Post – 2018-01-20

लौकिक संस्कृत (४)

हम इस बात को दुहराना चाहते हैं कि पाणिनि का उद्देश्य संस्कृत को नियमित और आंचलिक प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करना मात्र था। वह इसी सीमा तक वैदिक और आंचलिक अनियमितताओं के दूर करना या संस्कृत करना चाहते थे, भाषा को दुरूह बनाने या अल्पजनग्राह्य बनाने का उनका कोई इरादा न था। उन्होंने (या कहें उनके सिद्धान्तों को निरूपित करते हुए किसी अन्य ने ने) पाणिनीय शिक्षा में उन दोषों को भी हतोत्साहित करने का प्रयत्न किया था जो संस्कृत के छात्रों और विद्वानों में आज तक पाए जाते हैं, ये दोष हैं गाते हुए पढ़ना (और बोलना), तेजी से पढ़ना (और बोलना), झूमते हुए पढ़ना (और बोलना), और जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ना (और बोलना)-
गीती, शीघ्री, शिरःकंपी यथालिखित पाठकः ।

प्रयोग पाठक का हुआ है, पर अभिप्राय वाचिक प्रस्तुति से है, जिसमें पढ़ना-बोलना दोनों आते हैं। यह है भाषा पर अधिकार होने की स्थिति में सहज, स्वाभाविक, निरहंकार भाव से पढ़ने और बोलने का तरीका। किसी को प्रभावित नहीं करना है, अपने मत को इस तरह प्रकट करना है कि सुननेवालों को हमारी बात समझ मे आ जाय और पढ़ते समय पाठ का अर्थ हमें स्वयं स्पष्ट होता चले।

इसमें अन्तिम अपेक्षा कि जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ने को दोष मानना बहुत रोचक है। कोई पाठक जैसा लिखा है वैसा ही न पढ़ेगा तो क्या कुछ और पढ़ेगा? यहां यह कहा गया है कि लिखित सामग्री का सन्धिविच्छेद करते हुए पाठ करें तो ही अर्थ समझ में आएगा। इस एक सीख पर ध्यान दिया गया होता तो संस्कृत की आधी दुरूहता समाप्त हो जाती और केवल इसे निर्देशक सिद्धान्त बना लेने के कारण ऋग्वेद जैसे डरावना माने जाने वाले ग्रन्थ का बिना टीका और भाष्य की सहायता लिए पाठ करना और अर्थ ग्रहण करना मेरे लिए काफी दूर तक संभव हो पाया। ऐसा नहीं कि मुझे अनुवाद और भाष्य देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती, इसकी नौबत कम आती है और अनुवादकों और भाष्यकारों की गलतियां तक पकड़ में आ जाती हैं। यह आप थोड़ी बहुत संस्कृत जानते हैं तो स्वयं आजमा कर देख सकते हैं।

इसे स्पष्ट करने के लिए हम ऋग्वेद के पहले ही सूक्त की पहली और दूसरी ऋचाओं को ही लें:
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति ।।

अब इसी के स्फुट (सन्धिविच्छेद सहित) पाठ पर ध्यान दें:
अग्निं ईळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं ऋत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभि: ऋषिभि: ईड्यो नूतनैः उत । स देवान् आ इह वक्षति ।।

अब पहली ऋचा में यदि कोई समस्या रह जाएगी तो ईळे को लेकर पर वह भी दूसरी ऋचा में आए ईड्य से दूर हो जाएगी। दूसरी ऋचा में इह से एक नया बोध होंगा कि भोजपुरी का इहां हिन्दी के यहां से अधिक पुराना है अर्थात् प्राचीनतर रूप या वैदिक की जड़ें कुरु पांचाल में नहीं भोजपुरी-मागधी क्षेत्र में हैं। संस्कृत के वहति का अधिक पुराना रूप वक्षति है, अर्थात् वह् धातु जिससे सं. वहन, वाहन और अंग्रेजी का वेहिकल आदि निकले हैं उसका पुराना रूप वघ् है जो बग्घी में उजागर है। हां इन बारीकियों को देखने के लिए नजर का सधना जरूरी है, पर एक बार सध जाने के बाद बोलियों, संस्कृत, और भारोपीय के विषय में दिमाग की जकड़बन्दी तार तार होने लगती है। हम जब वैदिक के गहन पाठके लिए पूरीतरह वैदिक के अध्ययन पर केन्द्रित पाठ की आवश्यकता पर बल देते हैं तो इसीलिए ।

Post – 2018-01-20

लौकिक संस्कृत (४)

हम इस बात को दुहराना चाहते हैं कि पाणिनि का उद्देश्य संस्कृत को नियमित और आंचलिक प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करना मात्र था। वह इसी सीमा तक वैदिक और आंचलिक अनियमितताओं के दूर करना या संस्कृत करना चाहते थे, भाषा को दुरूह बनाने या अल्पजनग्राह्य बनाने का उनका कोई इरादा न था। उन्होंने (या कहें उनके सिद्धान्तों को निरूपित करते हुए किसी अन्य ने ने) पाणिनीय शिक्षा में उन दोषों को भी हतोत्साहित करने का प्रयत्न किया था जो संस्कृत के छात्रों और विद्वानों में आज तक पाए जाते हैं, ये दोष हैं गाते हुए पढ़ना (और बोलना), तेजी से पढ़ना (और बोलना), झूमते हुए पढ़ना (और बोलना), और जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ना (और बोलना)-
गीती, शीघ्री, शिरःकंपी यथालिखित पाठकः ।

प्रयोग पाठक का हुआ है, पर अभिप्राय वाचिक प्रस्तुति से है, जिसमें पढ़ना-बोलना दोनों आते हैं। यह है भाषा पर अधिकार होने की स्थिति में सहज, स्वाभाविक, निरहंकार भाव से पढ़ने और बोलने का तरीका। किसी को प्रभावित नहीं करना है, अपने मत को इस तरह प्रकट करना है कि सुननेवालों को हमारी बात समझ मे आ जाय और पढ़ते समय पाठ का अर्थ हमें स्वयं स्पष्ट होता चले।

इसमें अन्तिम अपेक्षा कि जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ने को दोष मानना बहुत रोचक है। कोई पाठक जैसा लिखा है वैसा ही न पढ़ेगा तो क्या कुछ और पढ़ेगा? यहां यह कहा गया है कि लिखित सामग्री का सन्धिविच्छेद करते हुए पाठ करें तो ही अर्थ समझ में आएगा। इस एक सीख पर ध्यान दिया गया होता तो संस्कृत की आधी दुरूहता समाप्त हो जाती और केवल इसे निर्देशक सिद्धान्त बना लेने के कारण ऋग्वेद जैसे डरावना माने जाने वाले ग्रन्थ का बिना टीका और भाष्य की सहायता लिए पाठ करना और अर्थ ग्रहण करना मेरे लिए काफी दूर तक संभव हो पाया। ऐसा नहीं कि मुझे अनुवाद और भाष्य देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती, इसकी नौबत कम आती है और अनुवादकों और भाष्यकारों की गलतियां तक पकड़ में आ जाती हैं। यह आप थोड़ी बहुत संस्कृत जानते हैं तो स्वयं आजमा कर देख सकते हैं।

इसे स्पष्ट करने के लिए हम ऋग्वेद के पहले ही सूक्त की पहली और दूसरी ऋचाओं को ही लें:
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति ।।

अब इसी के स्फुट (सन्धिविच्छेद सहित) पाठ पर ध्यान दें:
अग्निं ईळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं ऋत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभि: ऋषिभि: ईड्यो नूतनैः उत । स देवान् आ इह वक्षति ।।

अब पहली ऋचा में यदि कोई समस्या रह जाएगी तो ईळे को लेकर पर वह भी दूसरी ऋचा में आए ईड्य से दूर हो जाएगी। दूसरी ऋचा में इह से एक नया बोध होंगा कि भोजपुरी का इहां हिन्दी के यहां से अधिक पुराना है अर्थात् प्राचीनतर रूप या वैदिक की जड़ें कुरु पांचाल में नहीं भोजपुरी-मागधी क्षेत्र में हैं। संस्कृत के वहति का अधिक पुराना रूप वक्षति है, अर्थात् वह् धातु जिससे सं. वहन, वाहन और अंग्रेजी का वेहिकल आदि निकले हैं उसका पुराना रूप वघ् है जो बग्घी में उजागर है। हां इन बारीकियों को देखने के लिए नजर का सधना जरूरी है, पर एक बार सध जाने के बाद बोलियों, संस्कृत, और भारोपीय के विषय में दिमाग की जकड़बन्दी तार तार होने लगती है। हम जब वैदिक के गहन पाठके लिए पूरीतरह वैदिक के अध्ययन पर केन्द्रित पाठ की आवश्यकता पर बल देते हैं तो इसीलिए ।

Post – 2018-01-19

लौकिक संस्कृत (३)

पाणिनि के समय में संभवत: संस्कृत का जनता से बिलगाव नहीं हुआ था। अनेकानेक जन भाषाओं के क्षेत्र में व्यापक संपर्क के लिए संस्कृत का प्रयोग होता था परन्तु क्षेत्रीय बोलियों के प्रभाव से इसका चरित्र बदला था। फिर भी यह माना जाता था कि उदीच्य की या कुरुपांचाल की संस्कृत अधिक शुद्ध है। शुद्धता के आग्रहशील अपने बच्चों को शिक्षा के लिए यहां भेजते थे और उनका अनुकरण करते हुए दूसरे अपना उच्चारण सुधारते थे । इसका कारण हम बता चुके हैं कि इसी क्षेत्र में कई हजार साल के लंबे दौर में संस्कृत का चरित्र निर्धारण हुआ था और मोटे तौर पर कहें तो इसी क्षेत्र में पाणिनीय वर्णमाला के सभी अक्षरों का सही उच्चारण संभव हो पाता है। यहां से जिस भी दिशा में चलें उच्चारण अशुद्ध होने लगता है। हालत यह कि बंगाल पहुंचते पहुंचते अकार अॉकार, इकार का ह्रस्व-दीर्घ में अभेद, ऐ और औ का एइ, ओइ मे परिवर्तन, ऋ, लृ, ण, य,व, ष, स, संयुक्ताक्षरों क्ष, ज्ञ, त्र की ध्वनियों का अभाव मिलता है।

हमने एक बहुत उलझे विषय को उठा लिया, जिसकी व्याख्या करने चलें तो बहुत लम्बा काम हो जाएगा, पर संक्षेप में कहें तो इस विकास रेखा को न समझ पाने के कारण संस्कृत का इतिहास लिखने वाले देसी-विदेशी सभी विद्वानों से भारी चूक हुई है। इनमें से कोई संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया के विविध चरणों को समझ ही न सका, न ही यह समझ सका कि किसी भी क्षेत्र की बोलचाल की भाषा न होते हुए भी यह व्यापक संचार के लिए संपर्क भाषा बन कर वैदिक काल या हड़प्पा सभ्यता की नीव से जो भिर्राना के साक्ष्यों से समझना चाहें तो सातवीं सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व तक जाती है, अपने नए रूप में ढलनी आरंभ हुई और विशिष्ट आर्थिक-सांस्कृतिक उपक्रमों से जुड़े श्रुधी और गंवार, अमीर-गरीब सभी के द्वारा बोली और समझी जाती थी, जब कि घरेलू स्तर पर सामान्य जन अपनी बोली बोलते थे जिनमें कुछ ऐसे तत्व थे जिन्हें द्रविड़ और मुंडा समुदायों की भाषाओं की विशेषता मानी जाती है और इसे बहुत झिझकते हुए वैदिक में मिला स्वीकार किया जाने लगा है।

पाणिनि से पहले जो वैयाकरण हुए उनके सामने मुख्य समस्या ऋग्वेद की भाषा को समझने की थी। हम फिर इस सवाल से बचना चाहेंगे कि यह समस्या पैदा क्यों हुई। संक्षेप में यह कि लंबे समय तक चलने वाली किसी प्राकृतिक त्रासदी के कारण जीवन रक्षा की समस्या इतनी उग्र हो गई कि पूरी सभ्यता नष्ट हो गई। असाधारण सम्मान के बाद भी वेदों की रक्षा तक संभव न रही, अर्थज्ञान का प्रशन तो उसके बाद आता है। दिन फिरे तो असाधारण प्रयत्न से देश-देशान्तर से जितना कुछ जुटाया जा सका उसका संकलित रूप ही हमें उपलब्ध है। इस परंपरा-विच्छेदन के कारण सदियों के अन्तराल के बाद तरह तरह की अटकलबाजियों से आगे बढ़ते हुए वे वेद का अर्थ समझने का प्रयत्न कर रहे थे। इसी क्रम में धातुओं की कल्पना और उनके बीजार्थ के निर्धारण के प्रयत्न भी हुए। इस प्रयत्न में दूसरे अनेक लोग लगे हुए थे, जिनके परिणाम वेदांग, संहिताएं और ब्राह्मण आदि हैं।

पाणिनि का प्रयत्न उस भाषा का उद्धार था जिसमें ऐसी एकरूपता आ गई थी कि वह देश-देशान्तर में बोली और समझी जाती थी, परन्तु आज जिसके इतने स्थानीय भेद हो चुके थे कि एक क्षेत्र की उसी भाषा को दूसरे क्षेत्र का व्यक्ति समझ ही नहीं सकता था। वह भाषा में वैदिक कालीन एक रूपता लाना चाहते थे परन्तु इस बीच में भाषाओं में जो वैदिक प्रयोग प्रयोगबाह्य हो गए थे, या स्वयं वैदिक भाषा में जो प्रयोग बाहुल्य थे उनका परिहार करते हुए।

पाणिनि के सामने तीन समस्यायें थीं। एक भाषा का एक मानक रूप जिसका कठोरता से निर्वाह किया जाय। दूसरा, ऐसे शब्द जो कालबाह्य हो चुके हैं या नितान्त आंचलिक हैं उनसे बचा जाय। तीसरा उच्चारण की एक रूपता जिसकी चिन्ता पहले भी थी, परन्तु इस दौर में जिसकी आवश्यकता पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ गई थी, पाणिनि पूरी वर्णमाला का पुनराख्यान और वर्गीकरण करते हुए उनके उच्चारण का तरीका बता रहे थे, उच्चारण के आभ्यन्तर और बाह्य प्रयत्न का संकेत देते हुए उच्चारण में हलन्त, अजन्त ध्वनियों के मात्राभेद से ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, स्वरित, अनुनासिक आदि का निर्देश देते हुए अपेक्षा कर रहे थे कि सभी के द्वारा एक जैसा उच्चारण हो जिससे उसी भाषा को बोलने, सुनने, समझने में किसी तरह की समस्या देश-काल भेद से उत्पन्न न हो। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी ओर से किसी तरह का अनुशासन नहीं रखा। अष्टाध्यायी के अन्य प्रसंगों को ध्यान में रखते हुए भी उन्होंने अपनी ओर से कुछ नहीं किया जो ऋग्वेद में उपलब्ध न था। अपनी समझ से वह भाषा को कठिन नहीं बना रहे थे, पर नियमित बनाने के क्रम में ही भाषा यान्त्रिक भाषा में बदल गई और पहले के संस्कृत के आंचलिक रूप जो बोले भले शिक्षित और संभ्रान्त जनों द्वारा जाते थे, पर अशिक्षितों द्वारा भी समझ लिए जाते थे, अब व्यापक जनसमाज से पूरी तरह कट गए।

इस प्रक्रिया को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। सामान्य बोलचाल की भाषा को सही सही बोलने के लिए हमें उन नियमों और प्रयत्नों को, यहां तक कि अक्षरों के क्रम और संख्या तक को जानने की आवश्यकता नहीं होती, जिनको समझाने के लिए पाणिनि को इतना श्रम करना पड़ा। बच्चा लोगों को बोलते सुनकर बोलना सीख जाता है। वु्याकरण जानने का भी झमेला नहीं रहता। परन्तु अपनी भाषा पर अधिकार के बाद भी सधे सुर ताल में अचूक गायन की शर्त हो तो यह अल्पजनसाध्य साधना में बदल जाता है। यदि संस्कृत को सर्वजनगम्य भाषा का रूप देना है तो लाख दावे करने के बाद भी वही भाषा नहीं रह सकती जिसकी नींव अपनी महत्वाकांक्षा नें पाणिनि ने रखी थी, इस प्रक्रिया को उलटना होगा। इसके लिए क्या करना होगा, इसकी चर्चा हम कल करेंगे।

आज इतना और कि पाणिनीय संस्कृत की कीमत पर यह काम नहीं किया जा सकता। साथ ही अपने पहले से चले आ रहे वैदिक साहित्य को समझने के जिस प्रयत्न को किनारे रख कर पाणिनि आगे बढ़ गए थे वह एक वेद की भाषा की समस्या नहीं है अपितु कई हजार साल के भाषा के पूर्ववर्ती इतिहास की समस्या है। इसकी घोर उपेक्षा हुई है। इसलिए संस्कृत के कतिपय़ मान्य विश्वविद्यालयों में संस्कृत के तीन विभागों की आवश्यकता है – लौकिक संस्कृत, पाणिनीय संस्कृत और आर्ष संस्कृत। अन्तिम दो को भी सरल बनाया जा सकता है, और संभवतः उस दिशा में कुछ प्रयत्न कई साल से हो भी रहा है।

Post – 2018-01-19

लौकिक संस्कृत (३)

पाणिनि के समय में संभवत: संस्कृत का जनता से बिलगाव नहीं हुआ था। अनेकानेक जन भाषाओं के क्षेत्र में व्यापक संपर्क के लिए संस्कृत का प्रयोग होता था परन्तु क्षेत्रीय बोलियों के प्रभाव से इसका चरित्र बदला था। फिर भी यह माना जाता था कि उदीच्य की या कुरुपांचाल की संस्कृत अधिक शुद्ध है। शुद्धता के आग्रहशील अपने बच्चों को शिक्षा के लिए यहां भेजते थे और उनका अनुकरण करते हुए दूसरे अपना उच्चारण सुधारते थे । इसका कारण हम बता चुके हैं कि इसी क्षेत्र में कई हजार साल के लंबे दौर में संस्कृत का चरित्र निर्धारण हुआ था और मोटे तौर पर कहें तो इसी क्षेत्र में पाणिनीय वर्णमाला के सभी अक्षरों का सही उच्चारण संभव हो पाता है। यहां से जिस भी दिशा में चलें उच्चारण अशुद्ध होने लगता है। हालत यह कि बंगाल पहुंचते पहुंचते अकार अॉकार, इकार का ह्रस्व-दीर्घ में अभेद, ऐ और औ का एइ, ओइ मे परिवर्तन, ऋ, लृ, ण, य,व, ष, स, संयुक्ताक्षरों क्ष, ज्ञ, त्र की ध्वनियों का अभाव मिलता है।

हमने एक बहुत उलझे विषय को उठा लिया, जिसकी व्याख्या करने चलें तो बहुत लम्बा काम हो जाएगा, पर संक्षेप में कहें तो इस विकास रेखा को न समझ पाने के कारण संस्कृत का इतिहास लिखने वाले देसी-विदेशी सभी विद्वानों से भारी चूक हुई है। इनमें से कोई संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया के विविध चरणों को समझ ही न सका, न ही यह समझ सका कि किसी भी क्षेत्र की बोलचाल की भाषा न होते हुए भी यह व्यापक संचार के लिए संपर्क भाषा बन कर वैदिक काल या हड़प्पा सभ्यता की नीव से जो भिर्राना के साक्ष्यों से समझना चाहें तो सातवीं सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व तक जाती है, अपने नए रूप में ढलनी आरंभ हुई और विशिष्ट आर्थिक-सांस्कृतिक उपक्रमों से जुड़े श्रुधी और गंवार, अमीर-गरीब सभी के द्वारा बोली और समझी जाती थी, जब कि घरेलू स्तर पर सामान्य जन अपनी बोली बोलते थे जिनमें कुछ ऐसे तत्व थे जिन्हें द्रविड़ और मुंडा समुदायों की भाषाओं की विशेषता मानी जाती है और इसे बहुत झिझकते हुए वैदिक में मिला स्वीकार किया जाने लगा है।

पाणिनि से पहले जो वैयाकरण हुए उनके सामने मुख्य समस्या ऋग्वेद की भाषा को समझने की थी। हम फिर इस सवाल से बचना चाहेंगे कि यह समस्या पैदा क्यों हुई। संक्षेप में यह कि लंबे समय तक चलने वाली किसी प्राकृतिक त्रासदी के कारण जीवन रक्षा की समस्या इतनी उग्र हो गई कि पूरी सभ्यता नष्ट हो गई। असाधारण सम्मान के बाद भी वेदों की रक्षा तक संभव न रही, अर्थज्ञान का प्रशन तो उसके बाद आता है। दिन फिरे तो असाधारण प्रयत्न से देश-देशान्तर से जितना कुछ जुटाया जा सका उसका संकलित रूप ही हमें उपलब्ध है। इस परंपरा-विच्छेदन के कारण सदियों के अन्तराल के बाद तरह तरह की अटकलबाजियों से आगे बढ़ते हुए वे वेद का अर्थ समझने का प्रयत्न कर रहे थे। इसी क्रम में धातुओं की कल्पना और उनके बीजार्थ के निर्धारण के प्रयत्न भी हुए। इस प्रयत्न में दूसरे अनेक लोग लगे हुए थे, जिनके परिणाम वेदांग, संहिताएं और ब्राह्मण आदि हैं।

पाणिनि का प्रयत्न उस भाषा का उद्धार था जिसमें ऐसी एकरूपता आ गई थी कि वह देश-देशान्तर में बोली और समझी जाती थी, परन्तु आज जिसके इतने स्थानीय भेद हो चुके थे कि एक क्षेत्र की उसी भाषा को दूसरे क्षेत्र का व्यक्ति समझ ही नहीं सकता था। वह भाषा में वैदिक कालीन एक रूपता लाना चाहते थे परन्तु इस बीच में भाषाओं में जो वैदिक प्रयोग प्रयोगबाह्य हो गए थे, या स्वयं वैदिक भाषा में जो प्रयोग बाहुल्य थे उनका परिहार करते हुए।

पाणिनि के सामने तीन समस्यायें थीं। एक भाषा का एक मानक रूप जिसका कठोरता से निर्वाह किया जाय। दूसरा, ऐसे शब्द जो कालबाह्य हो चुके हैं या नितान्त आंचलिक हैं उनसे बचा जाय। तीसरा उच्चारण की एक रूपता जिसकी चिन्ता पहले भी थी, परन्तु इस दौर में जिसकी आवश्यकता पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ गई थी, पाणिनि पूरी वर्णमाला का पुनराख्यान और वर्गीकरण करते हुए उनके उच्चारण का तरीका बता रहे थे, उच्चारण के आभ्यन्तर और बाह्य प्रयत्न का संकेत देते हुए उच्चारण में हलन्त, अजन्त ध्वनियों के मात्राभेद से ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, स्वरित, अनुनासिक आदि का निर्देश देते हुए अपेक्षा कर रहे थे कि सभी के द्वारा एक जैसा उच्चारण हो जिससे उसी भाषा को बोलने, सुनने, समझने में किसी तरह की समस्या देश-काल भेद से उत्पन्न न हो। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी ओर से किसी तरह का अनुशासन नहीं रखा। अष्टाध्यायी के अन्य प्रसंगों को ध्यान में रखते हुए भी उन्होंने अपनी ओर से कुछ नहीं किया जो ऋग्वेद में उपलब्ध न था। अपनी समझ से वह भाषा को कठिन नहीं बना रहे थे, पर नियमित बनाने के क्रम में ही भाषा यान्त्रिक भाषा में बदल गई और पहले के संस्कृत के आंचलिक रूप जो बोले भले शिक्षित और संभ्रान्त जनों द्वारा जाते थे, पर अशिक्षितों द्वारा भी समझ लिए जाते थे, अब व्यापक जनसमाज से पूरी तरह कट गए।

इस प्रक्रिया को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। सामान्य बोलचाल की भाषा को सही सही बोलने के लिए हमें उन नियमों और प्रयत्नों को, यहां तक कि अक्षरों के क्रम और संख्या तक को जानने की आवश्यकता नहीं होती, जिनको समझाने के लिए पाणिनि को इतना श्रम करना पड़ा। बच्चा लोगों को बोलते सुनकर बोलना सीख जाता है। वु्याकरण जानने का भी झमेला नहीं रहता। परन्तु अपनी भाषा पर अधिकार के बाद भी सधे सुर ताल में अचूक गायन की शर्त हो तो यह अल्पजनसाध्य साधना में बदल जाता है। यदि संस्कृत को सर्वजनगम्य भाषा का रूप देना है तो लाख दावे करने के बाद भी वही भाषा नहीं रह सकती जिसकी नींव अपनी महत्वाकांक्षा नें पाणिनि ने रखी थी, इस प्रक्रिया को उलटना होगा। इसके लिए क्या करना होगा, इसकी चर्चा हम कल करेंगे।

आज इतना और कि पाणिनीय संस्कृत की कीमत पर यह काम नहीं किया जा सकता। साथ ही अपने पहले से चले आ रहे वैदिक साहित्य को समझने के जिस प्रयत्न को किनारे रख कर पाणिनि आगे बढ़ गए थे वह एक वेद की भाषा की समस्या नहीं है अपितु कई हजार साल के भाषा के पूर्ववर्ती इतिहास की समस्या है। इसकी घोर उपेक्षा हुई है। इसलिए संस्कृत के कतिपय़ मान्य विश्वविद्यालयों में संस्कृत के तीन विभागों की आवश्यकता है – लौकिक संस्कृत, पाणिनीय संस्कृत और आर्ष संस्कृत। अन्तिम दो को भी सरल बनाया जा सकता है, और संभवतः उस दिशा में कुछ प्रयत्न कई साल से हो भी रहा है।

Post – 2018-01-19

लौकिक संस्कृत (३)

पाणिनि के समय में संभवत: संस्कृत का जनता से बिलगाव नहीं हुआ था। अनेकानेक जन भाषाओं के क्षेत्र में व्यापक संपर्क के लिए संस्कृत का प्रयोग होता था परन्तु क्षेत्रीय बोलियों के प्रभाव से इसका चरित्र बदला था। फिर भी यह माना जाता था कि उदीच्य की या कुरुपांचाल की संस्कृत अधिक शुद्ध है। शुद्धता के आग्रहशील अपने बच्चों को शिक्षा के लिए यहां भेजते थे और उनका अनुकरण करते हुए दूसरे अपना उच्चारण सुधारते थे । इसका कारण हम बता चुके हैं कि इसी क्षेत्र में कई हजार साल के लंबे दौर में संस्कृत का चरित्र निर्धारण हुआ था और मोटे तौर पर कहें तो इसी क्षेत्र में पाणिनीय वर्णमाला के सभी अक्षरों का सही उच्चारण संभव हो पाता है। यहां से जिस भी दिशा में चलें उच्चारण अशुद्ध होने लगता है। हालत यह कि बंगाल पहुंचते पहुंचते अकार अॉकार, इकार का ह्रस्व-दीर्घ में अभेद, ऐ और औ का एइ, ओइ मे परिवर्तन, ऋ, लृ, ण, य,व, ष, स, संयुक्ताक्षरों क्ष, ज्ञ, त्र की ध्वनियों का अभाव मिलता है।

हमने एक बहुत उलझे विषय को उठा लिया, जिसकी व्याख्या करने चलें तो बहुत लम्बा काम हो जाएगा, पर संक्षेप में कहें तो इस विकास रेखा को न समझ पाने के कारण संस्कृत का इतिहास लिखने वाले देसी-विदेशी सभी विद्वानों से भारी चूक हुई है। इनमें से कोई संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया के विविध चरणों को समझ ही न सका, न ही यह समझ सका कि किसी भी क्षेत्र की बोलचाल की भाषा न होते हुए भी यह व्यापक संचार के लिए संपर्क भाषा बन कर वैदिक काल या हड़प्पा सभ्यता की नीव से जो भिर्राना के साक्ष्यों से समझना चाहें तो सातवीं सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व तक जाती है, अपने नए रूप में ढलनी आरंभ हुई और विशिष्ट आर्थिक-सांस्कृतिक उपक्रमों से जुड़े श्रुधी और गंवार, अमीर-गरीब सभी के द्वारा बोली और समझी जाती थी, जब कि घरेलू स्तर पर सामान्य जन अपनी बोली बोलते थे जिनमें कुछ ऐसे तत्व थे जिन्हें द्रविड़ और मुंडा समुदायों की भाषाओं की विशेषता मानी जाती है और इसे बहुत झिझकते हुए वैदिक में मिला स्वीकार किया जाने लगा है।

पाणिनि से पहले जो वैयाकरण हुए उनके सामने मुख्य समस्या ऋग्वेद की भाषा को समझने की थी। हम फिर इस सवाल से बचना चाहेंगे कि यह समस्या पैदा क्यों हुई। संक्षेप में यह कि लंबे समय तक चलने वाली किसी प्राकृतिक त्रासदी के कारण जीवन रक्षा की समस्या इतनी उग्र हो गई कि पूरी सभ्यता नष्ट हो गई। असाधारण सम्मान के बाद भी वेदों की रक्षा तक संभव न रही, अर्थज्ञान का प्रशन तो उसके बाद आता है। दिन फिरे तो असाधारण प्रयत्न से देश-देशान्तर से जितना कुछ जुटाया जा सका उसका संकलित रूप ही हमें उपलब्ध है। इस परंपरा-विच्छेदन के कारण सदियों के अन्तराल के बाद तरह तरह की अटकलबाजियों से आगे बढ़ते हुए वे वेद का अर्थ समझने का प्रयत्न कर रहे थे। इसी क्रम में धातुओं की कल्पना और उनके बीजार्थ के निर्धारण के प्रयत्न भी हुए। इस प्रयत्न में दूसरे अनेक लोग लगे हुए थे, जिनके परिणाम वेदांग, संहिताएं और ब्राह्मण आदि हैं।

पाणिनि का प्रयत्न उस भाषा का उद्धार था जिसमें ऐसी एकरूपता आ गई थी कि वह देश-देशान्तर में बोली और समझी जाती थी, परन्तु आज जिसके इतने स्थानीय भेद हो चुके थे कि एक क्षेत्र की उसी भाषा को दूसरे क्षेत्र का व्यक्ति समझ ही नहीं सकता था। वह भाषा में वैदिक कालीन एक रूपता लाना चाहते थे परन्तु इस बीच में भाषाओं में जो वैदिक प्रयोग प्रयोगबाह्य हो गए थे, या स्वयं वैदिक भाषा में जो प्रयोग बाहुल्य थे उनका परिहार करते हुए।

पाणिनि के सामने तीन समस्यायें थीं। एक भाषा का एक मानक रूप जिसका कठोरता से निर्वाह किया जाय। दूसरा, ऐसे शब्द जो कालबाह्य हो चुके हैं या नितान्त आंचलिक हैं उनसे बचा जाय। तीसरा उच्चारण की एक रूपता जिसकी चिन्ता पहले भी थी, परन्तु इस दौर में जिसकी आवश्यकता पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ गई थी, पाणिनि पूरी वर्णमाला का पुनराख्यान और वर्गीकरण करते हुए उनके उच्चारण का तरीका बता रहे थे, उच्चारण के आभ्यन्तर और बाह्य प्रयत्न का संकेत देते हुए उच्चारण में हलन्त, अजन्त ध्वनियों के मात्राभेद से ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, स्वरित, अनुनासिक आदि का निर्देश देते हुए अपेक्षा कर रहे थे कि सभी के द्वारा एक जैसा उच्चारण हो जिससे उसी भाषा को बोलने, सुनने, समझने में किसी तरह की समस्या देश-काल भेद से उत्पन्न न हो। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी ओर से किसी तरह का अनुशासन नहीं रखा। अष्टाध्यायी के अन्य प्रसंगों को ध्यान में रखते हुए भी उन्होंने अपनी ओर से कुछ नहीं किया जो ऋग्वेद में उपलब्ध न था। अपनी समझ से वह भाषा को कठिन नहीं बना रहे थे, पर नियमित बनाने के क्रम में ही भाषा यान्त्रिक भाषा में बदल गई और पहले के संस्कृत के आंचलिक रूप जो बोले भले शिक्षित और संभ्रान्त जनों द्वारा जाते थे, पर अशिक्षितों द्वारा भी समझ लिए जाते थे, अब व्यापक जनसमाज से पूरी तरह कट गए।

इस प्रक्रिया को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। सामान्य बोलचाल की भाषा को सही सही बोलने के लिए हमें उन नियमों और प्रयत्नों को, यहां तक कि अक्षरों के क्रम और संख्या तक को जानने की आवश्यकता नहीं होती, जिनको समझाने के लिए पाणिनि को इतना श्रम करना पड़ा। बच्चा लोगों को बोलते सुनकर बोलना सीख जाता है। वु्याकरण जानने का भी झमेला नहीं रहता। परन्तु अपनी भाषा पर अधिकार के बाद भी सधे सुर ताल में अचूक गायन की शर्त हो तो यह अल्पजनसाध्य साधना में बदल जाता है। यदि संस्कृत को सर्वजनगम्य भाषा का रूप देना है तो लाख दावे करने के बाद भी वही भाषा नहीं रह सकती जिसकी नींव अपनी महत्वाकांक्षा नें पाणिनि ने रखी थी, इस प्रक्रिया को उलटना होगा। इसके लिए क्या करना होगा, इसकी चर्चा हम कल करेंगे।

आज इतना और कि पाणिनीय संस्कृत की कीमत पर यह काम नहीं किया जा सकता। साथ ही अपने पहले से चले आ रहे वैदिक साहित्य को समझने के जिस प्रयत्न को किनारे रख कर पाणिनि आगे बढ़ गए थे वह एक वेद की भाषा की समस्या नहीं है अपितु कई हजार साल के भाषा के पूर्ववर्ती इतिहास की समस्या है। इसकी घोर उपेक्षा हुई है। इसलिए संस्कृत के कतिपय़ मान्य विश्वविद्यालयों में संस्कृत के तीन विभागों की आवश्यकता है – लौकिक संस्कृत, पाणिनीय संस्कृत और आर्ष संस्कृत। अन्तिम दो को भी सरल बनाया जा सकता है, और संभवतः उस दिशा में कुछ प्रयत्न कई साल से हो भी रहा है।

Post – 2018-01-18

लौकिक संस्कृत (2)

यदि स्टीफेन हाकिंग्स का दृढ़ संकल्प प्रेरक न होता तो चारपाई पर निष्क्रिय पड़ा रहता । उनको नमन पूर्वक हम कल की चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं।

जिन दिनों राजदरबारों में संस्कृत का आदर था उन दिनों भी संस्कृत बोलने और लिखने वाले दुर्लभ थे। इसका एक प्रमाण पुराभिलेखों में ताम्रपत्रादि में पाई जानेवाला अशुद्धियॉं हैं। इसी का दूसरा पक्ष यह है कि संस्कृत में गद्य साहित्य का विकास न हो सका। किसी इतर भाषा में गाना गा लेना आसान है, पर जरूत पड़ने पर गद्य में कुछ कहना पड़े तो असलित सामने आ जाती है । पद्य में पुराने पद बन्धों की स्मृति उसी तर्ज पर कुछ गढ़ने जोड़ने में सहायक होती है। जिन दिनों खड़ीबोली कविता के उपयुक्त नहीं समझी जाती थी पूरे हिन्दी प्रदेश के कवि ब्रजभाषा में कविता करते थे जब कि ब्रजभाषा नहीं बोल सकते थे। भाषा पर अधिकार गद्य पर अधिकार से प्रकट होता है, यह बात संस्कृतज्ञों को भी मालूम थी- गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति । गद्य का विकास बोलचाल की भाषा पर निर्भर करता है। संस्कृत को योजनाबद्ध रूप में बोलचाल से अलग करके ब्राह्मणों ने अपनी कूट भाषा बना कर अपनी कालकोठरी में बन्द कर लिया। यह मानुषी वाक् से पारुषी वाक् बना दी गई।

यह तो रही कल की पोस्ट में छूटे रह गए कुछ बिन्दुओं का स्मरण ।

अब हम आज की समस्या पर आएं, साथ ही यह देखें कि संस्कृत में वह कौन सी विशेषता है कि लोक भाषाएं कला, प्रविधि, दर्शन और विज्ञान के उपयोग के लिए संस्कृत पर इतनी निर्भर करने लगती हैं कि वे संस्कृतमय हो कर संस्कृत की ही तरह अपनी बोली से दूर चली जाती हैं परन्तु उनके प्रसार और व्यवहार का क्षेत्र बढ़ जाता है, जैसा प्राकृत और पाली के साथ हुआ और कुछ दूर तक हिन्दी के साथ भी हो चुका है।

परन्तु इससे पहले हम दो बातों पर विचार करेंगे। पहला उन बिन्दुओं से संबंधित है जो अंग्रजी की कमियों को इंगित करते हुए एक दो मित्रों ने संस्कृत की क्लिष्टता का बचाव किया है और दूसरा इस बात से कि क्या संस्कृत को लौकिक संस्कृत बनाकर सामान्य बोलचाल की भाषा बनाया जा सकता है ? दूसरे प्रासंगिक प्रशन भी हैं जिनसे हम बचना चाहें तो अपने विषय के साथ न्याय नहीं कर सकते।

हमने संस्कृत की निखोटता को नहीं, इसके व्याकरण की जटिलता और व्याकरण से भाषाशिक्षा आदि की ओर ध्यान आकृष्ट किया था और अंग्रेजी के दोष गिनाने वालों में कुछ को पता होगा कि अंग्रेजी की वर्तनी के दोष को लेकर बर्नर्ड शा (Bernard Shaw on Language) ने कितनी तल्ख टिप्पणी की है । इसके बावजूद अंग्रेजी इंगलैंड के और उच्चारणभेद के साथ अमेरिका और आस्ट्रेलिया तथा दूसरे देशों में जहां उनके परिवार बसे हैं. वहां के बच्चे-बूढ़े सभी अंग्रेजी बोलते, समझते, पढ़ते, लिखते हैं। दूसरों को भिन्न भाषाई परिवेश में रहते हुए अंग्रेजी सीखनी होती है इसलिए शब्दभंडार से लेकर व्याकरण तक किताबों से सीखना पड़ता है इसके बाद भी जितने लोग अंग्रेजी लिख, पढ़ और बोल लेते हैं संस्कृत सीखने वालों में उसके शतांश भी ऐसा क्यों नहीं कर पाते जब कि 75 प्रतिशत शब्दभंडार से वे अपनी भाषाओं के माध्यम से परिचित होते हैं?

रही बात संस्कृत के लोकव्यवहार की भाषा बन पाने की समस्या। इसका सफल प्रयोग मैं देख चुका हं, यद्यपि उस किशोरवय में मुझे यह प्रयोग हास्यास्पद प्रतीत होता था, जैसे मेरा यह प्रस्ताव आप में से बहुतों को लग रहा होगा।

मेरे गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर भलुआन के एक ठिगने कद के बहुत ओजस्वी व्यक्ति थे, नाम विन्ध्याचलशर्मा शास्त्री। उन्होंने एकाएक ठान लिया कि वह संस्कृत छोड़ दूसरी कोई भाषा बोलेंगे ही नहीं। उनको अपनी बात समझाने में कभी परेशानी नहीं हुई। परन्तु उनकी संस्कृत व्यावहारिक संस्कृत थी –
द्वि आणकस्य जलेबीं देहि। इक्कया गच्छ।
सुनकर आरंभ में लोग मुस्कराते। बाद में मुस्कराना भी बन्द हो गया। आजीवन वह अपने व्रत पर कायम रहे।

संस्कृत से हमारी भाषाएं और भाषाओं से बोलियां नहीं पैदा हुईं, अपितु आर्थिक विकास के क्रम में हारसंग्रह के आदिम चरण के मानवयूथों के परस्पर निकट आने और वृहत्तर सामाजिक इकाइयों के गठन के चलते आदिम बोलियों का अधिक समर्थ बोलियों, भाषाओं और फिर संपर्क भाषाओं के गठन और क्रमिक मानकीकरण से वैदिक का प्रादुर्भाव हआ। यह प्रक्रिया कई हजार साल में सारस्वत क्षेत्र में पूरी हुुई और तब से आजतक यह क्षेत्र व्यापक प्रसारक्षेत्र वाली भाषाओं के मानकीकरण का केन्द्र बना हुआ है।

जिस तथ्य को मै यहां रेखांकित करना चाहता हूं वह यह कि वैदिक या संस्कृत शुद्ध भाषाएं नहीं हैं, बहुत सी बोलियों के मेल से बनी भाषाएं हैं और बोलियों से क्रमशः दूर होती हैं, न कि बोलियों का जन्म संस्कृत के विघटन से हुआ है।

चर्चा आज भी अधूरी रह गई। कल सही।

Post – 2018-01-18

लौकिक संस्कृत (2)

यदि स्टीफेन हाकिंग्स का दृढ़ संकल्प प्रेरक न होता तो चारपाई पर निष्क्रिय पड़ा रहता । उनको नमन पूर्वक हम कल की चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं।

जिन दिनों राजदरबारों में संस्कृत का आदर था उन दिनों भी संस्कृत बोलने और लिखने वाले दुर्लभ थे। इसका एक प्रमाण पुराभिलेखों में ताम्रपत्रादि में पाई जानेवाला अशुद्धियॉं हैं। इसी का दूसरा पक्ष यह है कि संस्कृत में गद्य साहित्य का विकास न हो सका। किसी इतर भाषा में गाना गा लेना आसान है, पर जरूत पड़ने पर गद्य में कुछ कहना पड़े तो असलित सामने आ जाती है । पद्य में पुराने पद बन्धों की स्मृति उसी तर्ज पर कुछ गढ़ने जोड़ने में सहायक होती है। जिन दिनों खड़ीबोली कविता के उपयुक्त नहीं समझी जाती थी पूरे हिन्दी प्रदेश के कवि ब्रजभाषा में कविता करते थे जब कि ब्रजभाषा नहीं बोल सकते थे। भाषा पर अधिकार गद्य पर अधिकार से प्रकट होता है, यह बात संस्कृतज्ञों को भी मालूम थी- गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति । गद्य का विकास बोलचाल की भाषा पर निर्भर करता है। संस्कृत को योजनाबद्ध रूप में बोलचाल से अलग करके ब्राह्मणों ने अपनी कूट भाषा बना कर अपनी कालकोठरी में बन्द कर लिया। यह मानुषी वाक् से पारुषी वाक् बना दी गई।

यह तो रही कल की पोस्ट में छूटे रह गए कुछ बिन्दुओं का स्मरण ।

अब हम आज की समस्या पर आएं, साथ ही यह देखें कि संस्कृत में वह कौन सी विशेषता है कि लोक भाषाएं कला, प्रविधि, दर्शन और विज्ञान के उपयोग के लिए संस्कृत पर इतनी निर्भर करने लगती हैं कि वे संस्कृतमय हो कर संस्कृत की ही तरह अपनी बोली से दूर चली जाती हैं परन्तु उनके प्रसार और व्यवहार का क्षेत्र बढ़ जाता है, जैसा प्राकृत और पाली के साथ हुआ और कुछ दूर तक हिन्दी के साथ भी हो चुका है।

परन्तु इससे पहले हम दो बातों पर विचार करेंगे। पहला उन बिन्दुओं से संबंधित है जो अंग्रजी की कमियों को इंगित करते हुए एक दो मित्रों ने संस्कृत की क्लिष्टता का बचाव किया है और दूसरा इस बात से कि क्या संस्कृत को लौकिक संस्कृत बनाकर सामान्य बोलचाल की भाषा बनाया जा सकता है ? दूसरे प्रासंगिक प्रशन भी हैं जिनसे हम बचना चाहें तो अपने विषय के साथ न्याय नहीं कर सकते।

हमने संस्कृत की निखोटता को नहीं, इसके व्याकरण की जटिलता और व्याकरण से भाषाशिक्षा आदि की ओर ध्यान आकृष्ट किया था और अंग्रेजी के दोष गिनाने वालों में कुछ को पता होगा कि अंग्रेजी की वर्तनी के दोष को लेकर बर्नर्ड शा (Bernard Shaw on Language) ने कितनी तल्ख टिप्पणी की है । इसके बावजूद अंग्रेजी इंगलैंड के और उच्चारणभेद के साथ अमेरिका और आस्ट्रेलिया तथा दूसरे देशों में जहां उनके परिवार बसे हैं. वहां के बच्चे-बूढ़े सभी अंग्रेजी बोलते, समझते, पढ़ते, लिखते हैं। दूसरों को भिन्न भाषाई परिवेश में रहते हुए अंग्रेजी सीखनी होती है इसलिए शब्दभंडार से लेकर व्याकरण तक किताबों से सीखना पड़ता है इसके बाद भी जितने लोग अंग्रेजी लिख, पढ़ और बोल लेते हैं संस्कृत सीखने वालों में उसके शतांश भी ऐसा क्यों नहीं कर पाते जब कि 75 प्रतिशत शब्दभंडार से वे अपनी भाषाओं के माध्यम से परिचित होते हैं?

रही बात संस्कृत के लोकव्यवहार की भाषा बन पाने की समस्या। इसका सफल प्रयोग मैं देख चुका हं, यद्यपि उस किशोरवय में मुझे यह प्रयोग हास्यास्पद प्रतीत होता था, जैसे मेरा यह प्रस्ताव आप में से बहुतों को लग रहा होगा।

मेरे गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर भलुआन के एक ठिगने कद के बहुत ओजस्वी व्यक्ति थे, नाम विन्ध्याचलशर्मा शास्त्री। उन्होंने एकाएक ठान लिया कि वह संस्कृत छोड़ दूसरी कोई भाषा बोलेंगे ही नहीं। उनको अपनी बात समझाने में कभी परेशानी नहीं हुई। परन्तु उनकी संस्कृत व्यावहारिक संस्कृत थी –
द्वि आणकस्य जलेबीं देहि। इक्कया गच्छ।
सुनकर आरंभ में लोग मुस्कराते। बाद में मुस्कराना भी बन्द हो गया। आजीवन वह अपने व्रत पर कायम रहे।

संस्कृत से हमारी भाषाएं और भाषाओं से बोलियां नहीं पैदा हुईं, अपितु आर्थिक विकास के क्रम में हारसंग्रह के आदिम चरण के मानवयूथों के परस्पर निकट आने और वृहत्तर सामाजिक इकाइयों के गठन के चलते आदिम बोलियों का अधिक समर्थ बोलियों, भाषाओं और फिर संपर्क भाषाओं के गठन और क्रमिक मानकीकरण से वैदिक का प्रादुर्भाव हआ। यह प्रक्रिया कई हजार साल में सारस्वत क्षेत्र में पूरी हुुई और तब से आजतक यह क्षेत्र व्यापक प्रसारक्षेत्र वाली भाषाओं के मानकीकरण का केन्द्र बना हुआ है।

जिस तथ्य को मै यहां रेखांकित करना चाहता हूं वह यह कि वैदिक या संस्कृत शुद्ध भाषाएं नहीं हैं, बहुत सी बोलियों के मेल से बनी भाषाएं हैं और बोलियों से क्रमशः दूर होती हैं, न कि बोलियों का जन्म संस्कृत के विघटन से हुआ है।

चर्चा आज भी अधूरी रह गई। कल सही।

Post – 2018-01-18

लौकिक संस्कृत (2)

यदि स्टीफेन हाकिंग्स का दृढ़ संकल्प प्रेरक न होता तो चारपाई पर निष्क्रिय पड़ा रहता । उनको नमन पूर्वक हम कल की चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं।

जिन दिनों राजदरबारों में संस्कृत का आदर था उन दिनों भी संस्कृत बोलने और लिखने वाले दुर्लभ थे। इसका एक प्रमाण पुराभिलेखों में ताम्रपत्रादि में पाई जानेवाला अशुद्धियॉं हैं। इसी का दूसरा पक्ष यह है कि संस्कृत में गद्य साहित्य का विकास न हो सका। किसी इतर भाषा में गाना गा लेना आसान है, पर जरूत पड़ने पर गद्य में कुछ कहना पड़े तो असलित सामने आ जाती है । पद्य में पुराने पद बन्धों की स्मृति उसी तर्ज पर कुछ गढ़ने जोड़ने में सहायक होती है। जिन दिनों खड़ीबोली कविता के उपयुक्त नहीं समझी जाती थी पूरे हिन्दी प्रदेश के कवि ब्रजभाषा में कविता करते थे जब कि ब्रजभाषा नहीं बोल सकते थे। भाषा पर अधिकार गद्य पर अधिकार से प्रकट होता है, यह बात संस्कृतज्ञों को भी मालूम थी- गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति । गद्य का विकास बोलचाल की भाषा पर निर्भर करता है। संस्कृत को योजनाबद्ध रूप में बोलचाल से अलग करके ब्राह्मणों ने अपनी कूट भाषा बना कर अपनी कालकोठरी में बन्द कर लिया। यह मानुषी वाक् से पारुषी वाक् बना दी गई।

यह तो रही कल की पोस्ट में छूटे रह गए कुछ बिन्दुओं का स्मरण ।

अब हम आज की समस्या पर आएं, साथ ही यह देखें कि संस्कृत में वह कौन सी विशेषता है कि लोक भाषाएं कला, प्रविधि, दर्शन और विज्ञान के उपयोग के लिए संस्कृत पर इतनी निर्भर करने लगती हैं कि वे संस्कृतमय हो कर संस्कृत की ही तरह अपनी बोली से दूर चली जाती हैं परन्तु उनके प्रसार और व्यवहार का क्षेत्र बढ़ जाता है, जैसा प्राकृत और पाली के साथ हुआ और कुछ दूर तक हिन्दी के साथ भी हो चुका है।

परन्तु इससे पहले हम दो बातों पर विचार करेंगे। पहला उन बिन्दुओं से संबंधित है जो अंग्रजी की कमियों को इंगित करते हुए एक दो मित्रों ने संस्कृत की क्लिष्टता का बचाव किया है और दूसरा इस बात से कि क्या संस्कृत को लौकिक संस्कृत बनाकर सामान्य बोलचाल की भाषा बनाया जा सकता है ? दूसरे प्रासंगिक प्रशन भी हैं जिनसे हम बचना चाहें तो अपने विषय के साथ न्याय नहीं कर सकते।

हमने संस्कृत की निखोटता को नहीं, इसके व्याकरण की जटिलता और व्याकरण से भाषाशिक्षा आदि की ओर ध्यान आकृष्ट किया था और अंग्रेजी के दोष गिनाने वालों में कुछ को पता होगा कि अंग्रेजी की वर्तनी के दोष को लेकर बर्नर्ड शा (Bernard Shaw on Language) ने कितनी तल्ख टिप्पणी की है । इसके बावजूद अंग्रेजी इंगलैंड के और उच्चारणभेद के साथ अमेरिका और आस्ट्रेलिया तथा दूसरे देशों में जहां उनके परिवार बसे हैं. वहां के बच्चे-बूढ़े सभी अंग्रेजी बोलते, समझते, पढ़ते, लिखते हैं। दूसरों को भिन्न भाषाई परिवेश में रहते हुए अंग्रेजी सीखनी होती है इसलिए शब्दभंडार से लेकर व्याकरण तक किताबों से सीखना पड़ता है इसके बाद भी जितने लोग अंग्रेजी लिख, पढ़ और बोल लेते हैं संस्कृत सीखने वालों में उसके शतांश भी ऐसा क्यों नहीं कर पाते जब कि 75 प्रतिशत शब्दभंडार से वे अपनी भाषाओं के माध्यम से परिचित होते हैं?

रही बात संस्कृत के लोकव्यवहार की भाषा बन पाने की समस्या। इसका सफल प्रयोग मैं देख चुका हं, यद्यपि उस किशोरवय में मुझे यह प्रयोग हास्यास्पद प्रतीत होता था, जैसे मेरा यह प्रस्ताव आप में से बहुतों को लग रहा होगा।

मेरे गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर भलुआन के एक ठिगने कद के बहुत ओजस्वी व्यक्ति थे, नाम विन्ध्याचलशर्मा शास्त्री। उन्होंने एकाएक ठान लिया कि वह संस्कृत छोड़ दूसरी कोई भाषा बोलेंगे ही नहीं। उनको अपनी बात समझाने में कभी परेशानी नहीं हुई। परन्तु उनकी संस्कृत व्यावहारिक संस्कृत थी –
द्वि आणकस्य जलेबीं देहि। इक्कया गच्छ।
सुनकर आरंभ में लोग मुस्कराते। बाद में मुस्कराना भी बन्द हो गया। आजीवन वह अपने व्रत पर कायम रहे।

संस्कृत से हमारी भाषाएं और भाषाओं से बोलियां नहीं पैदा हुईं, अपितु आर्थिक विकास के क्रम में हारसंग्रह के आदिम चरण के मानवयूथों के परस्पर निकट आने और वृहत्तर सामाजिक इकाइयों के गठन के चलते आदिम बोलियों का अधिक समर्थ बोलियों, भाषाओं और फिर संपर्क भाषाओं के गठन और क्रमिक मानकीकरण से वैदिक का प्रादुर्भाव हआ। यह प्रक्रिया कई हजार साल में सारस्वत क्षेत्र में पूरी हुुई और तब से आजतक यह क्षेत्र व्यापक प्रसारक्षेत्र वाली भाषाओं के मानकीकरण का केन्द्र बना हुआ है।

जिस तथ्य को मै यहां रेखांकित करना चाहता हूं वह यह कि वैदिक या संस्कृत शुद्ध भाषाएं नहीं हैं, बहुत सी बोलियों के मेल से बनी भाषाएं हैं और बोलियों से क्रमशः दूर होती हैं, न कि बोलियों का जन्म संस्कृत के विघटन से हुआ है।

चर्चा आज भी अधूरी रह गई। कल सही।

Post – 2018-01-17

लौकिक संस्कृत

इस विषय पर मैंने एक मित्र की पोस्ट पर अपनी टिप्पणी दी थी, जिसमें यह सुझाया था कि यदि आधुनिक ग्रीक की तरह पाणिनीय संस्कृत की तरह लौकिक संस्कृत बनाया जा सके तो यह एक जीवन्त और अखिल भारतीय व्यवहार की सर्वमान्य भाषा बन सकती है। इस पर अनेक मतामत आए, इसलिए अपने मत को कुछ विस्तार से रखना जरूरी लगा।

यदि हमें भारतीय मानस को अंग्रेजी की जकड़बन्दी से मुक्त करना है, तो हमें आधुनिक ग्रीक की तरह लौकिक संस्कृत की जरूरत हे। इसके जानकारों के लिए पाणिनीय संस्कृत सीखना आसान हो जाएगा। जीवित भाषा ही नहीं प्रत्येक जीवित प्राणी, पौधा, व्यक्ति, संस्था में बदलाव आता है। वह लौकिक संस्कृत में भी होगा। बदलाव जीवन्तता का और इसका अभाव जड़ता या निष्प्राणता का प्रमाण। जीवित चलता है, जड़ को ढोना पड़ता है। संंस्कृत को ढोया जाता रहा है। द्वादश वर्ष पठेत् व्याकरणम् । जिस भाषा का व्याकरण समझने में बारह साल लग जायं, वह किसके काम आएगी

संस्कृत के छात्रों को अक्षरज्ञान के बाद अष्टाध्यायी रटाई जाती थी। इसका बड़ा अच्छा चित्रण माखनलाल चतुर्वेदी की जीवनी में ऋषि जैमिनी कृष्ण बरुआ ने उन्हीं के शब्दों में दिया है। उसके बाद लघुकौमुदी से साधनिका, फिर अमरकोश को कठस्थ करना। यह उनका अनुभव था। हो सकता है अन्य पाठशालाओं का तरीका भिन्न हो पर अधिक भिन्न नहीं था। मैने स्वयं इसका अनुभव किया है। यह सर्जनात्मकता को कुंद करने और सहज ज्ञेय को असाधारण जपाट श्रम और रटन्त बुद्धि से लंबे अभ्यास से अर्जित किया जाता है। संस्कृत का विद्वान अपने ज्ञान पर नहीं अपने श्रम पर गर्व करता है। वह युगों पुराने ज्ञान को जिसका एक अंश मानव स्वभाव से जुड़ा है और नीतिवाक्यों या सूक्तियों के रूप में उपलब्ध है इसलिए स्थायी महत्व का है अपनी परम उपलब्धि मानता और अवसर कुअवसर दुहराता है। तुलसी की कृपा से रामायण का पाठ करने वाले मात्र साक्षर सदगृहस्त के व्यावहारिक ज्ञान से ऐसे पंडितों का ज्ञान अधिक नहीं होता, फिर भी जब वही बात फर्राटे के बोलता है तो भाषा की दुरूहता और संस्कृत के प्रति आदर के कारण मूल को समझे बिना भी खासा रोब पड़ता है।

सच तो यह है कि संस्कृत का विद्वान संस्कृत का विद्वान संस्कृत बोलना नहीं जानता। वह धाराप्रवाह उदगार करता हे। वह श्रोता को अपनी बात समझाना और उसके मतामत को जानना नहीं चाहता, वह उसे आतंकित करना चाहता हे और इसलिए कंठस्थ को दूसरो की अपेक्षा अधिक वेग से उद्वमित करता है जो संस्कृत जाननेवालों में भी केवल उन्हीं के पल्ले पड़ता है जो पहले उससे कंठस्थ किए रहते हैं। इसे सुनना भी नहीं कहा जा सकता। इसे बौद्धिक जुगाली करना अवश्य कहा जा सकता है।

संस्कृत को जीवित रखने के लिए तीन काम जरूरी हेः
1. संस्कृत को संवाद की, सोचविचार की भाषा बनाना, जिसे लौकिक संस्कृत कह आए हं। यह आसान काम नहीं है। इसकी कुछ समस्यायें हैं। इस पर हम कल चर्चा करेंंगे
2. पाणिनीय संस्कृत के लिए अलग पीठ की स्थापना।
3- ठीक ऐसा ही पीठ की वैदिक के लिए स्थापना
इनमें विरोध पैदा न होगा, अपितु ये एक दूसरे के उत्कर्ष मे सहायक होंगे।

Post – 2018-01-17

लौकिक संस्कृत

इस विषय पर मैंने एक मित्र की पोस्ट पर अपनी टिप्पणी दी थी, जिसमें यह सुझाया था कि यदि आधुनिक ग्रीक की तरह पाणिनीय संस्कृत की तरह लौकिक संस्कृत बनाया जा सके तो यह एक जीवन्त और अखिल भारतीय व्यवहार की सर्वमान्य भाषा बन सकती है। इस पर अनेक मतामत आए, इसलिए अपने मत को कुछ विस्तार से रखना जरूरी लगा।

यदि हमें भारतीय मानस को अंग्रेजी की जकड़बन्दी से मुक्त करना है, तो हमें आधुनिक ग्रीक की तरह लौकिक संस्कृत की जरूरत हे। इसके जानकारों के लिए पाणिनीय संस्कृत सीखना आसान हो जाएगा। जीवित भाषा ही नहीं प्रत्येक जीवित प्राणी, पौधा, व्यक्ति, संस्था में बदलाव आता है। वह लौकिक संस्कृत में भी होगा। बदलाव जीवन्तता का और इसका अभाव जड़ता या निष्प्राणता का प्रमाण। जीवित चलता है, जड़ को ढोना पड़ता है। संंस्कृत को ढोया जाता रहा है। द्वादश वर्ष पठेत् व्याकरणम् । जिस भाषा का व्याकरण समझने में बारह साल लग जायं, वह किसके काम आएगी

संस्कृत के छात्रों को अक्षरज्ञान के बाद अष्टाध्यायी रटाई जाती थी। इसका बड़ा अच्छा चित्रण माखनलाल चतुर्वेदी की जीवनी में ऋषि जैमिनी कृष्ण बरुआ ने उन्हीं के शब्दों में दिया है। उसके बाद लघुकौमुदी से साधनिका, फिर अमरकोश को कठस्थ करना। यह उनका अनुभव था। हो सकता है अन्य पाठशालाओं का तरीका भिन्न हो पर अधिक भिन्न नहीं था। मैने स्वयं इसका अनुभव किया है। यह सर्जनात्मकता को कुंद करने और सहज ज्ञेय को असाधारण जपाट श्रम और रटन्त बुद्धि से लंबे अभ्यास से अर्जित किया जाता है। संस्कृत का विद्वान अपने ज्ञान पर नहीं अपने श्रम पर गर्व करता है। वह युगों पुराने ज्ञान को जिसका एक अंश मानव स्वभाव से जुड़ा है और नीतिवाक्यों या सूक्तियों के रूप में उपलब्ध है इसलिए स्थायी महत्व का है अपनी परम उपलब्धि मानता और अवसर कुअवसर दुहराता है। तुलसी की कृपा से रामायण का पाठ करने वाले मात्र साक्षर सदगृहस्त के व्यावहारिक ज्ञान से ऐसे पंडितों का ज्ञान अधिक नहीं होता, फिर भी जब वही बात फर्राटे के बोलता है तो भाषा की दुरूहता और संस्कृत के प्रति आदर के कारण मूल को समझे बिना भी खासा रोब पड़ता है।

सच तो यह है कि संस्कृत का विद्वान संस्कृत का विद्वान संस्कृत बोलना नहीं जानता। वह धाराप्रवाह उदगार करता हे। वह श्रोता को अपनी बात समझाना और उसके मतामत को जानना नहीं चाहता, वह उसे आतंकित करना चाहता हे और इसलिए कंठस्थ को दूसरो की अपेक्षा अधिक वेग से उद्वमित करता है जो संस्कृत जाननेवालों में भी केवल उन्हीं के पल्ले पड़ता है जो पहले उससे कंठस्थ किए रहते हैं। इसे सुनना भी नहीं कहा जा सकता। इसे बौद्धिक जुगाली करना अवश्य कहा जा सकता है।

संस्कृत को जीवित रखने के लिए तीन काम जरूरी हेः
1. संस्कृत को संवाद की, सोचविचार की भाषा बनाना, जिसे लौकिक संस्कृत कह आए हं। यह आसान काम नहीं है। इसकी कुछ समस्यायें हैं। इस पर हम कल चर्चा करेंंगे
2. पाणिनीय संस्कृत के लिए अलग पीठ की स्थापना।
3- ठीक ऐसा ही पीठ की वैदिक के लिए स्थापना
इनमें विरोध पैदा न होगा, अपितु ये एक दूसरे के उत्कर्ष मे सहायक होंगे।