Post – 2016-02-11

मैंने कहा था, हिन्‍दी पर अगली पोस्‍ट शाम को, पर नहीं जानता था कि उस पोस्‍ट को पूरा करने के बीच में ही कविता की कृपा हो जाएगी। इसलिए उसे कल के लिए स्‍थगित करते हुए इस खुराफात पर नजर डालें:

रात ऐसी कि तड़प बन गई हो खामोशी।
दिन कुछ ऐसा कि रोशनी में दिखाई न पड़़े।
याद ऐसी है कि कॉमा में जगह ढूढ़ते हैं
चीख ऐसी कि पासबॉं को सुनाई न पड़े ।
गुरुवार, 11 फरवरी 2016
कल मिलेंगे।
पर यह रचना प्रकिया का एक रहस्‍य है जो मुझे भी नहीं मालूम था और आप को भी मालूम न होगा। इससे पहले मैंने उन पोस्‍टों को देखा था जिनमे जेएनयू मे अफजल गुरु की आड़ में अराजकता और राष्‍ट्रद्राेह फैलाने के आयोजन किए गए थे। जेएनयू वामपंथी रुझान के लिए जाना जाता रहा है, वैचारिक खुलेपन के लिए नहीं। वामपन्‍थी भटकाव कदम दर कदम बढ़ते हुए राष्‍ट्रद्रोह और अराजकता का पर्याय बन जाएगा यह सोचा तक न था। यह चिन्‍ता अन्‍तर्मन में थी और काम अपने विषय पर कर रहा था, चिन्‍ता ने विवेक को रौदते हुए कविता मे अपनी अभिव्‍यक्ति ढूढते हुए लेखन क रास्‍ता रोक लिया। अपनी सांकेतिक भाषा में कहा, किस युग में अटके हो, इस यथार्थ को तो देखो। मैं कितना अकिंचन हूॅ और कितना असहाय।
पत्थर भी कोई है जो सिर को सुकून देगा, टकरा भी अगर दूँ तो क्या खून भी निकलेगा।

Post – 2016-02-11

”यह बताओ, तुम्हागरे पास जादू की कौन सी छड़ी है जिससे तुम हिन्दी को भारतीय संपर्क भाषा बनने का सपना देखते हो और कौन सी ऐसी भन्नताऍं हैं जिनके कारण तुमको पाकिस्तान में उर्दू की स्वीकृति असंभव लगती है।”

”इतने सारे सवाल । मैं तो इनमें पहले का ही जवाब दे सकूँ तेा धन्य समझूँगा। पहली बात यह जादू की छड़ी न तो कभी मेरे पास थी, न ही उसकी कामना करता हूँ। छड़ी का जादू छड़ी के हटते ही टूट जाता है। मेरे पास इतिहास की एक मोटी समझ है जिसमें यह संभव प्रतीत होता है।”

”यह समझ सिर्फ तुम्हें है, और किसी को नहीं।”

”दूसरों को इतिहास की बारीक समझ है इसलिए वे इसके साथ छेड़छाड़ करते रहते हैं, इसालिए उसे समझ नहीं पाते। वे उससे डरते हैं, उसे अपनी भट्ठी का ईंधन बना कर रखना चाहते है, और लापरवाही में अपना हाथ भी जला लेते हैं। मैं उसे देखता हूँ, उसके रुख को पहचानता हूँ और उससे संवाद तक कर लेता हूँ क्योंकि उसकी संकेत भाषा समझता हूँ।”

”तब तो तुम्हारी आरती उतारनी पड़ेगी।”

”उसमें तो सीधे आग से पाला पड़ेगा और तुम अपनी दाढ़ी भी जला बैठोगे। इसलिए ऐसा जोखिम मत उठाओ, मैं तुम्हें स्वयं उसके पास ले चलता हूँ।”

”देखो, उन्नीसवीं शताब्दी में कोई इस बात का सपना तक नहीं देखता था कि यह देश कभी आजाद हो सकेगा, सिर्फ अंग्रेजों को पता था कि उनके पॉंव जमीन पर नहीं है, वे अधर में लटके हुए है, उन्‍हें यह आशंका भी थी कि 1857 के दमन का गुस्‍सा भारतीय मानस में भरा हो सकता है और कभी उग्र रूप ले सकता है। इसलिए वे तभी तक सुरक्षित है जब तक भारतीय आपस में लड़ते रहें। यह नीति उन्होंने टीपू (1799) की पराजय और उसके बाद दूसरे मराठा युद्ध में विजय (1805) और 1815 में तीसरे मराठा युद्ध में मराठा प्रतिरोध को पूरी तरह चूर करने के बाद जब कहीं से प्रभावशाली प्रतिरोध का खतरा नहीं रह गया तब अपनाई। इससे पहले वे यह मान कर चल रहे थे कि उन्होंने बंगाल की जमीन मुसलमान शासकों से छीनी थी सो मुसलमान ही उनके विरोधी हो सकते हैं, हिन्दुओं को मुस्लिम शासन से मुक्ति मिली है इसलिए वे आसानी से हमारे साथ आ सकते हैं, उन्होंने हिन्दू सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन और इसके नकारात्मक पक्षों की उपेक्षा करते हुए केवल धनात्मक पक्षों को उजागर करने की नीति तो अपनाई ही, इस बात की सावधानी भी बरती कि मिशनरियों की गतिविधियों को काबू में रखा जाय, जिससे वे जिन हिन्दुओं का सहयोग और समर्थन चाहते हैं वे बिदक न जायँ। यह याद रखना जरूरी है कि मुसलिम प्रतिरोध बंगाल में 1857 के संग्राम के बाद भी जारी रहा और उसी से चिन्तित हो कर हंटर ने जो खुफिया विभाग के प्रधान रह चुके थे मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध करने या कहें आपसी झगड़े लगा कर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का रास्ता अपनाया था।

”तुम किसी बात को इतना फैला देते हो, यदि मुझे तुम्हारी बीमारी को नाम देना हो तो इसे डायलोफीलिया नाम दूँगा और तुम्हें समझाने का प्रयास करूँगा कि तुमको किसी अस्पताल में भर्ती हो जाना चाहिए।”

”और यदि मैने पूछ लिया कि कौन सा अस्पताल तो तुम उसका नाम बताओगे जिसमें तुम आते जाते रहते हो। तुम्हें अपने अस्पलताल से भी प्रेम है और अपने आप से भी, और तुम जो अच्छे नंबर लाते रहे हो वह हिस्ट्री मेड ईजी, साइंस मेड ईजी, यूनिवर्स मेड ईजी जैसी किताबें पढ़ कर। तुम्हें झटपटिया ज्ञान है और मैं तुम्हें उस मनोविश्लेषण से गुजारना चाहता हूँ जिसमें अवचेतन की गहराइयों में उतर कर समस्याओं का कारण समझा जाता है, समाधान वहॉं नहीं मिलता। समाधान कारण को जानने के बाद हमें ही तलाशना होता है।
“तुम्हें आज इतनी ही खूराक काफी है। पहले इसे पचा लो तो उन गॉंठों पर बात करेंगे जिनसे मुक्ति के बिना हम राष्ट्राकवि की उन सरल पंक्तियों का भी अर्थ नहीं समझ सकते जो निरक्षरों को भी बोधगम्य लगती हैं :
हम कौन थे क्यां हो गए हैं और क्या होंगे अभी।
(कुछ घंटों बाद इसका अगला अंश)

अब इस तथ्य पर ध्यान दो िक मध्यकाल में शासकों के जो भी अन्याय रहे होंं सामान्य िहन्दुओं और मुसलमानों के बीच कटुता न थी । इसका प्रधान कारण यह था कि मुसलमानों का नब्बे प्रति शत धरमान्तरित िहन्दू थे िजन्हें विवशता में ऐसा करना पड़ा था। इसलिए दफ्तरों की भाषा जो भी रही हो आम बोलचाल की ज़बान ऐसी थी िजसमें
कुछ अरबी फारसी के शब्द थे जबान िहन्दी थी, हिन्दी ही कही जाती थी ।
सभी मुसलमान अपने क्षेत्र की बोली जानते और बोलते थे। विदेशी मूल पर गर्व करने वाले
आपस मे तुर्की या फारसी बंोलते थे । कविता करते समय उनकी जबान में कुछ ऐसे शब्द भी आ जाते थे जो आम बोलचाल में नहीं आए थे । पर इसे एक दोष माना जाता था । मीर का यह कथन िक ‘क्या जानूँ लोग कहते हैं किसको सरूरे कल्ब । आया नहीं है लफ्ज ये हिन्दी जबाँ के बीच ।’ इस सचाई को बयान करने के लिए काफी है । हाली के बारे में एक बार शमशेर बहादुर सिंह ने बताया था कि वह शब्द विचार के मामले में कहते थे कि हमारे घर में । इसके लिए यह बोला जाता है, अर्थात महिलाओं की बोली को वह भाषा की कसौटी मानते थे । जौक ने गालिब की भाषा का मजाक उड़ाते हुए कहा था मजा कहने का जब है एक कहे और दूसरा समझे, मगर इनका कहा ये आप समझें या खुदा समझे । गरज नाम भले उर्दू भी चलन में आ गया था पर उसका मतलब भी हिन्दी या आम बोलचाल की भाषा ही था, इसलिए भाषा को लेकर हिन्दू मुसलमान का फर्क न था । गालिब भी अपनी चूक सुधारने की ओर मुड़े थे । उनके वे ही शेर लोकप्रिय हैं जो आम जबान और मुहावरों में हैं। यह अलगाव १८७०के बाद प्रयत्न पूर्वक पैदा किया गया और इसी तरह गोकुशी को सह दे कर, कराने की कोशिशें शुरू हुंईं कि जिससे उनके कसाई खानों की ओर ध्यान न जाय। इसे प्रचारित जान बूझ कर किया जाता था। इसको खुले आम कराने के प्रयतन के बाद भी ऐसा विरल मामलों में ही होता था ।
‘तुम फिर बहक रहे हो।’
‘तुम ठीक कहते हो । यह समझो कि औरंगजेब ने भी अपनी मौत को निकट जान कर जो
दर्द और अफसोस भरा, लगभग आत्मग्लानि भरा पत्र दक्षिण भारत से अपने पुत्र को लिखा था उसे मुस्िलम शासकों के व्यवहार में एक मोड़ माना जा सकता है िजसमे भारतीय जमीन और जन से जुड़ने की तड़प साफ देखी जा सकती है यही कारण है १८५७ में । हिन्दू मुसलमान दोनों मेंइतना एका पैदा हो सका।
“यह पँवारा तुम क्यों दुहरा रहे हो?”
“यह याद दिलाने के िलए कि उन्नीसवीं सदी में भारतीय समाज अधिक एकजुट था, कि १८५७ का संग्राग हमारे जातीय आक्रोश की अभिव्यक्ति था, उसका लक्ष्य ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने काथा, जब िक सैयद अहमद का अभियान और कांग्रेस का लक्ष्य अपने और अपनों के लिए रियायतें माँगने का था। इसमें नजर िकसको क्या िमला इस पर थी और जब इसने डोमिनियन स्टेटस या स्वतन्त्रता की माँग करना शुरू किया तब भी
इसमें ऐसों का बोलबाला था जो अपने लिए कुछ चाहते थे और लगे हाथ कुछ देश को भी
मिल जाय तो उस पर उन्हें आपत्ति न थी।

Post – 2016-02-09

न मैंने सोचा न मैंने देखा न मैंने जाना

मैंने तो यह सोचा ही नहीं था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों की दशा एक जैसी ही है।

पहले तो यह समझो कि हिन्दुस्ताान नाम का कोई देश नहीं है, कभी हुआ करता था, कुछ सौ बरसों तक, अब वह भारत, पाकिस्तान और बांग्ला देश में बट चुका है, इसलिए अगर तुम हिन्दुरस्तान की बात करोगे तो पड़ोसियों को चिन्ता् होगी कि तुम उन्हेंं हड़पना चाहते हो। इंडिया भी उसे ही कहा जाता था। इंडिया जैसा देश भी नहीं है।

तुमने भारतीय संविधान पढ़ा है। इसके लिए संविधान पढ़ने की जरूरत नहीं।

हमारे संविधान में बहुत कुछ गलत था। न होता तो इतनी बार संशोधन की जरूरत नहीं पड़ती। यह नहीं कह सकते कि अभी बहुत कुछ गलत बचा नहीं रह गया है जिसके लिए आगे संशोधनों की जरूरत पड़ सकती है। इंडिया जिस नदी के नाम पर रखा गया था, वह पाकिस्तान में है। हिन्द जिस सिन्ध का ईरानी नाम था वह भी पाकिस्तान में है और देखो यह जो तुम ‘पंजाब सिन्धं गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंगा’ गाते हो उसको भी राष्ट्र संघ में चुनौती दी जा सकती है। तुम्हारे देश के किसी भूभाग को दूसरे के नक्शे में दिखा दिया जाय तो कोहराम मच जाता है और तुमने दूसरे देश का एक पूरा प्रान्त ही अपनी राष्ट्रगान में दबोच रखा है और उनको इसकी खबर ही नहीं। वह गाना ऐतिहासिक है, उसे विभाजित हिन्दुरस्तान का राष्‍ट्रगान नहीं बनाना चाहिए था।

इस पर तो मैंने गौर ही नहीं किया था।

गौर तो तुमने इस पर भी नहीं किया होगा कि जो अपने राज्यों की या अंचलों की भाषाऍं हैं उनको राष्ट्रभाषाऍं कहा जाने लगा मानो तुम्हारा देश राष्ट्र मंडल हो, न कि राष्ट्र , और जिसे राष्ट्रभाषा के रूप में परिकल्पित किया गया था और व्यावहारिक रूप में जो आज भी राष्ट्र भाषा है क्योंकि इसी का टूटा फूटा ज्ञान रखने वाला कोई न कोई तुम्हें उन क्षेत्रों के गॉंवों और अनपढ़ों में भी मिल जाएगा जिसने कसम खा रखी थी कि हम हिन्दी को राष्ट्राभाषा नहीं बनने देंगे, पूरे भारतीय भूभाग में कहीं सघन कहीं विरल इसी की उपस्थिति मिलती है, पर संविधान में इसे राजकाज की भाषा या अफिशियल लैंग्वेज कहा गया, भले उसमें काम न होता हो। राज्य भाषाऍं राष्ट्रभाषाऍं और राष्ट्रभाषा राजभाषा। यह उलटबॉंसियों का देश है यार।

तुम्हारी चले तो तुम इसे उपमहाद्वीपीय भाषा बना दो। किसी महाद्वीप या उपमहाद्वीप के लिए एक भाषा की कल्पना अभी तक की नहीं गई। ऐसी नौबत आई तो हम इसे सार्कभाषा तो कह ही सकते हैं।

देखो, स्वाधीनता से पहले भारतवर्ष को दो राष्ट्रीयताओं का देश बनाने का प्रयत्न किया गया और उसे सचाई में भी बदल डाला गया। अब जो एक राष्ट्र बचा रह गया था उसे तुमने दर्जनों राष्ट्रीयताओं का देश बना दिया है। तुम ही सोचो तुम्हें कैसा बावला नेतृत्व मिला और उसने देश को तोड़ने का काम किया है या जोड़ कर रखने का। आज भी ऐसी शक्तियॉं हैं जो इसी काम पर लगी हुई हैं।

अच्छा यह बताओ, यदि तुम्हारा वश चले तो किसे राष्ट्रदगान बनाओगे।

देखो, जब दुनिया में कहीं राष्ट्र की परिकल्पना तक नहीं थी, जब देव वन्द ना और राजा की वन्दना के अलावा कोई वन्दना तक न थी, उस समय एक कवि ने भारत के लिए एक वन्दना गीत लिखा था। मुस्क राओ नहीं, इस देश में बहुत कुछ है जो पच्छिमी नजर से देखने वालों को चकित करता है उसमें यह कथन भी चकित कर सकता है, पर सचाई को नकारा तो जा नहीं सकता, स्वीकारा भले न जाए।

तुम किस गीत की बात कर रहे हो।

विष्णुसपुराण में आए राष्ट्र गान का-
गायन्ति देवा किल गीतिकानि धन्यास्तु ते भारत भूमि भागे
स्वर्गापवर्गास्पद मार्गभूते भवन्ति भूय-पुरुषा सुरत्वात् ।

इस देश का नाम भारत है और युगों से यही नाम है । एक ईमानदार आदमी और स्वाभिमानी देश के लिए एक ही संज्ञा पर्याप्त है। दुनिया में किसी दूसरे देश के दो नाम नहीं होंगे । छद्मनाम चरित्रगत छद्मों की आशंका जगाते हैं । जिस भाषा में भारत तक नहीं कहा जा सकता, वह भाषा भारत की नहीं हो सकती।

तुम जानते हो तुम क्या कह रहे हो।

तुमको समझना होगा कि मैं क्या कह रहा हूँ क्योंकि डरा हुआ आदमी न सच को कह सकता है न समझ सकता है, यथास्थितिवादी होना उसकी नियति है। यदि यह नहीं समझ में आया कि क्या कह रहा हूँ तो इसका भाष्य करके बता दूँ कि मैं कह रहा हूँ हमने भावुकता से अधिक और विवेक से कम काम लिया, हम लोगों को खुश करने की कोशिश में अपना वजूद भूल गए । गनीमत इतनी ही है कि अधिनायक की वन्दना हम करते हैं और अधिनायक पाकिस्तान में पैदा होते हैं, इसलिए किसी भी मामले में हमारी दशा पाकिस्ता‍न जैसी नहीं हो सकती। भाषा के मामले में भी। पाकिस्तान के पास राष्ट्र भाषा है, अपनी भाषा नहीं है। पाकिस्ताान के किसी भाग की भाषा उर्दू नहीं थी। वह उस पर लादी गई इसलिए चल नहीं सकी। उर्दू उनके लिए विदेशी भाषा थी या कहो मुहाजिर भाषा थी और मुहाजिरों के बीच बोली और दूसरों द्वारा लगभग समझ ली जाती है। विदेशी भाषा में शुद्धता पर बहुत जोर होता है। मैट्रन के सामने बच्चे को पूर्णत: अनुशासित रहना होता है, वह लगातार सही होने की कोशिश में यन्त्र साधित और यन्त्रचालित शिशु बन जाता है। नियम कायदे मे बँध कर चेतना के स्तर पर गुलाम, वह केवल अपनी मॉं के साथ जो कुछ करे, शरारतें तक, कभी गलत नहीं होता। जानते हो कामकाजी महिलाऍं के्रच में नन्ही उम्र में ही डाल कर उनके बचपन को क्रश कर देती है इन बच्चो पर तरस भी आता है और इनके भविष्य को ले कर डर लगता है, उनके अपने लिए नहीं, उस समाज के लिए जिसमें बच्चों को मॉं की ममता से समय से पहले ही अलग कर दिया जाता है।

अब तुम बच्चोंा पर बात करोगे।

दे,खो मैं जिन्दा शब्दों में बात करता हूँ इसलि‍ए वे शब्द मुझे बीच बीच में बॉंध लेते हैं, कहो लिपट से जाते हैं कुछ पलों के लिए। तुम मरे हुए, किताबों या कोशों से उठाए हुए या सुने सुनाए अधमरे शब्दों में बात करने के आदी हो इसलिए मेरा उनको दुलराते हुए आगे बढ़ना तुम्हें भटकाव लगता है।

विषय पर तो आ यार ।

तो हमारी स्थिति पाकिस्ता न से इसलिए भिन्न है कि उसके पास जो राष्ट्रभाषा है वह भी बाहर से आई हुई है, मुहाजिर है, और जिसमें काम काज हो रहा है वह भी मुहाजिर है। और उसके जो राज्य हैं उनकी अपनी भाषाओं को महत्व दिया ही नहीं गया। या तो उनमें अंग्रेजी में काम होता है या थोड़ा बहुत उर्दू में। उनकी अपनी भाषाऍं कराहने और गाली देने के काम आती हैं। हमारे यहॉं यह कुशल है कि सभी राज्यों की अपनी भाषाऍं और हिन्दी इसीके मध्यदेश की भाषा है। पराई केवल अंग्रेजी है भले एक राज्य के कुछ लाख लोगों को ईसाई बना कर और अंग्रेजी सिखा कर यह दलील तैयार कर ली गई हो कि अंग्रेजी वहाँ की भाषा है। परन्तु सबसे बड़ा अन्तंर यह है कि हमारे यहॉं हिन्दी संपर्क भाषा है और औपचाीरिक संपर्कभाषा या राष्ट्रभाषा का स्था्न ग्रहण कर सकती है, पाकिस्तान से अंग्रेजी को हटाना मुश्किल है।

वह ठठाकर हॅसा, ‘तुमने मुंगेरी लाल के सपने वाले सीरियल देखे थे।

मैंने वह सीरियल तो नहीं देखा पर जानता हूँ वह हास परिहास का था। मैं सीरियस हो कर यह बात कह रहा हूँ लेकिन आज तुम इसे समझ नहीं पाओगे।

Post – 2016-02-08

आत्मघात

‘’यह बात तो किसी से छिपी नहीं है िक देश का बँटवारा उर्दू भाषा को लेकर हुआ था और तुम यह दिखाना चाहते हो कि सब कुछ ठीक ठाक था, मसला लिपि का था।‘’
‘’देखो, भाषा तो बहाना थी। बँटवारा इस दहशत के कारण हुआ था कि भारत स्वतन्त्र होगा तो लोकतंत्र की स्थापना होगी। शासन बहुमत के हाथों में होगा जिसका मतलब है राज्य हिंदुओं का होगा और वह बदले की भावना से काम करेंगे। यह उनकी सोच नहीं थी, मन्त्र फूँक कर, हतचेत करके, इसे उनकी जहन में उतार दिया गया था। उन्हों ने हिन्दू‍ इतिहास को ध्यान से पढ़ने तक का प्रयत्न नहीं किया, अन्यथा वे समझते कि जिन मूल्यों ने ही भारत को मुस्लिमबहुल देश होने से बचाया, ईसाइयत का प्रतिरोध किया उन्हीं ने उन उत्पीड़क कर्मों से उसे बचना सिखाया, जिनके कारण एक प्रभावशाली मुस्लिम नेता ने पाकिस्तान बनाने के समर्थन में यह तर्क किया था कि जिन्हें वे अपना नायक मानते हैं उन्हें हिन्दू खलनायक मानते है, और जिन्हें हिन्दू अपना नायक मानते हैं, उन्हें वे खलनायक मानते हैं, इसलिए दोनों समुदाय साथ नहीं रह सकते।
” वे अपने ही मध्यकाल की यादों से डरे हुए थे और अपने ही मूल्य मानों के कारण डरे हुए थे, क्योंकि वे सोचते थे कि वे जैसा आचरण करते आए हैं वैसा ही दूसरा भी करेगा। यह उनकी सीमा नहीं थी, एकेश्वरवादी सोच की सीमा थी, जिसमें भिन्न मान्यताओं, विचारों, दृष्टियों के लिए तो स्थान होता ही नहीं, आत्मनिरीक्षण तक के दरवाजे बन्द कर दिए जाते हैं और भावना विवेक पर इस तरह हावी हो जाती है कि देखने और जॉंचने की इच्छा‍ तक मर जाती है। अन्यथा मुस्लिम नेताओं ने देखा होता कि मध्यकाल के मुस्लिम शासकों, प्रशासकों और सिपहसालारों के कारनामों के अनुभव के बावजूद किसी हिन्दू राजा या रानी ने मुसलमानों के साथ दुराव तक का व्यवहार नहीं रखा, अत्याचार की तो बात ही दूर है, यद्यपि कई बार इस सद्विश्वास के कारण उन्हें क्षति भी उठानी पड़ी, किसी ने अपने अधिकार क्षेत्र में भी उनके साथ प्रतिशोध या अविश्वास तक का प्रमाण नहीं दिया। जिस मूल्य व्यवस्था ने धर्मान्तरण से बचाया उसी ने इतर धर्मियों का उत्पीड़न करने से भी रोका।‘’
’’यह बताओ, तुम्हें कभी किसी पागल कुत्ते ने काटा था। याद करो, हो सकता है बचपन में काटा हो और सूइयॉं लगी हों, कहने के लिए तुम ठीक हो गए हो, पर जहर तो जहर है यार, उसका हल्का असर कब तक बना रहे कौन जानता है।‘’
’’मैं तुम पर हँसना चाहता हूँ पर हँस इसलिए नहीं पाता कि तुम्हें दु:ख होगा।‘’
’’मैं तुम पर हँसते हुए यह सोच कर रोता रहता हूँ कि तुम घूम फिर कर उसी हिन्दू-मुस्लिम सवाल पर क्यों लौट आते हो। तुम इतने प्यारे दोस्त हो, विचार नहीं‍ मिलते तो क्या, मैं बड़ी पीड़ा के साथ पागल कुत्ते के काटने का मुहावरा तलाश पाया था। उपमा का क्या बुरा मानना।‘’
“परन्तु कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके लिए उपमा तक तलाशने चले तो उपमा दहशत में पीछे हट जाती है। उनमें ही तुम हो । मैं भाषा पर बात कर रहा था और तुम विभाजन पर पहुँच गए और उसका विवेचन किया तो मुझे ही उस बीमारी से ग्रस्त बता दिया जिसका प्रमाण तुम स्वयं दे रहे थे।
‘’सच कहो तो जिस भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव था वह हिन्दी‍ नहीं, हिंदुस्तानी थी, जिसमें अरबी फारसी शब्दों के प्रयोग की पूरी छूट थी। उसकी कसौटी थी बोधगम्यता, परन्तु उसको ले कर बहुत चर्चा नहीं हुई थी क्योंकि भाषा केन्द्रीय समस्या थी नहीं, वह मात्र ओट थी। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने जो हिंदी-तमिल, हिन्दी-कन्नड आदि कोश तैयार कराए थे उनमें फारसी अरबी के शब्दों संख्या बहुत अधिक थी और उन छोटे कोशों में जिन्हें शब्दसंग्रह कहना अधिक उचित होगा, ऐसे फारसी और अरबी के शब्द भरे हुए थे जिनका शायद ही कोई प्रयोग करता हो । ज्ञानमंडल के हिन्दी शब्दकोश में फारसी और अरबी शब्दों को बहुत उदारता और विवेक से स्थान दिया गया है। मुस्लिम अभिजात वर्ग का आग्रह अरबी लिपि में लिखित भाषा पर था और इसके पीछे अपनी धौंस जमाने की आकांक्षा अधिक प्रबल थी, अपनी भाषा से प्रेम कम । इसमें प्रगतिशील और दकियानूस का फर्क नहीं था।
“बीमारी भी पुरानी थी। यह विवाद 19वीं शताब्दी में ही पैदा हो गया था और इसमें जान बीम्स की बहुत सक्रिय भूमिका थी, जो परोक्ष रूप से मुसलमानों को इस बात के लिए उकसा रहे थे कि वे अपनी भाषा को अधिक अरबी फारसी मंडित करें, इसे मुसलमानों की भाषा मानें और हिन्दू इसके जवाब में अधिक संस्कृतनिष्ठ भाषा अपनाएँ, जब कि फैलन बोलचाल की शब्दावली की वकालत कर रहे थे। यह नूरा कुश्ती थी। इसकी चर्चा यहॉं उचित न होगी। उनकी यह चाल सफल रही और हिन्दी‍ और उर्दू के पक्षधर उनकी इच्छा पूरी करने लगे थे। हंटर के सामने अपने बयान में सैय्यद अहमद का यह कथन कि ‘उर्दू शरीफों की जबान है और हिंदी गँवारों की जबान‘ और इससे तिलमिला कर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का यह फिकरा कि उर्दू नाचने वाली लड़कियों और तवायफों की जबान है। धनी हिन्दु्ओं की बिगड़ी औलादें और ढीले ढाले चरित्र के नौजवान जब रंडियो, रखैलों और भड़ुओं के बीच होते हैं तो उर्दू बोलते हैं।‘ उस जाल में दोनों समुदायों के नेताओं के फॅसने के प्रमाण हैं। भारतेन्दु स्वंयं भी उर्दू में शायरी करते थे और सन्तुलित चित्त से ऐसी बात नहीं कह सकते थे, पर जवाब तो देना ही था। शब्दों के मामूली फर्क से सैयद अहमद बीम्स के जुमले को ही दुहरा रहे थे तो इसकी प्रतिक्रिया में भारतेन्दु उस पाले में पॉंव रख रहे थे जिसमें बीम्स ने हिन्दी को दरिद्र भाषा सिद्ध करते हुए यह सुझाया था कि हिन्दी में तकनीकी शब्दावली का अभाव ही नहीं है, वैसी शब्दावली बन ही नहीं सकती। हिन्दीं को संस्कृतनिष्ठ बनाने की बीमारी के पीछे यही कारण था अन्यथा हिन्दी के संस्कृतज्ञ भी बोलचाल में संस्कृत के तदभव पदों का ही प्रयोग करते थे। भारतेन्दु स्वयं आजीवन इस बीमारी से बचे रहे।
‘’दुखद यह है इन दोनों फिकरों का खुमार जनमानस पर लम्बे समय तक बना रहा इसके कारण हिंदी उर्दू दोनों की प्रतिष्ठा को अघात पहुंचा । इसका सबसे खतरनाक परिणाम मुस्लिम समुदाय का दबे सुर से अंग्रेजी का पक्षधर हो जाना था। यदि अरबी लिपि में लिखित उर्दू राष्ट्र भाषा न बनी तो उस हिन्दुस्तानी से अच्छा है अंग्रेजी ही जारी रहे। परन्तु इसका सबसे बड़ा नुकसान स्वयं अरबी लिपि में उर्दू के हिमायतियों को ही उठाना पड़ा। देश बँट गया पर न उर्दू पाकिस्तान के कामकाज की भाषा बनी न हिन्दी भारत के कामकाज की और इसका कारण भाषाप्रेम का पाखंड रच कर अपना स्वार्थ साधन था।
हम कहें इस खींच-तान का यह असर तो हुआ ही कि अपनी भाषा के प्रति हिन्दी-प्रदेश में हिन्दी़ या उर्दू के प्रति वह गहरा लगाव नहीं पैदा हो सका जो दूसरे प्रदेशों में देखने में आता है। हिन्दी भाषी क्षेत्र भग्नमनस्कता का शिकार बना रहा और आज भी है। जो भी हो भाषा और संस्कृति की आड़ में देश का विभाजन हो जाने के बाद भी न हिन्दी भारत की सरकारी काम काज की भाषा बनी न पाकिस्तान की राष्ट्राभाषा घोषित होने के बाद भी उर्दू।
‘’भारत की बात अलग है, पाकिस्तान के बारे में तुम ऐसा नहीं कह सकते।‘’
‘’मेरी जानकारी ही कितनी है कि कुछ कहूँ, मैं तो डान में प्रकाशित एक लेख की ओर तुम्हारा ध्यान ले जाना चाहता हूँ जिसके बाद मुझे कुछ कहने की जरूरत ही न होगी। इसके लेखक ने इसे शेयर करने की अनुमति दे रखी है इसलिए इसे शेयर करना ही समझ सकते हो:
The status of Urdu is a major issue which does not seem to be getting its due share of attention; in fact it seems to be getting no attention at all, either by the government or by the citizens. Current policies and trends have seen a pathetic downfall in the status of our national language.
The language policy according to the Constitution of Pakistan is
1. The national language of Pakistan is Urdu, and arrangements shall be made for it being used for official and other purposes within 15 years from the commencing day.
2. The English language may be used for official purposes until arrangements are made for its replacement by Urdu (Article 251 of the Constitution of the Islamic Republic of Pakistan, 1973)
It has been 62 years but unfortunately our government has failed to take appropriate measures to replace English with Urdu.
The status of Urdu is a major issue which does not seem to be getting its due share of attention; in fact it seems to be getting no attention at all, either by the government or by the citizens. Current policies and trends have seen a pathetic downfall in the status of our national language.
The language policy according to the Constitution of Pakistan is
1. The national language of Pakistan is Urdu, and arrangements shall be made for it being used for official and other purposes within 15 years from the commencing day.
2. The English language may be used for official purposes until arrangements are made for its replacement by Urdu (Article 251 of the Constitution of the Islamic Republic of Pakistan, 1973)
It has been 62 years but unfortunately our government has failed to take appropriate measures to replace English with Urdu.
We have seen nations progressing because of taking pride in their national language and their identity but we on the other hand are content with hiding our real identity and feel ’embarrassed’ in relegating the status of our national language. We consider those backward who prefer to talk in Urdu while speaking in English has become a symbol of status.
Another problem relevant to the language issue is the flaw in our educational system. It was the government’s responsibility to take proper steps to raise the status of Urdu among citizens which could very well have been achieved through the educational system.
But there is no unanimous educational system in Pakistan. In majority of the systems, English is made compulsory and students are encouraged to talk in English which not only suppresses their love for their national language but also makes the students studying under Urdu-based systems victims of inferiority complex.
Furthermore, citizens are forced to learn English for better job opportunities. Is this supposed to be the policy of a country with Urdu as the national language?
Another point which I would like to add here is that the current trend of writing Urdu in Roman script in SMSs and emails has led to further deterioration in the language’s quality. Mobile phones with Arabic are available in our country, then why not those with Urdu?
It’s high time the government took essential steps like revising the education policy and promoting Urdu writing, debates and poetry competitions on the national level.
The people, especially the youth of Pakistan, should participate in this by bringing about a change in their thoughts and reunite for this cause.
FARIHA SAGHIR
Karachi
JUL 16, 2009 DAWN

Post – 2016-02-06

उर्दू हिन्दी के संबन्ध

”तो तुम मानते हो हिंदी की स्वीकार्यता में उर्दू भाषा रुकावट बनी।”

मैं मानता हूँ एक ही क्षेत्र में दो भाषाऍं आम जबान नहीं हो सकतीं। उर्दू भाषा नहीं है, हिन्दी की एक शैली है जिसमें अरबी-फारसी जानने वाले को अपनी भावना की सटीक अभिव्यक्ति के लिए उनका कोई शब्द या पदबन्ध अधिक उपयुक्त लग सकता है, और संस्कृत जानने वाले को उससे भिन्न शब्द या पदबन्ध अधिक सटीक लग सकते हैं और देशज बोलियों के सौन्दर्य पर मुग्ध किसी व्यक्ति को उनमें अपनी भावना की सही अभिव्याक्ति मिल सकती है और वह उसका प्रयोग कर सकता है। हिन्दी वह महानदी है जो इन सबको समेटते हुए प्रवाहित हो सकती है और ये हिन्दी की उद्दाम शक्ति को प्रकट करते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि हिन्दी एक महान भाषा है। इस माने में अंग्रेजी भी हिन्दी से पीछे पड़ेगी जो दूसरी ऐसी भाषा है जिसकी महिमा का एक रहस्य यह है कि उसने अपना अस्सी प्रतिशत बाहर से लिया है। वह भी उतनी उदारता से अन्य भाषाओं के शब्दों और व्यंजनाओं को आत्मसात नहीं करती जितनी उदारता से हिन्दी फिर भी अंग्रेजी दुनिया की किसी दूसरी भाषा से अधिक खुली भाषा रही है। उसके कोशकार उन शब्दों और अभिव्यक्तियों को उसके मानक रूप में शामिल करने में कई दशक लगा दें, कुछ को स्वीकार तक न करें, फिर भी सर्जनात्मक साहित्य में कुछ भी स्वीकार्य है परन्तु लेखक के जोखिम पर । यदि उसको प्रकाशक न मिला तो, या प्रकाशक मिल गया परन्तु वह पाठकों तक नहीं पहुँच पाई तो, वह अपनी रचना के साथ ही रसातल को चला जाएगा। यहीं सही अनुपात और सन्तुलन का प्रश्न आता है।‘’

’’तुमको हिंग्लिश से कोई खतरा नहीं महसूस होता ।‘’

”तुमने भवानी भाई की वे पंक्तियॉं पढ़ी हैं : जिस तरह मैं बोलता हूँ उस तरह तू लिख / और उसके बाद भी मुझसे बड़ा तू दिख । इसका अर्थ जानते हो तुम ।”

” क्या बात करते हो, यदि बोलचाल में किन्हीं शब्दों और पदबन्धों का प्रयोग होता है तो उसे लिखना गलत कैसे हो सकता है। उसे लिखा जाना चाहिए। गरज कि हिंग्लिश से किसी को शिकायत है तो वह दकियानूस है।‘’

”देखो, हिंग्लिश शब्द नया है, उर्दू की तरह अंग्रेजी शब्दबहुल भाषा के लिए एक नया शब्द । और जानते हो इसकी संभावना ग्रियर्सन ने आज से सौ साल से भी पहले लिग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया में ही जता दी थी। उस सर्वे में भयंकर गलतियॉं हैं फिर भी वह आज भी एक महत्वपूर्ण कृति है। अब कंठस्थ तो किया नहीं कि तुम्हेंं सुना दूँ, परखने के लिए तुम्हें ही उस रपट को पढ़ना पड़ेगा। परन्तु एक बात तुम्हारे ध्यान में नहीं आई कि कवि ने यह नहीं कहा कि जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख। यदि लिखता तो उसकी अगली पंक्ति होती, ‘और अपनी परिधि में सिकुड़ा हुआ तू दिख।‘’

”तुम कहना क्या चाहते हो, अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हिन्दी में नहीं होना चाहिए।”

” क्या मेरे पास या किसी के भी पास इतनी ताकत है कि वह यह निर्देश दे सके कि बोलते समय लोग अमुक शब्दाभंडार का प्रयोग करेंगे और यदि इसका उल्लंघन हुआ तो उनको दंडित किया जाएगा, या सामाजिक रूप में बहिष्कृत किया जाएगा।”

‘’है तो नहीं।‘’ वह इस तरह बोला मानो अपना सिर पीट रहा हो।

मैंने कहा, ”यह मेरी बात नहीं है, न इस विषय में मेरी जानकारी अधिक है पर सुना है एक भाषा के भीतर कई तरह की कूट भाषाऍं और कृत्रिम भाषाऍं और विशिष्ट तथा क्षेत्रीय भाषाऍं व्यावहार में आती हैं। उनकी एक सीमित परिधि होती है जिसमें उन्हें समझा जाता है। इसी तरह विचारों की भी परिधि होती है जिसमें मूर्धन्य ज्ञानी भी होते हैं परन्तु हमारी कसौटी पर मूर्ख और उनकी कसौटी पर हम, उनके प्रभावक्षेत्र में मूर्ख सिद्ध होते हैं। इनमें सभी सही होते हैं, गलत कोई नहीं होता, पर मूर्ख भी कई बार समझदारी की बात और काम करता है, और समझदार भी मूर्खता करते हैं और अपनी मूर्खताओं पर गर्व तक करते हैं। यह एक शास्त्रीय विषय है और इसके पचड़े में पड़ गए तो पता नहीं कहॉं जा कर लाश किनारे लगे। इसलिए मैं फिर भवानी भाई की पंक्ति पर आना चाहूँगा। जिस तरह मैं बोलता हूँ उस तरह तू लिख न कि जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख।

”उर्दू और हिन्दी का अन्त र यह नहीं है कि ये दो भाषाऍं हैं, बल्कि यह दो भिन्न स्तरों की अभिव्य क्तियॉं हैं। उर्दू में जिस तरह वे बोलते हैं या बोलते तक नहीं, सोचते हैं उस तरह लिखने की कोशिश की जाती रही और की जाती है। यही दशा संस्कृितगर्भी हिन्दीह की थी। हिन्दी उस जबान का नाम है जिसका मानदंड वह व्यक्ति तय करता है जो अधिक से अधिक साक्षर है और निरक्षर तो है ही। भाषा का चरित्र वहीं से निर्धारित होता है। ताकत लगाकर भी, राजशक्ति का प्रयोग करके भी आप उसे प्रभावित नहीं कर सकते, आपका असर खरोंच बन कर रह जाएगा। अत: जो अपनी कोठरी में या कोटर में बात करना चाहते हैं और यह चाहते हैं कि उनको अपनी कोटर के अनमोल बोल के कारण दूसरों से बड़ा समझा जाए उन पर दया की जा सकती है। उर्दू अपनी पहली ही परीक्षा में फेल हो गई। तुम जितनी भी कोशिश हिन्दी को उर्दू बनाने की करो, यदि तुम्हें बहुजन तक पहुँचना है तो वह हिन्दी बन जाएगी, हिन्दी मानी जाएगीा तुम उर्दू सिनेमा बनाओगे, कुछ शब्द जबरदस्ती भरोगे जो आम आदमी की समझ में नहीं आऍंगे, वह उनका मानी सन्देर्भ को देख कर कयास से लगा लेगा क्योंकि वह इसे अपनी भाषा के ही अधिक पढ़े-लिखों की भाषा मानता है। वह हिन्दू मुस्लिम का भेद करके शब्दों को नहीं समझता। उर्दू के प्रति अतिसंवेदनशीलता ब्रिटिश काल में बढ़ाई गई जिससे हिन्दी भाषियों के साथ इनका संचार तक सीमित रह जाए।

एक और कसौटी बता दूँ । जिस भाषा में गलतियॉं सहने की आदत होती है वही महान भाषा बन सकती है। खीच तान कर भी यदि आपका आशय समझ में आ गया तो सिर माथे। हिन्दीा में यह सराहनीय गुण अंग्रेजी के बाद आएगा, परन्तु है यह इन दोनों के बीच का ही मुकाबला और भारत की अपनी सीमाओं के भीतर यही कसौटी बन सकता है। उर्दू तलफ्फुज या शूद्ध उच्चाररण पर इतना जोर देती रही कि जिस भाषा के नाम पर पाकिस्तान बना उसमें भी वह स्वीाकार्य न हो सकी और भाषा को ले कर कई तरह के टकराव पैदा हो गए जिनमें सबसे बड़ा आघात उसके ही पूर्वी भाग के अलग राष्ट्र बनने के रूप में मिला।

‘’परन्तुू देखो, इतिहास ने भले सच साबित किया हो, समाज में अपने रागबन्ध में बँधे हुए लोग हमारी बात को मान लेंगे, यह सोचना तक नासमझी होगी।‘’

‘’परन्तु हिन्दी एक महान भाषा है यह तुम्हें नहीं कहना चाहिए था, तुम हिन्दी के लेखक हो। अपने मुँह से अपनी तारीफ ही नहीं, अपने से अनन्य किसी भी चीज की, चाहे वह भाषा हो या देश, या धर्म, हमें इनके प्रति निष्ठा समर्पित भाव से दिखानी चाहिए, महान कह कर पल्ला नहीं झाड़ लेना चाहिए।‘’

’’यह सलाह तो मैं देने वाला था, तुम्हारे पल्ले कैसे पड़ गई? पड़ गई तो मैं खुश हूँ कि अत तुम मेरे करीब आते जा रहे हो।”

‘’तुम्हारे करीब मैं? बैठना तो पड़ता है पर होना मुश्किल है।‘’

’’जानता था, यह तुम्हारी किस्मत में नहीं, फिर भी यह जान लो कि हिन्दी और उर्दू में बुनियादी फर्क नहीं है। भाषा का चरित्र उसके व्याकरण से तय होता है, उसके वक्ताओं की आनुपाितक संख्या से तय होता है, उसकी परंपरा से तय होता है और सबसे अधिक उसके निरक्षर या नाममात्र को साक्षर लोगों की जबान से तय होता है और इसलिए एक पृथक भाषा के रूप में अपने सभी प्रयोगों में उर्दू विफल रही, परन्तु एक पृथक शैली के रूप में इतनी सफल रही कि हिन्दी बोलने वाला भी बात बात पर या तो उर्दू का कोई शेर जड़ देता है या संस्कृत या हिन्दी की सूक्तियॉं बोल जाता है। हिन्दी के उन्हीं कवियों की भाषा में प्रवाह मिलता है जिन्हों ने उर्दू की शायरी से कुछ सीखा हो और इसका कारण अरबी फारसी के शब्द नहीं हैं, अपितु यह कि उर्दू कवियों में आरंभ में सूफियों का बोलबाला रहा और सूफियों ने सबसे पहले हमारी बोलियों को पहचाना, उनके माध्यम से जन जन तक पहुँचने का प्रयत्न किया, उनके मुहावरे और उनकी भाषा की रवानगी पर उर्दू की नींव रखी गई इसलिए उूर्द का ज्ञान हमें समृद्ध करता है, रंक नहीं बनाता।

“झगड़ा दर अस्ल भाषा का नहीं लिपि का था। लिपि भाषा नहीं होती यह हम जानते हैं, पर लिपि के साथ भी हमारा भावनात्मक लगाव होता है और मुस्लिम समुदाय का पान इस्लामि ,क आकांक्षाओं के कारण अधिक गहरा था । लिपि न कि भाषा उन्हें दूसरे मुस्लिम देशों से जोड़ती थी। कुुछ लोगों को यह बिल्कु्ल तुच्छ समस्या लगेगी, अवैज्ञानिक तो है ही। सामी भाषाओं के लिए विकसित लिपि तथाकथित आर्य भाषाओं के उपयुक्त नहीं है। बर्नर्ड शा ने तो अंग्रे जी की वर्तनी के सुधार का मार्ग नागरी में देखा था और अपनी संचित संपदा की वसीयत उस आदमी के नाम करने को कहा था जो अंग्रेजी की वर्तनी सुधार दे । पर भावना के क्षेत्र में तार्किकता सिर धुन कर रह जाती है अन्यंथा हमने पूरे देश को जोड़ने के लिए अपनी लिपियों को जो सभी ब्राह्मी से निकली है, एक कर लिया होता और आपसी दूरियॉं कम हो गई होतीं। न हुआ, न होने वाला है”

Post – 2016-02-05

हमने अपने को परिन्‍दों की जबॉं से जाना

’हॉं अब बताओ ऊपरी छिल्के के नीचे की वह सचाई।‘’
’’सबसे पहले मैं इस प्रचलित भ्रम को दूर कर दूं कि हिंदी के प्रसार में हिन्दीं सिनेमा का, हिन्दी क्षेत्र के अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों की भूमिका प्रधान थी.”
“यह तो सर्वमान्य तथ्य है यार, इसे कैसे नकार सकते हो? ”
” नकार नहीं रहा हूँ, उस अतिमूल्यन का प्रतिवाद कर रहा हूँ जो सामान्य ज्ञान का हिस्सा बन गया है। उनकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, परंतु साथ ही इनके ऋणात्मक पहलू पर भी ध्यान देना होगा, भावुकता के कारण जिसकी अनदेखी की जाती रही है और इतिहास की उस वक्र रेखीय चाल को समझने में भूल की जाती रही। तुमने एक बार मेरा मजाक उड़ाते हुए कहा था न ‘चलई जोंक जिमि वक्र गति’, इतिहास की भी चाल ऎसी ही है यार ! हम समझते है आगे बढ़ रहा है, बढ़ता भी है पर साथ ही बल खाकर नीचे भी चला जाता है।”
‘’पहली बात तो यह कि इस प्रसार का हिन्दी को लाभ नहीं हुआ, उल्टे नुकसान हुआ। दूसरी बात यह कि हिन्दी सिनेमा जैसी कोई चीज तब थी ही नहीं। इसे उर्दू सिनेमा बनाया गया और उसी को हिन्दी सिनेमा कहा गया और उर्दू के लेखकों को इसका मलाल रहा कि हम उर्दू सिनेमा बना रहे हैं और लोग इसे हिन्दी सिनमा कह रहे हैं।‘’
”तुम्हे उलटबॉंसियॉं इतनी पसन्द हैं कि कोई बात सीधी कह ही नहीं पाते। उर्दू सिनेमा बनाया गया और हिन्दी सिनेमा कहा गया। कोई तुक है इसमे1”
‘’समझ नहीं पाओगे, परन्तु तथ्य के रूप में इसे दर्ज कर लो कि जिन्हें तुम प्रगतिशील लेखन कहते हो और उर्दू के जिन कवियों को तुम प्रगतिशील मानते हो वे अपनी सांप्रदायिक चिन्ता से इतने ग्रस्त थे कि जब उनको लगा कि स्वतन्त्रता को रोका नहीं जा सकता, स्वतन्त्र भारत की भाषा हिन्दी ही होगी, उर्दू का भविष्य क्या होगा, इस चिन्ता से कातर, किसी रहस्यमय तरीके से उर्दू की उत्कृष्ट प्रतिभाओं ने निश्चय किया कि हम नए और सबसे प्रतापी संचार माध्यम सिनेमा का उपयोग करके उर्दू को बचाऍंगे। इसे जन जन तक पहुँचाएंगे। उनकी सर्वोत्कृष्ट न भी कहें तो उत्कृष्ट् प्रतिभाओं ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उर्दू को भारतीय जनभाषा बनाने के लिए उन्‍होंने यह आखिरी प्रयत्न किया।‘’
‘’यह राज की बात सिर्फ तुम्हें मालूम है या किसी और को। यह बताओ तुम किस चक्की के आटे की रोटी खाते हो। इतने उम्दा खयाल तो आरएसएस की चक्की के आटे से ही पैदा होते है।‘’
”मैं यह नहीं कहूँगा कि तुम जैसे नासमझ बिना पिसे और पकाए, भूसा से ले कर अनाज तक खा जाने वालों में ही पैदा होते हैं, क्योंकि मैं दोस्ती की कद्र करता हूँ। तुम्हारे सन्तोष के लिए बता दूँ कि मैं भी तुम्हारी ही तरह नादान था। भला हो कर्रतुल ऐन हैदर का जिन्हों ने यह दर्द जाहिर किया था और उससे मुझे अपनी युवावस्था में देखी वे फिल्में याद आईं जिनमें कास्ट पहले उर्दू में आता था, फिर अंगेजी में और अन्त में हिन्दी में, गो अन्तिम के बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूँ कि वह आता भी था या नहीं।
‘’तुम लाइलाज हो।‘’
‘’अपने बारे में जानता हूँ। उसका कारण भी जानता हूँ, परन्तु यह भी जानता हूँ कि हम दोनों को एक ही वार्ड में भरती नहीं किया जाएगा। तुमको पूरी बात तो सुननी चाहिए इतना बड़ा खतरा उठाने से पहले।‘’
‘’बोलो क्या कहना है।‘’
‘’हिन्दी राष्ट्रभाषा बनेगी तो हम उर्दू को जनभाषा बनाऍगे यह था उनका संकल्प। इसलिए हिन्दी/उर्दू सिनेमा ने अपनी भाषा का इस्लामीकरण किया और अन्तर्वस्तु का ‘जन-वादी-करण’ करते हुए, मजदूरों के निकट पहुँचने के प्रयत्नं में मनोरंजन के सबसे प्रभावशाली माध्यम से कुरुचि का विस्तार किया। पहली बात यह कि मजदूर और सिनेमा में, मजदूर पहले और सिनेमा बाद में। मजदूरों के कारण हिन्दी के विषय में अहिन्दीे भाषाओं में यह संदेश गया कि हिन्दीे बोलने वालो की संख्या जो भी हो, यह मजदूरों और गँवारो की भाषा है और उस मजदूर वर्ग तक पहुँचने के प्रयत्नं मे सिनेमा का भदेसीकरण किया गया जिससे अन्य भाषा क्षेत्रों में यह सन्देश गया कि हिन्दीभाषी समाज अपरिष्कृत रुचि और प्रतिभा का समाज है और इसके नेतृत्व में भारत का अकल्याण ही हो सकता है। यह सचाई नहीं थी, पर इसे सचाई का रूप निहित स्वार्थो के कारण दिया गया। इसका उपयोग एक कारगर औजार के रूप में किया गया।‘’’
’’तुम असह्य हो यार । दिमाग मत खराब करो।”

Post – 2016-02-04

राष्‍ट्रभाषा (edited)

‘’तुम आधे दिमाग के आदमी हो कोई बात पूरी कर ही नहीं पाते।‘’
’’श्रोता की पाचन-शक्ति का ध्यान रखना पड़ता है। एक साथ पूरी बात पचा नहीं पाओगे, इसलिए टुकड़े-टुकड़े करके पेश करना होता है।‘’
‘’जुमलेबाजी पर आ गए। आज भी यही सुनना पड़ेगा कि यार बात पूरी तो हुई नहीं। तुम संक्षेप में बताओ तुम कहना क्या- चाहते हो। कोई बात उलझी रह गई तो बाद में पूछ लूँगा।‘’
’’मैं तीन बातों की ओर ध्यान दिलाना चाहता था। हिन्दी प्रदेश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि लम्‍बे अरसे तक इसी को हिन्दुस्तान कहा जाता रहा है। आज भी बंगाली इस क्षेत्र के लोगों को हिन्‍दुस्‍तानी या पंजाबी कहता है। जिसने इस पर अधिकार कर लिया वह पूरे भारत को जिसमें तुम पाकिस्तान को भी जोड़ सकते हो, जीत लेता रहा है या कहो, उसके लिए ऐसी विजय आसान हो जाती रही है। वैसे तो इसे स्मिथ ने फ्रांसीसियों से अपनी श्रेष्ठोता जताने के लिए कहा था, और एक हद तक झूठ भी कहा था, परन्तु उसका कहना था कि अंग्रेजो ने बंगाल में या गांगेय पट्टी पर अधिकार किया और फ्रांसीसी मद्रास में केन्द्रित हुए इसलिए भारत पर स्वाभाविक स्वा‍मित्व अंग्रेजों का ही हो सकता था उसी ने इस इतिहास की ओर ध्यान दिलाया था, उससे पहले मेरे दिमाग में भी यह बात न थी। पर असलियत यह थी कि गंघार से ले कर मगध तक हिमालय से ले कर उज्जैन तक इसके संपर्क सूत्र फैले थे और ईसा से कई सौ साल पहले यहीं के संस्क़ृत विद्वान अन्‍यत्र पहुचते और समादृत होते थे। कहें, अपनी केन्द्रीय स्थिति का भौगोलिक लाभ इसे मिलना ही था। भारत के दूसरे सभी अहिन्दी प्रदेश इससे सीधे संपर्क में थे जब कि उनके बीच यह संपर्क बहुत हाल का है या सीमित था। वे कुछ क्षेत्रों और उनके लोगों से सीमांत क्षेत्रों के लोगों उनकी भाषाओं और रीतियों से परिचित तक न थे परंतु इस केंद्रीय भाग को जैसी भी सही, सबकी जानकारी थी और इसके माध्यम से उनको एक दूसरे की कुछ जानकारी मिली थी और मिलती रही थी।
इसी के उूपर पालि और प्राकृत का एक दूसरा रद्दा चढ़ा था जो संस्कृत का स्थानीय ध्वनिसीमा में उच्चरित रूप था और इसलिए प्राकृत का प्रयोग नाटकों के उन पात्रों द्वारा किया जाता था जिनको औपचारिक शिक्षा प्राप्त़ न थी। जैसे महिलाऍं, नौकर-चाकर आदि । इसे जैन मत ने अपनी भाषा बना कर अपने साहित्य के लिए प्रयोग किया। जैन और बौद्ध मत ने अपने संजाल का प्रसार व्या-पारिक मार्गों पर और उनके माध्यम से उनके परिवेश में किया। जैन मत का प्रसार तमिल क्षेत्र में भी हुआ और संगम साहित्य का बहुत सारा साहित्य इस जैन मत के अनुमोदन में लिखा गया, जब कि पालि का प्रवेश उससे भी दक्षिण में, श्रीलंका तक में हुआ और मुझे जो विचित्र बात लगती है वह यह कि श्रीलंका को कन्नड क्षेत्र से गए हुए लोगों ने प्रभावित किया। एकारान्त शब्द भारत में केवल कन्नड की और इससे बाहर श्रीलंका की विशेषता है। यह कैसे हुआ, क्या महेन्द्र अपने सिंहल की यात्रा में कर्नाटक होते हुए और वहॉं के दलबल के साथ गए थे, या नहीं, इसका मुझे कुछ पता नहीं, परन्तु भाषा के तथ्य‍ यही कहते हैं।
परंतु मैंने कहा न कि हम कुछ आगे बढ़ आए हैं । इससे पीछे एक बहुत क्रान्तिकारी चरण है। वह है कृषि और कृषिविद्या के माध्यम से उसकी जानकारी और शब्दावली का प्रसार। कोसंबी ने अपने निजी कारणों से यह स्वींकार किया है कि भारत में कृषि का प्रसार आर्यभाषा के प्रसार के समानान्तर हुआ है। यह एक अर्धसत्य है। हम इसकी मीमांसा की ओर नहीं मुड़ेंगे फिर भी यह कहना जरूरी है कि मोटे तौर पर यह सच है क्योंकि जिन देवों और ब्राह्मणों ने कृषि की दिशा में कदम आगे बढ़ाया था उन्हें सफलता या एक जगह टिक कर खेती करने का सुयोग इसी भूभाग में कहीं मिला था। वह स्थान या क्षेत्र जो भी रहा हो, वह इसी प्रदेश में था और कृषिविद्या का प्रसार सबसे पहले जिस क्षेत्र में हुआ उसे तुम आज की भाषा में हिन्दी प्रदेश कह सकते हो।”
’’मैं अधिक नहीं जानता, परंतु इतना जानता हूं कि हिन्दीे अभी कल पैदा हुई है और तुम उसे युगों पहले ले जा कर एक दिव्य अधिकार दिलाना चाहते हो। ”
”मैंने सोचा था तुम मेरी बात समझ जाओगे। मुझे उसका नाम नहीं लेना पड़ेगा। अब लगता है कि तुमको बुनियादी बातों की भी जानकारी नहीं है। हिन्दी एक भाषा नहीं है, एक सांस्क़ृतिक क्षेत्र की वाणी है जो कई हजार साल से आपस में कई तरीकों से आलाप करती रही है। इसमें एक ही भाषा की स्‍वीकार्यता होती है।
और यह क्षेत्र तीन स्तरों से निर्मित हुआ है। एक, आहार संचय और आखेट का चरण जिसे पुराणों की भाषा में सतयुग कहा जाता है और शेष सभ्यता के उत्थान के साथ अर्थतन्त्र के समानान्तर, परन्तु अपनी वक्र रेखाओं के साथ, जिसमें नियम तलाशने चलोगे तो वे कुछ दूर तक साथ देंगे परन्तु आगे काम न आऍंगे।
अब तुम हिंदी क्षेत्र को इस रूप में समझ सकते हो कि यह किसी एक भाषा का क्षेत्र नहीं है, कृषि विद्या के साथ पारस्‍परिक संपर्क में आई बोलियों का क्षेत्र है; सांस्कृतिक अन्तरक्रिया का क्षेत्र है, जिसमें कोई भी एक भाषा, उसका उद्गम क्षेत्र कोई भी क्यों न हो, उसका मानक चरित्र सारस्वकत क्षेत्र में आ कर ही निर्धारित होता है और इसके बाद यह अखिल भारतीय स्वीकार्यता पा जाती रही है। वह वैदिक हो, संस्कृत हो, पाली या अपभ्रंश हो या आधुनिक बोलियॉ हों। यह सुयोग ही है कि आधुनिक हिन्दी उसी सारस्वरत क्षेत्र की उपज है जिसमें कुऱु पांचाल आते रहे हैं और यह उस क्षेत्र के लोगों द्वारा आगे बढ़ कर अपना ली गई जिनकी अपनी भाषाऍं और ऐसी बोलियॉं थीं, जिनका साहित्य इस पूरे क्षेत्र में स्वीकार्य था। यह अविरोध या सहर्ष स्वीकार ही उस भाषाई क्षेत्र की सीमा रेखा निर्धारित करता है जिसे आप हिन्दी क्षेत्र कह सकते हैं जो भारतीय भूभाग में सभ्यबता और संस्कृति के विकास में अग्रणी रहा है और आज पश्चिमी कूटनीतिक सफलता का प्रमाण ही माना जाएगा, कि यह सांस्क़ृतिक और भाषा-संस्कार का क्षेत्र कलह और विरोध का क्षेत्र बना दिया गयाा। ,
यह स्थिति बहुत हाल की है, साझाी विरासत बहुत पुरानी है। यहॉं की भाषा अखिल भारतीय संपर्कसूत्र का काम दस पॉच हजार साल से करती आई हैा हिन्‍दी की हिन्दी प्रदेश में स्वीकार्यता और बाहर इस पर आश्चर्य भी स्वाभाविक है।हिन्‍दी इसी तर्क से इस देश को जोड़नेवाली भाषा है, समस्त भारतीय अहिन्दी भूभाग में कुछ लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है। यह संविधान की क़ृपा से या किसी आन्देालन से पैदा हुई भाषा नहीं है, अपितु नैसर्गिक राष्ट्रभाषा है और आज भी राष्ट्रीय उपयोग की भाषा है वह राजकाज की भाषा बने या न बने। भारत की किसी भाषा से इसका विरोध नहीं, बाहर तक की भाषाओं से भी नहीं। िफर भी यदि इसे ले कर गलतफी पैदा हुई तो इसे हम व्रितानी कूट नीतिक सफलता का प्रमाण मान सकते हैं ।
तुम ठीक कहरहे थे, विषय ही कुछ ऐसा है कि इसे न चुटकी बजाते समझा जा सकता है न हल किया जा सकता है।
परन्तु् गौर करो, अभी तो हमने इसके छिल्के पर बात की है। इसकी मर्मकथा और आज की समस्या तो बची ही रह गई है। इतना धैर्य है कि उन पर भी बात की जा सके।”
उसने हाथ ख्ड़े कर दिए।

Post – 2016-02-03

अधूरा ही सही

‘’तुमने भगवान को देखा था कभी या कि नहीं?‘’
’’क्योे ऐसा क्या हो गया?’’
’’सुना उस शख्स को गुजरे हुए जमाना हुआ।‘’
‘’शेर तो अच्छा है।‘’
’’सिर्फ शेर ही दिखाई दिया तुम्हें, वह वेदना नहीं जो अनकही रह गई है। तुमने घनानन्द को पढ़ा है। हिन्दीे पढ़ाते हो तो पढ़ा ही होगा। उसकी वह पंक्ति याद है, ‘लोग है लागि कबित्त बनावत मोहें तो मेरे कबित्त बनावत।‘ मैंने कुछ कहा तो तुमने कहा अच्छा शेर है, यह न समझ पाए कि व्यथा इतनी गहरी है कि आह भी शेर बन जाती है।
‘’आज कैसी निराशा भरी बातें कर रहे हो यार। हुआ क्या है?‘’
‘’कल तुम कह रहे थे मैं तैश में आ गया था। यह जो भीतर की व्यथा है उसे बहुत प्रयत्न से हँसी मजाक से ढके रहता हूँ पर कभी कभी सँभाल नहीं पाता। प्रयत्न करके भी। पर कलम उठाता हूँ तो मैं लिखता नहीं हूँ उसे अपनी भाषा और भंगिमा स्वयं तलाशना होता है।‘’
देखो, मेरे फिकरे का मलाल है तो मैं अपनी गलती स्‍वीकार करता हूँ। तुम्‍हारी दिमागी हालत का पता लगा कर बात करनी थीा जाे भी हो, तुम्हारा आक्रोश सात्विक है, पर तुम लोग आदर्शवादी ठहरे, यह नहीं समझ पाते कि आदमी आदर्श नहीं खाता, रोटी खाता है। रोटी जिधर से भी मिलेगी, आदमी उसी ओर दौड़ पड़ेगा।‘’
‘’लावारिस कुत्ते की तरह । यही कहना चाहते हो? मार्क्सतवाद को तुम लोग निरी रोटी पर क्यों उतार देते हो कि शर्म तक की गुंजायश नही रहती। देखों आदमी रोटी खाता नहीं, रोटी की ओर दौड़ता नहीं, वह रोटी पैदा करके खाता है। अपने काम को पूरी ईमानदारी और पूरे श्रम से किए बिना तुम अपनी रोटी पैदा नहीं कर सकते। जो लोग ऐसा नहीं करते वे अपनी कमाई की रोटी नहीं खाते, किसी का फेंका या चुराया हुआ टुकड़ा खाते हैं। शारीरिक श्रम हो या बौद्धिक, मैं इन दोनों में यहाँ फर्क नहीं करता। तुम्हारा कर्म क्षेत्र ही वह खेत खलिहान और रसोईघर है जहॉं से तुम्हे अपनी रोटी उगानी और पकानी है। हमने वह नहीं किया। चोरी करते रहे, भीख मागते रहे, शारीरिक श्रम के क्षेत्र में भी और बौद्धिक श्रम के क्षेत्र में भी काम किया ही नहीं, नैतिकता की तो चिन्ता ही नहीं रही, वही तो दोनों क्षेत्रों में सक्रिय रखती है।
‘’ज्ञान के क्षेत्र में भी हमारी स्थिति यही है। हमने अपनी समस्यांओं का सामना ही नहीं किया, उन्हें समझा तक नहीं। भागते रहे, प्रतीक्षा करते रहे कि कोई देव दूत पच्छिम से आएगा और उनका अध्य्यन करके हमें उनका समाधान देगा, और हम उसे निगल जाऍंगे और इस बात की अकड़ दिखाते फिरेंगे कि इसे सबसे पहले मैंने निगला था।‘’
’’लगता है आज फिर बोर करोगे। देखो, तुम अपने नाम के साथ जो सिंह लगाते हो न, उसे हटा दो, उसके स्थान पर बोरवर्कर रख लो। सुनने वाले को लगेगा बोरीवेली की तरह बोरवर्क नाम का भी कोई स्थान है जहॉं से तुम्हारा उद्भव हुआ है। यह बताओ तमिल वाला भूत उतर गया, नैतिकता का यह नया जिन्नत सवार हुआ है?‘’
’’मैं उसी पर बात कर रहा हूँ। देखो, हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव और आन्दोलन अहिन्दी भाषियों ने किया था। यहॉं तब सब कुछ ठीक था। दो बातें सर्वमान्य थी । यह कि स्वनतन्त्र भारत की भाषा अंग्रेजी नहीं रह सकती, अंग्रेजों के साथ अंग्रेजी को भी विदा करना होगा, और भारत की राष्ट्रभाषा की भूमिका का निर्वाह हिन्दी ही कर सकती है अत: हिन्दीं प्रचार से जुड़ी संस्थाओं का नाम हिन्दी प्रचार सभा या समिति न रख कर राष्ट्रभाषा प्रचार सभा या समिति रखा गया था जो उनके साथ आज भी अजागलस्तन की तरह लटका रह गया है जब कि मेरे एक मित्र ने मुझे याद दिलाया कि भारतीय संविधान में हिन्दी के लिए राजकाज की भाषा या राजभाषा का प्रयोग हुआ है, अब भी मौका है, अपनी भूल सुधार लो, और इसीलिए मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के द्वारा सम्मानित होने का अवसर मिला तो वह पीड़ा उभर आई। तुम जानते हो, मेरी सहानुभूति हिन्दीे को राष्ट्रभाषा बनाने वालों के साथ नहीं है, इसका विरोध करने वालों के साथ हो सकती थी, पर है नहीं ।‘’
‘’क्या कह रहे हो तुम, पता है? तुम पहेलियॉं गढ़ने का एक साफ्टवेयर तैयार करो। फेसबुक वाले खरीद लेंगे और तुम मालामाल हो जाओगे। यार, कभी तो ऐसी बातें किया करो जो मेरी खोपड़ी में भी धँसें।‘’
’’ठीक कहा तुमने, तुम्हारी ही नहीं, पूरे देश की खोपड़ी इतनी मोटी हो गई है कि मेरी कमजोर आवाज उसे भेद नहीं पाती। उदाहरण दूँ तो, हिन्दी वाले आज भी हिन्दी का कारोबार करते हैं, हिन्दी से प्या।र नहीं करते।‘’ वह हँसने लगा

Post – 2016-02-02

हम जैसे हैं वैसे क्‍यों हैं ?

’’तुम जानते हो आदमी के पेट में भी एक छोटा दिमाग होता है और वह अपने फैसले स्वयं कर लिया करता है, केवल अपने फैसले नहीं करता, बड़े दिमाग को नियन्त्रित और निर्देशित भी करता है?‘’

‘’यह खयाल कैसे सूझ गया तुमको ?’’

’’इसलिए कि हममें से अधिकांश लोग पेट वाले दिमाग से सोचते हैं, बहुत कम लोग हैं बड़े दिमाग से सोचते हैं। सत्ता हस्तांतरण के बाद हमारे समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती चली गई । यदि ऐसा न होता तो हमने सत्ता पाने के बाद उधरंभर बनने की जगह स्वतंत्र बनने की कोशिश जरूर की होती। सत्ता- हस्ता‍न्तरण को ही स्वाधीनता मान कर रास-रंग में व्यस्त न हो गए होतेा। स्वतन्त्रत कहे जाने वाले भारत में उदरंभरता का विस्तार न हुआ होता, हमारी जबान लम्बी और रीढ़ कमजोर न होती गई होती।
‘जानते हो उदर वाले दिमाग से सोचने वाले पेट के बल रेगते हैं, तनकर खड़े नहीं होते इसलिए वे चलते नहीं हैं किसी के पॉंव पकड़ कर घिसटते हैं और हम पश्चिम के पॉंव पकड़ कर घिसटते हुए आगे बढ़ रहे हैं और प्रसन्न हैं कि जहॉं थे वहॉं से इतना आगे बढ़ चुके हैं, यह नहीं समझ पाते कि जिस सतह पर थे उससे कितने गिर चुके हैं।‘’
’’तुम यह मानोगे कि तुम ऐसी बातें लोगों को चौंकाने के लिए करते हो?’’
‘’ तुम मेरे साथ दोस्ती के कारण कुछ रियायत कर रहे हो। मैं चौकाने के लिए कुछ नहीं करता। अपने भरसक थप्पड़ लगाता हूं और उस चुल्लू भर पानी की तलाश करता हूँ जिसमें कभी लोग डूब मरा करते थे। क्योंकि थप्पण खा कर भी तुम कहते हो मजा आ गया, कितनी चमत्कारी बात कही है और तान कर सो जाते हो अलगे थप्पड़ के इन्तजार में जब फिर मजा आएगा।
” आश्चर्य होता है कितना श्रम उन्होंने हमें अपना बौद्धिक गुलाम या अपना परजीवी बनाने के लिए किया। उसकी शतांश कोशिश भी हमने अपनी मानसिक स्वाधीनता के लिए की होती, उनकी दबोच से बाहर निकलने के लिए की होती तो …’’

”तुम हवा में बातें कर रहे हो। पता नहीं चलता तुम किसके किस गुण या दोष की ओर इशारा कर रहे हो।”

‘’मैं बात तो कर ही नहीं रहा था यार। मैं तो रो रहा था। रोने के कई रूप हैं, कई बार आदमी हँसते हुए भी रोता है और बोलते हुए भी रोता है, और कई बार चीत्का‍र करते हुए भी अट्ठहास करता है। तुमने देखा दलि‍त चीत्कार के रूप में प्रकट होता दलित अट्टहास।”

”आ गए न सामयिक राजनीति पर।”

” मौसम की मार से कोई बचा है। पर मौसम की मार खाने वाले भी लगातार मौसम पर बात नहीं करते। मैं रो भी रहा था और उन महान सांस्क़ृतिक आक्रमणकारियों की राष्ट्रनिष्ठा को अश्रुजल से तृप्तं भी कर रहा था। मेरे मन में उनके प्रति उससे गहरा सम्मान है जो तुमहारे मन में होगा जो उपनिवेशवादी मूल्यों से क्रान्ति का सपना देखते देखते उूब गए तो सोचा धर्मक्षेत्र में ही क्रान्ति कर ली जाए और इन धर्मों के बुनियादी तत्वों तक को नहीं समझा। जो हो रहा है अच्छां ही होगा, समय आगे बढ़ता है तो समाज भी आगे बढ़ता है के इकहरेपन के कारण न अपने समय को समझ पाए न समाज को न अपने कार्यभार को … ”

’’तुम तैश में आ गए हो।‘’

’’जानता हूँ इसलिए यह भी नहीं समझा पाउूँगा कि तैश में आया क्यों हूँ। बात कल करेंगे।”

Post – 2016-02-01

पुर हूँ मैं शिकवे से यूँ राग से जैसे बाजा

”क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारी बातें कुछ गfरष्ठ हो जाती हैं? ’’

”जानता हूं लॉलीपॉप चूसने वाले बच्चों को रोटी से घबराहट होती है। हम साहित्य के नाम पर केवल कविता कहानी चुटकुले और हल्के फुल्के व्यंग्ये के आदी हैं, भावुकता को खुराक देने वाले साहित्य के आदी हैं जिससे आनंद तो आता है परंतु विचार-विमुखता भी पैदा होती है, एक बौद्धिक रिक्तता भी जिसमें समाज के कर्णधार माने जाने वाले लोग हुड़दंग में शामिल हो कर नाम कमाने लगते हैं। देश को तोड़ने वाले इतने आयोजनों के बीच उस देश को समझने की कोशि‍श भी गरिष्ठ लगने लगती है। मैं तुम्हा्रे बौद्धिक आलस्य की दवा करना चाहता हूँ। तुम्हांरी रुचि बदलना चाहता हूँ। मालिश का शौक छुड़ा कर व्यायाम की आदत डालना चाहता हूँ।‘’
’’मेरा मतलब यह नहीं था, भार्इ। मैं सिर्फ यह कह रहा था कि क्या इन्हीं विचारों काे कुछ और सरल बना कर नहीं रखा जा सकता जिससे अधिक से अधिक लोग इसे समझ सकें?”
”कहा तो जा सकता है, एक ही बात को कई तरह से दोहराया भी जा सकता है, परंतु उसके बाद भी जरूरी नहीं कि जो न समझना चाहता हो उसकी रुचि ऐसे विषय में पैदा हो जाए। कुछ कहते समय सरलता से अधिक जरूरी है सटीकता। यदि बात सटीक ढंग से न कहीं गई तो सरल भाषा में कहने पर भी समझ में नहीं आएगी। आनन्दमार्गी साहित्य की लत से हमें बौद्धिक रूप में इतना खोखला कर दिया गया है कि उस खोखलेपन को भरने के लिए हमें हंगामों का सहारा लेना पड़ता है और उनमें शरीक होते समय लोग सोचते तक नहीं कि इसका अनुपात क्या होना चाहिए, किसी समस्या का समाधान क्या होना चाहिए, यह तक तय नहीं कर पाते कि अपने ही समाज और देश को लगातार उद्विग्नता की स्थिति में रख कर वे उसे किस दिशा में ले जा रहे हैं? ”
”तुम क्या किसी से कम हो। कोई बहाना मिल जाय उसी हंगामे में तुम भी शामिल हो जाते हो, हॉं दूसरी ओर से। तुम उसी बात को कुछ और साफ करो जिसे कल उठाया था। मुझे उससे कोई परेशानी नहीं थी। सच कहो तो मुझे बहुत मजा आ रहा है यह सोचकर कि कैसे हमारे तार एक दूसरे से जुड़े हैं। सच कहो तो इन तारों को न हम लक्ष्य कर पाते हैं न हमारे समाजशास्त्री और ऩ नृतत्ववेत्ता, फिर भी ये सूत्र कुछ इस तरह काम करते रहते हैं कि तोड़ने की इतनी सारी कोशि‍शों के बाद भी इसका अपनत्व बना रहता है।”
”अभी तो तुमने इस तार के भीतर की पहलों को देखा ही नहीं। देखो, ये सभी स्थानवाची अव्यय तीन घटकों से बने हैं, ई/इ/य जो निकटता को प्रकट करता है और आगे अंक, कड, इड, इल, खान, हान या हॉ, ठान, त्थ आदि जिन सभी का अर्थ स्थान है और सबके साथ ए की विभक्ति लगी है जो में या पर का सूचक है। यह ए संस्क़ृत में भी गृहे, बने आदि में मिलेगा। तमिल का अंग और सं; का अंक एक ही हैं। इला और इल एक दूसरे से जुड़े हुए हैं अभी इन तारों के कुछ और पहल हैं जिनको देख कर तुम चकित रह जाओगे।
” देखो यह जो तमिल का इंगे है इ-अंक-ए मिले हुए हैं। अंक का मतलब हुआ स्थान, इविड में इ के साथ इड जुड़ा हुआ है डसका अर्थ है जगह । बांग्ला खाने में खान का अर्थ है स्थान एक और प्रयोग भोजपुरी में होता है यह भी स्थान का ही सूचक है और इसी तरह पंजाबी का त्‍थे वही है भोजपुरी अौर हिंदी का हां तरह की गहरी समानता भाराोपीय बोलियों में भी नहीं मिलेगी। वहॉं सीधे स्वीकार है और उस स्वीकार में अटपटापन है1 वाक्य विन्यास भी एक जैसा है कर्ता- कर्म- क्रिया। इनके विशेषण इनसे पहले। यह नियमितता भारोपीय बोलियों में नहीं पाई जातीा अंग्रेजी आदि में क्रिया कर्ता के ठीक बाद आती है और कर्म उसके बाद। बड़ी मशक्कत से काल्डवेल में तमिल आदि की वाक्य रचना को अलगाने के लिए यह फर्क निकाला कि हिन्दी आदि में सहायक वाक्य मुख्य वाक्ये से पहले आएगा, ‘मैंने सुना है कल फिर बरसात होगी’ तमिल आदि में उलट जाता है, जिसमें कल फिर बरसात होगी, ऐसा मैने सुना है जैसा वाक्य बनेगाा परन्तु उत्तर की बोलियों में, भाषाओं में और संस्कृत तक में यह प्राय: देखने को मिल जाएगा।”
”’बोर कर दिया। तुम उस कशीदाकारी की बात करने वाले थे जिसमें एक शब्द दूसरे सिरे पर पहुँच कर नई रंगत लेता है फिर उसके साथ लौटता है और एक नई रंगत लेकर वापस लौटता है। ऐसा झटके में कह गए थे?”

”पीने के अर्थ में तमिल में कुडि का प्रयोग होता हैा इससे भ्रम पैदा होता है कि यह दक्षिणी बोलियों का शब्‍द है। परन्‍तु संस्‍कृत कु/कुं का अर्थ ह पानी। कुमुद/कुमुदिनी का अर्थ है पानी में मगन रहने वाला/वाली, कमल, कमलिनी। कूप, कुँआ, कुंभ –जलपात्र, कुंभी, कुप्पी- द्रव रखने की थैली, कुड, कूँड़ा त; कुडम्, कुडिक्कारन – पियक्‍कड़।
त. पो – जाना, सं; पवि – क्षेप्यास्‍त्र, पवन – चलने वाला, अर्थात् वायु, (वायु: वाति),
त. में ऑख के लिए कण् का प्रयोग होता है संस्क़ृत सहित उत्तर की भाषाओं में अक्षि- ऑख, चक्षु – बां. चोख आदि । अब इस भिन्नता के कारण पहली नजर में दोनों में भिन्नता दिखाई देगी। पर त. में कण् का एक और अर्थ है गोलाकार गड्ढा जो अक्ष का भी अर्थ है। संकल्पना के स्तर पर इस समानता से आगे बढ़ने पर हम सं. और हिन्दी आदि में कनीनिका या ऑंख की पुतली (इस पुतली के साथ हो सकता है आपको अंग्रेजी का प्यूपिल भी याद आ जाये), काणा या काना, कण्व – द्रष्टा (सायण ने कण्व का अर्थ काना लिया है, फिर भी आँख से संबन्ध तो बना ही हुआ है), प्रस्कण्व – चिचक्षण। परन्तु इससे पीछे भाषा के विकास का एक स्तर है जिसमें भारतीय भाषाओं में जिन वस्तुओं में अपनी कोई ध्वनि नहीं होती उन सबके लिए शब्द जल के पर्यायों से लिए गए है जिसकी प्रत्येक ध्वनि को एक उच्चार्य शब्द के रूप में ढाल कर इसके सूक्ष्म भेदों के लिए अलग शब्द बनाए गए और फिर उनमें से ही किसी या किन्हीं का प्रयोग नीरव भावों, पदार्थों, क्रियाओ आदि के लिए किया गया, यद्यपि क्रिया का अर्थ ही है ध्वनि का उत्पादन। इसे यहॉं नहीं समझा जा सकता। इस पर मैं बहुत बाद में चर्चा करूँगा । परन्तु यहॉं उस नियम को लागू करें तो कन् का अर्थ है जल, कंज का अर्थ है जलज, कनखल, कानपूर कन्नौज, कनइल, कनराय आदि का अर्थ है जलतटीय स्थल, कनक आ अर्थ है चमकने वाला और कनीनिका का अर्थ है देखने वाली।
इनमें धागे की वह कशीदाकारी समझ में नहीं आती, यद्यपि है. इसलिए एक अन्य उदाहरण को लो। तमिल में दूध के लिए पाल् का प्रयोग होता है, तेलुगु में यह पालु हो जाता है, हिन्दीे का पालन अर्थात् दूध पिला कर पोषण करना इसी से निकला है और इस तरह पालित शिशु के लिए बाल या बालक का विकास इसी से हुआ है, परन्तु। हिन्दी का पाला जो तुहिन या फ्रास्ट के आशय में प्रयोग में आता है क्या् इस पाल् से निकला है। नहीं। इसके पीछे जाने पर हमें प्ल, प्लव, प्ला‍वन आदि जल से जुड़े शब्द मिलते हैं। अब हमें पता चलता है कि पानी के लिए जिस शब्द का प्रयोग हुआ, उसी का अर्थविस्तार दूध, अमृत, आदि के लिए भी हुआ और ठंड तथा बर्फ आदि के लिए भी। पा, पी, पानी, पय, वीयूष, अम, अम्बु , अमृत। पहली नजर में जो द्रविड़ मूल का शब्द् दिखाई दे रहा था अब उसकी जड़ें आर्यभाषा में दिखाई दे रही हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि इन शब्दों का स्रोत तथाकथित आर्य भाषाऍं हैं, बल्कि यह कि यह साझेदारी इतनी जटिल है कि हम अपनी भाषा संपदा को आर्य या द्रविड़ न कह कर भारती कहें, कम से कम उस भाषा को भारती कहें जिसका प्रसार भारत से ले कर यूरोप के छोर तक सीधे और उससे आगे का प्रसार उन क्षेत्रों के कारक तत्वों के कारण हुआ था तभी हम समझ पाऍंगे कि यूरोप तक पहुँची संपदा में द्रविड़ के तत्वे जिन्हें काल्ड्वेल ने लक्ष्यू किया था क्यों हैं और जैसा कि हाफमैन आदि ने बाद में लक्ष्य किया, मुंडारी के तत्व यूरोप तक कैसे पहुँचे है। यहॉं इनकी चर्चा जरूरी नहीं। तुम थक भी रहे होगे, फिर भी काल्डवेल की एक टिप्पेणी के साथ अपनी बात समाप्त् करना ठीक रहेगा:
The distinctive marks of the neuter gender, in the Dravidian languages, even agree with those of our languages to so great an extent that it does not appear probable that these two circles of languages should have developed the neuter gender quite independently of each other. The Dravidian languages have not yet been proven to belong to our own sex-denoting family of languages; and although it is not impossible that they may be shown ultimately to be a member of the family, yet it may also be that at the time of the formation of the Aryan languages a Dravinian influence was exerted upon them, to which this, among other similarities is due.72
गौर करो। काल्डवेल भी जानता था या उसे इसका आभास था कि जिसे वह द्रविड़भाषा परिवार कह कर संस्क़ृत से अलग कर रहा था उसकी गहरी पड़ताल में उतरने पर यह सिद्ध किया जा सकता है कि इन दोनों में बुनियादी अलगाव नहीं है, फिर भी हमने उस दिशा में प्रयास तक न किया। इस देश को तोड़ने वाले तक समझदारी बरत रहे थे कि आगे चलकर उनकी बात गलत सिद्ध हो तो भी उनकी अकादमिक साख को बट्टा न लगे, परन्तु हमने अपना काम नहीं किया। हम राजनीति करते रहे और आज भी कर रहे हैं, जैसे हमारा अपना कोई घर ही न हो।दूसरे के घर में हम या तो भार बन कर रहेंगे या उसकी चाकरी करते हुए। राजनीति की भागीदारी ने साहित्ययकार को इन्हीं दो में से कुछ न कुछ बनाया है। मालिक बन कर केवल अपने घर में रहा जा सकता है जिसे हमने या हमारे पुरखों ने बनाया है और हमें सौंप गए हैं। उसकी मर्यादा की रक्षा तक हम नहीं कर पा रहे।