Post – 2018-05-02

धन के द्योतक कतिपय और शब्द (1)

संतोष तो शब्दों की पूरी विकास यात्रा को रखने से ही होता है परंतु अब तक के अनुभव से हमने पाया कि विस्तार के मोह में चर्चा दो तीन शब्दों की व्याख्या तक सिमट कर रह जाती है, इसलिए आज की पोस्ट में हम अल्पतम हस्तक्षेप करते हुए ऋग्वेद में आए हुए उन शब्दों को रखने का प्रयास करेंगे जिन का अर्थ खाद्य पदार्थ है जो धन का प्राचीनतम रूप था. सभी की उत्पत्ति जल के किसी पर्याय से हुई है इसका हम संकेत मात्र करेंगेः

अज्म
अज का अर्थ जल है इसका आभास आज्य से मिला जाएगा। जल की गति से, चलने वाले प्राणियों का नाम जुड़ा हुआ है जिसमें सबसे पहला स्थान अज का है। जल की गति के कारण अज्म का अर्थ प्रवाह, शक्ति और गति है। रुद्रों के प्रयाण से धरा डर से उसी तरह कांपने लगती है जैसे शत्रु को देखकर बूढ़ा विश्पति कांपने लगे (येषामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वां इव विश्पतिः । भिया यामेषु रेजते । 1.37.8) । परंतु खाद्य पदार्थ के रूप में भी इसका प्रयोग हुआ है (अज्मं अन्नं, 8.46.28 )।

अद्म
अद् जल है इस विषय में कोई दुविधा नहीं है । सायणाचार्य ने एक स्थान पर या तो संदर्भ विशेष के कारण, या सहज भाव से, इसे बरसात से मिलने वाला पानी (अद्भ्यः – वृष्टिउदकेभ्यो, 2.1.11), और दूसरे स्थल पर इसे अंतरिक्ष से उपलब्ध होने वाला बताया है, (अन्तरिक्षलोकात्, 2.38.11)। अज्म की तरह ही अद्म का खाद्य पदार्थ के लिए प्रयोग होना सर्वथा उचित ही था,पर इसकी व्याप्ति केवल मनुष्य के खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं है अपितु पशु प्राणियों के खाद्य पदार्थों को भी इसमें समाहित किया गया है (अद्मं अदनीयं तृणगुल्मादिकं, 1.58.2).

अंध
वास्तव में अद, उद, अन्न और अंध एक ही ध्वनि के अनुकारभेद हैं और इन सब का प्रयोग जल के लिए होता रहा है (अन्धसः -अन्नस्य, 1.80.6); परंतु इसका प्रयोग सोम रस के लिए विशेष रुप से हुआ है (अन्धसा – सारेण, 5.54.8),

अन्न
अन्न का प्रयोग आज भले हम केवल मनुष्य द्वारा खाए जाने वाले अनाजों के लिए करते हैं परंतु इसका प्रयोग अन्य जीवों द्वारा खाए जाने वाले पदार्थों के लिए भी किया जा सकता था (अन्नं -घासं, 2.24.12)

प्रय/अभिप्रय

हम आज प्राय: और अभिप्राय का प्रयोग जिस अर्थ में करते हैं उस अर्थ में इनका प्रयोग होता भी रहा हो तो भी इनका दायरा संभवत- अधिक व्यापक था। प्रय का जल केअर्थ में प्रयोग पहले हुआ करता था और फिर अन्न के लिए होने लगा (प्रयः – अन्नं, 1.31.7;1.132.3; अभिप्रयः – अन्नं अभिलक्ष्य,1.45.8; हविर्लक्षणमन्न, 1.118.4)

अर्क

अर्क का प्रयोगजल अर्चना से आगे बढ़ते हुए, अन्न, प्रकाश, उद्गार और स्तोत्रों तक अनेक अर्थों में देखने में आता है। (अर्कं – मंत्ररूप स्तोत्रं, 1.62.1; अर्चनीयं अन्नं,1.अर्चनीयं इन्द्रं, 184.4 ;(1.164.24) अर्कसाधनं मन्त्रं, अन्नं, 7.97.5), अर्कैः- अर्चनीयैः स्तोत्रैः(3.31.9, स्तोतृभिः, 6.69.2), अर्कसातौ -अर्चनीयस्यान्नस्य लाभे निमित्तभूते सति,

अव
अव का प्रयोग हम उपसर्ग के रूप में ही करते हैं, यह प्रयोग प्राचीन है (अवः -अवस्तात्,1.83.2, अवस्तात् अवाङ्मंु1.133.6) ) परंतु कुछ स्थलों पर इसका अर्थ अन्न किया है (अवः – अन्नः,3.59.6), अवसा -अन्नेन, 1.185.4)

आय, आयु , वय और वर्चस
आय और आयु के एक ही अर्थ से हम परिचित हैं, इसलिए यह सोच भी नहीं सकते कि कभी इनका प्रयोग अन्न के लिए भी होता था, परंतु हम खाते तो दोनों को हैं, (आयुः – अन्नं, 1.113.16; 3.1.5; आयूंषि – अन्नानि, 2.41.17; जीवनमन्नं, 3.53.7; आयुषि – अन्ने सर्वप्राण्याहारत्वेन, 4.58.11) परन्तु इसका एक अर्थ वायु भी था (आयुः – सततं गता वायुः, 1.162.1) (5.41.2) सततगतिवायुरुच्यते आयुभिः -आयुष्मद्भिः, 5.60.8). इन सबके पीछे जल और उसकी निरंतर प्रवहमानता की अवधारणा है।
हद तो यह कि वय का भी पुराना अर्थ जल और अन्न ही था (वयसः – अन्नस्य, 8.48.1, वयसा- अन्नेन, 2.33.6 ; वयोधाः – अन्नस्यदातारः, 6.75.9 ; वरिवःविदं – अन्नस्य लम्भकं, (4.55.1) धनं, वरिवस्कृत्- धनस्य कर्ता, 8.16.60
और यही हाल वर्चस्व का था। यहां भी जल, प्रकाश, अन्न, तेजस्विता की दिशा में विकासरेखा बहुत स्पस्ट है (वर्चः – अन्नं, 3.8.3; 3.24.1; वर्चसा – तेजसा, 1.23.23).

इळा, इला, इरा

इळा, इला, इरा, का विकास बहुत रोचक है क्योंकि इसमें हमारे इतिहास की महायात्रा में पुरातन स्मृतियों को संजोने के क्रम में एक ही तथ्य को रूपकीय कलेवर देते हुए बाद की पीढ़ियों को स्थांतरित करने के क्रम में जो विचलनें हुईं हैं उनको समझने में यह बहुत सहायक होता है परंतु हम यहां पर उसके विस्तार में न जाकर उन शब्दों के जो अर्थ ऋग्वेद में किए गए हैं केवल उनका उल्लेख करके संतोष करना चाहेंगे (इळया- हविर्लक्षणेनान्नेन, 3.54.20; अन्नेन, 3.59.3; इळस्पतिः – इलाया अन्नस्यपतिः, 6.58.4; इळस्पदे – मनोपुत्र्या गोरूपायाः पदे, 1.128.1; इळा – मनोः पुत्री, 1.40.4; भूमि, 4.50.8) ; गोदेवता, 8.31.4; इळां -अन्नं, 6.10.7; 6.52.16) ; इरस्या- अन्नेच्छया, 5.40.7; इरावती – अन्नवती 7.99.3); इलयत – ईरयत गच्छत, 1.191.6). इलां – एतन्नामधेयां पुत्रीं, 1.31.11; इलाभिः – बहुविधैरन्नै, 5.53.2).
(आगे जारी )

Post – 2018-05-02

धन के द्योतक कतिपय और शब्द (1)

संतोष तो शब्दों की पूरी विकास यात्रा को रखने से ही होता है परंतु अब तक के अनुभव से हमने पाया कि विस्तार के मोह में चर्चा दो तीन शब्दों की व्याख्या तक सिमट कर रह जाती है, इसलिए आज की पोस्ट में हम अल्पतम हस्तक्षेप करते हुए ऋग्वेद में आए हुए उन शब्दों को रखने का प्रयास करेंगे जिन का अर्थ खाद्य पदार्थ है जो धन का प्राचीनतम रूप था. सभी की उत्पत्ति जल के किसी पर्याय से हुई है इसका हम संकेत मात्र करेंगेः

अज्म
अज का अर्थ जल है इसका आभास आज्य से मिला जाएगा। जल की गति से, चलने वाले प्राणियों का नाम जुड़ा हुआ है जिसमें सबसे पहला स्थान अज का है। जल की गति के कारण अज्म का अर्थ प्रवाह, शक्ति और गति है। रुद्रों के प्रयाण से धरा डर से उसी तरह कांपने लगती है जैसे शत्रु को देखकर बूढ़ा विश्पति कांपने लगे (येषामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वां इव विश्पतिः । भिया यामेषु रेजते । 1.37.8) । परंतु खाद्य पदार्थ के रूप में भी इसका प्रयोग हुआ है (अज्मं अन्नं, 8.46.28 )।

अद्म
अद् जल है इस विषय में कोई दुविधा नहीं है । सायणाचार्य ने एक स्थान पर या तो संदर्भ विशेष के कारण, या सहज भाव से, इसे बरसात से मिलने वाला पानी (अद्भ्यः – वृष्टिउदकेभ्यो, 2.1.11), और दूसरे स्थल पर इसे अंतरिक्ष से उपलब्ध होने वाला बताया है, (अन्तरिक्षलोकात्, 2.38.11)। अज्म की तरह ही अद्म का खाद्य पदार्थ के लिए प्रयोग होना सर्वथा उचित ही था,पर इसकी व्याप्ति केवल मनुष्य के खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं है अपितु पशु प्राणियों के खाद्य पदार्थों को भी इसमें समाहित किया गया है (अद्मं अदनीयं तृणगुल्मादिकं, 1.58.2).

अंध
वास्तव में अद, उद, अन्न और अंध एक ही ध्वनि के अनुकारभेद हैं और इन सब का प्रयोग जल के लिए होता रहा है (अन्धसः -अन्नस्य, 1.80.6); परंतु इसका प्रयोग सोम रस के लिए विशेष रुप से हुआ है (अन्धसा – सारेण, 5.54.8),

अन्न
अन्न का प्रयोग आज भले हम केवल मनुष्य द्वारा खाए जाने वाले अनाजों के लिए करते हैं परंतु इसका प्रयोग अन्य जीवों द्वारा खाए जाने वाले पदार्थों के लिए भी किया जा सकता था (अन्नं -घासं, 2.24.12)

प्रय/अभिप्रय

हम आज प्राय: और अभिप्राय का प्रयोग जिस अर्थ में करते हैं उस अर्थ में इनका प्रयोग होता भी रहा हो तो भी इनका दायरा संभवत- अधिक व्यापक था। प्रय का जल केअर्थ में प्रयोग पहले हुआ करता था और फिर अन्न के लिए होने लगा (प्रयः – अन्नं, 1.31.7;1.132.3; अभिप्रयः – अन्नं अभिलक्ष्य,1.45.8; हविर्लक्षणमन्न, 1.118.4)

अर्क

अर्क का प्रयोगजल अर्चना से आगे बढ़ते हुए, अन्न, प्रकाश, उद्गार और स्तोत्रों तक अनेक अर्थों में देखने में आता है। (अर्कं – मंत्ररूप स्तोत्रं, 1.62.1; अर्चनीयं अन्नं,1.अर्चनीयं इन्द्रं, 184.4 ;(1.164.24) अर्कसाधनं मन्त्रं, अन्नं, 7.97.5), अर्कैः- अर्चनीयैः स्तोत्रैः(3.31.9, स्तोतृभिः, 6.69.2), अर्कसातौ -अर्चनीयस्यान्नस्य लाभे निमित्तभूते सति,

अव
अव का प्रयोग हम उपसर्ग के रूप में ही करते हैं, यह प्रयोग प्राचीन है (अवः -अवस्तात्,1.83.2, अवस्तात् अवाङ्मंु1.133.6) ) परंतु कुछ स्थलों पर इसका अर्थ अन्न किया है (अवः – अन्नः,3.59.6), अवसा -अन्नेन, 1.185.4)

आय, आयु , वय और वर्चस
आय और आयु के एक ही अर्थ से हम परिचित हैं, इसलिए यह सोच भी नहीं सकते कि कभी इनका प्रयोग अन्न के लिए भी होता था, परंतु हम खाते तो दोनों को हैं, (आयुः – अन्नं, 1.113.16; 3.1.5; आयूंषि – अन्नानि, 2.41.17; जीवनमन्नं, 3.53.7; आयुषि – अन्ने सर्वप्राण्याहारत्वेन, 4.58.11) परन्तु इसका एक अर्थ वायु भी था (आयुः – सततं गता वायुः, 1.162.1) (5.41.2) सततगतिवायुरुच्यते आयुभिः -आयुष्मद्भिः, 5.60.8). इन सबके पीछे जल और उसकी निरंतर प्रवहमानता की अवधारणा है।
हद तो यह कि वय का भी पुराना अर्थ जल और अन्न ही था (वयसः – अन्नस्य, 8.48.1, वयसा- अन्नेन, 2.33.6 ; वयोधाः – अन्नस्यदातारः, 6.75.9 ; वरिवःविदं – अन्नस्य लम्भकं, (4.55.1) धनं, वरिवस्कृत्- धनस्य कर्ता, 8.16.60
और यही हाल वर्चस्व का था। यहां भी जल, प्रकाश, अन्न, तेजस्विता की दिशा में विकासरेखा बहुत स्पस्ट है (वर्चः – अन्नं, 3.8.3; 3.24.1; वर्चसा – तेजसा, 1.23.23).

इळा, इला, इरा

इळा, इला, इरा, का विकास बहुत रोचक है क्योंकि इसमें हमारे इतिहास की महायात्रा में पुरातन स्मृतियों को संजोने के क्रम में एक ही तथ्य को रूपकीय कलेवर देते हुए बाद की पीढ़ियों को स्थांतरित करने के क्रम में जो विचलनें हुईं हैं उनको समझने में यह बहुत सहायक होता है परंतु हम यहां पर उसके विस्तार में न जाकर उन शब्दों के जो अर्थ ऋग्वेद में किए गए हैं केवल उनका उल्लेख करके संतोष करना चाहेंगे (इळया- हविर्लक्षणेनान्नेन, 3.54.20; अन्नेन, 3.59.3; इळस्पतिः – इलाया अन्नस्यपतिः, 6.58.4; इळस्पदे – मनोपुत्र्या गोरूपायाः पदे, 1.128.1; इळा – मनोः पुत्री, 1.40.4; भूमि, 4.50.8) ; गोदेवता, 8.31.4; इळां -अन्नं, 6.10.7; 6.52.16) ; इरस्या- अन्नेच्छया, 5.40.7; इरावती – अन्नवती 7.99.3); इलयत – ईरयत गच्छत, 1.191.6). इलां – एतन्नामधेयां पुत्रीं, 1.31.11; इलाभिः – बहुविधैरन्नै, 5.53.2).
(आगे जारी )

Post – 2018-05-02

राजनीतिक कारणों से बौद्धिक पर्यावरण इतना सतही बना दिया गया है कि उतावली में जुमलेबाजी के चक्कर में बुद्धिजीवी से लेकर राजनीतिक जन तक जो कहना चाहते हैं उसके लिए सही मुहावरा तक नही तलाश पाते, जो परिणाम चाहते हैं उसके लिए सही रणनीति तक नहीं तय कर पाते और हडबडी इतनी कि चुप तक नहीं रह पाते कि सोचने के लिए शांत वातावरण तैयार हो.

Post – 2018-05-02

राजनीतिक कारणों से बौद्धिक पर्यावरण इतना सतही बना दिया गया है कि उतावली में जुमलेबाजी के चक्कर में बुद्धिजीवी से लेकर राजनीतिक जन तक जो कहना चाहते हैं उसके लिए सही मुहावरा तक नही तलाश पाते, जो परिणाम चाहते हैं उसके लिए सही रणनीति तक नहीं तय कर पाते और हडबडी इतनी कि चुप तक नहीं रह पाते कि सोचने के लिए शांत वातावरण तैयार हो.

Post – 2018-05-02

राजनीतिक कारणों से बौद्धिक पर्यावरण इतना सतही बना दिया गया है कि उतावली में जुमलेबाजी के चक्कर में बुद्धिजीवी से लेकर राजनीतिक जन तक जो कहना चाहते हैं उसके लिए सही मुहावरा तक नही तलाश पाते, जो परिणाम चाहते हैं उसके लिए सही रणनीति तक नहीं तय कर पाते और हडबडी इतनी कि चुप तक नहीं रह पाते कि सोचने के लिए शांत वातावरण तैयार हो.

Post – 2018-04-30

धन-संपत्ति के रूप (2)

संपत्ति
संपत्ति के विषय में एक समय में यह सोचता था कि इसका नामकरण पत्ती के गिरने से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण का परिणाम है। उसी का अर्थ विस्तार सभी वनस्पतियों के लिए हुआ है और उसका अर्थोत्कर्ष संपदा के रूप में हुआ । पत्ती, पत्र, पत्तल, पात्र, पाट, पॉटरी, पैटर्न, पोटली, की श्रृंखला के विषय में मैं आज भी यह मानता हूं इसमें इनमें पत्ती और उससे बने हुए आदिम पात्रों का हाथ है और ऐसा उसी प्राकृतिक परिवेश में संभव है जहां बर्फ नहीं पड़ती थी इसलिए बड़ी पत्तियों वाले पेड़ों की बहुतायत थी और ऐसे पत्ते सुलभ थे जिन पर किसी चीज को रखकर खाया जा सके। भारत में यह सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन कि आज भी जीवित है। किसी अन्य देश के विषय में ऐसी जानकारी हमें उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे संभव है मेरे पूर्वाग्रह काम करते रहे हों, परंतु पत्तल, पात्र, पॉट, पतीला और पोटरी का ध्वनिगत और अर्थगत अनुक्रम जितना निर्णायक है उतना निर्णायक प्रमाण एक भी भारोपीय भाषा दार्शनिकों ने आज तक नहीं दिया ौर तिनकों को पहाड़ बना कर अपनी मनमानी लादते रहे।

परंतु संपत्ति के विषय में मेरे विचारों में कुछ परिवर्तन आया है। मैं यह तो मानता हूं की पत पानी की बूंद की आवाज है और जल की पत संज्ञा का आधार यही है । सभी वनस्पतियों में रस या आर्द्रता पाई जाती है इसलिए उनका जातीय नामकरण जल के इस गुण के कारण हुआ है। परंतु ऐसी स्थिति में तो पत्ती का भी अर्थ बदल जाएगा। पत्ती जिसमे रस पाया जाता है, न कि वह जिसके गिरने से पत् की आवाज होती है। ऋग्वेद की भाषा में कहें तो को ददर्श प्रथमं संज्ञमानं । कुछ मामलों में संदेह का बना रह जाना भी तार्किक विचार की सीमा में आता है।

अर्थ
अर्थ का अर्थ है किसी लता या वनस्पति को निचोड़कर बाहर निकाला हुआ रस या सारतत्व । यह पहले समस्त खाद्य और पेय के लिए और फिर संपदा के दूसरे सभी रूपों के लिए व्यवहार में आने लगा, परंतु जब हम शब्द का अर्थ कहते हैं तो प्राचीन भाव जागृत हो जाता है, भले हम मूल अर्थ ग्रहण करने की जगह रूढ़ आशय से ही अपना काम चलाते हों। जब हम शब्दों के मूल अर्थ का साक्षात्कार करते हैं या जिस अनुपात में यह संभव होता है उस अनुपात में भाषा एक जीवंत सत्ता बनकर उपस्थित होती है, न कि वर्तनी उच्चारण और भाव का जमाकडा।

ऋग्वेद के समय तक अर्थ और अर्थी – अर्थकामी धन और धनकामना का आशय में चलन में थेः
अर्थमिद् वा उ अर्थिन आ जाया युवते पतिम् ।
रोचक है ऐसे स्थानों पर ऋग्वेद ग्रिफिथ ने अर्थ का अनर्थ करते हुए विश कर दिया है जिससे उन्नत अर्थव्यवस्था का आभास न मिले।

द्रव्य/द्रविण
द्रव्य और द्रविण में द्र/ द्रव इतना स्पष्ट है कि किसी व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता। ऋग्वेद से अपने परिचय के आरंभिक दिनों में मैंने द्रव और द्रविण (विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत् पृथिव्याम् ) को धातु गलाने की वैदिक विद्या का प्रमाण मान लिया था। विद्या का पता तो उन्हें था इसके प्रमाण भी ऋग्वेद में है। धातु गलाने वाले को द्रवी कहा भी गया है (विजेहमानः परशुर्न जिह्वां द्रविर्न द्रावयति दारु धक्षत् । । 6.3.4) परन्तु मैने कुछ चूक की थी, यह आभास अब हुआ है। ऋग्वेद में द्रविण धन के विविध रूपों का द्योतक प्रतीत होता है (अस्मे रयिं विश्ववारं समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि ।। 5.4.7) और इसलिए इसकी आकांक्षा भी बार-बार व्यक्त की गई है, इसका मूल आशय रस से भरे हुए खाद्य पदार्थों के लिए ही रहा लगता है।
द्रवित होना पसीजने का पर्याय है ही।

रेक्ण
रेक्ण का प्रयोग ऋग्वेद के बाद मेरे देखने में नहीं आया, ऋग्वेद में भी इसका प्रयोग अधिक नहीं हुआ है (ददी रेक्णस्तन्वे ददिर्वसु ददिर्वाजेषु पुरुहूत वाजिना) परंतु अंग्रेजी के रिच, रिचेज, को इसका सजात मान सकते है। हम इसे रेचन से व्युत्पन्न मान सकते हैं जिसका अर्थ जल है।

नृम्ण
नृम्ण का प्रयोग भी वैदिक काल के बाद शायद ही हुआ हो। इसे मैं मनुष्य द्वारा अपने सामर्थ्य उत्पादित धन के रूप में ग्रहण करना चाहता हूं परंतु साथ ही यह नहीं भूल पाता कि नर का अर्थ भी जल है । नर, नारा, नीर, नूर एक ही श्रृंखला के शब्द हैं यद्यपि नर का पुरुष के आशय में प्रयोग होते रहने के कारण जल वाला अर्थ हमारे लिए अपरिचित है। नूर तो फारसी में भी प्रकाश या कांति के आशय में ही बचा रह गया लगता है।

हिरण्य
चालू व्याख्या में हम कह सकते हैं की यह वह मूल्यवान धातु है जिसकी खोज जाती है, पर हर, हरि, हिर सभी जल के ही पर्याय हैं। हीरा या हीरक में भी इसे देखा जा सकता है।

स्वर्ण
स्वः का अर्थ जल है, इसका प्रयोग सूर्य के लिए भी देखा जा सकता है (तपन्अति शत्रुं स्वः न भूमा) अर्ण के विषय में यहां कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। अतः यह जल के लिए प्रयुक्त दो शब्दों से बना हुआ पद है।

कंचन/ कनक
कंचन में भी प्रयुक्त कन् और चन दोनों शब्द जलवाची हैं। कनक में भी कन् की उपस्थिति देखी जा सकती है।

रजत
रजत में भी रज शब्द से हम पहले परिचित हो चुके हैं जिसका एक अर्थ है जल है और दूसरा उसके गुणों वाला श्वेत रंग का चमकने वाला पदार्थ और इसी आशय में इसका प्रयोग चांदी के लिए ऋग्वेद में हुआ है और आज भी होता है।

चंद्र
चंद्र के विषय में यह पहले का आए हैं इसमें चन् और द्र, दो जलार्थक शब्दों का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में चंद्रम का प्रयोग लगभग उसी अनुपात में हुआ है जिस अनुपात में हिरण्य का। परंतु इसको भ्रमवश चंद्रमा के आशय में ही ग्रहण किया जाता रहा। मैंने पहली बार इसके बहुवचन रूप तालिका बद्ध करके तुलना करते हुए हमने सुझाया कि चांदी चंद्रम से ही व्युत्पन्न है और वैदिक काल में चांदी का बहुत प्रचुरता से प्रयोग हुआ करता था। वास्तव में रजत शब्द का प्रयोग ईरान से आगे की भाषाओं में अधिक पाया जाता है। तमिल में शब्द के आरंभ में रकार होने पर उच्चारण की सुकरता के लिए अकार का सहारा लिया जाता है और इसलिए अर्जेंटम रजत की देन है।

Post – 2018-04-30

धन-संपत्ति के रूप (2)

संपत्ति
संपत्ति के विषय में एक समय में यह सोचता था कि इसका नामकरण पत्ती के गिरने से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण का परिणाम है। उसी का अर्थ विस्तार सभी वनस्पतियों के लिए हुआ है और उसका अर्थोत्कर्ष संपदा के रूप में हुआ । पत्ती, पत्र, पत्तल, पात्र, पाट, पॉटरी, पैटर्न, पोटली, की श्रृंखला के विषय में मैं आज भी यह मानता हूं इसमें इनमें पत्ती और उससे बने हुए आदिम पात्रों का हाथ है और ऐसा उसी प्राकृतिक परिवेश में संभव है जहां बर्फ नहीं पड़ती थी इसलिए बड़ी पत्तियों वाले पेड़ों की बहुतायत थी और ऐसे पत्ते सुलभ थे जिन पर किसी चीज को रखकर खाया जा सके। भारत में यह सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन कि आज भी जीवित है। किसी अन्य देश के विषय में ऐसी जानकारी हमें उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे संभव है मेरे पूर्वाग्रह काम करते रहे हों, परंतु पत्तल, पात्र, पॉट, पतीला और पोटरी का ध्वनिगत और अर्थगत अनुक्रम जितना निर्णायक है उतना निर्णायक प्रमाण एक भी भारोपीय भाषा दार्शनिकों ने आज तक नहीं दिया ौर तिनकों को पहाड़ बना कर अपनी मनमानी लादते रहे।

परंतु संपत्ति के विषय में मेरे विचारों में कुछ परिवर्तन आया है। मैं यह तो मानता हूं की पत पानी की बूंद की आवाज है और जल की पत संज्ञा का आधार यही है । सभी वनस्पतियों में रस या आर्द्रता पाई जाती है इसलिए उनका जातीय नामकरण जल के इस गुण के कारण हुआ है। परंतु ऐसी स्थिति में तो पत्ती का भी अर्थ बदल जाएगा। पत्ती जिसमे रस पाया जाता है, न कि वह जिसके गिरने से पत् की आवाज होती है। ऋग्वेद की भाषा में कहें तो को ददर्श प्रथमं संज्ञमानं । कुछ मामलों में संदेह का बना रह जाना भी तार्किक विचार की सीमा में आता है।

अर्थ
अर्थ का अर्थ है किसी लता या वनस्पति को निचोड़कर बाहर निकाला हुआ रस या सारतत्व । यह पहले समस्त खाद्य और पेय के लिए और फिर संपदा के दूसरे सभी रूपों के लिए व्यवहार में आने लगा, परंतु जब हम शब्द का अर्थ कहते हैं तो प्राचीन भाव जागृत हो जाता है, भले हम मूल अर्थ ग्रहण करने की जगह रूढ़ आशय से ही अपना काम चलाते हों। जब हम शब्दों के मूल अर्थ का साक्षात्कार करते हैं या जिस अनुपात में यह संभव होता है उस अनुपात में भाषा एक जीवंत सत्ता बनकर उपस्थित होती है, न कि वर्तनी उच्चारण और भाव का जमाकडा।

ऋग्वेद के समय तक अर्थ और अर्थी – अर्थकामी धन और धनकामना का आशय में चलन में थेः
अर्थमिद् वा उ अर्थिन आ जाया युवते पतिम् ।
रोचक है ऐसे स्थानों पर ऋग्वेद ग्रिफिथ ने अर्थ का अनर्थ करते हुए विश कर दिया है जिससे उन्नत अर्थव्यवस्था का आभास न मिले।

द्रव्य/द्रविण
द्रव्य और द्रविण में द्र/ द्रव इतना स्पष्ट है कि किसी व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता। ऋग्वेद से अपने परिचय के आरंभिक दिनों में मैंने द्रव और द्रविण (विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत् पृथिव्याम् ) को धातु गलाने की वैदिक विद्या का प्रमाण मान लिया था। विद्या का पता तो उन्हें था इसके प्रमाण भी ऋग्वेद में है। धातु गलाने वाले को द्रवी कहा भी गया है (विजेहमानः परशुर्न जिह्वां द्रविर्न द्रावयति दारु धक्षत् । । 6.3.4) परन्तु मैने कुछ चूक की थी, यह आभास अब हुआ है। ऋग्वेद में द्रविण धन के विविध रूपों का द्योतक प्रतीत होता है (अस्मे रयिं विश्ववारं समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि ।। 5.4.7) और इसलिए इसकी आकांक्षा भी बार-बार व्यक्त की गई है, इसका मूल आशय रस से भरे हुए खाद्य पदार्थों के लिए ही रहा लगता है।
द्रवित होना पसीजने का पर्याय है ही।

रेक्ण
रेक्ण का प्रयोग ऋग्वेद के बाद मेरे देखने में नहीं आया, ऋग्वेद में भी इसका प्रयोग अधिक नहीं हुआ है (ददी रेक्णस्तन्वे ददिर्वसु ददिर्वाजेषु पुरुहूत वाजिना) परंतु अंग्रेजी के रिच, रिचेज, को इसका सजात मान सकते है। हम इसे रेचन से व्युत्पन्न मान सकते हैं जिसका अर्थ जल है।

नृम्ण
नृम्ण का प्रयोग भी वैदिक काल के बाद शायद ही हुआ हो। इसे मैं मनुष्य द्वारा अपने सामर्थ्य उत्पादित धन के रूप में ग्रहण करना चाहता हूं परंतु साथ ही यह नहीं भूल पाता कि नर का अर्थ भी जल है । नर, नारा, नीर, नूर एक ही श्रृंखला के शब्द हैं यद्यपि नर का पुरुष के आशय में प्रयोग होते रहने के कारण जल वाला अर्थ हमारे लिए अपरिचित है। नूर तो फारसी में भी प्रकाश या कांति के आशय में ही बचा रह गया लगता है।

हिरण्य
चालू व्याख्या में हम कह सकते हैं की यह वह मूल्यवान धातु है जिसकी खोज जाती है, पर हर, हरि, हिर सभी जल के ही पर्याय हैं। हीरा या हीरक में भी इसे देखा जा सकता है।

स्वर्ण
स्वः का अर्थ जल है, इसका प्रयोग सूर्य के लिए भी देखा जा सकता है (तपन्अति शत्रुं स्वः न भूमा) अर्ण के विषय में यहां कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। अतः यह जल के लिए प्रयुक्त दो शब्दों से बना हुआ पद है।

कंचन/ कनक
कंचन में भी प्रयुक्त कन् और चन दोनों शब्द जलवाची हैं। कनक में भी कन् की उपस्थिति देखी जा सकती है।

रजत
रजत में भी रज शब्द से हम पहले परिचित हो चुके हैं जिसका एक अर्थ है जल है और दूसरा उसके गुणों वाला श्वेत रंग का चमकने वाला पदार्थ और इसी आशय में इसका प्रयोग चांदी के लिए ऋग्वेद में हुआ है और आज भी होता है।

चंद्र
चंद्र के विषय में यह पहले का आए हैं इसमें चन् और द्र, दो जलार्थक शब्दों का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में चंद्रम का प्रयोग लगभग उसी अनुपात में हुआ है जिस अनुपात में हिरण्य का। परंतु इसको भ्रमवश चंद्रमा के आशय में ही ग्रहण किया जाता रहा। मैंने पहली बार इसके बहुवचन रूप तालिका बद्ध करके तुलना करते हुए हमने सुझाया कि चांदी चंद्रम से ही व्युत्पन्न है और वैदिक काल में चांदी का बहुत प्रचुरता से प्रयोग हुआ करता था। वास्तव में रजत शब्द का प्रयोग ईरान से आगे की भाषाओं में अधिक पाया जाता है। तमिल में शब्द के आरंभ में रकार होने पर उच्चारण की सुकरता के लिए अकार का सहारा लिया जाता है और इसलिए अर्जेंटम रजत की देन है।

Post – 2018-04-30

धन-संपत्ति के रूप (2)

संपत्ति
संपत्ति के विषय में एक समय में यह सोचता था कि इसका नामकरण पत्ती के गिरने से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण का परिणाम है। उसी का अर्थ विस्तार सभी वनस्पतियों के लिए हुआ है और उसका अर्थोत्कर्ष संपदा के रूप में हुआ । पत्ती, पत्र, पत्तल, पात्र, पाट, पॉटरी, पैटर्न, पोटली, की श्रृंखला के विषय में मैं आज भी यह मानता हूं इसमें इनमें पत्ती और उससे बने हुए आदिम पात्रों का हाथ है और ऐसा उसी प्राकृतिक परिवेश में संभव है जहां बर्फ नहीं पड़ती थी इसलिए बड़ी पत्तियों वाले पेड़ों की बहुतायत थी और ऐसे पत्ते सुलभ थे जिन पर किसी चीज को रखकर खाया जा सके। भारत में यह सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन कि आज भी जीवित है। किसी अन्य देश के विषय में ऐसी जानकारी हमें उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे संभव है मेरे पूर्वाग्रह काम करते रहे हों, परंतु पत्तल, पात्र, पॉट, पतीला और पोटरी का ध्वनिगत और अर्थगत अनुक्रम जितना निर्णायक है उतना निर्णायक प्रमाण एक भी भारोपीय भाषा दार्शनिकों ने आज तक नहीं दिया ौर तिनकों को पहाड़ बना कर अपनी मनमानी लादते रहे।

परंतु संपत्ति के विषय में मेरे विचारों में कुछ परिवर्तन आया है। मैं यह तो मानता हूं की पत पानी की बूंद की आवाज है और जल की पत संज्ञा का आधार यही है । सभी वनस्पतियों में रस या आर्द्रता पाई जाती है इसलिए उनका जातीय नामकरण जल के इस गुण के कारण हुआ है। परंतु ऐसी स्थिति में तो पत्ती का भी अर्थ बदल जाएगा। पत्ती जिसमे रस पाया जाता है, न कि वह जिसके गिरने से पत् की आवाज होती है। ऋग्वेद की भाषा में कहें तो को ददर्श प्रथमं संज्ञमानं । कुछ मामलों में संदेह का बना रह जाना भी तार्किक विचार की सीमा में आता है।

अर्थ
अर्थ का अर्थ है किसी लता या वनस्पति को निचोड़कर बाहर निकाला हुआ रस या सारतत्व । यह पहले समस्त खाद्य और पेय के लिए और फिर संपदा के दूसरे सभी रूपों के लिए व्यवहार में आने लगा, परंतु जब हम शब्द का अर्थ कहते हैं तो प्राचीन भाव जागृत हो जाता है, भले हम मूल अर्थ ग्रहण करने की जगह रूढ़ आशय से ही अपना काम चलाते हों। जब हम शब्दों के मूल अर्थ का साक्षात्कार करते हैं या जिस अनुपात में यह संभव होता है उस अनुपात में भाषा एक जीवंत सत्ता बनकर उपस्थित होती है, न कि वर्तनी उच्चारण और भाव का जमाकडा।

ऋग्वेद के समय तक अर्थ और अर्थी – अर्थकामी धन और धनकामना का आशय में चलन में थेः
अर्थमिद् वा उ अर्थिन आ जाया युवते पतिम् ।
रोचक है ऐसे स्थानों पर ऋग्वेद ग्रिफिथ ने अर्थ का अनर्थ करते हुए विश कर दिया है जिससे उन्नत अर्थव्यवस्था का आभास न मिले।

द्रव्य/द्रविण
द्रव्य और द्रविण में द्र/ द्रव इतना स्पष्ट है कि किसी व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता। ऋग्वेद से अपने परिचय के आरंभिक दिनों में मैंने द्रव और द्रविण (विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत् पृथिव्याम् ) को धातु गलाने की वैदिक विद्या का प्रमाण मान लिया था। विद्या का पता तो उन्हें था इसके प्रमाण भी ऋग्वेद में है। धातु गलाने वाले को द्रवी कहा भी गया है (विजेहमानः परशुर्न जिह्वां द्रविर्न द्रावयति दारु धक्षत् । । 6.3.4) परन्तु मैने कुछ चूक की थी, यह आभास अब हुआ है। ऋग्वेद में द्रविण धन के विविध रूपों का द्योतक प्रतीत होता है (अस्मे रयिं विश्ववारं समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि ।। 5.4.7) और इसलिए इसकी आकांक्षा भी बार-बार व्यक्त की गई है, इसका मूल आशय रस से भरे हुए खाद्य पदार्थों के लिए ही रहा लगता है।
द्रवित होना पसीजने का पर्याय है ही।

रेक्ण
रेक्ण का प्रयोग ऋग्वेद के बाद मेरे देखने में नहीं आया, ऋग्वेद में भी इसका प्रयोग अधिक नहीं हुआ है (ददी रेक्णस्तन्वे ददिर्वसु ददिर्वाजेषु पुरुहूत वाजिना) परंतु अंग्रेजी के रिच, रिचेज, को इसका सजात मान सकते है। हम इसे रेचन से व्युत्पन्न मान सकते हैं जिसका अर्थ जल है।

नृम्ण
नृम्ण का प्रयोग भी वैदिक काल के बाद शायद ही हुआ हो। इसे मैं मनुष्य द्वारा अपने सामर्थ्य उत्पादित धन के रूप में ग्रहण करना चाहता हूं परंतु साथ ही यह नहीं भूल पाता कि नर का अर्थ भी जल है । नर, नारा, नीर, नूर एक ही श्रृंखला के शब्द हैं यद्यपि नर का पुरुष के आशय में प्रयोग होते रहने के कारण जल वाला अर्थ हमारे लिए अपरिचित है। नूर तो फारसी में भी प्रकाश या कांति के आशय में ही बचा रह गया लगता है।

हिरण्य
चालू व्याख्या में हम कह सकते हैं की यह वह मूल्यवान धातु है जिसकी खोज जाती है, पर हर, हरि, हिर सभी जल के ही पर्याय हैं। हीरा या हीरक में भी इसे देखा जा सकता है।

स्वर्ण
स्वः का अर्थ जल है, इसका प्रयोग सूर्य के लिए भी देखा जा सकता है (तपन्अति शत्रुं स्वः न भूमा) अर्ण के विषय में यहां कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। अतः यह जल के लिए प्रयुक्त दो शब्दों से बना हुआ पद है।

कंचन/ कनक
कंचन में भी प्रयुक्त कन् और चन दोनों शब्द जलवाची हैं। कनक में भी कन् की उपस्थिति देखी जा सकती है।

रजत
रजत में भी रज शब्द से हम पहले परिचित हो चुके हैं जिसका एक अर्थ है जल है और दूसरा उसके गुणों वाला श्वेत रंग का चमकने वाला पदार्थ और इसी आशय में इसका प्रयोग चांदी के लिए ऋग्वेद में हुआ है और आज भी होता है।

चंद्र
चंद्र के विषय में यह पहले का आए हैं इसमें चन् और द्र, दो जलार्थक शब्दों का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में चंद्रम का प्रयोग लगभग उसी अनुपात में हुआ है जिस अनुपात में हिरण्य का। परंतु इसको भ्रमवश चंद्रमा के आशय में ही ग्रहण किया जाता रहा। मैंने पहली बार इसके बहुवचन रूप तालिका बद्ध करके तुलना करते हुए हमने सुझाया कि चांदी चंद्रम से ही व्युत्पन्न है और वैदिक काल में चांदी का बहुत प्रचुरता से प्रयोग हुआ करता था। वास्तव में रजत शब्द का प्रयोग ईरान से आगे की भाषाओं में अधिक पाया जाता है। तमिल में शब्द के आरंभ में रकार होने पर उच्चारण की सुकरता के लिए अकार का सहारा लिया जाता है और इसलिए अर्जेंटम रजत की देन है।

Post – 2018-04-30

सवाल विश्वसनीयता का है

आज भारत के सभी दल आसन्न भविष्य में सत्ता हासिल करने के लिए नहीं , अपितु भाजपा को सत्ता से वंचित करने के लिए, किसी भी तरह का जोड़-तोड़ करने और गर्हित से गर्हित हथकंडा अपनाने को तैयार हैं और इसके बाद भी उन्हें भरोसा नहीं कि वे ऐसा करने में सफल होंगे। इससे तीन बातें स्वतः सिद्ध हैः
1. वे दिशाहीन हें, उनमें सत्ता की भूख तो है, पर आगे का कोई ठोस कार्यक्रम नही है;
२. सभी मानते हैं की उनमें से कोई अकेला मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा का सामना नहीं कर सकता और सभी मिलकर भी उसके बराबर नहीं है और

३. यह कि पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लगातार कोसने के बाद भी जनसाधारण के बीच भाजपा की साख इन सभी की अपेक्षा अधिक बनी हुई है, अन्यथा इनके निराश होने की कोई वजह वजह न थी।

ऐसी स्थिति में समस्या सत्ता हासिल करने की नहीं है, अपितु विश्वसनीयता अर्जित करने की है। मोदी को तीन बार ऐसे निर्णय लेने पड़े जो किसी व्यक्ति और प्रशासन की विश्वसनीयता को समाप्त कर सकते थे:
१. विमुद्रीकरण का प्रयोग स्वयं ही जोखिम भरा प्रयोग था, क्योंकि इससे पहले यदि किसी देश ने ऐसा प्रयोग किया था तो सत्ता पलट गई थी । विपक्ष और राजनीतिक दलों से लगाव रखने वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी इस उम्मीद में थे कि यहां भी ऐसा हो सकता है और इसलिए उन्होंने अपना सारा जोर लगा दिया था। सभी संचारमाध्यम मोदी की कटु आलोचना कर रहे थे और इस प्रयोग से जनता को होने वाली कठिनाइयों का हृदयविदारक चित्र प्रस्तुत कर रहे थे। कई बार संचार माध्यमों का प्रयोग लोगों को उकसाने के लिए किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने अपनी सीमा तोड़कर बयान दिया, राष्ट्रपति ने भी दबी जुबान से अपनी निराशा प्रकट की।

यह कोई नहीं कह सकता कि सार्वजनिक जीवन पर, छोटे काम-धंधों पर और कुछ दूर तक बड़े उद्योगों पर भी तत्समय या उसके बाद तक इसका प्रभाव कष्टकर नहीं रहा। इसके बावजूद जो बुद्धिजीवी मोदी की निंदा करने के लिए मुहावरों का अनुसंधान करते रहते थे, उन्हें भी यह देख कर आश्चर्य हुआ, कि इतना सब कुछ सहने ने के बाद भी जनता मे मोदी की विश्वसनीयता कम नहीं हुई।

२. जीएसटी दूसरा प्रयोग था जिससे अर्थव्यवस्था ही नहीं कुछ समय के लिए कर की उगाही में भी निराशाजनक परिणाम देखने को मिले । इसके बाद भी इससे प्रभावित व्यापारियों के बीच भी मोदी की विश्वसनीयता पर आंच नहीं आई, या आई तो इतनी कम कि उसका निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा।

३. विदेशनीति में एक और सबको साथ लेने के व्यक्तिगत और कूटनीतिक प्रयत्न जिनमे बरती गई उदारता को देश के लिए अहितकर बताया जाता रहा और दूसरी और सामरिक तैयारी जिसे भी मोदी की युयुत्सु प्रकृति का प्रमाण माना गया जब की विभिन्न कारणों से उनकी सफलता मोदी को एक दूरदर्शी राजविद सिद्ध किया.

कतिपय नकली मुद्दे उठा कर जाटों को, पाटीदारों को, दलितों को, मुसलमानों को भड़काने ओर अलगाने के प्रयत्न किए गए। विक्षोभ को, अपवित्र साधनों का प्रयोग करते हुए, इस सीमा तक पहुंचाया गया कि पूरे देश में अराजकता फैल जाए।

बुद्धिजीवियों ने या तो मुखर होकर अराजक तत्वों का साथ दिया, या चुप्पी साध ली। उन्हें कभी ऐसे अशोभन तरीकों की निंदा करते हुए नहीं पाया गया। घबराहट के कारण हडबडी में पाखंड और धूर्ततापूर्ण प्रदर्शनों का जाने कितनी बार प्रयोग किया गया और इसमें विदेशी परामर्शदाताओं तक का भी सहयोग लिया गया।

कई बार जनता की नजर में देशद्रोह प्रतीत होने वाले प्रदर्शन और आयोजन किए गए,। बुद्धिजीवियों द्वारा उनकी हिमायत की गई। ऎसी स्थिति में जहां हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए अशोभन तरीके से भगवा ध्वज का प्रदर्शनीय प्रयोग हुआ या गोरक्षा के नाम पर पशु तस्करों की प्रतारणा और लूटपाट की घटनाएं घटी और समस्या की संवेदनशीलता को देखते हुए भाजपा सरकारों ने भी ठंडा रवैया अपनाया, और अपराधियों को दंडित करने में विलंब या संकोच किया, वहां पर दूसरी पाखंडपूर्ण गतिविधियों के कारण, कम से कम हिंदू समाज में, यह विश्वास पैदा नहीं हो सका कि इन सब के पीछे कांग्रेस का हाथ नहीं है ।

प्रशासन की विफलता सिद्ध करने के लिए रेलवे के न जाने कितने एक्सीडेंट कराए गए, जिनमें मानव हस्तक्षेप को छुपाया नहीं जा सकता था, और इन दुर्घटनाओं पर उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने की जगह प्रशासन की खिल्ली उड़ाई जाती रही।

मुसलमानों में नितान्त मामूली और काल्पनिक आधार पर ( सोचिए, दो दो बीवियां रखने वाला एक हीरो तीसरी की तैयारी कर रहा है और उसकी पत्नी अपनी असुरक्षा का सवाल उठाती है तो वह इसे मुसलमानों के मन में असुरक्षा की भावना का सवाल बना देता है), कभी-कभी शातिराना ढंग से,असंतोष भड़काने के प्रयत्न किए गए ( JNU का IS से जुड़ाव रखने वाला एक लड़का ABVP नेता को पीटने के बाद चुपके से गायब हो जाता है और बहुत बाद में उसकी असलियत पता चलती है पर उसकी मां को लेकर इस तरह के इशारे करते हुए बयान दिए जाते हैं मानो सरकार ने उसे जानबूझकर गायब कराया हो) , जबकि उसकी तुलना में अधिक जघन्य और संख्या में गणनातीत त्रासदियों के प्रति संचार माध्यम और बुद्धिजीवियों द्वारा लकवाग्रस्त उपेक्षा का प्रमाण दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शत्रु देशों के साथ छिपी सांठगांठ के प्रमाण दिए गए और सैन्य बलों के मनोबल को गिराने वाले बयान दिए जाते रहे, आहत और हताहत सैनिकों के प्रति संवेदनहीनता प्रदर्शित की जाती रही, और इस पर भी बुद्धिजीवी चुप रहे।

मोदी और भाजपा का विरोध करने वालों ने विरल अपवादों को छोड़कर तार्किक विश्लेषण का सहारा नहीं लिया, केवल मखौल उड़ाते रहे और विमर्श का स्तर नीचे गिरा कर आरोप प्रत्यारोप करते रहे, जो उनकी घृणा तो प्रकट करता था, परंतु समझदारी को नहीं । जिन क्षेत्रों में भारत की सफलता और नेतृत्व शक्ति, दुनिया में पहली बार आशा जगा रही थी, उनमें ऐसे बुद्धिजीवियों को कुछ दिखता ही नहीं या सब कुछ उलटा दिखाई दिया।

जिस बात को मोदी ने अपने पिछले चुनाव में केंद्रीय मुद्दा बनाया था अर्थात कांग्रेस पार्टी नहीं है वह एक वंश का राज्य है उसे उस वंश ने निर्लज्जता पूर्वक स्वीकार और प्रमाणित किया।

कांग्रेस के शासन की वापसी का सपना देखने वालों ने यह दोहराते हुए कि भाजपा ने कांग्रेस के ही कार्यक्रमों को कार्यान्वित किया, एक साथ दो बातें प्रमाणित की। पहला यह कि वर्तमान शासन उन योजनाओं को क्रियान्वित करने की क्षमता रखता है जिनके कांग्रेस केवल सपने देखती थी और कमीशन तय न हो पाने के कारण जो लटके रह जाते थे और दूसरे भाजपा की नीतियां राष्ट्रीय हित हैं। यदि किसी चीज में कमी है तो वह है उच्चतम स्तर से संचालित होने वाला भ्रष्टाचार।

ऐसी स्थिति में सामान्य जन को लगता है कि वे लोग जो कांग्रेस के शासन की वापसी के लिए बेचैन है, केवल भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस की वापसी चाहते हैं क्योंकि किसी अन्य बदलाव का संकेत उनके अब तक के बयानों या कार्यक्रम में उन्हें दिखाई दे रहा है?

कांग्रेस के लूटपाट के दौर में पत्रकारों शिक्षकों और बुद्धिजीवियों को भी तरह तरह से लाभान्वित किया जाता था ताकि वे चुप रहे या उसका समर्थन करें इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। इसके विरल अपवाद वे पत्रकार और बुद्धिजीवी हो सकते हैं जिनका लगाव ऐसे दलों से रहा है जो आज अपनी साख गंवाकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बुद्धिजीवियों की साख भी उसी तरह डाव पर उन्कीलग अतिसक्रियता के कारण लगती गई है पर उनको इसकी चिंता तक नहीं ।

मैं यहां वर्तमान शासन सफलताओं या उपलब्धियों की गिनती कराना नहीं चाहता परंतु यह दुखद है कि जो दल और बुद्धिजीवी विविध कारणों से अपनी विश्वसनीयता खोते गए हैं, या खोई हुई विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सके हैं, उन्हें उस दिशा में प्रयत्नशील तक नहीं देखा जा रहा है। ऊपर गिनाए गए उनके सारे प्रयत्न रही सही विश्वसनीयता को भी खत्म करने के लाजवाब प्रयोग तो कहें जा सकते हैं पर जनता से बीच अपनी विश्वसनीयता पैदा करने के प्रयोग नहीं माने जा सकते।

पहले भी मोदी को सफलता का नहीं राजनीतिक क्षेत्र में पैदा हुई रिक्तता का लाभ मिला था. विगत वर्षों में यह रिक्तता बढी है, न कि कम हुई है। इसका लाभ तो मोदी को और भाजपा को मिलना ही है।

व्यावहारिक राजनीति मैं धूर्तता और षड्यंत्र के बल पर कुछ भी हासिल किया जा सकता है और पहले भी हासिल किया गया है, इसलिए हम चुनाव की गणित में अपनी बात नहीं रख सकते। जाति धर्म और पैसे का ऐसा सदुपयोग हो सकता है कि सत्ता भाजपा के हाथ से चली जाए। किसी दल की लंबे समय तक उपस्थिति और शिक्षा और संस्कृति के मामले में उसकी नीतियां और व्यवहार जितने भी असंतोषजनक क्यों न हों, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा जीतकर तो कमजोर हो सकती है पर यदि हार हो ही गई तो दोबारा उसका और मजबूत बनकर सत्ता में आना निश्चित है।

Post – 2018-04-30

सवाल विश्वसनीयता का है

आज भारत के सभी दल आसन्न भविष्य में सत्ता हासिल करने के लिए नहीं , अपितु भाजपा को सत्ता से वंचित करने के लिए, किसी भी तरह का जोड़-तोड़ करने और गर्हित से गर्हित हथकंडा अपनाने को तैयार हैं और इसके बाद भी उन्हें भरोसा नहीं कि वे ऐसा करने में सफल होंगे। इससे तीन बातें स्वतः सिद्ध हैः
1. वे दिशाहीन हें, उनमें सत्ता की भूख तो है, पर आगे का कोई ठोस कार्यक्रम नही है;
२. सभी मानते हैं की उनमें से कोई अकेला मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा का सामना नहीं कर सकता और सभी मिलकर भी उसके बराबर नहीं है और

३. यह कि पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लगातार कोसने के बाद भी जनसाधारण के बीच भाजपा की साख इन सभी की अपेक्षा अधिक बनी हुई है, अन्यथा इनके निराश होने की कोई वजह वजह न थी।

ऐसी स्थिति में समस्या सत्ता हासिल करने की नहीं है, अपितु विश्वसनीयता अर्जित करने की है। मोदी को तीन बार ऐसे निर्णय लेने पड़े जो किसी व्यक्ति और प्रशासन की विश्वसनीयता को समाप्त कर सकते थे:
१. विमुद्रीकरण का प्रयोग स्वयं ही जोखिम भरा प्रयोग था, क्योंकि इससे पहले यदि किसी देश ने ऐसा प्रयोग किया था तो सत्ता पलट गई थी । विपक्ष और राजनीतिक दलों से लगाव रखने वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी इस उम्मीद में थे कि यहां भी ऐसा हो सकता है और इसलिए उन्होंने अपना सारा जोर लगा दिया था। सभी संचारमाध्यम मोदी की कटु आलोचना कर रहे थे और इस प्रयोग से जनता को होने वाली कठिनाइयों का हृदयविदारक चित्र प्रस्तुत कर रहे थे। कई बार संचार माध्यमों का प्रयोग लोगों को उकसाने के लिए किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने अपनी सीमा तोड़कर बयान दिया, राष्ट्रपति ने भी दबी जुबान से अपनी निराशा प्रकट की।

यह कोई नहीं कह सकता कि सार्वजनिक जीवन पर, छोटे काम-धंधों पर और कुछ दूर तक बड़े उद्योगों पर भी तत्समय या उसके बाद तक इसका प्रभाव कष्टकर नहीं रहा। इसके बावजूद जो बुद्धिजीवी मोदी की निंदा करने के लिए मुहावरों का अनुसंधान करते रहते थे, उन्हें भी यह देख कर आश्चर्य हुआ, कि इतना सब कुछ सहने ने के बाद भी जनता मे मोदी की विश्वसनीयता कम नहीं हुई।

२. जीएसटी दूसरा प्रयोग था जिससे अर्थव्यवस्था ही नहीं कुछ समय के लिए कर की उगाही में भी निराशाजनक परिणाम देखने को मिले । इसके बाद भी इससे प्रभावित व्यापारियों के बीच भी मोदी की विश्वसनीयता पर आंच नहीं आई, या आई तो इतनी कम कि उसका निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा।

३. विदेशनीति में एक और सबको साथ लेने के व्यक्तिगत और कूटनीतिक प्रयत्न जिनमे बरती गई उदारता को देश के लिए अहितकर बताया जाता रहा और दूसरी और सामरिक तैयारी जिसे भी मोदी की युयुत्सु प्रकृति का प्रमाण माना गया जब की विभिन्न कारणों से उनकी सफलता मोदी को एक दूरदर्शी राजविद सिद्ध किया.

कतिपय नकली मुद्दे उठा कर जाटों को, पाटीदारों को, दलितों को, मुसलमानों को भड़काने ओर अलगाने के प्रयत्न किए गए। विक्षोभ को, अपवित्र साधनों का प्रयोग करते हुए, इस सीमा तक पहुंचाया गया कि पूरे देश में अराजकता फैल जाए।

बुद्धिजीवियों ने या तो मुखर होकर अराजक तत्वों का साथ दिया, या चुप्पी साध ली। उन्हें कभी ऐसे अशोभन तरीकों की निंदा करते हुए नहीं पाया गया। घबराहट के कारण हडबडी में पाखंड और धूर्ततापूर्ण प्रदर्शनों का जाने कितनी बार प्रयोग किया गया और इसमें विदेशी परामर्शदाताओं तक का भी सहयोग लिया गया।

कई बार जनता की नजर में देशद्रोह प्रतीत होने वाले प्रदर्शन और आयोजन किए गए,। बुद्धिजीवियों द्वारा उनकी हिमायत की गई। ऎसी स्थिति में जहां हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए अशोभन तरीके से भगवा ध्वज का प्रदर्शनीय प्रयोग हुआ या गोरक्षा के नाम पर पशु तस्करों की प्रतारणा और लूटपाट की घटनाएं घटी और समस्या की संवेदनशीलता को देखते हुए भाजपा सरकारों ने भी ठंडा रवैया अपनाया, और अपराधियों को दंडित करने में विलंब या संकोच किया, वहां पर दूसरी पाखंडपूर्ण गतिविधियों के कारण, कम से कम हिंदू समाज में, यह विश्वास पैदा नहीं हो सका कि इन सब के पीछे कांग्रेस का हाथ नहीं है ।

प्रशासन की विफलता सिद्ध करने के लिए रेलवे के न जाने कितने एक्सीडेंट कराए गए, जिनमें मानव हस्तक्षेप को छुपाया नहीं जा सकता था, और इन दुर्घटनाओं पर उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने की जगह प्रशासन की खिल्ली उड़ाई जाती रही।

मुसलमानों में नितान्त मामूली और काल्पनिक आधार पर ( सोचिए, दो दो बीवियां रखने वाला एक हीरो तीसरी की तैयारी कर रहा है और उसकी पत्नी अपनी असुरक्षा का सवाल उठाती है तो वह इसे मुसलमानों के मन में असुरक्षा की भावना का सवाल बना देता है), कभी-कभी शातिराना ढंग से,असंतोष भड़काने के प्रयत्न किए गए ( JNU का IS से जुड़ाव रखने वाला एक लड़का ABVP नेता को पीटने के बाद चुपके से गायब हो जाता है और बहुत बाद में उसकी असलियत पता चलती है पर उसकी मां को लेकर इस तरह के इशारे करते हुए बयान दिए जाते हैं मानो सरकार ने उसे जानबूझकर गायब कराया हो) , जबकि उसकी तुलना में अधिक जघन्य और संख्या में गणनातीत त्रासदियों के प्रति संचार माध्यम और बुद्धिजीवियों द्वारा लकवाग्रस्त उपेक्षा का प्रमाण दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शत्रु देशों के साथ छिपी सांठगांठ के प्रमाण दिए गए और सैन्य बलों के मनोबल को गिराने वाले बयान दिए जाते रहे, आहत और हताहत सैनिकों के प्रति संवेदनहीनता प्रदर्शित की जाती रही, और इस पर भी बुद्धिजीवी चुप रहे।

मोदी और भाजपा का विरोध करने वालों ने विरल अपवादों को छोड़कर तार्किक विश्लेषण का सहारा नहीं लिया, केवल मखौल उड़ाते रहे और विमर्श का स्तर नीचे गिरा कर आरोप प्रत्यारोप करते रहे, जो उनकी घृणा तो प्रकट करता था, परंतु समझदारी को नहीं । जिन क्षेत्रों में भारत की सफलता और नेतृत्व शक्ति, दुनिया में पहली बार आशा जगा रही थी, उनमें ऐसे बुद्धिजीवियों को कुछ दिखता ही नहीं या सब कुछ उलटा दिखाई दिया।

जिस बात को मोदी ने अपने पिछले चुनाव में केंद्रीय मुद्दा बनाया था अर्थात कांग्रेस पार्टी नहीं है वह एक वंश का राज्य है उसे उस वंश ने निर्लज्जता पूर्वक स्वीकार और प्रमाणित किया।

कांग्रेस के शासन की वापसी का सपना देखने वालों ने यह दोहराते हुए कि भाजपा ने कांग्रेस के ही कार्यक्रमों को कार्यान्वित किया, एक साथ दो बातें प्रमाणित की। पहला यह कि वर्तमान शासन उन योजनाओं को क्रियान्वित करने की क्षमता रखता है जिनके कांग्रेस केवल सपने देखती थी और कमीशन तय न हो पाने के कारण जो लटके रह जाते थे और दूसरे भाजपा की नीतियां राष्ट्रीय हित हैं। यदि किसी चीज में कमी है तो वह है उच्चतम स्तर से संचालित होने वाला भ्रष्टाचार।

ऐसी स्थिति में सामान्य जन को लगता है कि वे लोग जो कांग्रेस के शासन की वापसी के लिए बेचैन है, केवल भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस की वापसी चाहते हैं क्योंकि किसी अन्य बदलाव का संकेत उनके अब तक के बयानों या कार्यक्रम में उन्हें दिखाई दे रहा है?

कांग्रेस के लूटपाट के दौर में पत्रकारों शिक्षकों और बुद्धिजीवियों को भी तरह तरह से लाभान्वित किया जाता था ताकि वे चुप रहे या उसका समर्थन करें इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। इसके विरल अपवाद वे पत्रकार और बुद्धिजीवी हो सकते हैं जिनका लगाव ऐसे दलों से रहा है जो आज अपनी साख गंवाकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बुद्धिजीवियों की साख भी उसी तरह डाव पर उन्कीलग अतिसक्रियता के कारण लगती गई है पर उनको इसकी चिंता तक नहीं ।

मैं यहां वर्तमान शासन सफलताओं या उपलब्धियों की गिनती कराना नहीं चाहता परंतु यह दुखद है कि जो दल और बुद्धिजीवी विविध कारणों से अपनी विश्वसनीयता खोते गए हैं, या खोई हुई विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सके हैं, उन्हें उस दिशा में प्रयत्नशील तक नहीं देखा जा रहा है। ऊपर गिनाए गए उनके सारे प्रयत्न रही सही विश्वसनीयता को भी खत्म करने के लाजवाब प्रयोग तो कहें जा सकते हैं पर जनता से बीच अपनी विश्वसनीयता पैदा करने के प्रयोग नहीं माने जा सकते।

पहले भी मोदी को सफलता का नहीं राजनीतिक क्षेत्र में पैदा हुई रिक्तता का लाभ मिला था. विगत वर्षों में यह रिक्तता बढी है, न कि कम हुई है। इसका लाभ तो मोदी को और भाजपा को मिलना ही है।

व्यावहारिक राजनीति मैं धूर्तता और षड्यंत्र के बल पर कुछ भी हासिल किया जा सकता है और पहले भी हासिल किया गया है, इसलिए हम चुनाव की गणित में अपनी बात नहीं रख सकते। जाति धर्म और पैसे का ऐसा सदुपयोग हो सकता है कि सत्ता भाजपा के हाथ से चली जाए। किसी दल की लंबे समय तक उपस्थिति और शिक्षा और संस्कृति के मामले में उसकी नीतियां और व्यवहार जितने भी असंतोषजनक क्यों न हों, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा जीतकर तो कमजोर हो सकती है पर यदि हार हो ही गई तो दोबारा उसका और मजबूत बनकर सत्ता में आना निश्चित है।