Post – 2018-03-26

टिप्पणी -2

भारतीय अतीत की कुछ बातें हमें विस्मित करती हैं। दूसरी सभ्यताओं की उपलब्धियां कम विस्मयकारी नहीं रही हैं परन्तु वे भव्यता, विराटता के कारण अधिक रही हैं जिसका दूसरा पक्ष रहा है सामान्य जनता का उसी क्रूरता से दोहन, उत्पीड़न, और असहायता। भारत में स्थिति ठीक इसके विपरीत दिखाई देती है। इसकी विस्मयकारी उपलब्धियां चिंतन, दर्शन, विज्ञान की सैद्धान्तिकी के क्षेत्र में और सकल संपदा के अधिक न्यायसंगत वितरण, तकनीक और कौशल के व्यापक उपयोगितावादी विनियोजन और दूसरी सभ्यताओं की तुलना में विस्मयकारी समृद्धि के होते हुए भी आर्थिक परिपक्वता में दिखाई देती है जिन सभी के पीछे इसकी विश्वदृष्टि और जीवनदृष्टि है।

इन पहलुओं पर मेरा ध्यान इसलिए गया कि मैंने देखा सैद्धांतिक विवेचन में उनकी उपलब्धियां आधुनिक युग से पहले दूसरों के लिए अकल्पनीय थीं। यहां तक कि कुछ शताब्दी पहले तक भी शेष जगत को अविश्वसनीय सी लगती थी और इसलिए इन पर ध्यान देने की बजाय, इनमें से कुछ
की उपेक्षा की जाती थी और शेष का उपहास किया जाता था। और उनकी पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त करने वाले और ऊंची हैसियत रखने वाले विद्वान इस अतिरंजना पर शर्म से पानी पानी हो जाते थे और उसी शिक्षा प्रणाली द्वारा और उन्हीं पुस्तकों के अध्ययन से ज्ञान अर्जित करने वाले हम सबके मन में ऐसे ही विचार पैदा होते रहे हैं।

उदाहरण के लिए गति की सापेक्षता का सिद्धांत जिसके अनुसार यदि किसी गतिमान पिंड पर स्थित या वाहन पर बैठे हुए हैं तो अचल वस्तु या पिंड गतिमान प्रतीत होगा और आप और आप का वाहन अचल।

खगोलीय स्तर पर पहुंचने पर इसके बहुत विस्मयकारी परिणाम होते हैं। यह अनायास नहीं है कि भारत ने वैदिक काल में ही यह जान लिया था कि धरती गोल है और साथ ही कई गतियों से गतिशील है । संभवतः ग्रहों और उपग्रहों दृष्टिगोचर होने के समय और सप्तर्षि की स्थिति के अध्ययन से वे इस परिणाम पर भी पहुंचे थे कि सभी पिंड स्थिर नहीं हैं, गतिशील है – विवर्तेते अहनी चक्रियेव ।

इसी तरह पदार्थ और काल के सूक्ष्मतम अंशों और विभागो तथा वृहत्तम संख्याओं को देख कर जिनका उपयोग ज्योतिर्विज्ञान में ही हो सकता था, लोग इसका उपहास करते थे। काल की सापेक्षता उस तरह के साधनों, यंत्रों और सुविधाओं का अभाव होते हुए जो आज उपलब्ध है कैसे इस नतीजे पर पहुंच गए कि काल सापेक्ष है। मनुष्य के एक दिन, देवों के (जिसका अर्थ है ज्योतिर्मान पिंडों के) एक दिन और ब्रह्मा के एक दिन में सापेक्षतः अकल्पनीय अंतर है। यह आइंस्टाइन से पहले किसी के चिंतन का हिस्सा नहीं रहा। परंतु आइंस्टाइन ने भी यह निष्कर्ष गणितीय आधार पर निकाला था न कि दूरदर्शी यंत्रों के माध्यम से ब्रह्मांड को देख कर।

मेरी जानकारी में किसी अन्य देश या समाज के चिंतकों ने पहले कभी नहीं सोचा था कि काल और दिक् के बीच सापेक्षिक संबंध है, न ही यह कि केवल हमारा जीवन ही नश्वर नहीं है, समस्त ब्रह्मांड महाकाल द्वारा अनुक्षण विनष्ट किया जा रहा है। प्रत्येक वस्तु यहां तक की ग्रह पिंड और सूर्य चंद्रमा भी विनाश की विभिन्न अवस्थाओं में हैं। यह अवधारणा महाकाल के दिव्य रूप में जितनी स्पष्ट है वह चकित करने वाली है।

यह सोच कहां से आई, कैसे पैदा हुई यह मेरी समझ में नहीं आता है । कारण यह है कि हमारे ज्ञान साहित्य का बहुत बड़ा अंश मनोविक्षिप्तों द्वारा नष्ट कर दिया गया। उस इतिहास को दोहराने की आवश्यकता नहीं। इसलिए नष्ट प्रासाद के मलबे में से हमें जहां-तहां से कुछ कीमती रत्न और चिन्दियां मिलती हैं, कुछ चौंकाने वाली सूचनाएं मिलती हैं, जिनको आगे पीछे से हम जोड़ नहीं पाते इसलिए आविश्वास करने को मजबूर हो जाते हैं ।

चीन को इस तरह के दुर्भाग्य से गुजारना नहीं पड़ा, इसलिए उसका जो कुछ था, उससे भी अधिक बढ़-चढ़कर वहां के कम्युनिस्ट इतिहासकार दावा करते रहे, जिसका परिणाम है साइंस ऐंड सिविलाइजेशन इन चाइना जिसके खंडों की सही संख्या तक का ज्ञान मुझे नहीं।

हमारे अधिकांश प्रतिभाशाली तरुण मार्क्सवाद के सुनहले आकर्षण से अपने को रोक नहीं सकते थे, परंतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लीग के प्रभाव में आ जाने के कारण उपेक्षा और उपहास द्वारा इतिहास के इन साक्ष्यों को भी नष्ट करने के लिए कृतसंकल्प रही और उसका असर हम सभी पर है। हम परंपरा विमुख बुद्धिजीवी अपने अतीत को समझने की जगह उस इतिहास के धनात्मक पक्ष का भी उपहास करने लगे।

मुझे अपने विचारों को आपके समक्ष रखते हुए भी बहुत संकोच होता है, क्योंकि भाजपा में ब्राह्मणवाद प्रबल है और इससे जुड़े लोग देवता से लेकर इतिहास तक को भुनाने के लिए किसी सीमा तक पहुंचने के लिए आतुर रहते हैं । यह हमारा दायित्व है जैसे ब्राहमणवादी चंगुल से शिक्षा को बाहर लाने में सफल हुए उसी तरह अपने इतिहास को भी उनके चंगुल से बाहर रखते हुए उसकी सही समझ विकसित करें।

Post – 2018-03-26

टिप्पणी -2

भारतीय अतीत की कुछ बातें हमें विस्मित करती हैं। दूसरी सभ्यताओं की उपलब्धियां कम विस्मयकारी नहीं रही हैं परन्तु वे भव्यता, विराटता के कारण अधिक रही हैं जिसका दूसरा पक्ष रहा है सामान्य जनता का उसी क्रूरता से दोहन, उत्पीड़न, और असहायता। भारत में स्थिति ठीक इसके विपरीत दिखाई देती है। इसकी विस्मयकारी उपलब्धियां चिंतन, दर्शन, विज्ञान की सैद्धान्तिकी के क्षेत्र में और सकल संपदा के अधिक न्यायसंगत वितरण, तकनीक और कौशल के व्यापक उपयोगितावादी विनियोजन और दूसरी सभ्यताओं की तुलना में विस्मयकारी समृद्धि के होते हुए भी आर्थिक परिपक्वता में दिखाई देती है जिन सभी के पीछे इसकी विश्वदृष्टि और जीवनदृष्टि है।

इन पहलुओं पर मेरा ध्यान इसलिए गया कि मैंने देखा सैद्धांतिक विवेचन में उनकी उपलब्धियां आधुनिक युग से पहले दूसरों के लिए अकल्पनीय थीं। यहां तक कि कुछ शताब्दी पहले तक भी शेष जगत को अविश्वसनीय सी लगती थी और इसलिए इन पर ध्यान देने की बजाय, इनमें से कुछ
की उपेक्षा की जाती थी और शेष का उपहास किया जाता था। और उनकी पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त करने वाले और ऊंची हैसियत रखने वाले विद्वान इस अतिरंजना पर शर्म से पानी पानी हो जाते थे और उसी शिक्षा प्रणाली द्वारा और उन्हीं पुस्तकों के अध्ययन से ज्ञान अर्जित करने वाले हम सबके मन में ऐसे ही विचार पैदा होते रहे हैं।

उदाहरण के लिए गति की सापेक्षता का सिद्धांत जिसके अनुसार यदि किसी गतिमान पिंड पर स्थित या वाहन पर बैठे हुए हैं तो अचल वस्तु या पिंड गतिमान प्रतीत होगा और आप और आप का वाहन अचल।

खगोलीय स्तर पर पहुंचने पर इसके बहुत विस्मयकारी परिणाम होते हैं। यह अनायास नहीं है कि भारत ने वैदिक काल में ही यह जान लिया था कि धरती गोल है और साथ ही कई गतियों से गतिशील है । संभवतः ग्रहों और उपग्रहों दृष्टिगोचर होने के समय और सप्तर्षि की स्थिति के अध्ययन से वे इस परिणाम पर भी पहुंचे थे कि सभी पिंड स्थिर नहीं हैं, गतिशील है – विवर्तेते अहनी चक्रियेव ।

इसी तरह पदार्थ और काल के सूक्ष्मतम अंशों और विभागो तथा वृहत्तम संख्याओं को देख कर जिनका उपयोग ज्योतिर्विज्ञान में ही हो सकता था, लोग इसका उपहास करते थे। काल की सापेक्षता उस तरह के साधनों, यंत्रों और सुविधाओं का अभाव होते हुए जो आज उपलब्ध है कैसे इस नतीजे पर पहुंच गए कि काल सापेक्ष है। मनुष्य के एक दिन, देवों के (जिसका अर्थ है ज्योतिर्मान पिंडों के) एक दिन और ब्रह्मा के एक दिन में सापेक्षतः अकल्पनीय अंतर है। यह आइंस्टाइन से पहले किसी के चिंतन का हिस्सा नहीं रहा। परंतु आइंस्टाइन ने भी यह निष्कर्ष गणितीय आधार पर निकाला था न कि दूरदर्शी यंत्रों के माध्यम से ब्रह्मांड को देख कर।

मेरी जानकारी में किसी अन्य देश या समाज के चिंतकों ने पहले कभी नहीं सोचा था कि काल और दिक् के बीच सापेक्षिक संबंध है, न ही यह कि केवल हमारा जीवन ही नश्वर नहीं है, समस्त ब्रह्मांड महाकाल द्वारा अनुक्षण विनष्ट किया जा रहा है। प्रत्येक वस्तु यहां तक की ग्रह पिंड और सूर्य चंद्रमा भी विनाश की विभिन्न अवस्थाओं में हैं। यह अवधारणा महाकाल के दिव्य रूप में जितनी स्पष्ट है वह चकित करने वाली है।

यह सोच कहां से आई, कैसे पैदा हुई यह मेरी समझ में नहीं आता है । कारण यह है कि हमारे ज्ञान साहित्य का बहुत बड़ा अंश मनोविक्षिप्तों द्वारा नष्ट कर दिया गया। उस इतिहास को दोहराने की आवश्यकता नहीं। इसलिए नष्ट प्रासाद के मलबे में से हमें जहां-तहां से कुछ कीमती रत्न और चिन्दियां मिलती हैं, कुछ चौंकाने वाली सूचनाएं मिलती हैं, जिनको आगे पीछे से हम जोड़ नहीं पाते इसलिए आविश्वास करने को मजबूर हो जाते हैं ।

चीन को इस तरह के दुर्भाग्य से गुजारना नहीं पड़ा, इसलिए उसका जो कुछ था, उससे भी अधिक बढ़-चढ़कर वहां के कम्युनिस्ट इतिहासकार दावा करते रहे, जिसका परिणाम है साइंस ऐंड सिविलाइजेशन इन चाइना जिसके खंडों की सही संख्या तक का ज्ञान मुझे नहीं।

हमारे अधिकांश प्रतिभाशाली तरुण मार्क्सवाद के सुनहले आकर्षण से अपने को रोक नहीं सकते थे, परंतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लीग के प्रभाव में आ जाने के कारण उपेक्षा और उपहास द्वारा इतिहास के इन साक्ष्यों को भी नष्ट करने के लिए कृतसंकल्प रही और उसका असर हम सभी पर है। हम परंपरा विमुख बुद्धिजीवी अपने अतीत को समझने की जगह उस इतिहास के धनात्मक पक्ष का भी उपहास करने लगे।

मुझे अपने विचारों को आपके समक्ष रखते हुए भी बहुत संकोच होता है, क्योंकि भाजपा में ब्राह्मणवाद प्रबल है और इससे जुड़े लोग देवता से लेकर इतिहास तक को भुनाने के लिए किसी सीमा तक पहुंचने के लिए आतुर रहते हैं । यह हमारा दायित्व है जैसे ब्राहमणवादी चंगुल से शिक्षा को बाहर लाने में सफल हुए उसी तरह अपने इतिहास को भी उनके चंगुल से बाहर रखते हुए उसकी सही समझ विकसित करें।

Post – 2018-03-26

टिप्पणी -2

भारतीय अतीत की कुछ बातें हमें विस्मित करती हैं। दूसरी सभ्यताओं की उपलब्धियां कम विस्मयकारी नहीं रही हैं परन्तु वे भव्यता, विराटता के कारण अधिक रही हैं जिसका दूसरा पक्ष रहा है सामान्य जनता का उसी क्रूरता से दोहन, उत्पीड़न, और असहायता। भारत में स्थिति ठीक इसके विपरीत दिखाई देती है। इसकी विस्मयकारी उपलब्धियां चिंतन, दर्शन, विज्ञान की सैद्धान्तिकी के क्षेत्र में और सकल संपदा के अधिक न्यायसंगत वितरण, तकनीक और कौशल के व्यापक उपयोगितावादी विनियोजन और दूसरी सभ्यताओं की तुलना में विस्मयकारी समृद्धि के होते हुए भी आर्थिक परिपक्वता में दिखाई देती है जिन सभी के पीछे इसकी विश्वदृष्टि और जीवनदृष्टि है।

इन पहलुओं पर मेरा ध्यान इसलिए गया कि मैंने देखा सैद्धांतिक विवेचन में उनकी उपलब्धियां आधुनिक युग से पहले दूसरों के लिए अकल्पनीय थीं। यहां तक कि कुछ शताब्दी पहले तक भी शेष जगत को अविश्वसनीय सी लगती थी और इसलिए इन पर ध्यान देने की बजाय, इनमें से कुछ
की उपेक्षा की जाती थी और शेष का उपहास किया जाता था। और उनकी पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त करने वाले और ऊंची हैसियत रखने वाले विद्वान इस अतिरंजना पर शर्म से पानी पानी हो जाते थे और उसी शिक्षा प्रणाली द्वारा और उन्हीं पुस्तकों के अध्ययन से ज्ञान अर्जित करने वाले हम सबके मन में ऐसे ही विचार पैदा होते रहे हैं।

उदाहरण के लिए गति की सापेक्षता का सिद्धांत जिसके अनुसार यदि किसी गतिमान पिंड पर स्थित या वाहन पर बैठे हुए हैं तो अचल वस्तु या पिंड गतिमान प्रतीत होगा और आप और आप का वाहन अचल।

खगोलीय स्तर पर पहुंचने पर इसके बहुत विस्मयकारी परिणाम होते हैं। यह अनायास नहीं है कि भारत ने वैदिक काल में ही यह जान लिया था कि धरती गोल है और साथ ही कई गतियों से गतिशील है । संभवतः ग्रहों और उपग्रहों दृष्टिगोचर होने के समय और सप्तर्षि की स्थिति के अध्ययन से वे इस परिणाम पर भी पहुंचे थे कि सभी पिंड स्थिर नहीं हैं, गतिशील है – विवर्तेते अहनी चक्रियेव ।

इसी तरह पदार्थ और काल के सूक्ष्मतम अंशों और विभागो तथा वृहत्तम संख्याओं को देख कर जिनका उपयोग ज्योतिर्विज्ञान में ही हो सकता था, लोग इसका उपहास करते थे। काल की सापेक्षता उस तरह के साधनों, यंत्रों और सुविधाओं का अभाव होते हुए जो आज उपलब्ध है कैसे इस नतीजे पर पहुंच गए कि काल सापेक्ष है। मनुष्य के एक दिन, देवों के (जिसका अर्थ है ज्योतिर्मान पिंडों के) एक दिन और ब्रह्मा के एक दिन में सापेक्षतः अकल्पनीय अंतर है। यह आइंस्टाइन से पहले किसी के चिंतन का हिस्सा नहीं रहा। परंतु आइंस्टाइन ने भी यह निष्कर्ष गणितीय आधार पर निकाला था न कि दूरदर्शी यंत्रों के माध्यम से ब्रह्मांड को देख कर।

मेरी जानकारी में किसी अन्य देश या समाज के चिंतकों ने पहले कभी नहीं सोचा था कि काल और दिक् के बीच सापेक्षिक संबंध है, न ही यह कि केवल हमारा जीवन ही नश्वर नहीं है, समस्त ब्रह्मांड महाकाल द्वारा अनुक्षण विनष्ट किया जा रहा है। प्रत्येक वस्तु यहां तक की ग्रह पिंड और सूर्य चंद्रमा भी विनाश की विभिन्न अवस्थाओं में हैं। यह अवधारणा महाकाल के दिव्य रूप में जितनी स्पष्ट है वह चकित करने वाली है।

यह सोच कहां से आई, कैसे पैदा हुई यह मेरी समझ में नहीं आता है । कारण यह है कि हमारे ज्ञान साहित्य का बहुत बड़ा अंश मनोविक्षिप्तों द्वारा नष्ट कर दिया गया। उस इतिहास को दोहराने की आवश्यकता नहीं। इसलिए नष्ट प्रासाद के मलबे में से हमें जहां-तहां से कुछ कीमती रत्न और चिन्दियां मिलती हैं, कुछ चौंकाने वाली सूचनाएं मिलती हैं, जिनको आगे पीछे से हम जोड़ नहीं पाते इसलिए आविश्वास करने को मजबूर हो जाते हैं ।

चीन को इस तरह के दुर्भाग्य से गुजारना नहीं पड़ा, इसलिए उसका जो कुछ था, उससे भी अधिक बढ़-चढ़कर वहां के कम्युनिस्ट इतिहासकार दावा करते रहे, जिसका परिणाम है साइंस ऐंड सिविलाइजेशन इन चाइना जिसके खंडों की सही संख्या तक का ज्ञान मुझे नहीं।

हमारे अधिकांश प्रतिभाशाली तरुण मार्क्सवाद के सुनहले आकर्षण से अपने को रोक नहीं सकते थे, परंतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लीग के प्रभाव में आ जाने के कारण उपेक्षा और उपहास द्वारा इतिहास के इन साक्ष्यों को भी नष्ट करने के लिए कृतसंकल्प रही और उसका असर हम सभी पर है। हम परंपरा विमुख बुद्धिजीवी अपने अतीत को समझने की जगह उस इतिहास के धनात्मक पक्ष का भी उपहास करने लगे।

मुझे अपने विचारों को आपके समक्ष रखते हुए भी बहुत संकोच होता है, क्योंकि भाजपा में ब्राह्मणवाद प्रबल है और इससे जुड़े लोग देवता से लेकर इतिहास तक को भुनाने के लिए किसी सीमा तक पहुंचने के लिए आतुर रहते हैं । यह हमारा दायित्व है जैसे ब्राहमणवादी चंगुल से शिक्षा को बाहर लाने में सफल हुए उसी तरह अपने इतिहास को भी उनके चंगुल से बाहर रखते हुए उसकी सही समझ विकसित करें।

Post – 2018-03-26

आज की पोस्ट लिख सका तो शाम को लिखूंगा, परंतु इस समय मैं तीन छोटी छोटी टिप्पणियां तीन अलग अलग पोस्टों के माध्यम से करना चाहता हूंः पहली कल स्मृति पर अधिक भरोसा करने से हुई एक त्रुटि को लेकर। दूसरी भारतीय मनीषा की दिक-काल विषयक विस्मयकारी उपलब्धियों को लेकर और तीसरी भारत सरकार की शिक्षानीति को लेकर।

एक
कल की मेरी पोस्ट में स्वर्ग की मेरी जानकारी में सबसे प्राचीन हवाला ऋग्वेद के नवें मंडल के 114 वें सूक्त अाया है जब कि सूक्त की संख्या 113 है और ऋचाएं निम्न प्रकार हैंः
यत्र ज्योतिः अजस्रः यस्मिन् लोके स्वर् हितम्।
तस्मिन् मां धेहि पवमान अमृते लोके अक्षित, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।।
यत्र राजा वैवस्वतो यत्र आरोधनं दिवः।
यत्र अमूः यह्वतीः आपः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र अनुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः।
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र कामा निकामाश्च यत्र ब्रध्नस्य विष्टपः।
स्वधाः च यत्र तृप्तिः च तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र आनन्दाः च मोदाः च मुदः प्रमुद आसते।
कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र मां अमृतं कृधि, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।। 9.113.7-11

ऋग्वेद का जो भी अनुवाद आपको सुलभ हो उससे इन ऋचाओं का अर्थ समझें और पश्चिमी जगत और स्वयं अपनी बाद के कालों की स्वर्ग की अवधारणा से इसकी तुलना करें और सभ्यता के चिरत्र को समझने का प्रयत्न करें।

Post – 2018-03-26

आज की पोस्ट लिख सका तो शाम को लिखूंगा, परंतु इस समय मैं तीन छोटी छोटी टिप्पणियां तीन अलग अलग पोस्टों के माध्यम से करना चाहता हूंः पहली कल स्मृति पर अधिक भरोसा करने से हुई एक त्रुटि को लेकर। दूसरी भारतीय मनीषा की दिक-काल विषयक विस्मयकारी उपलब्धियों को लेकर और तीसरी भारत सरकार की शिक्षानीति को लेकर।

एक
कल की मेरी पोस्ट में स्वर्ग की मेरी जानकारी में सबसे प्राचीन हवाला ऋग्वेद के नवें मंडल के 114 वें सूक्त अाया है जब कि सूक्त की संख्या 113 है और ऋचाएं निम्न प्रकार हैंः
यत्र ज्योतिः अजस्रः यस्मिन् लोके स्वर् हितम्।
तस्मिन् मां धेहि पवमान अमृते लोके अक्षित, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।।
यत्र राजा वैवस्वतो यत्र आरोधनं दिवः।
यत्र अमूः यह्वतीः आपः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र अनुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः।
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र कामा निकामाश्च यत्र ब्रध्नस्य विष्टपः।
स्वधाः च यत्र तृप्तिः च तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र आनन्दाः च मोदाः च मुदः प्रमुद आसते।
कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र मां अमृतं कृधि, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।। 9.113.7-11

ऋग्वेद का जो भी अनुवाद आपको सुलभ हो उससे इन ऋचाओं का अर्थ समझें और पश्चिमी जगत और स्वयं अपनी बाद के कालों की स्वर्ग की अवधारणा से इसकी तुलना करें और सभ्यता के चिरत्र को समझने का प्रयत्न करें।

Post – 2018-03-26

आज की पोस्ट लिख सका तो शाम को लिखूंगा, परंतु इस समय मैं तीन छोटी छोटी टिप्पणियां तीन अलग अलग पोस्टों के माध्यम से करना चाहता हूंः पहली कल स्मृति पर अधिक भरोसा करने से हुई एक त्रुटि को लेकर। दूसरी भारतीय मनीषा की दिक-काल विषयक विस्मयकारी उपलब्धियों को लेकर और तीसरी भारत सरकार की शिक्षानीति को लेकर।

एक
कल की मेरी पोस्ट में स्वर्ग की मेरी जानकारी में सबसे प्राचीन हवाला ऋग्वेद के नवें मंडल के 114 वें सूक्त अाया है जब कि सूक्त की संख्या 113 है और ऋचाएं निम्न प्रकार हैंः
यत्र ज्योतिः अजस्रः यस्मिन् लोके स्वर् हितम्।
तस्मिन् मां धेहि पवमान अमृते लोके अक्षित, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।।
यत्र राजा वैवस्वतो यत्र आरोधनं दिवः।
यत्र अमूः यह्वतीः आपः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र अनुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः।
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र कामा निकामाश्च यत्र ब्रध्नस्य विष्टपः।
स्वधाः च यत्र तृप्तिः च तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र आनन्दाः च मोदाः च मुदः प्रमुद आसते।
कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र मां अमृतं कृधि, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।। 9.113.7-11

ऋग्वेद का जो भी अनुवाद आपको सुलभ हो उससे इन ऋचाओं का अर्थ समझें और पश्चिमी जगत और स्वयं अपनी बाद के कालों की स्वर्ग की अवधारणा से इसकी तुलना करें और सभ्यता के चिरत्र को समझने का प्रयत्न करें।

Post – 2018-03-25

हमारी भाषा (११)
चमकता हुआ अंधेरा (ख )

काला, काली,कलंक, कल्मष, कोयला, कोयल, आदि पर ध्यान देने पर इस विषयमें संदेह नहीं रह जाता कि इनका प्रयोग जिन आशयों में आज होता है वे आशय इनसे आरंभ से ही जुड़े रहे होंगे? हम यह नहीं जानते कि इन शब्दों के आशय इनसे कब से जुड़े हैं इसलिए यह मान सकते हैं कालिमा का भाव इन शब्दों के साथ आरंभ से ही जुड़ा रहा होगा। हमारी समस्या यह है कि इनसे कोई ध्वनि पैदा नहीं होली इसलिए इनके नामकरण में किसकी ध्वनि को आधार बनाया गया होगा और उसकी तार्किक संगति क्या हो सकती है? हम यह तो नहीं मान सकते कि कोयल की कूक के आधार पर उसका नामकरण – कोकिल या कोयल (कोइलरि)रखा गया होगा और उसके रंग के कारण उस नाम के आधार पर उनकी संज्ञाएं नियत की गई होंगी।

कारण एक तो इनकी संकल्पनाएँ भिन्न हैं दुसरे काल। उदाहरण के लिए काली का रंग काला है पर संकल्पना का आधार और चरण भिन्न है। यह काल की अवधारणा का मातृप्रधान समुदायों में आनयन है। काल दिन और काली रात । यम दिन और यमी रात। दिन प्रकाशित और रात काली। यह चेतना हमारे समाज में निरन्तर बनी रही है, इसलिए काल को विवस्वान या सूर्य माना ही जाता है, दुर्गा सप्तशती मे काली का वर्णन कालाभ्राभाम कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुलेखां (काल-अभ्र-आभां कटाक्षै: अरिकुलभयदां मौलिबद्ध इन्दुलेखां ) के रूप में किया गया है। यह एक रोचक धज है और एक रोचक ऐतिहासिक विकासयात्रा से जुड़ी है इसलिए मुझे इस पर कुछ विस्तार से अपनी बात कहनी होगी क्योंकि मैं स्वयं भी इससे पहले जो कुछ सोचता रहा हूं वह अब गलत लग रहा है।

यम और यमी की कथा ऋग्वेद में है। यामायन सूक्तों (ऋ. १०.१४-१८) से भी स्पष्ट है कि यमलोक या मरणोत्तर एक ऐसे लोक की जिसमे अजस्र ज्योति है और जिसमें द्वार्ग है, आनंद और मोद है कल्पना (ऋ ९.११४) थी। नरक की भी रही होगी यद्यपि, मेरी जानकारी में अंध तमस से भरे लोक की कल्पना उपनिषत काल से पहले नहीं मिलती (अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः। )

हमारा यह अनुमान है कि काल का वह विकराल रूप जो गीता में विश्वरूप में चित्रित है और काली का वह विकराल रूप जो कपालिनी में देखने में आता है, वह उस भयानक दौर के बाद विकसित हुआ जो हडप्पा के पराभव का कारण बना था जिसमे भारतीय चिंतन में निर्णायक मोड़ आया था। पंचतंत्र में वराहमिहिर द्वारा की गई एक ग्रह दशा का हवाला है जिसमें धरती मुंडमाल पहने राख लपेटे कराल रूप में चित्रित की गई है धरती ही चारों दिशाओं के कारण चतुर्भुजी, चार दिशा-कोणों के जुटने के साथ अष्टभुजा और नीचे ऊपर को भी दिग के रूप में जोड़ने के बाद दशभुजी हो जाती है, वही मातृदेवी भी है यह ऋग्वेद में बहुत स्पष्ट है – यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः – और चंडी कालिका की अवधारणा उस भीषण अकाल के बाद पैदा हुई जिसका चित्रण वैदिककालीन आपदा के रूप मे महाभारत में भी हुआ है -ऐसा मेरा ख्याल इस लेख के दौर में बना क्योंकि काल का ऐसा भयानक रूप इससे पहले के साहित्य में मुझे दिखाई नही देता, न ही काली का विकराल रूप पहले नज़र आता है।

हम केवल इतना जोड़ना चाहेंगे कि काले का काली से संबंध दिन रात के अंतर के कारण है। काल यदि अजस्र ज्योति से भरा है तो उसका काले रंग से सम्बन्ध नहीं हो सकता और फिर जो सीमा रंग की है वही काल की है। ध्वनि तो इसमें भी नहीं होती। इसलिए पुनः हमें जल की कल कल ध्वनि का ही सहारा रह जाता है जो पहले जलवाची बना और फिर जिसका उपयोग प्रकाश और इसके निषेध के दोनों आशयों के लिए उपयोग होने लगा। कल का जलर्थक प्रयोग कलेवा, कमल-शान्ति, विकलता (जल बिन मीन की दशा), क्लेद, क्लेश, कलवार, अं. क्ले, क्लाउड आदि में मिलेगा।

यह भी कम रोचक नहीं है कि कोयले के लिए भी अंगार शब्द का प्रयोग होता रहा है और दहकते काठ के लिए भी।

आज हम न काल में समाहित दिक की भारतीय सूझ का विस्तार से विवेचन कर सके जो आइन्स्टाइन से पहले अकल्पनीय थी न अन्धकार के दूसरे पर्यायों को ले सके।
(असमाप्त)

Post – 2018-03-25

हमारी भाषा (११)
चमकता हुआ अंधेरा (ख )

काला, काली,कलंक, कल्मष, कोयला, कोयल, आदि पर ध्यान देने पर इस विषयमें संदेह नहीं रह जाता कि इनका प्रयोग जिन आशयों में आज होता है वे आशय इनसे आरंभ से ही जुड़े रहे होंगे? हम यह नहीं जानते कि इन शब्दों के आशय इनसे कब से जुड़े हैं इसलिए यह मान सकते हैं कालिमा का भाव इन शब्दों के साथ आरंभ से ही जुड़ा रहा होगा। हमारी समस्या यह है कि इनसे कोई ध्वनि पैदा नहीं होली इसलिए इनके नामकरण में किसकी ध्वनि को आधार बनाया गया होगा और उसकी तार्किक संगति क्या हो सकती है? हम यह तो नहीं मान सकते कि कोयल की कूक के आधार पर उसका नामकरण – कोकिल या कोयल (कोइलरि)रखा गया होगा और उसके रंग के कारण उस नाम के आधार पर उनकी संज्ञाएं नियत की गई होंगी।

कारण एक तो इनकी संकल्पनाएँ भिन्न हैं दुसरे काल। उदाहरण के लिए काली का रंग काला है पर संकल्पना का आधार और चरण भिन्न है। यह काल की अवधारणा का मातृप्रधान समुदायों में आनयन है। काल दिन और काली रात । यम दिन और यमी रात। दिन प्रकाशित और रात काली। यह चेतना हमारे समाज में निरन्तर बनी रही है, इसलिए काल को विवस्वान या सूर्य माना ही जाता है, दुर्गा सप्तशती मे काली का वर्णन कालाभ्राभाम कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुलेखां (काल-अभ्र-आभां कटाक्षै: अरिकुलभयदां मौलिबद्ध इन्दुलेखां ) के रूप में किया गया है। यह एक रोचक धज है और एक रोचक ऐतिहासिक विकासयात्रा से जुड़ी है इसलिए मुझे इस पर कुछ विस्तार से अपनी बात कहनी होगी क्योंकि मैं स्वयं भी इससे पहले जो कुछ सोचता रहा हूं वह अब गलत लग रहा है।

यम और यमी की कथा ऋग्वेद में है। यामायन सूक्तों (ऋ. १०.१४-१८) से भी स्पष्ट है कि यमलोक या मरणोत्तर एक ऐसे लोक की जिसमे अजस्र ज्योति है और जिसमें द्वार्ग है, आनंद और मोद है कल्पना (ऋ ९.११४) थी। नरक की भी रही होगी यद्यपि, मेरी जानकारी में अंध तमस से भरे लोक की कल्पना उपनिषत काल से पहले नहीं मिलती (अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः। )

हमारा यह अनुमान है कि काल का वह विकराल रूप जो गीता में विश्वरूप में चित्रित है और काली का वह विकराल रूप जो कपालिनी में देखने में आता है, वह उस भयानक दौर के बाद विकसित हुआ जो हडप्पा के पराभव का कारण बना था जिसमे भारतीय चिंतन में निर्णायक मोड़ आया था। पंचतंत्र में वराहमिहिर द्वारा की गई एक ग्रह दशा का हवाला है जिसमें धरती मुंडमाल पहने राख लपेटे कराल रूप में चित्रित की गई है धरती ही चारों दिशाओं के कारण चतुर्भुजी, चार दिशा-कोणों के जुटने के साथ अष्टभुजा और नीचे ऊपर को भी दिग के रूप में जोड़ने के बाद दशभुजी हो जाती है, वही मातृदेवी भी है यह ऋग्वेद में बहुत स्पष्ट है – यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः – और चंडी कालिका की अवधारणा उस भीषण अकाल के बाद पैदा हुई जिसका चित्रण वैदिककालीन आपदा के रूप मे महाभारत में भी हुआ है -ऐसा मेरा ख्याल इस लेख के दौर में बना क्योंकि काल का ऐसा भयानक रूप इससे पहले के साहित्य में मुझे दिखाई नही देता, न ही काली का विकराल रूप पहले नज़र आता है।

हम केवल इतना जोड़ना चाहेंगे कि काले का काली से संबंध दिन रात के अंतर के कारण है। काल यदि अजस्र ज्योति से भरा है तो उसका काले रंग से सम्बन्ध नहीं हो सकता और फिर जो सीमा रंग की है वही काल की है। ध्वनि तो इसमें भी नहीं होती। इसलिए पुनः हमें जल की कल कल ध्वनि का ही सहारा रह जाता है जो पहले जलवाची बना और फिर जिसका उपयोग प्रकाश और इसके निषेध के दोनों आशयों के लिए उपयोग होने लगा। कल का जलर्थक प्रयोग कलेवा, कमल-शान्ति, विकलता (जल बिन मीन की दशा), क्लेद, क्लेश, कलवार, अं. क्ले, क्लाउड आदि में मिलेगा।

यह भी कम रोचक नहीं है कि कोयले के लिए भी अंगार शब्द का प्रयोग होता रहा है और दहकते काठ के लिए भी।

आज हम न काल में समाहित दिक की भारतीय सूझ का विस्तार से विवेचन कर सके जो आइन्स्टाइन से पहले अकल्पनीय थी न अन्धकार के दूसरे पर्यायों को ले सके।
(असमाप्त)

Post – 2018-03-25

हमारी भाषा (११)
चमकता हुआ अंधेरा (ख )

काला, काली,कलंक, कल्मष, कोयला, कोयल, आदि पर ध्यान देने पर इस विषयमें संदेह नहीं रह जाता कि इनका प्रयोग जिन आशयों में आज होता है वे आशय इनसे आरंभ से ही जुड़े रहे होंगे? हम यह नहीं जानते कि इन शब्दों के आशय इनसे कब से जुड़े हैं इसलिए यह मान सकते हैं कालिमा का भाव इन शब्दों के साथ आरंभ से ही जुड़ा रहा होगा। हमारी समस्या यह है कि इनसे कोई ध्वनि पैदा नहीं होली इसलिए इनके नामकरण में किसकी ध्वनि को आधार बनाया गया होगा और उसकी तार्किक संगति क्या हो सकती है? हम यह तो नहीं मान सकते कि कोयल की कूक के आधार पर उसका नामकरण – कोकिल या कोयल (कोइलरि)रखा गया होगा और उसके रंग के कारण उस नाम के आधार पर उनकी संज्ञाएं नियत की गई होंगी।

कारण एक तो इनकी संकल्पनाएँ भिन्न हैं दुसरे काल। उदाहरण के लिए काली का रंग काला है पर संकल्पना का आधार और चरण भिन्न है। यह काल की अवधारणा का मातृप्रधान समुदायों में आनयन है। काल दिन और काली रात । यम दिन और यमी रात। दिन प्रकाशित और रात काली। यह चेतना हमारे समाज में निरन्तर बनी रही है, इसलिए काल को विवस्वान या सूर्य माना ही जाता है, दुर्गा सप्तशती मे काली का वर्णन कालाभ्राभाम कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुलेखां (काल-अभ्र-आभां कटाक्षै: अरिकुलभयदां मौलिबद्ध इन्दुलेखां ) के रूप में किया गया है। यह एक रोचक धज है और एक रोचक ऐतिहासिक विकासयात्रा से जुड़ी है इसलिए मुझे इस पर कुछ विस्तार से अपनी बात कहनी होगी क्योंकि मैं स्वयं भी इससे पहले जो कुछ सोचता रहा हूं वह अब गलत लग रहा है।

यम और यमी की कथा ऋग्वेद में है। यामायन सूक्तों (ऋ. १०.१४-१८) से भी स्पष्ट है कि यमलोक या मरणोत्तर एक ऐसे लोक की जिसमे अजस्र ज्योति है और जिसमें द्वार्ग है, आनंद और मोद है कल्पना (ऋ ९.११४) थी। नरक की भी रही होगी यद्यपि, मेरी जानकारी में अंध तमस से भरे लोक की कल्पना उपनिषत काल से पहले नहीं मिलती (अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः। )

हमारा यह अनुमान है कि काल का वह विकराल रूप जो गीता में विश्वरूप में चित्रित है और काली का वह विकराल रूप जो कपालिनी में देखने में आता है, वह उस भयानक दौर के बाद विकसित हुआ जो हडप्पा के पराभव का कारण बना था जिसमे भारतीय चिंतन में निर्णायक मोड़ आया था। पंचतंत्र में वराहमिहिर द्वारा की गई एक ग्रह दशा का हवाला है जिसमें धरती मुंडमाल पहने राख लपेटे कराल रूप में चित्रित की गई है धरती ही चारों दिशाओं के कारण चतुर्भुजी, चार दिशा-कोणों के जुटने के साथ अष्टभुजा और नीचे ऊपर को भी दिग के रूप में जोड़ने के बाद दशभुजी हो जाती है, वही मातृदेवी भी है यह ऋग्वेद में बहुत स्पष्ट है – यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः – और चंडी कालिका की अवधारणा उस भीषण अकाल के बाद पैदा हुई जिसका चित्रण वैदिककालीन आपदा के रूप मे महाभारत में भी हुआ है -ऐसा मेरा ख्याल इस लेख के दौर में बना क्योंकि काल का ऐसा भयानक रूप इससे पहले के साहित्य में मुझे दिखाई नही देता, न ही काली का विकराल रूप पहले नज़र आता है।

हम केवल इतना जोड़ना चाहेंगे कि काले का काली से संबंध दिन रात के अंतर के कारण है। काल यदि अजस्र ज्योति से भरा है तो उसका काले रंग से सम्बन्ध नहीं हो सकता और फिर जो सीमा रंग की है वही काल की है। ध्वनि तो इसमें भी नहीं होती। इसलिए पुनः हमें जल की कल कल ध्वनि का ही सहारा रह जाता है जो पहले जलवाची बना और फिर जिसका उपयोग प्रकाश और इसके निषेध के दोनों आशयों के लिए उपयोग होने लगा। कल का जलर्थक प्रयोग कलेवा, कमल-शान्ति, विकलता (जल बिन मीन की दशा), क्लेद, क्लेश, कलवार, अं. क्ले, क्लाउड आदि में मिलेगा।

यह भी कम रोचक नहीं है कि कोयले के लिए भी अंगार शब्द का प्रयोग होता रहा है और दहकते काठ के लिए भी।

आज हम न काल में समाहित दिक की भारतीय सूझ का विस्तार से विवेचन कर सके जो आइन्स्टाइन से पहले अकल्पनीय थी न अन्धकार के दूसरे पर्यायों को ले सके।
(असमाप्त)

Post – 2018-03-24

चमकता हुआ अंधेरा
(इस लेख में पहले लिखे लेखों के आंकड़ों का उपयोग करूंगा)

आपने अभी इस बात पर सोचा है जान दिया है ध्यान दिया है की अंधेरे के लिए हमारी भाषा में कोई अलग शब्द नहीं है हमने अंध की बात की थी और बताया था उसका अर्थ सोमरस (पाहि मध्वो अन्धसः) भी होता है मादक पेय (अमन्दत मघवा मध्वो अन्धसः) भी होता है और यदि जल (यद्वा समुद्रं अन्धसः) है तो कांति तो होगी ही। अन्धस उसी श्रृखला का शब्द है जिसमे अद, उद, इद, इंद, इंदु, अन्न, आदि आते हैं । यह अलग से कहने की जरूरत नहीं कि इन सबका अर्थ जल है और आप कह सकते हैं कि इंदु= चंद्रमा का अर्थ जल है, या उसकी संज्ञा जल की कांति पर आधारित है।

अंधेरे के लिए एक दूसरा शब्द तम है इसका प्रयोग ऋग्वेद में भी अंधकार के लिए हुआ तम आसीत तमसा गूढ़ं अग्रे, आरम्भ में अंधकार अंधकार में लिपटा हुआ था । परंतु तमकना, तामा / ताम्बा (ताम्र), तांबूल, तामरस से स्पष्ट है इसका अर्थ चमकने, दमकने या लालिमा है। इसकी विकास प्रक्रिया कुछ टेढ़ी है। मत, मद, मध्, मदु, मधु श्रृंखला में आता है । इसमें भी प्रत्येक शब्द का एक अर्थ जल है। मत वर्ण विपर्यय से तम बना है जल की चमक वाला भाव इसमें बना रह गया है जिसे ललौहे पदार्थों के लिए रूढ़ किया गया और फिर विरोध से अंधकार के लिए ।

मसि = स्याही या रोशनाई बनाने के लिए कालिख का प्रयोग किया जाता है। मसें भीगना =दाढ़ी मूंछ की रोमारेखा के लिए प्रयोग में आता है। जैसा कि रोशनाई से प्रकट होता है, इसमें भी रोशनी या प्रकाश का भाव है, न कि अंधेरे का । रोशनी उसी रुष से व्युत्पन्न है जैसे रोष। मस का अर्थ है ‘चमकने वाला’। इसी का मस और मास दोनों रूपों में चंद्रमा के लिए प्रयोग होता है। मास महीने के लिए रूढ़ हो चुका है जिसका अर्थ है चंद्रमा की एक परिक्रमा। मस और मास फारसी में मह और माह बन जाते हैं जिनका अर्थ चाँद होता है पर माह महीना के लिए रूढ़ सा है। अंग्रेजी में मास प्रतिरूप मंथ, मून से निकला। फारसी में चाँद के लिए महताब का भी प्रयोग होता है। सामान्यतः ताब का प्रयोग ताप और प्रताप के लिए होता है पर मह के साथ प्रयोग में आने पर इसमें गर्मी चमक बन जाती है।

यदि हम संस्कृत और अंग्रेजी में चंद्रमा के लिए प्रयुक्त चंद्र्मन पर ध्यान दें तो पता चलेगा इसमें तीन शब्द हैं। चन्+ द्र+मन् इन तीनों का एक अर्थ पानी है, दूसरा चमक है और तीसरा चंद्रमा (चन >चान, तर/तार का प्रकाश वाला भाव तर+णि और तारा की दिशा में स्थिर हुआ और मन को अंग. मून में लक्ष्य किया जा सकता है) कहें हम चंद्रमा कहते समय हम चाँद के तीन पर्यायों को मिला कर एक शब्द बना लेते हैं । परंतु चंद्रमा की संस्कृत रूपावली में मस् का प्रवेश हो जाता है चंद्रमा- चंद्रमसौ – चंद्रमसः और अब प्रकारांतर से चार शब्दों का एक साथ प्रयोग करते हैं।

अन्धकार का एक पर्याय है तिमिर । इसमें प्रयुक्त तिम का अर्थ जल है जिससे तिमिंगल = मत्स्य, महामत्स्य निकला है। इसका प्रकाश का भाव टिमटिमाना, टीम-टाम, टीमल- सुन्दर, में बचा रह गया है. (असमाप्त)