Post – 2018-03-19

केदारनाथ सिंह का चला जाना मर्माहत करने वाला है. मै पुणे में था जब खबर मिली थी उनके एकाएक बीमार पड़ने की. उसके बाद कोई समाचार नहीं. सोचा स्वस्थ हो गए होंगे. वह मेरे सबसे प्रिय कवियों में उस समय से थे जब १९५५ में आजकल में उनकी कविताएँ पहली बार पढने को मिलीं. व्यक्ति रूप में अजातशत्रु. ऐसे लागों की कमी होती जा रही है.

Post – 2018-03-19

हमारी भाषा (6)ग्रुप

दर से दर्पण
दर से संबंध नहीं एक पूरी शब्द श्रृंखला है जो दर्द पर्ची भेज दीजिए अंग्रेजी डोर, फा . दर, दरी- घाटी, दर्रा, दरवाजा दरकना दारुण, दरिद्र, बहुत सारे शब्द परंतु हमारा ध्यान दृष्टि से नहीं जाता नहीं जाता इस तरह की समस्तशब्दावली का समाविष्ट करना हमारा लक्ष्य नहीं है हम केवल उन दिशाओं का संकेत करना चाहते हैं सबकी अर्थ विकास प्रक्रिया परंतु दर का दर्श, आदर्श, दर्पण,

Post – 2018-03-19

हमारी भाषा (6)ग्रुप

दर से दर्पण
दर से संबंध नहीं एक पूरी शब्द श्रृंखला है जो दर्द पर्ची भेज दीजिए अंग्रेजी डोर, फा . दर, दरी- घाटी, दर्रा, दरवाजा दरकना दारुण, दरिद्र, बहुत सारे शब्द परंतु हमारा ध्यान दृष्टि से नहीं जाता नहीं जाता इस तरह की समस्तशब्दावली का समाविष्ट करना हमारा लक्ष्य नहीं है हम केवल उन दिशाओं का संकेत करना चाहते हैं सबकी अर्थ विकास प्रक्रिया परंतु दर का दर्श, आदर्श, दर्पण,

Post – 2018-03-19

हमारी भाषा (6)ग्रुप

दर से दर्पण
दर से संबंध नहीं एक पूरी शब्द श्रृंखला है जो दर्द पर्ची भेज दीजिए अंग्रेजी डोर, फा . दर, दरी- घाटी, दर्रा, दरवाजा दरकना दारुण, दरिद्र, बहुत सारे शब्द परंतु हमारा ध्यान दृष्टि से नहीं जाता नहीं जाता इस तरह की समस्तशब्दावली का समाविष्ट करना हमारा लक्ष्य नहीं है हम केवल उन दिशाओं का संकेत करना चाहते हैं सबकी अर्थ विकास प्रक्रिया परंतु दर का दर्श, आदर्श, दर्पण,

Post – 2018-03-18

हमारी भाषा (6)
डर से डार्क डार्क से डर

हमारी भाषा बहुत जटिल और बहुआयामी है। इसकी निर्माण प्रक्रिया में विभिन्न रुचियों योग्यताओं और मानसिकताओं के लोगों का हाथ रहा है। लोक-व्यवहार गंगा का ऐसा प्रवाह है जिसमें आकर सब की मलिनताएं समाप्त हो जाती हैं। डरपोक शब्द का अगर दृश्य तैयार करें तो आपको डर से भागते हुए और इसी के साथ गोबर-विसर्जन करते हुए जानवर का चित्र उभरेगा। प्रयोग हमारी सुरुचि के अनुरूप नहीं है, परंतु निरन्तर प्रयोग में आते रहने के कारण हमारा ध्यान इस विद्रूप की ओर नहीं जाता, इसका भावसत्य और उसका तेवर संप्रेषित होता है। यही हाल उन गालियों और हमें क्षुब्ध करने वाले न प्रयोगों का है जो अपनी उजड्डता को ही अपने खरेपन का प्रमाण मानते हैं। हम जिसे अश्लील समझते हैं वह उनके परिवेश में कथन को जोरदार बनाने के लिए प्रयुक्त अलंकार होता है। अंगों गर उस परिवेश के लोगों का ध्यान नहीं जाता। ये सामाजिक स्तरभेद से जुड़ा पहलू है, पर सबसे चकित करने वाला है ध्वनि और अर्थ का परिसर।

डर शब्द तर और दर से अलग शब्द न था। तर, दर, डर, अघोषप्रेमी, घोषप्रेमी, मूर्धन्य प्रेमी समुदायों द्वारा एक ही प्राकृत ध्वनि के वाचिक उच्चार थे जिनका प्राथमिक अर्थ पानी ही रहा होगा। यही लकारान्त रूपों के विषय में कही जा सकती है। पारस्परिक संपर्क में आने और चेतना में निखार और अनुभव संसार के विस्तार के चलते इनका अर्थ विस्तार हुआ ।

पानी की संज्ञा भय के आशय में प्रयुक्त हो सकती है यह समझने में है हमें कठिनाई होती है। परंतु तड़पने का पानी से संबंध हो सकता है इसे समझने में कठिनाई नहीं होती। पानी के बिना छटपटाती हुई मछलियों का दृश्य बिंब बनता है जब हम तड़पना शब्द का प्रयोग करते हैं तो। दर से दर्द का संबंध है यह भी आसानी से हमारे गले नहीं उतरता। इसका अर्थ विकास और भी टेढ़ा है। तर से तरु, दर से दारु का संबंध सीधा है, पर दारु के कटने,चीरने के साथ उत्पन्न ध्वनि दारण, दरकने और दर्द का जनक है ।

तर जब संस्कृतीकरण के कारण तृ हो जाता है तो पानी के अभाव या तलब के लिए हम तृषा शब्द का प्रयोग करते हैं और यही जब किसी वस्तु की आकांक्षा में बदल जाती है तो उसे तृष्णा कहते हैं । तृषा न मिटे तो इसकी उग्रता त्रास में बदल जाती है, और अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर संत्रास बन जाती है ।
क्या आपने कभी त्राहि शब्द पर ध्यान दिया है। त्राहि का शाब्दिक अर्थ है पानी पिलाओ। यह युद्ध स्थल में मरणाासन्न व्यक्ति की कातर पुकार है, इसका भाव है कि पानी पिलाकर मेरे प्राणों की रक्षा करो और यह रक्षा करो के आशय में रूढ़ हो गया। और त्राण-रक्षा, त्राता- उद्धारक के व्यापक अर्थ में प्रयोग मेंआने लगा । यह पानी से बचाने वाला भी हो सकता है और पाप से बचाने वाला भी हो सकता है और आर्थिक दुर वस्था से बचाने वाला भी हो सकता है ।

रक्षा के आशय में एक दूसरा शब्द प्रयोग में आता है पाहि। इसमें भी पा का अर्थ पानी है और पाहि का अर्थ है पिलाओ। पाहि मां का अर्थ (पानी पिलाकर) प्राण रक्षा करो। यह शब्द इन बातों से अलग इतिहास की सच्चाई को भी प्रकट करते हैं हमारी भाषा का विकास भौगोलिक परिवेश में हुआ।
तृषा अंग्रेजी में थर्स्ट बन जाती है, और त्रास का टेरर से संबंध हो सकता है। अंग्रेजी कोशों में व्युत्पत्ति के नाम पर दिेए गए शब्दविशेष के प्रतिरूपों से इसका निर्ण करना कठिन है और मेरी अपनी सीमाओं और साधनों के अभाव के कारण निश्चयात्मक रूप में कोई दावा करना उचित न होगा।

पानी से इसका कोई संबंध यूरोपीय पंडितों को सुझाने पर भी दिखाई न देगा।
अंग्रेजी के माध्यम से डर-ड्र-अं. ड्राई और ड्रिंक से डर का पानी से नाता भले पता चल जाय, भारतीय बोलियों में भय के आशय में इसके रूढ़ हो जाने के कारण, यह तक भुला दिया गया कि जल से इसका कभी कोई नाता रहा है। मेरी समझ से अं. के डार्क, और हिन्दी डर की संकल्पना के विकास में संभवत है पानी में डूबने का हाथ रहा है। पानी से डर सभी को लगता है ओर पानी से प्रेम भी सभी को होता है, प्रश्न जल के वेग, प्रसार और गहराई का है। डूबने के बाद लुप्त वस्तु अदृश्य हो जाती है और लोप के भाव ने ही शायद अंग्रेजी के डार्क को जन्म दिया हो। इसी डार्क या डबने से डर का भी संबंध है।

Post – 2018-03-18

हमारी भाषा (6)
डर से डार्क डार्क से डर

हमारी भाषा बहुत जटिल और बहुआयामी है। इसकी निर्माण प्रक्रिया में विभिन्न रुचियों योग्यताओं और मानसिकताओं के लोगों का हाथ रहा है। लोक-व्यवहार गंगा का ऐसा प्रवाह है जिसमें आकर सब की मलिनताएं समाप्त हो जाती हैं। डरपोक शब्द का अगर दृश्य तैयार करें तो आपको डर से भागते हुए और इसी के साथ गोबर-विसर्जन करते हुए जानवर का चित्र उभरेगा। प्रयोग हमारी सुरुचि के अनुरूप नहीं है, परंतु निरन्तर प्रयोग में आते रहने के कारण हमारा ध्यान इस विद्रूप की ओर नहीं जाता, इसका भावसत्य और उसका तेवर संप्रेषित होता है। यही हाल उन गालियों और हमें क्षुब्ध करने वाले न प्रयोगों का है जो अपनी उजड्डता को ही अपने खरेपन का प्रमाण मानते हैं। हम जिसे अश्लील समझते हैं वह उनके परिवेश में कथन को जोरदार बनाने के लिए प्रयुक्त अलंकार होता है। अंगों गर उस परिवेश के लोगों का ध्यान नहीं जाता। ये सामाजिक स्तरभेद से जुड़ा पहलू है, पर सबसे चकित करने वाला है ध्वनि और अर्थ का परिसर।

डर शब्द तर और दर से अलग शब्द न था। तर, दर, डर, अघोषप्रेमी, घोषप्रेमी, मूर्धन्य प्रेमी समुदायों द्वारा एक ही प्राकृत ध्वनि के वाचिक उच्चार थे जिनका प्राथमिक अर्थ पानी ही रहा होगा। यही लकारान्त रूपों के विषय में कही जा सकती है। पारस्परिक संपर्क में आने और चेतना में निखार और अनुभव संसार के विस्तार के चलते इनका अर्थ विस्तार हुआ ।

पानी की संज्ञा भय के आशय में प्रयुक्त हो सकती है यह समझने में है हमें कठिनाई होती है। परंतु तड़पने का पानी से संबंध हो सकता है इसे समझने में कठिनाई नहीं होती। पानी के बिना छटपटाती हुई मछलियों का दृश्य बिंब बनता है जब हम तड़पना शब्द का प्रयोग करते हैं तो। दर से दर्द का संबंध है यह भी आसानी से हमारे गले नहीं उतरता। इसका अर्थ विकास और भी टेढ़ा है। तर से तरु, दर से दारु का संबंध सीधा है, पर दारु के कटने,चीरने के साथ उत्पन्न ध्वनि दारण, दरकने और दर्द का जनक है ।

तर जब संस्कृतीकरण के कारण तृ हो जाता है तो पानी के अभाव या तलब के लिए हम तृषा शब्द का प्रयोग करते हैं और यही जब किसी वस्तु की आकांक्षा में बदल जाती है तो उसे तृष्णा कहते हैं । तृषा न मिटे तो इसकी उग्रता त्रास में बदल जाती है, और अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर संत्रास बन जाती है ।
क्या आपने कभी त्राहि शब्द पर ध्यान दिया है। त्राहि का शाब्दिक अर्थ है पानी पिलाओ। यह युद्ध स्थल में मरणाासन्न व्यक्ति की कातर पुकार है, इसका भाव है कि पानी पिलाकर मेरे प्राणों की रक्षा करो और यह रक्षा करो के आशय में रूढ़ हो गया। और त्राण-रक्षा, त्राता- उद्धारक के व्यापक अर्थ में प्रयोग मेंआने लगा । यह पानी से बचाने वाला भी हो सकता है और पाप से बचाने वाला भी हो सकता है और आर्थिक दुर वस्था से बचाने वाला भी हो सकता है ।

रक्षा के आशय में एक दूसरा शब्द प्रयोग में आता है पाहि। इसमें भी पा का अर्थ पानी है और पाहि का अर्थ है पिलाओ। पाहि मां का अर्थ (पानी पिलाकर) प्राण रक्षा करो। यह शब्द इन बातों से अलग इतिहास की सच्चाई को भी प्रकट करते हैं हमारी भाषा का विकास भौगोलिक परिवेश में हुआ।
तृषा अंग्रेजी में थर्स्ट बन जाती है, और त्रास का टेरर से संबंध हो सकता है। अंग्रेजी कोशों में व्युत्पत्ति के नाम पर दिेए गए शब्दविशेष के प्रतिरूपों से इसका निर्ण करना कठिन है और मेरी अपनी सीमाओं और साधनों के अभाव के कारण निश्चयात्मक रूप में कोई दावा करना उचित न होगा।

पानी से इसका कोई संबंध यूरोपीय पंडितों को सुझाने पर भी दिखाई न देगा।
अंग्रेजी के माध्यम से डर-ड्र-अं. ड्राई और ड्रिंक से डर का पानी से नाता भले पता चल जाय, भारतीय बोलियों में भय के आशय में इसके रूढ़ हो जाने के कारण, यह तक भुला दिया गया कि जल से इसका कभी कोई नाता रहा है। मेरी समझ से अं. के डार्क, और हिन्दी डर की संकल्पना के विकास में संभवत है पानी में डूबने का हाथ रहा है। पानी से डर सभी को लगता है ओर पानी से प्रेम भी सभी को होता है, प्रश्न जल के वेग, प्रसार और गहराई का है। डूबने के बाद लुप्त वस्तु अदृश्य हो जाती है और लोप के भाव ने ही शायद अंग्रेजी के डार्क को जन्म दिया हो। इसी डार्क या डबने से डर का भी संबंध है।

Post – 2018-03-18

हमारी भाषा (6)
डर से डार्क डार्क से डर

हमारी भाषा बहुत जटिल और बहुआयामी है। इसकी निर्माण प्रक्रिया में विभिन्न रुचियों योग्यताओं और मानसिकताओं के लोगों का हाथ रहा है। लोक-व्यवहार गंगा का ऐसा प्रवाह है जिसमें आकर सब की मलिनताएं समाप्त हो जाती हैं। डरपोक शब्द का अगर दृश्य तैयार करें तो आपको डर से भागते हुए और इसी के साथ गोबर-विसर्जन करते हुए जानवर का चित्र उभरेगा। प्रयोग हमारी सुरुचि के अनुरूप नहीं है, परंतु निरन्तर प्रयोग में आते रहने के कारण हमारा ध्यान इस विद्रूप की ओर नहीं जाता, इसका भावसत्य और उसका तेवर संप्रेषित होता है। यही हाल उन गालियों और हमें क्षुब्ध करने वाले न प्रयोगों का है जो अपनी उजड्डता को ही अपने खरेपन का प्रमाण मानते हैं। हम जिसे अश्लील समझते हैं वह उनके परिवेश में कथन को जोरदार बनाने के लिए प्रयुक्त अलंकार होता है। अंगों गर उस परिवेश के लोगों का ध्यान नहीं जाता। ये सामाजिक स्तरभेद से जुड़ा पहलू है, पर सबसे चकित करने वाला है ध्वनि और अर्थ का परिसर।

डर शब्द तर और दर से अलग शब्द न था। तर, दर, डर, अघोषप्रेमी, घोषप्रेमी, मूर्धन्य प्रेमी समुदायों द्वारा एक ही प्राकृत ध्वनि के वाचिक उच्चार थे जिनका प्राथमिक अर्थ पानी ही रहा होगा। यही लकारान्त रूपों के विषय में कही जा सकती है। पारस्परिक संपर्क में आने और चेतना में निखार और अनुभव संसार के विस्तार के चलते इनका अर्थ विस्तार हुआ ।

पानी की संज्ञा भय के आशय में प्रयुक्त हो सकती है यह समझने में है हमें कठिनाई होती है। परंतु तड़पने का पानी से संबंध हो सकता है इसे समझने में कठिनाई नहीं होती। पानी के बिना छटपटाती हुई मछलियों का दृश्य बिंब बनता है जब हम तड़पना शब्द का प्रयोग करते हैं तो। दर से दर्द का संबंध है यह भी आसानी से हमारे गले नहीं उतरता। इसका अर्थ विकास और भी टेढ़ा है। तर से तरु, दर से दारु का संबंध सीधा है, पर दारु के कटने,चीरने के साथ उत्पन्न ध्वनि दारण, दरकने और दर्द का जनक है ।

तर जब संस्कृतीकरण के कारण तृ हो जाता है तो पानी के अभाव या तलब के लिए हम तृषा शब्द का प्रयोग करते हैं और यही जब किसी वस्तु की आकांक्षा में बदल जाती है तो उसे तृष्णा कहते हैं । तृषा न मिटे तो इसकी उग्रता त्रास में बदल जाती है, और अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर संत्रास बन जाती है ।
क्या आपने कभी त्राहि शब्द पर ध्यान दिया है। त्राहि का शाब्दिक अर्थ है पानी पिलाओ। यह युद्ध स्थल में मरणाासन्न व्यक्ति की कातर पुकार है, इसका भाव है कि पानी पिलाकर मेरे प्राणों की रक्षा करो और यह रक्षा करो के आशय में रूढ़ हो गया। और त्राण-रक्षा, त्राता- उद्धारक के व्यापक अर्थ में प्रयोग मेंआने लगा । यह पानी से बचाने वाला भी हो सकता है और पाप से बचाने वाला भी हो सकता है और आर्थिक दुर वस्था से बचाने वाला भी हो सकता है ।

रक्षा के आशय में एक दूसरा शब्द प्रयोग में आता है पाहि। इसमें भी पा का अर्थ पानी है और पाहि का अर्थ है पिलाओ। पाहि मां का अर्थ (पानी पिलाकर) प्राण रक्षा करो। यह शब्द इन बातों से अलग इतिहास की सच्चाई को भी प्रकट करते हैं हमारी भाषा का विकास भौगोलिक परिवेश में हुआ।
तृषा अंग्रेजी में थर्स्ट बन जाती है, और त्रास का टेरर से संबंध हो सकता है। अंग्रेजी कोशों में व्युत्पत्ति के नाम पर दिेए गए शब्दविशेष के प्रतिरूपों से इसका निर्ण करना कठिन है और मेरी अपनी सीमाओं और साधनों के अभाव के कारण निश्चयात्मक रूप में कोई दावा करना उचित न होगा।

पानी से इसका कोई संबंध यूरोपीय पंडितों को सुझाने पर भी दिखाई न देगा।
अंग्रेजी के माध्यम से डर-ड्र-अं. ड्राई और ड्रिंक से डर का पानी से नाता भले पता चल जाय, भारतीय बोलियों में भय के आशय में इसके रूढ़ हो जाने के कारण, यह तक भुला दिया गया कि जल से इसका कभी कोई नाता रहा है। मेरी समझ से अं. के डार्क, और हिन्दी डर की संकल्पना के विकास में संभवत है पानी में डूबने का हाथ रहा है। पानी से डर सभी को लगता है ओर पानी से प्रेम भी सभी को होता है, प्रश्न जल के वेग, प्रसार और गहराई का है। डूबने के बाद लुप्त वस्तु अदृश्य हो जाती है और लोप के भाव ने ही शायद अंग्रेजी के डार्क को जन्म दिया हो। इसी डार्क या डबने से डर का भी संबंध है।

Post – 2018-03-17

हमारी भाषा (५)
तर से तर्पण

हमारे पास आज की व्यस्तता में रात को चांद और तारों तक को देखने का समय नहीं रह गया है। यान्त्रिक सुविधाओं के साथ हमारी अनेक नैसर्गिक वृत्तियाँ या तो नष्ष्ट हुई हैं, या इतनी मन्द पड़ चुकी हैं कि उन्हें सक्रिय करने के लिए शिक्षण और अभ्यास की जरूरत पड़ती है। हमारा अनुभव संसार सिकुड़ा है और अपनी पेशियों और दिमाग पर पड़ने वाले जोर को यन्त्रों को सौंप कर हम शारीरिक और मानसिक रूप में कमजोर होते जा रहे हैं। गाड़ी पर दौड़ने वाले को चलने में दिक्कत नहीं भी हो तो भी आलस्य लगने लगा है, और दौड़ने मे वह अक्षम हो गया है, गणनायंत्र की मदद लेने वाला मामूली जोड़ भाग तक नहीं कर पाता, और कंप्यूटर पर लिखने वाले को लिखना बोझ लगता है, और लिखावट बच्चों या नाममात्र के साक्षरों जैसी होती है। यन्त्रों के विकास क्रम में लंबे समय से चले आरहे अदृश्य पर निरन्तर ह्रास को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि आज से हजारों साल पहले के हमारे पूर्वज हमसे जानते बहुत कम थे, परन्तु मानसिक और शारीरिक रूप में हमसे बहुत सबल थे। उनके पास अपने अनुभव जगत को एकाग्र मन से निहारने का अकूत समय था, और प्रकृति दृश्यों को निहारने और सूक्ष्म से सूक्ष्म श्रव्य ध्वनियों को सुनने की अकल्पनीय क्षमता थी। वे सचमुच ऋषि थे, क्रान्तद्रष्टा थे और अपनी इन्हीं क्षमताओं के बल पर उन्होंने सभ्यता की आधारशिला रखी थी।

इस पृष्ठभूमि में ही हम भाषा के आरंभिक चरणों के विकास को समझ सकते हैं।

आपने किसी पत्ती पर पड़ी हुई एक पानी या ओस की बूंद को ढलते हुए या पसीने की बूंद को धीरे-धीरे नीचे खिसकते हुए देखा हो और उस पर ध्यान दिया हो तो आपको लगेगा कि उससे तर या टर जैसी आवाज आ रही है यह ध्वनि डर, ढर, टल, डल, ढल के रुप में भी सुनी जा सकती है । इनमें से किसी रूप में सुनना इस बात पर निर्भर करता है कि आप की भाषा में मूर्धन्य उच्चारण होता है या दंत्य। टल,ल डल, ढल के रूप में सुनना तो उस अवस्था की बात है जब वह भाषा में मूर्धन्य और दंत्य दोनों ध्वनियों का समावेश हो चुका हो जिसका अर्थ है दोनों भाषाभाषी समुदाय एक दूसरे में रच पच गए हों। परंतु हाहाकार भरी ध्वनियों के युग में जीते हुए यह कल्पना नहीं कर सकते कि एक बूंद के स्थान बदलने को बदलने से जो ध्वनि पैदा होती है उसे मनुष्य के कानों से सुना भी जा सकता है। इसके लिए जिस नीरवता की जरूरत है, उसे हमने खो दिया है । परंतु जब हम तर तर पसीना चूने की बात करते हैं तब पहला अर्थ उस ध्वनि का अनुकार होता है और सुनने की क्रिया जाहिर है केवल कल्पित ही की जा सकती है। पर जब पसीने से तर-ब-तर होने की बात करते हैं तब उसकी याद दिलाने पर भी विश्वास न होगा कि इसमें प्रयुक्त तर का किसी ध्वनि से संबंध है, यद्यपि यह स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि तर का अर्थ पानी है। सच यह है कि इन सभी वैकल्पिक रूपों का एक अर्थ पानी है, दूसरा कोई भी द्रव और तीसरा नीचे की ओर का बहाव, सिवाय टर, टल, डर के। इनमें पहले दो का आशय हटना हो गया, और डर जिससे अंग्रेजी के ड्रा का नाता हो सकता है, भारतीय बोलियों में पानी के अभाव और फिर भय को लिए कबसे और कैसे प्रयोग में आने लगा यह तय करना कठिन है। लीजिए, टर और डर के बीच मे आने वाले ठर की ओर तो हमारा ध्यान ही नहीं गया जो पानी के आशय में तो कभी प्रयोग में नहीं आया लगता पर ठरक = चाहत और क्रिया रूप ठरना = पाले की ठंढ।

इस क्रम को समझे बिना हम न तो ताल=जलाशय का अर्थ समझ सकते है, न तल, तले, तलवे, तालु का न ढालना, ढलवां, ढलान और ढीला का, तरना, तारना का आशय समझ में आ भी जाय, यह समझने में कठिनाई होगी कि तलना भी जल/द्रव के इसी समूह का है।

तर का अर्थ जल तो तर्पण का अर्थ पानी पिलाना, सींचना और जलवायु में पानी की आवश्यकता सर्वाधिक हो उस के अभाव में मनुष्य मर भी सकता हूं तो श्रद्धा प्रकट करने के लिए भी पानी पिलाने का अर्थात तर्पण का प्रयोग हो सकता है। वनस्पतियों और पेड़ों का नाम भी जल से ही उत्पन्न हो सकता था, क्योंकि जल आर्द्रता को और ऐसे पदार्थों को भी अपनी परिधि में समेट लेता है । इनसे स्वत: कोई ध्वनि पैदा होती नहीं इसलिए तरु (ट्री) को अपनी यह संज्ञा जल से मिली ।

समस्या वहां खड़ी होगी जब आप यह तय करने लगे की तरी को अपनी संज्ञा इसलिए मिली कि यह तरु से बनी है या इसलिए यह जलधारा को पार कराती है। कहा यह जा सकता है कि नौका वृक्ष से नहीं बनती दारु से बनती है, जिसका प्रयोग देवदारु के एक मात्र विकल्प को छोड़कर काठ के लिए होता है। पर फारसी का दरख्त का दारु से अभेद है ही। तरी का अर्थ तरु निर्मित नहीं है पर दर्वी = काठ की बड़ी कलछी और दर्विका = छोटी कलछी से अवश्य है। तैरना, तरंग, तरसना- पानी की चाह, किसी दुर्लब वस्तु की उत्कट कामना में तर का भूमिका सहज ग्राह्य है।

जल की गतिशीलता के कारण जलवाची शब्दों का ही प्रयोग गति, चलन और रास्ते के लिए भी हुआ है, इसलिए तर से तार की उत्पत्ति हुई हो सकती है। फारसी तरह, तर्ज, तरीका तर
से निकले हो सकते हैं।

Post – 2018-03-17

हमारी भाषा (५)
तर से तर्पण

हमारे पास आज की व्यस्तता में रात को चांद और तारों तक को देखने का समय नहीं रह गया है। यान्त्रिक सुविधाओं के साथ हमारी अनेक नैसर्गिक वृत्तियाँ या तो नष्ष्ट हुई हैं, या इतनी मन्द पड़ चुकी हैं कि उन्हें सक्रिय करने के लिए शिक्षण और अभ्यास की जरूरत पड़ती है। हमारा अनुभव संसार सिकुड़ा है और अपनी पेशियों और दिमाग पर पड़ने वाले जोर को यन्त्रों को सौंप कर हम शारीरिक और मानसिक रूप में कमजोर होते जा रहे हैं। गाड़ी पर दौड़ने वाले को चलने में दिक्कत नहीं भी हो तो भी आलस्य लगने लगा है, और दौड़ने मे वह अक्षम हो गया है, गणनायंत्र की मदद लेने वाला मामूली जोड़ भाग तक नहीं कर पाता, और कंप्यूटर पर लिखने वाले को लिखना बोझ लगता है, और लिखावट बच्चों या नाममात्र के साक्षरों जैसी होती है। यन्त्रों के विकास क्रम में लंबे समय से चले आरहे अदृश्य पर निरन्तर ह्रास को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि आज से हजारों साल पहले के हमारे पूर्वज हमसे जानते बहुत कम थे, परन्तु मानसिक और शारीरिक रूप में हमसे बहुत सबल थे। उनके पास अपने अनुभव जगत को एकाग्र मन से निहारने का अकूत समय था, और प्रकृति दृश्यों को निहारने और सूक्ष्म से सूक्ष्म श्रव्य ध्वनियों को सुनने की अकल्पनीय क्षमता थी। वे सचमुच ऋषि थे, क्रान्तद्रष्टा थे और अपनी इन्हीं क्षमताओं के बल पर उन्होंने सभ्यता की आधारशिला रखी थी।

इस पृष्ठभूमि में ही हम भाषा के आरंभिक चरणों के विकास को समझ सकते हैं।

आपने किसी पत्ती पर पड़ी हुई एक पानी या ओस की बूंद को ढलते हुए या पसीने की बूंद को धीरे-धीरे नीचे खिसकते हुए देखा हो और उस पर ध्यान दिया हो तो आपको लगेगा कि उससे तर या टर जैसी आवाज आ रही है यह ध्वनि डर, ढर, टल, डल, ढल के रुप में भी सुनी जा सकती है । इनमें से किसी रूप में सुनना इस बात पर निर्भर करता है कि आप की भाषा में मूर्धन्य उच्चारण होता है या दंत्य। टल,ल डल, ढल के रूप में सुनना तो उस अवस्था की बात है जब वह भाषा में मूर्धन्य और दंत्य दोनों ध्वनियों का समावेश हो चुका हो जिसका अर्थ है दोनों भाषाभाषी समुदाय एक दूसरे में रच पच गए हों। परंतु हाहाकार भरी ध्वनियों के युग में जीते हुए यह कल्पना नहीं कर सकते कि एक बूंद के स्थान बदलने को बदलने से जो ध्वनि पैदा होती है उसे मनुष्य के कानों से सुना भी जा सकता है। इसके लिए जिस नीरवता की जरूरत है, उसे हमने खो दिया है । परंतु जब हम तर तर पसीना चूने की बात करते हैं तब पहला अर्थ उस ध्वनि का अनुकार होता है और सुनने की क्रिया जाहिर है केवल कल्पित ही की जा सकती है। पर जब पसीने से तर-ब-तर होने की बात करते हैं तब उसकी याद दिलाने पर भी विश्वास न होगा कि इसमें प्रयुक्त तर का किसी ध्वनि से संबंध है, यद्यपि यह स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि तर का अर्थ पानी है। सच यह है कि इन सभी वैकल्पिक रूपों का एक अर्थ पानी है, दूसरा कोई भी द्रव और तीसरा नीचे की ओर का बहाव, सिवाय टर, टल, डर के। इनमें पहले दो का आशय हटना हो गया, और डर जिससे अंग्रेजी के ड्रा का नाता हो सकता है, भारतीय बोलियों में पानी के अभाव और फिर भय को लिए कबसे और कैसे प्रयोग में आने लगा यह तय करना कठिन है। लीजिए, टर और डर के बीच मे आने वाले ठर की ओर तो हमारा ध्यान ही नहीं गया जो पानी के आशय में तो कभी प्रयोग में नहीं आया लगता पर ठरक = चाहत और क्रिया रूप ठरना = पाले की ठंढ।

इस क्रम को समझे बिना हम न तो ताल=जलाशय का अर्थ समझ सकते है, न तल, तले, तलवे, तालु का न ढालना, ढलवां, ढलान और ढीला का, तरना, तारना का आशय समझ में आ भी जाय, यह समझने में कठिनाई होगी कि तलना भी जल/द्रव के इसी समूह का है।

तर का अर्थ जल तो तर्पण का अर्थ पानी पिलाना, सींचना और जलवायु में पानी की आवश्यकता सर्वाधिक हो उस के अभाव में मनुष्य मर भी सकता हूं तो श्रद्धा प्रकट करने के लिए भी पानी पिलाने का अर्थात तर्पण का प्रयोग हो सकता है। वनस्पतियों और पेड़ों का नाम भी जल से ही उत्पन्न हो सकता था, क्योंकि जल आर्द्रता को और ऐसे पदार्थों को भी अपनी परिधि में समेट लेता है । इनसे स्वत: कोई ध्वनि पैदा होती नहीं इसलिए तरु (ट्री) को अपनी यह संज्ञा जल से मिली ।

समस्या वहां खड़ी होगी जब आप यह तय करने लगे की तरी को अपनी संज्ञा इसलिए मिली कि यह तरु से बनी है या इसलिए यह जलधारा को पार कराती है। कहा यह जा सकता है कि नौका वृक्ष से नहीं बनती दारु से बनती है, जिसका प्रयोग देवदारु के एक मात्र विकल्प को छोड़कर काठ के लिए होता है। पर फारसी का दरख्त का दारु से अभेद है ही। तरी का अर्थ तरु निर्मित नहीं है पर दर्वी = काठ की बड़ी कलछी और दर्विका = छोटी कलछी से अवश्य है। तैरना, तरंग, तरसना- पानी की चाह, किसी दुर्लब वस्तु की उत्कट कामना में तर का भूमिका सहज ग्राह्य है।

जल की गतिशीलता के कारण जलवाची शब्दों का ही प्रयोग गति, चलन और रास्ते के लिए भी हुआ है, इसलिए तर से तार की उत्पत्ति हुई हो सकती है। फारसी तरह, तर्ज, तरीका तर
से निकले हो सकते हैं।

Post – 2018-03-17

हमारी भाषा (५)
तर से तर्पण

हमारे पास आज की व्यस्तता में रात को चांद और तारों तक को देखने का समय नहीं रह गया है। यान्त्रिक सुविधाओं के साथ हमारी अनेक नैसर्गिक वृत्तियाँ या तो नष्ष्ट हुई हैं, या इतनी मन्द पड़ चुकी हैं कि उन्हें सक्रिय करने के लिए शिक्षण और अभ्यास की जरूरत पड़ती है। हमारा अनुभव संसार सिकुड़ा है और अपनी पेशियों और दिमाग पर पड़ने वाले जोर को यन्त्रों को सौंप कर हम शारीरिक और मानसिक रूप में कमजोर होते जा रहे हैं। गाड़ी पर दौड़ने वाले को चलने में दिक्कत नहीं भी हो तो भी आलस्य लगने लगा है, और दौड़ने मे वह अक्षम हो गया है, गणनायंत्र की मदद लेने वाला मामूली जोड़ भाग तक नहीं कर पाता, और कंप्यूटर पर लिखने वाले को लिखना बोझ लगता है, और लिखावट बच्चों या नाममात्र के साक्षरों जैसी होती है। यन्त्रों के विकास क्रम में लंबे समय से चले आरहे अदृश्य पर निरन्तर ह्रास को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि आज से हजारों साल पहले के हमारे पूर्वज हमसे जानते बहुत कम थे, परन्तु मानसिक और शारीरिक रूप में हमसे बहुत सबल थे। उनके पास अपने अनुभव जगत को एकाग्र मन से निहारने का अकूत समय था, और प्रकृति दृश्यों को निहारने और सूक्ष्म से सूक्ष्म श्रव्य ध्वनियों को सुनने की अकल्पनीय क्षमता थी। वे सचमुच ऋषि थे, क्रान्तद्रष्टा थे और अपनी इन्हीं क्षमताओं के बल पर उन्होंने सभ्यता की आधारशिला रखी थी।

इस पृष्ठभूमि में ही हम भाषा के आरंभिक चरणों के विकास को समझ सकते हैं।

आपने किसी पत्ती पर पड़ी हुई एक पानी या ओस की बूंद को ढलते हुए या पसीने की बूंद को धीरे-धीरे नीचे खिसकते हुए देखा हो और उस पर ध्यान दिया हो तो आपको लगेगा कि उससे तर या टर जैसी आवाज आ रही है यह ध्वनि डर, ढर, टल, डल, ढल के रुप में भी सुनी जा सकती है । इनमें से किसी रूप में सुनना इस बात पर निर्भर करता है कि आप की भाषा में मूर्धन्य उच्चारण होता है या दंत्य। टल,ल डल, ढल के रूप में सुनना तो उस अवस्था की बात है जब वह भाषा में मूर्धन्य और दंत्य दोनों ध्वनियों का समावेश हो चुका हो जिसका अर्थ है दोनों भाषाभाषी समुदाय एक दूसरे में रच पच गए हों। परंतु हाहाकार भरी ध्वनियों के युग में जीते हुए यह कल्पना नहीं कर सकते कि एक बूंद के स्थान बदलने को बदलने से जो ध्वनि पैदा होती है उसे मनुष्य के कानों से सुना भी जा सकता है। इसके लिए जिस नीरवता की जरूरत है, उसे हमने खो दिया है । परंतु जब हम तर तर पसीना चूने की बात करते हैं तब पहला अर्थ उस ध्वनि का अनुकार होता है और सुनने की क्रिया जाहिर है केवल कल्पित ही की जा सकती है। पर जब पसीने से तर-ब-तर होने की बात करते हैं तब उसकी याद दिलाने पर भी विश्वास न होगा कि इसमें प्रयुक्त तर का किसी ध्वनि से संबंध है, यद्यपि यह स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि तर का अर्थ पानी है। सच यह है कि इन सभी वैकल्पिक रूपों का एक अर्थ पानी है, दूसरा कोई भी द्रव और तीसरा नीचे की ओर का बहाव, सिवाय टर, टल, डर के। इनमें पहले दो का आशय हटना हो गया, और डर जिससे अंग्रेजी के ड्रा का नाता हो सकता है, भारतीय बोलियों में पानी के अभाव और फिर भय को लिए कबसे और कैसे प्रयोग में आने लगा यह तय करना कठिन है। लीजिए, टर और डर के बीच मे आने वाले ठर की ओर तो हमारा ध्यान ही नहीं गया जो पानी के आशय में तो कभी प्रयोग में नहीं आया लगता पर ठरक = चाहत और क्रिया रूप ठरना = पाले की ठंढ।

इस क्रम को समझे बिना हम न तो ताल=जलाशय का अर्थ समझ सकते है, न तल, तले, तलवे, तालु का न ढालना, ढलवां, ढलान और ढीला का, तरना, तारना का आशय समझ में आ भी जाय, यह समझने में कठिनाई होगी कि तलना भी जल/द्रव के इसी समूह का है।

तर का अर्थ जल तो तर्पण का अर्थ पानी पिलाना, सींचना और जलवायु में पानी की आवश्यकता सर्वाधिक हो उस के अभाव में मनुष्य मर भी सकता हूं तो श्रद्धा प्रकट करने के लिए भी पानी पिलाने का अर्थात तर्पण का प्रयोग हो सकता है। वनस्पतियों और पेड़ों का नाम भी जल से ही उत्पन्न हो सकता था, क्योंकि जल आर्द्रता को और ऐसे पदार्थों को भी अपनी परिधि में समेट लेता है । इनसे स्वत: कोई ध्वनि पैदा होती नहीं इसलिए तरु (ट्री) को अपनी यह संज्ञा जल से मिली ।

समस्या वहां खड़ी होगी जब आप यह तय करने लगे की तरी को अपनी संज्ञा इसलिए मिली कि यह तरु से बनी है या इसलिए यह जलधारा को पार कराती है। कहा यह जा सकता है कि नौका वृक्ष से नहीं बनती दारु से बनती है, जिसका प्रयोग देवदारु के एक मात्र विकल्प को छोड़कर काठ के लिए होता है। पर फारसी का दरख्त का दारु से अभेद है ही। तरी का अर्थ तरु निर्मित नहीं है पर दर्वी = काठ की बड़ी कलछी और दर्विका = छोटी कलछी से अवश्य है। तैरना, तरंग, तरसना- पानी की चाह, किसी दुर्लब वस्तु की उत्कट कामना में तर का भूमिका सहज ग्राह्य है।

जल की गतिशीलता के कारण जलवाची शब्दों का ही प्रयोग गति, चलन और रास्ते के लिए भी हुआ है, इसलिए तर से तार की उत्पत्ति हुई हो सकती है। फारसी तरह, तर्ज, तरीका तर
से निकले हो सकते हैं।