Post – 2018-03-27

ईश्वर के बारे में सोचता हूं
तो आदमी को भूल जाता हूं
आदमी ईश्वर को नहीं जानता।
आदमी के बारे में सोचता हूं
तो ईश्वर को भूल जाता हूं
आदमी को ईश्वर की जरूरत नहीं ।

Post – 2018-03-27

ईश्वर के बारे में सोचता हूं
तो आदमी को भूल जाता हूं
आदमी ईश्वर को नहीं जानता।
आदमी के बारे में सोचता हूं
तो ईश्वर को भूल जाता हूं
आदमी को ईश्वर की जरूरत नहीं ।

Post – 2018-03-26

टिप्पणी -तीन

मुझे ऐसा लगता है कि उच्च शिक्षा केंद्रों की स्वायत्तता की आड़ लेकर है, प्रकारांतर से शिक्षा का उसी तरह निजीकरण किया जा रहा है जैसे स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही प्राथमिक शिक्षा का निजीकरण आरंभ किया गया था। अपनी पोस्टों के माध्यम से मैं जब तब शिक्षा पर अपने विचार प्रकट करता रहा हूं इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि मैं इसे नीति पर भी अपना पक्ष रखूं।

मैं वर्तमान सरकार के किन्हीं मामलों में किए जाने वाले गलत फैसलों को कुटिलता से प्रेरित नहीं मानता । परंतु जो कुटिलता से प्रेरित नहीं है वह भी नादानी से भरा तो हो ही सकता है। मैं केवल अनुमान के आधार पर यह सोचता हूं कि शिक्षा के विषय में बहुत कामचलाऊ दृष्टि रखने के कारण वर्तमान सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि यदि लोगों को रोजगार देना है तो तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना होगा । ऐसे में कुछ जिम्मेदारी उनकी भी बनती है जो तकनीकी शिक्षा प्राप्त प्रतिभाशाली छात्रों का उपयोग अपने कारोबार में करते हैं इसलिए उच्च शिक्षा का काम यदि उन को सौंप दिया जाए तो वे इस काम को अधिक सलीके से कर पाएंगे और सरकार को भी अधिक व्यय नहीं करना पड़ेगा।

यह सोच घटिया है। इसमें हम मान लेते हैं कि मैकाले ने अंग्रेजी भाषा की शिक्षा का प्रस्ताव इसलिए रखा था कंपनी के दफ्तरों के लिए क्लर्क पैदा किए जा सकें, जबकि मैकाले ने न तो अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा की बात सोची थी और न ही यह यह भारतीय भाषाओं के विकास में बाधक थी। उल्टे उसकी समझ यह थी संस्कृत और फारसी के माध्यम से जब तक शिक्षा दी जाएगी तब तक इसे सेकुलर नहीं बनाया जा सकता । संस्कृत और फारसी शिक्षा साधारण जनों को नहीं दी जा सकती, न ही इसमें ज्ञान विज्ञान की पढ़ाई की जा सकती है । शिक्षा शास्त्रीय बनी रहेगी और इसका भार सरकार को उठाना पड़ेगा परंतु इसका कोई लाभ नहीं हो सकेगा ।उसके प्रस्ताव में व्यक्त था कि अंग्रेजी के माध्यम से आधुनिक विषयों की जानकारी प्राप्त करने वाले भारतीय दक्षता पूर्वक अंग्रेजी में अपने को व्यक्त नहीं कर पाएंगे इसलिए लिखने का काम वे अपनी मातृभाषा में करेंगे और इस तरह की भारतीय भाषाओं का विकास होगा और वे कुछ समय के बाद शिक्षा का माध्यम भी बन सकेगी।

इसके बाद भी लोगों की आशंका कुछ दूर तक सही हो सकती है परंतु वर्तमान सरकार की शिक्षा नीति कुछ ऐसी लगती है शिक्षा का काम लोगों को रोजगार के योग्य बनाना मात्र है और वह शिक्षा के माध्यम से केवल देश देशांतर में काम करने वाले मजदूर पैदा करने जा रही है। बेशक, कुशल मजदूर।

पूंजीपति कुशल मजदूर पैदा करने के लिए अपना पैसा नहीं लगाएंगे। होगा यह कि उच्च शिक्षा एक अधिक बड़े कारोबार में बदल जाएगी और मोदी सरकार के उस दावे को झुठलाएगी जिसमें वह अपनी प्राथमिकताओं मैं गरीबों को सबसे ऊपर रखने की बात करती है। गजट में घोषणा हो जाने के बाद भी मेरा सुझाव है इसे वापस लिया जाना चाहिए। देश का भविष्य गजट की छपाई पर खर्च होने वाली रोशनाई से कुछ अधिक कीमती है। होना यह चाहिए शिक्षा और स्वास्थ्य के विषय में हम अमेरिका से प्रेरणा न लेकर ब्रिटेन से प्रेरणा लें ।

Post – 2018-03-26

टिप्पणी -तीन

मुझे ऐसा लगता है कि उच्च शिक्षा केंद्रों की स्वायत्तता की आड़ लेकर है, प्रकारांतर से शिक्षा का उसी तरह निजीकरण किया जा रहा है जैसे स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही प्राथमिक शिक्षा का निजीकरण आरंभ किया गया था। अपनी पोस्टों के माध्यम से मैं जब तब शिक्षा पर अपने विचार प्रकट करता रहा हूं इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि मैं इसे नीति पर भी अपना पक्ष रखूं।

मैं वर्तमान सरकार के किन्हीं मामलों में किए जाने वाले गलत फैसलों को कुटिलता से प्रेरित नहीं मानता । परंतु जो कुटिलता से प्रेरित नहीं है वह भी नादानी से भरा तो हो ही सकता है। मैं केवल अनुमान के आधार पर यह सोचता हूं कि शिक्षा के विषय में बहुत कामचलाऊ दृष्टि रखने के कारण वर्तमान सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि यदि लोगों को रोजगार देना है तो तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना होगा । ऐसे में कुछ जिम्मेदारी उनकी भी बनती है जो तकनीकी शिक्षा प्राप्त प्रतिभाशाली छात्रों का उपयोग अपने कारोबार में करते हैं इसलिए उच्च शिक्षा का काम यदि उन को सौंप दिया जाए तो वे इस काम को अधिक सलीके से कर पाएंगे और सरकार को भी अधिक व्यय नहीं करना पड़ेगा।

यह सोच घटिया है। इसमें हम मान लेते हैं कि मैकाले ने अंग्रेजी भाषा की शिक्षा का प्रस्ताव इसलिए रखा था कंपनी के दफ्तरों के लिए क्लर्क पैदा किए जा सकें, जबकि मैकाले ने न तो अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा की बात सोची थी और न ही यह यह भारतीय भाषाओं के विकास में बाधक थी। उल्टे उसकी समझ यह थी संस्कृत और फारसी के माध्यम से जब तक शिक्षा दी जाएगी तब तक इसे सेकुलर नहीं बनाया जा सकता । संस्कृत और फारसी शिक्षा साधारण जनों को नहीं दी जा सकती, न ही इसमें ज्ञान विज्ञान की पढ़ाई की जा सकती है । शिक्षा शास्त्रीय बनी रहेगी और इसका भार सरकार को उठाना पड़ेगा परंतु इसका कोई लाभ नहीं हो सकेगा ।उसके प्रस्ताव में व्यक्त था कि अंग्रेजी के माध्यम से आधुनिक विषयों की जानकारी प्राप्त करने वाले भारतीय दक्षता पूर्वक अंग्रेजी में अपने को व्यक्त नहीं कर पाएंगे इसलिए लिखने का काम वे अपनी मातृभाषा में करेंगे और इस तरह की भारतीय भाषाओं का विकास होगा और वे कुछ समय के बाद शिक्षा का माध्यम भी बन सकेगी।

इसके बाद भी लोगों की आशंका कुछ दूर तक सही हो सकती है परंतु वर्तमान सरकार की शिक्षा नीति कुछ ऐसी लगती है शिक्षा का काम लोगों को रोजगार के योग्य बनाना मात्र है और वह शिक्षा के माध्यम से केवल देश देशांतर में काम करने वाले मजदूर पैदा करने जा रही है। बेशक, कुशल मजदूर।

पूंजीपति कुशल मजदूर पैदा करने के लिए अपना पैसा नहीं लगाएंगे। होगा यह कि उच्च शिक्षा एक अधिक बड़े कारोबार में बदल जाएगी और मोदी सरकार के उस दावे को झुठलाएगी जिसमें वह अपनी प्राथमिकताओं मैं गरीबों को सबसे ऊपर रखने की बात करती है। गजट में घोषणा हो जाने के बाद भी मेरा सुझाव है इसे वापस लिया जाना चाहिए। देश का भविष्य गजट की छपाई पर खर्च होने वाली रोशनाई से कुछ अधिक कीमती है। होना यह चाहिए शिक्षा और स्वास्थ्य के विषय में हम अमेरिका से प्रेरणा न लेकर ब्रिटेन से प्रेरणा लें ।

Post – 2018-03-26

टिप्पणी -तीन

मुझे ऐसा लगता है कि उच्च शिक्षा केंद्रों की स्वायत्तता की आड़ लेकर है, प्रकारांतर से शिक्षा का उसी तरह निजीकरण किया जा रहा है जैसे स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही प्राथमिक शिक्षा का निजीकरण आरंभ किया गया था। अपनी पोस्टों के माध्यम से मैं जब तब शिक्षा पर अपने विचार प्रकट करता रहा हूं इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि मैं इसे नीति पर भी अपना पक्ष रखूं।

मैं वर्तमान सरकार के किन्हीं मामलों में किए जाने वाले गलत फैसलों को कुटिलता से प्रेरित नहीं मानता । परंतु जो कुटिलता से प्रेरित नहीं है वह भी नादानी से भरा तो हो ही सकता है। मैं केवल अनुमान के आधार पर यह सोचता हूं कि शिक्षा के विषय में बहुत कामचलाऊ दृष्टि रखने के कारण वर्तमान सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि यदि लोगों को रोजगार देना है तो तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना होगा । ऐसे में कुछ जिम्मेदारी उनकी भी बनती है जो तकनीकी शिक्षा प्राप्त प्रतिभाशाली छात्रों का उपयोग अपने कारोबार में करते हैं इसलिए उच्च शिक्षा का काम यदि उन को सौंप दिया जाए तो वे इस काम को अधिक सलीके से कर पाएंगे और सरकार को भी अधिक व्यय नहीं करना पड़ेगा।

यह सोच घटिया है। इसमें हम मान लेते हैं कि मैकाले ने अंग्रेजी भाषा की शिक्षा का प्रस्ताव इसलिए रखा था कंपनी के दफ्तरों के लिए क्लर्क पैदा किए जा सकें, जबकि मैकाले ने न तो अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा की बात सोची थी और न ही यह यह भारतीय भाषाओं के विकास में बाधक थी। उल्टे उसकी समझ यह थी संस्कृत और फारसी के माध्यम से जब तक शिक्षा दी जाएगी तब तक इसे सेकुलर नहीं बनाया जा सकता । संस्कृत और फारसी शिक्षा साधारण जनों को नहीं दी जा सकती, न ही इसमें ज्ञान विज्ञान की पढ़ाई की जा सकती है । शिक्षा शास्त्रीय बनी रहेगी और इसका भार सरकार को उठाना पड़ेगा परंतु इसका कोई लाभ नहीं हो सकेगा ।उसके प्रस्ताव में व्यक्त था कि अंग्रेजी के माध्यम से आधुनिक विषयों की जानकारी प्राप्त करने वाले भारतीय दक्षता पूर्वक अंग्रेजी में अपने को व्यक्त नहीं कर पाएंगे इसलिए लिखने का काम वे अपनी मातृभाषा में करेंगे और इस तरह की भारतीय भाषाओं का विकास होगा और वे कुछ समय के बाद शिक्षा का माध्यम भी बन सकेगी।

इसके बाद भी लोगों की आशंका कुछ दूर तक सही हो सकती है परंतु वर्तमान सरकार की शिक्षा नीति कुछ ऐसी लगती है शिक्षा का काम लोगों को रोजगार के योग्य बनाना मात्र है और वह शिक्षा के माध्यम से केवल देश देशांतर में काम करने वाले मजदूर पैदा करने जा रही है। बेशक, कुशल मजदूर।

पूंजीपति कुशल मजदूर पैदा करने के लिए अपना पैसा नहीं लगाएंगे। होगा यह कि उच्च शिक्षा एक अधिक बड़े कारोबार में बदल जाएगी और मोदी सरकार के उस दावे को झुठलाएगी जिसमें वह अपनी प्राथमिकताओं मैं गरीबों को सबसे ऊपर रखने की बात करती है। गजट में घोषणा हो जाने के बाद भी मेरा सुझाव है इसे वापस लिया जाना चाहिए। देश का भविष्य गजट की छपाई पर खर्च होने वाली रोशनाई से कुछ अधिक कीमती है। होना यह चाहिए शिक्षा और स्वास्थ्य के विषय में हम अमेरिका से प्रेरणा न लेकर ब्रिटेन से प्रेरणा लें ।

Post – 2018-03-26

टिप्पणी -2

भारतीय अतीत की कुछ बातें हमें विस्मित करती हैं। दूसरी सभ्यताओं की उपलब्धियां कम विस्मयकारी नहीं रही हैं परन्तु वे भव्यता, विराटता के कारण अधिक रही हैं जिसका दूसरा पक्ष रहा है सामान्य जनता का उसी क्रूरता से दोहन, उत्पीड़न, और असहायता। भारत में स्थिति ठीक इसके विपरीत दिखाई देती है। इसकी विस्मयकारी उपलब्धियां चिंतन, दर्शन, विज्ञान की सैद्धान्तिकी के क्षेत्र में और सकल संपदा के अधिक न्यायसंगत वितरण, तकनीक और कौशल के व्यापक उपयोगितावादी विनियोजन और दूसरी सभ्यताओं की तुलना में विस्मयकारी समृद्धि के होते हुए भी आर्थिक परिपक्वता में दिखाई देती है जिन सभी के पीछे इसकी विश्वदृष्टि और जीवनदृष्टि है।

इन पहलुओं पर मेरा ध्यान इसलिए गया कि मैंने देखा सैद्धांतिक विवेचन में उनकी उपलब्धियां आधुनिक युग से पहले दूसरों के लिए अकल्पनीय थीं। यहां तक कि कुछ शताब्दी पहले तक भी शेष जगत को अविश्वसनीय सी लगती थी और इसलिए इन पर ध्यान देने की बजाय, इनमें से कुछ
की उपेक्षा की जाती थी और शेष का उपहास किया जाता था। और उनकी पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त करने वाले और ऊंची हैसियत रखने वाले विद्वान इस अतिरंजना पर शर्म से पानी पानी हो जाते थे और उसी शिक्षा प्रणाली द्वारा और उन्हीं पुस्तकों के अध्ययन से ज्ञान अर्जित करने वाले हम सबके मन में ऐसे ही विचार पैदा होते रहे हैं।

उदाहरण के लिए गति की सापेक्षता का सिद्धांत जिसके अनुसार यदि किसी गतिमान पिंड पर स्थित या वाहन पर बैठे हुए हैं तो अचल वस्तु या पिंड गतिमान प्रतीत होगा और आप और आप का वाहन अचल।

खगोलीय स्तर पर पहुंचने पर इसके बहुत विस्मयकारी परिणाम होते हैं। यह अनायास नहीं है कि भारत ने वैदिक काल में ही यह जान लिया था कि धरती गोल है और साथ ही कई गतियों से गतिशील है । संभवतः ग्रहों और उपग्रहों दृष्टिगोचर होने के समय और सप्तर्षि की स्थिति के अध्ययन से वे इस परिणाम पर भी पहुंचे थे कि सभी पिंड स्थिर नहीं हैं, गतिशील है – विवर्तेते अहनी चक्रियेव ।

इसी तरह पदार्थ और काल के सूक्ष्मतम अंशों और विभागो तथा वृहत्तम संख्याओं को देख कर जिनका उपयोग ज्योतिर्विज्ञान में ही हो सकता था, लोग इसका उपहास करते थे। काल की सापेक्षता उस तरह के साधनों, यंत्रों और सुविधाओं का अभाव होते हुए जो आज उपलब्ध है कैसे इस नतीजे पर पहुंच गए कि काल सापेक्ष है। मनुष्य के एक दिन, देवों के (जिसका अर्थ है ज्योतिर्मान पिंडों के) एक दिन और ब्रह्मा के एक दिन में सापेक्षतः अकल्पनीय अंतर है। यह आइंस्टाइन से पहले किसी के चिंतन का हिस्सा नहीं रहा। परंतु आइंस्टाइन ने भी यह निष्कर्ष गणितीय आधार पर निकाला था न कि दूरदर्शी यंत्रों के माध्यम से ब्रह्मांड को देख कर।

मेरी जानकारी में किसी अन्य देश या समाज के चिंतकों ने पहले कभी नहीं सोचा था कि काल और दिक् के बीच सापेक्षिक संबंध है, न ही यह कि केवल हमारा जीवन ही नश्वर नहीं है, समस्त ब्रह्मांड महाकाल द्वारा अनुक्षण विनष्ट किया जा रहा है। प्रत्येक वस्तु यहां तक की ग्रह पिंड और सूर्य चंद्रमा भी विनाश की विभिन्न अवस्थाओं में हैं। यह अवधारणा महाकाल के दिव्य रूप में जितनी स्पष्ट है वह चकित करने वाली है।

यह सोच कहां से आई, कैसे पैदा हुई यह मेरी समझ में नहीं आता है । कारण यह है कि हमारे ज्ञान साहित्य का बहुत बड़ा अंश मनोविक्षिप्तों द्वारा नष्ट कर दिया गया। उस इतिहास को दोहराने की आवश्यकता नहीं। इसलिए नष्ट प्रासाद के मलबे में से हमें जहां-तहां से कुछ कीमती रत्न और चिन्दियां मिलती हैं, कुछ चौंकाने वाली सूचनाएं मिलती हैं, जिनको आगे पीछे से हम जोड़ नहीं पाते इसलिए आविश्वास करने को मजबूर हो जाते हैं ।

चीन को इस तरह के दुर्भाग्य से गुजारना नहीं पड़ा, इसलिए उसका जो कुछ था, उससे भी अधिक बढ़-चढ़कर वहां के कम्युनिस्ट इतिहासकार दावा करते रहे, जिसका परिणाम है साइंस ऐंड सिविलाइजेशन इन चाइना जिसके खंडों की सही संख्या तक का ज्ञान मुझे नहीं।

हमारे अधिकांश प्रतिभाशाली तरुण मार्क्सवाद के सुनहले आकर्षण से अपने को रोक नहीं सकते थे, परंतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लीग के प्रभाव में आ जाने के कारण उपेक्षा और उपहास द्वारा इतिहास के इन साक्ष्यों को भी नष्ट करने के लिए कृतसंकल्प रही और उसका असर हम सभी पर है। हम परंपरा विमुख बुद्धिजीवी अपने अतीत को समझने की जगह उस इतिहास के धनात्मक पक्ष का भी उपहास करने लगे।

मुझे अपने विचारों को आपके समक्ष रखते हुए भी बहुत संकोच होता है, क्योंकि भाजपा में ब्राह्मणवाद प्रबल है और इससे जुड़े लोग देवता से लेकर इतिहास तक को भुनाने के लिए किसी सीमा तक पहुंचने के लिए आतुर रहते हैं । यह हमारा दायित्व है जैसे ब्राहमणवादी चंगुल से शिक्षा को बाहर लाने में सफल हुए उसी तरह अपने इतिहास को भी उनके चंगुल से बाहर रखते हुए उसकी सही समझ विकसित करें।

Post – 2018-03-26

टिप्पणी -2

भारतीय अतीत की कुछ बातें हमें विस्मित करती हैं। दूसरी सभ्यताओं की उपलब्धियां कम विस्मयकारी नहीं रही हैं परन्तु वे भव्यता, विराटता के कारण अधिक रही हैं जिसका दूसरा पक्ष रहा है सामान्य जनता का उसी क्रूरता से दोहन, उत्पीड़न, और असहायता। भारत में स्थिति ठीक इसके विपरीत दिखाई देती है। इसकी विस्मयकारी उपलब्धियां चिंतन, दर्शन, विज्ञान की सैद्धान्तिकी के क्षेत्र में और सकल संपदा के अधिक न्यायसंगत वितरण, तकनीक और कौशल के व्यापक उपयोगितावादी विनियोजन और दूसरी सभ्यताओं की तुलना में विस्मयकारी समृद्धि के होते हुए भी आर्थिक परिपक्वता में दिखाई देती है जिन सभी के पीछे इसकी विश्वदृष्टि और जीवनदृष्टि है।

इन पहलुओं पर मेरा ध्यान इसलिए गया कि मैंने देखा सैद्धांतिक विवेचन में उनकी उपलब्धियां आधुनिक युग से पहले दूसरों के लिए अकल्पनीय थीं। यहां तक कि कुछ शताब्दी पहले तक भी शेष जगत को अविश्वसनीय सी लगती थी और इसलिए इन पर ध्यान देने की बजाय, इनमें से कुछ
की उपेक्षा की जाती थी और शेष का उपहास किया जाता था। और उनकी पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त करने वाले और ऊंची हैसियत रखने वाले विद्वान इस अतिरंजना पर शर्म से पानी पानी हो जाते थे और उसी शिक्षा प्रणाली द्वारा और उन्हीं पुस्तकों के अध्ययन से ज्ञान अर्जित करने वाले हम सबके मन में ऐसे ही विचार पैदा होते रहे हैं।

उदाहरण के लिए गति की सापेक्षता का सिद्धांत जिसके अनुसार यदि किसी गतिमान पिंड पर स्थित या वाहन पर बैठे हुए हैं तो अचल वस्तु या पिंड गतिमान प्रतीत होगा और आप और आप का वाहन अचल।

खगोलीय स्तर पर पहुंचने पर इसके बहुत विस्मयकारी परिणाम होते हैं। यह अनायास नहीं है कि भारत ने वैदिक काल में ही यह जान लिया था कि धरती गोल है और साथ ही कई गतियों से गतिशील है । संभवतः ग्रहों और उपग्रहों दृष्टिगोचर होने के समय और सप्तर्षि की स्थिति के अध्ययन से वे इस परिणाम पर भी पहुंचे थे कि सभी पिंड स्थिर नहीं हैं, गतिशील है – विवर्तेते अहनी चक्रियेव ।

इसी तरह पदार्थ और काल के सूक्ष्मतम अंशों और विभागो तथा वृहत्तम संख्याओं को देख कर जिनका उपयोग ज्योतिर्विज्ञान में ही हो सकता था, लोग इसका उपहास करते थे। काल की सापेक्षता उस तरह के साधनों, यंत्रों और सुविधाओं का अभाव होते हुए जो आज उपलब्ध है कैसे इस नतीजे पर पहुंच गए कि काल सापेक्ष है। मनुष्य के एक दिन, देवों के (जिसका अर्थ है ज्योतिर्मान पिंडों के) एक दिन और ब्रह्मा के एक दिन में सापेक्षतः अकल्पनीय अंतर है। यह आइंस्टाइन से पहले किसी के चिंतन का हिस्सा नहीं रहा। परंतु आइंस्टाइन ने भी यह निष्कर्ष गणितीय आधार पर निकाला था न कि दूरदर्शी यंत्रों के माध्यम से ब्रह्मांड को देख कर।

मेरी जानकारी में किसी अन्य देश या समाज के चिंतकों ने पहले कभी नहीं सोचा था कि काल और दिक् के बीच सापेक्षिक संबंध है, न ही यह कि केवल हमारा जीवन ही नश्वर नहीं है, समस्त ब्रह्मांड महाकाल द्वारा अनुक्षण विनष्ट किया जा रहा है। प्रत्येक वस्तु यहां तक की ग्रह पिंड और सूर्य चंद्रमा भी विनाश की विभिन्न अवस्थाओं में हैं। यह अवधारणा महाकाल के दिव्य रूप में जितनी स्पष्ट है वह चकित करने वाली है।

यह सोच कहां से आई, कैसे पैदा हुई यह मेरी समझ में नहीं आता है । कारण यह है कि हमारे ज्ञान साहित्य का बहुत बड़ा अंश मनोविक्षिप्तों द्वारा नष्ट कर दिया गया। उस इतिहास को दोहराने की आवश्यकता नहीं। इसलिए नष्ट प्रासाद के मलबे में से हमें जहां-तहां से कुछ कीमती रत्न और चिन्दियां मिलती हैं, कुछ चौंकाने वाली सूचनाएं मिलती हैं, जिनको आगे पीछे से हम जोड़ नहीं पाते इसलिए आविश्वास करने को मजबूर हो जाते हैं ।

चीन को इस तरह के दुर्भाग्य से गुजारना नहीं पड़ा, इसलिए उसका जो कुछ था, उससे भी अधिक बढ़-चढ़कर वहां के कम्युनिस्ट इतिहासकार दावा करते रहे, जिसका परिणाम है साइंस ऐंड सिविलाइजेशन इन चाइना जिसके खंडों की सही संख्या तक का ज्ञान मुझे नहीं।

हमारे अधिकांश प्रतिभाशाली तरुण मार्क्सवाद के सुनहले आकर्षण से अपने को रोक नहीं सकते थे, परंतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लीग के प्रभाव में आ जाने के कारण उपेक्षा और उपहास द्वारा इतिहास के इन साक्ष्यों को भी नष्ट करने के लिए कृतसंकल्प रही और उसका असर हम सभी पर है। हम परंपरा विमुख बुद्धिजीवी अपने अतीत को समझने की जगह उस इतिहास के धनात्मक पक्ष का भी उपहास करने लगे।

मुझे अपने विचारों को आपके समक्ष रखते हुए भी बहुत संकोच होता है, क्योंकि भाजपा में ब्राह्मणवाद प्रबल है और इससे जुड़े लोग देवता से लेकर इतिहास तक को भुनाने के लिए किसी सीमा तक पहुंचने के लिए आतुर रहते हैं । यह हमारा दायित्व है जैसे ब्राहमणवादी चंगुल से शिक्षा को बाहर लाने में सफल हुए उसी तरह अपने इतिहास को भी उनके चंगुल से बाहर रखते हुए उसकी सही समझ विकसित करें।

Post – 2018-03-26

टिप्पणी -2

भारतीय अतीत की कुछ बातें हमें विस्मित करती हैं। दूसरी सभ्यताओं की उपलब्धियां कम विस्मयकारी नहीं रही हैं परन्तु वे भव्यता, विराटता के कारण अधिक रही हैं जिसका दूसरा पक्ष रहा है सामान्य जनता का उसी क्रूरता से दोहन, उत्पीड़न, और असहायता। भारत में स्थिति ठीक इसके विपरीत दिखाई देती है। इसकी विस्मयकारी उपलब्धियां चिंतन, दर्शन, विज्ञान की सैद्धान्तिकी के क्षेत्र में और सकल संपदा के अधिक न्यायसंगत वितरण, तकनीक और कौशल के व्यापक उपयोगितावादी विनियोजन और दूसरी सभ्यताओं की तुलना में विस्मयकारी समृद्धि के होते हुए भी आर्थिक परिपक्वता में दिखाई देती है जिन सभी के पीछे इसकी विश्वदृष्टि और जीवनदृष्टि है।

इन पहलुओं पर मेरा ध्यान इसलिए गया कि मैंने देखा सैद्धांतिक विवेचन में उनकी उपलब्धियां आधुनिक युग से पहले दूसरों के लिए अकल्पनीय थीं। यहां तक कि कुछ शताब्दी पहले तक भी शेष जगत को अविश्वसनीय सी लगती थी और इसलिए इन पर ध्यान देने की बजाय, इनमें से कुछ
की उपेक्षा की जाती थी और शेष का उपहास किया जाता था। और उनकी पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त करने वाले और ऊंची हैसियत रखने वाले विद्वान इस अतिरंजना पर शर्म से पानी पानी हो जाते थे और उसी शिक्षा प्रणाली द्वारा और उन्हीं पुस्तकों के अध्ययन से ज्ञान अर्जित करने वाले हम सबके मन में ऐसे ही विचार पैदा होते रहे हैं।

उदाहरण के लिए गति की सापेक्षता का सिद्धांत जिसके अनुसार यदि किसी गतिमान पिंड पर स्थित या वाहन पर बैठे हुए हैं तो अचल वस्तु या पिंड गतिमान प्रतीत होगा और आप और आप का वाहन अचल।

खगोलीय स्तर पर पहुंचने पर इसके बहुत विस्मयकारी परिणाम होते हैं। यह अनायास नहीं है कि भारत ने वैदिक काल में ही यह जान लिया था कि धरती गोल है और साथ ही कई गतियों से गतिशील है । संभवतः ग्रहों और उपग्रहों दृष्टिगोचर होने के समय और सप्तर्षि की स्थिति के अध्ययन से वे इस परिणाम पर भी पहुंचे थे कि सभी पिंड स्थिर नहीं हैं, गतिशील है – विवर्तेते अहनी चक्रियेव ।

इसी तरह पदार्थ और काल के सूक्ष्मतम अंशों और विभागो तथा वृहत्तम संख्याओं को देख कर जिनका उपयोग ज्योतिर्विज्ञान में ही हो सकता था, लोग इसका उपहास करते थे। काल की सापेक्षता उस तरह के साधनों, यंत्रों और सुविधाओं का अभाव होते हुए जो आज उपलब्ध है कैसे इस नतीजे पर पहुंच गए कि काल सापेक्ष है। मनुष्य के एक दिन, देवों के (जिसका अर्थ है ज्योतिर्मान पिंडों के) एक दिन और ब्रह्मा के एक दिन में सापेक्षतः अकल्पनीय अंतर है। यह आइंस्टाइन से पहले किसी के चिंतन का हिस्सा नहीं रहा। परंतु आइंस्टाइन ने भी यह निष्कर्ष गणितीय आधार पर निकाला था न कि दूरदर्शी यंत्रों के माध्यम से ब्रह्मांड को देख कर।

मेरी जानकारी में किसी अन्य देश या समाज के चिंतकों ने पहले कभी नहीं सोचा था कि काल और दिक् के बीच सापेक्षिक संबंध है, न ही यह कि केवल हमारा जीवन ही नश्वर नहीं है, समस्त ब्रह्मांड महाकाल द्वारा अनुक्षण विनष्ट किया जा रहा है। प्रत्येक वस्तु यहां तक की ग्रह पिंड और सूर्य चंद्रमा भी विनाश की विभिन्न अवस्थाओं में हैं। यह अवधारणा महाकाल के दिव्य रूप में जितनी स्पष्ट है वह चकित करने वाली है।

यह सोच कहां से आई, कैसे पैदा हुई यह मेरी समझ में नहीं आता है । कारण यह है कि हमारे ज्ञान साहित्य का बहुत बड़ा अंश मनोविक्षिप्तों द्वारा नष्ट कर दिया गया। उस इतिहास को दोहराने की आवश्यकता नहीं। इसलिए नष्ट प्रासाद के मलबे में से हमें जहां-तहां से कुछ कीमती रत्न और चिन्दियां मिलती हैं, कुछ चौंकाने वाली सूचनाएं मिलती हैं, जिनको आगे पीछे से हम जोड़ नहीं पाते इसलिए आविश्वास करने को मजबूर हो जाते हैं ।

चीन को इस तरह के दुर्भाग्य से गुजारना नहीं पड़ा, इसलिए उसका जो कुछ था, उससे भी अधिक बढ़-चढ़कर वहां के कम्युनिस्ट इतिहासकार दावा करते रहे, जिसका परिणाम है साइंस ऐंड सिविलाइजेशन इन चाइना जिसके खंडों की सही संख्या तक का ज्ञान मुझे नहीं।

हमारे अधिकांश प्रतिभाशाली तरुण मार्क्सवाद के सुनहले आकर्षण से अपने को रोक नहीं सकते थे, परंतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लीग के प्रभाव में आ जाने के कारण उपेक्षा और उपहास द्वारा इतिहास के इन साक्ष्यों को भी नष्ट करने के लिए कृतसंकल्प रही और उसका असर हम सभी पर है। हम परंपरा विमुख बुद्धिजीवी अपने अतीत को समझने की जगह उस इतिहास के धनात्मक पक्ष का भी उपहास करने लगे।

मुझे अपने विचारों को आपके समक्ष रखते हुए भी बहुत संकोच होता है, क्योंकि भाजपा में ब्राह्मणवाद प्रबल है और इससे जुड़े लोग देवता से लेकर इतिहास तक को भुनाने के लिए किसी सीमा तक पहुंचने के लिए आतुर रहते हैं । यह हमारा दायित्व है जैसे ब्राहमणवादी चंगुल से शिक्षा को बाहर लाने में सफल हुए उसी तरह अपने इतिहास को भी उनके चंगुल से बाहर रखते हुए उसकी सही समझ विकसित करें।

Post – 2018-03-26

आज की पोस्ट लिख सका तो शाम को लिखूंगा, परंतु इस समय मैं तीन छोटी छोटी टिप्पणियां तीन अलग अलग पोस्टों के माध्यम से करना चाहता हूंः पहली कल स्मृति पर अधिक भरोसा करने से हुई एक त्रुटि को लेकर। दूसरी भारतीय मनीषा की दिक-काल विषयक विस्मयकारी उपलब्धियों को लेकर और तीसरी भारत सरकार की शिक्षानीति को लेकर।

एक
कल की मेरी पोस्ट में स्वर्ग की मेरी जानकारी में सबसे प्राचीन हवाला ऋग्वेद के नवें मंडल के 114 वें सूक्त अाया है जब कि सूक्त की संख्या 113 है और ऋचाएं निम्न प्रकार हैंः
यत्र ज्योतिः अजस्रः यस्मिन् लोके स्वर् हितम्।
तस्मिन् मां धेहि पवमान अमृते लोके अक्षित, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।।
यत्र राजा वैवस्वतो यत्र आरोधनं दिवः।
यत्र अमूः यह्वतीः आपः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र अनुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः।
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र कामा निकामाश्च यत्र ब्रध्नस्य विष्टपः।
स्वधाः च यत्र तृप्तिः च तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र आनन्दाः च मोदाः च मुदः प्रमुद आसते।
कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र मां अमृतं कृधि, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।। 9.113.7-11

ऋग्वेद का जो भी अनुवाद आपको सुलभ हो उससे इन ऋचाओं का अर्थ समझें और पश्चिमी जगत और स्वयं अपनी बाद के कालों की स्वर्ग की अवधारणा से इसकी तुलना करें और सभ्यता के चिरत्र को समझने का प्रयत्न करें।

Post – 2018-03-26

आज की पोस्ट लिख सका तो शाम को लिखूंगा, परंतु इस समय मैं तीन छोटी छोटी टिप्पणियां तीन अलग अलग पोस्टों के माध्यम से करना चाहता हूंः पहली कल स्मृति पर अधिक भरोसा करने से हुई एक त्रुटि को लेकर। दूसरी भारतीय मनीषा की दिक-काल विषयक विस्मयकारी उपलब्धियों को लेकर और तीसरी भारत सरकार की शिक्षानीति को लेकर।

एक
कल की मेरी पोस्ट में स्वर्ग की मेरी जानकारी में सबसे प्राचीन हवाला ऋग्वेद के नवें मंडल के 114 वें सूक्त अाया है जब कि सूक्त की संख्या 113 है और ऋचाएं निम्न प्रकार हैंः
यत्र ज्योतिः अजस्रः यस्मिन् लोके स्वर् हितम्।
तस्मिन् मां धेहि पवमान अमृते लोके अक्षित, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।।
यत्र राजा वैवस्वतो यत्र आरोधनं दिवः।
यत्र अमूः यह्वतीः आपः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र अनुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः।
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र कामा निकामाश्च यत्र ब्रध्नस्य विष्टपः।
स्वधाः च यत्र तृप्तिः च तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र आनन्दाः च मोदाः च मुदः प्रमुद आसते।
कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र मां अमृतं कृधि, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।। 9.113.7-11

ऋग्वेद का जो भी अनुवाद आपको सुलभ हो उससे इन ऋचाओं का अर्थ समझें और पश्चिमी जगत और स्वयं अपनी बाद के कालों की स्वर्ग की अवधारणा से इसकी तुलना करें और सभ्यता के चिरत्र को समझने का प्रयत्न करें।