज की जरूरत न थी और जब तक आप पश्चिमी दिमाग की काबिलियत पर भरोसा बनाए रहेंगे यह खोज जारी रहेगी। जननी भाषा और ब्राहमणों की जन्मभूमि भले न मिले, जोंस इस नए विज्ञान के जनक अवश्य मान लिए गए – कभी किसी नतीजे पर न पहुँचने वाले विज्ञान के जनक और उसे विज्ञान मानने वाले घामड़ विद्वानों के जनक।
दूसरे संकट के निवारण के लिए जोंस जैसी ही लफ्फाजी के धनी मैक्समूलर मंच पर आए। उन्होंने ठान लिया कि वह हिंदुओं की धार्मिक आस्था के स्रोत वेद की खोज करेंगे और सिद्ध कर देंगे कि ईसाइयत के सामने दूसरे सभी मजहब और धर्म ओछे हैं। उन्होंने वेद को खोज निकाला उसका पाठ तैयार किया, उसे सर्वसुलभ कराया और उसकी असलियत भी बता दी : (1) यह भारत से लेकर यूरोप तक के सभी की आदिम भाषा में रचित है: (2) सभ्यता के शैशव की भाषा है इसलिए उसके कुछ शब्द तो (डेड लेटर ) हैं जाे कभी समझे ही नहीं जा सकते और इसकी कुछ उक्त्तियाँ नितांत बचकानी(चाइल्डिश टु दि इक्स्ट्रीम) हैं। ऋचाएं चरवाहों के उद्गार हैं परंतु उनमें दार्शनिकता भी है जो केवल भारत के चरवाहों में भी हो सकती थी, और इसका नाम श्रुति था इसलिए इसे कंठस्थ किया जाता था जो इस बात का प्रमाण है कि समाज निरक्षर था, पर इसका एक एक अक्षर ईसा से 1000 साल पहले गिना जा चुका था और उसमें कोई अंतर आज तक नहीं आया है, यह है वह स्मरणशक्ति जो केवल भारतीयों में ही हो सकती है। पर वैदिक मूल्य बचकाने हैं, बौद्धधर्म उसकी अगली अवस्था है परन्तु सभी का लक्ष्य उस ऊँचाई तक पहुँचना था जिसे ईसाइयत मूर्त करती है। इससे मैक्समुलर जोंस के दाय के अनुसार ‘तुलनात्मक धर्मशास्त्र’ का जनक बनना चाहते थे। वेद का प्रकाशन, सैक्रेड बुक्स ऑफ दि ईस्ट सीरीज का प्रकाशन इसी योजना का हिस्सा है फिर भी मैक्समुलर ‘तुलनात्मक धर्मशास्त्र’ के जनक न बन सके, क्योंकि शास्त्र अनुभववादी होने के बाद भी तर्क पर आधारित होते हैं, जब कि ईसाइयत सहित सभी मजहब विश्वास पर आधारित हैं। शास्त्र का औजार तर्क है, विश्वास का औजार हिंसा और उत्पीड़न और धोखाधड़ी जिसका भारत में सबसे अधिक प्रयोग किया गया । यह सराहनीय है कि मैक्समूलर ने ईसाइयत को भी तर्कसम्मत या शास्त्रसम्मत बनाना चाहा पर उसके लिए तो ईसाइत का कायाकल्प जरूरी था। जो भी हो, मैक्समूलर तुलनात्मक धर्मशास्त्र के जनक न बन पाए। उन्हें आज भी कुछ लोग भाषाविज्ञानी और कुछ भारतविद के रूप में ही याद करते हैं और यह भूल जाते हैं कि वह संस्कृत साहित्य का इतिहास ब्राह्मणों के धर्म को आदिम सिद्ध करने के लिए कर रहे थे और पुष्पित भाषा के साथ सारा लेखन नकारात्मक है और उसका उल्टा पाठ करके हम सचाई पर पहुँच सकते हैं।
हमें नवोदित पश्चिम की सीमाओं और विवशताओं का पता है, इसलिए ‘हमसे बड़ा न कोय’ की इस खींचतान से कोई शिकायत नहीं। हमारा अपना इतिहास इस चरण से बहुत पहले गुजर चुका है ।
इतिहासकार के रूप में हमारी शिकायत इस बात से है कि इस इकहरीऔर सीमित लक्ष्य की दौड़ में न भाषाओं के साथ न्याय हुआ, न मनुष्य के अंतर्लोक की उस उधेड़बुन को समझने का गंभीर प्रयत्न हुआ जिससे वैज्ञानिक जिज्ञासा के आदिम रूपों को समझा जा सकता था, जो कार्य-कारण की तर्क शृंखला का अनुकरण करता हुआ परमेश्वर/परमेश्वरी तक और देव समाज की कल्पना की गई और जिनसे निकटता कायम करने और लाभान्वित होने के प्रयत्न में धर्म विश्वास और उपासनापद्धतियों का जन्म हुआ।
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ऐसा इकहरापन स्रोतों की विश्वसनीयता और अविश्वसनीयता के मामले में भी देखने में आया जिसमे किसी समस्या को समझने में सहायक सबसे उपयोगी स्रोतों को व्यर्थ कर दिया गया। मिलावट वाचिक प्रसार में होता है परंतु यह याद रखना जरूरी है कि लेखन में उससे अधिक घालमेल किया जाता है। पुरातत्व तो इतिहास को आँखों के सामने पेश कर देता है, पर उसकी जो गति मार्शल और व्हीलर ने की वह उनके किए कराए पर पानी फेर देता है। किसी भी स्रोत अविश्वसनीय मान कर उससे उपलब्ध रोशनी को त्याग कर हम अँधेरापन बढ़ाते हैं।
हम लिखित प्रमाणों पर भरोसा करते हैं तो तो पता चलता है भारत का सुमेरिया से संपर्क 2300 ईसा पूर्व में हुआ हो सकता है, और पौराणिक सूचनाओं की मदद लेते हैं तो पता चलता है कि वहां सभ्यता का सूत्रपात करने वाले ओएनेस (उशनस्) ने किया था जो भारत से गए थे और उनका संपर्क मूल देश से बाद में भी बना रहा था । (देखें, 1 अक्तूबर 2019 की पोस्ट)।
वेद का सतही पाठ करते हैं तो भारोपीय क्षेत्र में भाषा, संस्कृति का प्रसार करने वैदिक साहित्य में प्रमुखता से अंकित नेताओं/राजाओं और ऋषियों को जाता है। जब उसी का गहराई से पाठ करते हैं तो पाते हैं इस प्रभुवर्ग से जुड़ा हुआ और फिर भी उससे हर मामले में तनाव की और टकराव की स्थिति में विद्यमान देवेतर परंपरा से जुड़ा, नौचालन, पशुपालन, खनन, धातुशोधन, तक्षण, आदि विविध उपक्रमों से जुड़ा वर्ग लाभ में अपनी बराबरी का दावा करता है, समुद्र मंथन में अमृत (अमृतं हिरण्यम्) के बँटवारे में अपने उचित हिस्से की माँग करता है, उससे हेराफेरी की जाती है, उसका दमन और उत्पीड़न होता है, वह बदले की कार्रवाई भी करता है जो विश्वरूपा/ त्वष्टा और इन्द्र और सौत्रामणि के प्रायश्चित्त में कथाबद्ध है। देववादियों की तुलना में आंतरिक कलह से खिन्न हो कर देशान्तर में पलायन करने वाले और वहाँ सभ्यता का सूत्रपात करने में अग्रणी भूमिका इनकी है। इसी परिप्रेक्ष्य में हम सुमेरी, मिस्री और यूनानी तथा रोमन ही नहीं फिनो- उग्रियन क्षेत्र में वैदिक संपर्क भाषा के समानान्तर अपनी बोलिेयों, अपने आराध्य देवी-देवताओं और विशेष रूप से कौशलों, उद्यमों और व्यापारिक गतिविधियों के प्रसार का एक नया अध्याय सामने आता है जो अबतक छिपा रह गया था और जिसकी और ध्यान जाने पर लगभग समूचे पुराने जगत में सभ्यता के प्रसार का एक अधिक बड़ा और बहु-आयामी चित्र उभरता है जिसे समझने में पणियों की भूमिका सहायक होती है।
Post – 2020-08-11
Post – 2020-08-10
Post – 2020-08-09
#शब्दवेध(97)
एक अचरज हम अइसा देखा मूरख बाँटे ज्ञान
जब हम यथार्थ को उसके नियम से समझने का प्रयत्न करते हैं, तो हमें ऐसी सचाइयों का सामना करना पड़ता है जो हमें चकित कर देती हैं, कारण हम उससे पहले यह सोच भी नहीं पाते कि ऐसा हो भी सकता है। इस दृष्टि से विज्ञान सबसे बड़ा जादूघर है। म्यूजियम (अपनी विचत्रता से उत्फुल्ल करने वाला संग्रह) में भी यह भाव छिपा है, पर अजायबघर इसे अधिक सही बयान करता है। अज्ञात सत्य से अधिक आश्चर्यजनक कुछ नहीं होता। मैं अपने लेखन में कितने आश्चर्यों से गुजरता हूँ इसकी गिनती नहीं, पर चौंकाने के लिए कुछ नहीं लिखता, यह विश्वास है।
जब हम अपनी जरूरत से अपने नियम गढ़कर सचाई को देखना चाहते हैं तो सच्चाई मरीचिका में बदल जाती है और हम उसे पकड़ने की कोशिश में हम नई जुगत तैयार करते रहते हैं, पर वह और पीछे हटती जाती है। ‘अब हाथ आई, आई, पर नहीं आई’ का खेल कभी खत्म नहीं होता। सिद्धांतों के पहाड़ खड़े हो जाते हैं और वे स्वयं भी समाधान को असंभव ही नहीं बनाते जाते हैं, लौटने का रास्ता भी बंद कर देते हैं।
सत्य की ‘खोज’ करने वाले इस मामूली बात को नहीं समझ पाते किसी दूसरे के नियम से किसी चीज को नहीं समझा जा सकता। पाश्चात्य इतिहास और समाजशास्त्र की सबसे बड़ी सीमा यही रही है। मानविकी के क्षेत्र में उसने अपनी जरूरत से गढ़े गए नियम यथार्थ पर लादने के प्रयत्न किए, इसलिए उसके सहारे सचाई को नहीं समझा जा सकता। उसके नियमों से सर्वोपरि बने रहने की उसकी लालसा को अवश्य समझा जा सकता है।
पाश्चात्य ज्ञानशास्त्र ने समाधान के प्रयास में निरंतर नई समस्याएं पैदा कीं, परंतु किसी भी समस्या का निर्णायक हल नहीं कर सका । अधूरे समाधान, उल्टी प्रस्तुति, और वह भी इस योजनाबद्ध रूप में जिसमें यूरोप के सभी विद्वानों की साझेदारी लगती है, इसलिए, उसी अनुपात में, शोधविधि (मेथडालॉजी) के मामले में उनकी विलक्षणता के बावजूद, उनके निष्कर्षों पर भरोसा नहीं होता।
हमने पहले जिन खाइयों और असंगतियों का उल्लेख किया था, वे उनके उस ‘विवेचन’ से पैदा हुई हैं जिसमें विवेक पर लालसा हावी थी । उनका विवेचन सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर झुठलाने की कोशिश का दूसरा नाम है। टुकड़े टुकड़े में वे सभी बातों को जानते और मानते हैं, परंतु संयोजन की जगह जानबूझकर कुयोजन करते हैं। समझ की कमी से अधिक बड़ा आरोप है नीयत में खोट पाया जाना, परंतु जब तक औपनिवेशिक खुमार में सोचने की जगह ऊँघने और बर्रा देशों के बुद्धिजीवी उनके निर्भर करते हैं तब तक उनको इस खोट के पकड़े जाने की भी चिंता नहीं होती।
वे मानते हैं कि भारोपीय संपर्क में आने से पहले पूरा यूरोप पशुचारण की अवस्था में था। इसलिए उनकी भाषा ऊंचाई पर नहीं पहुंच सकती थी जिसकी पुष्टि ग्रीक, रोमन और संस्कृत में प्रतिबिंबित होती है।
बोगाज़कोई के अभिलेखों से, जिसे इंडो-हित्ताइत (हित्ती) की संज्ञा दी गई, यह भी प्रकट हुआ कि यह भाषा भारतीय आर्यभाषा है, फिर भी इसे बदल कर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया कि यही मूल भाषा का सबसे प्राचीन रूप है और समानता रखने वाली भाषाओं की तरह’भारतीय आर्य-भाषा भी इसी की उपज भारत-ईरानी की उपशाखा है, जब कि हित्ती का ईरानी से कोई संबंध न था, भारतीय से सीधा नाता था। इसके साथ ही उन्हें यह भी पता था कि लघु एशिया में प्रतिष्ठित होने वाले भारतीय आर्य-भाषा भाषी वहां मध्येशिया के अश्वक्षेत्र से, जिसे शिंतास्ता (सिंधियों का उपनिवेश) से पहुंचे थे, इसलिए इंडो-हित्ताइत मूल भाषा का प्राचीनतम रूप नहीं हो सकती। उससे अधिक प्राचीन मध्येशिया की भाषा हुई। यहां वे सभी एक सुर से सच्चाई को उलट कर पेश करते हैं और बताते हैं कि हित्ती भारत आने के रास्ते में मध्येशिया पहुंचे थे और इसलिए मध्येशिया की भाषा जिसका कोई खाका उनके पास नहीं, भारतीय आर्य भाषा का पूर्वरूप हुई, जब कि शिंतास्ता नाम से भी प्रकट है कि मध्येशिया में बसने वाले भारत से वहां पहुंचे थे। इतने उलटफेर में सभी विद्वानों की साझेदारी यदि नीयत की खोट नहीं है तो इसे और कौन सी संज्ञा दी जा सकती है। और नियत में खोट का पता चलने के बाद, जितने भी आडंबर के साथ किसी विषय में दावे किए जायं, आडंबर के अनुपात में ही अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं।
हमारी चुनौती, एक ओर तो, उन्हीं के द्वारा, टुकड़ों-टुकड़ों में पेश की गई सचाई को सँजोने की है, क्योंकि हमारे पास सत्तर साल की आजादी के बाद भी बाहरी जानकारी का अपना कोई स्रोत नहीं है, और दूसरी ओर उनके कोलाज को दरकिनार करके एक सुसंगत चित्र बनाने की है जिसमें सच्चाई स्वयं अपने निखरे रंग में प्रस्तुत हो जाय। पाश्चात्य आधे अध्येताओं ने ज्ञान के स्रोतों को नष्ट करके विशाल मलबा का तैयार किया है और हमारी चुनौती उस मलबे से टुकड़े जुटाते हुए, जहां तक संभव है, उन्हें जोड़कर उनके पूर्व रूप में लाने की है। इन टुकड़ों को जोड़ने के लिए जरूरी सूचना जो गोंद या आसंजक का काम करेगी, उसे हमें अपने प्रयत्न से अब तक उपेक्षित स्रोतों से भी जुटाना होगा जिन तक हमारी पकड़ किसी अन्य से अधिक अच्छी हो सकती है।
इसमें किसी तरह का संदेह नहीं कि मध्येशिया के रास्ते से लघु एशिया पहुंचने वाले जत्थे नौचालन में दक्ष नहीं हो सकते थे। इसलिए हम यह भी नहीं कह सकते कि यूनानी और रोमन क्षेत्रों को सभ्य बनाने में इंडो-हित्ताइत शाखा का ही हाथ था। इसका अधिक श्रेय फिनीशियनों को दिया जाता रहा है, जिनके लिए, अब, हम आश्वस्त होकर ‘पणि’ शब्द का प्रयोग इसलिए कर सकते हैं कि यह सकी भी है और सुविधाजनक भी।
परिवहन की इस खाई को पाटते हुए हम एक नई खाई के सामने पहुँचते हैं। वह यह कि यदि हम ग्रीक स्रोतों पर भरोसा करें तो पणि पर्णक्षेत्र या फिनीशिया में 2500 ई.पू. में पहुँच गए थे। यह तिथि बोगाज़कोई के अभिलेखों से और कुछ रियायत देते हुए क्षेत्र में आर्य वासियों के पहुंचने की तिथि 2000 ख्रिस्ताब्द पूर्व से भी पीछे जाती है, परन्तु क्रीत की मिनोअन (मानव) संस्कृति की काल रेखा को देखते हुए (The Minoan civilization was a Bronze Age Aegean civilization on the island of Crete and other Aegean Islands, flourishing from c. 3000 BC to c. 1450 BC until a late period of decline, finally ending around 1100 BC. It represents the first advanced civilization in Europe, leaving behind massive building complexes, tools, artwork, writing systems, and a massive network of trade.) अतिरंजना को घटाने के बाद अधिक बेमेल नहीं लगती। यदि ऐसा है तो यूनानियों और रोमनों के बीच भारतीय भाषा और सभ्यता का प्रसार देव परंपरा से संबंध रखने वालों से पहले असुर परंपरा के उत्तराधिकारियों ने किया था जिनकी उपासनापद्धति शाक्त थी। इसके कुछ प्रमाण जोंस ने अपने आठवें अभिभाषण में दिया था और इसके पुरातात्विक साक्ष्य हमारी 16 अप्रैल 2019 की पोस्ट में चित्र सहित निम्न उद्धरण के साथ दिया था:
Gregorian Etruscan Museum Vatican City.
This has the most important Etruscan collection in Rome, starting with early Iron Age objects from the 9th century BC.
Encyclopedia Britannica mentions under the headings “Etruria” and “Etruscan” that between the 2nd and 7th centuries BC, northern Italy was known as Etruria.
During archaeological excavations many such “meteoric stones mounted on carved pedestals (Siva Lingas on Bases)” are discovered in Italy.
This Siva Lingam was dug-up from Vatica City itself. Many more must be lying buried in the Vatican’s massive walls and numerous cellars
भूमध्य सागरीय क्षेत्र में नौचालन और इसका ज्ञान लेकर वे सीधे नहीं पहुँच सकते थे। इसका उत्तर इथिओपिया पर उनके अधिकार के रूप में देखा जा सकता है, जिसकी वकालत जोंस ने पुरजोर की है परंतु यहाँ कुछ तथ्य तथ्य उनकी विचार परिधि से छूट गए लगते हैं। इन्हें हम सही क्रम में रखें तो इथिओपिया में प्रवेश के शताब्दयों बाद वहां अपनी धाक जमाने के बाद उनकी पहुँच मिस्री सभ्यता तक हो सकती थी, जिसे पहले नौचालन का अनुभव पहले से इसलिए नहीं रहा हो सकता था कि उसे मूलतः आबाद करने वाले नूबियन सूखे क्षेत्रों से आए थे। स्वेज नहर बनने से युगों पहले लालसागर से एक नहर नील नदी से जोड़ी गई थी। इसके प्रेरक और आरंभिक उपयोक्ता पणि ही रहे हो सकते है. इसके अभाव में पणि अपने जलयानों के साथ भूमध्यसागर क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकते थे। अब इस नए कालबोध के साथ पीछे के सभी अनुक्रम बदल जाते हैं। हमने पहले यह देखा था कि लेखन के प्रयोग और नए सुधार असुरों के द्वारा किए गए और अब हम कहने जा रहे हैं कि भारोपीय क्षेत्र में भाषा और संस्कृति के प्रसार में अग्रणी भूमिका असुरों की थी। क्या यह कड़वी खूराक हजम की जा सकती है? इंतजार फिर भी खत्म न हुआ। कल की फिर कल को देखी जाएगी, घने बादल हैं आसमानों में।
Post – 2020-08-09
#शब्दवेध(97)
एक अचरज हम अइसा देखा मूरख बाँटे ज्ञान
जब हम यथार्थ को उसके नियम से समझने का प्रयत्न करते हैं, तो हमें ऐसी सचाइयों का सामना करना पड़ता है जो हमें चकित कर देती हैं, कारण हम उससे पहले यह सोच भी नहीं पाते कि ऐसा हो भी सकता है। इस दृष्टि से विज्ञान सबसे बड़ा जादूघर है। म्यूजियम (अपनी विचत्रता से उत्फुल्ल करने वाला संग्रह) में भी यह भाव छिपा है, पर अजायबघर इसे अधिक सही बयान करता है। अज्ञात सत्य से अधिक आश्चर्यजनक कुछ नहीं होता। मैं अपने लेखन में कितने आश्चर्यों से गुजरता हूँ इसकी गिनती नहीं, पर चौंकाने के लिए कुछ नहीं लिखता, यह विश्वास है।
जब हम अपनी जरूरत से अपने नियम गढ़कर सचाई को देखना चाहते हैं तो सच्चाई मरीचिका में बदल जाती है और हम उसे पकड़ने की कोशिश में हम नई जुगत तैयार करते रहते हैं, पर वह और पीछे हटती जाती है। ‘अब हाथ आई, आई, पर नहीं आई’ का खेल कभी खत्म नहीं होता। सिद्धांतों के पहाड़ खड़े हो जाते हैं और वे स्वयं भी समाधान को असंभव ही नहीं बनाते जाते हैं, लौटने का रास्ता भी बंद कर देते हैं।
सत्य की ‘खोज’ करने वाले इस मामूली बात को नहीं समझ पाते किसी दूसरे के नियम से किसी चीज को नहीं समझा जा सकता। पाश्चात्य इतिहास और समाजशास्त्र की सबसे बड़ी सीमा यही रही है। मानविकी के क्षेत्र में उसने अपनी जरूरत से गढ़े गए नियम यथार्थ पर लादने के प्रयत्न किए, इसलिए उसके सहारे सचाई को नहीं समझा जा सकता। उसके नियमों से सर्वोपरि बने रहने की उसकी लालसा को अवश्य समझा जा सकता है।
पाश्चात्य ज्ञानशास्त्र ने समाधान के प्रयास में निरंतर नई समस्याएं पैदा कीं, परंतु किसी भी समस्या का निर्णायक हल नहीं कर सका । अधूरे समाधान, उल्टी प्रस्तुति, और वह भी इस योजनाबद्ध रूप में जिसमें यूरोप के सभी विद्वानों की साझेदारी लगती है, इसलिए, उसी अनुपात में, शोधविधि (मेथडालॉजी) के मामले में उनकी विलक्षणता के बावजूद, उनके निष्कर्षों पर भरोसा नहीं होता।
हमने पहले जिन खाइयों और असंगतियों का उल्लेख किया था, वे उनके उस ‘विवेचन’ से पैदा हुई हैं जिसमें विवेक पर लालसा हावी थी । उनका विवेचन सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर झुठलाने की कोशिश का दूसरा नाम है। टुकड़े टुकड़े में वे सभी बातों को जानते और मानते हैं, परंतु संयोजन की जगह जानबूझकर कुयोजन करते हैं। समझ की कमी से अधिक बड़ा आरोप है नीयत में खोट पाया जाना, परंतु जब तक औपनिवेशिक खुमार में सोचने की जगह ऊँघने और बर्रा देशों के बुद्धिजीवी उनके निर्भर करते हैं तब तक उनको इस खोट के पकड़े जाने की भी चिंता नहीं होती।
वे मानते हैं कि भारोपीय संपर्क में आने से पहले पूरा यूरोप पशुचारण की अवस्था में था। इसलिए उनकी भाषा ऊंचाई पर नहीं पहुंच सकती थी जिसकी पुष्टि ग्रीक, रोमन और संस्कृत में प्रतिबिंबित होती है।
बोगाज़कोई के अभिलेखों से, जिसे इंडो-हित्ताइत (हित्ती) की संज्ञा दी गई, यह भी प्रकट हुआ कि यह भाषा भारतीय आर्यभाषा है, फिर भी इसे बदल कर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया कि यही मूल भाषा का सबसे प्राचीन रूप है और समानता रखने वाली भाषाओं की तरह’भारतीय आर्य-भाषा भी इसी की उपज भारत-ईरानी की उपशाखा है, जब कि हित्ती का ईरानी से कोई संबंध न था, भारतीय से सीधा नाता था। इसके साथ ही उन्हें यह भी पता था कि लघु एशिया में प्रतिष्ठित होने वाले भारतीय आर्य-भाषा भाषी वहां मध्येशिया के अश्वक्षेत्र से, जिसे शिंतास्ता (सिंधियों का उपनिवेश) से पहुंचे थे, इसलिए इंडो-हित्ताइत मूल भाषा का प्राचीनतम रूप नहीं हो सकती। उससे अधिक प्राचीन मध्येशिया की भाषा हुई। यहां वे सभी एक सुर से सच्चाई को उलट कर पेश करते हैं और बताते हैं कि हित्ती भारत आने के रास्ते में मध्येशिया पहुंचे थे और इसलिए मध्येशिया की भाषा जिसका कोई खाका उनके पास नहीं, भारतीय आर्य भाषा का पूर्वरूप हुई, जब कि शिंतास्ता नाम से भी प्रकट है कि मध्येशिया में बसने वाले भारत से वहां पहुंचे थे। इतने उलटफेर में सभी विद्वानों की साझेदारी यदि नीयत की खोट नहीं है तो इसे और कौन सी संज्ञा दी जा सकती है। और नियत में खोट का पता चलने के बाद, जितने भी आडंबर के साथ किसी विषय में दावे किए जायं, आडंबर के अनुपात में ही अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं।
हमारी चुनौती, एक ओर तो, उन्हीं के द्वारा, टुकड़ों-टुकड़ों में पेश की गई सचाई को सँजोने की है, क्योंकि हमारे पास सत्तर साल की आजादी के बाद भी बाहरी जानकारी का अपना कोई स्रोत नहीं है, और दूसरी ओर उनके कोलाज को दरकिनार करके एक सुसंगत चित्र बनाने की है जिसमें सच्चाई स्वयं अपने निखरे रंग में प्रस्तुत हो जाय। पाश्चात्य आधे अध्येताओं ने ज्ञान के स्रोतों को नष्ट करके विशाल मलबा का तैयार किया है और हमारी चुनौती उस मलबे से टुकड़े जुटाते हुए, जहां तक संभव है, उन्हें जोड़कर उनके पूर्व रूप में लाने की है। इन टुकड़ों को जोड़ने के लिए जरूरी सूचना जो गोंद या आसंजक का काम करेगी, उसे हमें अपने प्रयत्न से अब तक उपेक्षित स्रोतों से भी जुटाना होगा जिन तक हमारी पकड़ किसी अन्य से अधिक अच्छी हो सकती है।
इसमें किसी तरह का संदेह नहीं कि मध्येशिया के रास्ते से लघु एशिया पहुंचने वाले जत्थे नौचालन में दक्ष नहीं हो सकते थे। इसलिए हम यह भी नहीं कह सकते कि यूनानी और रोमन क्षेत्रों को सभ्य बनाने में इंडो-हित्ताइत शाखा का ही हाथ था। इसका अधिक श्रेय फिनीशियनों को दिया जाता रहा है, जिनके लिए, अब, हम आश्वस्त होकर ‘पणि’ शब्द का प्रयोग इसलिए कर सकते हैं कि यह सकी भी है और सुविधाजनक भी।
परिवहन की इस खाई को पाटते हुए हम एक नई खाई के सामने पहुँचते हैं। वह यह कि यदि हम ग्रीक स्रोतों पर भरोसा करें तो पणि पर्णक्षेत्र या फिनीशिया में 2500 ई.पू. में पहुँच गए थे। यह तिथि बोगाज़कोई के अभिलेखों से और कुछ रियायत देते हुए क्षेत्र में आर्य वासियों के पहुंचने की तिथि 2000 ख्रिस्ताब्द पूर्व से भी पीछे जाती है, परन्तु क्रीत की मिनोअन (मानव) संस्कृति की काल रेखा को देखते हुए (The Minoan civilization was a Bronze Age Aegean civilization on the island of Crete and other Aegean Islands, flourishing from c. 3000 BC to c. 1450 BC until a late period of decline, finally ending around 1100 BC. It represents the first advanced civilization in Europe, leaving behind massive building complexes, tools, artwork, writing systems, and a massive network of trade.) अतिरंजना को घटाने के बाद अधिक बेमेल नहीं लगती। यदि ऐसा है तो यूनानियों और रोमनों के बीच भारतीय भाषा और सभ्यता का प्रसार देव परंपरा से संबंध रखने वालों से पहले असुर परंपरा के उत्तराधिकारियों ने किया था जिनकी उपासनापद्धति शाक्त थी। इसके कुछ प्रमाण जोंस ने अपने आठवें अभिभाषण में दिया था और इसके पुरातात्विक साक्ष्य निम्न लिंक पर देखे जा सकते है यद्यपि इनमें रोम से प्राप्त सभी नमूनों का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता:
https://in.pinterest.com/lindapullis1/roman-phallic-symbols/पर भूमध्य सागरीय क्षेत्र में नौचालन और इसका ज्ञान लेकर वे सीधे नहीं पहुँच सकते थे। इसका उत्तर इथिओपिया पर उनके अधिकार के रूप में देखा जा सकता है, जिसकी वकालत जोंस ने पुरजोर की है परंतु यहाँ कुछ तथ्य तथ्य उनकी विचार परिधि से छूट गए लगते हैं। इन्हें हम सही क्रम में रखें तो इथिओपिया में प्रवेश के शताब्दयों बाद वहां अपनी धाक जमाने के बाद उनकी पहुँच मिस्री सभ्यता तक हो सकती थी, जिसे पहले नौचालन का अनुभव पहले से इसलिए नहीं रहा हो सकता था कि उसे मूलतः आबाद करने वाले नूबियन सूखे क्षेत्रों से आए थे। स्वेज नहर बनने से युगों पहले लालसागर से एक नहर नील नदी से जोड़ी गई थी। इसके प्रेरक और आरंभिक उपयोक्ता पणि ही रहे हो सकते है. इसके अभाव में पणि अपने जलयानों के साथ भूमध्यसागर क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकते थे। अब इस नए कालबोध के साथ पीछे के सभी अनुक्रम बदल जाते हैं। हमने पहले यह देखा था कि लेखन के प्रयोग और नए सुधार असुरों के द्वारा किए गए और अब हम कहने जा रहे हैं कि भारोपीय क्षेत्र में भाषा और संस्कृति के प्रसार में अग्रणी भूमिका असुरों की थी। क्या यह कड़वी खूराक हजम की जा सकती है? इंतजार फिर भी खत्म न हुआ। कल की फिर कल को देखी जाएगी, घने बादल हैं आसमानों में।
Post – 2020-08-09
#शब्दवेध(97)
एक अचरज हम अइसा देखा मूरख बाँटे ज्ञान
जब हम यथार्थ को उसके नियम से समझने का प्रयत्न करते हैं, तो हमें ऐसी सचाइयों का सामना करना पड़ता है जो हमें चकित कर देती हैं, कारण हम उससे पहले यह सोच भी नहीं पाते कि ऐसा हो भी सकता है। इस दृष्टि से विज्ञान सबसे बड़ा जादूघर है। म्यूजियम (अपनी विचत्रता से उत्फुल्ल करने वाला संग्रह) में भी यह भाव छिपा है, पर अजायबघर इसे अधिक सही बयान करता है। अज्ञात सत्य से अधिक आश्चर्यजनक कुछ नहीं होता। मैं अपने लेखन में कितने आश्चर्यों से गुजरता हूँ इसकी गिनती नहीं, पर चौंकाने के लिए कुछ नहीं लिखता, यह विश्वास है।
जब हम अपनी जरूरत से अपने नियम गढ़कर सचाई को देखना चाहते हैं तो सच्चाई मरीचिका में बदल जाती है और हम उसे पकड़ने की कोशिश में हम नई जुगत तैयार करते रहते हैं, पर वह और पीछे हटती जाती है। ‘अब हाथ आई, आई, पर नहीं आई’ का खेल कभी खत्म नहीं होता। सिद्धांतों के पहाड़ खड़े हो जाते हैं और वे स्वयं भी समाधान को असंभव ही नहीं बनाते जाते हैं, लौटने का रास्ता भी बंद कर देते हैं।
सत्य की ‘खोज’ करने वाले इस मामूली बात को नहीं समझ पाते किसी दूसरे के नियम से किसी चीज को नहीं समझा जा सकता। पाश्चात्य इतिहास और समाजशास्त्र की सबसे बड़ी सीमा यही रही है। मानविकी के क्षेत्र में उसने अपनी जरूरत से गढ़े गए नियम यथार्थ पर लादने के प्रयत्न किए, इसलिए उसके सहारे सचाई को नहीं समझा जा सकता। उसके नियमों से सर्वोपरि बने रहने की उसकी लालसा को अवश्य समझा जा सकता है।
पाश्चात्य ज्ञानशास्त्र ने समाधान के प्रयास में निरंतर नई समस्याएं पैदा कीं, परंतु किसी भी समस्या का निर्णायक हल नहीं कर सका । अधूरे समाधान, उल्टी प्रस्तुति, और वह भी इस योजनाबद्ध रूप में जिसमें यूरोप के सभी विद्वानों की साझेदारी लगती है, इसलिए, उसी अनुपात में, शोधविधि (मेथडालॉजी) के मामले में उनकी विलक्षणता के बावजूद, उनके निष्कर्षों पर भरोसा नहीं होता।
हमने पहले जिन खाइयों और असंगतियों का उल्लेख किया था, वे उनके उस ‘विवेचन’ से पैदा हुई हैं जिसमें विवेक पर लालसा हावी थी । उनका विवेचन सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर झुठलाने की कोशिश का दूसरा नाम है। टुकड़े टुकड़े में वे सभी बातों को जानते और मानते हैं, परंतु संयोजन की जगह जानबूझकर कुयोजन करते हैं। समझ की कमी से अधिक बड़ा आरोप है नीयत में खोट पाया जाना, परंतु जब तक औपनिवेशिक खुमार में सोचने की जगह ऊँघने और बर्रा देशों के बुद्धिजीवी उनके निर्भर करते हैं तब तक उनको इस खोट के पकड़े जाने की भी चिंता नहीं होती।
वे मानते हैं कि भारोपीय संपर्क में आने से पहले पूरा यूरोप पशुचारण की अवस्था में था। इसलिए उनकी भाषा ऊंचाई पर नहीं पहुंच सकती थी जिसकी पुष्टि ग्रीक, रोमन और संस्कृत में प्रतिबिंबित होती है।
बोगाज़कोई के अभिलेखों से, जिसे इंडो-हित्ताइत (हित्ती) की संज्ञा दी गई, यह भी प्रकट हुआ कि यह भाषा भारतीय आर्यभाषा है, फिर भी इसे बदल कर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया कि यही मूल भाषा का सबसे प्राचीन रूप है और समानता रखने वाली भाषाओं की तरह’भारतीय आर्य-भाषा भी इसी की उपज भारत-ईरानी की उपशाखा है, जब कि हित्ती का ईरानी से कोई संबंध न था, भारतीय से सीधा नाता था। इसके साथ ही उन्हें यह भी पता था कि लघु एशिया में प्रतिष्ठित होने वाले भारतीय आर्य-भाषा भाषी वहां मध्येशिया के अश्वक्षेत्र से, जिसे शिंतास्ता (सिंधियों का उपनिवेश) से पहुंचे थे, इसलिए इंडो-हित्ताइत मूल भाषा का प्राचीनतम रूप नहीं हो सकती। उससे अधिक प्राचीन मध्येशिया की भाषा हुई। यहां वे सभी एक सुर से सच्चाई को उलट कर पेश करते हैं और बताते हैं कि हित्ती भारत आने के रास्ते में मध्येशिया पहुंचे थे और इसलिए मध्येशिया की भाषा जिसका कोई खाका उनके पास नहीं, भारतीय आर्य भाषा का पूर्वरूप हुई, जब कि शिंतास्ता नाम से भी प्रकट है कि मध्येशिया में बसने वाले भारत से वहां पहुंचे थे। इतने उलटफेर में सभी विद्वानों की साझेदारी यदि नीयत की खोट नहीं है तो इसे और कौन सी संज्ञा दी जा सकती है। और नियत में खोट का पता चलने के बाद, जितने भी आडंबर के साथ किसी विषय में दावे किए जायं, आडंबर के अनुपात में ही अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं।
हमारी चुनौती, एक ओर तो, उन्हीं के द्वारा, टुकड़ों-टुकड़ों में पेश की गई सचाई को सँजोने की है, क्योंकि हमारे पास सत्तर साल की आजादी के बाद भी बाहरी जानकारी का अपना कोई स्रोत नहीं है, और दूसरी ओर उनके कोलाज को दरकिनार करके एक सुसंगत चित्र बनाने की है जिसमें सच्चाई स्वयं अपने निखरे रंग में प्रस्तुत हो जाय। पाश्चात्य आधे अध्येताओं ने ज्ञान के स्रोतों को नष्ट करके विशाल मलबा का तैयार किया है और हमारी चुनौती उस मलबे से टुकड़े जुटाते हुए, जहां तक संभव है, उन्हें जोड़कर उनके पूर्व रूप में लाने की है। इन टुकड़ों को जोड़ने के लिए जरूरी सूचना जो गोंद या आसंजक का काम करेगी, उसे हमें अपने प्रयत्न से अब तक उपेक्षित स्रोतों से भी जुटाना होगा जिन तक हमारी पकड़ किसी अन्य से अधिक अच्छी हो सकती है।
इसमें किसी तरह का संदेह नहीं कि मध्येशिया के रास्ते से लघु एशिया पहुंचने वाले जत्थे नौचालन में दक्ष नहीं हो सकते थे। इसलिए हम यह भी नहीं कह सकते कि यूनानी और रोमन क्षेत्रों को सभ्य बनाने में इंडो-हित्ताइत शाखा का ही हाथ था। इसका अधिक श्रेय फिनीशियनों को दिया जाता रहा है, जिनके लिए, अब, हम आश्वस्त होकर ‘पणि’ शब्द का प्रयोग इसलिए कर सकते हैं कि यह सकी भी है और सुविधाजनक भी।
परिवहन की इस खाई को पाटते हुए हम एक नई खाई के सामने पहुँचते हैं। वह यह कि यदि हम ग्रीक स्रोतों पर भरोसा करें तो पणि पर्णक्षेत्र या फिनीशिया में 2500 ई.पू. में पहुँच गए थे। यह तिथि बोगाज़कोई के अभिलेखों से और कुछ रियायत देते हुए क्षेत्र में आर्य वासियों के पहुंचने की तिथि 2000 ख्रिस्ताब्द पूर्व से भी पीछे जाती है, परन्तु क्रीत की मिनोअन (मानव) संस्कृति की काल रेखा को देखते हुए (The Minoan civilization was a Bronze Age Aegean civilization on the island of Crete and other Aegean Islands, flourishing from c. 3000 BC to c. 1450 BC until a late period of decline, finally ending around 1100 BC. It represents the first advanced civilization in Europe, leaving behind massive building complexes, tools, artwork, writing systems, and a massive network of trade.) अतिरंजना को घटाने के बाद अधिक बेमेल नहीं लगती। यदि ऐसा है तो यूनानियों और रोमनों के बीच भारतीय भाषा और सभ्यता का प्रसार देव परंपरा से संबंध रखने वालों से पहले असुर परंपरा के उत्तराधिकारियों ने किया था जिनकी उपासनापद्धति शाक्त थी। इसके कुछ प्रमाण जोंस ने अपने आठवें अभिभाषण में दिया था और इसके पुरातात्विक साक्ष्य निम्न लिंक पर देखे जा सकते है यद्यपि इनमें रोम से प्राप्त सभी नमूनों का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता:
https://in.pinterest.com/lindapullis1/roman-phallic-symbols/पर भूमध्य सागरीय क्षेत्र में नौचालन और इसका ज्ञान लेकर वे सीधे नहीं पहुँच सकते थे। इसका उत्तर इथिओपिया पर उनके अधिकार के रूप में देखा जा सकता है, जिसकी वकालत जोंस ने पुरजोर की है परंतु यहाँ कुछ तथ्य तथ्य उनकी विचार परिधि से छूट गए लगते हैं। इन्हें हम सही क्रम में रखें तो इथिओपिया में प्रवेश के शताब्दयों बाद वहां अपनी धाक जमाने के बाद उनकी पहुँच मिस्री सभ्यता तक हो सकती थी, जिसे पहले नौचालन का अनुभव पहले से इसलिए नहीं रहा हो सकता था कि उसे मूलतः आबाद करने वाले नूबियन सूखे क्षेत्रों से आए थे। स्वेज नहर बनने से युगों पहले लालसागर से एक नहर नील नदी से जोड़ी गई थी। इसके प्रेरक और आरंभिक उपयोक्ता पणि ही रहे हो सकते है. इसके अभाव में पणि अपने जलयानों के साथ भूमध्यसागर क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकते थे। अब इस नए कालबोध के साथ पीछे के सभी अनुक्रम बदल जाते हैं। हमने पहले यह देखा था कि लेखन के प्रयोग और नए सुधार असुरों के द्वारा किए गए और अब हम कहने जा रहे हैं कि भारोपीय क्षेत्र में भाषा और संस्कृति के प्रसार में अग्रणी भूमिका असुरों की थी। क्या यह कड़वी खूराक हजम की जा सकती है? इंतजार फिर भी खत्म न हुआ। कल की फिर कल को देखी जाएगी, घने बादल हैं आसमानों में।
Post – 2020-08-08
#शब्दवेध(96)
साँप और सीढ़ी का खेल
कभी-कभी अपने पाठकों के धैर्य पर आश्चर्य होता है। पिछले कुछ समय से मैं, एक ही बात को, एक बार निष्कर्ष तक पहुँचा लेने के बाद, फिर दुहराता हूं उसी को, एक नए कोण से देखने और लगभग उसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए। कब से हम फिनीशियन या सामी लिपि से ब्राह्मी की उत्पत्ति की धारणा के विपरीत सिंधु-सरस्वती लिपि से ब्राह्मी और सामी दोनों के निकलने की चर्चा कर रहे हैं। चर्चा लगभग पूरी हो जाती है और फिर शुरू हो जाती है एक दूसरे सिरे से। कारण यह कि हमें एक साथ अपनी स्थापना के भीतर की कुछ ग्रंथियों से भी निपटना होता है, आपके भीतर बद्धमूल धारणा को भी शिथिल करना होता है, और इसके व्यापक संदर्भ को उजागर करने का सम्मोहन भी काम करता है।
मैं अपनी बात को कुछ खोल कर रखूँ तो हिंदी के बौद्धिक समाज की एक बड़ी त्रासदी यह है कि वह अपने समाज तक नहीं पहुंच पा रहा है। वह जिसे गलत समझता है, उसे, भारत का, पहले की तुलना में बहुत बड़ा हिस्सा, सही मानता है और बुद्धिजीवियों को अविश्वसनीय तक नहीं कहता।
त्रासदी यहीं समाप्त नहीं होती बुद्धिजीवी वर्ग स्वयं समूचे बुद्धिजीवी समाज तक नहीं पहुंच पाता। राजनीतिक बंटवारे ने बुद्धिजीवियों को एक दूसरे के लिए असह्य, अगम्य, और अलभ्य मानने की सीमा तक बांट रखा है। मेरा फेसबुक का लेखन शिकायत के कई चरणों से गुजरा है। पहले यह कि इतने गंभीर और लंबे लेख को कौन पढ़ेगा? फेसबुक हल्की-फुल्की चुटकुले बाजी के लिए बना मंच है। यह गंभीर विषय विचार विमर्श का मंच नहीं हो सकता। लोकप्रिय होना है तो लोकधुन पर नाचना भी होगा। मुझे इस मंच का इस्तेमाल इसलिए करना था कि इस पर दर्ज वायरस का शिकार नहीं होता। पर साथ ही यह विचार ङी काम कर रहा था कि पत्रों पत्रिकाओं और संचार के दूसरे माध्यमों के संकट के दौर में गंभीर चिंतन के लिए उपलब्ध इस मंच का सही उपयोग न किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं अपने पाठकों को खुश करने के लिए नहीं लिखता, यह लेखक को चंपी करने वाले की भूमिका में पहुँचा देता है। जो सच मुझे दीखता है वह मेरे लेखन में चीखता है। मैं लेखक की भूमिका जनरंजन नहीं लोकशिक्षण मानता रहा। मेरे अनुभव ने मुझे निराश नहीं किया। आज ऐसे लोगों की संख्या काफी बढ़ी है जो गंभीर विषयों पर मुझ से भी अधिक लंबे और गंभीर, तथ्यपरक, लेख लिखते हैं और पढ़े जाते हैं ।
मेरी एक दूसरी शिकायत बौद्धिक समाज में पारस्परिक संवादहीनता की रही है। यदि आप जिन विचारों को मानते हैं उन्हीं को मानने वालों के बीच संचार कर पाते हैं तो आपकी बौद्धिक भूमिका शून्य हो जाती है। विचार कीर्तन का रूप ले लेता है, जो भक्तिभाव से, भक्त-समुदाय के बीच, पवित्रता का अनुभव करते हुए, बार-बार दुहराया जाता है। इसलिए मेरा आग्रह, समस्त हिंदी लेखन में हस्तक्षेप करते हुए, जो कमियां किसी लेखन में दिखाई दें, उन को इंगित करते हुए टिप्पणी करने का रहा है। हस्तक्षेप तो दूर की बात है, पढ़ने वालों का विभाजन हो चुका है। मैं जिस विषय पर लिख रहा हूं यदि उसे पढ़ने वालों का एक समुदाय यह सोचकर पढ़े कि इससे भारतीय समाज की महिमा प्रकट होती है, भारतीय इतिहास का उज्जवल पक्ष सामने आता है, तो यह सत्यान्वेषण नहीं हुआ।
यह सच है कि मोटे तौर पर मेरा लेखन इस तरह की भ्रांति पैदा कर सकता है, परंतु यह औपनिवेशिक चिंतन के विरोध में किया जाने वाला सत्यान्वेषण है जिसे दबाने के लिए हजार तरह के फरेब योजनाबद्ध रूप में किए गए। ऐसा करना साम्राज्यवादियों की राजनीतिक जरूरत थी। हमारी ऐसी कौन सी राजनीतिक जरूरत है कि हम उस षड्यंत्र को जारी रखना चाहते हैं और उनका खंडन करने वालों को अतीतोन्मुखता या देशानुराग से ग्रस्त मान कर पढ़ना तक पसंद नहीं करते या पढ़ने पर डर जाते हैं कि यह तो अमुक राजनीति के पक्ष में जा सकता है, इसलिए चुप्पी साध जाते हैं: आलोचना या खंडन करना तक पसंद नहीं करते। यह दूसरी बात है कि आलोचना या खंडन के लिए जिस स्तर का अध्ययन और ज्ञान होना चाहिए, उसे अर्जित करने का उन्होंने प्रयास भी नहीं किया, क्योंकि उन्हें सिखाया गया था कि ऐसा अध्ययन भी प्रतिक्रियावादी है या किसी प्रगतिवादी को भी प्रतिक्रियावादी बना सकता है। ये तर्क नए नहीं हैं, उपनिवेशवादियों के हैं। वे इसका प्रयोग अपनी आलोचना करने वालों को निष्प्रभाव करने के लिए किया करते थे और स्वयं नस्लवादी, वर्चस्ववादी दुराग्रहों का तांडव खुलकर किया करते थे। यूरोपीय वर्चस्ववाद और औपनिवेशिक मानसिकता को शिरोधार्य करते हुए हमने अपनी “स्वतंत्रता” पाई थी। भारत स्वतंत्र हो रहा है। वर्षों पहले डोमिनियन स्टेटस सौंपा जा रहा था, जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया था, और जब स्वतंत्र हो रहा था तो कॉमनवेल्थ की सदस्यता स्वीकार करते हुए नेहरू ने चोर दरवाजे से उसे स्वीकार कर लिया था, जबकि जिन्ना में इतनी समझ थी कि उन्होंने उसे ठुकरा दिया था, माउंटबेटन को स्वतंत्र देश का पहला गवर्नर जनरल मानने से इंकार कर दिया था, जिसे नेहरू ने स्वीकार कर लिया था। कौन कह सकता है कि अपनी मर्दबदल आदत के लिए कुख्यात बुढृिया को नेहरू को परोस कर माउंटबेटन ने कुछ हासिल नहीं किया था?
इस राजनीतिक दुर्दशा का चित्रण एक ही कवि ने किया था, पर कुछ विलंब से- महारानी के आगमन पर- आओ रानी हम ढोएँगे पालकी, जय कन्हैया लाल की। पालकी आजतक ढोई जा रही है, परंतु किनके द्वारा? किन राजनीतिक दलों और संगठनों के द्वारा, इसका जवाब उन्हें ढूंढना होगा, जिनको इस बात की शिकायत है उनकी आवाज जनता से टकरा कर वापस आ जाती है। वे जो आरोप लगाते हैं जनता की अमोघ चट्टान से टकरा कर प्रति-ध्वनि के रूप में उन्हें स्वयं सुनाई पड़ती है।
परंतु जो लोग इस अनुसंधान-श्रृंखला के नियमित पाठक हैं, और जिनके न होने का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था, उनमें से सभी की सत्यनिष्ठा पर भी पूरा भरोसा नहीं हो पाता। वे मेरी कुछ टिप्पणियों से, जो वर्णवाद (जिसे ब्राह्मणवाद कहने में संकोच नहीं, क्योंकि समाज का बौद्धिक नेतृत्व उनके हाथ में रहा है) विरोधी होती हैं उनसे वे खिन्न अनुभव करते हैं जिसका पता चल जाता है और जिससे यह भी पता चलता है कि मेरे पाठक होने के बाद भी वे रैशनल नहीं हो पाए हैं, अतः कुछ को लगता होगा कि मैं ब्राह्मणद्वेषी हूँ।
मैं केवल वस्तुनिष्ठ हूँ, वैज्ञानिक बने रहने का प्रयत्न करता हूँ और यह जानने के लिए उत्सुक रहता हूँ कि मैं अपने लेखन में अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह कर पाता हूँ या नहीं। गलती का पता चलने पर, उसे मानने, और अपने मत को बदलने के लिए तैयार रहता हूँ। केवल इस तत्परता को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूँ इसलिए अपने इस दृष्टिकोण को समझाने का जितनी बार, जितने तरीकों से समझाने का प्रयत्न किया है वह भी एक कीर्तिमान ही माना जाएगा। अपने दृष्टिकोण को समझा पाने में विफलता हिंदी समाज के वर्तमान और भविष्य के प्रति दुश्चिंता पैदा करती है। जो भी हो, यह एक कारण है कि मैं पहले से बनी हुई गलत धारणाओं को निर्मूल करने का प्रयत्न करूं; उसे हर पहलू से जांचने परखने का प्रयत्न करूं, जिससे मेरे पाठकों के मन में किसी तरह का संदेह न रह जाय।
दूसरा पहलू यह है हमने बहुत पहले पश्चिम एशिया पर हित्ती (प्रा. खत्तिओ), मित्र (मितन्नी), कश (कस्साइट) जनों द्वारा स्थापित और कई शताब्दी तक चलते रहने वाले शासन का हवाला देते हुए यह दावा किया था यूरोप में तथाकथित भारोपीय भाषा का प्रचार भारतीय उपनिवेशों से हुआ। प्रसार वहां से हुआ इसे सभी आधुनिक भाषाविज्ञानी मानते हैं, वे केवल इस बात पर बहस करते रहे हैं कि वे भारत से वहां नहीं पहुंचे थे बल्कि वहां से भारत आए थे। उन लेखों में हमने दिशा सही कर दी थी, इससे अधिक कुछ करने को था नहीं। पश्चिम एशिया पर इनका अधिकार अश्व व्यापार के क्रम में हुआ था। मध्य एशिया में अश्वपालन के क्षेत्र पर इन्होंने उससे पहले अधिकार किया था और उत्तरी यूरोप की भाषाओं को इसी क्षेत्र का ऋणी होना पड़ा था, इसलिए यूरोप में भारोपीय के प्रचार के दो केंद्र बन जाते हैं, एक मध्य एशिया से जुड़ा हुआ और दूसरा पश्चिम एशिया से जुड़ा।
इसके बाद इस समस्या के जनक सर विलियम जॉन्स के व्याख्यानों पर विचार करते हुए हमने पाया कि रोमन और ग्रीक भाषाओं को प्रभावित करने वाले ही नहीं बल्कि उन्हें सांस्कृतिक रूप में आप्लावित करने वाले भारतीय इथोपिया मे और भूमध्य सागर के पूर्वी तटीय क्षेत्र पर अधिकार करने वाले फिनीशियन थे, जो वैदिक देवी देवताओं को नहीं मानते थे अपितु मातृदेवी के उपासक थे।
यहां आकर हमारी अपनी स्थापनाओं, जो हमारी अपनी स्थापनाएँ भी नहीं है, इनका आधार भी एक दूसरे स्रोत हैं जिन्हें हम सही मानते हैं। अब इस वाद में एक विरोधाभासी स्थिति पैदा होती है, जिसका निराकरण किए बिना हम समस्या का संतोषजनक समाधान नहीं कर सकते। इसके साथ ही साथ एक नया फलक इनके पीछे से उभरता है जो केवल भारोपीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता अपितु सभ्यता के व्यापक प्रसार का रूप ले लेता है जिस पर भी पहले विचार किया गया है परंतु विकृत ढंग से विचार किया गया है इसलिए विचारों के बीच गहरी खाइयाँ बनी रह गई हैं जिनका समाधान सभ्यता-विमर्श की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं।
क्या इन खाइयों को पाटना आज की चरचा में संभव है? Wait! They also work who only stand and wait.
Post – 2020-08-07
#शब्दवेध(95)
फिनीशियन या पणि
वैदिक संदर्भ में पणि शब्द लंबे ऊहापोह का विषय बना रहा है क्योंकि पणियों के विषय में उपलब्ध सूचनाओं में परस्पर विरोध है। एक के लिए इंद्र के उपासक उनकी निधि के दोहन को तत्पर दिखाई देते हैं (
स सत्पतिः शवसा हन्ति वृत्रं अग्ने विप्रो वि पणेर्भर्ति वाजम् ।) दूसरे में वे उनकी कृपा के लिए अनुनय करते मिलते हैं (अथेमस्मभ्यं रन्धय ।। 6.53.7) वे दान में कुछ दें इसकी कामना करते हैं (अदित्सन्तं चिदाघृणे पूषन् दानाय चोदय ।) वे धनी हैं, इंद्र से उनका विरोध है, उनके देवता और उपासना पद्धति भिन्न है (न रेवता पणिना सख्यमिन्द्रोऽसुन्वता सुतपाः सं गृणीते।)
उनके दूसरे रूप का सही परिचय नहीं मिल पाता परंतु इतना स्पष्ट है कि उपासना पद्धति में विरोध के बाद भी वैदिक आर्थिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण घटक थे और समृद्ध होने के साथ ही साथ खासे कंजूस थे और इसी आधार पर राजबली पांडे ने यह सुझाव रखा था कि पणि फिनीशियन थे।
पाश्चात्य लेखकों में भी फिनीशियनों के विषय में तरह तरह की अटकलबाजियां की जाती रही हैं जिनमें उनकी पहचान से अधिक पहचान को छिपाने का प्रयत्न अधिक दिखाई देता है। नई सूचनाएँ पुरानी जानकारी के अधूरेपन को पूरा करके उनका अधिक विश्वसनीय चित्र नहीं प्रस्तुत करतीं अपितु उनको नकारते हुए पहले से अधिक अधूरापन और खालीपन पैदा करती हैं। इसके बाद भी कुछ चीजें अपनी अपरिहार्यता के कारण उनसे भी स्पष्ट हो कर उनके दावे विरोध में खडी होती हैं। वे उन्हें भूमध्यसागरीय परिधि तक सीमित रख कर उन्हें सामी सिद्ध करना चाहते हैं, जब कि उनके विवरणों से ही यह सिद्ध होता है कि:
वे भूमध्यसागरीय क्षेत्र में एक आश्चर्यजनक उपस्थिति थे जिनके पास ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, लेखन कला, ज्योतिष-गणना, नौचालन, स्थल-परिवहन सभी कुछ था और भूमध्यसागर के तटीय क्षेत्रों में जहाँ का समाज पशुचारण से आगे नहीं बढ़ पाया था, इन सभी का प्रसार इनके माध्यम से हुआ।
स्वतःसिद्ध है कि वे एक भिन्न सांस्कृतिक परिवेश से आए थे और इसकी सूचना उन यूनानी स्रोतों में थी जिनको भुलाने का प्रयत्न किया जाता है। उसके अनुसार वे पूर्व के किसी तटीय भूभाग से वहाँ इसलिए 2500 ई.पू. में पहुँचे थे कि उस देश में लगातार भूचाल के झटके आ रहे थे। प्राचीन ग्रीक लेखकों ने उस स्थल को फारस की खाड़ी के दक्षिणी भाग में स्थित माना था। पर वे अपने ही अनुमान के अनुसार फिनीशियनों के उस क्षेत्र मे पहुँचने के लगभग 2000 साल बाद पुरानी कहानियों के आधार परअटकलें लगा रहे थे, इसलिए इसमें कुछ समायोजन संभव है।
यदि सभ्यता के अन्य घटकों के साथ भूगर्भीय उपद्रव को भी इनकी पहचान में निर्णायक मानें तो संयोगवश उसी काल रेखा पर सिंधु सारस्वत क्षेत्र ऐसी ही एक आपदा से गुजरा था जिसका एक अवशेष ढोलावीरा के राजप्रासाद का 14 मीटर चौड़ा प्राचीर था जो फट कर टेढ़ा हो गया था और उसके सहारे के लिए पाँच मीटर मोटी दीवार बनाई गई थी। इसकी पुष्टि के लिए मैंने ढोलावीरा की खुदाई करने वाले आर एस बिष्ट से बात की तो इसकी काल रेखा वही (2500 ई.पू.) निकली जो परिपक्व हड़प्पा से पहले और सारस्वत चरण के अवसान का प्रतीत होता है।
ऋग्वेद की एक ऋचा में लंबे समय तक चलने वाले उपद्रव का बहुत जीवंत चित्रण देखने में आता है –
यः पृथिवीं व्यथमानामदृंहद् यः पर्वतान् प्रकुपिताँ अरम्णात् । यो अन्तरिक्षं विममे वरीयो यो द्यामस्तभ्नात् स जनास इन्द्रः ।। 2.12.2
इससे इस बात का आभास होता है कि यह भूगर्भीय उपद्रव लंबे समय तक चलता रहा था। ऐसे में कोई कोई समुदाय प्राणरक्षा की चिंता से पलायन के लिए बाध्य हुआ हो तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं।
इसका दूसरा पक्ष यह है कि इस काल के आसपास के सुमेरी अभिलेखों में जिन अड्डों से माल लेकर आने वाले जहाजों के हवाले मिलते हैं वे सभी भारतीय या भारतीय व्यापारियों के नियंत्रण में थे। नौवहन के क्षेत्र में भारत का एकाधिकार सा था, इसलिए भी नौवहन में अग्रणी फिनीशियन भारत से ही वहाँ पहुँचे हो सकते थे। जोंस ने इसके न केवल इसके बहुपक्षीय प्रमाण दिये थे कि यूनानी इथियोपिया में अपने उपनिवेश कायम करने वाले भारतीय थे, उन्होंने मिस्र को, मिस्र की संस्कृति को भी बहुत गहराई से प्रभावित किया और भूमध्यसागर के पूर्वी तट को आबाद कर रखा था और दोनों का आपस में गहरा संबंध था (देखें शब्दवेध 84)
आगे बढ़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि यह तय कर लिया जाय कि उनका अपना नाम क्या था। हम पीछे (शब्दवेध 85) में प्रचलित धारणा का उल्लेख करते हुए यूनानियों द्वारा उनके पर्पल रंग के वस्त्रों की माँग के आधार पर दिया गया नाम बताया था, परंतु कुछ ऐसे प्रमाण हैं जिनसे लगता है कि वे अपने को जिस नाम से पुकारते थे उसका, नामों का सत्यानाश करने वाली यूनानी परंपरा के कारण, भ्रष्ट लेखन और उच्चारण करने के कारण उनका नामकरण फिनीशियन पड़ा, न कि रंग के नाम पर:
Robert S. P. Beekes has suggested a pre-Greek origin of the ethnonym The oldest attested form of the word in Greek may be the Mycenaean po-ni-ki-jo, po-ni-ki, possibly borrowed from Ancient Egyptian: fnḫw] (literally “carpenters”, “woodcutters”; likely in reference to the famed Lebanon cedars for which the Phoenicians were well-known), although this derivation is disputed.( Aubet Semmler, María Eugenia (2001). The Phoenicians and the West: Politics, Colonies and Trade. Cambridge University Press. p. 9. ISBN
अब इस नामकरण की पण/ पणि से अभिन्नता स्पष्ट है, यद्यपि इसका संबंध सीधे धन से न जुड़कर काटने गढ़ने के मूल आशय (पण-वण खंडने) से जुड़ता है जो ही उस चरण के अनुरूप है क्योंकि उस दौर में सिक्के के रूप में पण का चलन संभव न था। हाथ के लिए पाणि का प्रयोग तक्षण/दक्षता प्रकट करने के इसी से जुड़ा है।
यहाँ इस तथ्य पर भी ध्यान जाता है कि तक्षण में भृगुओं की विशेषज्ञता थी (ब्रह्माकर्म भृगवो न रथम्), व्यापारिक गतिविधियों में उनकी संलिप्तता थी ( येना यतिभ्यो भृगवे धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ ।। 8.3.9) इसके कारण ही सुदास के विरुद्ध वे लामबंद होने वाले प्रतिस्पर्धियों मे वे भी शामिल थे और उनके नाम से जुड़ा भृगुकक्ष समुद्री व्यापार का प्रमुख बंदरगाह था। इसके अतिरिक्त उससे निकट समुद्र में डूबे एक नगर का प्रमाण मिला है, जो उसी भूगर्भीय उपद्रव का परिणाम रहा लगता है। द्वारका भी इसी उपद्रव में जलमग्न हुआ हो सकता है।