Post – 2018-03-26

आज की पोस्ट लिख सका तो शाम को लिखूंगा, परंतु इस समय मैं तीन छोटी छोटी टिप्पणियां तीन अलग अलग पोस्टों के माध्यम से करना चाहता हूंः पहली कल स्मृति पर अधिक भरोसा करने से हुई एक त्रुटि को लेकर। दूसरी भारतीय मनीषा की दिक-काल विषयक विस्मयकारी उपलब्धियों को लेकर और तीसरी भारत सरकार की शिक्षानीति को लेकर।

एक
कल की मेरी पोस्ट में स्वर्ग की मेरी जानकारी में सबसे प्राचीन हवाला ऋग्वेद के नवें मंडल के 114 वें सूक्त अाया है जब कि सूक्त की संख्या 113 है और ऋचाएं निम्न प्रकार हैंः
यत्र ज्योतिः अजस्रः यस्मिन् लोके स्वर् हितम्।
तस्मिन् मां धेहि पवमान अमृते लोके अक्षित, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।।
यत्र राजा वैवस्वतो यत्र आरोधनं दिवः।
यत्र अमूः यह्वतीः आपः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र अनुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः।
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तः तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र कामा निकामाश्च यत्र ब्रध्नस्य विष्टपः।
स्वधाः च यत्र तृप्तिः च तत्र मां अमृतं कृधि …..।।
यत्र आनन्दाः च मोदाः च मुदः प्रमुद आसते।
कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र मां अमृतं कृधि, इन्द्राय इन्दो परिस्रव ।। 9.113.7-11

ऋग्वेद का जो भी अनुवाद आपको सुलभ हो उससे इन ऋचाओं का अर्थ समझें और पश्चिमी जगत और स्वयं अपनी बाद के कालों की स्वर्ग की अवधारणा से इसकी तुलना करें और सभ्यता के चिरत्र को समझने का प्रयत्न करें।

Post – 2018-03-25

हमारी भाषा (११)
चमकता हुआ अंधेरा (ख )

काला, काली,कलंक, कल्मष, कोयला, कोयल, आदि पर ध्यान देने पर इस विषयमें संदेह नहीं रह जाता कि इनका प्रयोग जिन आशयों में आज होता है वे आशय इनसे आरंभ से ही जुड़े रहे होंगे? हम यह नहीं जानते कि इन शब्दों के आशय इनसे कब से जुड़े हैं इसलिए यह मान सकते हैं कालिमा का भाव इन शब्दों के साथ आरंभ से ही जुड़ा रहा होगा। हमारी समस्या यह है कि इनसे कोई ध्वनि पैदा नहीं होली इसलिए इनके नामकरण में किसकी ध्वनि को आधार बनाया गया होगा और उसकी तार्किक संगति क्या हो सकती है? हम यह तो नहीं मान सकते कि कोयल की कूक के आधार पर उसका नामकरण – कोकिल या कोयल (कोइलरि)रखा गया होगा और उसके रंग के कारण उस नाम के आधार पर उनकी संज्ञाएं नियत की गई होंगी।

कारण एक तो इनकी संकल्पनाएँ भिन्न हैं दुसरे काल। उदाहरण के लिए काली का रंग काला है पर संकल्पना का आधार और चरण भिन्न है। यह काल की अवधारणा का मातृप्रधान समुदायों में आनयन है। काल दिन और काली रात । यम दिन और यमी रात। दिन प्रकाशित और रात काली। यह चेतना हमारे समाज में निरन्तर बनी रही है, इसलिए काल को विवस्वान या सूर्य माना ही जाता है, दुर्गा सप्तशती मे काली का वर्णन कालाभ्राभाम कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुलेखां (काल-अभ्र-आभां कटाक्षै: अरिकुलभयदां मौलिबद्ध इन्दुलेखां ) के रूप में किया गया है। यह एक रोचक धज है और एक रोचक ऐतिहासिक विकासयात्रा से जुड़ी है इसलिए मुझे इस पर कुछ विस्तार से अपनी बात कहनी होगी क्योंकि मैं स्वयं भी इससे पहले जो कुछ सोचता रहा हूं वह अब गलत लग रहा है।

यम और यमी की कथा ऋग्वेद में है। यामायन सूक्तों (ऋ. १०.१४-१८) से भी स्पष्ट है कि यमलोक या मरणोत्तर एक ऐसे लोक की जिसमे अजस्र ज्योति है और जिसमें द्वार्ग है, आनंद और मोद है कल्पना (ऋ ९.११४) थी। नरक की भी रही होगी यद्यपि, मेरी जानकारी में अंध तमस से भरे लोक की कल्पना उपनिषत काल से पहले नहीं मिलती (अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः। )

हमारा यह अनुमान है कि काल का वह विकराल रूप जो गीता में विश्वरूप में चित्रित है और काली का वह विकराल रूप जो कपालिनी में देखने में आता है, वह उस भयानक दौर के बाद विकसित हुआ जो हडप्पा के पराभव का कारण बना था जिसमे भारतीय चिंतन में निर्णायक मोड़ आया था। पंचतंत्र में वराहमिहिर द्वारा की गई एक ग्रह दशा का हवाला है जिसमें धरती मुंडमाल पहने राख लपेटे कराल रूप में चित्रित की गई है धरती ही चारों दिशाओं के कारण चतुर्भुजी, चार दिशा-कोणों के जुटने के साथ अष्टभुजा और नीचे ऊपर को भी दिग के रूप में जोड़ने के बाद दशभुजी हो जाती है, वही मातृदेवी भी है यह ऋग्वेद में बहुत स्पष्ट है – यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः – और चंडी कालिका की अवधारणा उस भीषण अकाल के बाद पैदा हुई जिसका चित्रण वैदिककालीन आपदा के रूप मे महाभारत में भी हुआ है -ऐसा मेरा ख्याल इस लेख के दौर में बना क्योंकि काल का ऐसा भयानक रूप इससे पहले के साहित्य में मुझे दिखाई नही देता, न ही काली का विकराल रूप पहले नज़र आता है।

हम केवल इतना जोड़ना चाहेंगे कि काले का काली से संबंध दिन रात के अंतर के कारण है। काल यदि अजस्र ज्योति से भरा है तो उसका काले रंग से सम्बन्ध नहीं हो सकता और फिर जो सीमा रंग की है वही काल की है। ध्वनि तो इसमें भी नहीं होती। इसलिए पुनः हमें जल की कल कल ध्वनि का ही सहारा रह जाता है जो पहले जलवाची बना और फिर जिसका उपयोग प्रकाश और इसके निषेध के दोनों आशयों के लिए उपयोग होने लगा। कल का जलर्थक प्रयोग कलेवा, कमल-शान्ति, विकलता (जल बिन मीन की दशा), क्लेद, क्लेश, कलवार, अं. क्ले, क्लाउड आदि में मिलेगा।

यह भी कम रोचक नहीं है कि कोयले के लिए भी अंगार शब्द का प्रयोग होता रहा है और दहकते काठ के लिए भी।

आज हम न काल में समाहित दिक की भारतीय सूझ का विस्तार से विवेचन कर सके जो आइन्स्टाइन से पहले अकल्पनीय थी न अन्धकार के दूसरे पर्यायों को ले सके।
(असमाप्त)

Post – 2018-03-25

हमारी भाषा (११)
चमकता हुआ अंधेरा (ख )

काला, काली,कलंक, कल्मष, कोयला, कोयल, आदि पर ध्यान देने पर इस विषयमें संदेह नहीं रह जाता कि इनका प्रयोग जिन आशयों में आज होता है वे आशय इनसे आरंभ से ही जुड़े रहे होंगे? हम यह नहीं जानते कि इन शब्दों के आशय इनसे कब से जुड़े हैं इसलिए यह मान सकते हैं कालिमा का भाव इन शब्दों के साथ आरंभ से ही जुड़ा रहा होगा। हमारी समस्या यह है कि इनसे कोई ध्वनि पैदा नहीं होली इसलिए इनके नामकरण में किसकी ध्वनि को आधार बनाया गया होगा और उसकी तार्किक संगति क्या हो सकती है? हम यह तो नहीं मान सकते कि कोयल की कूक के आधार पर उसका नामकरण – कोकिल या कोयल (कोइलरि)रखा गया होगा और उसके रंग के कारण उस नाम के आधार पर उनकी संज्ञाएं नियत की गई होंगी।

कारण एक तो इनकी संकल्पनाएँ भिन्न हैं दुसरे काल। उदाहरण के लिए काली का रंग काला है पर संकल्पना का आधार और चरण भिन्न है। यह काल की अवधारणा का मातृप्रधान समुदायों में आनयन है। काल दिन और काली रात । यम दिन और यमी रात। दिन प्रकाशित और रात काली। यह चेतना हमारे समाज में निरन्तर बनी रही है, इसलिए काल को विवस्वान या सूर्य माना ही जाता है, दुर्गा सप्तशती मे काली का वर्णन कालाभ्राभाम कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुलेखां (काल-अभ्र-आभां कटाक्षै: अरिकुलभयदां मौलिबद्ध इन्दुलेखां ) के रूप में किया गया है। यह एक रोचक धज है और एक रोचक ऐतिहासिक विकासयात्रा से जुड़ी है इसलिए मुझे इस पर कुछ विस्तार से अपनी बात कहनी होगी क्योंकि मैं स्वयं भी इससे पहले जो कुछ सोचता रहा हूं वह अब गलत लग रहा है।

यम और यमी की कथा ऋग्वेद में है। यामायन सूक्तों (ऋ. १०.१४-१८) से भी स्पष्ट है कि यमलोक या मरणोत्तर एक ऐसे लोक की जिसमे अजस्र ज्योति है और जिसमें द्वार्ग है, आनंद और मोद है कल्पना (ऋ ९.११४) थी। नरक की भी रही होगी यद्यपि, मेरी जानकारी में अंध तमस से भरे लोक की कल्पना उपनिषत काल से पहले नहीं मिलती (अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः। )

हमारा यह अनुमान है कि काल का वह विकराल रूप जो गीता में विश्वरूप में चित्रित है और काली का वह विकराल रूप जो कपालिनी में देखने में आता है, वह उस भयानक दौर के बाद विकसित हुआ जो हडप्पा के पराभव का कारण बना था जिसमे भारतीय चिंतन में निर्णायक मोड़ आया था। पंचतंत्र में वराहमिहिर द्वारा की गई एक ग्रह दशा का हवाला है जिसमें धरती मुंडमाल पहने राख लपेटे कराल रूप में चित्रित की गई है धरती ही चारों दिशाओं के कारण चतुर्भुजी, चार दिशा-कोणों के जुटने के साथ अष्टभुजा और नीचे ऊपर को भी दिग के रूप में जोड़ने के बाद दशभुजी हो जाती है, वही मातृदेवी भी है यह ऋग्वेद में बहुत स्पष्ट है – यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः – और चंडी कालिका की अवधारणा उस भीषण अकाल के बाद पैदा हुई जिसका चित्रण वैदिककालीन आपदा के रूप मे महाभारत में भी हुआ है -ऐसा मेरा ख्याल इस लेख के दौर में बना क्योंकि काल का ऐसा भयानक रूप इससे पहले के साहित्य में मुझे दिखाई नही देता, न ही काली का विकराल रूप पहले नज़र आता है।

हम केवल इतना जोड़ना चाहेंगे कि काले का काली से संबंध दिन रात के अंतर के कारण है। काल यदि अजस्र ज्योति से भरा है तो उसका काले रंग से सम्बन्ध नहीं हो सकता और फिर जो सीमा रंग की है वही काल की है। ध्वनि तो इसमें भी नहीं होती। इसलिए पुनः हमें जल की कल कल ध्वनि का ही सहारा रह जाता है जो पहले जलवाची बना और फिर जिसका उपयोग प्रकाश और इसके निषेध के दोनों आशयों के लिए उपयोग होने लगा। कल का जलर्थक प्रयोग कलेवा, कमल-शान्ति, विकलता (जल बिन मीन की दशा), क्लेद, क्लेश, कलवार, अं. क्ले, क्लाउड आदि में मिलेगा।

यह भी कम रोचक नहीं है कि कोयले के लिए भी अंगार शब्द का प्रयोग होता रहा है और दहकते काठ के लिए भी।

आज हम न काल में समाहित दिक की भारतीय सूझ का विस्तार से विवेचन कर सके जो आइन्स्टाइन से पहले अकल्पनीय थी न अन्धकार के दूसरे पर्यायों को ले सके।
(असमाप्त)

Post – 2018-03-25

हमारी भाषा (११)
चमकता हुआ अंधेरा (ख )

काला, काली,कलंक, कल्मष, कोयला, कोयल, आदि पर ध्यान देने पर इस विषयमें संदेह नहीं रह जाता कि इनका प्रयोग जिन आशयों में आज होता है वे आशय इनसे आरंभ से ही जुड़े रहे होंगे? हम यह नहीं जानते कि इन शब्दों के आशय इनसे कब से जुड़े हैं इसलिए यह मान सकते हैं कालिमा का भाव इन शब्दों के साथ आरंभ से ही जुड़ा रहा होगा। हमारी समस्या यह है कि इनसे कोई ध्वनि पैदा नहीं होली इसलिए इनके नामकरण में किसकी ध्वनि को आधार बनाया गया होगा और उसकी तार्किक संगति क्या हो सकती है? हम यह तो नहीं मान सकते कि कोयल की कूक के आधार पर उसका नामकरण – कोकिल या कोयल (कोइलरि)रखा गया होगा और उसके रंग के कारण उस नाम के आधार पर उनकी संज्ञाएं नियत की गई होंगी।

कारण एक तो इनकी संकल्पनाएँ भिन्न हैं दुसरे काल। उदाहरण के लिए काली का रंग काला है पर संकल्पना का आधार और चरण भिन्न है। यह काल की अवधारणा का मातृप्रधान समुदायों में आनयन है। काल दिन और काली रात । यम दिन और यमी रात। दिन प्रकाशित और रात काली। यह चेतना हमारे समाज में निरन्तर बनी रही है, इसलिए काल को विवस्वान या सूर्य माना ही जाता है, दुर्गा सप्तशती मे काली का वर्णन कालाभ्राभाम कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुलेखां (काल-अभ्र-आभां कटाक्षै: अरिकुलभयदां मौलिबद्ध इन्दुलेखां ) के रूप में किया गया है। यह एक रोचक धज है और एक रोचक ऐतिहासिक विकासयात्रा से जुड़ी है इसलिए मुझे इस पर कुछ विस्तार से अपनी बात कहनी होगी क्योंकि मैं स्वयं भी इससे पहले जो कुछ सोचता रहा हूं वह अब गलत लग रहा है।

यम और यमी की कथा ऋग्वेद में है। यामायन सूक्तों (ऋ. १०.१४-१८) से भी स्पष्ट है कि यमलोक या मरणोत्तर एक ऐसे लोक की जिसमे अजस्र ज्योति है और जिसमें द्वार्ग है, आनंद और मोद है कल्पना (ऋ ९.११४) थी। नरक की भी रही होगी यद्यपि, मेरी जानकारी में अंध तमस से भरे लोक की कल्पना उपनिषत काल से पहले नहीं मिलती (अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः। )

हमारा यह अनुमान है कि काल का वह विकराल रूप जो गीता में विश्वरूप में चित्रित है और काली का वह विकराल रूप जो कपालिनी में देखने में आता है, वह उस भयानक दौर के बाद विकसित हुआ जो हडप्पा के पराभव का कारण बना था जिसमे भारतीय चिंतन में निर्णायक मोड़ आया था। पंचतंत्र में वराहमिहिर द्वारा की गई एक ग्रह दशा का हवाला है जिसमें धरती मुंडमाल पहने राख लपेटे कराल रूप में चित्रित की गई है धरती ही चारों दिशाओं के कारण चतुर्भुजी, चार दिशा-कोणों के जुटने के साथ अष्टभुजा और नीचे ऊपर को भी दिग के रूप में जोड़ने के बाद दशभुजी हो जाती है, वही मातृदेवी भी है यह ऋग्वेद में बहुत स्पष्ट है – यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः – और चंडी कालिका की अवधारणा उस भीषण अकाल के बाद पैदा हुई जिसका चित्रण वैदिककालीन आपदा के रूप मे महाभारत में भी हुआ है -ऐसा मेरा ख्याल इस लेख के दौर में बना क्योंकि काल का ऐसा भयानक रूप इससे पहले के साहित्य में मुझे दिखाई नही देता, न ही काली का विकराल रूप पहले नज़र आता है।

हम केवल इतना जोड़ना चाहेंगे कि काले का काली से संबंध दिन रात के अंतर के कारण है। काल यदि अजस्र ज्योति से भरा है तो उसका काले रंग से सम्बन्ध नहीं हो सकता और फिर जो सीमा रंग की है वही काल की है। ध्वनि तो इसमें भी नहीं होती। इसलिए पुनः हमें जल की कल कल ध्वनि का ही सहारा रह जाता है जो पहले जलवाची बना और फिर जिसका उपयोग प्रकाश और इसके निषेध के दोनों आशयों के लिए उपयोग होने लगा। कल का जलर्थक प्रयोग कलेवा, कमल-शान्ति, विकलता (जल बिन मीन की दशा), क्लेद, क्लेश, कलवार, अं. क्ले, क्लाउड आदि में मिलेगा।

यह भी कम रोचक नहीं है कि कोयले के लिए भी अंगार शब्द का प्रयोग होता रहा है और दहकते काठ के लिए भी।

आज हम न काल में समाहित दिक की भारतीय सूझ का विस्तार से विवेचन कर सके जो आइन्स्टाइन से पहले अकल्पनीय थी न अन्धकार के दूसरे पर्यायों को ले सके।
(असमाप्त)

Post – 2018-03-24

चमकता हुआ अंधेरा
(इस लेख में पहले लिखे लेखों के आंकड़ों का उपयोग करूंगा)

आपने अभी इस बात पर सोचा है जान दिया है ध्यान दिया है की अंधेरे के लिए हमारी भाषा में कोई अलग शब्द नहीं है हमने अंध की बात की थी और बताया था उसका अर्थ सोमरस (पाहि मध्वो अन्धसः) भी होता है मादक पेय (अमन्दत मघवा मध्वो अन्धसः) भी होता है और यदि जल (यद्वा समुद्रं अन्धसः) है तो कांति तो होगी ही। अन्धस उसी श्रृखला का शब्द है जिसमे अद, उद, इद, इंद, इंदु, अन्न, आदि आते हैं । यह अलग से कहने की जरूरत नहीं कि इन सबका अर्थ जल है और आप कह सकते हैं कि इंदु= चंद्रमा का अर्थ जल है, या उसकी संज्ञा जल की कांति पर आधारित है।

अंधेरे के लिए एक दूसरा शब्द तम है इसका प्रयोग ऋग्वेद में भी अंधकार के लिए हुआ तम आसीत तमसा गूढ़ं अग्रे, आरम्भ में अंधकार अंधकार में लिपटा हुआ था । परंतु तमकना, तामा / ताम्बा (ताम्र), तांबूल, तामरस से स्पष्ट है इसका अर्थ चमकने, दमकने या लालिमा है। इसकी विकास प्रक्रिया कुछ टेढ़ी है। मत, मद, मध्, मदु, मधु श्रृंखला में आता है । इसमें भी प्रत्येक शब्द का एक अर्थ जल है। मत वर्ण विपर्यय से तम बना है जल की चमक वाला भाव इसमें बना रह गया है जिसे ललौहे पदार्थों के लिए रूढ़ किया गया और फिर विरोध से अंधकार के लिए ।

मसि = स्याही या रोशनाई बनाने के लिए कालिख का प्रयोग किया जाता है। मसें भीगना =दाढ़ी मूंछ की रोमारेखा के लिए प्रयोग में आता है। जैसा कि रोशनाई से प्रकट होता है, इसमें भी रोशनी या प्रकाश का भाव है, न कि अंधेरे का । रोशनी उसी रुष से व्युत्पन्न है जैसे रोष। मस का अर्थ है ‘चमकने वाला’। इसी का मस और मास दोनों रूपों में चंद्रमा के लिए प्रयोग होता है। मास महीने के लिए रूढ़ हो चुका है जिसका अर्थ है चंद्रमा की एक परिक्रमा। मस और मास फारसी में मह और माह बन जाते हैं जिनका अर्थ चाँद होता है पर माह महीना के लिए रूढ़ सा है। अंग्रेजी में मास प्रतिरूप मंथ, मून से निकला। फारसी में चाँद के लिए महताब का भी प्रयोग होता है। सामान्यतः ताब का प्रयोग ताप और प्रताप के लिए होता है पर मह के साथ प्रयोग में आने पर इसमें गर्मी चमक बन जाती है।

यदि हम संस्कृत और अंग्रेजी में चंद्रमा के लिए प्रयुक्त चंद्र्मन पर ध्यान दें तो पता चलेगा इसमें तीन शब्द हैं। चन्+ द्र+मन् इन तीनों का एक अर्थ पानी है, दूसरा चमक है और तीसरा चंद्रमा (चन >चान, तर/तार का प्रकाश वाला भाव तर+णि और तारा की दिशा में स्थिर हुआ और मन को अंग. मून में लक्ष्य किया जा सकता है) कहें हम चंद्रमा कहते समय हम चाँद के तीन पर्यायों को मिला कर एक शब्द बना लेते हैं । परंतु चंद्रमा की संस्कृत रूपावली में मस् का प्रवेश हो जाता है चंद्रमा- चंद्रमसौ – चंद्रमसः और अब प्रकारांतर से चार शब्दों का एक साथ प्रयोग करते हैं।

अन्धकार का एक पर्याय है तिमिर । इसमें प्रयुक्त तिम का अर्थ जल है जिससे तिमिंगल = मत्स्य, महामत्स्य निकला है। इसका प्रकाश का भाव टिमटिमाना, टीम-टाम, टीमल- सुन्दर, में बचा रह गया है. (असमाप्त)

Post – 2018-03-24

चमकता हुआ अंधेरा
(इस लेख में पहले लिखे लेखों के आंकड़ों का उपयोग करूंगा)

आपने अभी इस बात पर सोचा है जान दिया है ध्यान दिया है की अंधेरे के लिए हमारी भाषा में कोई अलग शब्द नहीं है हमने अंध की बात की थी और बताया था उसका अर्थ सोमरस (पाहि मध्वो अन्धसः) भी होता है मादक पेय (अमन्दत मघवा मध्वो अन्धसः) भी होता है और यदि जल (यद्वा समुद्रं अन्धसः) है तो कांति तो होगी ही। अन्धस उसी श्रृखला का शब्द है जिसमे अद, उद, इद, इंद, इंदु, अन्न, आदि आते हैं । यह अलग से कहने की जरूरत नहीं कि इन सबका अर्थ जल है और आप कह सकते हैं कि इंदु= चंद्रमा का अर्थ जल है, या उसकी संज्ञा जल की कांति पर आधारित है।

अंधेरे के लिए एक दूसरा शब्द तम है इसका प्रयोग ऋग्वेद में भी अंधकार के लिए हुआ तम आसीत तमसा गूढ़ं अग्रे, आरम्भ में अंधकार अंधकार में लिपटा हुआ था । परंतु तमकना, तामा / ताम्बा (ताम्र), तांबूल, तामरस से स्पष्ट है इसका अर्थ चमकने, दमकने या लालिमा है। इसकी विकास प्रक्रिया कुछ टेढ़ी है। मत, मद, मध्, मदु, मधु श्रृंखला में आता है । इसमें भी प्रत्येक शब्द का एक अर्थ जल है। मत वर्ण विपर्यय से तम बना है जल की चमक वाला भाव इसमें बना रह गया है जिसे ललौहे पदार्थों के लिए रूढ़ किया गया और फिर विरोध से अंधकार के लिए ।

मसि = स्याही या रोशनाई बनाने के लिए कालिख का प्रयोग किया जाता है। मसें भीगना =दाढ़ी मूंछ की रोमारेखा के लिए प्रयोग में आता है। जैसा कि रोशनाई से प्रकट होता है, इसमें भी रोशनी या प्रकाश का भाव है, न कि अंधेरे का । रोशनी उसी रुष से व्युत्पन्न है जैसे रोष। मस का अर्थ है ‘चमकने वाला’। इसी का मस और मास दोनों रूपों में चंद्रमा के लिए प्रयोग होता है। मास महीने के लिए रूढ़ हो चुका है जिसका अर्थ है चंद्रमा की एक परिक्रमा। मस और मास फारसी में मह और माह बन जाते हैं जिनका अर्थ चाँद होता है पर माह महीना के लिए रूढ़ सा है। अंग्रेजी में मास प्रतिरूप मंथ, मून से निकला। फारसी में चाँद के लिए महताब का भी प्रयोग होता है। सामान्यतः ताब का प्रयोग ताप और प्रताप के लिए होता है पर मह के साथ प्रयोग में आने पर इसमें गर्मी चमक बन जाती है।

यदि हम संस्कृत और अंग्रेजी में चंद्रमा के लिए प्रयुक्त चंद्र्मन पर ध्यान दें तो पता चलेगा इसमें तीन शब्द हैं। चन्+ द्र+मन् इन तीनों का एक अर्थ पानी है, दूसरा चमक है और तीसरा चंद्रमा (चन >चान, तर/तार का प्रकाश वाला भाव तर+णि और तारा की दिशा में स्थिर हुआ और मन को अंग. मून में लक्ष्य किया जा सकता है) कहें हम चंद्रमा कहते समय हम चाँद के तीन पर्यायों को मिला कर एक शब्द बना लेते हैं । परंतु चंद्रमा की संस्कृत रूपावली में मस् का प्रवेश हो जाता है चंद्रमा- चंद्रमसौ – चंद्रमसः और अब प्रकारांतर से चार शब्दों का एक साथ प्रयोग करते हैं।

अन्धकार का एक पर्याय है तिमिर । इसमें प्रयुक्त तिम का अर्थ जल है जिससे तिमिंगल = मत्स्य, महामत्स्य निकला है। इसका प्रकाश का भाव टिमटिमाना, टीम-टाम, टीमल- सुन्दर, में बचा रह गया है. (असमाप्त)

Post – 2018-03-24

चमकता हुआ अंधेरा
(इस लेख में पहले लिखे लेखों के आंकड़ों का उपयोग करूंगा)

आपने अभी इस बात पर सोचा है जान दिया है ध्यान दिया है की अंधेरे के लिए हमारी भाषा में कोई अलग शब्द नहीं है हमने अंध की बात की थी और बताया था उसका अर्थ सोमरस (पाहि मध्वो अन्धसः) भी होता है मादक पेय (अमन्दत मघवा मध्वो अन्धसः) भी होता है और यदि जल (यद्वा समुद्रं अन्धसः) है तो कांति तो होगी ही। अन्धस उसी श्रृखला का शब्द है जिसमे अद, उद, इद, इंद, इंदु, अन्न, आदि आते हैं । यह अलग से कहने की जरूरत नहीं कि इन सबका अर्थ जल है और आप कह सकते हैं कि इंदु= चंद्रमा का अर्थ जल है, या उसकी संज्ञा जल की कांति पर आधारित है।

अंधेरे के लिए एक दूसरा शब्द तम है इसका प्रयोग ऋग्वेद में भी अंधकार के लिए हुआ तम आसीत तमसा गूढ़ं अग्रे, आरम्भ में अंधकार अंधकार में लिपटा हुआ था । परंतु तमकना, तामा / ताम्बा (ताम्र), तांबूल, तामरस से स्पष्ट है इसका अर्थ चमकने, दमकने या लालिमा है। इसकी विकास प्रक्रिया कुछ टेढ़ी है। मत, मद, मध्, मदु, मधु श्रृंखला में आता है । इसमें भी प्रत्येक शब्द का एक अर्थ जल है। मत वर्ण विपर्यय से तम बना है जल की चमक वाला भाव इसमें बना रह गया है जिसे ललौहे पदार्थों के लिए रूढ़ किया गया और फिर विरोध से अंधकार के लिए ।

मसि = स्याही या रोशनाई बनाने के लिए कालिख का प्रयोग किया जाता है। मसें भीगना =दाढ़ी मूंछ की रोमारेखा के लिए प्रयोग में आता है। जैसा कि रोशनाई से प्रकट होता है, इसमें भी रोशनी या प्रकाश का भाव है, न कि अंधेरे का । रोशनी उसी रुष से व्युत्पन्न है जैसे रोष। मस का अर्थ है ‘चमकने वाला’। इसी का मस और मास दोनों रूपों में चंद्रमा के लिए प्रयोग होता है। मास महीने के लिए रूढ़ हो चुका है जिसका अर्थ है चंद्रमा की एक परिक्रमा। मस और मास फारसी में मह और माह बन जाते हैं जिनका अर्थ चाँद होता है पर माह महीना के लिए रूढ़ सा है। अंग्रेजी में मास प्रतिरूप मंथ, मून से निकला। फारसी में चाँद के लिए महताब का भी प्रयोग होता है। सामान्यतः ताब का प्रयोग ताप और प्रताप के लिए होता है पर मह के साथ प्रयोग में आने पर इसमें गर्मी चमक बन जाती है।

यदि हम संस्कृत और अंग्रेजी में चंद्रमा के लिए प्रयुक्त चंद्र्मन पर ध्यान दें तो पता चलेगा इसमें तीन शब्द हैं। चन्+ द्र+मन् इन तीनों का एक अर्थ पानी है, दूसरा चमक है और तीसरा चंद्रमा (चन >चान, तर/तार का प्रकाश वाला भाव तर+णि और तारा की दिशा में स्थिर हुआ और मन को अंग. मून में लक्ष्य किया जा सकता है) कहें हम चंद्रमा कहते समय हम चाँद के तीन पर्यायों को मिला कर एक शब्द बना लेते हैं । परंतु चंद्रमा की संस्कृत रूपावली में मस् का प्रवेश हो जाता है चंद्रमा- चंद्रमसौ – चंद्रमसः और अब प्रकारांतर से चार शब्दों का एक साथ प्रयोग करते हैं।

अन्धकार का एक पर्याय है तिमिर । इसमें प्रयुक्त तिम का अर्थ जल है जिससे तिमिंगल = मत्स्य, महामत्स्य निकला है। इसका प्रकाश का भाव टिमटिमाना, टीम-टाम, टीमल- सुन्दर, में बचा रह गया है. (असमाप्त)

Post – 2018-03-23

हमारी भाषा (९)
उल्टा-सीधा एक समान

फिकरा तो पहेलियों से संबन्धित है । बच्चे आज भी बुझाते होंगे। रबर, नमन जैसे शब्द और १२१ या इसी से मिलती जुलती संख्याएं बतानी होतीं। मनोरजन होता था।

भाषा में यदि एक ही शब्द के सीधे उल्टे दुहरे अर्थ हों तो मनोरंजन नहीं होता। उलझन पैदा होती हैं । बीज वपन में वपन का अर्थ बोना हो और केश वपन में काटना हो, वप्ता के दो आशय हो जायं, बोने वाला और काटने वाला तो उलझन तो पैदा होगी। पूत का अर्थ पवित्र हो और साथ ही सड़ा हुआ भी हो और फिर उसी का अर्थ पुत्र भी हो, तो सर पीटने की नौबत तो आएगी ही। किसी एक मामले में ऐसा हो तो क्षम्य भी है, यदि ऐसे शब्दों की संख्या बहुत अधिक हो तो इसके पीछे कोई विवशता तो होगी ही कि हम इस सीमा को लांघ न पाएं और इस उलझन से बचने केलिए उस शब्द का एक ही आशय में व्यवहार करने की आदत डाल लें और यथासंभव दूसरे अर्थ में प्रयेग बन्द कर दें, फिर भी उसकी छाया बनी रह जाय।

इस बाध्यता से भाषाविज्ञान की एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान होता है। यह है वाक् और अर्थ की नैसर्गिक अभिन्नता जिसे कालिदास ने वागर्थ की संपृक्तता कहा है। इसका बोध वैदिक काल में बहुत स्पष्ट था, कवियों में बना रहा, पर वैयाकरणों में यदि लुप्त नहीं तो इतना दबा रह जाता है कि हैरानी होती है। कतिपय दूसरी बातें भी हैं जिनसे लगता है कि संस्कृत के विद्वान लोक से कट गए थे, जब कि काव्यधारा का ऐसा विलगाव गुप्तकाल के बाद ही हुआ, जब कि लोक उस परंपरा से जुड़ा रहा जिसका प्रमाण तुलसी हैं दो कालिादस से भी अधिक मार्मिकता के उसी बात को दुहराते हैंः गिरा अन्ल जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। पश्चिमी परंपरा में उसकी पुराणकथा के दबाव में यह माना जाता रहा कि जिस चीज को आदम ने जो नाम दे दिया वही उसकी संज्ञा बन गई, अर्थात् भाषा मनुष्य की मरजी से रची गई है, मनुष्य वस्तुओं, क्रियाओं और विशेषताओं के लिए शब्द विशेष का प्रयोग करने में पूरी तरह स्वतंत्र था ।

यह लंगड़ी सोच थी। इससे कई तरह के प्रश्न खड़े होते थे जिनकी अनदेखी कर दी गई। उदाहरण के लिए (१) नयी संज्ञाओं के लिए सभी भाषाओं में स्व-व्य (CVC) के कुछ लघु विन्यास उपलब्ध थे, उनका उपयोग करने की जगह लम्बे और उच्चारण में क्लिष्ट विन्यासों का चयन क्यों किया गया ? इसके विस्तार में न जाकर हम इतना ही याद दिलाना चाहेंगे कि किसी भी अन्य भाषा के एकाक्षरी या द्वयक्षरी (अल, आल, इल, किल जैसे)शब्दों को जे उसकी प्रकृति से भी मेल खाते हों सामने रख कर देखें कि मनचाहा चुनाव करने की स्थिति में उनका उपयोग संभव थ । (२) भिन्न आशयों और व्यंजनाओं के लिए पृथक शब्दों का चयन क्यों नहीं किया गया। किसी वस्तु के लिए एक संज्ञा पर्याप्त थी, उसके लिए एकाधिक पर्यायों का क्या आवश्यकता थी? (३) समनादी (homophonic) शब्दों का सहारा क्यों लेना पड़ा ? आदि। इनके समाधान भाषा को पूर्णत: मानव रचित मानने कि स्थिति में तलाशना जरूरी हो जाता है पर इसे छेड़ना भानमती का पिटारा खोलने जैसा था जिससे तुलनात्मक भाषाविज्ञान का चरित्र ही बदल जाता और सारे नतीजे उलट जाते।

ऋग्वेद का महत्व यह है कि इसमें ऐसे शब्दों की संख्या काफी बड़ी है जिनमें नैसर्गिक आशय बना रह गया है जिसका सामना होने पर हम चकित रह जाते हैं। अन्न= जल, और अनाज; अन्ध= जल, रस, सोम रस, और दृष्टिहीन; को = जल, ईश्वर, कौन; घृत= जल और घी; अमृत= जल, अमरता दायक; पीयूष =जल, अमृत, कोई पेय; मधु= जल, सोमरस, शहद; घर्म = पानी, पसीना, ऊष्ण, धूप; तेल = पानी(इस बात का कोई संकेत नहीं है कि तिलहनों की खेती होने लगी थी जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि वे तेल का सेवन करते थे। पर बाद में तेल के रूढ़ अर्थ से हम परिचित हैं); तिल्विल = नम या सिंचित; रेत =जल, मूत्र,और रेतस्; विष = जल और विष; धन= जल और धन; पुरीष =जल और मल; अर्क =जल और प्रकाश। मूत का प्रयोग नहीं हुआ है, पर जीमूत =जीवन दायक जल में स्पष्ट कि इसका एक अर्थ जल था। संख्या और बढ़ाई जा सकती है।

पाश्चात्य अनुवादकों ने जिन्होंने सायण से मदद भी ली थी और जलर्थक प्रयोगों से अवगत थे अर्थ का अनर्थ करने के लिए जान बूझ कर बाद के रूढ़ अर्थ को ही लिया है ताकि आशय भोंड़ा लगे। हम उनके अनुवाद और अनर्थ पर बात नहीं कर रहे हैं अपितु इस बात पर कि जल की ध्वनियों से भाषा की उत्पत्ति हुई।

Post – 2018-03-23

हमारी भाषा (९)
उल्टा-सीधा एक समान

फिकरा तो पहेलियों से संबन्धित है । बच्चे आज भी बुझाते होंगे। रबर, नमन जैसे शब्द और १२१ या इसी से मिलती जुलती संख्याएं बतानी होतीं। मनोरजन होता था।

भाषा में यदि एक ही शब्द के सीधे उल्टे दुहरे अर्थ हों तो मनोरंजन नहीं होता। उलझन पैदा होती हैं । बीज वपन में वपन का अर्थ बोना हो और केश वपन में काटना हो, वप्ता के दो आशय हो जायं, बोने वाला और काटने वाला तो उलझन तो पैदा होगी। पूत का अर्थ पवित्र हो और साथ ही सड़ा हुआ भी हो और फिर उसी का अर्थ पुत्र भी हो, तो सर पीटने की नौबत तो आएगी ही। किसी एक मामले में ऐसा हो तो क्षम्य भी है, यदि ऐसे शब्दों की संख्या बहुत अधिक हो तो इसके पीछे कोई विवशता तो होगी ही कि हम इस सीमा को लांघ न पाएं और इस उलझन से बचने केलिए उस शब्द का एक ही आशय में व्यवहार करने की आदत डाल लें और यथासंभव दूसरे अर्थ में प्रयेग बन्द कर दें, फिर भी उसकी छाया बनी रह जाय।

इस बाध्यता से भाषाविज्ञान की एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान होता है। यह है वाक् और अर्थ की नैसर्गिक अभिन्नता जिसे कालिदास ने वागर्थ की संपृक्तता कहा है। इसका बोध वैदिक काल में बहुत स्पष्ट था, कवियों में बना रहा, पर वैयाकरणों में यदि लुप्त नहीं तो इतना दबा रह जाता है कि हैरानी होती है। कतिपय दूसरी बातें भी हैं जिनसे लगता है कि संस्कृत के विद्वान लोक से कट गए थे, जब कि काव्यधारा का ऐसा विलगाव गुप्तकाल के बाद ही हुआ, जब कि लोक उस परंपरा से जुड़ा रहा जिसका प्रमाण तुलसी हैं दो कालिादस से भी अधिक मार्मिकता के उसी बात को दुहराते हैंः गिरा अन्ल जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। पश्चिमी परंपरा में उसकी पुराणकथा के दबाव में यह माना जाता रहा कि जिस चीज को आदम ने जो नाम दे दिया वही उसकी संज्ञा बन गई, अर्थात् भाषा मनुष्य की मरजी से रची गई है, मनुष्य वस्तुओं, क्रियाओं और विशेषताओं के लिए शब्द विशेष का प्रयोग करने में पूरी तरह स्वतंत्र था ।

यह लंगड़ी सोच थी। इससे कई तरह के प्रश्न खड़े होते थे जिनकी अनदेखी कर दी गई। उदाहरण के लिए (१) नयी संज्ञाओं के लिए सभी भाषाओं में स्व-व्य (CVC) के कुछ लघु विन्यास उपलब्ध थे, उनका उपयोग करने की जगह लम्बे और उच्चारण में क्लिष्ट विन्यासों का चयन क्यों किया गया ? इसके विस्तार में न जाकर हम इतना ही याद दिलाना चाहेंगे कि किसी भी अन्य भाषा के एकाक्षरी या द्वयक्षरी (अल, आल, इल, किल जैसे)शब्दों को जे उसकी प्रकृति से भी मेल खाते हों सामने रख कर देखें कि मनचाहा चुनाव करने की स्थिति में उनका उपयोग संभव थ । (२) भिन्न आशयों और व्यंजनाओं के लिए पृथक शब्दों का चयन क्यों नहीं किया गया। किसी वस्तु के लिए एक संज्ञा पर्याप्त थी, उसके लिए एकाधिक पर्यायों का क्या आवश्यकता थी? (३) समनादी (homophonic) शब्दों का सहारा क्यों लेना पड़ा ? आदि। इनके समाधान भाषा को पूर्णत: मानव रचित मानने कि स्थिति में तलाशना जरूरी हो जाता है पर इसे छेड़ना भानमती का पिटारा खोलने जैसा था जिससे तुलनात्मक भाषाविज्ञान का चरित्र ही बदल जाता और सारे नतीजे उलट जाते।

ऋग्वेद का महत्व यह है कि इसमें ऐसे शब्दों की संख्या काफी बड़ी है जिनमें नैसर्गिक आशय बना रह गया है जिसका सामना होने पर हम चकित रह जाते हैं। अन्न= जल, और अनाज; अन्ध= जल, रस, सोम रस, और दृष्टिहीन; को = जल, ईश्वर, कौन; घृत= जल और घी; अमृत= जल, अमरता दायक; पीयूष =जल, अमृत, कोई पेय; मधु= जल, सोमरस, शहद; घर्म = पानी, पसीना, ऊष्ण, धूप; तेल = पानी(इस बात का कोई संकेत नहीं है कि तिलहनों की खेती होने लगी थी जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि वे तेल का सेवन करते थे। पर बाद में तेल के रूढ़ अर्थ से हम परिचित हैं); तिल्विल = नम या सिंचित; रेत =जल, मूत्र,और रेतस्; विष = जल और विष; धन= जल और धन; पुरीष =जल और मल; अर्क =जल और प्रकाश। मूत का प्रयोग नहीं हुआ है, पर जीमूत =जीवन दायक जल में स्पष्ट कि इसका एक अर्थ जल था। संख्या और बढ़ाई जा सकती है।

पाश्चात्य अनुवादकों ने जिन्होंने सायण से मदद भी ली थी और जलर्थक प्रयोगों से अवगत थे अर्थ का अनर्थ करने के लिए जान बूझ कर बाद के रूढ़ अर्थ को ही लिया है ताकि आशय भोंड़ा लगे। हम उनके अनुवाद और अनर्थ पर बात नहीं कर रहे हैं अपितु इस बात पर कि जल की ध्वनियों से भाषा की उत्पत्ति हुई।

Post – 2018-03-23

हमारी भाषा (९)
उल्टा-सीधा एक समान

फिकरा तो पहेलियों से संबन्धित है । बच्चे आज भी बुझाते होंगे। रबर, नमन जैसे शब्द और १२१ या इसी से मिलती जुलती संख्याएं बतानी होतीं। मनोरजन होता था।

भाषा में यदि एक ही शब्द के सीधे उल्टे दुहरे अर्थ हों तो मनोरंजन नहीं होता। उलझन पैदा होती हैं । बीज वपन में वपन का अर्थ बोना हो और केश वपन में काटना हो, वप्ता के दो आशय हो जायं, बोने वाला और काटने वाला तो उलझन तो पैदा होगी। पूत का अर्थ पवित्र हो और साथ ही सड़ा हुआ भी हो और फिर उसी का अर्थ पुत्र भी हो, तो सर पीटने की नौबत तो आएगी ही। किसी एक मामले में ऐसा हो तो क्षम्य भी है, यदि ऐसे शब्दों की संख्या बहुत अधिक हो तो इसके पीछे कोई विवशता तो होगी ही कि हम इस सीमा को लांघ न पाएं और इस उलझन से बचने केलिए उस शब्द का एक ही आशय में व्यवहार करने की आदत डाल लें और यथासंभव दूसरे अर्थ में प्रयेग बन्द कर दें, फिर भी उसकी छाया बनी रह जाय।

इस बाध्यता से भाषाविज्ञान की एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान होता है। यह है वाक् और अर्थ की नैसर्गिक अभिन्नता जिसे कालिदास ने वागर्थ की संपृक्तता कहा है। इसका बोध वैदिक काल में बहुत स्पष्ट था, कवियों में बना रहा, पर वैयाकरणों में यदि लुप्त नहीं तो इतना दबा रह जाता है कि हैरानी होती है। कतिपय दूसरी बातें भी हैं जिनसे लगता है कि संस्कृत के विद्वान लोक से कट गए थे, जब कि काव्यधारा का ऐसा विलगाव गुप्तकाल के बाद ही हुआ, जब कि लोक उस परंपरा से जुड़ा रहा जिसका प्रमाण तुलसी हैं दो कालिादस से भी अधिक मार्मिकता के उसी बात को दुहराते हैंः गिरा अन्ल जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। पश्चिमी परंपरा में उसकी पुराणकथा के दबाव में यह माना जाता रहा कि जिस चीज को आदम ने जो नाम दे दिया वही उसकी संज्ञा बन गई, अर्थात् भाषा मनुष्य की मरजी से रची गई है, मनुष्य वस्तुओं, क्रियाओं और विशेषताओं के लिए शब्द विशेष का प्रयोग करने में पूरी तरह स्वतंत्र था ।

यह लंगड़ी सोच थी। इससे कई तरह के प्रश्न खड़े होते थे जिनकी अनदेखी कर दी गई। उदाहरण के लिए (१) नयी संज्ञाओं के लिए सभी भाषाओं में स्व-व्य (CVC) के कुछ लघु विन्यास उपलब्ध थे, उनका उपयोग करने की जगह लम्बे और उच्चारण में क्लिष्ट विन्यासों का चयन क्यों किया गया ? इसके विस्तार में न जाकर हम इतना ही याद दिलाना चाहेंगे कि किसी भी अन्य भाषा के एकाक्षरी या द्वयक्षरी (अल, आल, इल, किल जैसे)शब्दों को जे उसकी प्रकृति से भी मेल खाते हों सामने रख कर देखें कि मनचाहा चुनाव करने की स्थिति में उनका उपयोग संभव थ । (२) भिन्न आशयों और व्यंजनाओं के लिए पृथक शब्दों का चयन क्यों नहीं किया गया। किसी वस्तु के लिए एक संज्ञा पर्याप्त थी, उसके लिए एकाधिक पर्यायों का क्या आवश्यकता थी? (३) समनादी (homophonic) शब्दों का सहारा क्यों लेना पड़ा ? आदि। इनके समाधान भाषा को पूर्णत: मानव रचित मानने कि स्थिति में तलाशना जरूरी हो जाता है पर इसे छेड़ना भानमती का पिटारा खोलने जैसा था जिससे तुलनात्मक भाषाविज्ञान का चरित्र ही बदल जाता और सारे नतीजे उलट जाते।

ऋग्वेद का महत्व यह है कि इसमें ऐसे शब्दों की संख्या काफी बड़ी है जिनमें नैसर्गिक आशय बना रह गया है जिसका सामना होने पर हम चकित रह जाते हैं। अन्न= जल, और अनाज; अन्ध= जल, रस, सोम रस, और दृष्टिहीन; को = जल, ईश्वर, कौन; घृत= जल और घी; अमृत= जल, अमरता दायक; पीयूष =जल, अमृत, कोई पेय; मधु= जल, सोमरस, शहद; घर्म = पानी, पसीना, ऊष्ण, धूप; तेल = पानी(इस बात का कोई संकेत नहीं है कि तिलहनों की खेती होने लगी थी जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि वे तेल का सेवन करते थे। पर बाद में तेल के रूढ़ अर्थ से हम परिचित हैं); तिल्विल = नम या सिंचित; रेत =जल, मूत्र,और रेतस्; विष = जल और विष; धन= जल और धन; पुरीष =जल और मल; अर्क =जल और प्रकाश। मूत का प्रयोग नहीं हुआ है, पर जीमूत =जीवन दायक जल में स्पष्ट कि इसका एक अर्थ जल था। संख्या और बढ़ाई जा सकती है।

पाश्चात्य अनुवादकों ने जिन्होंने सायण से मदद भी ली थी और जलर्थक प्रयोगों से अवगत थे अर्थ का अनर्थ करने के लिए जान बूझ कर बाद के रूढ़ अर्थ को ही लिया है ताकि आशय भोंड़ा लगे। हम उनके अनुवाद और अनर्थ पर बात नहीं कर रहे हैं अपितु इस बात पर कि जल की ध्वनियों से भाषा की उत्पत्ति हुई।