Post – 2017-02-20

जिस तरह की कुटिलता से कंपनी ने अपना साम्राज्य विस्तार किया था उसी तरह की कुटिलता के बल पर वह इसे अपने चंगुल में रखना चाहती थी. इसी का हिस्सा था सब्ज बाग़ दिखाना पर सब्जी तक हाथ पहुँचने न देना. आधिकारिक पदों पर अंग्रेजों को रखना और भारतीयों को ताबेदार बनाकर और हर तरह से निरुपाय बना कर रखना. सत्ता की यह पुरानी इंजीनियरी है जो सुमेरी सभ्यता से लेकर भारत की वर्णवादी संस्कृति तक में बनी रही है. यह कम हैरानी की बात नहीं की हमारे समाज के सबसे ऊपर माने जाने वाले ब्राह्मण और क्षत्रिय हाथ से काम नहीं करते, सारा उद्यम, कौशल, कला – वास्तु, मूर्ति, धातुकर्म, काष्ठशिल्प, भांड निर्माण, वस्त्र, अलंकार, माला बनाने से लेकर कांड, मूल,फल, फूल और शहद तक, करने, नृत्य, संगीत, चित्रकला और नाटक तक – और इनका लाभ हज़ारों साल से उन्हें मिलता रहा जिन्होंने संपत्ति के साधनो, उन्नत ज्ञान और हथियार को अपने तक सीमित रख कर श्रमिकों और उत्पादकों को इनसे वंचित कर दिया था. ईद लिए यह सोचने वाले कि बहुत कम संख्या में होने के कारण विशाल क्षेत्र और जनसंख्या पर कब्जा जमाये नही र खा जा सकता उन्हें इतिहास न दिखाई देता हो वर्तमान ही दिखाई दे की कितने कम लोगों के पास विश्व कि कितनी सम्पदा सिमटी हुई है और शेष सारा मानव समुदाय उनकी योजना के अनुसार चल रहा है तो सम्पदा और सत्ता के चरित्र को समझने में आसानी हो.

Post – 2017-02-19

हिंदुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – ३९
हिन्दूफोबिया

सर सैयद ने यदि अपने विवेक से काम लिया होता तो वे पूरे भारत के नेता बनकर उन क्षेत्रो में शिक्षा के विस्तार का आग्रह करते और उस एकता में एक नई जान फूँक सकते थे जो १८ ५७ में ऐतिहासिक कारणों से पैदा हुई थी और जिससे आतंकित होकर अंग्रेज उसे तोडना चाहते थे. राजद्रोह के जिस अभियोग से वह बचना चाहते थे उससे भी बचे रहते. इससे उन्हें केवल उत्तर भारत के हिंदुओं का ही नही, पूरे भारत के सभी वर्गों का समर्थन मिलता. यह उनकी उस समझ के भी अनुरूप था कि हिन्दू और मुसलमान एक सुन्दरी की दो ऑंखें हैं, कि दोनों की भलाई आपसी मेलजोल में है, और यह चिंता पूरे हिंदुस्तान के हिंदुओं और मुसलमानों के विषय में होती.

हमारी समझ से किसी को क्या करना चाहिए था इसके आधार पर हम उसका मूल्यांकन नहीं कर सकते .

परन्तु यदि परिथितियाँ और साक्ष्य ऐसे हों जिनसे यह सोचा जा सके कि उसने ऐसा क्यों किया या क्यों नहीँ किया तो यह समझा जा सकता है कि उन परिस्थितियों का निर्माण करने वाले का अपना संकट क्या था जिसे उसने किसी अन्य पर डाल दिया और उस अन्य का चुनाव उसने कैसे किया और अपनी योजना को किस तरह लागू किया कि उसे संदेह न हुआ कि उसका उपयोग किया जा रहा है.

इस तरह के सवाल बहुत जटिल होते हैं जिनमे आदि अंत में और अंत आदि में समाया रहता है. अंडा पहले या मुर्गी की तरह. देखना यह होगा कि दहशत में कौन था और उससे उबरने की चिंता किसे अधिक थी और मौके की तलाश में कौन था, जिस की पहचान करके उसने उसका उपयोग इतनी चालाकी से किया कि वह इस भ्रम में रहा कि वह अपनी चातुरी से अपना उपयोग करने वाले का उपयोग कर रहा है.

सैयद अहमद कम्पनी सरकार के वफादार मुलाजिम थे. उनमे मानवीयता भी कम न थी. १८५७ को जिस भी नाम से याद किया जाय, उसमे उन्होंने अपनी निष्ठां और व्यक्तिगत गरिमा के अनुरूप व्यवहार किया और आपदाग्रस्त अंग्रेज़ परिवारों को शरण दी और बाद में अंग्रेजों ने जो उससे भी जघन्य बदले की कार्रवाई की उसको भी देखा और उसकी कहानियां सुनी. उन्होंने इन्हें सुनकर कितने आंसू बहाये यह न तो किसी ने देखा न उन्होंने दर्ज किया पर जब इसके कारण बताने वाली व्याख्याएं आईं और सारा दोष हिंदुस्तानियों पर और खासकर मुसलामानों पर डाल कर इसे एक शाजिस बताया गया तो वे आंसू आक्रोश बनकर उनकी वाणी में प्रकट हुए जिसे लिपिबद्ध करने के बाद उन्होंने अपने पैसे से इसकी पांच सौ प्रतियाँ प्रकाशित कीं और उन्हें वाइसरॉय और ब्रिटिश सांसदों को भेज दी. उनके एक हिन्दू मित्र थे, नाम याद नही आ रहा पर वह इसकी प्रतियां अंग्रेज़ों को भेजने से बरजते रहे और जब वह फिर भी अड़े रहे तो उनका अंजाम सोचकर रोने लगे.

सैयद अहमद जानते थे कि उनके आरोप और बचाव दोनों सशक्त हैं. उनकी इस पुस्तक, असबाबे बग़ावतें हिन्द को उन्हें समझने की कुंजी माना जा सकता है. परिणाम उनकी आकांक्षा के अनुरूप रहे. उनका क़द बढ़ा, आफत नहीं आई .

जिस समय सैयद अहमद ने अपनी पुस्तक लिखी उस समय उनके मन में आक्रोश था, भय नहीं. हिंदुओं और मुसलमानो के साथ जो बुरा से बुरा हो सकता था वह हो चुका था. वह प्रतिशोध नहीं अतिशोध था जिससे सिद्ध होता था कि वे जिन मध्यकालीन क्रूरताओं की याद दिलाते हुए अपने को उनसे बेहतर शासक सिद्ध कर रहे थे अब नहीं कर सकते.

उन्होंने अपराधियों को दण्डित नहीं किया था निरपराध जनता पर अत्याचार किया. इसे अत्याचार मानते हुए ब्रिटिश संसद ने कम्पनी के शासन का अंत कर दिया था. यह संसद का फैसला था पर ब्रिटिश अमला वर्ग तो वही था. उसकी समस्या उग्र हो गई थी. तलवार ने अपना जवाब दे दिया था. यदि मुसलामानों के शासन के प्रति जिन्होंने गुरुओं के साथ जघन्य अत्याचार किये थे सिखों की दुश्मनी न होती जिसके कारण उन्होंने कम्पनी का साथ दिया, तो अंग्रेजों का सफाया निश्चित था.

अन्यायी सत्ता तलवार के बल पर टिकी होती है इसलिए उसे तलवार से तब तक डर नहीं लगता जब तक तलवार उसके हाथ में है, पर विचारों से डर लगता है. विचार तलवारों की धार भोथरी भी कर सकते हैं, और तलवार बनाने और तलवार उठाने की ताक़त भी पैदा कर सकते है.

यह खतरा पहले से पैदा हो चुका था जिसे प्रतिबंधों से दबाया जा रहा था. यह उन हिंदुओं की और से पैदा हुआ था जिन्होंने नए यथार्थ के अनुरूप अपने को ढालते हुए अपने प्रयत्न से अंग्रेजी सीख कर मैकाले के भारत आने से पहले ही अंग्रेजी में दक्ष एक शिक्षित मध्यवर्ग, नए अवसरों का लाभ उठाने के लिए, पैदा कर लिया था और अंग्रेजी संस्थाओं से परिचित हो चुके थे और उन अधिकारों की मांग कर रहे थे जो मध्यकाल में न तो मांगी गईं, न मांगी जा सकती थीं, पर वे अंग्रेज़ी ज्ञान के बल पर उनकी मांग कर थे. यह थी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जिसके जनक राममोहन रॉय थे.

उस खलबली का तो उन्हें पता ही न चला जिसका १८ ५७ में सामना करना पड़ा और हिन्दू मुस्लिम भेद के कारण सिखों की मदद और बंगालियों की तटस्थत के कारण और समय रहते ब्रिटिश सहायता मिलने हे कारण जो निर्ममता से कुचल दिया गया. पर बदले की कार्रवाई के बाद भी पहली बार भीतर से अँगरेज़ डरे हुए थे,

इससे उन्होंने आत्मालोचन करने पर तीन औज़ार निकाले.

१- सूचना तंत्रा का विकास जिससे हिन्दुस्तनियों के बीच क्या चल रहां है उसका पता चल सके .

२- सिखों और मूसलमानो की दबी कटुता का विस्तार करते हुए साम्प्रदायिक वैमनष्य को बढ़ाना और उन्हें लड़ने मरने के लिए छोड़ देना,

३. इसके लिए सही भारतीय का चुनाव करना और उस के निर्णयों को इस ठंडेपन से प्रभावित करना कि उसे लगे वह जो कुछ कर रहा है अपने निर्णय के अनुसार कर रहां है और उसकी साख बाढाने का प्रयत्न करना.

इस के लिए बंगालियों को पटाना मुश्किल था अन्यत्र परयावरण क्षुब्ध था.
इसी बीच उन्हें अपने क्षोभ को मुखर करने वाले सैयद अहमद मिल गए जो अपनी उसी पुस्तक में बता रहे थे कि मुअलमान अंग्रेजों के प्रति जिहाद कर ही नहीं सकता, वह वर्जित है, हां हिंदुओं के खिलाफ जिहाद गलत नहीं था.
T he preaching of jehad in India… against the British Government was opposed to the doctrine of the Mohammadan religion, and from the same cause, its practice on the other side of the Indus provinces , i.e. against the Sikhs was held lawful.

यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपने काम का बन्दा मिल गया. इसका आगे पीछे का व्योरा कल.

Post – 2017-02-18

आईने लाख हों हम खुद पर फ़िदा रहते है
विषय कोई हो मगर खुद को लिखा करते है
मिलने चलते है सरे राह जो मिले उससे
अंत में पाते है हम खुद से मिला करते हैं.

Post – 2017-02-18

मर गए ढूंढनेवाले कि कहीँ है कि नहीं
मैंने भगवान को पाया नही, पर हूँ तो सही .
‘क्या कहा डींग तो हाँकी है मगर है तो नहीं’
क्यों नहीं हूँ ये बताओ तो कहूँ यूँ तो सही.

सही के कितने ठिकाने हैं देर से जाना
ग़लत सच होता है और सच भी गलत होता है
गलत सही में मिला है तो मिला रहने दो
जिस भी हालत में हैं, दोनों हैं, मगर हैं तो सही

Post – 2017-02-18

हिंदुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – ३८
क्षेपक-3

मैं जानता था एकसाथ इतने उद्धरणों के कारण कुछ पाठकों को असुविधा होगी. मुझे स्वयं होती थी. मैं चाहता हूँ कि इनका अनुवाद भी साथ देता चलूँ पर इससे लेख और भी लंबा होने का डर रहता है.

जो लोग आराम से अंग्रेजी समझ लेते हैं उन्हें भी अपने मत को बिना उसे स्पष्ट किए समझा पाना आसान नहीं होता. समझा कर लिखने या कहने पर भी दृष्टि की भिन्नता होने पर अन्य व्यक्ति को अपने मत से सहमत कर पाना सम्भव नही होता. असहमत व्यक्तियों के विचारों का महत्त्व अधिक होता है. वे हमें अपनी सीमाओं से परिचित कराते हैं या भिन्न दृष्टि से सोचने को विवस करते है.

इस भूमिका के बाद ही हम अपने मन्तव्य को स्पष्ट कर सकते हैं जिसको ग्रहण कर ने का भर पाठकों पर डाल कर आज फोबिया वाले पक्ष पर लौट ना चाहता था.

विचार एक हथियार है. परंतु इसके द्वारा किसी भिन्न मंतव्य या भरम के विरुद्ध लड़ने से पहले इसे धार देने के लिए अपने आप से लड़ना होता है. अपने मन में उतारे गए विश्वास, अपने अहंकार और स्वार्थ और परिवेशीय दबाव से, तभी विचारों में वह धार पैदा होती है. इसीलिए मैंने पहले कहा था विचारों, (जिसमे विचारधारा और संगठन भी आते हैं) विश्वासों की बेड़िया सबसे खतरनाक होती है क्योंकि ये चेतना को जकड़ती हैं.

मैकाले पर ही आज भी रुकना होगा. मैंने कहा मैकाले वोल्टेयर आदि की परम्परा में आते हैं तो इसका अर्थ वह उनमें से किसी के बराबर थे यह नहीं है बल्कि उससे प्रेरित हैं. वैसा बनाने या उस उदारता को जीवित रखने और आगे बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं.

मैकाले राष्ट्रवादी थे जिसमें राष्ट्र के हित और राष्ट्र के गौरव और मानवीय गरिमा की चिंता थी और इसलिए वह संकीर्णता का, अन्याय का और किसी मनुष्य की या जाति की गरिमा की चिंता करते हैं परंतु वह क्रांतिकारी नहीं हैं. उन्होंने यहूदियों के विरुद्ध ब्रिटिश पूर्वाग्रहों और उनके साथ किये जा रहे भेदभाव के खिलाफ भी मोर्चा लिया था और भारत के पक्ष में भी. उनकी जानकारी बहुत व्यापक थी और जिज्ञासा उससे भी अपार. जब उन्होंने भारत की ज़मीन पर कदम रखा, उन्हें मद्रास (चेन्नई ) से उटकमंड तक की जहाँ गवर्नर जनरल विलियम बेंटिंग गर्मियों में डेरा जमाये थे, चार सौ मील की यात्रा पालकी में सवार होकर करनी पड़ी थी. रास्ते में ही उसने जितने पोथे पढ़ डाले थे उतने अपने को पढ़ा लिखा मानने वाले बहुतेरे लोग ज़िन्दगी में नहीं पढ़ पाते:

परंतु हमारे लिए उसकी वे टिप्पणियां अधिक माने रखती हैं जिनका सम्बन्ध हमारे समाज से है.

मैकाले न संस्कृत जानते थे न अरबी, न फ़ारसी. इनके सम्बन्ध में उनकी सूचनाएं तब तक अनूदित हो चुकी पुस्तकों और संस्कृत, अरबी और फारसी के विद्वानों से प्राप्त जानकारी तक सीमित थीं. संस्कृत साहित्य के विषय में उनके विचारों को जेम्स मिल के इतिहास ने प्रभावित किया था. उनके सामने दो समस्याएं थीं. एक था कानून का शासन स्थापित करने का जिसके लिए उन्होंने ब्रिटिश संसद में भी जंग लड़ी थी. तब तक कानून की दो तरह की व्यवस्थाएं, हिंदुओं का मनुस्मृति पर आधारित, मुसलमानों का सरियत पर आधारित. अंग्रेज़ कानून से ऊपर थे और उन्होंने चेत सिंह और अवध की बेगमों तक को नहीं बख्शा था, साधारण लोगों की तो बात ही अलग. कानून ऐसा हो जो सब पर लागू हो और धर्म, नस्ल, जाति का इसमें हस्तक्षेप न हो इसके लिए उन्होंने संहिता के निर्माण का काम हाथ में लिया.

शिक्षा भी अबतक धार्मिक प्रकृति की थी जिसका व्यापक जीवन से कोई सरोकार न था. मैकाले धर्मनिरपेक्ष और ज्ञान वर्धक, सुरुचि का विकास करने वाली ऎसी शिक्षा के पक्ष में थे जिसका जीवन में उपयोग हो और जिसे किसी के दान के बल पर नहीं अपने साधनों से अर्जित किया जाय और जिसमें आधुनिक ज्ञान विज्ञानं की शिक्षा हासिल हो सके. शिक्षा की भाषा क्या हो इस पर दस सदस्यों की जो समिति बनी थी मैकाले उसके एक सदस्य थे. इसमें दो तरह के विचार थे. पुराने लोग शिक्षा को पुराने ढर्रे पर चलने देना चाहते थे. मैकाले शिक्षा को संस्कृत अरबी के जाल से बाहर लाना चाहते थे. One-half of the committee maintain that it should be the English. The other half strongly recommend the Arabic and Sanscrit. The whole question seems to me to be– which language is the best worth knowing?

भारत की बोलचाल की कोई भाषा इतनी विकसित नहीं थी की उसमें शिक्षा दी जाय. मत समान रूप में विभाजित था. इसका मिनट लिखने का जिम्मा मैकाले का था जिसमे उसने अंग्रेज़ी को शिक्षा की भाषा बनाने का पक्ष लिया था. इसका विरोध करने वालों का मानना था कि भारतीय अधिक से अधिक कामचलाऊ अंग्रेज़ी ही सीख सकते है. यह आधा सच था.

पूरा सच यह था कि संस्कृत, फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी सभी शिक्षा लभ्य भाषाएं थीं और इन पर आधाकारिक ज्ञान के लिए बहुत अधिक परिश्रम और बहुत लंबे समय की आवश्यकता होती है और इनपर अधिकार करना ही इतनी बड़ी चुनौती बन जाती है कि इन्हें बोल पाना ही विदत्ता का प्रमाण बन जाता है. भाषा से आगे किसी विषय का ज्ञान हो या न हो. जो बात एक अनपढ़ अपनी बोली में कहता है वही आप एक शैक्ष भाषा में कहने की योग्यता हासिल करने के बाद विद्वान मान लिए जाते हैं.

मैकाले जानते थे कि शिक्षा की भाषा बोलचाल की भाषा ही हो सकती है. क्योंकि उनमें अक्षर ज्ञान के बाद जो कुछ भी पढ़ते हैं वह ज्ञान और सुरुचि का विस्तार होता है जो ही शिक्षा का लक्ष्य है. परंतु सभी इस बात पर एकमत थे कि किसी भाषा में ज्ञान साहित्य सुलभ नहीं है और बोलचाल की भाषाएं इतनी अविकसित हैं कि उनमें अभी ऐसे साहित्य का अनुवाद करना भी समभव नहीं!
All parties seem to be agreed on one point, that the dialects commonly spoken among the natives of this part of India contain neither literary nor scientific information, and are moreover so poor and rude that, until they are enriched from some other quarter, it will not be easy to translate any valuable work into them.
अब We have to educate a people who cannot at present be educated by means of their mother-tongue. We must teach them some foreign language.

विदेशी भाषाओँ में से चुनाव करना है तो किसी अन्य भाषा की तुलना में अंग्रेजी अधिक उपयुक्त है. ध्यान रहे कि मैकाले की नज़र में रूस का उदाहरण था, जिन्होंने फ्रेंच को वरीयता दी थी कुछ ने अंग्रेजी का भी चुनाव किया था . अंग्रेजी ऎसी थी जिसका साहित्य सभी दृष्टियों से संपन्न और आधुनिक था. जिसे लोग अपने प्रयत्न से सीख रहे थे और जिस पर अधिकार रखने वाले विद्वान भी थे जो इस संशय को दूर करता था की हिंदुस्तानी अंग्रेजी पर अधिकार नहीं कर सकते और ऊपर से अंग्रेज़ी शासकों की भाषा थी और आनेवाले समय में यह व्यापार की भाषा बनाने जा रही थी.
In India, English is the language spoken by the ruling class. It is spoken by the higher class of natives at the seats of Government. It is likely to become the language of commerce throughout the seas of the East.

यह नहीं भूलना चाहिये कि अंग्रेज़ी का पहला कालेज हिन्दू कालेज राममोहन राय की पहल से १८१७ में स्थापित हुआ था, मैकाले की टिप्पणी से अठारह साल पहले ही बंगाल ने अंग्रेजी को अपनी उन्नति की भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया था. कहें फैसला पहले हो चुका था उसपर मुहर लगनी बाकी थी. वह मुहर शिक्षा समिति में पांच पांच के बटवारे के बाद लार्ड विलियम बैंटिग को लगानी थी. वह लगी.

अंग्रेज़ी का ज्ञान जनता की शिक्षा की समस्या को तो दूर करता नहीं, पर यह काम कोई संस्कृत और अरबी फ़ारसी भी नहीं करतीं. पर अंग्रेजी के साथ इसकी संभावना थी. आधुनिक शिक्षा प्राप्त लोग अपनी भाषा में उसी तरह साहित्य रचेंगे और बोलियों का स्तर ऊँचा करेंगे जैसे रूसियों ने किया जिनकी पिछड़ी हुई भाषा आज किसी भी यूरोपीय भाषा से टक्कर ले सकती है.
Within the last hundred and twenty years, a nation which had previously been in a state as barbarous as that in which our ancestors were before the Crusades has gradually emerged from the ignorance in which it was sunk, and has taken its place among civilized communities. I speak of Russia.

मैकाले के सामने एक दूसरी समस्या न्यायपूर्ण शासन की थी. इसके लिए वह उच्च पदों पर भारतीयों की भागीदारी को जरुरी मानते थे और इस दृष्टि से अंग्रेज़ी पढ़े लोग ही उपयुक्त थे. हम अपनी ग्रंथि के कारण कई बातों का आशय उलट देते हैं मानो वह उनका धर्मान्तरण कर रहे थे. मध्य काल में रिश्वतखोरी इतनी व्यापक थी कि इसे दस्तूरी कहा जाता था. बिना फीस के कोई काम न होता था. क्लाइव और हेस्टिंग्स की भ्रष्टता का भी यही कारण बताया जाता रहा कि वे भारतीयों के संपर्क में आने के कारण भ्रष्ट हुए थे और बाद में संपर्क न रखने की नीति अपनाई गई थी. अतः हिंदुस्तानियों को धीरे धीरे प्रशासन में हिस्सेदार बनाना क्या प्रशासन को भ्रष्ट बनाना नही था? मैकाले का विचार था कि अंग्रेजी शिक्षा से उनका चरित्र अंग्रेजों जैसा ही हो जाएगा. वे उस ज्ञान और संस्कार से लैस होंगे जो उच्च शिक्षा से होता है. इसलिए
It would be… far better for us that the people of India were ruled by their own kins, but wearing our own broadcloths, and working with our cutlery … To trade with civilized men is infinitely more profitable than to govern savages.

इसके कुछ खतरे थे, पर वे हिंदुस्तानियों के लिए नही अपितु अंग्रेजों के लिए थे कि यूरोपीय ज्ञान और संस्थाओं से लैस होकर वे कभी न कभी आज़ादी की मांग करेंगे, ‘परंतु वह भी हमारे लिए गौरव की बात होगी’. ध्यान रहे कि इस आज़ादी में अपनी भाषा को विकसित और समृद्ध बनाने के बाद उसे उसी तरह अंग्रेजी से आज़ाद होना भी शामिल है जैसे यूरोपीय भाषाएं लातिन के दबाव से आज़ाद हुई थीं.

मुझे नहीं लगता कि ऐसे व्यक्ति के लिए महामना(broadminded) विशेषण अनुचित है. यदि हमारे अंग्रेजी के ज्ञाता अपना राज कायम करने के लिए अंग्रेजी से चिपके रह गए तो इसमें मैकाले का क्या दोष. यदि आज़ादी के इतने कम समय बाद फिर खुला भ्रष्टाचार आरम्भ हो गया और मुग़ल कालीन ऐयाशी और दम्भ प्रदर्शन आरम्भ हो गया, ताकतवर लोग कानून से ऊपर हो गए तो इसमें मैकाले के कानून का दोष तो नहीं. हमें अपनी कमियों के लिए दूसरो को कोस कर छुटकारा पाने से बचना होगा तभी अपनी कमियों को दूर कर सकेंगे. आज़ादी आंतरिक उपनिवेशवाद से प्राप्त करें और सं घर्ष अवसर की उस समानता के लिए करें जिसका आरम्भ शिक्षा की भाषा की समानता से होता है.

Post – 2017-02-17

हिंदुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – ३८
क्षेपक-2

हम अपने श्रद्धेय जनों के प्रति आदरसूचक विशेषण लगाना पसन्द करते हैं, जैसे महर्षि, महात्मा, महामना, स्वामी परन्तु पश्चिमी विभूतियों के प्रति कृपणता बरतते हैं। यह आदत गोरों में भी थी और पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, परन्तु है यह बुरी आदत, रुग्णता का परिचायक भी, ग्रंथि से जुड़ी – वह अहंताग्रंथि हो, या अकिंचनता ग्रंथि- मोटापा हो या कृशता, हैं तो दोनो व्याधियां।

यह भूमिका इसलिए कि यूरोप में (उससे बाहर का तो कुछ पता ही नहीं), ऐसी अनगिनत विभूतियां हैं जिनके साथ ऐसे विशेषण लगाने का प्रलोभन होता है और उस दशा में हम मैकाले के साथ महामना लगाएं तो अनुचित न होगा। वह उस परंपरा में आते हैं जो वाल्तेयर से आरंभ होती और जेफर्सन और टाम पेन से होती उन तक आती है। इसके बाद भी हिन्दीवालों ने उनका तिरस्कार किया। परन्तु आपको तो ‘हिन्दीवाला’ का अर्थ भी पता न होगा। जैसे दारूवाला, बाटलीवाला, सब्जीवाला, चायवाला, मिठाईवाला होता है, उसी तरह हिन्दीवाला भी होता है, हिन्दी को बेच कर अपनी महिमा की दुन्दुभी बजाने वाला। हिन्दी में काम-काज करने की जगह हिन्दी दिवस और हिन्दी पखवाड़ा मनाने वाला, विश्व हिन्दी सम्मेलन करने वाला, हिन्दी पर सवार होकर बड़ा बनने वाला। हिन्दीभाषी समाज में हिन्दीवालों का अलग संप्रदाय सेठ गोविन्ददास के साथ ही आरंभ हो गया था और इसने हिन्दी का अंग्रेज़ी से अधिक अहित किया। यह कम पखारने और अधिक बघारने वालों की जमात है, परन्तु यदि मैं कहूं कि यह हिन्दी तक सीमित है तो अन्याय होगा। यह भारतीय पहचान बन गई है और हिन्दीवालों से अधिक अंग्रेजीवालों में पाई जाती है। उथलापन और परनिर्भरता हमारा बौद्धिक पर्याय बन चुका है। भांग कुंए में ही घुली हुई है, इसके बिना आजादी की मस्ती का मजा ही नहीं लिया जा सकता था।

मैं आज आपके और मैकाले के बीच नहीं आना चाहता था। इच्छा थी कि उनके संगत व्याख्यानों या लेखों आदि से जुटाए गए कुछ उद्धरणों को सामने रख दूं कि आप बिना किसी हस्तक्षेप के स्वयं अपनी राय बना सकें, परन्तु कुछ बिन्दुओं की ओर ध्यान दिलाना जरूरी है, क्योंपिक पाठक तो बादशाह होता है और लेखक को इसरार करना होता है कि हुजूर इसे तो देखिए, इसके लिए ही अपनी शैलियां और युक्तियां और विधाएं और मंच चुनता रहता है पर बादशाहत का मिजाज कि सारे करतब करने के बाद भी वह जहां तक पहुंचना चाहता है, पहुंच नहीं पाता। सो बीच बीच में ध्यानाकर्षण के लिए मुझे अल्पतम वाक्यों में हस्तक्षेप करना ही होगा। इसे हम आरंभ से ही आरंभ करते हैं। अधकचरी सोच के लोगों ने हिन्दी राज स्थापित करने के लिए चला दिया कि अंग्रेजी ने हमारा अहित किया, वह न होती तो भारतीय कामकाज की हिन्दी होती, उन्हें यह भी पता नहीं कि अंगेजी से परिचय के बिना हिन्दी हिन्दी भी नहीं बन सकती थी। इससे पहले किसी ने सोचा ही नहीं था कि गद्य में भी कोई महत्वपूर्ण बात कही जा सकती है। भारतीय भाषाओं के विकास में अंग्रेजी का इतना योगदान है कि उससे परिचित होने से पहले हम सही वाक्य तक नहीं लिखते थे, वाक्य की जगह लकीर लिखते थे। उर्दू में ही नहीं, हिन् दी में भी एक शब्द को दूसरे से अलग किए बिना पूरी लकीर लिखी जाती थी और परी लकीर की एक ही शिरोरेखा हुआ करती थी। इसमें विरामचिन्हों के नाम और महत्व का बोध तक न था। एक ही विराम दम तोड़ ने वाला, अन्तिम गति, पूर्णविराम और दुहरे अन्त के लिए दुहरा पूर्णविराम। मैं इस पर अधिक बोलने चला तो विषयांतर होगा और स्थानाभाव और समयाभाव अलग से।
मैकाले पर ठीकरे फेंकने के लिए उनके एक ही कथन को तोड़ कर पेश किया करते हैं । वह अंश निम्न प्रकार हैः
We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern, –a class of persons Indian in blood and colour, but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect.
इसे कब किसने कहां उद्धृत किया था इसका मुझे भी पता नहीं. श्रम के मामले में आलसी होने के कारण इन वाक्यों को लोग अपने तरह से ले उड़ते हैं, और यह जांचना तक गवारा नहीं करते कि यह कब , कहां और किन परिस्थितियों में अन्तिम विकल्प के रूप में सुझाया गया था और दूसरे इन इबारतों को उद्धृत करते हुए अपनी मुश्किल को आसान बनाते रहे हैं और मूर्खता का विस्तार करते हुए इसे ही अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाते जा रहे हैं। इस अंश के ठीक व बाद में आए वाक्यांश को छोड़ देते रहे हैं। पूरा कथन निम्न प्रकार है,
I feel with them that it is impossible for us, with our limited means, to attempt to educate the body of the people. We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern, –a class of persons Indian in blood and colour, but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect. To that class we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from the Western nomenclature, and to render them by degrees fit vehicles for conveying knowledge to the great mass of the population.
मुझे डर है कि इस गति से मुझे मैकाले को प्रस्तुत करने का अवसर नहीं मिलेगा इसलिए उनके विचारो को निम्न रूप में समझें।
वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने कहा कि भारत के प्रशासन में भारतीयों को शामिल किया जाना चाहिए. उनका यह भाषण ब्रिटिश सन्सद में १० जुलाई १८३३ के हैं और उसी साल ब्रिटिश संसद से ऐक्ट पास हुआ जिसमें भारतीयों को प्रशासनिक सेवाओं में शामिल करने का अवसर तैयार हुआ और इसके असफल क्रियान्ववयन के कारण ही एक नया मोड़ आया. आगे का पथ आप पर छोड़ने के अलावा कोई उपाय नहीं यह याद दिलाना जरुरी है कि आरम्भ के अंश उस अधिनियम के हैं जो १९३५ मैं पारित हुआ और बाद के अंश ब्रिटिश पार्लियामेंट में १० जुलाई 1833 के उनके भाषण के. कुछ बहुत मार्मिक अंशों को जो उनके पत्राचार आदि से हैं स्थानाभाव के कारण छोडना पड रहा है. यह भी यद् दिलाना जरुरी है कि एक राशि शिक्षा के नाम पर १८१३ में ही नियत की गयी थी पर वह आपतोषवादी थी. उसमे संस्कृत और अरबी की पढ़ाई कि छूट दी गई टी थी. पर मैकाले ने उसे ज्ञानाभिमुख बनाया. दुःख है कि बहुत कुछ कथनीय आ है पर कहने का अवसर नहीं:
Act of British Parliament in 1813 A sum is set apart “for the revival and promotion of literature, and the encouragement of the learned natives of India, and for the introduction and promotion of a knowledge of the sciences among the inhabitants of the British territories.”
***
All parties seem to be agreed on one point, that the dialects commonly spoken among the natives of this part of India contain neither literary nor scientific information, and are moreover so poor and rude that, until they are enriched from some other quarter, it will not be easy to translate any valuable work into them.
***
What then shall that language be? One-half of the committee maintain that it should be the English. The other half strongly recommend the Arabic and Sanscrit. The whole question seems to me to be– which language is the best worth knowing?
***
I have no knowledge of either Sanscrit or Arabic. But I have done what I could to form a correct estimate of their value. I have read translations of the most celebrated Arabic and Sanscrit works. I have conversed, both here and at home, with men distinguished by their proficiency in the Eastern tongues.
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We have to educate a people who cannot at present be educated by means of their mother-tongue. We must teach them some foreign language.
***
In India, English is the language spoken by the ruling class. It is spoken by the higher class of natives at the seats of Government. It is likely to become the language of commerce throughout the seas of the East.
***
Within the last hundred and twenty years, a nation which had previously been in a state as barbarous as that in which our ancestors were before the Crusades has gradually emerged from the ignorance in which it was sunk, and has taken its place among civilized communities. I speak of Russia.
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The committee have thought fit to lay out above a lakh of rupees in printing Arabic and Sanscrit books. Those books find no purchasers. It is very rarely that a single copy is disposed of.
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Twenty-three thousand volumes, most of them folios and quartos, fill the libraries or rather the lumber-rooms of this body.
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The fact that the Hindoo law is to be learned chiefly from Sanscrit books, and the Mahometan law from Arabic books, has been much insisted on, but seems not to bear at all on the question. We are commanded by Parliament to ascertain and digest the laws of India.
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We are to teach it because it is fruitful of monstrous superstitions. We are to teach false history, false astronomy, false medicine, because we find them in company with a false religion.
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It is taken for granted by the advocates of oriental learning that no native of this country can possibly attain more than a mere smattering of English. They do not attempt to prove this.
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There are in this very town natives who are quite competent to discuss political or scientific questions with fluency and precision in the English language.
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If, on the other hand, it be the opinion of the Government that the present system ought to remain unchanged, I beg that I may be permitted to retire from the chair of the Committee. I feel that I could not be of the smallest use there.
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I believe that no country ever stood in need of a code of law as India.
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I feel that for the good of India itself, the admission of natives to high offices must be effected by slow degrees. But that, when the fullness of time is come, when the interest of India requires change, lest we should endanger our own power, this is a doctrine of which I can nor think without indignation. Governments, like men, may buy existence too dear.
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It is scarcely possible to calculate the benefits that we may derive from the diffusion of the European civilization among the vast population of the East. It would be, on the most selfish view of the case, far better for us that the people of India were rules by their own kins, but wearing our own broadcloths, and working with our cutlery than that they were performing their salams to English collectors and English magistrates but were too ignorant to value or too poor to buy English manufactures. To trade with civilized men is infinitely more profitable than to govern savages.
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What is power worth if it is founded on vice, or ignorance or on misery.
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We are free, we are civilized to little purpose if we grudge to any portion of human race an equal measure of freedom and civilization.
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Are we to keep people of India ignorant in order that we may keep them submissive or do we think that we can give them knowledge without awakening ambition? Or do we mean to awaken ambition and to provide no legitimate vent? Who will answer any of these questions in the affirmative? Yet any of these must be answered in the affirmative, by every person who maintains that we ought permanently to exclude the native from high office. I have no fears, the path of duty is plain before us, and it is also the path of wisdom, of national prosperity, of national honour.
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… that having become instructed in European knowledge, they may in some future age demand European institutions. Whether such a day will ever come, I know not. Whenever it comes, it will be the proudest day in English history.
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Post – 2017-02-16

हिंदुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – ३८
क्षेपक

आज मैं आपका परिचय एक ऐसे व्यक्ति से करना चाहता हूँ जिसे आधुनिक भारत का निर्माता कहा जा सकता है, मगर हमारी समझ की सीमा कहें या राजनीतिक नासमझी कहें कि उसके प्रति कृतज्ञ होने की जगह हमने उसकी तौहीन की और वह भी तब जब वह जवाब देने को न रहा।

यह अपराध हिन्दीप्रेम से शून्य , परन्तु हिन्दी के वर्चस्व के लिए आतुर और उसकी राजनीति करते हुए अपना उल्लू सीधा करने वाले, अल्पचेत वचनवीरों ने किया जिसके लिए हिन्दीभाषी होने के कारण मुझे भी ग्लानि अनुभव होती है!

इस अपराध स्वीकृति को प्रायश्चित्त भी कहा जा सकता है।

हमारे सामने दो बातें बहुत स्पष्ट होनी चाहिए। अंग्रेजी को ही नहीं किसी भी ऐसी भाषा को जो हमारे समाज से भौगोलिक दूरी रखती हो या हमारे वर्तमान से ऐतिहासिक दूरी रखती हो, उसको राजकाज की भाषा नहीं होना चाहिए। इस दृष्टि से अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी किसी को यह सौभाग्य या अधिकार नहीं मिल सकता।

भारत की कोई भी आधुनिक भाषा इसकी पात्र मानी जा सकती है, वह बंगला या तमिल ही क्यों न हो।

भाषा जो भी क्यों न हो उसे एक अन्य परीक्षा से भी गुजरना होगा। जिस प्रदेश या क्षेत्र में वह भाषा बोली जाती है उससे बाहर भारत में निकलने पर स्वयं उस भाषा को बोलने वालों का काम उससे चल जाता है या नहीं, यदि नहीं तो जिस भाषा का सहारा लेने से किसी न किसी तरह काम चल जाता है, वह राजकाज के लिए भारत की स्वाभाविक भाषा हुई, क्योंकि इसको न सरकार थोपती है न ही कोई भाषाविज्ञानी न कोई कलामर्मज्ञ, यह चुनाव आप खुद करते हैं या अपनी ज़रूरत से करने को विवश होते हैं. आप स्वयं फैसला करते है कि इस देश के कामकाज की भाषा क्या है.

जो लोग यह समझते हैं कि हिन्दी को संख्याबल के आधार पर देश की राष्ट्रभाषा होना चाहिए वे दो बातें नहीं जानते जब कि जानना जरूरी है। पहली, यह नहीं जानते कि राजभाषा और राष्ट्रभाषा का अन्तर क्या हैं, दूसरे वे यह नहीं जानते कि भाषाओं का अपना दबाव राजकीय दबाव से अधिक प्रबल होता है और यदि दोनों का प्रवाह एकदिश हो तो परिणाम अधिक अच्छे निकलते हैं।

यदि हिंदी को हिन्दीभाषियों के संख्याबल के आधार पर राजकाज की भाषा होना था तो य ह अब तक बन क्यों नहीं पाई । यदि नहीं बन पाई तो इसलिए कि इसका प्रतिरोध स्वाभाविक था। इससे यह सन्देश जाता था कि हिन्दी हिन्दीभाषियों की भाषा हैं. इसके वर्चस्व से हिंदीवाले बाज़ी मर ले जायेंगे. यह ठीक वैसा ही भय था जो हिंदुओं (बंगालियों) की अग्रता के भय से सर सैयद को असुरक्षा का अनुभव हुआ था और उनको लगा था कि इस तरह तो हम मिट जायेंगे. सर सैयद के सन्दर्भ में यह चिंता साम्प्रदायिक चिन्ता बन जाती हैं, परंतु यदि इसे हम भाषा से जुड़े अन्य प्रश् नो के साथ देखना चाहे, समस्या अपने नग्न रूप मे रखें तो समस्या सामने आजाती हैं]

सचाई यह है कि हिन्दी की अधिकांश बोलियां विकसित भाषाएं हैं और हिन्दी क्षेत्र की एक विचित्र अन्तःक्रिया है कि हम एक भाषागत साझेदारी निभाते चले आए हैं जिसके कारण इसकी कोई भाषा यदि प्रचलन में आ जाय तो इसके भीतर कोई विरोध नहीं होता और इसके बाहर विरोध न भी हो तो अलगाव या पहचान की चिन्ता बनी रहती है। अन् यथा बोली तो खड़ी बोली थी जो हिन्दी बनी, दूसरी तो सभी भाषाएं थीं!

इस वनोद को त्याग भी दे तो हिंदी ने अपने क्षेत्र की भाषाओं के उत्थान की भूमिका निभाने में चूक करके अपना अहित किया , अन्यथा यह किसी छोटे या बड़े क्षेत्र की भाषा न हो कर अखिल भारतीय व्यवहार्य भाषा होती.

जिन्हें बात करना नहीं आता वे फालतू बातों में इतना समय गंवा देते हैं कि जो कहना होता है उसे कह ही नहीं पाते। अपने साथ भी यही मुसीबत है, परन्तु जब बात छेड़ ही दी तो यह तो बताते चलें कि राष्ट्रभाषा हमारे राष्ट्रपति की तरह एक शोभाधर्मी पद है। हमारा राष्ट्रीय पक्षी शोभाधर्मी मोर है जब कि हमारा सांस्कृतिक पक्षी कौआ है. शकुन विचार हो या पितरों को आहार या पिया का संदेश कौआ को याद किया जाता है. मोर का स्थान संस्कृत ले या अंग्रेजी, कौए का स्थान हिंदी को चाहिए, सन्देश ले आने या पहुंचाने की भूमिका उसकी होनी चाहिए क्योंकि यह हिन्दी भाषियों की भाषा नही भारतीयों की वाणी है जिसके चरित्र को समझने में हिन्दी क्षेत्र की भाषाओं की उपेक्षा बाधक रही है. राष्ट्रभाषा पद पर संस्कृत या अंग्रेजी में से किसी को रखा जाय तो मुझे कोई आपत्ति न हो. प्रधानमंत्री का पद देशकाकातीत किसी अन्य को नहीं दिया जा सकता. हमें अंग्रेज़ी की जरूरत ही नहीं हैं देशविदेश की सभी भाषाओँ के जानकारों की और उनके पठन पाठन की आवश्यकता हैं और इसी तरह संस्कृत की शिक्षा ही नहीं भारत की पुरातन और अद्यतन भाषाओं के अधिकारी विद्वानों की जरुरत हैं, ये हिन्दी के लिए बाधक नहीं साधक हैं.

परंतु जिस व्यक्ति के विषय में बात करनी थी उनका नाम मैकाले था. उनपर कल बात करेंगे. भूमिका बनाने में बात ही कहने से रह गयी . आज केवल उस महाचेता को नमस्कार !

Post – 2017-02-15

हिंदुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 37
5- हिन्दू फोबिया की पड़ताल

पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए थे। पर आरंभ से ही उनकी नजर अपनी सल्तनत कायम करने पर भी थी। सभी ने अपने अपने ढंग से कुछ इलाके दबाए। परन्तु आरंभ में उनके मुनाफे का स्रोत व्यापार ही था। व्यापार में दोनों पक्षों को एक दूसरे की बात समझनी और अपनी बात बतानी होती है। इस क्रम में दोनों एक दूसरे की भाषा सीखते और संतोषजनक ढंग से अपनी बात कह पाने के लिए उसमें सुधार करते है। आरंभ संकेत और वास्तु की संज्ञा से होता है फिर दोनों पक्ष एक दूसरे की भाषा के कुछ शब्द सीखते हैं और कई बार खुद नए प्रयोग गढ़ लते हैं और एक संकर भाषा या पिजिन का चलन होता है। कई बार पिजिन ही व्यवहार की भाषा बन जाती है, परन्तु यदि संपर्क गहन और व्यापक हों तो दोनों अपने भाषाज्ञान में सुधार करते हुए पहले कामचलाऊ और फिर आधिकारिक ज्ञाप प्राप्त करते हैं।

भारत का व्यापार मध्यकाल में भी हिन्दुओं के हाथ में था। यहां तक कि सुल्तानों और मुगलों के विजय अभियानों में सेना के पहुंचने से पहले पड़ावों और छावनियों पर खानपान और रसद का प्रबन्ध वे ही करते थे। बुनकरी से जुड़े लोगों के लिए कपास से लेकर सूत तक की आपूर्ति और उनके द्वारा बनाए गए माल केा बेचने का काम हिन्दुओं के हाथ में ही था।

यह एक विचित्र लचीलापन है कि कुछ परिस्थितियों में कुलीन ब्राह्मण और क्षत्रिय भी धर्मान्तरण के लिए बाध्य हुए परन्तु बनियों ने ले दे कर अपने को बचाए रखा। इसका एक कारन यह है की उनके साथ मनमानी भी नहीं की जा सकती थी क्योंकि इसका अर्थ आपूर्ति व्यवस्था को पंगु बनाना था इसलिए सेना के रसद पानी का प्रबन्ध करने वाले बनिये भी अपने धर्म की रक्षा करने में सफल रहे। विदेशी मूल के लगभग सभी मुसलमान जागीरदार और जमींदार थे और वे उगाही पर पलते थे और मौजमस्ती में दिन काटते थे। उनके जीवन मूल्य मध्य- एशियाई थे जिसमें पराए माल को लूटने जोड़ने की प्रवृत्ति तो थी, उत्पादन और संवर्धन की नहीं । वे व्यापार का झमेला मोल नहीं ले सकते थे जिसमें असाधारण लोच और विनय की और जब तब टुच्चेपन की भी आवश्यकता होती है। उनकी शान ऎसी कि अपनी जमीदारी संभालने के लिए भी उन्हें कारिन्दों की जरूरत होती थी।

कंपनी के अमलों के संपर्क में हिन्दू आए चाहे उनका दफतरी काम काज हो या दुभाषिए का काम या भारतीय भाषाएं सीखने को उत्सुक अंग्रेजों की सहायता का काम. यह सारा गोरखधंधा हिन्दुओं के हाथ में ही रहा। यदि मैकाले के सुझाव से अंग्रेजी शिक्षा को प्रोत्साहन न भी दिया गया होता तो भी अंग्रेजी जानने वाले बंगालियों की बहुत बड़ी संख्या स्वयं अपने प्रयास से अंग्रेजी सीखने जानने वालों की निकल सकती थी जो नये अवसरों का लाभ उठाती और परिस्थितिवश ये बंगाल के हिन्दू ही थे मुसलमान नहीं।

अठारहवीं शताब्दी तक अंग्रेजों के आदर्श मुगल थे। वे उनकी जीवनशैली की नकल करते थे, अतः मुसलमानों के लिए अनुकरणीय नहीं हो सकते थे। इस प्रवृत्ति में बदलाव उन्नीसवीं शताब्दी में आया जब क्लाइव और वारेन हेस्टिग्स के ऊपर कदाचार के आरोपों के सिद्ध होने और इसके लिए भारत में व्याप्त कदाचार को उत्तरदायी मान कर लार्ड वेलेस्ली के समय में स्थानीय जनों के सीधे संपर्क में आने पर रोक लगाई गई।

सामाजिक स्तर पर हिन्दुओं से मुसलमानों के संबंध जहां तनावपूर्ण भी थे वहां दुराव तो था, टकराव भी कम था और घृणा नहीं थी। राजकीय अमलों के द्वारा दमन अवश्य होता था और हिन्दू उत्पीड़ित भी अधिक होते थे। अकालों के दौर में भी रियायत यह सोच कर नहीं दी जाती थी कि लगान चुकाने में असमर्थता की स्थिति में उनको धर्मान्तरण के लिए बाध्य किया जा सकता था।

परन्तु अंग्रेजों से उनकी चिढ़ घृणा के स्तर पर इसलिए थी कि उनके कारण ही मुसलमानों के बुरे दिन आए थे जिसकी चर्चा हम पहले कर आए हैं। मुसलमान न झुकने को तैयार थे, न बदलने को। उनकी चाकरी करने और उसके लिए अपेक्षित योग्यता प्राप्त करने का तो प्रश्न ही नहीं। हिन्दुओं के लिए यह अवसर था, मनोवैज्ञानिक अवरोध इसलिए नहीं था कि कल तक मुसलमान शासकों की चाकरी करते थे अब अंग्रेजों की करनी थी। पहले अवसर सीमित था अब खुला अवसर था।

हिन्दुओं में आधुनिक मध्यवर्ग के उदय से पहले से एक शिक्षित और ज्ञानजीवी वर्ग रहा है और जिसमें ब्राह्मण और कायस्थ आते रहे हैं। इसलिए यदि सतही नजर से देखें तो लगेगा, हिन्दू आगे बढ़ रहे थे और मुसलमान पिछड़ रहे थे। परन्तु यह लाभ केवल बंगाल तक सीमित था जिसमें देश की राजधानी थी। पर और गहराई में जाएं तो पाएंगे कि बंगाल के भी ब्राह़मणों ने जिनमें शीर्ष कान्यकुब्ज थे – चटर्जी, बनर्जी, मुखर्जी (चट्टोपाध्याय, वन्द्योपाध्याय, मुखोपाध्याय), टैगोर/ठाकुर और कायस्थों (बोस, घोष, दत्त, राय) ने और पहले के जमींदारों (सेनों और पालों) ने ही इसका लाभ उठाया] शेष हिन्दू नहीं, बंगाल के बाहर के हिन्दू नहीं। सर सैयद को इसका पता था, क्योंकि अपने मेरठ के जिस व्याख्यान में उन्होंने अपनी दहशत प्रकट की थी उसी में वह तीन तरह की बातें करते हैंः
1. बंगाली हिन्दुओं ने अपने लाभ के लिए उस संगठन की स्थापना की जिसे इंडियन नेनल कांग्रेस कहते हैंः
You know, gentlemen, that, from a long time, our friends the Bengalis have shown very warm feeling on political matters. Three years ago they founded a very big assembly, which holds its sittings in various places, and they have given it the name “National Congress.”
2- बंगाल से बाहर के हिन्दू भी मुसलमानों की तरह पिछड़ गए है और बंगालियों की दबंगता का फल उन्हें भी भुगतना पड़ेगा, यद्यपि उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं को इसका इल्म नहीं है . उनकी कल्पना के हिन्दू सोचते है वह उनके अनूदित शब्दों में:
what I am about to say is not only useful for my own nation, but also for my Hindu brothers of these Provinces, who from some wrong notions have taken part in this Congress. At last they also will be sorry for it — although perhaps they will never have occasion to be sorry; for it is beyond the region of possibility that the proposals of the Congress should be carried out fully. These wrong notions which have grown up in our Hindu fellow-countrymen, and on account of which they think it expedient to join the Congress, depend upon two things. The first thing is this: that they think that as both they themselves and the Bengalis are Hindus, they have nothing to fear from the growth of their influence. The second thing is this: that some Hindus — I do not speak of all the Hindus but only of some — think that by joining the Congress and by increasing the power of the Hindus, they will perhaps be able to suppress those Mahomedan religious rites which are opposed to their own, and, by all uniting, annihilate them.
3. और फिर यह कि सभी बंगालियों को भी इसका लाभ नहीं मिला है, वे भी बंगाल से बाहर के हिन्दुओं और बंगाल के भीतर के मुसलमानों की तरह इस पहल से लाभान्वित नहीं हुए हैं:
and the ordinary Bengalis who live in the districts are also as ignorant of it as the Mahomedans.

अतः हम कह सकते हैं कि यह हिन्दू फोबिया नहीं था, बंगाली फोबिया था जिसे उन्होंने एक साल पहले , मद्रास में कांग्रेस के चौथे अधिवेशन से पहले लखनऊ में दिए गए भाषण में मुखर किया था:
Think for a moment what would be the result if all appointments were given by competitive examination. Over all races, not only over Mahomedans but over Rajas of high position and the brave Rajputs who have not forgotten the swords of their ancestors, would be placed as ruler a Bengali who at sight of a table knife would crawl under his chair. There would remain no part of the country in which we should see at the tables of justice and authority any face except those of Bengalis. I am delighted to see the Bengalis making progress, but the question is —What would be the result on the administration of the country? Do you think that the Rajput and the fiery Pathan, who are not afraid of being hanged or of encountering the swords of the police or the bayonets of the army, could remain in peace under the Bengalis? This would be the outcome of the proposal if accepted. Therefore if any of you — men of good position, Raïses, men of the middle classes, men of noble family to whom God has given sentiments of honour — if you accept that the country should groan under the yoke of Bengali rule and its people lick the Bengali shoes, then, in the name of God! jump into the train, sit down, and be off to Madras, be off to Madras!
मेरा दुर्भाग्य है कि मैं सर सैयद की अधिकांश चिंताओं को सही और दूरदर्शितापूर्ण मानता हूं । परन्तु इस संशय से मुक्त नहीं हो पाता कि उनकी चिन्ताओं का किसी दूसरे ने इस्तेमाल करते हुए पूरी दिशा ही मोड़ दी और फिर यह सोच कर भी आश्वस्त नहीं हो पाता कि उस समय कोई ऐसा समाधान संभव था जिससे उनकी चिन्ताओं का निवारण हो पाता और वह उस बृहत्तर सरोकार से जुड़ पाते जिसके चलते कांग्रेस का नाम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रखा गया था। यह बहुत उलझा हुआ सवाल है जिसमें यह पता होते हुए भी कि कौन किसका इस्तेमाल कर रहा है, उस ऐतिहासिक चरण पर यह नहीं कहा जा सकता कि किसे विश्वास था कि वह दूसरे का इस्तेमाल कर रहा है। गलतियां तो सभी से हुई हैं, सर सैयद से भी हुईं, पर यह एक ऐसी गलती थी जिसने भारत के भविष्य को ऐसे दुस्वप्न में बदल दिया कि यह इबारत पहले की अपेक्षा अधिक बार सुनने को मिल रही है कि इससे तो अंग्रेजों का जमाना ही अच्छा था!

Post – 2017-02-14

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास -37
4 . नशे की साम्प्रदायिकता और नशे की राजनीति

कोलकाता में रहते मैंने बहुत से बंगालियों को सुंघनी का आदी पाया. सभी हिन्दू थे. एक भी मुसलमान नहीं. नशे में भी साम्प्रदायिकता ! मैंने पूछा इसका फायदा क्या है तो पता चला इससे दिमाग खुल जाता है. परेशान हुआ कि हिंदुओं को अपना दिमाग खोलने का इतना चाव और मुसलमानों में नदारद ! बंगालियों का पाला सिर्फ अंग्रेजों से नहीं पड़ा, सीरामपुर में फ्रांसीसियों का भी अड्डा था. फ़्रांसिसी भारत में अंग्रेजों की तुलना में अधिक मित्र भाव से रहते थे. बंगालियों के संपर्क में भी आये. बंगालियों को लगा कि फ़्रांसिसी लोगों का दिमाग आला दर्जे का है और इसकी वजह उन्हें साफ दिखाई दी कि वे सुंघनी सूंघते हैं और उन्होंने अपना दिमाग सुंघनी की आदत डाल कर बढ़ाने की कोशिश की. अंग्रजो का दिमाग भी कुछ कम तो था नहीं. वे सिगरेट पीते थे. उन्होंने सिगरेट से भी दिमाग को बढ़ाया.

मेरे कई मित्रों का मानना था की सिगरेट की कश लेने से दिमाग का कंसंट्रेशन बढ़ता है. अपने मुस्लिम मित्रों को सिगरेट पीते इतना कम देखा कि कोशिश करने पर भी किसी की याद नहीं आरही, जब कि अपने हिन्दू मित्रों में कई को पाया कि सिगरेट से पूरा कंसंट्रेशन न होते देख कर उन्होंने सिगार और पाइप की भी आदत डाली.

मुझे फ़िक़्र होती है कि दिमाग खोलने और एकाग्रता बढ़ाने के नुस्खे इतने आसान होते हुए भी मुसलमानों ने इन्हें आजमा कर देखा क्यों नहीं. कयास यह लगाया कि मुहम्मद साहब के ज़माने में तम्बाकू का पता तो था नहीं इसलिए पढ़े लिखे मुसलमानों को भी सुंघनी, सिगरेट, सिगार और चुरुट से दिमाग खोलने का ख्याल ही नहीं आया.

पुराने समय से ही भांग का नशा भी मन की एकाग्रता के लिए था जिसका चंडू की तर्ज पर चिलम पर रख कर कश लेने से गांजा का प्रयोग शुरू हुआ हो सकता है.

अफीम, कोकीन, चंडू और माजून आदि की मध्येशियाई और चीनी आदतें मुग़लों के साथ आई थीं और मुग़ल काल के साथ चली गईं मगर इनमे से किसी का दिमाग खोलने और एकाग्रता बढ़ाने से सम्बन्ध नहीं. इनका सम्बन्ध निर्वेदता से अर्थात दिमाग को सुन्न करने से है.

आयुधजीवी लुटेरों को युद्ध में चोट से पीड़ा न हो इसके लिए अफीम, माजून की आदत बचपन से ही डाली जाती थी और चीनियों को मंगोलों और हूणों के साथ लगातार जूझना पड़ा क्योंकि उनके बीच हिमालय की दीवार नहीं थी, वह दीवार तंग आकर उन्हें चीन की दीवार के रूप में बनानी पड़ी फिर भी मंगोलों और हूणों का इतनी बार हमला हुआ और इतनी पैठ बनी कि अफीम कि आदत चीनियों को पड़ ही नहीं गयी आधी से अधिक आबादी मंगोलीय मुखाकृति वाली हो गई और इसलिए ज्ञानपिपाशु चीनी जनता अफीम की शौकीन और प्रकृति में जुझारू हो गई.

कहा जाता है कि अंग्रेजों ने चीनियों को अफीमची बनाया और फिर भारत में अफीम पैदा कर के वही अफीम चीनियों को देकर उनका माल असबाब बिना सोना गंवाए खरीदते रहे, पर सचाई यह है कि नशे के कारोबार से अधिक बाध्यकर कोई कारोबार नहीं. अंग्रजो ने कुछ भी नया नहीं पैदा किया, यहाँ तक कि हमारा सांप्रदायिक विभेद पैदा करने के लिए भी, उन्होंने सामाजिक परिस्थिति का बारीकी से अध्ययन और विश्लेषण किया और फिर उनका विस्तार और उपयोग किया.

स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में अंग्रजों के विरुद्ध जनमत तैयार करने के लिए उनको जितना दुष्ट सिद्ध किया उससे कई गुना दुष्ट हमारा अपना प्रशासन हो चुका है और उन्नीसवीं शताब्दी के सर सैयद और बीसवी सदी के नीरद चंद्र चौधरी के बाद मैं भी यह मानता हूँ, यद्यपि कारण भिन्न हैं, कि यदि हम अंग्रेजो से बच भी जाते तो जो परिस्थितियां हमने पैदा कर रखी थीं उनमे हमें दूसरे ग़ुलाम बना सकते थे, और जैसा कि बाद के इतिहास ने सिद्ध किया सबसे सभ्य और सबसे समझदार अँगरेज़ ही थे, जिन्होंने कानून का राज्य स्थापित किया. इसलिए यह हमारा दुर्भाग्य गर्भित सौभाग्य है कि हम अंग्रेजी अधीनता में रहे और उन्होंने अपने नियम, कानून की गरिमा का नस्ली पूर्वाग्रह और प्रशासनिक सीमाओं के होते हुए भी जिस तरह निर्वाह किया उस तरह हम नहीं कर पा रहे हैं.

इसलिए मैं अपनी विफलताओं के लिए अंग्रजों और उनके हथकंडों को दोष देने की जगह अपने आप से यह सवाल करना चाहता हूँ की क्या हम उनको दोष देने की जगह आत्मालोचन और प्रतिरोध की सही युक्ति अपना सके. अंग्रेजों ने कुछ ऐसा नहीं किया जो हमारे नीतिशास्त्र के विपरीत हो.

मध्यकालीन समाज में लाठी और भैस के बीच जो रिश्ता बन गया था वह आज के भारत का यथार्थ है. यह तय करना हो की हम आगे बढे हैं या औपनिवेशिक काल से भी पीछे के मध्यकाल में पहुंचे हैं तो पहली नज़र में ऑंखें चौंधिया जाएँगी और जवाब देते नहीं बनेगा.

मैं जानता हूँ आप इस पोस्ट से निराश होंगे. सोचा था कि पिछली बातें बहुत भारी पड़ी होंगी इसलिए इसे कुछ हल्का बनाया जाये और भटकने का हाल यह कि कहाँ पहुँच गए पता ही नहीं. गाने तो ‘ये दिल मेरे बस में नहीं’ के बने हैं, पर दिमाग अपने बस में होता तो कल के अंत से आगे की बात करता. नज़र आया नशे तक की साम्प्रदायिकता और राजनीति होती है, उनसे भी मानसिकता और अग्रता और पिछड़ेपन का गहरा सम्बन्ध है तो उधर मुड़ गए.
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यदि हमारा ऊपर का तथ्य निरूपण सही हो तो हिन्दू अपने नशे की मूर्खताओं में भी बौद्धिक और नैतिक उत्थान की संभावनाओं की तलाश में रहा है और संभ्रांत मुस्लिम वर्ग और उसकी अपेक्षाओं पर सही उतरने वाले राजपूतों ने अफीम की सेवादारी को अपनी संस्कृति का अंग बना लिया जिसका उल्लंघन जशवंत सिंह जैसे सुशिक्षित व्यक्ति भी नहीं कर सके.

शराब की बात तो रह ही गयी. इसका इतिहास तो बहुत पुराना है और यह किसी न किसी रूप में सभी समाजो में प्रयोग में आता रहा है परंतु कुछ में इसे निंदनीय माना जाता रहा कुछ में वर्जित और कुछ में आनदानुभूति का साधन. पहले में यह वैदिक समाज में था पर इसका वर्जना पक्ष ही इसको आकर्षक बनाता रहां होगा. सोम का सेवन करने वालों को सुरा का आनंद लेने के लिए सौत्रामणी की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी और संभव है इस्लाम में यह वर्जित रहां हो पर ईरानी संस्कृति और सूफी रीति की आड़ लेकर यह इस्लामी निग्रहवाद के विरुद्ध पाबंदियों से मुक्ति के लिए चोर दरवाजा जैसा खुला तो सर्जना से लिए तड़पते कवियों के बीच यह दर्शन और मस्ती का पेय सबसे अधिक चलन में आया और वहां से इसका अधिमूल्यन आरम्भ हुआ तो इन इबारतों को लिखनेवाला भी ये इबारतें भी उसी के असर में लिख रहा है, यह जानते हुए की बौद्धिक और नैतिक स्खलन का रास्ता यहीं से शुरू होता है.

आदतों की गुलामी भी गुलामी ही है पर इस गुलामी में गुलामों की हथकड़ियां और बेड़ियां हाथों और पावों में नहीं, चेतना में होती हैं. गुलामी के अनेक रूप होते हैं जिनमे सबसे बाध्यकर होती है विचारों और विश्वासों की गुलामी, क्योंकि यह गुलामी प्रतीत ही नहीं होती. गौरव का विषय बन जाती हैं. गुलामों को गुलामी के फायदे आज़ादी के जोखिमों से अधिक आकर्षक प्रतीत होने लगते हैं .

Post – 2017-02-13

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास -37

3. हिन्दू फोबिया की पड़ताल की भूमिका

अपने लिखने पर मेरा नियंत्रण नहीं। सोचा था आज हिन्दू फोबिया की पड़ताल करूंगा। पर जो लिखता है वह मुझसे बड़ा है और उस बड़े में मेरे पाठक भी शामिल हैं। उनके द्वारा उठाए जाने वाले प्रश्न, उनके द्वारा उठाई जाने वाली आशंकाएं मेरे लेखन को नियन्त्रित करती हैं और वह पिशाच जो मुझे अपनी योजना पूरी करने में बाधा डालता है उसको आप भी शक्ति देते हैं! आपके परोक्ष अंकुश के कारण जो बना वह सामने है जिसका शीर्षक बदल कर “हिन्दू फोबिया की पड़ताल की भूमिका” करना पड़ा।)

सभ्यता पाशविकता को नियंत्रित करते हुए भौतिक समृद्धि, उस समृद्धि को हासिल करने की युक्तियों और दक्षताओं के विकास, बौद्धिक प्रगति और आत्मिक उत्थान का ही दूसरा नाम है जिसे अपने ही भीतर या आसपास के आलसी, उपद्रवी तत्वों से खतरा बना रहा है परंतु जिनको नियंत्रित करने के लिए उसने अपने प्रतिरक्षा तंत्र (सैन्यबल), सतर्कता तंत्र (चर और दण्डधर या पुलिस व्यवस्था) दण्ड संहिता, न्यायाचार का विकास किया जो अपनी मर्यादा का अतिक्रमण करते हुए स्वयं भी अन्याय और दमन में प्रवृत्त पाये जा सकते है। इसलिए सभ्यता को हम जिस रूप में जानते हैं उसे आदर्श मानवीयता की व्यवस्था कहना गलत होगा।

यहाँ हम इसका उल्लेख एक सीमित सन्दर्भ में कर रहे हैं : यह कबीलाई अवस्था से आगे का चरण है, उससे बहुत जटिल है, और यह आर्थिक विषमता के कारण अपने भीतर से और अपनी समृद्धि के कारण कबीलाई अवस्था में जीने वाले समाजों से आतंकित और असुरक्षित रहा है जो आदिम लुञ्चनकारी समुदायों से कुछ ही आगे रहे हैं। अतः उत्पादन से अधिक लूटपाट पर भरोसा करते रहे हैं और अपने कबीले से बाहर के समुदायों पर अत्याचार करने,और आतंकित करने की क्षमता को गर्व का विषय मानते रहे हैं और सभ्य समाजों से लूटपाट में मिली संपत्ति को मौज मस्ती पर खर्च करके नई लूट पाट की योजनाएं बनाता और उसपर अमल करते रहे हैं।

इसमें सन्देह नहीं कि अपने भीतरी चोरों, ठगों और तस्करों से परेशान रहने वाला सभ्य समाज लुटेरे यायावर कबीलों के आक्रमणों से सदा से आतंकित रहा है और उनका दमन इतनी बड़ी चुनौती रही है कि जो इसमें सफल हुआ वह इसे बहुत बड़ी उपलब्धि मानता रहा है, इसे हम वैदिक काल के त्रसदस्यु, शकारि विक्रमादित्य आदि संज्ञाओं में देख सकते हैं ।

यदि हम इतिहास पर ध्यान दें तो पाएंगे कि एशिया के तीन देश – भारत, ईरान और चीन – लंबे समय से आगे बढ़े रहे हैं जिसमें कुछ दूर तक उनकी भूभौतिक स्थितियां भी जिम्मेदार रही हैं, और इनको लगातार अपने पड़ोसी यायावर कबीलों से खतरा बना रहा है और कई बार अकल्पनीय दुर्गति का शिकार होना पड़ा है । इन तीनों में कुछ मामलों में प्रेरक की भूमिका भारत ने निभाई, यह दावा मुझे नहीं करना चाहि, भले इस बात के प्रमाण हों कि जिन हूणों, मंगोलों से चीन और भारत भी आशंकित रहते थे, उनके भीतर पैठ बनाने के साथ चीन और उससे आगे के देशों में भी अपनी छाप छोड़ने का काम भारतीय विचारधारा ने किया और यदि ईसाई मठ-व्यवस्था पर ध्यान दें तो उस पर भी बौद्ध मत का प्रभाव पड़ा। इससे पहले भी भारोपीय प्रभावविस्तार से इसकी भास्वरता का कुछ आभास मिल सकता है। पर चीन और ईरान की भी कुछ विशेषताएं ऐसी रही हैं जो भारत के लिए अनुकरणीय रही हैं और कुछ का संभवतः उसने अनुकरण भी किया ।

सभ्य समाज का पहला और अनिवार्य लक्षण है अध्यवसाय, आत्मावलंबन, आत्मानुशासन, और अपने कमाए और उपजाए पर भरोसा। यह भारतीय सभ्यता का अन्तःसंगीत रहा है जो विविध रूपों में विविध सन्दर्भों में ध्वनित होता रहा है। ऋग्वेद का एक वाक्य है मा कस्याद्भुतक्रतू यक्षं भुजेमा तनूभिः । मा शेषशा मा तनसा । किसी दूसरे के श्रम से उत्पादित असाधारण से असाधारण सुख विलास क्यों न हो, हमें उसका भोग न करना पड़े । ऐसा दिन न मुझे देखना पड़े न मेरे आद औलाद को। यही पूर्णायुत्व के साथ अदैन्य की कामना में भी है – अदीनाः स्याम शरदः शतम् । या मा गृधः कस्यस्वित् धनम् में भी । इसलिए इसके साथ जुड़ा रहा है संयम, अपरिग्रह, अस्तेय और त्यागपूर्वक भोग का भाव। दंभ, आडंबर और प्रदर्शनप्रियता से अरुचि ।

हड़प्पा काल से लेकर बाद तक के कालों में यही आदर्ष काम करता रहा है और इसका ही परिणाम है पूर्ण नागर व्यवस्थाओं के साथ नगर और उपनगर योजनाएं जिनमें मजदूरों की बस्तियां भी एक अल्पतम मानवीय अपेक्षा के अनुरूप मिलती हैं, और संपन्न घरों में रक्षा की चिंता तो दिखाई देती है पर वैभव का प्रदर्शन नहीं। उनमें उस तरह की भव्य निर्मितियों का अभाव दिखाई देता है, जब कि सुमेर, मेसोपोटामिया और मिश्र की सभ्यताओं में समाज दरिद्रता और मलिनता से त्रस्त रहा है पर शासको के महल और मकबरे चमत्कृत करते हैं। यदि समाज के लिए उत्पीड़क निरंकुशता रही है तो इन सभ्यताओं में जिन्हें एकलपाश लगाकर ‘सभ्यताएं’ कहें तो ही इस शब्द का उनके सन्दर्भ में प्रयोग हो सकता है, अन्यथा उनके लिए ‘प्रभुता’ अधिक सही प्रयोग होगा।

दूसरी ओर वे सभ्यताएं रही हैं जिनमें जनकल्याण को प्राथमिकता दी गई। जिनके राजा की कसौटी उसकी प्रजावत्सलता रही है। वह कर वसूल करेगा (इसके बिना तो राजसंस्था का ही लोप हो जाएगा) तो इस तरह जैसे भंवरा फूल से रस ग्रहण करता है, परन्तु उसे कोई क्षति नहीं पहुंचाता, अर्थात् जो कामलवेल्थ या कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का प्राचीनतम रूप है और जिसका निर्वाह करने का आग्रह इन सभ्यताओं में रहा है, उनको इस लोकप्रियता के कारण ही प्राच्य निरंकुशता का नमूना बना दिया गया और प्राचीनतम अवस्था से कुछ सौ साल पहले तक के निरंकुश शासकों की छवि को धवल बना दिया गया। वाक्चतुर लोग अपराधियों को निरपराध और भुक्तभोगी को अपराधी सिद्ध कर सकते हैं, इसके नमूने अदालतों में ही नहीं, इतिहासलेखन में भी देखने को मिलते हैं। भारतीय इतिहासलेखन में इनका नंगा रूप देखने में आता है.

हम अपने उक्त कथन का समाहार करते हुए कहें कि जब मैंने भारत, ईरान और चीन को ही एशिया के सबसे सभ्य (और सभ्यता का जन्म ही एशिया में हुआ और इसके स्पर्श से ही यूरोप सभ्य हुआ, इसलिए विश्वसभ्यता के सबसे सभ्य) देश और समाज कहा तो इसलिए कि इनमें जनकल्याण की चिन्ता बहुत प्राचीन काल से प्रधान रही है और सभ्यता के वे गुण भी रहे हैं जिनको हम भारतीय परंपरा में वैदिक या हड़प्पा काल से मध्यकाल तक और ग्राम स्तर पर उसके बाद भी अव्याहत पाते हैं।

परन्तु परजीवी और लुटेरे कबीलों के जीवनमूल्य ठीक इसके विपरीत रहे हैं और उन्हीं से मध्येशियाई समाजों का, सच कहें तो अरब और यूरोप तक के समाजों का चरित्र निर्धारित होता है। अरब भी कुछ समय के लिए, ईरानी प्रभाव और उसकी ज्ञानसंपदा के प्रभाव में आने के बाद और उससे सीखने के बाद ही सभ्यता के शिखर पर पहुंचे थे और अपने ज्ञानगुरुओं भारत, ईरान और चीन को भी ओझल कर दिया था। कबीलाई जीवन और मानसिकता के बचाव में भी कुछ बातें कही जा सकती हैं, परन्तु हम पहले ही बहुत भटक चुके हैं इसलिए इस समय उधर नहीं जाएंगे।

मैं समझना यह चाहता था कि मध्यकाल के बाद भारतीय उच्चवर्ग के, (जो आगे बढ़ने और आगे बने रहने की चिन्ता में सबसे नकलची होता है), जीवनमूल्य सुल्तानों के समय में कितने प्रभावित हुए इसका हमें ज्ञान नहीं। संभवतः इसकी संभावना न थी। परन्तु मुगलकाल में अकबर के बाद ईरानियों के लिए विशेष अनुग्रहभाव के कारण मध्यकालीन संस्कृति में जो नया सांस्कृतिक संचार हुआ वह, जिस सीमा तक हो सका, सभ्याचार का संचार था और इसे शासकों के सेवक वर्ग ने अपने आदर्श के रूप में स्वीकार किया और एक नयी सभ्यता का उदय हुआ
परन्तु यह निचले स्तर तक अपनी जड़ें नहीं जमा सकी, क्योंकि सब कुछ राजा के चाहने से नहीं होता।

प्रशासन पर हावी मुस्लिम समाज सल्तनतकालीन चेतना से ही ग्रस्त था और ईरानी संस्कारों का नाममात्र को, सतही प्रभाव पड़ा यह तो शिया सुन्नी अनुपात से ही समझा जा सकता है। रौब जमाओ, आतंकित करो, लूटो, मौजमस्ती करो वाला आदर्श अकबर के समय में भी सक्रिय रहा अन्यथा उनके दरबारियों और अमलदारों के वैभव और मूर्खतापूर्ण प्रदर्शन के वे किस्से सुनने को न मिलते जो रात के समय निकलने पर अपने मशालचियों की संख्या को भी अपनी महिमा में गिनना पसन्द करते थे।

भारतीय इतिहास का अब तक का विवेचन इतना सांप्रदायिक रहा है कि हम इतिहास की गतिकी को समझ ही नहीं पाए। इसे धर्म से अधिक मूल्यव्यवस्थाओं के रूप में लिया जाना चाहिए था और इस रूप में समझा जाना चाहिए था कि हमने कौन से मूल्य मध्येशियाई आक्रमणकारियों से, उनसे प्रभावित समाजों से ग्रहण किए और कौन से ईरान से और ईरान के प्रभाव में कुछ शताब्दियों के लिए उदार बने अरबों से? किसका कितना प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ा और कहां से नीचे नहीं उतर पाया? आज के समाज में हिन्दुओं में बंटे बहुसंख्य समाज में कितने हिन्दू और मुसलमान किस स्तर से जुड़े होने के कारण मध्येशियाई मूल्यों से जुड़े रह हैं? कितने ईरानी या खिलाफत के बाद के अरबी मूल्यों से? इसका धर्म से अधिक मूल्यप्रणाली से संबन्ध है और इसे समझा नहीं गया। बाद की पीढ़ियां अजदाद की लाश ढोने और उसे ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी ही निभा सकती हैं, उनकी सीमाओं में कैद रहने की नहीं।

मैंने सोचा था आज यह समझा सकूंगा कि कंपनी शासन के साथ हिन्दू क्यों आगे बढ़ गए, सभी हिन्दू बढे या हिन्दू छतरी के नीचे आने वालों में से कुछ लोग बढ़ गए और मुसलमान क्यों पीछे रह गए और किन मुसलमानों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, पर हो तो नहीं पाया। देखते हैं कल क्या होता है!