कल की पोस्ट में सर्व और विश्व जिनका भी अर्थ एक ही है, विचार करने से रह गए। सर्व का सर = जल, जलाशय से नाता स्पष्ट है। विश्व का मूल विष है । विष् =जल, >प्रवाह > फैलाव>अनन्त, समस्त > विषुव, विषूवृत या विषुवत रेखा । अग्नि की दिशा में इसका विकास विष्णु का जनक है यह हम देख आए हैं।
अंग्रेजी के सगोत शब्द जो सूझ गया वह लिख दिया। इनको जांच परख के बाद नहीं लिखता। उसका समय नहीं रहता इसलिए उन्हें या उन जैसे दूसरे, मुझसे छूटे दूसरे पर्यायों को जांचने की जरूरत है।
Post – 2018-04-10
महिमापरक/ विपुलतासूचक शब्द
अब हम ऐसे शब्दों को विचार करेंगे जिनका संबंध महिमा समग्रता और सहयोग पर सहयोग से संबंधित हैः
अरं/ अलं
अर = जल; अर्क- सार, रस, सूर्य, अर्घ = अर्चना का जल, अर्चन- जल देना, अर्चि – किरण – अर्ण = ज्वार; अर्णव =समुद्र, अरंकरण = सज्जित करना, अलंकरण , अलं – हद, बहुत , allegater- जलचर, ale- पेय , all -समस्त।
सम सं – जल, समसना -आर्द्र पदार्थ का प्रवेश करना, समास, समस्त- सारा, समग्र , समाहित/ सम्मिलित, समेटना =एकत्र करना, समय – सीमा, हद।
चह – जल, चहबच्चा- पानी की हौज, चाह, सह – *जल, > बल स्पृधो बाधस्व सहसा सहस्वान्, ऐ बली अग्नि अपने बल से शत्रुओं को रोको) (, .> सहसा (क्रिया विशे.)= बलपूर्वक (यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान् – जिसने अनपे बूते धरती के छोर को टांग रखा है,’ साहस = *असाधारण शक्ति, अपराध, सह – दमन कर – अग्ने सहस्व पृतना अभिमातीरपास्य, ‘अग्निदेव घमंडी शत्रुओं का दमन करके दूर भगाओ. ( सहस्वान- , सहीयस – आत ईं राज्ञे न सहीयसे सचा। ), सहसा – बलात, हठात, एकाएक; सहना – दमन करना (ये सहांसि सहसा सहन्ते – जो शातिशाली शत्रुओं का अपनी शक्ति से दमन करते हैं; हिं. सहना- दमन/अन्याय/कष्ट झेलना; साथ, संह = साथ, संहति – जमाव, ढेर; सहस्तम – बहुत अधिक (भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता ।) सहस्र – बहुत अधिक (अतः सहस्रनिर्णिजा रथेना यातमश्विना – अपने बहुत सारे रथों के साथ), सहस्र (त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम्) >*हजस्र – हजार।
पु (प, प्, पी, पू =जल )> पुरु = कई (त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे ।), पुरु – बहुत अधिक (पुरूवसुं पुरु प्रशस्तं ऊतये), पुरू = बहुत बड़ा (पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम् ) पूरू = वंश नाम, बहुत बड़े, पुर = बदल, जत्था, बड़ी बस्ती, पूर्ण – पूरा, अधिकतम, full, प्रु/प्लु – जल, बहना, पृत/प्लुत बहुत अधिक (जैसे ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत), plenty, तमिल – पल = बहुत, हिं. पल्ली- छोटी बस्ती ।
प्र /प्ल – जल, ( अधिकता, अग्रता, श्रेष्ठता और उच्चता मत;क उपसर्ग प्र/ प्रा/पर् ) प्रवण = ढलान (सिन्धूँरिव प्रवण आशुया यतो), प्रणय = आगे ले जाना, प्रतर – अच्छे से अच्छा (इन्द्र प्र णः पुरएतेव पश्य प्र नो नय प्रतरं वस्यो अच्छ), प्रतम/प्रथम – पहला, अग्रणी, *प्लु/ प्रवण/प्लवन -flow, प्लव – float, प्लावन – बाढ़, प्लवन – तैरना,
पू /फू (full)/ बू (boost)/भू <>बहु – (तु. पुर-भूरि)
बाढ़ – प्लावन, शक्तिशाली, बहुत अच्छा, प्रचुर
विपुल – प्रचुर
अत/इत = यहाँ, अतः – यहाँ से आगे; अतर – इत्र; अति – बीता (अतीत ) अति = हद, अंत
/अधि,- रजस्वला, ऊपर, अपने वश में, अधिकार- नियंत्रण, अधिक
मघ/ मह, – जल, मघवा = जल दाता इंद्र, माघ – सबसे अधिक ठंडा मास, इंद्र को मघवा के अतिरिक्त महान/महाँ -जल से भरपूर या मघवा (ययाथेन्द्र महा मनसा सोमपेयम्; त्वं महाँइन्द्र ) लगता है, दे. मेघ/ मेह, मिह सेचने . महान – बहुत बड़ा।
अपार – जिसको पार न किया जा सके. पार का प्रयोग जलराशि के प्रसार के लिए होता है. अपार – जिसके फैलाव या परिमाण या समृद्धि का अंत न हो।
Post – 2018-04-10
महिमापरक/ विपुलतासूचक शब्द
अब हम ऐसे शब्दों को विचार करेंगे जिनका संबंध महिमा समग्रता और सहयोग पर सहयोग से संबंधित हैः
अरं/ अलं
अर = जल; अर्क- सार, रस, सूर्य, अर्घ = अर्चना का जल, अर्चन- जल देना, अर्चि – किरण – अर्ण = ज्वार; अर्णव =समुद्र, अरंकरण = सज्जित करना, अलंकरण , अलं – हद, बहुत , allegater- जलचर, ale- पेय , all -समस्त।
सम सं – जल, समसना -आर्द्र पदार्थ का प्रवेश करना, समास, समस्त- सारा, समग्र , समाहित/ सम्मिलित, समेटना =एकत्र करना, समय – सीमा, हद।
चह – जल, चहबच्चा- पानी की हौज, चाह, सह – *जल, > बल स्पृधो बाधस्व सहसा सहस्वान्, ऐ बली अग्नि अपने बल से शत्रुओं को रोको) (, .> सहसा (क्रिया विशे.)= बलपूर्वक (यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान् – जिसने अनपे बूते धरती के छोर को टांग रखा है,’ साहस = *असाधारण शक्ति, अपराध, सह – दमन कर – अग्ने सहस्व पृतना अभिमातीरपास्य, ‘अग्निदेव घमंडी शत्रुओं का दमन करके दूर भगाओ. ( सहस्वान- , सहीयस – आत ईं राज्ञे न सहीयसे सचा। ), सहसा – बलात, हठात, एकाएक; सहना – दमन करना (ये सहांसि सहसा सहन्ते – जो शातिशाली शत्रुओं का अपनी शक्ति से दमन करते हैं; हिं. सहना- दमन/अन्याय/कष्ट झेलना; साथ, संह = साथ, संहति – जमाव, ढेर; सहस्तम – बहुत अधिक (भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता ।) सहस्र – बहुत अधिक (अतः सहस्रनिर्णिजा रथेना यातमश्विना – अपने बहुत सारे रथों के साथ), सहस्र (त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम्) >*हजस्र – हजार।
पु (प, प्, पी, पू =जल )> पुरु = कई (त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे ।), पुरु – बहुत अधिक (पुरूवसुं पुरु प्रशस्तं ऊतये), पुरू = बहुत बड़ा (पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम् ) पूरू = वंश नाम, बहुत बड़े, पुर = बदल, जत्था, बड़ी बस्ती, पूर्ण – पूरा, अधिकतम, full, प्रु/प्लु – जल, बहना, पृत/प्लुत बहुत अधिक (जैसे ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत), plenty, तमिल – पल = बहुत, हिं. पल्ली- छोटी बस्ती ।
प्र /प्ल – जल, ( अधिकता, अग्रता, श्रेष्ठता और उच्चता मत;क उपसर्ग प्र/ प्रा/पर् ) प्रवण = ढलान (सिन्धूँरिव प्रवण आशुया यतो), प्रणय = आगे ले जाना, प्रतर – अच्छे से अच्छा (इन्द्र प्र णः पुरएतेव पश्य प्र नो नय प्रतरं वस्यो अच्छ), प्रतम/प्रथम – पहला, अग्रणी, *प्लु/ प्रवण/प्लवन -flow, प्लव – float, प्लावन – बाढ़, प्लवन – तैरना,
पू /फू (full)/ बू (boost)/भू <>बहु – (तु. पुर-भूरि)
बाढ़ – प्लावन, शक्तिशाली, बहुत अच्छा, प्रचुर
विपुल – प्रचुर
अत/इत = यहाँ, अतः – यहाँ से आगे; अतर – इत्र; अति – बीता (अतीत ) अति = हद, अंत
/अधि,- रजस्वला, ऊपर, अपने वश में, अधिकार- नियंत्रण, अधिक
मघ/ मह, – जल, मघवा = जल दाता इंद्र, माघ – सबसे अधिक ठंडा मास, इंद्र को मघवा के अतिरिक्त महान/महाँ -जल से भरपूर या मघवा (ययाथेन्द्र महा मनसा सोमपेयम्; त्वं महाँइन्द्र ) लगता है, दे. मेघ/ मेह, मिह सेचने . महान – बहुत बड़ा।
अपार – जिसको पार न किया जा सके. पार का प्रयोग जलराशि के प्रसार के लिए होता है. अपार – जिसके फैलाव या परिमाण या समृद्धि का अंत न हो।
Post – 2018-04-10
महिमापरक/ विपुलतासूचक शब्द
अब हम ऐसे शब्दों को विचार करेंगे जिनका संबंध महिमा समग्रता और सहयोग पर सहयोग से संबंधित हैः
अरं/ अलं
अर = जल; अर्क- सार, रस, सूर्य, अर्घ = अर्चना का जल, अर्चन- जल देना, अर्चि – किरण – अर्ण = ज्वार; अर्णव =समुद्र, अरंकरण = सज्जित करना, अलंकरण , अलं – हद, बहुत , allegater- जलचर, ale- पेय , all -समस्त।
सम सं – जल, समसना -आर्द्र पदार्थ का प्रवेश करना, समास, समस्त- सारा, समग्र , समाहित/ सम्मिलित, समेटना =एकत्र करना, समय – सीमा, हद।
चह – जल, चहबच्चा- पानी की हौज, चाह, सह – *जल, > बल स्पृधो बाधस्व सहसा सहस्वान्, ऐ बली अग्नि अपने बल से शत्रुओं को रोको) (, .> सहसा (क्रिया विशे.)= बलपूर्वक (यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान् – जिसने अनपे बूते धरती के छोर को टांग रखा है,’ साहस = *असाधारण शक्ति, अपराध, सह – दमन कर – अग्ने सहस्व पृतना अभिमातीरपास्य, ‘अग्निदेव घमंडी शत्रुओं का दमन करके दूर भगाओ. ( सहस्वान- , सहीयस – आत ईं राज्ञे न सहीयसे सचा। ), सहसा – बलात, हठात, एकाएक; सहना – दमन करना (ये सहांसि सहसा सहन्ते – जो शातिशाली शत्रुओं का अपनी शक्ति से दमन करते हैं; हिं. सहना- दमन/अन्याय/कष्ट झेलना; साथ, संह = साथ, संहति – जमाव, ढेर; सहस्तम – बहुत अधिक (भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता ।) सहस्र – बहुत अधिक (अतः सहस्रनिर्णिजा रथेना यातमश्विना – अपने बहुत सारे रथों के साथ), सहस्र (त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम्) >*हजस्र – हजार।
पु (प, प्, पी, पू =जल )> पुरु = कई (त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे ।), पुरु – बहुत अधिक (पुरूवसुं पुरु प्रशस्तं ऊतये), पुरू = बहुत बड़ा (पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम् ) पूरू = वंश नाम, बहुत बड़े, पुर = बदल, जत्था, बड़ी बस्ती, पूर्ण – पूरा, अधिकतम, full, प्रु/प्लु – जल, बहना, पृत/प्लुत बहुत अधिक (जैसे ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत), plenty, तमिल – पल = बहुत, हिं. पल्ली- छोटी बस्ती ।
प्र /प्ल – जल, ( अधिकता, अग्रता, श्रेष्ठता और उच्चता मत;क उपसर्ग प्र/ प्रा/पर् ) प्रवण = ढलान (सिन्धूँरिव प्रवण आशुया यतो), प्रणय = आगे ले जाना, प्रतर – अच्छे से अच्छा (इन्द्र प्र णः पुरएतेव पश्य प्र नो नय प्रतरं वस्यो अच्छ), प्रतम/प्रथम – पहला, अग्रणी, *प्लु/ प्रवण/प्लवन -flow, प्लव – float, प्लावन – बाढ़, प्लवन – तैरना,
पू /फू (full)/ बू (boost)/भू <>बहु – (तु. पुर-भूरि)
बाढ़ – प्लावन, शक्तिशाली, बहुत अच्छा, प्रचुर
विपुल – प्रचुर
अत/इत = यहाँ, अतः – यहाँ से आगे; अतर – इत्र; अति – बीता (अतीत ) अति = हद, अंत
/अधि,- रजस्वला, ऊपर, अपने वश में, अधिकार- नियंत्रण, अधिक
मघ/ मह, – जल, मघवा = जल दाता इंद्र, माघ – सबसे अधिक ठंडा मास, इंद्र को मघवा के अतिरिक्त महान/महाँ -जल से भरपूर या मघवा (ययाथेन्द्र महा मनसा सोमपेयम्; त्वं महाँइन्द्र ) लगता है, दे. मेघ/ मेह, मिह सेचने . महान – बहुत बड़ा।
अपार – जिसको पार न किया जा सके. पार का प्रयोग जलराशि के प्रसार के लिए होता है. अपार – जिसके फैलाव या परिमाण या समृद्धि का अंत न हो।
Post – 2018-04-09
लघुता सूचक शब्द – २
रेणु
(इस चर्चा में यह बात दृष्टि से ओझल नहीं होनी चाहिए कि हम जल के नाद से भाषा की उत्पत्ति को दावे की पुष्टि में अपने प्रमाणों का, जहां जरूरी है वहां उनकी जांच करते हुए, संकलन कर रहे हैं। अत: ध्यान इस पर रहना चाहिए कि पानी से उसको व्युत्पादित करते हुए जो कुछ लिखा है वह पर्याप्त है या नहीं।)
हम पाते हैं बालू और मिट्टी के लिए प्रयुक्त शब्दों का मूल अर्थ जल है । यपरिस्थितिजन्य प्रमाण इस अनुमान का आधार हो सकता है, कि रेणु का, जो त्रसरेणु में भी आया है, पानी के आशय में कभी प्रयोग होता था पर इसका सीधा प्रमाण नहीं है। रे/रै/रयि का अर्थ अवश्य जल, धन, प्रकाश आदि है। रण का प्राचीन अर्थ जल रहा लगता है जिससे रण्य, और अरण्य=जंगल, रेगिस्तान, निकले हैं और संभव है अं. rain का भी इससे संबंध हो। सरस्वती की बाढ़ से तंग कवि कहता है ऐसा न हो हमें तुम्हारे क्षेत्र को छोड़ कर अरणय क्षेत्रों में जामा पड़े – मा त्वत् क्षेत्रात् अरण्यानि गन्म। रै से रेणु और रण्य दोनों निकले हों तो इसे सीधा संबंध माना जा सकता है ।
पुद्गल – में पुत/ पुद/बुद (जैसे अर्बुद् में) अर्थ जल है। पुत से पोतना, पुताड़ा आदि का संबन्ध है। हिं. में पुद केवल पुदीना में दिखाई देता है, तमिल मे पुदिय – नया में। pudding का इससे दूर का नाता हो सकता है जैसे सं. सूप, सूपकार का अं soup, supper और त. शाप्पाडु के बीच। हमारे लिए इतना पर्याप्त है कि पुद्गल का उदगम जलसूचक है।
अंश – अंश का प्रयोग भाग सूचक प्रयोजन के अतिरिक्त, दिन के लिए होता है और अंशु का किरण और आभा के लिए, इसलिए इसका प्राथमिक आशय जलपरक मानना होगा। अंशुक इसी तर्क से मुलायम वस्त्र, रेशम, के लिए और अंसल मुलायम के लिए (शतपथ )। यदि अश्रु अंसु/ आंसू का संस्कृतीकरण हो तो, इसका संबंध उस विस्मृत अर्थ से जुड़ जाएगा।
खंड – कन्, खन्, कांड, खंड/खांड़/ खंड़सारी का जल और रस से व्युत्पादन संभव है, पर इसकी व्युत्पत्ति की अन्य संभावना फिर भी बनी रहती है।
भाग – भग, सूर्य, पक् , भक् की उत्पत्ति किसी भांड के टूटने या लौ के धधक कर बुझने से उत्पन्न निर्वात को भरने के लिए वायु के दबाव से भी पैदा हो सकती है, पर पाक, पाकशंस, फा. पाक, पाकीजा आदि में जो पवित्रता है उसका जल से संबंध स्पष्ट है और उसी कारण यह भग = सूर्य, पकाना, पक्व, आदि के लिए प्रयोग में आ सकता है।
क्षुद्र – क्षुत्, क्षुध, पानी के छलकने से उपन्न धवनि से व्युत्पन्न प्रतीत होता है। सं. क्षुल्ल= छोटा, थोड़ा, अल्प; क्षुल्लक = छोटा, नीच, क्षुद्र। ऋग्वेद में क्षुमन्त का प्रयोग आहार और उपभोग के लिए आया है :
क्षुमन्तं वाजं स्वपत्यं रयिं दा: । ऋ.२.४.८
कृधि क्षुमन्तं जरितारं अग्ने, २.९.५
क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं संगृभाय, ८.८१.१
क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणम् मक्षू गोमन्तं ईमहे। ८.८८.२
स नो क्षुमन्तं सदने वि ऊर्णुहि गोअर्णसं रयिं इन्द्र श्रवाय्यम् । १०. ३८.२
भोजन और पान की प्राथमिक संपल्पनाओं में अभेद रहा है इसीलिए बंगाली आज भी जल खाता है और संस्कृतज्ञ रस की चर्वणा करता है।
Post – 2018-04-09
लघुता सूचक शब्द – २
रेणु
(इस चर्चा में यह बात दृष्टि से ओझल नहीं होनी चाहिए कि हम जल के नाद से भाषा की उत्पत्ति को दावे की पुष्टि में अपने प्रमाणों का, जहां जरूरी है वहां उनकी जांच करते हुए, संकलन कर रहे हैं। अत: ध्यान इस पर रहना चाहिए कि पानी से उसको व्युत्पादित करते हुए जो कुछ लिखा है वह पर्याप्त है या नहीं।)
हम पाते हैं बालू और मिट्टी के लिए प्रयुक्त शब्दों का मूल अर्थ जल है । यपरिस्थितिजन्य प्रमाण इस अनुमान का आधार हो सकता है, कि रेणु का, जो त्रसरेणु में भी आया है, पानी के आशय में कभी प्रयोग होता था पर इसका सीधा प्रमाण नहीं है। रे/रै/रयि का अर्थ अवश्य जल, धन, प्रकाश आदि है। रण का प्राचीन अर्थ जल रहा लगता है जिससे रण्य, और अरण्य=जंगल, रेगिस्तान, निकले हैं और संभव है अं. rain का भी इससे संबंध हो। सरस्वती की बाढ़ से तंग कवि कहता है ऐसा न हो हमें तुम्हारे क्षेत्र को छोड़ कर अरणय क्षेत्रों में जामा पड़े – मा त्वत् क्षेत्रात् अरण्यानि गन्म। रै से रेणु और रण्य दोनों निकले हों तो इसे सीधा संबंध माना जा सकता है ।
पुद्गल – में पुत/ पुद/बुद (जैसे अर्बुद् में) अर्थ जल है। पुत से पोतना, पुताड़ा आदि का संबन्ध है। हिं. में पुद केवल पुदीना में दिखाई देता है, तमिल मे पुदिय – नया में। pudding का इससे दूर का नाता हो सकता है जैसे सं. सूप, सूपकार का अं soup, supper और त. शाप्पाडु के बीच। हमारे लिए इतना पर्याप्त है कि पुद्गल का उदगम जलसूचक है।
अंश – अंश का प्रयोग भाग सूचक प्रयोजन के अतिरिक्त, दिन के लिए होता है और अंशु का किरण और आभा के लिए, इसलिए इसका प्राथमिक आशय जलपरक मानना होगा। अंशुक इसी तर्क से मुलायम वस्त्र, रेशम, के लिए और अंसल मुलायम के लिए (शतपथ )। यदि अश्रु अंसु/ आंसू का संस्कृतीकरण हो तो, इसका संबंध उस विस्मृत अर्थ से जुड़ जाएगा।
खंड – कन्, खन्, कांड, खंड/खांड़/ खंड़सारी का जल और रस से व्युत्पादन संभव है, पर इसकी व्युत्पत्ति की अन्य संभावना फिर भी बनी रहती है।
भाग – भग, सूर्य, पक् , भक् की उत्पत्ति किसी भांड के टूटने या लौ के धधक कर बुझने से उत्पन्न निर्वात को भरने के लिए वायु के दबाव से भी पैदा हो सकती है, पर पाक, पाकशंस, फा. पाक, पाकीजा आदि में जो पवित्रता है उसका जल से संबंध स्पष्ट है और उसी कारण यह भग = सूर्य, पकाना, पक्व, आदि के लिए प्रयोग में आ सकता है।
क्षुद्र – क्षुत्, क्षुध, पानी के छलकने से उपन्न धवनि से व्युत्पन्न प्रतीत होता है। सं. क्षुल्ल= छोटा, थोड़ा, अल्प; क्षुल्लक = छोटा, नीच, क्षुद्र। ऋग्वेद में क्षुमन्त का प्रयोग आहार और उपभोग के लिए आया है :
क्षुमन्तं वाजं स्वपत्यं रयिं दा: । ऋ.२.४.८
कृधि क्षुमन्तं जरितारं अग्ने, २.९.५
क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं संगृभाय, ८.८१.१
क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणम् मक्षू गोमन्तं ईमहे। ८.८८.२
स नो क्षुमन्तं सदने वि ऊर्णुहि गोअर्णसं रयिं इन्द्र श्रवाय्यम् । १०. ३८.२
भोजन और पान की प्राथमिक संपल्पनाओं में अभेद रहा है इसीलिए बंगाली आज भी जल खाता है और संस्कृतज्ञ रस की चर्वणा करता है।
Post – 2018-04-09
लघुता सूचक शब्द – २
रेणु
(इस चर्चा में यह बात दृष्टि से ओझल नहीं होनी चाहिए कि हम जल के नाद से भाषा की उत्पत्ति को दावे की पुष्टि में अपने प्रमाणों का, जहां जरूरी है वहां उनकी जांच करते हुए, संकलन कर रहे हैं। अत: ध्यान इस पर रहना चाहिए कि पानी से उसको व्युत्पादित करते हुए जो कुछ लिखा है वह पर्याप्त है या नहीं।)
हम पाते हैं बालू और मिट्टी के लिए प्रयुक्त शब्दों का मूल अर्थ जल है । यपरिस्थितिजन्य प्रमाण इस अनुमान का आधार हो सकता है, कि रेणु का, जो त्रसरेणु में भी आया है, पानी के आशय में कभी प्रयोग होता था पर इसका सीधा प्रमाण नहीं है। रे/रै/रयि का अर्थ अवश्य जल, धन, प्रकाश आदि है। रण का प्राचीन अर्थ जल रहा लगता है जिससे रण्य, और अरण्य=जंगल, रेगिस्तान, निकले हैं और संभव है अं. rain का भी इससे संबंध हो। सरस्वती की बाढ़ से तंग कवि कहता है ऐसा न हो हमें तुम्हारे क्षेत्र को छोड़ कर अरणय क्षेत्रों में जामा पड़े – मा त्वत् क्षेत्रात् अरण्यानि गन्म। रै से रेणु और रण्य दोनों निकले हों तो इसे सीधा संबंध माना जा सकता है ।
पुद्गल – में पुत/ पुद/बुद (जैसे अर्बुद् में) अर्थ जल है। पुत से पोतना, पुताड़ा आदि का संबन्ध है। हिं. में पुद केवल पुदीना में दिखाई देता है, तमिल मे पुदिय – नया में। pudding का इससे दूर का नाता हो सकता है जैसे सं. सूप, सूपकार का अं soup, supper और त. शाप्पाडु के बीच। हमारे लिए इतना पर्याप्त है कि पुद्गल का उदगम जलसूचक है।
अंश – अंश का प्रयोग भाग सूचक प्रयोजन के अतिरिक्त, दिन के लिए होता है और अंशु का किरण और आभा के लिए, इसलिए इसका प्राथमिक आशय जलपरक मानना होगा। अंशुक इसी तर्क से मुलायम वस्त्र, रेशम, के लिए और अंसल मुलायम के लिए (शतपथ )। यदि अश्रु अंसु/ आंसू का संस्कृतीकरण हो तो, इसका संबंध उस विस्मृत अर्थ से जुड़ जाएगा।
खंड – कन्, खन्, कांड, खंड/खांड़/ खंड़सारी का जल और रस से व्युत्पादन संभव है, पर इसकी व्युत्पत्ति की अन्य संभावना फिर भी बनी रहती है।
भाग – भग, सूर्य, पक् , भक् की उत्पत्ति किसी भांड के टूटने या लौ के धधक कर बुझने से उत्पन्न निर्वात को भरने के लिए वायु के दबाव से भी पैदा हो सकती है, पर पाक, पाकशंस, फा. पाक, पाकीजा आदि में जो पवित्रता है उसका जल से संबंध स्पष्ट है और उसी कारण यह भग = सूर्य, पकाना, पक्व, आदि के लिए प्रयोग में आ सकता है।
क्षुद्र – क्षुत्, क्षुध, पानी के छलकने से उपन्न धवनि से व्युत्पन्न प्रतीत होता है। सं. क्षुल्ल= छोटा, थोड़ा, अल्प; क्षुल्लक = छोटा, नीच, क्षुद्र। ऋग्वेद में क्षुमन्त का प्रयोग आहार और उपभोग के लिए आया है :
क्षुमन्तं वाजं स्वपत्यं रयिं दा: । ऋ.२.४.८
कृधि क्षुमन्तं जरितारं अग्ने, २.९.५
क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं संगृभाय, ८.८१.१
क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणम् मक्षू गोमन्तं ईमहे। ८.८८.२
स नो क्षुमन्तं सदने वि ऊर्णुहि गोअर्णसं रयिं इन्द्र श्रवाय्यम् । १०. ३८.२
भोजन और पान की प्राथमिक संपल्पनाओं में अभेद रहा है इसीलिए बंगाली आज भी जल खाता है और संस्कृतज्ञ रस की चर्वणा करता है।
Post – 2018-04-09
अभिनन्दन शर्मा ने विषयान्तर होने की, या मुख्य विषय से जुड़े पार्श्विक मुद्दों को स्थान देने की मेरी प्रवृत्ति को मुख्य विषय को समझने में बाधक बताया है। मेरे मन में इसे लेकर दुविधा लंबे समय से रही है पर लोगों को प्रचलित मान्यताओं से बंधा पा कर मैं सोचता हूं कि पहले, पहले से चली आरही गलत धारणाओं का खंडन जरूरी है अन्यथा वे उन्हीं को लेकर आशंका प्रकट करेंगे। जैसे पश्चिमी विद्वानों से पहले कभी सोम को नशा नहीं माना जाता था, उसे नशा चढ़ाने वाली सुरा के विपरीत गुणों वाला आह्लादक पेय माना जाता था, आज प्राय: सुनने को मिल जाता हे कि ऋषि-मुनि भी तो सोमपान (सुरापान) करते थ, अत: लगा इसका कारण बताते हुए खंडन किए बिना मेरी बात समझने में बाधा पहुंचेगी। ऐसा ही अन्यत्र भी।
मै विवेचन पद्धति बदलने से पहले अन्य मित्रों की राय और अपना अनुभव जानना चाहता हूं।
Post – 2018-04-09
अभिनन्दन शर्मा ने विषयान्तर होने की, या मुख्य विषय से जुड़े पार्श्विक मुद्दों को स्थान देने की मेरी प्रवृत्ति को मुख्य विषय को समझने में बाधक बताया है। मेरे मन में इसे लेकर दुविधा लंबे समय से रही है पर लोगों को प्रचलित मान्यताओं से बंधा पा कर मैं सोचता हूं कि पहले, पहले से चली आरही गलत धारणाओं का खंडन जरूरी है अन्यथा वे उन्हीं को लेकर आशंका प्रकट करेंगे। जैसे पश्चिमी विद्वानों से पहले कभी सोम को नशा नहीं माना जाता था, उसे नशा चढ़ाने वाली सुरा के विपरीत गुणों वाला आह्लादक पेय माना जाता था, आज प्राय: सुनने को मिल जाता हे कि ऋषि-मुनि भी तो सोमपान (सुरापान) करते थ, अत: लगा इसका कारण बताते हुए खंडन किए बिना मेरी बात समझने में बाधा पहुंचेगी। ऐसा ही अन्यत्र भी।
मै विवेचन पद्धति बदलने से पहले अन्य मित्रों की राय और अपना अनुभव जानना चाहता हूं।
Post – 2018-04-09
अभिनन्दन शर्मा ने विषयान्तर होने की, या मुख्य विषय से जुड़े पार्श्विक मुद्दों को स्थान देने की मेरी प्रवृत्ति को मुख्य विषय को समझने में बाधक बताया है। मेरे मन में इसे लेकर दुविधा लंबे समय से रही है पर लोगों को प्रचलित मान्यताओं से बंधा पा कर मैं सोचता हूं कि पहले, पहले से चली आरही गलत धारणाओं का खंडन जरूरी है अन्यथा वे उन्हीं को लेकर आशंका प्रकट करेंगे। जैसे पश्चिमी विद्वानों से पहले कभी सोम को नशा नहीं माना जाता था, उसे नशा चढ़ाने वाली सुरा के विपरीत गुणों वाला आह्लादक पेय माना जाता था, आज प्राय: सुनने को मिल जाता हे कि ऋषि-मुनि भी तो सोमपान (सुरापान) करते थ, अत: लगा इसका कारण बताते हुए खंडन किए बिना मेरी बात समझने में बाधा पहुंचेगी। ऐसा ही अन्यत्र भी।
मै विवेचन पद्धति बदलने से पहले अन्य मित्रों की राय और अपना अनुभव जानना चाहता हूं।