Post – 2018-03-06

तों सम कौन कुटिल खल कामी

मैं सामान्यत: ऐसे प्रश्नों का जवाब देने से बचता हूं जो मेरी पोस्ट में चर्चित विषय से असंबद्ध हों। कारण दो हैं, मेरी जानकारी सीमित है। सभी प्रश्नों का उत्तर देना मेरे सामर्थ्य से बाहर है। दूसरा, यदि विषय की जानकारी हुई भी तो भी विषयान्तर होने पर, जिस विषय पर लिख रहा हूं, उससे हटने पर विचार प्रवाह भंग होने पर आगे लिखना रुक जाता है। इसके बाद भी मेरे मित्र और माकपान्केद्रीय कमेटी के सदस्य, जोगेन्दर शर्मा ने न्यजी लैंड के गाड जोन के ब्रायन नाम के व्यक्ति का विनोद कुमार द्वारा अनूदित लेख इसलिए मेरे टाइम लाइन पर टैग किया है कि मेरी प्रतिक्रिया से दूसरे लाभान्वित होंगे।

संक्षिप्त प्रतिक्रिया देना मेरे स्वभाव में नहीं। संक्षेप में गाली दी जाती है, आदेश दिए जाते हैं और नारे लगाए जाते हैं। मैं समस्या को समझने, उसकी जड़ तक जाने का प्रयत्न करता हूं और बहस कई शाखाओं में फैल जाती है। लंबी चर्चा के बाद भी अधूरापन बना रह जाता है। जानकार लोग दूसरों से जो कुछ जानते हैं उसके मुहावरे जानकारी के स्रोतों से प्राप्त होते हैं उसे कह लेना उनके लिए आसान होता है। मैं जानता नहीं, प्रत्यक्ष देखता हूं और दृश्य को वाणी दे पाना कठिन भी होता है और कभी पूरा नहीं हो पाता। जोगेन्दर ने प्रतिक्रिया जानने के लिए इसे भेजा भी नहीं है। यह हिन्दुत्व को और हिन्दुओं को गर्हित सिद्ध करने के लिए और साथ ही इसका उद्धारक बन कर धर्मान्तरण के लिए ईसाइयों द्वारा जो अभियान चलाया जा रहा है, उसी का हिस्सा है। यह उसका भर्त्सना वाला पक्ष है जिसमें इंगित है कि भारत में व्याप्त भ्रष्टता का कारण हिन्दुत्व है, भ्रष्टाचार इसके मूल में है और हिन्दुत्व को मिटाकर यदि सभी को ईसाई बना दिया जाय तो इससे मुक्ति मिल सकती है। जोगेन्दर ने इसे मुझे भेज कर यह प्रमाणित किया है कि वह और कम्युनिस्ट पार्टियां इस अभियान के साथ हैं। इससे मेरी जानकारी में वृद्धि नहीं हुई है क्योंकि मैं पहले इसे लिख चुका हूं कि कम्युनिस्ट पार्टी की जन्मघुट्टी में ही लीग का जहर घुल गया था इसलिए उसका मुख्य कार्यभार हिन्दूद्रोह है और वह हिन्दुत्व को अपमानित करने और मिटाने के लिए किसी हिन्दुत्व द्रोही का साथ दे सकती है।

इस सद्प्रयास के लिए मैं जोगेन्दर को धन्यवाद देता हूं कि इतने दूर की कौड़ी उन्होंने इतने दुष्कर क्षेत्र से जुटाई जहां जहां भ्रष्टाचार का नाम नहीं है, पर भ्रष्टाचार से इतना प्रेम है कि वहां के लोग दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों का ही नहीं वहां के सबसे भ्रष्ट धार्मिक समुदाय का पता लगाने पर और वहां के लोगों को यह बताने पर खर्च करते हैं, ‘गाड जोन’ जिससे भ्रष्टाचार डरता है, उसमें प्रवेश करने का सबसे आसान रास्ता क्या है और भारत के कम्युनिस्टों को यह समझने के लिए कि हिन्दूधर्म दुनिया का सबसे भ्रष्ट धर्म और हिन्दू दुनिया के सबसे भ्रष्ट लोग हैं ऐसे ही विद्वानों की तलाश रहती है। अपनी पवित्रता का इससे अच्छा प्रमाण कम्युनिस्टों को नहीं मिल पाता और इस पवित्रता की रक्षा के लिए वे हिन्दू समाज से परहेज करते हैं, और हिन्दू समाज ज्यों ज्यों उनके इरादे समंझता जाता त्यों त्यों उनकी पवित्रता की रक्षा के लिए स्वयं उनसे दूर हटता जाता है। इसके परिणाम जैसे हो सकते हैं वे सामने हैं। केशवदास ने भारतीय कम्युनिस्टों को लक्ष्य करके तीन सौ साल पहले ही लिखा था, “चेतना ही न रही चढ़ि चित्त सो चाहत मूढ़ चिताहू चढ़्यो रे।” यदि चेतना होती तो भारत को और हिन्दू धर्म और समाज को अपनी आंखों देखते और अपनी अक्ल से समझते, न्यूजीलैंड के गाड लैंड के किसी फरिश्ते पर भरोसा नहीं करते। मेरी समस्या यह है कि माकपा जैसी भी क्यों न हो, मेरी उससे सहानुभूति रही है और मैं उसकी अन्त्येष्ठि का जश्न नहीं मना सकता।

मैं अपने विचार दो खंडों में रखना चाहूंगा। पहले में तथ्य निरूपण और दूसरे में हिन्दुओं के विषय में विविध देशों, विविध धर्मों और अनेक कालों के ऐसे लोगों के विचार। दीर्घता के कारण इसे दो बार पोस्ट करूंगा स्वतत: । जिन्हें समझना हो वे दोनों को पढ़ें।

जहां तक मेरी प्रतिक्रिया से लाभ उठाने का प्रशन है पिछले ४१ साल से मैंने दसियों बार समझाया है, पर मुझ नाचीज से वे कभी कुछ न सीख सकते थे न सीखेंगे फिर भी पहली बार सीखने की इच्छा प्रकटकी है तो कर्तव्य निर्वाह के लिए बता दें:
१. ब्रायन के न आगे कुछ है न पीछे, नाम मानो तो उपनाम गायब, उपनाम मानो तो नाम, इतना विख्यात यह है नहीं कि इतने से पूरे नाम का स्मरण हो जाय, इसलिए यह नाम फर्जी है।
२. ईसाइयों के द्वारा भारत में हिन्दुत्व के विरोध में बहुत गर्हित, धूर्ततापूर्ण तरीक आरंभ से ही अपनाए जाते रहे है, इनमें निरंतर बृद्धि हुई है, जिसके उदारण देने की जरूरत नहीं है। ईसाइयत का वैचारिक आधार इतना लचर, इतिहास इतना क्रूर, वर्तमान योजनाएं इतनी गर्हित हैं कि वह पाखंड, प्रलोभन और दुष्प्रचार के बल पर ही आगे बढ़ सकता है।
३. बात इतिहास की की गई है इसलिए यह समझना जरूरी हो सकता है कि हिन्दुत्व के साथ भी पाखंड जुड़ा रहा है पर दूसरे धर्मों से कम। इसमे आत्मालोचन, सुधार, और अनर्गल के उपहास की जितनी छूट रही है, जितने विद्रोही आन्दोलन हुए हैं, वैसा किसी दूसरे धर्म या संप्रदाय में नहीं। एक ही परिवार के लोग आस्तिक, नास्तिक, विभिन्न देवों के उपासक रह कर पूरे सौहार्द से रह सकते थे और रह सकते हैं इसका दूसरा उदाहरण नहीं। इतिहास का पक्ष दूसरों की जबान से दूसरे खंड में।
४. यह सच है कि भारत का स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही अपने हिस्से की तलाश के साथ तेजी से नैतिक स्खलन हुआ है, और हिन्दू समाज इसका अपवाद नहीं, पर यदि इस काल रेखा से पहले के हिन्दू धर्म और समाज के नेताओं और लोगों की भी तुलना की जाय तो अन्तर समझ में आ जाएगा और समझ में यह भी आ जाएगा कि कारण दूसरे हैं जिसमें राजनीतिक अवसरवाद, उपभोक्तावाद, परंपरागत मूल्यों का ह्रास, शहरीकरण से उतपन्न सामाजिक दबाव की कमी, कार्यसंस्कृति का ह्रास, जनसंख्या का दबाव और अवसरों की कमी के करण संफलता के चोर दरवाजे तलाशने की होड़ और जाने कितने सारे कारण हैं पर इसमें हिन्दू ही नहीं किसी धर्म की भूमिका नहीं। मार्क्सवादी समझ रखने वालाे को पता यह लगाना चाहिए कि यह गिरावट आई कैसे तो समझ में आ जाएगा कि धर्म के राजनीतीकरण, राजनीति का सेकुलरिज्म की आड़ में हिन्दू द्रोही हो जाना और आस्था और निष्ठा की जड़ों पर प्रहार करते हुए मूल्यविमुखता के उत्थान और प्रसार में भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों की भी इसमें सक्रिय भूमिका रही है।

Post – 2018-03-04

नमो वेधाय शूद्राय सहस्र क्रतवे नम:

भारतीय समाजशास्त्र का खोखलापन इस बात से ही उजागर है कि भारतीयों सहित दुनिया के भारतविदों को शूद्र शब्द का मतलब तक पता नहीं, इसलिए इससे परिचित कराना जरूरी है। शूद्र का अर्थ होता है:

१. जो ब्राहमण, क्षत्रिय या वैश्य नहीं है, वह शूद्र है। कलकत्ता हाइकोर्ट ने एक मुकदमे में माना कि कायस्थ, जो हिन्दू समाज के सबसे शिक्षित (पुरुषों की साक्षरता १००%, महिलाएं भी सर्वाधिक शिक्षित, जिस कसौटी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कोई बराबरी पर नहीं आएगा), सबसे खुले दिमाग और सेकुलर समझ के होते हुए भी इसलिए शूद्र हैं क्योंकि वे इन तीन में नहीं आते। इसी कसौटी पर चूकने के कारण दक्षिण के वे राजा भी शूद्र थे जिन्होंने उत्तर भारत से ब्राह्मणों को अपने यहां आदर सहित बुलाया था और जो मानते थे कि जैसा कि उनके राजपंडित बताते हैं, वे सचमुच शूद्र हैं। जब तक ये उनके आश्रित थे इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वे शूद्र थे या क्षत्रिय, थे तो दोनों स्थितियों में ब्राह्मणों से नीचे ही।

२. प्राचीन काल में जब जमीन का लेखा रखना आरंभ हुआ तो जिन शिक्षित व्यक्तियों को लेखपाल (लिपिक) के पद पर नियुक्त किया गया वे उन्हीं वर्णों के हो सकते थे जिनको शिक्षा का अधिकार था। उच्च सार्वजनिक पदों पर नियुक्त (कार्यस्थ) किया जाता रहा वे भी इन्हीं वर्णों के होसकते थे। एक बार प्रशासनिक पदों पर नियुक्त होने के बाद उनका शादी व्याह भी अपने ही दायरे में होने लगा। विवाह अपने वर्ण में ही करना था इसलिए एक वर्ण के सभी का लगता है समान उपनाम हो गया और वे उसी में रिश्ते नाते करते रहे हैं। आज वे स्वयं भी भूल चुके हैं कि किस उपनाम के कायस्थ मूलत:किस वर्ण के हैं, और संभवत: अपने ही उपनाम में रिश्ते नाते के पीछे यह कारण हो सकता है, इसका भी उन्हें ध्यान न हो। हमारे प्रयोजन के लिए शूद्र का अर्थ हुआ राजकाज से जुड़ा अमला वर्ग।

३. आविष्कारक ((पहिया, रथ, गाड़ी, नौका, हल आदि का आविष्कार शूद्रों ने किया), वास्तुकार या आर्किटेक्ट (स्थपति या थवई), धातुविद या मेटलर्जिस्ट और टूलमेकर (लोहार, सोनार), भूविज्ञानी, चिकित्सक और शल्यचिकित्सक, पशुचिकित्सक, नर्तक, नाटककार (नट), वनस्पतिविज्ञानी, जीवविज्ञानी, यान्रिक या इजीनियर, तकनीशियन, धातुर्कमी (ठठेरा, कंसल), तक्षणकर्मी (जिसमें नौनिर्माण लेकर काष्ठशिल्प कई कोटियां आती हैं) मूर्तिकार, भांडनिर्माता, नौचालक, वासोवाय या बुनकर, रंगसाज, तेली,चर्मकार, धरिकार, पथरी या पत्थर के पात्र बनाने वाले आदि विशेषज्ञता के सभी क्षेत्रों के लोग।

४. पशुपालन से जुड़े जन गोपाल, महिपाल, अजपाल, अविपाल।

५. शारीरिक श्रम या स्वल्प निपुणता के काम भारिक या कहांर, नाई, बारी/बरेल ( पत्ते के पात्र बनाने वाले), रजक धोबी और कृषि मजदूर, आदि ।

५. पक्षियों का शिकार, मृत पशुओं के निपटान, और वधिक (मृत्युदंड को क्रियान्वित करने वाले ), मांसविक्रयी, मदिरा और ताडी के कारोबारी, जिनको अस्पृश्य माना जाता था। बुद्धधर्म के प्रभाव के बाद इनके सामाजिक स्तर में और अधिक गिरावट आई। इनके साथ बहुत क्रूरता का व्यवहार किया जाता रहा। अकेला इन्हें दलित कहा जा सकता है।

शूद्र दुनिया को चलाते रहे हैं, जब कि संपत्ति पर अधिकार करके उनको काम पर लगाने वाले उनका ही उपयोग करके, संपदा के स्रोतों पर अपना अधकार भी बनाए रखते रहे हैं, और स्वयं उनका भी नियन्त्रण करते रहे हैं, क्योंकि उनमें पहल का अभाव रहा है जिसके होते ही वे स्वयं कोई न कोई नया उपक्रम करके संपत्तिवाले हो सकते थे। कहें इसके बल पर वे संपदा के स्रोतों और उत्पादन के साधनों (जिसमें यन्त्र से दोनों के स्वामी बने रहे हैं। अपने इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए वे नैतिकता, न्यायव्यवस्था, दंडविधान, सैन्यबल, धार्मिक विश्वास सभी का प्रयोग करते रहे है, जिससे मुक्त वे लोग उस अनुपात में रहे हैं जिस अनुपात में अपनी जीविका के लिए उन पर निर्भर नहीं रहे है।

संपत्ति संग्रह करने वालों को, संपत्ति पर नियन्त्रण करने वालों को हम इसके लिए दोष नहीं दे सकते, क्योंकि यह मानव स्वभाव है। निजी संपत्ति के विकास के बाद से व्यक्ति अपने परिवार में भी संपत्ति पर नियन्त्रण अपने हाथ में रखने के प्रयत्न में रहता है, और मनोवैज्ञानिक रूप से पूरे परिवार पर उसका आदेश चलता है जिस के नियंत्रण में संपदा होती है या जो कमाऊ होता है। पितृभक्ति की आचारसंहिता का एक पक्ष संपत्ति पर मरने के समय तक पिता का अधिकार होता था (ऋ. १.११६.२)/ है। हूणों और तातारों में जिनकी जीविका लूट पाट पर चलती थी पिता (बूढ़ों) से अधिक आदर और अधिकार युवा पुत्र का होता है और उस मूल्यव्यवस्था में पले होने के कारण मुगलों में जवान होते ही पुत्र सत्ता हथियाने के लिए विद्रोह पर उतारू हो जाते थे।

समानता के अधिकार की अवधारणा नई है, किंचित अप्राकृतिक है, क्योंकि पाशविक अवस्था से आगे इसका निर्वाह आज तक किसी समाज में नहीं हुआ और उसमें भी समाज पर भार बन चुका व्यक्ति स्वत: चुपचाप अलग हो जाया करता था। परन्तु कृत्रिम या मानव निर्मित होने के कारण यह मानव सभ्यता की उपलब्धि है। सभ्यता प्रकृति का अनुगमन नहीं उसके नियमों को जानकर, उस पर विजय है। पर इसकी सम्यक चेतना विकसित किए बिना बल प्रयोग से इसे व्यवहार्य नहीं बनाया जा सकता । जाहिर है बल प्रयोग से दूसरों को समानता के लिए बाध्य करने वाला दूसरों के समान नहीं हो सकता। वह अधिक क्रूर भी हो सकता है। सत्ता पर अधिकार करके साम्यवाद के लिए प्रयत्नशील व्यवस्थाओं में आरंभिक त्वरा के बाद जीवनयापन की अल्पतम सुविधाओं की सुनिश्चितता के कारण पहल का अभाव और अपेक्षित परिणाम के लिए बढ़ता दबाव इनकी आन्तरिक विफलता का प्रधान कारण रहा है।

परन्तु यहां हम अपने विषय से कुछ भटक गए हैं, या जिस चरण पर चर्चा अधूरी रह गई थी उससे कुछ आगे बढ़ आए हैं।

हमें यह स्वीकार करना होगा (१) कि ‘शूद्रों’ या संपदा से वंचित पर समस्त कार्यभार संभालने वालों का अपने ही समाज की व्यवस्था पर अधिकार नहीं रहा है, और जिनके हाथ में यह व्यवस्था रही है उन्होंने इनको आर्थिक दृष्टि से घाटे में रखा और सामाजिक दृष्टि से हेय बना कर रखा और इसे लेकर उनके मन में असन्तोष रहा है जो वाणिज्यिक अग्रता के दौर में यदा कदा विद्रोह बन कर उभरा, यद्पि उसे दबा दिया गया। ऋग्वेद में त्वष्टा के पुत्र, ज्ञान में चतुरानन ब्रह्मा से कुछ ही नीचे, त्रिशीर्ष और षडक्ष विश्वरूपा के वध को और समुद्रमंथन के लाभ में उचित भाग की मांग के प्रतीकांकन की तरह मैं ऐसे ही विद्रोह से जोड़ कर देखता हूं और त्वष्टा द्वारा इन्द्र से बदला लेने के लिए विषाक्त सोम पिला कर विषूची का शिकार बनाने और दूसरी मे राहु केतु चन्द्र और सूर्य ग्रास में भी बदले की कार्रवाई के प्रूतीकांकन के रूप में देखा जा सकता है।

पर यह वैदिक काल में इसलिए संभव था कि वैदिक कारीगर बाजार के लिए माल बनाता था (जरतीभि: ओषधीभि: पर्णेभि: शकुनानां। कार्मारो अशमभि द्युभि: हिरण्यवन्तं इच्छति )और इसलिए उसकी गुणवत्ता, प्रयोग, उत्पादन की मात्रा सभी का व्यापार पर प्रभाव पड़ता था और इसलिए जैसा ऋभुओं और अश्विनीकुमारों के प्रति व्यवहार और सोमपान के उनके अधिकार से प्रकट है, उनका आदर भी था और आय भी अधिक थी परन्तु उस प्राकृतिक प्रकोप के बाद जो कई शताब्दियों तक चला, और जिसमें भारत की प्रथम नगर सभ्यता के अधिकाश लक्षण प्रभावित हुए, गुणवत्ता नष्ट हो गई, सामाजिक उथल-पुथल मच गई, कृषि एक मात्र संबल रह गई और मौसम की अनिश्चितता के कारण उसका भी बुरा हाल था, शूद्रों या उत्पादकों की आर्थिक और सामाजिक अवस्था में भारी गिरावट आई जिसे संभलने में हजार एक साल का समय लग गया फिर भी पुराने दिन नहीं लौटे।

इस दौर में सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि इस अराजक सी स्थिति में उत्पादन का पुराना प्रबन्ध प्रभावित हुआ। भू संपदा पर क्षत्रियों ने अधिकार कर लिया, वाणिज्य देसी सीमा में सिमट गया। समुद्र यात्रा से घबराहट का हाल यह कि उस पर रोक सी लग गई, स्थल मार्ग से भी अपने सुरक्षित दायरे से बाहर जाने पर लोगों का धर्म नष्ट होने लगा। इस दहशत भरी कूपमंडूकता से अर्थव्यवस्था से लेकर सामाजिक संबंध तक सभी प्रभावित हुए । यह भारतीय सामन्ती व्यवस्था का दौर है जिससे मुक्ति पूंजीवादी विकास ही दे सकता है जो आज भी प्राथमिक स्तर का है इसलिए सामन्ती मूल्यों और बाजार सृजित उपभोक्तावादी घोल के दौर से गुजरते हुए हम कोई काम सलीके से नहीं कर पा रहे हैं। सोचना तक।

परन्तु हम जिस ऐतिहासिक दौर की बात कर आए हैं उसमें शूद्रों की दशा कभी उतनी बुरी नहीं थी जितनी कंपनी शासन के बाद हुई । शूद्रों के पास जो भी रोजगार थे वे बल प्रयोग से बन्द कर दिए गए। बेकारी के दिन और कृषि पर बढ़ती निर्भरता ने उनकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक दशा को और भी दयनीय बनाया, अन्यथा दूसरों के लिए कुंए और पोखरे खोदने वाला अपने पानी का अलग इंतजाम तो कर ही सकता था। ऐसी शिकायतें कवियों से लेकर उपदेशकों तक किसी के माध्यम से मध्यकाल तक सुनने में नहीं आती, पर कंपनी के कुचक्र के बाद जीने मरने के बीच के बफरलैंड में जिन्दगी गुजारनेवालों को अपने लिए श्रम करने के अवसर और साहस से भी वंचित कर दिया था। इसका एक नया पहलू मध्यकाल में शहरीकरण के नए खाके के अस्तित्व में आने के बाद भंगी प्रथा के कारण आया जो पहले मृत जानवरों को बस्ती से हटाने के सीमित और सह्य कारोबार तक सिमटा हुआ था।

अब हम इस समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में रख कर समझ सकते हैं। गाधी का ग्रामोद्योग, पेशीय बल का लघु यन्त्रों को चलाने और दक्षता का आधार रखने की योजना हमारी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का सबसे उत्तम समाधान था। हम उस अवसर को खो चुके हैं। दूसरा पर अधूरा समाधान है औद्योगिक क्रान्ति जो पूंजीवाद की जकड़ में होने के कारण दुर्गति का कारण भी बन सकती है, पर इसकी विफलता और इससे पैदा हुई तकनीकी दक्षता के योग से गांधीवादी साम्यवाद इसका सही समाधान होगा यह मेरा विश्वास है क्योंकि सामन्ती सोच के भीतर सामाजिक समता का शोर तो मचाया जा सकता है पर यह सुविधाओं के लिए हंगामे और घटिया राजनीति के लिए नारेबाजी से आगे इसलिए नहीं बढ़ सकता कि अपने को दलित बनाए रखना मुखर लोगों को इससे मुक्ति से अधिक लाभकर प्रतीत हो सकता है।

Post – 2018-03-04

नमो वेधाय शूद्राय सहस्र क्रतवे नम:

भारतीय समाजशास्त्र का खोखलापन इस बात से ही उजागर है कि भारतीयों सहित दुनिया के भारतविदों को शूद्र शब्द का मतलब तक पता नहीं, इसलिए इससे परिचित कराना जरूरी है। शूद्र का अर्थ होता है:

१. जो ब्राहमण, क्षत्रिय या वैश्य नहीं है, वह शूद्र है। कलकत्ता हाइकोर्ट ने एक मुकदमे में माना कि कायस्थ, जो हिन्दू समाज के सबसे शिक्षित (पुरुषों की साक्षरता १००%, महिलाएं भी सर्वाधिक शिक्षित, जिस कसौटी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कोई बराबरी पर नहीं आएगा), सबसे खुले दिमाग और सेकुलर समझ के होते हुए भी इसलिए शूद्र हैं क्योंकि वे इन तीन में नहीं आते। इसी कसौटी पर चूकने के कारण दक्षिण के वे राजा भी शूद्र थे जिन्होंने उत्तर भारत से ब्राह्मणों को अपने यहां आदर सहित बुलाया था और जो मानते थे कि जैसा कि उनके राजपंडित बताते हैं, वे सचमुच शूद्र हैं। जब तक ये उनके आश्रित थे इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वे शूद्र थे या क्षत्रिय, थे तो दोनों स्थितियों में ब्राह्मणों से नीचे ही।

२. प्राचीन काल में जब जमीन का लेखा रखना आरंभ हुआ तो जिन शिक्षित व्यक्तियों को लेखपाल (लिपिक) के पद पर नियुक्त किया गया वे उन्हीं वर्णों के हो सकते थे जिनको शिक्षा का अधिकार था। उच्च सार्वजनिक पदों पर नियुक्त (कार्यस्थ) किया जाता रहा वे भी इन्हीं वर्णों के होसकते थे। एक बार प्रशासनिक पदों पर नियुक्त होने के बाद उनका शादी व्याह भी अपने ही दायरे में होने लगा। विवाह अपने वर्ण में ही करना था इसलिए एक वर्ण के सभी का लगता है समान उपनाम हो गया और वे उसी में रिश्ते नाते करते रहे हैं। आज वे स्वयं भी भूल चुके हैं कि किस उपनाम के कायस्थ मूलत:किस वर्ण के हैं, और संभवत: अपने ही उपनाम में रिश्ते नाते के पीछे यह कारण हो सकता है, इसका भी उन्हें ध्यान न हो। हमारे प्रयोजन के लिए शूद्र का अर्थ हुआ राजकाज से जुड़ा अमला वर्ग।

३. आविष्कारक ((पहिया, रथ, गाड़ी, नौका, हल आदि का आविष्कार शूद्रों ने किया), वास्तुकार या आर्किटेक्ट (स्थपति या थवई), धातुविद या मेटलर्जिस्ट और टूलमेकर (लोहार, सोनार), भूविज्ञानी, चिकित्सक और शल्यचिकित्सक, पशुचिकित्सक, नर्तक, नाटककार (नट), वनस्पतिविज्ञानी, जीवविज्ञानी, यान्रिक या इजीनियर, तकनीशियन, धातुर्कमी (ठठेरा, कंसल), तक्षणकर्मी (जिसमें नौनिर्माण लेकर काष्ठशिल्प कई कोटियां आती हैं) मूर्तिकार, भांडनिर्माता, नौचालक, वासोवाय या बुनकर, रंगसाज, तेली,चर्मकार, धरिकार, पथरी या पत्थर के पात्र बनाने वाले आदि विशेषज्ञता के सभी क्षेत्रों के लोग।

४. पशुपालन से जुड़े जन गोपाल, महिपाल, अजपाल, अविपाल।

५. शारीरिक श्रम या स्वल्प निपुणता के काम भारिक या कहांर, नाई, बारी/बरेल ( पत्ते के पात्र बनाने वाले), रजक धोबी और कृषि मजदूर, आदि ।

५. पक्षियों का शिकार, मृत पशुओं के निपटान, और वधिक (मृत्युदंड को क्रियान्वित करने वाले ), मांसविक्रयी, मदिरा और ताडी के कारोबारी, जिनको अस्पृश्य माना जाता था। बुद्धधर्म के प्रभाव के बाद इनके सामाजिक स्तर में और अधिक गिरावट आई। इनके साथ बहुत क्रूरता का व्यवहार किया जाता रहा। अकेला इन्हें दलित कहा जा सकता है।

शूद्र दुनिया को चलाते रहे हैं, जब कि संपत्ति पर अधिकार करके उनको काम पर लगाने वाले उनका ही उपयोग करके, संपदा के स्रोतों पर अपना अधकार भी बनाए रखते रहे हैं, और स्वयं उनका भी नियन्त्रण करते रहे हैं, क्योंकि उनमें पहल का अभाव रहा है जिसके होते ही वे स्वयं कोई न कोई नया उपक्रम करके संपत्तिवाले हो सकते थे। कहें इसके बल पर वे संपदा के स्रोतों और उत्पादन के साधनों (जिसमें यन्त्र से दोनों के स्वामी बने रहे हैं। अपने इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए वे नैतिकता, न्यायव्यवस्था, दंडविधान, सैन्यबल, धार्मिक विश्वास सभी का प्रयोग करते रहे है, जिससे मुक्त वे लोग उस अनुपात में रहे हैं जिस अनुपात में अपनी जीविका के लिए उन पर निर्भर नहीं रहे है।

संपत्ति संग्रह करने वालों को, संपत्ति पर नियन्त्रण करने वालों को हम इसके लिए दोष नहीं दे सकते, क्योंकि यह मानव स्वभाव है। निजी संपत्ति के विकास के बाद से व्यक्ति अपने परिवार में भी संपत्ति पर नियन्त्रण अपने हाथ में रखने के प्रयत्न में रहता है, और मनोवैज्ञानिक रूप से पूरे परिवार पर उसका आदेश चलता है जिस के नियंत्रण में संपदा होती है या जो कमाऊ होता है। पितृभक्ति की आचारसंहिता का एक पक्ष संपत्ति पर मरने के समय तक पिता का अधिकार होता था (ऋ. १.११६.२)/ है। हूणों और तातारों में जिनकी जीविका लूट पाट पर चलती थी पिता (बूढ़ों) से अधिक आदर और अधिकार युवा पुत्र का होता है और उस मूल्यव्यवस्था में पले होने के कारण मुगलों में जवान होते ही पुत्र सत्ता हथियाने के लिए विद्रोह पर उतारू हो जाते थे।

समानता के अधिकार की अवधारणा नई है, किंचित अप्राकृतिक है, क्योंकि पाशविक अवस्था से आगे इसका निर्वाह आज तक किसी समाज में नहीं हुआ और उसमें भी समाज पर भार बन चुका व्यक्ति स्वत: चुपचाप अलग हो जाया करता था। परन्तु कृत्रिम या मानव निर्मित होने के कारण यह मानव सभ्यता की उपलब्धि है। सभ्यता प्रकृति का अनुगमन नहीं उसके नियमों को जानकर, उस पर विजय है। पर इसकी सम्यक चेतना विकसित किए बिना बल प्रयोग से इसे व्यवहार्य नहीं बनाया जा सकता । जाहिर है बल प्रयोग से दूसरों को समानता के लिए बाध्य करने वाला दूसरों के समान नहीं हो सकता। वह अधिक क्रूर भी हो सकता है। सत्ता पर अधिकार करके साम्यवाद के लिए प्रयत्नशील व्यवस्थाओं में आरंभिक त्वरा के बाद जीवनयापन की अल्पतम सुविधाओं की सुनिश्चितता के कारण पहल का अभाव और अपेक्षित परिणाम के लिए बढ़ता दबाव इनकी आन्तरिक विफलता का प्रधान कारण रहा है।

परन्तु यहां हम अपने विषय से कुछ भटक गए हैं, या जिस चरण पर चर्चा अधूरी रह गई थी उससे कुछ आगे बढ़ आए हैं।

हमें यह स्वीकार करना होगा (१) कि ‘शूद्रों’ या संपदा से वंचित पर समस्त कार्यभार संभालने वालों का अपने ही समाज की व्यवस्था पर अधिकार नहीं रहा है, और जिनके हाथ में यह व्यवस्था रही है उन्होंने इनको आर्थिक दृष्टि से घाटे में रखा और सामाजिक दृष्टि से हेय बना कर रखा और इसे लेकर उनके मन में असन्तोष रहा है जो वाणिज्यिक अग्रता के दौर में यदा कदा विद्रोह बन कर उभरा, यद्पि उसे दबा दिया गया। ऋग्वेद में त्वष्टा के पुत्र, ज्ञान में चतुरानन ब्रह्मा से कुछ ही नीचे, त्रिशीर्ष और षडक्ष विश्वरूपा के वध को और समुद्रमंथन के लाभ में उचित भाग की मांग के प्रतीकांकन की तरह मैं ऐसे ही विद्रोह से जोड़ कर देखता हूं और त्वष्टा द्वारा इन्द्र से बदला लेने के लिए विषाक्त सोम पिला कर विषूची का शिकार बनाने और दूसरी मे राहु केतु चन्द्र और सूर्य ग्रास में भी बदले की कार्रवाई के प्रूतीकांकन के रूप में देखा जा सकता है।

पर यह वैदिक काल में इसलिए संभव था कि वैदिक कारीगर बाजार के लिए माल बनाता था (जरतीभि: ओषधीभि: पर्णेभि: शकुनानां। कार्मारो अशमभि द्युभि: हिरण्यवन्तं इच्छति )और इसलिए उसकी गुणवत्ता, प्रयोग, उत्पादन की मात्रा सभी का व्यापार पर प्रभाव पड़ता था और इसलिए जैसा ऋभुओं और अश्विनीकुमारों के प्रति व्यवहार और सोमपान के उनके अधिकार से प्रकट है, उनका आदर भी था और आय भी अधिक थी परन्तु उस प्राकृतिक प्रकोप के बाद जो कई शताब्दियों तक चला, और जिसमें भारत की प्रथम नगर सभ्यता के अधिकाश लक्षण प्रभावित हुए, गुणवत्ता नष्ट हो गई, सामाजिक उथल-पुथल मच गई, कृषि एक मात्र संबल रह गई और मौसम की अनिश्चितता के कारण उसका भी बुरा हाल था, शूद्रों या उत्पादकों की आर्थिक और सामाजिक अवस्था में भारी गिरावट आई जिसे संभलने में हजार एक साल का समय लग गया फिर भी पुराने दिन नहीं लौटे।

इस दौर में सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि इस अराजक सी स्थिति में उत्पादन का पुराना प्रबन्ध प्रभावित हुआ। भू संपदा पर क्षत्रियों ने अधिकार कर लिया, वाणिज्य देसी सीमा में सिमट गया। समुद्र यात्रा से घबराहट का हाल यह कि उस पर रोक सी लग गई, स्थल मार्ग से भी अपने सुरक्षित दायरे से बाहर जाने पर लोगों का धर्म नष्ट होने लगा। इस दहशत भरी कूपमंडूकता से अर्थव्यवस्था से लेकर सामाजिक संबंध तक सभी प्रभावित हुए । यह भारतीय सामन्ती व्यवस्था का दौर है जिससे मुक्ति पूंजीवादी विकास ही दे सकता है जो आज भी प्राथमिक स्तर का है इसलिए सामन्ती मूल्यों और बाजार सृजित उपभोक्तावादी घोल के दौर से गुजरते हुए हम कोई काम सलीके से नहीं कर पा रहे हैं। सोचना तक।

परन्तु हम जिस ऐतिहासिक दौर की बात कर आए हैं उसमें शूद्रों की दशा कभी उतनी बुरी नहीं थी जितनी कंपनी शासन के बाद हुई । शूद्रों के पास जो भी रोजगार थे वे बल प्रयोग से बन्द कर दिए गए। बेकारी के दिन और कृषि पर बढ़ती निर्भरता ने उनकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक दशा को और भी दयनीय बनाया, अन्यथा दूसरों के लिए कुंए और पोखरे खोदने वाला अपने पानी का अलग इंतजाम तो कर ही सकता था। ऐसी शिकायतें कवियों से लेकर उपदेशकों तक किसी के माध्यम से मध्यकाल तक सुनने में नहीं आती, पर कंपनी के कुचक्र के बाद जीने मरने के बीच के बफरलैंड में जिन्दगी गुजारनेवालों को अपने लिए श्रम करने के अवसर और साहस से भी वंचित कर दिया था। इसका एक नया पहलू मध्यकाल में शहरीकरण के नए खाके के अस्तित्व में आने के बाद भंगी प्रथा के कारण आया जो पहले मृत जानवरों को बस्ती से हटाने के सीमित और सह्य कारोबार तक सिमटा हुआ था।

अब हम इस समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में रख कर समझ सकते हैं। गाधी का ग्रामोद्योग, पेशीय बल का लघु यन्त्रों को चलाने और दक्षता का आधार रखने की योजना हमारी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का सबसे उत्तम समाधान था। हम उस अवसर को खो चुके हैं। दूसरा पर अधूरा समाधान है औद्योगिक क्रान्ति जो पूंजीवाद की जकड़ में होने के कारण दुर्गति का कारण भी बन सकती है, पर इसकी विफलता और इससे पैदा हुई तकनीकी दक्षता के योग से गांधीवादी साम्यवाद इसका सही समाधान होगा यह मेरा विश्वास है क्योंकि सामन्ती सोच के भीतर सामाजिक समता का शोर तो मचाया जा सकता है पर यह सुविधाओं के लिए हंगामे और घटिया राजनीति के लिए नारेबाजी से आगे इसलिए नहीं बढ़ सकता कि अपने को दलित बनाए रखना मुखर लोगों को इससे मुक्ति से अधिक लाभकर प्रतीत हो सकता है।

Post – 2018-03-04

नमो वेधाय शूद्राय सहस्र क्रतवे नम:

भारतीय समाजशास्त्र का खोखलापन इस बात से ही उजागर है कि भारतीयों सहित दुनिया के भारतविदों को शूद्र शब्द का मतलब तक पता नहीं, इसलिए इससे परिचित कराना जरूरी है। शूद्र का अर्थ होता है:

१. जो ब्राहमण, क्षत्रिय या वैश्य नहीं है, वह शूद्र है। कलकत्ता हाइकोर्ट ने एक मुकदमे में माना कि कायस्थ, जो हिन्दू समाज के सबसे शिक्षित (पुरुषों की साक्षरता १००%, महिलाएं भी सर्वाधिक शिक्षित, जिस कसौटी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कोई बराबरी पर नहीं आएगा), सबसे खुले दिमाग और सेकुलर समझ के होते हुए भी इसलिए शूद्र हैं क्योंकि वे इन तीन में नहीं आते। इसी कसौटी पर चूकने के कारण दक्षिण के वे राजा भी शूद्र थे जिन्होंने उत्तर भारत से ब्राह्मणों को अपने यहां आदर सहित बुलाया था और जो मानते थे कि जैसा कि उनके राजपंडित बताते हैं, वे सचमुच शूद्र हैं। जब तक ये उनके आश्रित थे इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वे शूद्र थे या क्षत्रिय, थे तो दोनों स्थितियों में ब्राह्मणों से नीचे ही।

२. प्राचीन काल में जब जमीन का लेखा रखना आरंभ हुआ तो जिन शिक्षित व्यक्तियों को लेखपाल (लिपिक) के पद पर नियुक्त किया गया वे उन्हीं वर्णों के हो सकते थे जिनको शिक्षा का अधिकार था। उच्च सार्वजनिक पदों पर नियुक्त (कार्यस्थ) किया जाता रहा वे भी इन्हीं वर्णों के होसकते थे। एक बार प्रशासनिक पदों पर नियुक्त होने के बाद उनका शादी व्याह भी अपने ही दायरे में होने लगा। विवाह अपने वर्ण में ही करना था इसलिए एक वर्ण के सभी का लगता है समान उपनाम हो गया और वे उसी में रिश्ते नाते करते रहे हैं। आज वे स्वयं भी भूल चुके हैं कि किस उपनाम के कायस्थ मूलत:किस वर्ण के हैं, और संभवत: अपने ही उपनाम में रिश्ते नाते के पीछे यह कारण हो सकता है, इसका भी उन्हें ध्यान न हो। हमारे प्रयोजन के लिए शूद्र का अर्थ हुआ राजकाज से जुड़ा अमला वर्ग।

३. आविष्कारक ((पहिया, रथ, गाड़ी, नौका, हल आदि का आविष्कार शूद्रों ने किया), वास्तुकार या आर्किटेक्ट (स्थपति या थवई), धातुविद या मेटलर्जिस्ट और टूलमेकर (लोहार, सोनार), भूविज्ञानी, चिकित्सक और शल्यचिकित्सक, पशुचिकित्सक, नर्तक, नाटककार (नट), वनस्पतिविज्ञानी, जीवविज्ञानी, यान्रिक या इजीनियर, तकनीशियन, धातुर्कमी (ठठेरा, कंसल), तक्षणकर्मी (जिसमें नौनिर्माण लेकर काष्ठशिल्प कई कोटियां आती हैं) मूर्तिकार, भांडनिर्माता, नौचालक, वासोवाय या बुनकर, रंगसाज, तेली,चर्मकार, धरिकार, पथरी या पत्थर के पात्र बनाने वाले आदि विशेषज्ञता के सभी क्षेत्रों के लोग।

४. पशुपालन से जुड़े जन गोपाल, महिपाल, अजपाल, अविपाल।

५. शारीरिक श्रम या स्वल्प निपुणता के काम भारिक या कहांर, नाई, बारी/बरेल ( पत्ते के पात्र बनाने वाले), रजक धोबी और कृषि मजदूर, आदि ।

५. पक्षियों का शिकार, मृत पशुओं के निपटान, और वधिक (मृत्युदंड को क्रियान्वित करने वाले ), मांसविक्रयी, मदिरा और ताडी के कारोबारी, जिनको अस्पृश्य माना जाता था। बुद्धधर्म के प्रभाव के बाद इनके सामाजिक स्तर में और अधिक गिरावट आई। इनके साथ बहुत क्रूरता का व्यवहार किया जाता रहा। अकेला इन्हें दलित कहा जा सकता है।

शूद्र दुनिया को चलाते रहे हैं, जब कि संपत्ति पर अधिकार करके उनको काम पर लगाने वाले उनका ही उपयोग करके, संपदा के स्रोतों पर अपना अधकार भी बनाए रखते रहे हैं, और स्वयं उनका भी नियन्त्रण करते रहे हैं, क्योंकि उनमें पहल का अभाव रहा है जिसके होते ही वे स्वयं कोई न कोई नया उपक्रम करके संपत्तिवाले हो सकते थे। कहें इसके बल पर वे संपदा के स्रोतों और उत्पादन के साधनों (जिसमें यन्त्र से दोनों के स्वामी बने रहे हैं। अपने इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए वे नैतिकता, न्यायव्यवस्था, दंडविधान, सैन्यबल, धार्मिक विश्वास सभी का प्रयोग करते रहे है, जिससे मुक्त वे लोग उस अनुपात में रहे हैं जिस अनुपात में अपनी जीविका के लिए उन पर निर्भर नहीं रहे है।

संपत्ति संग्रह करने वालों को, संपत्ति पर नियन्त्रण करने वालों को हम इसके लिए दोष नहीं दे सकते, क्योंकि यह मानव स्वभाव है। निजी संपत्ति के विकास के बाद से व्यक्ति अपने परिवार में भी संपत्ति पर नियन्त्रण अपने हाथ में रखने के प्रयत्न में रहता है, और मनोवैज्ञानिक रूप से पूरे परिवार पर उसका आदेश चलता है जिस के नियंत्रण में संपदा होती है या जो कमाऊ होता है। पितृभक्ति की आचारसंहिता का एक पक्ष संपत्ति पर मरने के समय तक पिता का अधिकार होता था (ऋ. १.११६.२)/ है। हूणों और तातारों में जिनकी जीविका लूट पाट पर चलती थी पिता (बूढ़ों) से अधिक आदर और अधिकार युवा पुत्र का होता है और उस मूल्यव्यवस्था में पले होने के कारण मुगलों में जवान होते ही पुत्र सत्ता हथियाने के लिए विद्रोह पर उतारू हो जाते थे।

समानता के अधिकार की अवधारणा नई है, किंचित अप्राकृतिक है, क्योंकि पाशविक अवस्था से आगे इसका निर्वाह आज तक किसी समाज में नहीं हुआ और उसमें भी समाज पर भार बन चुका व्यक्ति स्वत: चुपचाप अलग हो जाया करता था। परन्तु कृत्रिम या मानव निर्मित होने के कारण यह मानव सभ्यता की उपलब्धि है। सभ्यता प्रकृति का अनुगमन नहीं उसके नियमों को जानकर, उस पर विजय है। पर इसकी सम्यक चेतना विकसित किए बिना बल प्रयोग से इसे व्यवहार्य नहीं बनाया जा सकता । जाहिर है बल प्रयोग से दूसरों को समानता के लिए बाध्य करने वाला दूसरों के समान नहीं हो सकता। वह अधिक क्रूर भी हो सकता है। सत्ता पर अधिकार करके साम्यवाद के लिए प्रयत्नशील व्यवस्थाओं में आरंभिक त्वरा के बाद जीवनयापन की अल्पतम सुविधाओं की सुनिश्चितता के कारण पहल का अभाव और अपेक्षित परिणाम के लिए बढ़ता दबाव इनकी आन्तरिक विफलता का प्रधान कारण रहा है।

परन्तु यहां हम अपने विषय से कुछ भटक गए हैं, या जिस चरण पर चर्चा अधूरी रह गई थी उससे कुछ आगे बढ़ आए हैं।

हमें यह स्वीकार करना होगा (१) कि ‘शूद्रों’ या संपदा से वंचित पर समस्त कार्यभार संभालने वालों का अपने ही समाज की व्यवस्था पर अधिकार नहीं रहा है, और जिनके हाथ में यह व्यवस्था रही है उन्होंने इनको आर्थिक दृष्टि से घाटे में रखा और सामाजिक दृष्टि से हेय बना कर रखा और इसे लेकर उनके मन में असन्तोष रहा है जो वाणिज्यिक अग्रता के दौर में यदा कदा विद्रोह बन कर उभरा, यद्पि उसे दबा दिया गया। ऋग्वेद में त्वष्टा के पुत्र, ज्ञान में चतुरानन ब्रह्मा से कुछ ही नीचे, त्रिशीर्ष और षडक्ष विश्वरूपा के वध को और समुद्रमंथन के लाभ में उचित भाग की मांग के प्रतीकांकन की तरह मैं ऐसे ही विद्रोह से जोड़ कर देखता हूं और त्वष्टा द्वारा इन्द्र से बदला लेने के लिए विषाक्त सोम पिला कर विषूची का शिकार बनाने और दूसरी मे राहु केतु चन्द्र और सूर्य ग्रास में भी बदले की कार्रवाई के प्रूतीकांकन के रूप में देखा जा सकता है।

पर यह वैदिक काल में इसलिए संभव था कि वैदिक कारीगर बाजार के लिए माल बनाता था (जरतीभि: ओषधीभि: पर्णेभि: शकुनानां। कार्मारो अशमभि द्युभि: हिरण्यवन्तं इच्छति )और इसलिए उसकी गुणवत्ता, प्रयोग, उत्पादन की मात्रा सभी का व्यापार पर प्रभाव पड़ता था और इसलिए जैसा ऋभुओं और अश्विनीकुमारों के प्रति व्यवहार और सोमपान के उनके अधिकार से प्रकट है, उनका आदर भी था और आय भी अधिक थी परन्तु उस प्राकृतिक प्रकोप के बाद जो कई शताब्दियों तक चला, और जिसमें भारत की प्रथम नगर सभ्यता के अधिकाश लक्षण प्रभावित हुए, गुणवत्ता नष्ट हो गई, सामाजिक उथल-पुथल मच गई, कृषि एक मात्र संबल रह गई और मौसम की अनिश्चितता के कारण उसका भी बुरा हाल था, शूद्रों या उत्पादकों की आर्थिक और सामाजिक अवस्था में भारी गिरावट आई जिसे संभलने में हजार एक साल का समय लग गया फिर भी पुराने दिन नहीं लौटे।

इस दौर में सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि इस अराजक सी स्थिति में उत्पादन का पुराना प्रबन्ध प्रभावित हुआ। भू संपदा पर क्षत्रियों ने अधिकार कर लिया, वाणिज्य देसी सीमा में सिमट गया। समुद्र यात्रा से घबराहट का हाल यह कि उस पर रोक सी लग गई, स्थल मार्ग से भी अपने सुरक्षित दायरे से बाहर जाने पर लोगों का धर्म नष्ट होने लगा। इस दहशत भरी कूपमंडूकता से अर्थव्यवस्था से लेकर सामाजिक संबंध तक सभी प्रभावित हुए । यह भारतीय सामन्ती व्यवस्था का दौर है जिससे मुक्ति पूंजीवादी विकास ही दे सकता है जो आज भी प्राथमिक स्तर का है इसलिए सामन्ती मूल्यों और बाजार सृजित उपभोक्तावादी घोल के दौर से गुजरते हुए हम कोई काम सलीके से नहीं कर पा रहे हैं। सोचना तक।

परन्तु हम जिस ऐतिहासिक दौर की बात कर आए हैं उसमें शूद्रों की दशा कभी उतनी बुरी नहीं थी जितनी कंपनी शासन के बाद हुई । शूद्रों के पास जो भी रोजगार थे वे बल प्रयोग से बन्द कर दिए गए। बेकारी के दिन और कृषि पर बढ़ती निर्भरता ने उनकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक दशा को और भी दयनीय बनाया, अन्यथा दूसरों के लिए कुंए और पोखरे खोदने वाला अपने पानी का अलग इंतजाम तो कर ही सकता था। ऐसी शिकायतें कवियों से लेकर उपदेशकों तक किसी के माध्यम से मध्यकाल तक सुनने में नहीं आती, पर कंपनी के कुचक्र के बाद जीने मरने के बीच के बफरलैंड में जिन्दगी गुजारनेवालों को अपने लिए श्रम करने के अवसर और साहस से भी वंचित कर दिया था। इसका एक नया पहलू मध्यकाल में शहरीकरण के नए खाके के अस्तित्व में आने के बाद भंगी प्रथा के कारण आया जो पहले मृत जानवरों को बस्ती से हटाने के सीमित और सह्य कारोबार तक सिमटा हुआ था।

अब हम इस समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में रख कर समझ सकते हैं। गाधी का ग्रामोद्योग, पेशीय बल का लघु यन्त्रों को चलाने और दक्षता का आधार रखने की योजना हमारी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का सबसे उत्तम समाधान था। हम उस अवसर को खो चुके हैं। दूसरा पर अधूरा समाधान है औद्योगिक क्रान्ति जो पूंजीवाद की जकड़ में होने के कारण दुर्गति का कारण भी बन सकती है, पर इसकी विफलता और इससे पैदा हुई तकनीकी दक्षता के योग से गांधीवादी साम्यवाद इसका सही समाधान होगा यह मेरा विश्वास है क्योंकि सामन्ती सोच के भीतर सामाजिक समता का शोर तो मचाया जा सकता है पर यह सुविधाओं के लिए हंगामे और घटिया राजनीति के लिए नारेबाजी से आगे इसलिए नहीं बढ़ सकता कि अपने को दलित बनाए रखना मुखर लोगों को इससे मुक्ति से अधिक लाभकर प्रतीत हो सकता है।

Post – 2018-03-02

#भारतीय #समाजव्यवस्था और इतिहास

पुरुष सूक्त पर कोई चर्चा तब तक अधूरी है जब तक हम दो सवालों का सामना न करें। पहला क्या यह न्यायोचित थी? दूसरा, क्या यह न्यायोचित है? इन सवालों से जुड़े दो सवाल और है। क्या जो न्यायोचित था, यदि था तो, क्या उसे आज के जीवन मूल्यों के अनुसार न्यायोचित कहा जा सकता है? दूसरा आज जो अन्यायपरक लगता है उससे मुक्ति का कोई उपाय है? एक अन्य सवाल इसी से पैदा होता है। क्या आज जो स्थिति है वैसी ही सदैव रही है, और इतिहास की समझ कितनी दूर तक इसका निराकरण करने में हमारा सहायक हो सकती है ?

यूं तो सत्य और न्याय अपेक्षाएं हैं जिनकी कसौटी पर कोई पूरा नहीं उतरता । इसका सबसे विस्मयकारी उदाहरण न्याय के विधान और न्याय की संस्थाएं हैं । इनमें नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। साधन संपन्न लोग बहुत कम दंडित होते हैं, क्योंकि वे प्रभावशाली वकीलों के माध्यम से न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर लेते हैं, जबकि अपनी आबादीकी तुलना में सबसे अधिक और सबसे बड़े पैमाने पर अपराध वे ही करते हैं। अत: आज भी दंड भोगने वाले साधनहीन लोगों का अनुपात उनकी तुलनात्क जनसंख्या से कई गुना अधिक होती है। जहां न्यायाधीश अप्रभावित रहता और स्वविवेक से नियमों का सम्मान करते हुए फैसले करता हैं वहां वह कहता है विधि के अनुसार निर्णय कर रहा है, न्याय नहीं कर रहा है। यदि विधि व्यवस्था में ही गड़बड़ है, वह निजी संपत्ति रखने का भी अधिकार देती, कई तरह की शिक्षाप्रणालियों की बात करती है, अल्पजनलभ्य विदेशी भाषा को वरीयता देती है, और साथ ही अवसर की समानता की बात भी करती है, एक ओर धर्म, जाति और लिंग निरपेक्ष समानता का सपना दिखाती है दूसरी ओर, जिन भी बाध्यताओं के कारण हो धर्म और जाति आधारित रियायतें देते हुए ऐसी व्यवस्थाओं को ढकोसला बना देती है, उसमें किसी को अपना न्यायेचित अधिकार शासन, व्ययवस्था, विधि और विधान से मिल सकता है?

लोकतन्त्र गणतन्त्र के बाद अकेली ऐसी व्यवस्था है जिसमें शासित ही शासक हो सकता है पर लोकतांत्रिक गणतन्त्र (democratic republic) फरेब है। गणतन्त्र गणव्यवस्था के बाहर, और बड़े पैमाने पर और बहुमिश्र समाज में संभव ही नही, अत: लोकतंत्र अब तक की शासन पद्धतियों में सबसे अच्छी व्यवस्था है, पर इसमें जितने तरह की और जितनी भ्रष्टता पाई जाती है वह किसी अन्य तंत्रमें संभव नहीं।

हम जिस बात पर बल देना चाहते हैं वह यह कि दुनिया में कभी कोई ऐसी व्यवस्था हुई ही नहीं जिसे न्यायोचित कह सकें। अन्तर केवल यह है कि एक व्यवस्था न्यायोचित होने का दावा करती है, न्याय भले न दे पाए, पर अपने इस दावे के कारण हमें अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का अवसर देती है और दूसरी न्याय की मांग को असंभव बना देती है। कहें एक तर्क और औचित्य पर आधारित रही है और तर्कसंगति के कारण विज्ञानपूर्व अवस्थाओं में भी वैज्ञानिक कही जा सकती है, और दूसरी वे जो शक्ति पर आधारित रही हैं इसलिए जिनको शक्ति से ही बदला जा सकता था या शक्ति के अनुपात में ही बदला या झुकाया जा सकता था। इस दृष्टि से विचार करने पर भारतीय समाज कहां आता है?

एक दूसरी बात विज्ञान के दो चरण हैं । एक जो डार्विन से पहले का पूरा इतिहास है जिसमें आइजैक न्यूटन तक आते है। इसमें भौतिक क्रियाकलाप शुद्ध भौतिक नियमों से परिचालित होता था और मोटे तौर पर यह दूसरे जानवरों पर भी लागू होता था, परन्तु मानवीय क्रियाव्यापार में लोकोत्तर शक्ति का हस्तक्षेप था जो सर्वोपरि शासक माना जाता था और राजा से रंक तक उसके अधीन थे और उससे डरते और एक सीमा में रहते थे।

,पुरुष सूक्त में जो बात कुछ भोंड़े रूप में रखी गई है वह समाज का मान्य सत्य था, अर्थात् वर्णव्यवस्था, या समाज व्यवस्था भी ईश्वरीय विधान है यद्यपि इसे इतने इकहरे रूप में नहीं रखा जा सकता। चाहे वह गणव्यवस्था हो जिसमें मर्यादा के उल्लंघन पर व्यक्ति को गण से ( उसके अवशेष जाति से) बाहर कर दिया जाता था और उसके साथ सभी सामाजिक संबंध और संपर्क तोड़ लिए जाते थे, या वर्ण समाज जिसमें ऐसे व्यक्ति को हीन जाति का मान लिया जाता, या हीन जाति में शामिल होने को बाध्य होना पड़ता था, या किसी विशेष दक्षता वाले समुदाय के वर्ण समाज के संपर्क में आने पर एक जाति मान लिया जाता था सामाजिक हस्तक्षेप इतना स्पष्ट था कि इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था। हमारे लिए यह आशंका स्वाभाविक है, परन्तु एक ऐसे दौर में जिसमें माना जाता था पंच के मुंह से परमात्मा बोलता है, बच्चे के मुंह से परमात्मा बोलता है, यह समझा लेना आसान था, कि जो कुछ हो रहा है, सब दैवी विधान से हो रहा है।

फिर भी हमारे देश में बहुत प्राचीन काल से एक जन समाज रहा है जो देवता या ईश्वर में विश्वास नहीं करता था। इसे देवों और असुरों के बीच मुख्य भेद माना गया है परन्तु यह अतिवादी होगा क्योंकि देव समाज के अतिरिक्त असुरों के देवता – रुद्र, काली/दुर्गा, वरुण, वृषाकपि – थे, इसलिए हम इन्हें एक भिन्न विचारधारा से जुड़े लोग कह सकते हैं जो असाधारण साधनाओं और सिद्धियों का दावा करते थे पर ईश्वर या दैवी शक्ति में विश्वास नहीं करते थे । इन्हे ऋग्वेद में अदेवयून कहा गया है, उपनिषद में इनको विरोचन की परंपरा से जुड़ा मान सकते हैं जो शरीर को या भौतिक जीवन को ही अन्तिम सत्य मानता है और आत्मा-परमात्मा के चक्कर में नहीं पड़ता। बौद्ध और जैन मत भी इसी परंपरा का विकास लगते हैं। मक्खलि घोषाल और आजीवक इसी भौतिकवादी परंपरा में आते है पर ये नियतिवादी थे, जब कि चार्वाक पुनर्जनम तक में विश्वास नहीं करते थे।
खैर चिन्तन, प्रतिवाद और विरोध की एस परंपरा मुझे आदिम अवस्था से अनवरत चली आती दिखाई देती है इसलिए वैचारिक प्रतिरोध और अन्याय के विरोध के विकल्प संभव रहे हैं। पश्चिम में जो पर्यावरण ग्रीक काल में (यद्यपि उसमें भी यदि वैचारिक भिन्नता के कारण किसी को गरल पीने को बाध्य किया जाता है तो इसे सीमित बौद्धिक स्वतन्त्रता ही कहा जा सकता है, जब कि भारत में कौत्स को वेदों की कठोरतम भर्त्सना करने पर उसकी केवल निन्दा की जाती है) था उसको कुचल कर असहमति ही नहीं किसी भी माने में अनमेल विचार के लिए यातनावध करने वालों को सन्त कहा जाता रहा और अरबों के और उनके माध्यम से पूर्व के विचारों से परिचित होने के बाद ही वैचारिक सुगबुगाहट आरंभ हुई और आज अपने उस उभार पर है कि युगों पुरानी वर्जनाओं के विरुद्ध आवाज उठाई जा सकती और उसे आन्दोलन का रूप दिया तथा व्यापक सहमति जुटाई जा सकती है।

अब इसी परिदृश्य में हम अपनी समाज व्यवस्था के इतिहास को आज के सामाजिक समीकरण का मूल्यांकन करने का प्रयत्न कर सकते हैं:

सबसे पहले हम इस प्रश्न का सामना करें कि यदि #वर्ण की उत्पत्ति #बलिपशु बने यज्ञ से हुई तो, या यदि किसी को लगे कि वह तो परमेश्वर ही था ( यद्यपि उस दशा में यह समस्या पैदा होगी कि यदि एक बार बलिपशु बन कर दूसरे रूपों में रूपान्तरित हो गया फिर #परमेश्वर जैसी पृथक सत्ता तो बची नहीं, भौतिक सृष्टि ही परम सत्ता के रूप में बच रहती है) तो भी उसके चार अंगों से चार वर्ण बन गए, पर जातियां कहां से पैदा हुईं और एक ही वर्ण के भीतर ऊंच नीच का भाव कैसे पैदा हुआ। कनौजिया #ब्राह्मणों के भीतर तेरह चूल्हों की नौबत कहां से आई? क्षत्रियों के बारे में कहा जाता था कि इनकी और धान की किस्मों का अंत नहीं! फिर एक ही वर्ण के इतने उपभेद कैसे हो गए?

फिर कृषिकर्मी समाज मेंजो विभाजन कर्म आधारित था वह जन्म आधारित कैसे बन गया?

इसका सीधा जवाब है कि आरंभ में कृषिकर्मी या देव समाज में आदिम कृषि-विमुख/विरोधी समाज के लोग सम्मिलित होते रहे। यह सम्मिलित होना इस तरह का नहीं था कि मैं आज से ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्व बनना चाहता हूं, मुझे अपने वर्ण में मिला लो। कृषि के लाभों से परिचित हो जाने के बाद वे स्वयं संगठित होकर वन्य भूमि की सफाई करके खेती करने लगते थे। इसका संकेत उन्हीं कृतियों में है जिसमें यज्ञ के विरोध का हवाला है, ‘देवगण जो कुछ करते, असुर उसकी नकल करने लगते।’ यदि उल्लेख न होता तो भी ऐतिहासिक कालों तक कृषिकर्मी बन कर क्षत्रिय होने का दावा करने वाले शाक्यों, बज्जियों की गणसमाजी व्यवस्था, कृषिकर्म में सक्रिय भागीदारी के उदाहरणों से इसे आसानी से समझा जा सकता है। यह ध्यान रहे कि गोतमबुद्ध का विवाह कोलिय (क्षत्रियत्व का दावा करने कोल मूलीय) समुदाय में हुआ था। कोसंबी ने पता नहीं क्यों ब्राह्मणों के गोत्र तक ही अपने अध्ययन को सीमित रखा और इस नतीजे पर पहुंचे कि आदिम जनों के बहुत से गोत्रनाम ब्राह्मणों से मिलते हैं और एस ही आटविक समुदाय के कुछ लोग दूसरे वर्णों में शामिल हुए, जब कि कुछ दूसरे पशुपालन तक बढ़े और कुछ पिछड़े ही रह गए। यह क्रम आज भी जारी है। हम इसके विस्तार में न जाकर यह कहना चाहते हैं कि जिन लोगों में पहल, लगन और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति थी वे आगे बढ़े, भूसंपदा के स्वामी और वर्ण समाज के सदस्य बने, कहे स्वीमिवर्ग में शामिल होते रहे। जो आलस्य, वर्जना या पहल के अभाव में पिछडे रह गए उनके पिछड़ेपन के लिए क्या उनको दोष दिया जा सकता है जो आगे बढ़ गए?

एक दूसरे पहलू पर विचार करना भी जरूरी है, जिन भी पेशों में, शूद्रों में परिगणित जन लगे थे क्या उनके लिए उन्हें किसी ने बाध्य किया था? बल प्रयोग से किसी को किसी कौशल के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। प्रेरित अवश्य किया जा सकता है, परन्तु वह भी तब जब उस योग्यता या कौशल का तंत्र पर अधिकार रखने वालों को स्वयं पता हो।

इसे हम अपने उदाहरण से समझें, क्योंकि हम सभी जो नौकरी करते हैं, शूद्र हैं। हमें शिक्षा की सुविधाएं संस्थाओं के माध्यम से तन्त्र से अवश्य मिली हैं, पर पहले यह राज्य का काम न होकर धर्मतन्त्र का काम था जो शिक्षा के माध्यम से परोक्षत: सामाजिक चेतना को नियंत्रित और राजसत्ता के समानान्तर, उस पर भी हावी होने वाली धर्मसत्ता कायम करना चाहता था। राजकीय तन्त्र शिक्षा के माध्यम से अपने कल पुर्जे तैयार करना चाहता है और शिक्षा के माध्यम से अपने को अधिक से अधिक उपयोगी पुर्जा बनाने की होड़ मे रहते हैं ताकि हमें अधिक से अधिक ग्रीज और मोबील आयल मिल सके। यह तो अमला तंत्र की बात हुई। इसी तरह तकनीकी योग्यताएं बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा में उतरते हैं, उद्योगतन्त्र में अपने लिए कोना तलाशते हैं जिसमें हमारा मोल इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने नियोक्ता को किसी भी तरकीब से कितना लाभ पहुंचा पाते हैं। हमारा सीधा टकराव अपने नियोक्ता से नहीं उस पद या काम के लिए प्रयत्नशील या समकक्ष लोगों से होता हैऔर हम इस प्रतिस्पर्धा में समर्पित स्वामिभक्त और कुशलतम कार्यभारी सिद्ध होने का प्रयत्न करते हैं। जो ऐसा नहीं करते वे साधन और पहल होने पर स्वयं ऐसा उत्पादन, प्रसाधन, या सेवाएं, जैसे वितरण, आदि के तरीके निकालते हैं। जो किसी तरह की योग्यता विकसित नहीं कर पाते या इस स्तर की योग्यता नहीं अर्जित कर पाते वे शारीरिक श्रम वाली जगहें भरते हैं। इनकी सबसे बड़ी समस्या कहीं न कहीं काम पाने की होती है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति सबसे निचले स्तर का काम पाने की नहीं होती (क्योंकि वे जानते हैं अपनी योग्यता से वे इससे अधिक के पात्र न थे) अपितु बेकार रह जाना होता है।

कृषिकर्मियों द्वारा संपदा के स्रोतों पर अधिकार कर लेने के बाद सेवा, निपुणता, श्रमकार्य के बदले भरण पोषण और कुछ दक्षताओं के बाद इसके अतिरिक्त सम्मान और ख्याति की आकांक्षा में परंपरागत शूद्र उसी तरह अनुद्विग्न और समायोजित भाव से काम करते और काम होने पर सन्तुष्ट अनुभव करते थे जैसे आज के शूद्र। अन्तर केवल यह है कि वर्णव्यवस्था वाली पारिभाषिक शब्दावली में हमारी जो सही संज्ञा है उससे सबोधित किए जाने पर हम मुंह चुराने लगेंगे।
(लेख अधूरा है पर इतना लंबा हो चुका है कि इसके कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करने से पहले वर्तमान रूम में इससे कई तरह के भ्रम पैदा हो सकते हैं इसलिए अच्छा कि आप इसका शेष अंश पोस्ट होने के बाद पढ़ें।)

Post – 2018-03-02

#भारतीय #समाजव्यवस्था और इतिहास

पुरुष सूक्त पर कोई चर्चा तब तक अधूरी है जब तक हम दो सवालों का सामना न करें। पहला क्या यह न्यायोचित थी? दूसरा, क्या यह न्यायोचित है? इन सवालों से जुड़े दो सवाल और है। क्या जो न्यायोचित था, यदि था तो, क्या उसे आज के जीवन मूल्यों के अनुसार न्यायोचित कहा जा सकता है? दूसरा आज जो अन्यायपरक लगता है उससे मुक्ति का कोई उपाय है? एक अन्य सवाल इसी से पैदा होता है। क्या आज जो स्थिति है वैसी ही सदैव रही है, और इतिहास की समझ कितनी दूर तक इसका निराकरण करने में हमारा सहायक हो सकती है ?

यूं तो सत्य और न्याय अपेक्षाएं हैं जिनकी कसौटी पर कोई पूरा नहीं उतरता । इसका सबसे विस्मयकारी उदाहरण न्याय के विधान और न्याय की संस्थाएं हैं । इनमें नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। साधन संपन्न लोग बहुत कम दंडित होते हैं, क्योंकि वे प्रभावशाली वकीलों के माध्यम से न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर लेते हैं, जबकि अपनी आबादीकी तुलना में सबसे अधिक और सबसे बड़े पैमाने पर अपराध वे ही करते हैं। अत: आज भी दंड भोगने वाले साधनहीन लोगों का अनुपात उनकी तुलनात्क जनसंख्या से कई गुना अधिक होती है। जहां न्यायाधीश अप्रभावित रहता और स्वविवेक से नियमों का सम्मान करते हुए फैसले करता हैं वहां वह कहता है विधि के अनुसार निर्णय कर रहा है, न्याय नहीं कर रहा है। यदि विधि व्यवस्था में ही गड़बड़ है, वह निजी संपत्ति रखने का भी अधिकार देती, कई तरह की शिक्षाप्रणालियों की बात करती है, अल्पजनलभ्य विदेशी भाषा को वरीयता देती है, और साथ ही अवसर की समानता की बात भी करती है, एक ओर धर्म, जाति और लिंग निरपेक्ष समानता का सपना दिखाती है दूसरी ओर, जिन भी बाध्यताओं के कारण हो धर्म और जाति आधारित रियायतें देते हुए ऐसी व्यवस्थाओं को ढकोसला बना देती है, उसमें किसी को अपना न्यायेचित अधिकार शासन, व्ययवस्था, विधि और विधान से मिल सकता है?

लोकतन्त्र गणतन्त्र के बाद अकेली ऐसी व्यवस्था है जिसमें शासित ही शासक हो सकता है पर लोकतांत्रिक गणतन्त्र (democratic republic) फरेब है। गणतन्त्र गणव्यवस्था के बाहर, और बड़े पैमाने पर और बहुमिश्र समाज में संभव ही नही, अत: लोकतंत्र अब तक की शासन पद्धतियों में सबसे अच्छी व्यवस्था है, पर इसमें जितने तरह की और जितनी भ्रष्टता पाई जाती है वह किसी अन्य तंत्रमें संभव नहीं।

हम जिस बात पर बल देना चाहते हैं वह यह कि दुनिया में कभी कोई ऐसी व्यवस्था हुई ही नहीं जिसे न्यायोचित कह सकें। अन्तर केवल यह है कि एक व्यवस्था न्यायोचित होने का दावा करती है, न्याय भले न दे पाए, पर अपने इस दावे के कारण हमें अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का अवसर देती है और दूसरी न्याय की मांग को असंभव बना देती है। कहें एक तर्क और औचित्य पर आधारित रही है और तर्कसंगति के कारण विज्ञानपूर्व अवस्थाओं में भी वैज्ञानिक कही जा सकती है, और दूसरी वे जो शक्ति पर आधारित रही हैं इसलिए जिनको शक्ति से ही बदला जा सकता था या शक्ति के अनुपात में ही बदला या झुकाया जा सकता था। इस दृष्टि से विचार करने पर भारतीय समाज कहां आता है?

एक दूसरी बात विज्ञान के दो चरण हैं । एक जो डार्विन से पहले का पूरा इतिहास है जिसमें आइजैक न्यूटन तक आते है। इसमें भौतिक क्रियाकलाप शुद्ध भौतिक नियमों से परिचालित होता था और मोटे तौर पर यह दूसरे जानवरों पर भी लागू होता था, परन्तु मानवीय क्रियाव्यापार में लोकोत्तर शक्ति का हस्तक्षेप था जो सर्वोपरि शासक माना जाता था और राजा से रंक तक उसके अधीन थे और उससे डरते और एक सीमा में रहते थे।

,पुरुष सूक्त में जो बात कुछ भोंड़े रूप में रखी गई है वह समाज का मान्य सत्य था, अर्थात् वर्णव्यवस्था, या समाज व्यवस्था भी ईश्वरीय विधान है यद्यपि इसे इतने इकहरे रूप में नहीं रखा जा सकता। चाहे वह गणव्यवस्था हो जिसमें मर्यादा के उल्लंघन पर व्यक्ति को गण से ( उसके अवशेष जाति से) बाहर कर दिया जाता था और उसके साथ सभी सामाजिक संबंध और संपर्क तोड़ लिए जाते थे, या वर्ण समाज जिसमें ऐसे व्यक्ति को हीन जाति का मान लिया जाता, या हीन जाति में शामिल होने को बाध्य होना पड़ता था, या किसी विशेष दक्षता वाले समुदाय के वर्ण समाज के संपर्क में आने पर एक जाति मान लिया जाता था सामाजिक हस्तक्षेप इतना स्पष्ट था कि इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था। हमारे लिए यह आशंका स्वाभाविक है, परन्तु एक ऐसे दौर में जिसमें माना जाता था पंच के मुंह से परमात्मा बोलता है, बच्चे के मुंह से परमात्मा बोलता है, यह समझा लेना आसान था, कि जो कुछ हो रहा है, सब दैवी विधान से हो रहा है।

फिर भी हमारे देश में बहुत प्राचीन काल से एक जन समाज रहा है जो देवता या ईश्वर में विश्वास नहीं करता था। इसे देवों और असुरों के बीच मुख्य भेद माना गया है परन्तु यह अतिवादी होगा क्योंकि देव समाज के अतिरिक्त असुरों के देवता – रुद्र, काली/दुर्गा, वरुण, वृषाकपि – थे, इसलिए हम इन्हें एक भिन्न विचारधारा से जुड़े लोग कह सकते हैं जो असाधारण साधनाओं और सिद्धियों का दावा करते थे पर ईश्वर या दैवी शक्ति में विश्वास नहीं करते थे । इन्हे ऋग्वेद में अदेवयून कहा गया है, उपनिषद में इनको विरोचन की परंपरा से जुड़ा मान सकते हैं जो शरीर को या भौतिक जीवन को ही अन्तिम सत्य मानता है और आत्मा-परमात्मा के चक्कर में नहीं पड़ता। बौद्ध और जैन मत भी इसी परंपरा का विकास लगते हैं। मक्खलि घोषाल और आजीवक इसी भौतिकवादी परंपरा में आते है पर ये नियतिवादी थे, जब कि चार्वाक पुनर्जनम तक में विश्वास नहीं करते थे।
खैर चिन्तन, प्रतिवाद और विरोध की एस परंपरा मुझे आदिम अवस्था से अनवरत चली आती दिखाई देती है इसलिए वैचारिक प्रतिरोध और अन्याय के विरोध के विकल्प संभव रहे हैं। पश्चिम में जो पर्यावरण ग्रीक काल में (यद्यपि उसमें भी यदि वैचारिक भिन्नता के कारण किसी को गरल पीने को बाध्य किया जाता है तो इसे सीमित बौद्धिक स्वतन्त्रता ही कहा जा सकता है, जब कि भारत में कौत्स को वेदों की कठोरतम भर्त्सना करने पर उसकी केवल निन्दा की जाती है) था उसको कुचल कर असहमति ही नहीं किसी भी माने में अनमेल विचार के लिए यातनावध करने वालों को सन्त कहा जाता रहा और अरबों के और उनके माध्यम से पूर्व के विचारों से परिचित होने के बाद ही वैचारिक सुगबुगाहट आरंभ हुई और आज अपने उस उभार पर है कि युगों पुरानी वर्जनाओं के विरुद्ध आवाज उठाई जा सकती और उसे आन्दोलन का रूप दिया तथा व्यापक सहमति जुटाई जा सकती है।

अब इसी परिदृश्य में हम अपनी समाज व्यवस्था के इतिहास को आज के सामाजिक समीकरण का मूल्यांकन करने का प्रयत्न कर सकते हैं:

सबसे पहले हम इस प्रश्न का सामना करें कि यदि #वर्ण की उत्पत्ति #बलिपशु बने यज्ञ से हुई तो, या यदि किसी को लगे कि वह तो परमेश्वर ही था ( यद्यपि उस दशा में यह समस्या पैदा होगी कि यदि एक बार बलिपशु बन कर दूसरे रूपों में रूपान्तरित हो गया फिर #परमेश्वर जैसी पृथक सत्ता तो बची नहीं, भौतिक सृष्टि ही परम सत्ता के रूप में बच रहती है) तो भी उसके चार अंगों से चार वर्ण बन गए, पर जातियां कहां से पैदा हुईं और एक ही वर्ण के भीतर ऊंच नीच का भाव कैसे पैदा हुआ। कनौजिया #ब्राह्मणों के भीतर तेरह चूल्हों की नौबत कहां से आई? क्षत्रियों के बारे में कहा जाता था कि इनकी और धान की किस्मों का अंत नहीं! फिर एक ही वर्ण के इतने उपभेद कैसे हो गए?

फिर कृषिकर्मी समाज मेंजो विभाजन कर्म आधारित था वह जन्म आधारित कैसे बन गया?

इसका सीधा जवाब है कि आरंभ में कृषिकर्मी या देव समाज में आदिम कृषि-विमुख/विरोधी समाज के लोग सम्मिलित होते रहे। यह सम्मिलित होना इस तरह का नहीं था कि मैं आज से ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्व बनना चाहता हूं, मुझे अपने वर्ण में मिला लो। कृषि के लाभों से परिचित हो जाने के बाद वे स्वयं संगठित होकर वन्य भूमि की सफाई करके खेती करने लगते थे। इसका संकेत उन्हीं कृतियों में है जिसमें यज्ञ के विरोध का हवाला है, ‘देवगण जो कुछ करते, असुर उसकी नकल करने लगते।’ यदि उल्लेख न होता तो भी ऐतिहासिक कालों तक कृषिकर्मी बन कर क्षत्रिय होने का दावा करने वाले शाक्यों, बज्जियों की गणसमाजी व्यवस्था, कृषिकर्म में सक्रिय भागीदारी के उदाहरणों से इसे आसानी से समझा जा सकता है। यह ध्यान रहे कि गोतमबुद्ध का विवाह कोलिय (क्षत्रियत्व का दावा करने कोल मूलीय) समुदाय में हुआ था। कोसंबी ने पता नहीं क्यों ब्राह्मणों के गोत्र तक ही अपने अध्ययन को सीमित रखा और इस नतीजे पर पहुंचे कि आदिम जनों के बहुत से गोत्रनाम ब्राह्मणों से मिलते हैं और एस ही आटविक समुदाय के कुछ लोग दूसरे वर्णों में शामिल हुए, जब कि कुछ दूसरे पशुपालन तक बढ़े और कुछ पिछड़े ही रह गए। यह क्रम आज भी जारी है। हम इसके विस्तार में न जाकर यह कहना चाहते हैं कि जिन लोगों में पहल, लगन और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति थी वे आगे बढ़े, भूसंपदा के स्वामी और वर्ण समाज के सदस्य बने, कहे स्वीमिवर्ग में शामिल होते रहे। जो आलस्य, वर्जना या पहल के अभाव में पिछडे रह गए उनके पिछड़ेपन के लिए क्या उनको दोष दिया जा सकता है जो आगे बढ़ गए?

एक दूसरे पहलू पर विचार करना भी जरूरी है, जिन भी पेशों में, शूद्रों में परिगणित जन लगे थे क्या उनके लिए उन्हें किसी ने बाध्य किया था? बल प्रयोग से किसी को किसी कौशल के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। प्रेरित अवश्य किया जा सकता है, परन्तु वह भी तब जब उस योग्यता या कौशल का तंत्र पर अधिकार रखने वालों को स्वयं पता हो।

इसे हम अपने उदाहरण से समझें, क्योंकि हम सभी जो नौकरी करते हैं, शूद्र हैं। हमें शिक्षा की सुविधाएं संस्थाओं के माध्यम से तन्त्र से अवश्य मिली हैं, पर पहले यह राज्य का काम न होकर धर्मतन्त्र का काम था जो शिक्षा के माध्यम से परोक्षत: सामाजिक चेतना को नियंत्रित और राजसत्ता के समानान्तर, उस पर भी हावी होने वाली धर्मसत्ता कायम करना चाहता था। राजकीय तन्त्र शिक्षा के माध्यम से अपने कल पुर्जे तैयार करना चाहता है और शिक्षा के माध्यम से अपने को अधिक से अधिक उपयोगी पुर्जा बनाने की होड़ मे रहते हैं ताकि हमें अधिक से अधिक ग्रीज और मोबील आयल मिल सके। यह तो अमला तंत्र की बात हुई। इसी तरह तकनीकी योग्यताएं बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा में उतरते हैं, उद्योगतन्त्र में अपने लिए कोना तलाशते हैं जिसमें हमारा मोल इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने नियोक्ता को किसी भी तरकीब से कितना लाभ पहुंचा पाते हैं। हमारा सीधा टकराव अपने नियोक्ता से नहीं उस पद या काम के लिए प्रयत्नशील या समकक्ष लोगों से होता हैऔर हम इस प्रतिस्पर्धा में समर्पित स्वामिभक्त और कुशलतम कार्यभारी सिद्ध होने का प्रयत्न करते हैं। जो ऐसा नहीं करते वे साधन और पहल होने पर स्वयं ऐसा उत्पादन, प्रसाधन, या सेवाएं, जैसे वितरण, आदि के तरीके निकालते हैं। जो किसी तरह की योग्यता विकसित नहीं कर पाते या इस स्तर की योग्यता नहीं अर्जित कर पाते वे शारीरिक श्रम वाली जगहें भरते हैं। इनकी सबसे बड़ी समस्या कहीं न कहीं काम पाने की होती है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति सबसे निचले स्तर का काम पाने की नहीं होती (क्योंकि वे जानते हैं अपनी योग्यता से वे इससे अधिक के पात्र न थे) अपितु बेकार रह जाना होता है।

कृषिकर्मियों द्वारा संपदा के स्रोतों पर अधिकार कर लेने के बाद सेवा, निपुणता, श्रमकार्य के बदले भरण पोषण और कुछ दक्षताओं के बाद इसके अतिरिक्त सम्मान और ख्याति की आकांक्षा में परंपरागत शूद्र उसी तरह अनुद्विग्न और समायोजित भाव से काम करते और काम होने पर सन्तुष्ट अनुभव करते थे जैसे आज के शूद्र। अन्तर केवल यह है कि वर्णव्यवस्था वाली पारिभाषिक शब्दावली में हमारी जो सही संज्ञा है उससे सबोधित किए जाने पर हम मुंह चुराने लगेंगे।
(लेख अधूरा है पर इतना लंबा हो चुका है कि इसके कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करने से पहले वर्तमान रूम में इससे कई तरह के भ्रम पैदा हो सकते हैं इसलिए अच्छा कि आप इसका शेष अंश पोस्ट होने के बाद पढ़ें।)

Post – 2018-03-02

#भारतीय #समाजव्यवस्था और इतिहास

पुरुष सूक्त पर कोई चर्चा तब तक अधूरी है जब तक हम दो सवालों का सामना न करें। पहला क्या यह न्यायोचित थी? दूसरा, क्या यह न्यायोचित है? इन सवालों से जुड़े दो सवाल और है। क्या जो न्यायोचित था, यदि था तो, क्या उसे आज के जीवन मूल्यों के अनुसार न्यायोचित कहा जा सकता है? दूसरा आज जो अन्यायपरक लगता है उससे मुक्ति का कोई उपाय है? एक अन्य सवाल इसी से पैदा होता है। क्या आज जो स्थिति है वैसी ही सदैव रही है, और इतिहास की समझ कितनी दूर तक इसका निराकरण करने में हमारा सहायक हो सकती है ?

यूं तो सत्य और न्याय अपेक्षाएं हैं जिनकी कसौटी पर कोई पूरा नहीं उतरता । इसका सबसे विस्मयकारी उदाहरण न्याय के विधान और न्याय की संस्थाएं हैं । इनमें नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। साधन संपन्न लोग बहुत कम दंडित होते हैं, क्योंकि वे प्रभावशाली वकीलों के माध्यम से न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर लेते हैं, जबकि अपनी आबादीकी तुलना में सबसे अधिक और सबसे बड़े पैमाने पर अपराध वे ही करते हैं। अत: आज भी दंड भोगने वाले साधनहीन लोगों का अनुपात उनकी तुलनात्क जनसंख्या से कई गुना अधिक होती है। जहां न्यायाधीश अप्रभावित रहता और स्वविवेक से नियमों का सम्मान करते हुए फैसले करता हैं वहां वह कहता है विधि के अनुसार निर्णय कर रहा है, न्याय नहीं कर रहा है। यदि विधि व्यवस्था में ही गड़बड़ है, वह निजी संपत्ति रखने का भी अधिकार देती, कई तरह की शिक्षाप्रणालियों की बात करती है, अल्पजनलभ्य विदेशी भाषा को वरीयता देती है, और साथ ही अवसर की समानता की बात भी करती है, एक ओर धर्म, जाति और लिंग निरपेक्ष समानता का सपना दिखाती है दूसरी ओर, जिन भी बाध्यताओं के कारण हो धर्म और जाति आधारित रियायतें देते हुए ऐसी व्यवस्थाओं को ढकोसला बना देती है, उसमें किसी को अपना न्यायेचित अधिकार शासन, व्ययवस्था, विधि और विधान से मिल सकता है?

लोकतन्त्र गणतन्त्र के बाद अकेली ऐसी व्यवस्था है जिसमें शासित ही शासक हो सकता है पर लोकतांत्रिक गणतन्त्र (democratic republic) फरेब है। गणतन्त्र गणव्यवस्था के बाहर, और बड़े पैमाने पर और बहुमिश्र समाज में संभव ही नही, अत: लोकतंत्र अब तक की शासन पद्धतियों में सबसे अच्छी व्यवस्था है, पर इसमें जितने तरह की और जितनी भ्रष्टता पाई जाती है वह किसी अन्य तंत्रमें संभव नहीं।

हम जिस बात पर बल देना चाहते हैं वह यह कि दुनिया में कभी कोई ऐसी व्यवस्था हुई ही नहीं जिसे न्यायोचित कह सकें। अन्तर केवल यह है कि एक व्यवस्था न्यायोचित होने का दावा करती है, न्याय भले न दे पाए, पर अपने इस दावे के कारण हमें अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का अवसर देती है और दूसरी न्याय की मांग को असंभव बना देती है। कहें एक तर्क और औचित्य पर आधारित रही है और तर्कसंगति के कारण विज्ञानपूर्व अवस्थाओं में भी वैज्ञानिक कही जा सकती है, और दूसरी वे जो शक्ति पर आधारित रही हैं इसलिए जिनको शक्ति से ही बदला जा सकता था या शक्ति के अनुपात में ही बदला या झुकाया जा सकता था। इस दृष्टि से विचार करने पर भारतीय समाज कहां आता है?

एक दूसरी बात विज्ञान के दो चरण हैं । एक जो डार्विन से पहले का पूरा इतिहास है जिसमें आइजैक न्यूटन तक आते है। इसमें भौतिक क्रियाकलाप शुद्ध भौतिक नियमों से परिचालित होता था और मोटे तौर पर यह दूसरे जानवरों पर भी लागू होता था, परन्तु मानवीय क्रियाव्यापार में लोकोत्तर शक्ति का हस्तक्षेप था जो सर्वोपरि शासक माना जाता था और राजा से रंक तक उसके अधीन थे और उससे डरते और एक सीमा में रहते थे।

,पुरुष सूक्त में जो बात कुछ भोंड़े रूप में रखी गई है वह समाज का मान्य सत्य था, अर्थात् वर्णव्यवस्था, या समाज व्यवस्था भी ईश्वरीय विधान है यद्यपि इसे इतने इकहरे रूप में नहीं रखा जा सकता। चाहे वह गणव्यवस्था हो जिसमें मर्यादा के उल्लंघन पर व्यक्ति को गण से ( उसके अवशेष जाति से) बाहर कर दिया जाता था और उसके साथ सभी सामाजिक संबंध और संपर्क तोड़ लिए जाते थे, या वर्ण समाज जिसमें ऐसे व्यक्ति को हीन जाति का मान लिया जाता, या हीन जाति में शामिल होने को बाध्य होना पड़ता था, या किसी विशेष दक्षता वाले समुदाय के वर्ण समाज के संपर्क में आने पर एक जाति मान लिया जाता था सामाजिक हस्तक्षेप इतना स्पष्ट था कि इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था। हमारे लिए यह आशंका स्वाभाविक है, परन्तु एक ऐसे दौर में जिसमें माना जाता था पंच के मुंह से परमात्मा बोलता है, बच्चे के मुंह से परमात्मा बोलता है, यह समझा लेना आसान था, कि जो कुछ हो रहा है, सब दैवी विधान से हो रहा है।

फिर भी हमारे देश में बहुत प्राचीन काल से एक जन समाज रहा है जो देवता या ईश्वर में विश्वास नहीं करता था। इसे देवों और असुरों के बीच मुख्य भेद माना गया है परन्तु यह अतिवादी होगा क्योंकि देव समाज के अतिरिक्त असुरों के देवता – रुद्र, काली/दुर्गा, वरुण, वृषाकपि – थे, इसलिए हम इन्हें एक भिन्न विचारधारा से जुड़े लोग कह सकते हैं जो असाधारण साधनाओं और सिद्धियों का दावा करते थे पर ईश्वर या दैवी शक्ति में विश्वास नहीं करते थे । इन्हे ऋग्वेद में अदेवयून कहा गया है, उपनिषद में इनको विरोचन की परंपरा से जुड़ा मान सकते हैं जो शरीर को या भौतिक जीवन को ही अन्तिम सत्य मानता है और आत्मा-परमात्मा के चक्कर में नहीं पड़ता। बौद्ध और जैन मत भी इसी परंपरा का विकास लगते हैं। मक्खलि घोषाल और आजीवक इसी भौतिकवादी परंपरा में आते है पर ये नियतिवादी थे, जब कि चार्वाक पुनर्जनम तक में विश्वास नहीं करते थे।
खैर चिन्तन, प्रतिवाद और विरोध की एस परंपरा मुझे आदिम अवस्था से अनवरत चली आती दिखाई देती है इसलिए वैचारिक प्रतिरोध और अन्याय के विरोध के विकल्प संभव रहे हैं। पश्चिम में जो पर्यावरण ग्रीक काल में (यद्यपि उसमें भी यदि वैचारिक भिन्नता के कारण किसी को गरल पीने को बाध्य किया जाता है तो इसे सीमित बौद्धिक स्वतन्त्रता ही कहा जा सकता है, जब कि भारत में कौत्स को वेदों की कठोरतम भर्त्सना करने पर उसकी केवल निन्दा की जाती है) था उसको कुचल कर असहमति ही नहीं किसी भी माने में अनमेल विचार के लिए यातनावध करने वालों को सन्त कहा जाता रहा और अरबों के और उनके माध्यम से पूर्व के विचारों से परिचित होने के बाद ही वैचारिक सुगबुगाहट आरंभ हुई और आज अपने उस उभार पर है कि युगों पुरानी वर्जनाओं के विरुद्ध आवाज उठाई जा सकती और उसे आन्दोलन का रूप दिया तथा व्यापक सहमति जुटाई जा सकती है।

अब इसी परिदृश्य में हम अपनी समाज व्यवस्था के इतिहास को आज के सामाजिक समीकरण का मूल्यांकन करने का प्रयत्न कर सकते हैं:

सबसे पहले हम इस प्रश्न का सामना करें कि यदि #वर्ण की उत्पत्ति #बलिपशु बने यज्ञ से हुई तो, या यदि किसी को लगे कि वह तो परमेश्वर ही था ( यद्यपि उस दशा में यह समस्या पैदा होगी कि यदि एक बार बलिपशु बन कर दूसरे रूपों में रूपान्तरित हो गया फिर #परमेश्वर जैसी पृथक सत्ता तो बची नहीं, भौतिक सृष्टि ही परम सत्ता के रूप में बच रहती है) तो भी उसके चार अंगों से चार वर्ण बन गए, पर जातियां कहां से पैदा हुईं और एक ही वर्ण के भीतर ऊंच नीच का भाव कैसे पैदा हुआ। कनौजिया #ब्राह्मणों के भीतर तेरह चूल्हों की नौबत कहां से आई? क्षत्रियों के बारे में कहा जाता था कि इनकी और धान की किस्मों का अंत नहीं! फिर एक ही वर्ण के इतने उपभेद कैसे हो गए?

फिर कृषिकर्मी समाज मेंजो विभाजन कर्म आधारित था वह जन्म आधारित कैसे बन गया?

इसका सीधा जवाब है कि आरंभ में कृषिकर्मी या देव समाज में आदिम कृषि-विमुख/विरोधी समाज के लोग सम्मिलित होते रहे। यह सम्मिलित होना इस तरह का नहीं था कि मैं आज से ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्व बनना चाहता हूं, मुझे अपने वर्ण में मिला लो। कृषि के लाभों से परिचित हो जाने के बाद वे स्वयं संगठित होकर वन्य भूमि की सफाई करके खेती करने लगते थे। इसका संकेत उन्हीं कृतियों में है जिसमें यज्ञ के विरोध का हवाला है, ‘देवगण जो कुछ करते, असुर उसकी नकल करने लगते।’ यदि उल्लेख न होता तो भी ऐतिहासिक कालों तक कृषिकर्मी बन कर क्षत्रिय होने का दावा करने वाले शाक्यों, बज्जियों की गणसमाजी व्यवस्था, कृषिकर्म में सक्रिय भागीदारी के उदाहरणों से इसे आसानी से समझा जा सकता है। यह ध्यान रहे कि गोतमबुद्ध का विवाह कोलिय (क्षत्रियत्व का दावा करने कोल मूलीय) समुदाय में हुआ था। कोसंबी ने पता नहीं क्यों ब्राह्मणों के गोत्र तक ही अपने अध्ययन को सीमित रखा और इस नतीजे पर पहुंचे कि आदिम जनों के बहुत से गोत्रनाम ब्राह्मणों से मिलते हैं और एस ही आटविक समुदाय के कुछ लोग दूसरे वर्णों में शामिल हुए, जब कि कुछ दूसरे पशुपालन तक बढ़े और कुछ पिछड़े ही रह गए। यह क्रम आज भी जारी है। हम इसके विस्तार में न जाकर यह कहना चाहते हैं कि जिन लोगों में पहल, लगन और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति थी वे आगे बढ़े, भूसंपदा के स्वामी और वर्ण समाज के सदस्य बने, कहे स्वीमिवर्ग में शामिल होते रहे। जो आलस्य, वर्जना या पहल के अभाव में पिछडे रह गए उनके पिछड़ेपन के लिए क्या उनको दोष दिया जा सकता है जो आगे बढ़ गए?

एक दूसरे पहलू पर विचार करना भी जरूरी है, जिन भी पेशों में, शूद्रों में परिगणित जन लगे थे क्या उनके लिए उन्हें किसी ने बाध्य किया था? बल प्रयोग से किसी को किसी कौशल के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। प्रेरित अवश्य किया जा सकता है, परन्तु वह भी तब जब उस योग्यता या कौशल का तंत्र पर अधिकार रखने वालों को स्वयं पता हो।

इसे हम अपने उदाहरण से समझें, क्योंकि हम सभी जो नौकरी करते हैं, शूद्र हैं। हमें शिक्षा की सुविधाएं संस्थाओं के माध्यम से तन्त्र से अवश्य मिली हैं, पर पहले यह राज्य का काम न होकर धर्मतन्त्र का काम था जो शिक्षा के माध्यम से परोक्षत: सामाजिक चेतना को नियंत्रित और राजसत्ता के समानान्तर, उस पर भी हावी होने वाली धर्मसत्ता कायम करना चाहता था। राजकीय तन्त्र शिक्षा के माध्यम से अपने कल पुर्जे तैयार करना चाहता है और शिक्षा के माध्यम से अपने को अधिक से अधिक उपयोगी पुर्जा बनाने की होड़ मे रहते हैं ताकि हमें अधिक से अधिक ग्रीज और मोबील आयल मिल सके। यह तो अमला तंत्र की बात हुई। इसी तरह तकनीकी योग्यताएं बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा में उतरते हैं, उद्योगतन्त्र में अपने लिए कोना तलाशते हैं जिसमें हमारा मोल इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने नियोक्ता को किसी भी तरकीब से कितना लाभ पहुंचा पाते हैं। हमारा सीधा टकराव अपने नियोक्ता से नहीं उस पद या काम के लिए प्रयत्नशील या समकक्ष लोगों से होता हैऔर हम इस प्रतिस्पर्धा में समर्पित स्वामिभक्त और कुशलतम कार्यभारी सिद्ध होने का प्रयत्न करते हैं। जो ऐसा नहीं करते वे साधन और पहल होने पर स्वयं ऐसा उत्पादन, प्रसाधन, या सेवाएं, जैसे वितरण, आदि के तरीके निकालते हैं। जो किसी तरह की योग्यता विकसित नहीं कर पाते या इस स्तर की योग्यता नहीं अर्जित कर पाते वे शारीरिक श्रम वाली जगहें भरते हैं। इनकी सबसे बड़ी समस्या कहीं न कहीं काम पाने की होती है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति सबसे निचले स्तर का काम पाने की नहीं होती (क्योंकि वे जानते हैं अपनी योग्यता से वे इससे अधिक के पात्र न थे) अपितु बेकार रह जाना होता है।

कृषिकर्मियों द्वारा संपदा के स्रोतों पर अधिकार कर लेने के बाद सेवा, निपुणता, श्रमकार्य के बदले भरण पोषण और कुछ दक्षताओं के बाद इसके अतिरिक्त सम्मान और ख्याति की आकांक्षा में परंपरागत शूद्र उसी तरह अनुद्विग्न और समायोजित भाव से काम करते और काम होने पर सन्तुष्ट अनुभव करते थे जैसे आज के शूद्र। अन्तर केवल यह है कि वर्णव्यवस्था वाली पारिभाषिक शब्दावली में हमारी जो सही संज्ञा है उससे सबोधित किए जाने पर हम मुंह चुराने लगेंगे।
(लेख अधूरा है पर इतना लंबा हो चुका है कि इसके कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करने से पहले वर्तमान रूम में इससे कई तरह के भ्रम पैदा हो सकते हैं इसलिए अच्छा कि आप इसका शेष अंश पोस्ट होने के बाद पढ़ें।)