Post – 2018-02-06

इतिहास का अन्त!

अमेरिकी समाजशास्त्री, राजविद और अर्थशास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा ने १९९२ में अपनी पुस्तक The end of History and the last man में यह प्रतिपादित करके लोगों को चौंका दिया कि ‘सारी दुनिया में उदार लोकतंत्रों की स्थापना हो चुकी है, बाजार आधारित पूंजीवाद का सिक्का जम चुका है, पूरी दुनिया ने पाश्चात्य जीवनशैली अपना ली है, इसिलए मानव विकास अपनी पूर्णता पर पहुंच गया है । अब न तो आगे मनुष्य के विकास की संभावना है, नट समाज व्यवस्था में कोई परिवर्तन संभव है, न ही अर्थव्यवस्था में। जाहिर है इतिहास का अन्त हो चुका है।’ इससे भी अधिक जाहिर यह है कि यह सोवियत संघ के विघटन के बाद ‘विश्व विजय करके दिखलायें, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा’ से प्रेरित अमेरिमी महत्वाकांक्षा का प्रचार वाक्य था, जिसे फुकुयामा ने पहले हंटिंग्टन की तरह एक लेख के रूप में लिखा था, और फिर १९९२ में पुस्तकाकार प्रकाशित किया था। इसे असाधारण प्रचार तो मिलना ही था। हिन्दी के आलोचक ‘सबसे पहले मैं’ की होड़ में ऐसे प्रचार की नीयत और नियति को समझे बिना इस पर टूट पड़ते हैं, और कुछ समय तक यही राग दरबारी राग बना रहता है, सो इसके साथ भी ऐसा हुआ।

सामान्यत: भारतीय मार्क्सवादी लेखक ऐसे लेखन को सीआईए की साजिश मान कर पढ़ते ही नहीं (सक्रिय राजनीति को सारा समय देने के कारण पढ़ते वैसे भी कम हैं), पर एक मोटा अंदाज लगा लेते हैं कि इसमें क्या लिखा गया होगा, और गाहे-ब-गाहे लिखते-बोलते समय उसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं। यह पहला अवसर था कि वे यह तक भूल गए कि, जैसा नाम से ही प्रकट था, यह मार्क्सवाद के, और पूंजीवाद के बाद के अवश्यंभावी चरण, साम्यवाद, के खंडन में लिखी गई, एक मूर्खतापूर्ण स्थापना है, उन्होंने इसे अपने ढंग से समझा ही नहीं, जो कुछ समझ में आया उसे दृढ़ता से लागू करने पर आ गए।

उन्होंने प्रचारित करना आरंभ किया कि उन्होंने भारत का जैसा इतिहास लिखा है उसके साथ इतिहासलेखन का अन्त हो गया है, और अब उसकी गलतियां निकालने का और उससे भिन्न इतिहास लेखन का काम बन्द हो जाना चाहिए। यदि हुआ तो उसे संशोधनवाद माना जाएगा, और ऐसा पर्यावरण तैयार करना आरंभ किया कि कोई ऐसी पुस्तक को पढ़ने न पाए।

कायिक हिंसा के लेकर वाचिक हिंसा में अटल विश्वास के कारण, कम्युनिस्ट गालियों को विचारो से अधिक ऊंचा स्थान देते हैं, यह तो सबको पता है, पर जिन्हें यह भ्रम है कि वे केवल गन्दी गालियां ही देना जानते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि संशोधनवाद कम्युनिस्ट गालीकोश का ऐसा शव्द है जिसे शिष्ट गालियों में ही रखा जा सकता है।

इसलिए उनके इस अभियान को मैं सही मानता था, यद्यपि यही इस बात का भी प्रमाण था कि उनका लिखा इतिहास वैज्ञानिता की ढोल तो पीटता था, पर वैज्ञानिक नहीं था।

हैरानी इस बात पर हुई कि जब इसका भी असर नहीं हुआ तो एक नया अभियान चलाया गया कि इतिहास का अन्त हुआ हो या नहीं, पर इतिहास के ज्ञान का अंत हो चुका है क्योंकि इतिहास का ज्ञान वर्तमान की समझ में बाधक है। इतिहास की चिन्ता वर्तमान से पलायन है। इतिहास से अधिक उर्वर पुराण और मिथक हैं क्यकोंकि इनमें मनचाही तोड़ मरोड़ की अनंत संभावनाएॆ हैं। इतिहास में जो लिखा जाना था वह लिखा जा चुका है, यहां तक कि जो पढ़ा जाना था वह पढ़ा भी जा चुका है, इसलिए अब उसे भुला दिया जाना चाहिए। इसके समर्थन में जो बोलना जानता था वह बोलने लगा, जो कविता लिख सकता था कविता लिखने लगा, यहां तक कि जो सिर्फ सर हिलाना जानता था वह ‘हां भइ हां’ करने लगा। अजीब तर्क दिए जाने लगे: नाव नदी पार कराने के लिए है। समझदार आदमी नदी पार करने के बाद नाव को छोड़ कर आगे बढ़ जाता है, मूर्ख नाव को कन्धे पर लाद लेते हैं।

मैं, सच कहें तो, ऐसे वज्र मूर्खों में हूं जो यह तक नहीं समझ पाते कि इतिहास किसी खास वैतरणी को पार करने के लिए भाड़े की नौका है और उसे पार करने के लिए ही उसकी जरूरत होती है। पानी में इतिहास हमारा बोझ उठाता है और पार होने के बाद यदि उसे साथ रखा तो वह हमारे ऊपर भार बन जाएगा। मुझे यह भ्रम था और है कि इतिहास अतीत के संगत अनुभवों का क्रमबद्ध ज्ञान है, जो बीते को बदलना तो दूर किसी चीज को टस से मस नहीं कर सकता, पर वर्तमान को समझने और बदलने में सहायक हो सकता है, इसलिए इससे भागने वाले वे गैरजिम्मेदार और अहंकारी लोग होते हैं जिन्होंने अतीत को समझने की जगह तोड़फोड़ की, और वर्तमान में भी केवल तोड़फोड़ ही करना चाहते हैं।

फिर भी मैंने प्रयत्न करके यह समझना चाहा कि वे नौका का उपयोग किस नदी को पार करने के लिए करना चाहते थे? जिस नौका से पार करना चाहते थे, उसे किसने बनाया था? कौन चला रहा था? कि वे उसमें चुपचाप बैठ ही नहीं गए थे, हांक लगाकर दूसरों को भी बुला रहे थे कि इस नौका पर सवार हो जाओ नहीं तो डूब जाओगे। अच्छे नंबर लाना और अच्छी श्रेणी लानी हो तो इतिहास जरूर लो। अच्छी नौकरी पानी हो तो इतिहास से बच कर कहां जाओगे? और इससे आसान विषय कहां पाओगे? जानने को कुछ नहीं है, हमने जो हाई स्कूल के बच्चों के लिए लिख दिया, उसे मानने से ही काम चल जाएगा, सीसीएस (सेंट्रल सिविल सर्विस) से लेकर पीसीएस तक, प्रेप से लेकर मेन और अन्तरव्यूह तक।

इनका जोर ज्ञान पर नहीं इतिहास के मलबे को लाद कर पार उतरने और उतारने पर था।

इतिहास बीत कर भी व्यर्थ नहीं होता, गुजर जाने के बाद भी बहुत कुछ बनाकर अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है, जिसमें कुछ सड़ और बुस भी जाती हैं और उन्हे फेंका न जाय तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाय।

मार्क्स के प्रस्तावों और विचारों में भी कुछ ऐसा है जो त्याज्य है, जैसे हिंसा, क्योंकि परमाणु युग में हिंसा के सहारे यांत्रिक साम्यवाद तक का सार्वभौम विस्तार नहीं हो सकता, या जैसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले कल कारखाने। या जैसे क्रान्ति की हड़बड़ी, क्योंकि पूंजीवाद के सार्वभौम विस्तार से पहले अभाव और भुखमरी की स्थितियां पैदा करने के बाद भी पूंजीवाद संकट में नहीं आ सकता। जब तक कुछ देश उत्पादक हैं शेष उनके बाजार, तब तक वह अमानवीय तरीके अपना कर भी अपने को, सामरिक तैयारी के बल पर बचा लेगा। परन्तु जिस दिन बाजार स्वयं भी उत्पादक बन जाएगा, उस दिन न अपने घर को छोड़ उसे बाजार मिलेगा, न उन्हें जिनका बाजार वह पहले बना हुआ था। अपने समस्त खुराफात के बाद भी वह इसे झेल नहीं पाएगा। यह होगा उसका आत्मध्वंस। यह होगा लघु उद्योगों से अपनी जरूरतों के लिए उत्पादन जिससे न फालतू उत्पादन होगा न आदमी फालतू होंगे। गांधीवादी मार्क्सवाद का दौर मानवता का एकमात्र विकल्प हैं, जिसकी आकांक्षा मार्क्स में थी पर उपाय गांधी ने अपनी ग्राम्य और पुरातन संस्कृति से आविष्कृत किया। बिरादरी पंचायतों वाला असहयोग भी आंदोलन का रूप ले सकता है, यह केवल गांधी की सूझ थी। इतिहास अपने को जिन्दा रखने के लिए अकल्पनीय परिवर्तन करता रहता है।

Post – 2018-02-06

इतिहास का अन्त!

अमेरिकी समाजशास्त्री, राजविद और अर्थशास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा ने १९९२ में अपनी पुस्तक The end of History and the last man में यह प्रतिपादित करके लोगों को चौंका दिया कि ‘सारी दुनिया में उदार लोकतंत्रों की स्थापना हो चुकी है, बाजार आधारित पूंजीवाद का सिक्का जम चुका है, पूरी दुनिया ने पाश्चात्य जीवनशैली अपना ली है, इसिलए मानव विकास अपनी पूर्णता पर पहुंच गया है । अब न तो आगे मनुष्य के विकास की संभावना है, नट समाज व्यवस्था में कोई परिवर्तन संभव है, न ही अर्थव्यवस्था में। जाहिर है इतिहास का अन्त हो चुका है।’ इससे भी अधिक जाहिर यह है कि यह सोवियत संघ के विघटन के बाद ‘विश्व विजय करके दिखलायें, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा’ से प्रेरित अमेरिमी महत्वाकांक्षा का प्रचार वाक्य था, जिसे फुकुयामा ने पहले हंटिंग्टन की तरह एक लेख के रूप में लिखा था, और फिर १९९२ में पुस्तकाकार प्रकाशित किया था। इसे असाधारण प्रचार तो मिलना ही था। हिन्दी के आलोचक ‘सबसे पहले मैं’ की होड़ में ऐसे प्रचार की नीयत और नियति को समझे बिना इस पर टूट पड़ते हैं, और कुछ समय तक यही राग दरबारी राग बना रहता है, सो इसके साथ भी ऐसा हुआ।

सामान्यत: भारतीय मार्क्सवादी लेखक ऐसे लेखन को सीआईए की साजिश मान कर पढ़ते ही नहीं (सक्रिय राजनीति को सारा समय देने के कारण पढ़ते वैसे भी कम हैं), पर एक मोटा अंदाज लगा लेते हैं कि इसमें क्या लिखा गया होगा, और गाहे-ब-गाहे लिखते-बोलते समय उसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं। यह पहला अवसर था कि वे यह तक भूल गए कि, जैसा नाम से ही प्रकट था, यह मार्क्सवाद के, और पूंजीवाद के बाद के अवश्यंभावी चरण, साम्यवाद, के खंडन में लिखी गई, एक मूर्खतापूर्ण स्थापना है, उन्होंने इसे अपने ढंग से समझा ही नहीं, जो कुछ समझ में आया उसे दृढ़ता से लागू करने पर आ गए।

उन्होंने प्रचारित करना आरंभ किया कि उन्होंने भारत का जैसा इतिहास लिखा है उसके साथ इतिहासलेखन का अन्त हो गया है, और अब उसकी गलतियां निकालने का और उससे भिन्न इतिहास लेखन का काम बन्द हो जाना चाहिए। यदि हुआ तो उसे संशोधनवाद माना जाएगा, और ऐसा पर्यावरण तैयार करना आरंभ किया कि कोई ऐसी पुस्तक को पढ़ने न पाए।

कायिक हिंसा के लेकर वाचिक हिंसा में अटल विश्वास के कारण, कम्युनिस्ट गालियों को विचारो से अधिक ऊंचा स्थान देते हैं, यह तो सबको पता है, पर जिन्हें यह भ्रम है कि वे केवल गन्दी गालियां ही देना जानते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि संशोधनवाद कम्युनिस्ट गालीकोश का ऐसा शव्द है जिसे शिष्ट गालियों में ही रखा जा सकता है।

इसलिए उनके इस अभियान को मैं सही मानता था, यद्यपि यही इस बात का भी प्रमाण था कि उनका लिखा इतिहास वैज्ञानिता की ढोल तो पीटता था, पर वैज्ञानिक नहीं था।

हैरानी इस बात पर हुई कि जब इसका भी असर नहीं हुआ तो एक नया अभियान चलाया गया कि इतिहास का अन्त हुआ हो या नहीं, पर इतिहास के ज्ञान का अंत हो चुका है क्योंकि इतिहास का ज्ञान वर्तमान की समझ में बाधक है। इतिहास की चिन्ता वर्तमान से पलायन है। इतिहास से अधिक उर्वर पुराण और मिथक हैं क्यकोंकि इनमें मनचाही तोड़ मरोड़ की अनंत संभावनाएॆ हैं। इतिहास में जो लिखा जाना था वह लिखा जा चुका है, यहां तक कि जो पढ़ा जाना था वह पढ़ा भी जा चुका है, इसलिए अब उसे भुला दिया जाना चाहिए। इसके समर्थन में जो बोलना जानता था वह बोलने लगा, जो कविता लिख सकता था कविता लिखने लगा, यहां तक कि जो सिर्फ सर हिलाना जानता था वह ‘हां भइ हां’ करने लगा। अजीब तर्क दिए जाने लगे: नाव नदी पार कराने के लिए है। समझदार आदमी नदी पार करने के बाद नाव को छोड़ कर आगे बढ़ जाता है, मूर्ख नाव को कन्धे पर लाद लेते हैं।

मैं, सच कहें तो, ऐसे वज्र मूर्खों में हूं जो यह तक नहीं समझ पाते कि इतिहास किसी खास वैतरणी को पार करने के लिए भाड़े की नौका है और उसे पार करने के लिए ही उसकी जरूरत होती है। पानी में इतिहास हमारा बोझ उठाता है और पार होने के बाद यदि उसे साथ रखा तो वह हमारे ऊपर भार बन जाएगा। मुझे यह भ्रम था और है कि इतिहास अतीत के संगत अनुभवों का क्रमबद्ध ज्ञान है, जो बीते को बदलना तो दूर किसी चीज को टस से मस नहीं कर सकता, पर वर्तमान को समझने और बदलने में सहायक हो सकता है, इसलिए इससे भागने वाले वे गैरजिम्मेदार और अहंकारी लोग होते हैं जिन्होंने अतीत को समझने की जगह तोड़फोड़ की, और वर्तमान में भी केवल तोड़फोड़ ही करना चाहते हैं।

फिर भी मैंने प्रयत्न करके यह समझना चाहा कि वे नौका का उपयोग किस नदी को पार करने के लिए करना चाहते थे? जिस नौका से पार करना चाहते थे, उसे किसने बनाया था? कौन चला रहा था? कि वे उसमें चुपचाप बैठ ही नहीं गए थे, हांक लगाकर दूसरों को भी बुला रहे थे कि इस नौका पर सवार हो जाओ नहीं तो डूब जाओगे। अच्छे नंबर लाना और अच्छी श्रेणी लानी हो तो इतिहास जरूर लो। अच्छी नौकरी पानी हो तो इतिहास से बच कर कहां जाओगे? और इससे आसान विषय कहां पाओगे? जानने को कुछ नहीं है, हमने जो हाई स्कूल के बच्चों के लिए लिख दिया, उसे मानने से ही काम चल जाएगा, सीसीएस (सेंट्रल सिविल सर्विस) से लेकर पीसीएस तक, प्रेप से लेकर मेन और अन्तरव्यूह तक।

इनका जोर ज्ञान पर नहीं इतिहास के मलबे को लाद कर पार उतरने और उतारने पर था।

इतिहास बीत कर भी व्यर्थ नहीं होता, गुजर जाने के बाद भी बहुत कुछ बनाकर अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है, जिसमें कुछ सड़ और बुस भी जाती हैं और उन्हे फेंका न जाय तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाय।

मार्क्स के प्रस्तावों और विचारों में भी कुछ ऐसा है जो त्याज्य है, जैसे हिंसा, क्योंकि परमाणु युग में हिंसा के सहारे यांत्रिक साम्यवाद तक का सार्वभौम विस्तार नहीं हो सकता, या जैसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले कल कारखाने। या जैसे क्रान्ति की हड़बड़ी, क्योंकि पूंजीवाद के सार्वभौम विस्तार से पहले अभाव और भुखमरी की स्थितियां पैदा करने के बाद भी पूंजीवाद संकट में नहीं आ सकता। जब तक कुछ देश उत्पादक हैं शेष उनके बाजार, तब तक वह अमानवीय तरीके अपना कर भी अपने को, सामरिक तैयारी के बल पर बचा लेगा। परन्तु जिस दिन बाजार स्वयं भी उत्पादक बन जाएगा, उस दिन न अपने घर को छोड़ उसे बाजार मिलेगा, न उन्हें जिनका बाजार वह पहले बना हुआ था। अपने समस्त खुराफात के बाद भी वह इसे झेल नहीं पाएगा। यह होगा उसका आत्मध्वंस। यह होगा लघु उद्योगों से अपनी जरूरतों के लिए उत्पादन जिससे न फालतू उत्पादन होगा न आदमी फालतू होंगे। गांधीवादी मार्क्सवाद का दौर मानवता का एकमात्र विकल्प हैं, जिसकी आकांक्षा मार्क्स में थी पर उपाय गांधी ने अपनी ग्राम्य और पुरातन संस्कृति से आविष्कृत किया। बिरादरी पंचायतों वाला असहयोग भी आंदोलन का रूप ले सकता है, यह केवल गांधी की सूझ थी। इतिहास अपने को जिन्दा रखने के लिए अकल्पनीय परिवर्तन करता रहता है।

Post – 2018-02-06

इतिहास का अन्त!

अमेरिकी समाजशास्त्री, राजविद और अर्थशास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा ने १९९२ में अपनी पुस्तक The end of History and the last man में यह प्रतिपादित करके लोगों को चौंका दिया कि ‘सारी दुनिया में उदार लोकतंत्रों की स्थापना हो चुकी है, बाजार आधारित पूंजीवाद का सिक्का जम चुका है, पूरी दुनिया ने पाश्चात्य जीवनशैली अपना ली है, इसिलए मानव विकास अपनी पूर्णता पर पहुंच गया है । अब न तो आगे मनुष्य के विकास की संभावना है, नट समाज व्यवस्था में कोई परिवर्तन संभव है, न ही अर्थव्यवस्था में। जाहिर है इतिहास का अन्त हो चुका है।’ इससे भी अधिक जाहिर यह है कि यह सोवियत संघ के विघटन के बाद ‘विश्व विजय करके दिखलायें, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा’ से प्रेरित अमेरिमी महत्वाकांक्षा का प्रचार वाक्य था, जिसे फुकुयामा ने पहले हंटिंग्टन की तरह एक लेख के रूप में लिखा था, और फिर १९९२ में पुस्तकाकार प्रकाशित किया था। इसे असाधारण प्रचार तो मिलना ही था। हिन्दी के आलोचक ‘सबसे पहले मैं’ की होड़ में ऐसे प्रचार की नीयत और नियति को समझे बिना इस पर टूट पड़ते हैं, और कुछ समय तक यही राग दरबारी राग बना रहता है, सो इसके साथ भी ऐसा हुआ।

सामान्यत: भारतीय मार्क्सवादी लेखक ऐसे लेखन को सीआईए की साजिश मान कर पढ़ते ही नहीं (सक्रिय राजनीति को सारा समय देने के कारण पढ़ते वैसे भी कम हैं), पर एक मोटा अंदाज लगा लेते हैं कि इसमें क्या लिखा गया होगा, और गाहे-ब-गाहे लिखते-बोलते समय उसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं। यह पहला अवसर था कि वे यह तक भूल गए कि, जैसा नाम से ही प्रकट था, यह मार्क्सवाद के, और पूंजीवाद के बाद के अवश्यंभावी चरण, साम्यवाद, के खंडन में लिखी गई, एक मूर्खतापूर्ण स्थापना है, उन्होंने इसे अपने ढंग से समझा ही नहीं, जो कुछ समझ में आया उसे दृढ़ता से लागू करने पर आ गए।

उन्होंने प्रचारित करना आरंभ किया कि उन्होंने भारत का जैसा इतिहास लिखा है उसके साथ इतिहासलेखन का अन्त हो गया है, और अब उसकी गलतियां निकालने का और उससे भिन्न इतिहास लेखन का काम बन्द हो जाना चाहिए। यदि हुआ तो उसे संशोधनवाद माना जाएगा, और ऐसा पर्यावरण तैयार करना आरंभ किया कि कोई ऐसी पुस्तक को पढ़ने न पाए।

कायिक हिंसा के लेकर वाचिक हिंसा में अटल विश्वास के कारण, कम्युनिस्ट गालियों को विचारो से अधिक ऊंचा स्थान देते हैं, यह तो सबको पता है, पर जिन्हें यह भ्रम है कि वे केवल गन्दी गालियां ही देना जानते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि संशोधनवाद कम्युनिस्ट गालीकोश का ऐसा शव्द है जिसे शिष्ट गालियों में ही रखा जा सकता है।

इसलिए उनके इस अभियान को मैं सही मानता था, यद्यपि यही इस बात का भी प्रमाण था कि उनका लिखा इतिहास वैज्ञानिता की ढोल तो पीटता था, पर वैज्ञानिक नहीं था।

हैरानी इस बात पर हुई कि जब इसका भी असर नहीं हुआ तो एक नया अभियान चलाया गया कि इतिहास का अन्त हुआ हो या नहीं, पर इतिहास के ज्ञान का अंत हो चुका है क्योंकि इतिहास का ज्ञान वर्तमान की समझ में बाधक है। इतिहास की चिन्ता वर्तमान से पलायन है। इतिहास से अधिक उर्वर पुराण और मिथक हैं क्यकोंकि इनमें मनचाही तोड़ मरोड़ की अनंत संभावनाएॆ हैं। इतिहास में जो लिखा जाना था वह लिखा जा चुका है, यहां तक कि जो पढ़ा जाना था वह पढ़ा भी जा चुका है, इसलिए अब उसे भुला दिया जाना चाहिए। इसके समर्थन में जो बोलना जानता था वह बोलने लगा, जो कविता लिख सकता था कविता लिखने लगा, यहां तक कि जो सिर्फ सर हिलाना जानता था वह ‘हां भइ हां’ करने लगा। अजीब तर्क दिए जाने लगे: नाव नदी पार कराने के लिए है। समझदार आदमी नदी पार करने के बाद नाव को छोड़ कर आगे बढ़ जाता है, मूर्ख नाव को कन्धे पर लाद लेते हैं।

मैं, सच कहें तो, ऐसे वज्र मूर्खों में हूं जो यह तक नहीं समझ पाते कि इतिहास किसी खास वैतरणी को पार करने के लिए भाड़े की नौका है और उसे पार करने के लिए ही उसकी जरूरत होती है। पानी में इतिहास हमारा बोझ उठाता है और पार होने के बाद यदि उसे साथ रखा तो वह हमारे ऊपर भार बन जाएगा। मुझे यह भ्रम था और है कि इतिहास अतीत के संगत अनुभवों का क्रमबद्ध ज्ञान है, जो बीते को बदलना तो दूर किसी चीज को टस से मस नहीं कर सकता, पर वर्तमान को समझने और बदलने में सहायक हो सकता है, इसलिए इससे भागने वाले वे गैरजिम्मेदार और अहंकारी लोग होते हैं जिन्होंने अतीत को समझने की जगह तोड़फोड़ की, और वर्तमान में भी केवल तोड़फोड़ ही करना चाहते हैं।

फिर भी मैंने प्रयत्न करके यह समझना चाहा कि वे नौका का उपयोग किस नदी को पार करने के लिए करना चाहते थे? जिस नौका से पार करना चाहते थे, उसे किसने बनाया था? कौन चला रहा था? कि वे उसमें चुपचाप बैठ ही नहीं गए थे, हांक लगाकर दूसरों को भी बुला रहे थे कि इस नौका पर सवार हो जाओ नहीं तो डूब जाओगे। अच्छे नंबर लाना और अच्छी श्रेणी लानी हो तो इतिहास जरूर लो। अच्छी नौकरी पानी हो तो इतिहास से बच कर कहां जाओगे? और इससे आसान विषय कहां पाओगे? जानने को कुछ नहीं है, हमने जो हाई स्कूल के बच्चों के लिए लिख दिया, उसे मानने से ही काम चल जाएगा, सीसीएस (सेंट्रल सिविल सर्विस) से लेकर पीसीएस तक, प्रेप से लेकर मेन और अन्तरव्यूह तक।

इनका जोर ज्ञान पर नहीं इतिहास के मलबे को लाद कर पार उतरने और उतारने पर था।

इतिहास बीत कर भी व्यर्थ नहीं होता, गुजर जाने के बाद भी बहुत कुछ बनाकर अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है, जिसमें कुछ सड़ और बुस भी जाती हैं और उन्हे फेंका न जाय तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाय।

मार्क्स के प्रस्तावों और विचारों में भी कुछ ऐसा है जो त्याज्य है, जैसे हिंसा, क्योंकि परमाणु युग में हिंसा के सहारे यांत्रिक साम्यवाद तक का सार्वभौम विस्तार नहीं हो सकता, या जैसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले कल कारखाने। या जैसे क्रान्ति की हड़बड़ी, क्योंकि पूंजीवाद के सार्वभौम विस्तार से पहले अभाव और भुखमरी की स्थितियां पैदा करने के बाद भी पूंजीवाद संकट में नहीं आ सकता। जब तक कुछ देश उत्पादक हैं शेष उनके बाजार, तब तक वह अमानवीय तरीके अपना कर भी अपने को, सामरिक तैयारी के बल पर बचा लेगा। परन्तु जिस दिन बाजार स्वयं भी उत्पादक बन जाएगा, उस दिन न अपने घर को छोड़ उसे बाजार मिलेगा, न उन्हें जिनका बाजार वह पहले बना हुआ था। अपने समस्त खुराफात के बाद भी वह इसे झेल नहीं पाएगा। यह होगा उसका आत्मध्वंस। यह होगा लघु उद्योगों से अपनी जरूरतों के लिए उत्पादन जिससे न फालतू उत्पादन होगा न आदमी फालतू होंगे। गांधीवादी मार्क्सवाद का दौर मानवता का एकमात्र विकल्प हैं, जिसकी आकांक्षा मार्क्स में थी पर उपाय गांधी ने अपनी ग्राम्य और पुरातन संस्कृति से आविष्कृत किया। बिरादरी पंचायतों वाला असहयोग भी आंदोलन का रूप ले सकता है, यह केवल गांधी की सूझ थी। इतिहास अपने को जिन्दा रखने के लिए अकल्पनीय परिवर्तन करता रहता है।

Post – 2018-02-05

इतिहास और मनोभग्नता

मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं कि मेरे पूर्वज भारत के मूल निवासी थे या कहीं अन्यत्र से आकर बसे थे। मुझे यह मालूम है कि दिल्ली में कम से कम 20 बार अपना ठिकाना और तीन बार स्थाई पता बदलना पड़ा और अब गाजियाबाद (क्रासिंग रिपब्लिक) के जिस मकान में रहता हूं, वह संभवतः मेरा अंतिम स्थाई पता रहे। मेरे पुत्र और पुत्री (और जामाता) अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं। मेरे जन्मस्थान (गगहा, गोरखपुर) में आज से पैंतालीस पीढ़ी पहले मेरे कुल के आदि पुरुष बाबा सक्त (शक्ति) सिंह ने सतासीनरेश से दहेज में मिले चौरासी पर अधिकार किया था। इस के लिए उन्होंन यहां पहले से बसे थारुओं का छल और क्रूरता से दमन और उन्मूलन किया था। इससे पहले वे फैजाबाद जिले के विड़हर में आबाद थे। बिड़हर का मतलब आपको न मालूम हो तो इसे बिरहोर पढ़ने पर पता चल जाएगा यहां पहले बिरहोर जनों का निवास था। हमारा परिचय देते हुए हमें पलुआर (पालीवाल) क्षत्रिय बताया जाता है, क्योंकि मध्यकाल में कभी हमारे पूर्वज हरदोई के पाली नामक स्थान से जान और मान बचा कर पूर्व की ओर भागे थे। हमारे साथ मुस्लिम शासकों ने जैसा बर्ताव किया था वैसा ही हमारे पूर्वजों ने कमजोर पाकर बिना उनके किसी अपराध के बिरहोरों और थारुओं (स्थविरों, या बौद्ध मतावलंबी) के साथ किया। मैं इस लघु इतिहासवृत्त के किसी भी खंड का समर्थन नहीं करता, कुछ की भर्त्सना करता हूं, फिर भी उत्तराधिकार में भूमि का जो हिस्सा मेरे नाम है उसे अपना मानता हूं।

तरुणाई के आगमन के साथ मूछें आईं तो हुआ कुछ ऐसा कि नाक के ठीक नीचे बाल उगेही नहीं । इसमें समय लगा। टाड का इतिहास तो नहीं पढ़ा था पर उसकी कुछ मोटी बातें पता थीं जिनमें से एक थी हूणों की शुद्धि करके उनको अग्निवंशी क्षत्रिय बनाना। हम अपने को अग्निवंशी तो नहीं, चंद्रवंशी कहते थे और अपना संबंध पांडवों से जोड़ते थे । यह भी मानते थे कि जनमेजय के नागयज्ञ के समय प्राणरक्षा के लिए जिन नागों ने कसम खाई कि वे कभी उनके वंश के किसी व्यक्ति को नहीं काटेंगे वे ही जीवित बचे थे और इसका निर्वाह वे आज तक करते हैं। प्रमाण यह कि आजतक किसी पालीवाल की मौत सांप के काटने से नहीं हुई।
पर हमारा गोत्रनाम था बैयाघर अर्थात् व्याघ्र है। गोत्रनाम ऋषियों के नाम पर होते हैं कोई जानवर, वह कितना भी शक्तिशाली हो, उसका गोत्रनाम तभी हो सकता था जब यह किसी को नकली रूप में दिया गया हो।

इसमें एक तत्व यह भी जुड़ा था कि मैं तब तक जिस पाली से अपना संबंध जोड़ता था, वह हरदोई का पाली न होकर राजस्थान का पाली था, अर्थात् अपने को क्षत्रिय नहीं राजपूत मानता था, इसलिए मानता था कि मूलतः हम लोग हूण हैं जिन्हें आबू पर्वत पर यज्ञ के आयोजन से राजपूत क्षत्रिय बनाया गया था।

प्रसंग आने पर मैं स्वयं इसे बताता भी था। यदि मित्रो में कोई मेरे सामने ही मेरा मजाक उड़ाता हुआ अपने को असली सिद्ध करने के लिए मुझे नकली क्षत्रिय कहता तो मुझे कोई परेशानी नहीं होती। बाद में जब पता चला कि व्याघ्रपाद नाम के ऋषि हुए हैं जो वसिष्ठ की वंश परंपरा में थे और यह कि हमारा संबंध राजस्थान के पाली से नहीं, हरदोई के पाली से है, और हमारा हूणों से कोई संबंध नहीं, तब भी मेरे लिए यह मात्र एक सूचना थी, परन्तु इस सूचना की एक आप्तता थी और इस आप्तता को मै किसी कीमत पर नष्ट नहीं होने दे सकता था। न छिपा कर, न दबा कर, न अतिरंजित करके, न इससे मुंह चुरा कर।

इन तथ्यों को याद करता हूं तो लगता है, मैं इतिहासकार नहीं बना, ऐतिहासिक वस्तुपरकता कहीं मेरे स्वभाव में था। यह बहुत छोटी अवस्था से मेरी चेतना का हिस्सा था कि हम कहां पैदा हुए, किस परिवार, समाज या देश में पैदा हुए, यह हमारे गर्व या ग्लानि का विषय नहीं है, क्योंकि इस पर हमारा वश नहीं था। इसके अच्छा या बुरा होने का लाभ या नुकसान हमें अवश्य होता है।

हम जहां हैं वहीं अनन्त काल से हैं, वहां से हिले डोले ही नहीं, यह गर्व की बात नहीं हो सकती, न ही हम अपने जीवन में किसी एक ही जगह खूंटे की तरह गड़ कर रहना चाहेंगे। परिस्थितियां ऐसी अवश्य हो सकती हैं, जिनमें हमारा अपनी जगह से हटना संभव न हो पाए या ऐसा करना घाटे का विकल्प प्रतीत हो।

परन्तु हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि हम जहां, या जहां जहां थे वहां किन परिस्थितियों में पहुंचे और जिस अवस्था में थे उससे आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। पर ये जानकारियां मात्र तथ्य हैं जिनका ज्ञान इसलिए जरूरी है कि इसके अभाव में हमारे अपने निर्णय और कार्य प्रभावित हो सकते हैं। हम उन गलतियों को दुहरा सकते हैं जिनसे सही जातीय अनुभवों के आलोक में बच सकते थे और उन अवसरों को खो सकते हैं जिनका लाभ हमें मिल सकता था।

हम जिस देश, अंचल, परिवेश और परिवार में, जिस समाज, संस्कृति और व्यवस्था में पैदा हुए हैं वह किस दशा में है और किस दिशा में जा रहा है और इसमें हमारी क्या भूमिका है यह और केवल यह हमारे गर्व, सन्तोष या ग्लानि का विषय हो सकता है। सूचनाएं आवेग से जितनी ही मुक्त हों, उतनी ही आप्त या पवित्र होती हैं और इन्हें किसी भी आग्रह से विकृत करना अपराध है क्योंकि सूचनाओं की पूंजी से ही हमारे ज्ञान और चेतना का निर्माण होता है, और सूचनाओं की विकृति हमारे ज्ञान को कुंठित और चेतना को विकृत करती है, जब कि अपूर्ण जानकारी के साथ अनिश्चय तो बना रहता है, परन्तु वह न तो ऐसी पंगुता पैदा करती है न मनोविकृति। कहें विकृत जानकारी आधारहीन भले हो, आधिकारिक और निशचयात्मक होती है, और सोचने विचारने की भी छूट नहीं देती जब कि अज्ञान या अधूरा ज्ञान हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है और पूरा होने की एक ऐसी यात्रा होता है जो कभी पूरी नहीं होती क्योंकि ज्ञान का विस्तार अज्ञान के महावृत्त का विस्तार करता है।

परन्तु एक स्थिति ऐसी भी होती है जिसमें विकृत सूचना निश्चयात्मक होने के बाद भी अन्तर्विरोधी बनी रहती है। यह मनोभग्नता, या शीजोफ्रेनिया पैदा करती। और यदि यह इतिहास के साथ हो पूरा समाज या इस सूचना व्यापार से जुड़ा समाज मनोभग्नता का शिकार हो सकता है। यहां तक कि वह अपनी मनोभग्नता पर गर्व करते हुए यथार्थ को देखने समझने से इन्कार कर सकता है। कुछ मनोभग्न रचनाकारों (काफ्का, नीट्शे, प्रूस्त, वान गाग आदि) को उदाहृत करते हुए The Divided Self के लेखक आर डी लैंग ने इनको The Birds of Paradise में, अपनी अलग ही दुनिया में खोए रहने वाले लोगों की, संज्ञा दी है।

औपनिवेशिक इतिहासकारों ने अपनी जरूरत, नस्ली पूर्वाग्रह और प्रशासनिक विवशता में ऐसा विकृत और अन्तर्विरोधी इतिहास रचा और उन्होंने कुछ ऐसी जुगत से अपने झूठ को सच और सच को झूठ बनाए रखा कि इसके कुछ दूर तक शिकार तथाकथित राष्ट्रवादी भी हुए। उन्होंने केवल इतना किया था कि अतीत की जिन उपलब्धियों को वे आंख मूंद कर नकार रहे थे उनके प्रमाण देते हुए उनका खंडन कर रहे थे। यह साम्राज्यवादियों के हित में था कि वे इनको राष्ट्रवादी या देशप्रेम से कातर अर्थात् भावावेश में आ कर महिमामंडन करने वाला इतिहासकार कह कर उनके प्रमाणों को नकारने का और सामान्य पाठकों का ध्यान उस ओर से हटाने का प्रयत्न करें। परन्तु मार्क्सवादी इतिहासकारों और समझदारों के कौन से हित उन इतिहासकारों के काम, प्रमाण और साख को संप्रदायवादी कह कर गिराने से सिद्ध हो रहा था। उन्होंने केवल हिन्दू समाज को पुरानपंथिता से मुक्त करने के नाम पर स्वयं सांप्रदायिक इतिहास लिखा और औपनिवेशिक इतिहास को उसके चरम पर पहुंचा दिया। इस तरह उन्होंने एक ऐसा आत्मनिषेधवादी बुद्धिजीवी वर्ग पैदा किया जो बर्ड्स आफ पैराडाइज की याद दिलाता है। मैं इसे मार्क्सवादी इतिहासलेखन की सबसे बड़ी विफलता तो मानता हूं, इस बात का दृष्टांत भी मानता हूं कि कैसे इतिहास की गलत व्याख्या से वर्तमान में खंडित चेतना या दुचित्तापन पैदा किया जा सकता है।

Post – 2018-02-05

इतिहास और मनोभग्नता

मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं कि मेरे पूर्वज भारत के मूल निवासी थे या कहीं अन्यत्र से आकर बसे थे। मुझे यह मालूम है कि दिल्ली में कम से कम 20 बार अपना ठिकाना और तीन बार स्थाई पता बदलना पड़ा और अब गाजियाबाद (क्रासिंग रिपब्लिक) के जिस मकान में रहता हूं, वह संभवतः मेरा अंतिम स्थाई पता रहे। मेरे पुत्र और पुत्री (और जामाता) अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं। मेरे जन्मस्थान (गगहा, गोरखपुर) में आज से पैंतालीस पीढ़ी पहले मेरे कुल के आदि पुरुष बाबा सक्त (शक्ति) सिंह ने सतासीनरेश से दहेज में मिले चौरासी पर अधिकार किया था। इस के लिए उन्होंन यहां पहले से बसे थारुओं का छल और क्रूरता से दमन और उन्मूलन किया था। इससे पहले वे फैजाबाद जिले के विड़हर में आबाद थे। बिड़हर का मतलब आपको न मालूम हो तो इसे बिरहोर पढ़ने पर पता चल जाएगा यहां पहले बिरहोर जनों का निवास था। हमारा परिचय देते हुए हमें पलुआर (पालीवाल) क्षत्रिय बताया जाता है, क्योंकि मध्यकाल में कभी हमारे पूर्वज हरदोई के पाली नामक स्थान से जान और मान बचा कर पूर्व की ओर भागे थे। हमारे साथ मुस्लिम शासकों ने जैसा बर्ताव किया था वैसा ही हमारे पूर्वजों ने कमजोर पाकर बिना उनके किसी अपराध के बिरहोरों और थारुओं (स्थविरों, या बौद्ध मतावलंबी) के साथ किया। मैं इस लघु इतिहासवृत्त के किसी भी खंड का समर्थन नहीं करता, कुछ की भर्त्सना करता हूं, फिर भी उत्तराधिकार में भूमि का जो हिस्सा मेरे नाम है उसे अपना मानता हूं।

तरुणाई के आगमन के साथ मूछें आईं तो हुआ कुछ ऐसा कि नाक के ठीक नीचे बाल उगेही नहीं । इसमें समय लगा। टाड का इतिहास तो नहीं पढ़ा था पर उसकी कुछ मोटी बातें पता थीं जिनमें से एक थी हूणों की शुद्धि करके उनको अग्निवंशी क्षत्रिय बनाना। हम अपने को अग्निवंशी तो नहीं, चंद्रवंशी कहते थे और अपना संबंध पांडवों से जोड़ते थे । यह भी मानते थे कि जनमेजय के नागयज्ञ के समय प्राणरक्षा के लिए जिन नागों ने कसम खाई कि वे कभी उनके वंश के किसी व्यक्ति को नहीं काटेंगे वे ही जीवित बचे थे और इसका निर्वाह वे आज तक करते हैं। प्रमाण यह कि आजतक किसी पालीवाल की मौत सांप के काटने से नहीं हुई।
पर हमारा गोत्रनाम था बैयाघर अर्थात् व्याघ्र है। गोत्रनाम ऋषियों के नाम पर होते हैं कोई जानवर, वह कितना भी शक्तिशाली हो, उसका गोत्रनाम तभी हो सकता था जब यह किसी को नकली रूप में दिया गया हो।

इसमें एक तत्व यह भी जुड़ा था कि मैं तब तक जिस पाली से अपना संबंध जोड़ता था, वह हरदोई का पाली न होकर राजस्थान का पाली था, अर्थात् अपने को क्षत्रिय नहीं राजपूत मानता था, इसलिए मानता था कि मूलतः हम लोग हूण हैं जिन्हें आबू पर्वत पर यज्ञ के आयोजन से राजपूत क्षत्रिय बनाया गया था।

प्रसंग आने पर मैं स्वयं इसे बताता भी था। यदि मित्रो में कोई मेरे सामने ही मेरा मजाक उड़ाता हुआ अपने को असली सिद्ध करने के लिए मुझे नकली क्षत्रिय कहता तो मुझे कोई परेशानी नहीं होती। बाद में जब पता चला कि व्याघ्रपाद नाम के ऋषि हुए हैं जो वसिष्ठ की वंश परंपरा में थे और यह कि हमारा संबंध राजस्थान के पाली से नहीं, हरदोई के पाली से है, और हमारा हूणों से कोई संबंध नहीं, तब भी मेरे लिए यह मात्र एक सूचना थी, परन्तु इस सूचना की एक आप्तता थी और इस आप्तता को मै किसी कीमत पर नष्ट नहीं होने दे सकता था। न छिपा कर, न दबा कर, न अतिरंजित करके, न इससे मुंह चुरा कर।

इन तथ्यों को याद करता हूं तो लगता है, मैं इतिहासकार नहीं बना, ऐतिहासिक वस्तुपरकता कहीं मेरे स्वभाव में था। यह बहुत छोटी अवस्था से मेरी चेतना का हिस्सा था कि हम कहां पैदा हुए, किस परिवार, समाज या देश में पैदा हुए, यह हमारे गर्व या ग्लानि का विषय नहीं है, क्योंकि इस पर हमारा वश नहीं था। इसके अच्छा या बुरा होने का लाभ या नुकसान हमें अवश्य होता है।

हम जहां हैं वहीं अनन्त काल से हैं, वहां से हिले डोले ही नहीं, यह गर्व की बात नहीं हो सकती, न ही हम अपने जीवन में किसी एक ही जगह खूंटे की तरह गड़ कर रहना चाहेंगे। परिस्थितियां ऐसी अवश्य हो सकती हैं, जिनमें हमारा अपनी जगह से हटना संभव न हो पाए या ऐसा करना घाटे का विकल्प प्रतीत हो।

परन्तु हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि हम जहां, या जहां जहां थे वहां किन परिस्थितियों में पहुंचे और जिस अवस्था में थे उससे आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। पर ये जानकारियां मात्र तथ्य हैं जिनका ज्ञान इसलिए जरूरी है कि इसके अभाव में हमारे अपने निर्णय और कार्य प्रभावित हो सकते हैं। हम उन गलतियों को दुहरा सकते हैं जिनसे सही जातीय अनुभवों के आलोक में बच सकते थे और उन अवसरों को खो सकते हैं जिनका लाभ हमें मिल सकता था।

हम जिस देश, अंचल, परिवेश और परिवार में, जिस समाज, संस्कृति और व्यवस्था में पैदा हुए हैं वह किस दशा में है और किस दिशा में जा रहा है और इसमें हमारी क्या भूमिका है यह और केवल यह हमारे गर्व, सन्तोष या ग्लानि का विषय हो सकता है। सूचनाएं आवेग से जितनी ही मुक्त हों, उतनी ही आप्त या पवित्र होती हैं और इन्हें किसी भी आग्रह से विकृत करना अपराध है क्योंकि सूचनाओं की पूंजी से ही हमारे ज्ञान और चेतना का निर्माण होता है, और सूचनाओं की विकृति हमारे ज्ञान को कुंठित और चेतना को विकृत करती है, जब कि अपूर्ण जानकारी के साथ अनिश्चय तो बना रहता है, परन्तु वह न तो ऐसी पंगुता पैदा करती है न मनोविकृति। कहें विकृत जानकारी आधारहीन भले हो, आधिकारिक और निशचयात्मक होती है, और सोचने विचारने की भी छूट नहीं देती जब कि अज्ञान या अधूरा ज्ञान हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है और पूरा होने की एक ऐसी यात्रा होता है जो कभी पूरी नहीं होती क्योंकि ज्ञान का विस्तार अज्ञान के महावृत्त का विस्तार करता है।

परन्तु एक स्थिति ऐसी भी होती है जिसमें विकृत सूचना निश्चयात्मक होने के बाद भी अन्तर्विरोधी बनी रहती है। यह मनोभग्नता, या शीजोफ्रेनिया पैदा करती। और यदि यह इतिहास के साथ हो पूरा समाज या इस सूचना व्यापार से जुड़ा समाज मनोभग्नता का शिकार हो सकता है। यहां तक कि वह अपनी मनोभग्नता पर गर्व करते हुए यथार्थ को देखने समझने से इन्कार कर सकता है। कुछ मनोभग्न रचनाकारों (काफ्का, नीट्शे, प्रूस्त, वान गाग आदि) को उदाहृत करते हुए The Divided Self के लेखक आर डी लैंग ने इनको The Birds of Paradise में, अपनी अलग ही दुनिया में खोए रहने वाले लोगों की, संज्ञा दी है।

औपनिवेशिक इतिहासकारों ने अपनी जरूरत, नस्ली पूर्वाग्रह और प्रशासनिक विवशता में ऐसा विकृत और अन्तर्विरोधी इतिहास रचा और उन्होंने कुछ ऐसी जुगत से अपने झूठ को सच और सच को झूठ बनाए रखा कि इसके कुछ दूर तक शिकार तथाकथित राष्ट्रवादी भी हुए। उन्होंने केवल इतना किया था कि अतीत की जिन उपलब्धियों को वे आंख मूंद कर नकार रहे थे उनके प्रमाण देते हुए उनका खंडन कर रहे थे। यह साम्राज्यवादियों के हित में था कि वे इनको राष्ट्रवादी या देशप्रेम से कातर अर्थात् भावावेश में आ कर महिमामंडन करने वाला इतिहासकार कह कर उनके प्रमाणों को नकारने का और सामान्य पाठकों का ध्यान उस ओर से हटाने का प्रयत्न करें। परन्तु मार्क्सवादी इतिहासकारों और समझदारों के कौन से हित उन इतिहासकारों के काम, प्रमाण और साख को संप्रदायवादी कह कर गिराने से सिद्ध हो रहा था। उन्होंने केवल हिन्दू समाज को पुरानपंथिता से मुक्त करने के नाम पर स्वयं सांप्रदायिक इतिहास लिखा और औपनिवेशिक इतिहास को उसके चरम पर पहुंचा दिया। इस तरह उन्होंने एक ऐसा आत्मनिषेधवादी बुद्धिजीवी वर्ग पैदा किया जो बर्ड्स आफ पैराडाइज की याद दिलाता है। मैं इसे मार्क्सवादी इतिहासलेखन की सबसे बड़ी विफलता तो मानता हूं, इस बात का दृष्टांत भी मानता हूं कि कैसे इतिहास की गलत व्याख्या से वर्तमान में खंडित चेतना या दुचित्तापन पैदा किया जा सकता है।

Post – 2018-02-05

इतिहास और मनोभग्नता

मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं कि मेरे पूर्वज भारत के मूल निवासी थे या कहीं अन्यत्र से आकर बसे थे। मुझे यह मालूम है कि दिल्ली में कम से कम 20 बार अपना ठिकाना और तीन बार स्थाई पता बदलना पड़ा और अब गाजियाबाद (क्रासिंग रिपब्लिक) के जिस मकान में रहता हूं, वह संभवतः मेरा अंतिम स्थाई पता रहे। मेरे पुत्र और पुत्री (और जामाता) अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं। मेरे जन्मस्थान (गगहा, गोरखपुर) में आज से पैंतालीस पीढ़ी पहले मेरे कुल के आदि पुरुष बाबा सक्त (शक्ति) सिंह ने सतासीनरेश से दहेज में मिले चौरासी पर अधिकार किया था। इस के लिए उन्होंन यहां पहले से बसे थारुओं का छल और क्रूरता से दमन और उन्मूलन किया था। इससे पहले वे फैजाबाद जिले के विड़हर में आबाद थे। बिड़हर का मतलब आपको न मालूम हो तो इसे बिरहोर पढ़ने पर पता चल जाएगा यहां पहले बिरहोर जनों का निवास था। हमारा परिचय देते हुए हमें पलुआर (पालीवाल) क्षत्रिय बताया जाता है, क्योंकि मध्यकाल में कभी हमारे पूर्वज हरदोई के पाली नामक स्थान से जान और मान बचा कर पूर्व की ओर भागे थे। हमारे साथ मुस्लिम शासकों ने जैसा बर्ताव किया था वैसा ही हमारे पूर्वजों ने कमजोर पाकर बिना उनके किसी अपराध के बिरहोरों और थारुओं (स्थविरों, या बौद्ध मतावलंबी) के साथ किया। मैं इस लघु इतिहासवृत्त के किसी भी खंड का समर्थन नहीं करता, कुछ की भर्त्सना करता हूं, फिर भी उत्तराधिकार में भूमि का जो हिस्सा मेरे नाम है उसे अपना मानता हूं।

तरुणाई के आगमन के साथ मूछें आईं तो हुआ कुछ ऐसा कि नाक के ठीक नीचे बाल उगेही नहीं । इसमें समय लगा। टाड का इतिहास तो नहीं पढ़ा था पर उसकी कुछ मोटी बातें पता थीं जिनमें से एक थी हूणों की शुद्धि करके उनको अग्निवंशी क्षत्रिय बनाना। हम अपने को अग्निवंशी तो नहीं, चंद्रवंशी कहते थे और अपना संबंध पांडवों से जोड़ते थे । यह भी मानते थे कि जनमेजय के नागयज्ञ के समय प्राणरक्षा के लिए जिन नागों ने कसम खाई कि वे कभी उनके वंश के किसी व्यक्ति को नहीं काटेंगे वे ही जीवित बचे थे और इसका निर्वाह वे आज तक करते हैं। प्रमाण यह कि आजतक किसी पालीवाल की मौत सांप के काटने से नहीं हुई।
पर हमारा गोत्रनाम था बैयाघर अर्थात् व्याघ्र है। गोत्रनाम ऋषियों के नाम पर होते हैं कोई जानवर, वह कितना भी शक्तिशाली हो, उसका गोत्रनाम तभी हो सकता था जब यह किसी को नकली रूप में दिया गया हो।

इसमें एक तत्व यह भी जुड़ा था कि मैं तब तक जिस पाली से अपना संबंध जोड़ता था, वह हरदोई का पाली न होकर राजस्थान का पाली था, अर्थात् अपने को क्षत्रिय नहीं राजपूत मानता था, इसलिए मानता था कि मूलतः हम लोग हूण हैं जिन्हें आबू पर्वत पर यज्ञ के आयोजन से राजपूत क्षत्रिय बनाया गया था।

प्रसंग आने पर मैं स्वयं इसे बताता भी था। यदि मित्रो में कोई मेरे सामने ही मेरा मजाक उड़ाता हुआ अपने को असली सिद्ध करने के लिए मुझे नकली क्षत्रिय कहता तो मुझे कोई परेशानी नहीं होती। बाद में जब पता चला कि व्याघ्रपाद नाम के ऋषि हुए हैं जो वसिष्ठ की वंश परंपरा में थे और यह कि हमारा संबंध राजस्थान के पाली से नहीं, हरदोई के पाली से है, और हमारा हूणों से कोई संबंध नहीं, तब भी मेरे लिए यह मात्र एक सूचना थी, परन्तु इस सूचना की एक आप्तता थी और इस आप्तता को मै किसी कीमत पर नष्ट नहीं होने दे सकता था। न छिपा कर, न दबा कर, न अतिरंजित करके, न इससे मुंह चुरा कर।

इन तथ्यों को याद करता हूं तो लगता है, मैं इतिहासकार नहीं बना, ऐतिहासिक वस्तुपरकता कहीं मेरे स्वभाव में था। यह बहुत छोटी अवस्था से मेरी चेतना का हिस्सा था कि हम कहां पैदा हुए, किस परिवार, समाज या देश में पैदा हुए, यह हमारे गर्व या ग्लानि का विषय नहीं है, क्योंकि इस पर हमारा वश नहीं था। इसके अच्छा या बुरा होने का लाभ या नुकसान हमें अवश्य होता है।

हम जहां हैं वहीं अनन्त काल से हैं, वहां से हिले डोले ही नहीं, यह गर्व की बात नहीं हो सकती, न ही हम अपने जीवन में किसी एक ही जगह खूंटे की तरह गड़ कर रहना चाहेंगे। परिस्थितियां ऐसी अवश्य हो सकती हैं, जिनमें हमारा अपनी जगह से हटना संभव न हो पाए या ऐसा करना घाटे का विकल्प प्रतीत हो।

परन्तु हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि हम जहां, या जहां जहां थे वहां किन परिस्थितियों में पहुंचे और जिस अवस्था में थे उससे आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। पर ये जानकारियां मात्र तथ्य हैं जिनका ज्ञान इसलिए जरूरी है कि इसके अभाव में हमारे अपने निर्णय और कार्य प्रभावित हो सकते हैं। हम उन गलतियों को दुहरा सकते हैं जिनसे सही जातीय अनुभवों के आलोक में बच सकते थे और उन अवसरों को खो सकते हैं जिनका लाभ हमें मिल सकता था।

हम जिस देश, अंचल, परिवेश और परिवार में, जिस समाज, संस्कृति और व्यवस्था में पैदा हुए हैं वह किस दशा में है और किस दिशा में जा रहा है और इसमें हमारी क्या भूमिका है यह और केवल यह हमारे गर्व, सन्तोष या ग्लानि का विषय हो सकता है। सूचनाएं आवेग से जितनी ही मुक्त हों, उतनी ही आप्त या पवित्र होती हैं और इन्हें किसी भी आग्रह से विकृत करना अपराध है क्योंकि सूचनाओं की पूंजी से ही हमारे ज्ञान और चेतना का निर्माण होता है, और सूचनाओं की विकृति हमारे ज्ञान को कुंठित और चेतना को विकृत करती है, जब कि अपूर्ण जानकारी के साथ अनिश्चय तो बना रहता है, परन्तु वह न तो ऐसी पंगुता पैदा करती है न मनोविकृति। कहें विकृत जानकारी आधारहीन भले हो, आधिकारिक और निशचयात्मक होती है, और सोचने विचारने की भी छूट नहीं देती जब कि अज्ञान या अधूरा ज्ञान हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है और पूरा होने की एक ऐसी यात्रा होता है जो कभी पूरी नहीं होती क्योंकि ज्ञान का विस्तार अज्ञान के महावृत्त का विस्तार करता है।

परन्तु एक स्थिति ऐसी भी होती है जिसमें विकृत सूचना निश्चयात्मक होने के बाद भी अन्तर्विरोधी बनी रहती है। यह मनोभग्नता, या शीजोफ्रेनिया पैदा करती। और यदि यह इतिहास के साथ हो पूरा समाज या इस सूचना व्यापार से जुड़ा समाज मनोभग्नता का शिकार हो सकता है। यहां तक कि वह अपनी मनोभग्नता पर गर्व करते हुए यथार्थ को देखने समझने से इन्कार कर सकता है। कुछ मनोभग्न रचनाकारों (काफ्का, नीट्शे, प्रूस्त, वान गाग आदि) को उदाहृत करते हुए The Divided Self के लेखक आर डी लैंग ने इनको The Birds of Paradise में, अपनी अलग ही दुनिया में खोए रहने वाले लोगों की, संज्ञा दी है।

औपनिवेशिक इतिहासकारों ने अपनी जरूरत, नस्ली पूर्वाग्रह और प्रशासनिक विवशता में ऐसा विकृत और अन्तर्विरोधी इतिहास रचा और उन्होंने कुछ ऐसी जुगत से अपने झूठ को सच और सच को झूठ बनाए रखा कि इसके कुछ दूर तक शिकार तथाकथित राष्ट्रवादी भी हुए। उन्होंने केवल इतना किया था कि अतीत की जिन उपलब्धियों को वे आंख मूंद कर नकार रहे थे उनके प्रमाण देते हुए उनका खंडन कर रहे थे। यह साम्राज्यवादियों के हित में था कि वे इनको राष्ट्रवादी या देशप्रेम से कातर अर्थात् भावावेश में आ कर महिमामंडन करने वाला इतिहासकार कह कर उनके प्रमाणों को नकारने का और सामान्य पाठकों का ध्यान उस ओर से हटाने का प्रयत्न करें। परन्तु मार्क्सवादी इतिहासकारों और समझदारों के कौन से हित उन इतिहासकारों के काम, प्रमाण और साख को संप्रदायवादी कह कर गिराने से सिद्ध हो रहा था। उन्होंने केवल हिन्दू समाज को पुरानपंथिता से मुक्त करने के नाम पर स्वयं सांप्रदायिक इतिहास लिखा और औपनिवेशिक इतिहास को उसके चरम पर पहुंचा दिया। इस तरह उन्होंने एक ऐसा आत्मनिषेधवादी बुद्धिजीवी वर्ग पैदा किया जो बर्ड्स आफ पैराडाइज की याद दिलाता है। मैं इसे मार्क्सवादी इतिहासलेखन की सबसे बड़ी विफलता तो मानता हूं, इस बात का दृष्टांत भी मानता हूं कि कैसे इतिहास की गलत व्याख्या से वर्तमान में खंडित चेतना या दुचित्तापन पैदा किया जा सकता है।

Post – 2018-02-04

सत्यानासी (२)

कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता साम्यवाद की विफलता नहीं है, न ही यह मार्क्सवाद की व्यर्थता का प्रमाण है। यह उन असावधानियों की देन है, जिनमें से कुछ कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में भी दिखाई देती हैं। अपनी विफलता के बाद भी कम्युनिस्ट आन्दोलन ने, विशेषत: रूसी क्रान्ति ने, केवल सोवियत संघ को ही नहीं, उससे प्ररित और क्रांति की दिशा में अग्रसर देशों को ही नहीं, समस्त पूंजीवादी देशों को भी अपने दबाव से जितना लोकोन्मुख और कल्याणकारी बनाया उसका सही आकलन करने की न तो मुझमें योग्यता है न ही हमारी आज की चर्चा में उसकी जरूरत।

हमारी चिन्ता में यह अवश्य शामिल है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चरित्र दुनिया के दूसरे सभी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों से विपरीत क्यों रहा? मन में यह सवाल अवश्य पैदा होता है कि इसने सांप्रदायिक चरित्र क्यों अपना लिया? इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यभार हिन्दू समाज तक सीमित क्यों रहे और वे भी इसकी जड़ें खोदने तक सीमित क्यों रहे? इसने इतिहास का दो तरह का पाठ क्यों किया जिसमें एक काल खंड के बारे में उपनिवेशवादी व्याख्या पूरी तरह सही बन गई और दूसरे के विषय में सरासर गलत मानी जाती रही? इन सवालों के उत्तर हम नहीं देना चाहेंगे, वे हमारी सोच की दिशा बदल सकते हैं, परन्तु विफलताओं की मीमांसा करने वालों को इन अप्रिय सवालों से दो चार होना होगा, अन्यथा वे गालियों के रियाज को ही मार्क्सवाद का नया कार्यभार बना लेंगे।

हम जिस एक प्रश्न को रेखांकित करना चाहते हैं वह यह कि जिन भी देशों ने क्रान्ति करने में सफलता पाई उनकी तुलना में भारत की स्थिति क्रान्ति के लिए सबसे अनुकूल थी। यहां औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की लंबी छटपटाहट और आक्रोश था और दूसरी ओर आर्थिक विषमता से जुड़ी सामाजिक विषमता भी थी।

यहां शोषितों और सामाजिक स्तरभेद के शिकार लोगों को संगठित करना अधिक आसान था, क्योंकि वे दूसरे देशों की फ्यूडल व्यवस्था के शिकार दलित समाज की तरह बिखरे नहीं, अपितु बिरादरी पंचायतों के माध्यम से पहले से संगठित समुदाय थे। एक बिरादरी के रूप में वे शक्तिशाली इतने थे कि असह्य स्थितियों में बिरादरी पंचायत का फैसला होने पर ये उन जमीदारों और भूस्वामियों से असहयोग कर सकते और उन्हें अपनी सेवाओं से वंचित कर सकते थे जिनसे सामान्यत: वे आंख तक नहीं मिला सकते थे। ऐसी स्थिति में उस पेशे से जुडा कहीं का कोई व्यक्ति उसकी सेवा के लिए तैयार नहीं हो सकता था। कहें जरूरत किसी अन्य देश की तुलना में अधिक होने के बाद भी उनके भीतर पैठ बनाना और उनको बड़े संगठन का अंग बनाना, उनमें आत्मविश्वास पैदा करना मजदूरों को संगठित करने की अपेक्षा अधिक आसान था।

ऐसी स्थिति मे उनको संगठित करने का प्रयत्न क्यों नहीं किया गया? जब किसानों को पार्टी से जोड़ने का खयाल आया भी तो भी दायरा बड़े और मझोले भूस्वामियों तक सीमित क्यों रह गया जब कि वे ही भूमिहीन कृषि मजदूरों के शोषक हुआ करते थे।

इन सभी सवालों का जवाब यह है कि उन्हें न तो अपने देश और समाज की समझ थी, न समझने की आकांक्षा थी । वे पश्चिमी समाज को अपने समाज पर आरोपित करके, इसे समझने का प्रयत्न कर रहे थे जैसे पाश्चात्य साहित्य पर मुग्ध हमारे लेखक उस साहित्य में व्यक्त अनुभूतियों और विचारों को स्वयं आत्मसात् करके उसका आरोपण अपने समाज पर करके उसका चित्रण करके इतना बारीक कात लेते हैं कि उनका साहित्य उनके जैसों की परिधि को पार ही नहीं कर पाता।

इन दोनों के बीच गहरा संबंध है। शोषित और दलित जनता से जुड़ने के लाख दावों के बावजूद प्रगतिशील साहित्य अपने समाज से जितना कटा रहा है उतना कटा दरबारी साहित्य तक नहीं रहा क्योंकि दरबारी होते हुए भी वह इस देश और समाज की अनुभूतियों और आकांक्षाओं का साहित्य था।

मुझे लगता है कि मार्क्सवादी सोच में एक खास तरह की यांत्रिकता इसलिए आ गई कि इसमें भौतिक पक्ष पर एकांगी बल दिया गया और यह मान लिया गया कि चेतना भौतिक परिस्थितियों की उपज है, भौतिक परिस्थितियों को बदल कर चेतना को इच्छित रूप में बदला जा सकता है।

यह अतिवाद था। इसमें इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया कि समान भौतिक परिस्थितियों में चेतना के रूप कितने भिन्न होते हैं और निरा भौतिक भी इतने ज्ञात और ज्ञेय घटकों से बना होता कि सबका हमें बोध तक नहीं होता, उनको नियंत्रित करना तो दूर की बात है। मार्क्स के अपने चिन्तन में उतना इकहरापन नहीं है जो नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे का मंसूबा रखने वाले भारतीय मार्क्सवादियों में यथार्थ से कटे रहने और इसकी क्षतिपूर्ति के रूप में खयालों को यथार्थ मान लेने के कारण देखने में आता है। इसका चरित्र निर्धारण जिस दौर में हुआ उसमें अपनी जीवनशैली में नवाबी और अभिव्यक्ति में आग उगलने वाले लफ्फाजियों का जैसा जमघट कम्युनिस्ट पार्टी मे था, वैसा किसी अन्य दल में कभी नहीं रहा। मार्क्सवाद में आस्था रखने वाले उस धड़े में भी नहीं, जिसे सोशलिस्ट कह कर अलग कर दिया गया।

इन दोनों में बुनियादी अंतर यह था कि सोसलिस्टों (समाजवादियों) की जड़ें भारतीय समाज और मूल्यव्यस्था में थीं, जब कि कम्युनिस्टों की मानसिकता उपनिवेशवादी थी। समाजवादी समाज को बदलना चाहते थे, जब कि कम्युनिस्ट सत्ता पर कब्जा जमाना चाहते थे। पहले की आस्था लोकतंत्र में थी, दूसरे की तानाशाही में। पहले को समाज के कल्याण के लिए समाजवाद चाहिए था, दूसरे को अपना सिक्का जमानेके लिए। सच यह है कि कम्युनिस्टों में अधिकांश ऐसे थे जिन्हें लोकतांत्रिक भारत की कल्पना से डर लगता था, उसमें अपना भविष्य असुरक्षित लगता था। इनमें ऊंचे रुतबे के लोग थे, अलपसंख्यक सिंड्रोम से ग्रस्त मानसिकता के लोग थे, और इन्होंने अपने प्रभाव से कम्युनिस्ट आन्दोलन को इतना बदला कि जिन्ना के प्रशंसक लीग से बाहर यदि कहीं मिल सकते थे तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में और लीग की योजनाओं पर कहीं काम होता रहा तो कम्युनिस्ट पार्टियों में।

क्रान्ति के सपनों के दिन लद गए तो सामाजिक क्रान्ति के नाम पर पुराण कथाओं को आधार बना कर अतीत में प्रचलित और आज अव्यावहारिक बन चुकी व्यवस्थाओं के विरोध के नाम पर सामाजिक उपद्रव भड़काने के अवसर तैयार करने में इसकी सारी ऊर्जा व्यय होती है। हिन्दू समाज को तोड़ने का ईसाइयत और मुसलिम लीग का कार्यभार इसका एक मात्र कार्यभार रह गया है।

जो इतिहास की इतनी मोटी समझ रखते हैं कि यह विश्वास पाल सकें कि वे अपने बुद्धिबल से मिथक को इतिहास और इतिहास को मिथक बना सकते हैं, वे ही यह विश्वास पाल सकते हैं कि वे समाज को तोड़ कर समाज को और देश की संपत्तियों को नष्ट करके देश को मजबूत बना सकते हैं।

जो इतिहास को नहीं समझता वह न तो वर्तमान को समझ सकता है, न अपने समाज को, न अपने आप को। वह यह भी नहीं सझ सकता कि वह कर क्या रहा है और उसके परिणाम क्या होंगे। उदाहरण के लिए मार्क्सवाद का प्रधान लक्ष्य आर्थिक विषमता का उन्मूलन रहा है। सामाजिक विषमता का प्रधान कारण भी वह इसी को मानता रहा है। पूंजीपति आर्थिक लूट जारी रखने के लिए इस प्रयास में रहता है कि जन आक्रोश को सामाजिक समस्याओं की ओर मोड़ दिया जाय जिससे उसे मनमानी करने की पूरी छूट मिल सके।

आज जब बीच बीच में यह राग अलापा जाता है कि धनी गरीब के बीच की खाई गहरी होती जा रही है, कि देश की ८७ प्रतिशत पूंजी केवल १ प्रतिशत पूंजीपतियों के पास जमा है और ९९ प्रतिशत को केवल २३ प्रतिशत पर निर्भर रहना पड़ रहा है, उस समय सामाजिक विक्षोभ को अपना प्रमुख कार्यभार बना कर कोई किसका साथ दे रहा है या किसकी लूट के लिए पर्यावरण तैयार कर रहा है? महिषासुर को हथियार बना कर, निषिद्ध खान पान का उत्सव मना कर या ऐसे ही दूसरे आयोजनों के माध्यम से वह आज की लड़ाई को किस युग के मैदान में उतर कर लड़ रहा है? यदि यही वैज्ञानिक तरीका है तो विज्ञान को नये रूप में परिभाषित करना होगा।

मेरे पाठकों में बहुतों को लग रहा होगा कि मेरा मार्क्सवाद का ज्ञान बहुत अच्छा नहीं है, और उनसे मैं स्वयं भी सहमत होना चाहूंगा, परन्तु मार्क्सवाद विचारदर्शन नहीं, कार्यदर्शन है। दुनिया को बदलने का दर्शन और इसकी परख इस आधार पर ही की जा सकता है कि भारतीय कम्युनिस्टों ने भारतीय समाज को किस रूप में बदला है, कहां तक बदला है, और वर्तमान में किनके साथ और किनके विरुद्ध हैं। इतिहास में आपकी नासमझी का स्रोत क्या रहा है और परिणाम क्या हुए?

हम इतिहास में केवल उस दुराग्रह की बात करेंगे जिसके चलते अयोध्या से लेकर राम तक, सरस्वती से लेकर सभ्यता या सभ्यता की प्रेरणा तक सब कुछ पश्चिम से आयात किया जाता रहा, और जब उस इतिहास को ध्वस्त कर दिया गया, और वैदिक और सैंधव सभ्यता का अभेद सिद्ध हो गया तो इतिहास की जगह थीम्स आफ हिस्ट्री पढ़ाई जाने लगी और हमले से तौबा किया गया पर फिर भी हड़प्पा सभ्यता को अनार्य बना कर पढ़ाया जाता रहा और वैदिक काल को परवर्ती कड़ी के रूप में पेश किया जाता रहा। आज भी स्थिति बदली न होगी और इसके आलोचकों की तरह मैं भी मानता हूं कि भाजपा की शिक्षा और संस्कृति की समझ खासी भोथरी है।

आज तो यह काम संभव ही नहीं, कल क्या रूप ले, पता नहीं।

Post – 2018-02-04

सत्यानासी (२)

कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता साम्यवाद की विफलता नहीं है, न ही यह मार्क्सवाद की व्यर्थता का प्रमाण है। यह उन असावधानियों की देन है, जिनमें से कुछ कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में भी दिखाई देती हैं। अपनी विफलता के बाद भी कम्युनिस्ट आन्दोलन ने, विशेषत: रूसी क्रान्ति ने, केवल सोवियत संघ को ही नहीं, उससे प्ररित और क्रांति की दिशा में अग्रसर देशों को ही नहीं, समस्त पूंजीवादी देशों को भी अपने दबाव से जितना लोकोन्मुख और कल्याणकारी बनाया उसका सही आकलन करने की न तो मुझमें योग्यता है न ही हमारी आज की चर्चा में उसकी जरूरत।

हमारी चिन्ता में यह अवश्य शामिल है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चरित्र दुनिया के दूसरे सभी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों से विपरीत क्यों रहा? मन में यह सवाल अवश्य पैदा होता है कि इसने सांप्रदायिक चरित्र क्यों अपना लिया? इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यभार हिन्दू समाज तक सीमित क्यों रहे और वे भी इसकी जड़ें खोदने तक सीमित क्यों रहे? इसने इतिहास का दो तरह का पाठ क्यों किया जिसमें एक काल खंड के बारे में उपनिवेशवादी व्याख्या पूरी तरह सही बन गई और दूसरे के विषय में सरासर गलत मानी जाती रही? इन सवालों के उत्तर हम नहीं देना चाहेंगे, वे हमारी सोच की दिशा बदल सकते हैं, परन्तु विफलताओं की मीमांसा करने वालों को इन अप्रिय सवालों से दो चार होना होगा, अन्यथा वे गालियों के रियाज को ही मार्क्सवाद का नया कार्यभार बना लेंगे।

हम जिस एक प्रश्न को रेखांकित करना चाहते हैं वह यह कि जिन भी देशों ने क्रान्ति करने में सफलता पाई उनकी तुलना में भारत की स्थिति क्रान्ति के लिए सबसे अनुकूल थी। यहां औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की लंबी छटपटाहट और आक्रोश था और दूसरी ओर आर्थिक विषमता से जुड़ी सामाजिक विषमता भी थी।

यहां शोषितों और सामाजिक स्तरभेद के शिकार लोगों को संगठित करना अधिक आसान था, क्योंकि वे दूसरे देशों की फ्यूडल व्यवस्था के शिकार दलित समाज की तरह बिखरे नहीं, अपितु बिरादरी पंचायतों के माध्यम से पहले से संगठित समुदाय थे। एक बिरादरी के रूप में वे शक्तिशाली इतने थे कि असह्य स्थितियों में बिरादरी पंचायत का फैसला होने पर ये उन जमीदारों और भूस्वामियों से असहयोग कर सकते और उन्हें अपनी सेवाओं से वंचित कर सकते थे जिनसे सामान्यत: वे आंख तक नहीं मिला सकते थे। ऐसी स्थिति में उस पेशे से जुडा कहीं का कोई व्यक्ति उसकी सेवा के लिए तैयार नहीं हो सकता था। कहें जरूरत किसी अन्य देश की तुलना में अधिक होने के बाद भी उनके भीतर पैठ बनाना और उनको बड़े संगठन का अंग बनाना, उनमें आत्मविश्वास पैदा करना मजदूरों को संगठित करने की अपेक्षा अधिक आसान था।

ऐसी स्थिति मे उनको संगठित करने का प्रयत्न क्यों नहीं किया गया? जब किसानों को पार्टी से जोड़ने का खयाल आया भी तो भी दायरा बड़े और मझोले भूस्वामियों तक सीमित क्यों रह गया जब कि वे ही भूमिहीन कृषि मजदूरों के शोषक हुआ करते थे।

इन सभी सवालों का जवाब यह है कि उन्हें न तो अपने देश और समाज की समझ थी, न समझने की आकांक्षा थी । वे पश्चिमी समाज को अपने समाज पर आरोपित करके, इसे समझने का प्रयत्न कर रहे थे जैसे पाश्चात्य साहित्य पर मुग्ध हमारे लेखक उस साहित्य में व्यक्त अनुभूतियों और विचारों को स्वयं आत्मसात् करके उसका आरोपण अपने समाज पर करके उसका चित्रण करके इतना बारीक कात लेते हैं कि उनका साहित्य उनके जैसों की परिधि को पार ही नहीं कर पाता।

इन दोनों के बीच गहरा संबंध है। शोषित और दलित जनता से जुड़ने के लाख दावों के बावजूद प्रगतिशील साहित्य अपने समाज से जितना कटा रहा है उतना कटा दरबारी साहित्य तक नहीं रहा क्योंकि दरबारी होते हुए भी वह इस देश और समाज की अनुभूतियों और आकांक्षाओं का साहित्य था।

मुझे लगता है कि मार्क्सवादी सोच में एक खास तरह की यांत्रिकता इसलिए आ गई कि इसमें भौतिक पक्ष पर एकांगी बल दिया गया और यह मान लिया गया कि चेतना भौतिक परिस्थितियों की उपज है, भौतिक परिस्थितियों को बदल कर चेतना को इच्छित रूप में बदला जा सकता है।

यह अतिवाद था। इसमें इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया कि समान भौतिक परिस्थितियों में चेतना के रूप कितने भिन्न होते हैं और निरा भौतिक भी इतने ज्ञात और ज्ञेय घटकों से बना होता कि सबका हमें बोध तक नहीं होता, उनको नियंत्रित करना तो दूर की बात है। मार्क्स के अपने चिन्तन में उतना इकहरापन नहीं है जो नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे का मंसूबा रखने वाले भारतीय मार्क्सवादियों में यथार्थ से कटे रहने और इसकी क्षतिपूर्ति के रूप में खयालों को यथार्थ मान लेने के कारण देखने में आता है। इसका चरित्र निर्धारण जिस दौर में हुआ उसमें अपनी जीवनशैली में नवाबी और अभिव्यक्ति में आग उगलने वाले लफ्फाजियों का जैसा जमघट कम्युनिस्ट पार्टी मे था, वैसा किसी अन्य दल में कभी नहीं रहा। मार्क्सवाद में आस्था रखने वाले उस धड़े में भी नहीं, जिसे सोशलिस्ट कह कर अलग कर दिया गया।

इन दोनों में बुनियादी अंतर यह था कि सोसलिस्टों (समाजवादियों) की जड़ें भारतीय समाज और मूल्यव्यस्था में थीं, जब कि कम्युनिस्टों की मानसिकता उपनिवेशवादी थी। समाजवादी समाज को बदलना चाहते थे, जब कि कम्युनिस्ट सत्ता पर कब्जा जमाना चाहते थे। पहले की आस्था लोकतंत्र में थी, दूसरे की तानाशाही में। पहले को समाज के कल्याण के लिए समाजवाद चाहिए था, दूसरे को अपना सिक्का जमानेके लिए। सच यह है कि कम्युनिस्टों में अधिकांश ऐसे थे जिन्हें लोकतांत्रिक भारत की कल्पना से डर लगता था, उसमें अपना भविष्य असुरक्षित लगता था। इनमें ऊंचे रुतबे के लोग थे, अलपसंख्यक सिंड्रोम से ग्रस्त मानसिकता के लोग थे, और इन्होंने अपने प्रभाव से कम्युनिस्ट आन्दोलन को इतना बदला कि जिन्ना के प्रशंसक लीग से बाहर यदि कहीं मिल सकते थे तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में और लीग की योजनाओं पर कहीं काम होता रहा तो कम्युनिस्ट पार्टियों में।

क्रान्ति के सपनों के दिन लद गए तो सामाजिक क्रान्ति के नाम पर पुराण कथाओं को आधार बना कर अतीत में प्रचलित और आज अव्यावहारिक बन चुकी व्यवस्थाओं के विरोध के नाम पर सामाजिक उपद्रव भड़काने के अवसर तैयार करने में इसकी सारी ऊर्जा व्यय होती है। हिन्दू समाज को तोड़ने का ईसाइयत और मुसलिम लीग का कार्यभार इसका एक मात्र कार्यभार रह गया है।

जो इतिहास की इतनी मोटी समझ रखते हैं कि यह विश्वास पाल सकें कि वे अपने बुद्धिबल से मिथक को इतिहास और इतिहास को मिथक बना सकते हैं, वे ही यह विश्वास पाल सकते हैं कि वे समाज को तोड़ कर समाज को और देश की संपत्तियों को नष्ट करके देश को मजबूत बना सकते हैं।

जो इतिहास को नहीं समझता वह न तो वर्तमान को समझ सकता है, न अपने समाज को, न अपने आप को। वह यह भी नहीं सझ सकता कि वह कर क्या रहा है और उसके परिणाम क्या होंगे। उदाहरण के लिए मार्क्सवाद का प्रधान लक्ष्य आर्थिक विषमता का उन्मूलन रहा है। सामाजिक विषमता का प्रधान कारण भी वह इसी को मानता रहा है। पूंजीपति आर्थिक लूट जारी रखने के लिए इस प्रयास में रहता है कि जन आक्रोश को सामाजिक समस्याओं की ओर मोड़ दिया जाय जिससे उसे मनमानी करने की पूरी छूट मिल सके।

आज जब बीच बीच में यह राग अलापा जाता है कि धनी गरीब के बीच की खाई गहरी होती जा रही है, कि देश की ८७ प्रतिशत पूंजी केवल १ प्रतिशत पूंजीपतियों के पास जमा है और ९९ प्रतिशत को केवल २३ प्रतिशत पर निर्भर रहना पड़ रहा है, उस समय सामाजिक विक्षोभ को अपना प्रमुख कार्यभार बना कर कोई किसका साथ दे रहा है या किसकी लूट के लिए पर्यावरण तैयार कर रहा है? महिषासुर को हथियार बना कर, निषिद्ध खान पान का उत्सव मना कर या ऐसे ही दूसरे आयोजनों के माध्यम से वह आज की लड़ाई को किस युग के मैदान में उतर कर लड़ रहा है? यदि यही वैज्ञानिक तरीका है तो विज्ञान को नये रूप में परिभाषित करना होगा।

मेरे पाठकों में बहुतों को लग रहा होगा कि मेरा मार्क्सवाद का ज्ञान बहुत अच्छा नहीं है, और उनसे मैं स्वयं भी सहमत होना चाहूंगा, परन्तु मार्क्सवाद विचारदर्शन नहीं, कार्यदर्शन है। दुनिया को बदलने का दर्शन और इसकी परख इस आधार पर ही की जा सकता है कि भारतीय कम्युनिस्टों ने भारतीय समाज को किस रूप में बदला है, कहां तक बदला है, और वर्तमान में किनके साथ और किनके विरुद्ध हैं। इतिहास में आपकी नासमझी का स्रोत क्या रहा है और परिणाम क्या हुए?

हम इतिहास में केवल उस दुराग्रह की बात करेंगे जिसके चलते अयोध्या से लेकर राम तक, सरस्वती से लेकर सभ्यता या सभ्यता की प्रेरणा तक सब कुछ पश्चिम से आयात किया जाता रहा, और जब उस इतिहास को ध्वस्त कर दिया गया, और वैदिक और सैंधव सभ्यता का अभेद सिद्ध हो गया तो इतिहास की जगह थीम्स आफ हिस्ट्री पढ़ाई जाने लगी और हमले से तौबा किया गया पर फिर भी हड़प्पा सभ्यता को अनार्य बना कर पढ़ाया जाता रहा और वैदिक काल को परवर्ती कड़ी के रूप में पेश किया जाता रहा। आज भी स्थिति बदली न होगी और इसके आलोचकों की तरह मैं भी मानता हूं कि भाजपा की शिक्षा और संस्कृति की समझ खासी भोथरी है।

आज तो यह काम संभव ही नहीं, कल क्या रूप ले, पता नहीं।

Post – 2018-02-04

सत्यानासी (२)

कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता साम्यवाद की विफलता नहीं है, न ही यह मार्क्सवाद की व्यर्थता का प्रमाण है। यह उन असावधानियों की देन है, जिनमें से कुछ कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में भी दिखाई देती हैं। अपनी विफलता के बाद भी कम्युनिस्ट आन्दोलन ने, विशेषत: रूसी क्रान्ति ने, केवल सोवियत संघ को ही नहीं, उससे प्ररित और क्रांति की दिशा में अग्रसर देशों को ही नहीं, समस्त पूंजीवादी देशों को भी अपने दबाव से जितना लोकोन्मुख और कल्याणकारी बनाया उसका सही आकलन करने की न तो मुझमें योग्यता है न ही हमारी आज की चर्चा में उसकी जरूरत।

हमारी चिन्ता में यह अवश्य शामिल है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चरित्र दुनिया के दूसरे सभी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों से विपरीत क्यों रहा? मन में यह सवाल अवश्य पैदा होता है कि इसने सांप्रदायिक चरित्र क्यों अपना लिया? इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यभार हिन्दू समाज तक सीमित क्यों रहे और वे भी इसकी जड़ें खोदने तक सीमित क्यों रहे? इसने इतिहास का दो तरह का पाठ क्यों किया जिसमें एक काल खंड के बारे में उपनिवेशवादी व्याख्या पूरी तरह सही बन गई और दूसरे के विषय में सरासर गलत मानी जाती रही? इन सवालों के उत्तर हम नहीं देना चाहेंगे, वे हमारी सोच की दिशा बदल सकते हैं, परन्तु विफलताओं की मीमांसा करने वालों को इन अप्रिय सवालों से दो चार होना होगा, अन्यथा वे गालियों के रियाज को ही मार्क्सवाद का नया कार्यभार बना लेंगे।

हम जिस एक प्रश्न को रेखांकित करना चाहते हैं वह यह कि जिन भी देशों ने क्रान्ति करने में सफलता पाई उनकी तुलना में भारत की स्थिति क्रान्ति के लिए सबसे अनुकूल थी। यहां औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की लंबी छटपटाहट और आक्रोश था और दूसरी ओर आर्थिक विषमता से जुड़ी सामाजिक विषमता भी थी।

यहां शोषितों और सामाजिक स्तरभेद के शिकार लोगों को संगठित करना अधिक आसान था, क्योंकि वे दूसरे देशों की फ्यूडल व्यवस्था के शिकार दलित समाज की तरह बिखरे नहीं, अपितु बिरादरी पंचायतों के माध्यम से पहले से संगठित समुदाय थे। एक बिरादरी के रूप में वे शक्तिशाली इतने थे कि असह्य स्थितियों में बिरादरी पंचायत का फैसला होने पर ये उन जमीदारों और भूस्वामियों से असहयोग कर सकते और उन्हें अपनी सेवाओं से वंचित कर सकते थे जिनसे सामान्यत: वे आंख तक नहीं मिला सकते थे। ऐसी स्थिति में उस पेशे से जुडा कहीं का कोई व्यक्ति उसकी सेवा के लिए तैयार नहीं हो सकता था। कहें जरूरत किसी अन्य देश की तुलना में अधिक होने के बाद भी उनके भीतर पैठ बनाना और उनको बड़े संगठन का अंग बनाना, उनमें आत्मविश्वास पैदा करना मजदूरों को संगठित करने की अपेक्षा अधिक आसान था।

ऐसी स्थिति मे उनको संगठित करने का प्रयत्न क्यों नहीं किया गया? जब किसानों को पार्टी से जोड़ने का खयाल आया भी तो भी दायरा बड़े और मझोले भूस्वामियों तक सीमित क्यों रह गया जब कि वे ही भूमिहीन कृषि मजदूरों के शोषक हुआ करते थे।

इन सभी सवालों का जवाब यह है कि उन्हें न तो अपने देश और समाज की समझ थी, न समझने की आकांक्षा थी । वे पश्चिमी समाज को अपने समाज पर आरोपित करके, इसे समझने का प्रयत्न कर रहे थे जैसे पाश्चात्य साहित्य पर मुग्ध हमारे लेखक उस साहित्य में व्यक्त अनुभूतियों और विचारों को स्वयं आत्मसात् करके उसका आरोपण अपने समाज पर करके उसका चित्रण करके इतना बारीक कात लेते हैं कि उनका साहित्य उनके जैसों की परिधि को पार ही नहीं कर पाता।

इन दोनों के बीच गहरा संबंध है। शोषित और दलित जनता से जुड़ने के लाख दावों के बावजूद प्रगतिशील साहित्य अपने समाज से जितना कटा रहा है उतना कटा दरबारी साहित्य तक नहीं रहा क्योंकि दरबारी होते हुए भी वह इस देश और समाज की अनुभूतियों और आकांक्षाओं का साहित्य था।

मुझे लगता है कि मार्क्सवादी सोच में एक खास तरह की यांत्रिकता इसलिए आ गई कि इसमें भौतिक पक्ष पर एकांगी बल दिया गया और यह मान लिया गया कि चेतना भौतिक परिस्थितियों की उपज है, भौतिक परिस्थितियों को बदल कर चेतना को इच्छित रूप में बदला जा सकता है।

यह अतिवाद था। इसमें इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया कि समान भौतिक परिस्थितियों में चेतना के रूप कितने भिन्न होते हैं और निरा भौतिक भी इतने ज्ञात और ज्ञेय घटकों से बना होता कि सबका हमें बोध तक नहीं होता, उनको नियंत्रित करना तो दूर की बात है। मार्क्स के अपने चिन्तन में उतना इकहरापन नहीं है जो नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे का मंसूबा रखने वाले भारतीय मार्क्सवादियों में यथार्थ से कटे रहने और इसकी क्षतिपूर्ति के रूप में खयालों को यथार्थ मान लेने के कारण देखने में आता है। इसका चरित्र निर्धारण जिस दौर में हुआ उसमें अपनी जीवनशैली में नवाबी और अभिव्यक्ति में आग उगलने वाले लफ्फाजियों का जैसा जमघट कम्युनिस्ट पार्टी मे था, वैसा किसी अन्य दल में कभी नहीं रहा। मार्क्सवाद में आस्था रखने वाले उस धड़े में भी नहीं, जिसे सोशलिस्ट कह कर अलग कर दिया गया।

इन दोनों में बुनियादी अंतर यह था कि सोसलिस्टों (समाजवादियों) की जड़ें भारतीय समाज और मूल्यव्यस्था में थीं, जब कि कम्युनिस्टों की मानसिकता उपनिवेशवादी थी। समाजवादी समाज को बदलना चाहते थे, जब कि कम्युनिस्ट सत्ता पर कब्जा जमाना चाहते थे। पहले की आस्था लोकतंत्र में थी, दूसरे की तानाशाही में। पहले को समाज के कल्याण के लिए समाजवाद चाहिए था, दूसरे को अपना सिक्का जमानेके लिए। सच यह है कि कम्युनिस्टों में अधिकांश ऐसे थे जिन्हें लोकतांत्रिक भारत की कल्पना से डर लगता था, उसमें अपना भविष्य असुरक्षित लगता था। इनमें ऊंचे रुतबे के लोग थे, अलपसंख्यक सिंड्रोम से ग्रस्त मानसिकता के लोग थे, और इन्होंने अपने प्रभाव से कम्युनिस्ट आन्दोलन को इतना बदला कि जिन्ना के प्रशंसक लीग से बाहर यदि कहीं मिल सकते थे तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में और लीग की योजनाओं पर कहीं काम होता रहा तो कम्युनिस्ट पार्टियों में।

क्रान्ति के सपनों के दिन लद गए तो सामाजिक क्रान्ति के नाम पर पुराण कथाओं को आधार बना कर अतीत में प्रचलित और आज अव्यावहारिक बन चुकी व्यवस्थाओं के विरोध के नाम पर सामाजिक उपद्रव भड़काने के अवसर तैयार करने में इसकी सारी ऊर्जा व्यय होती है। हिन्दू समाज को तोड़ने का ईसाइयत और मुसलिम लीग का कार्यभार इसका एक मात्र कार्यभार रह गया है।

जो इतिहास की इतनी मोटी समझ रखते हैं कि यह विश्वास पाल सकें कि वे अपने बुद्धिबल से मिथक को इतिहास और इतिहास को मिथक बना सकते हैं, वे ही यह विश्वास पाल सकते हैं कि वे समाज को तोड़ कर समाज को और देश की संपत्तियों को नष्ट करके देश को मजबूत बना सकते हैं।

जो इतिहास को नहीं समझता वह न तो वर्तमान को समझ सकता है, न अपने समाज को, न अपने आप को। वह यह भी नहीं सझ सकता कि वह कर क्या रहा है और उसके परिणाम क्या होंगे। उदाहरण के लिए मार्क्सवाद का प्रधान लक्ष्य आर्थिक विषमता का उन्मूलन रहा है। सामाजिक विषमता का प्रधान कारण भी वह इसी को मानता रहा है। पूंजीपति आर्थिक लूट जारी रखने के लिए इस प्रयास में रहता है कि जन आक्रोश को सामाजिक समस्याओं की ओर मोड़ दिया जाय जिससे उसे मनमानी करने की पूरी छूट मिल सके।

आज जब बीच बीच में यह राग अलापा जाता है कि धनी गरीब के बीच की खाई गहरी होती जा रही है, कि देश की ८७ प्रतिशत पूंजी केवल १ प्रतिशत पूंजीपतियों के पास जमा है और ९९ प्रतिशत को केवल २३ प्रतिशत पर निर्भर रहना पड़ रहा है, उस समय सामाजिक विक्षोभ को अपना प्रमुख कार्यभार बना कर कोई किसका साथ दे रहा है या किसकी लूट के लिए पर्यावरण तैयार कर रहा है? महिषासुर को हथियार बना कर, निषिद्ध खान पान का उत्सव मना कर या ऐसे ही दूसरे आयोजनों के माध्यम से वह आज की लड़ाई को किस युग के मैदान में उतर कर लड़ रहा है? यदि यही वैज्ञानिक तरीका है तो विज्ञान को नये रूप में परिभाषित करना होगा।

मेरे पाठकों में बहुतों को लग रहा होगा कि मेरा मार्क्सवाद का ज्ञान बहुत अच्छा नहीं है, और उनसे मैं स्वयं भी सहमत होना चाहूंगा, परन्तु मार्क्सवाद विचारदर्शन नहीं, कार्यदर्शन है। दुनिया को बदलने का दर्शन और इसकी परख इस आधार पर ही की जा सकता है कि भारतीय कम्युनिस्टों ने भारतीय समाज को किस रूप में बदला है, कहां तक बदला है, और वर्तमान में किनके साथ और किनके विरुद्ध हैं। इतिहास में आपकी नासमझी का स्रोत क्या रहा है और परिणाम क्या हुए?

हम इतिहास में केवल उस दुराग्रह की बात करेंगे जिसके चलते अयोध्या से लेकर राम तक, सरस्वती से लेकर सभ्यता या सभ्यता की प्रेरणा तक सब कुछ पश्चिम से आयात किया जाता रहा, और जब उस इतिहास को ध्वस्त कर दिया गया, और वैदिक और सैंधव सभ्यता का अभेद सिद्ध हो गया तो इतिहास की जगह थीम्स आफ हिस्ट्री पढ़ाई जाने लगी और हमले से तौबा किया गया पर फिर भी हड़प्पा सभ्यता को अनार्य बना कर पढ़ाया जाता रहा और वैदिक काल को परवर्ती कड़ी के रूप में पेश किया जाता रहा। आज भी स्थिति बदली न होगी और इसके आलोचकों की तरह मैं भी मानता हूं कि भाजपा की शिक्षा और संस्कृति की समझ खासी भोथरी है।

आज तो यह काम संभव ही नहीं, कल क्या रूप ले, पता नहीं।

Post – 2018-02-04

जो बात मैने रोहित वेमुला की आत्महत्या पर कही थी वही अंकित की हत्या पर कहना चाहूंगा। मृत्यु पर राजनीति करने वाले क्रूर होते हैं और कानून के अमल में बाधक होते हैं।