Post – 2018-04-04

भाषा और व्याकरण

व्याकरण से भाषा नहीं बनती, भाषा होती है और उसे बोलते हैं। अक्सर हम यह भी नहीं जानते कि हमारी भाषा का नाम क्या है। भाषा का व्याकरण होता है इसे अनपढ़ आदमी नहीं जानता। कुछ नियम होते हैं जिनको सीखने के बाद सही भाषा बोली जाती है उसके लिए इससे बड़ा मनोरंजन कोई हो ही नहीं सकता। कारण हम जिस सहजता से अपनी बोली के शब्द सीखते है, उसी तरह बिना किसी आयास के उन नियमों को आत्मसात करते चलते है। पहली बार किसी चीज से पाला पड़ने पर यह अवश्य पूछा जाता है, ‘इसे क्या कहते हैं’, पर यह कभी नहीं पूछा जाता कि इस बात को कैसे कहते है।

परन्तु किसी नई भाषा को सीखते समय हर चीज के साथ ‘इसे क्या कहते हैं, और बात के साथ, इसे कैसे कहते हैं, का सवाल खड़ा होता है। कहें, शब्दभंडार और व्याकरण दोनों की समस्या पराई भाषा के साथ या किसी भिन्न भाषा के प्रभाव के अनुपात में पैदा होती है। व्याकरण की प्रधानता भाषा के पराएपन की पहचान है।

भाषा की जाति नहीं होती, धर्म नहीं होता, उसका अपना क्षेत्र या प्रदेश होता है। यदि किसी कारण किसी क्षेत्र की भाषा में धर्म या जाति का दखल होता है तो उस दखल के अनुपात में ही, भाषा के भीतर एक ‘कूट’ भाषा का जन्म होता है जो उस समूह के भीतर समझी जाती है। इसी तर्क से संस्कृत को ब्राह्मणों की कूट भाषा और फारसी को विदेशी मूल के मुसलमानों की कूट भाषा बनी रही। सामान्य कामकाज स्थानीय जनों की भाषा के बिना चल नहीं सकता, इसलिए इनको भी जन भाषा सीखने की जरूरत पड़ती थी जब कि जन साधारण का काम अपनी बोली से चल जाता है और उसे इन भाषाओं को सीखने की बाध्यता नहीं होती। भाषा वह है जिसके बिना आप गूंगे हो जाते हैं और किसी क्षेत्र की भाषा वह है जिसे जाने बिना आप उस क्षेत्र में गूंगे बने रहते हैं। इस गूंगेपन से बचने की कोशिश में आक्रान्ताओं को भी विजितों की भाषा सीखनी पड़ती है और इसी न्याय से दिल्ली के आसपास की बोली को आधार बनाकर खड़ीबोली का विकास हुआ था जिसे हिन्दी, हिन्दवी, या रेख्ता कहा गया। अपनी बोली से कटने और दूसरे बोली क्षेत्रो के लिए भी व्यवहार्य होने के कारण और उसी अनुपात में इसके व्याकरण की आवश्यकता बढ़ती गई जब कि कौरवी के वयाकरण की उस क्षेत्र के लिए कोई आवश्यकता नहीं।

यहां हम भाषा के दो भेद करें । एक स्वाभाविक भाषा जिसका सर्वोत्तम रूप बोलियों में मिलता है जिनमें स्थानीयता का इतना गहरा पुट होता है कि एक बोली क्षेत्र के भीतर इनके अनेकानेक रूप पाए जाते हैं, जिनसे इनकी प्राचीनता पर सन्देह होता है जब कि कोई भी बोली किसी शेक्ष भाषा से बहुत पुरानी होती है। पूरे बोली क्षेत्र के लिए यदि शिक्षा की जरूरतों से इनमें से किसी का चुनाव करना हो तो उसका भी व्याकरण तैयार करना होगा। इसलिए बृहत्तर संचार के लिए इन बोली क्षेत्रों के बीच अलपतम आयास से समझी जा सकने वाली भाषाओं का प्राधान्य हो जाता है । हिन्दी प्रदेश इनमें सबसे विचित्र है जिसका निर्माण कौरवी पर आधारित खड़ीबोली के उत्थान से बहुत पहले ब्रज, डिंगल, अवधी और मैथिली के माध्यम से हो गया था । इसलिए
इसके उन्नयन में सबसे प्रधान भूमिका भोजपुरी की थी।

यहां मैं एक तथ्य पर बल देना चाहूंगा। किताबी या शैक्ष भाषाओं का प्राण बोलियों में बसता है। उनसे दूरी बनाने के क्रम में वे बेजान और इकहरी होती जाती हैं। व्याकरण की आवश्यकता इनको समझने के लिए होती है। कोई व्याकरण इनकी सभी असंगतियों को
संभाल नहीं पाता। बोलियां ऊपरी तौर पर अपार भिन्नताओं के बाद भी एक दूसरी से अधिक निकट होती हैं और इनकी पारस्परिक निकटता तथाकथित भाषा परिवारों की सीमाओं को पार कर जाती है, क्योंकि इन सभी की जड़ें आदिम स्रोतों तक जाती हैं। अत: अनुनादी स्रोत इनमें अधिक स्पषट होते है। शैक्ष भाषाओं में मानव हस्तक्षेप बढ़ जाता है, और इसके कारण उनकी व्याख्या का कोई नियम अधूरा और भ्रामक होता है।

संस्कृत को समझने के लिए जिन धातुओं को बहुनिष्ठता के आधार पर निकाला गया वे जैसा कि हम पहले शिकायत कर आए हैं न तो यह सझने में हमारी मदद करती हैं कि उनको वह अर्थ कैसे मिला, न मूल ध्वनि के समग्र फैलाव को समेट पाती है। कई बार एक ही शब्द को समझने के लिए अवसर के अनुसार एकाधिक धातुओं का सहारा लाना पड़ता है फर भी अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए ऋषि शब्द को लें। इसे ऋष् और रि धातुओं से समझाने का प्र्रयत्न किया जाता है। ऋष् का अर्थ है चलना। ऋष् गतौ। रि का भी वही अर्थ। पर ऋष् का एक और अर्थ है, मारना, आहत करना। मेरे सामने आप्टे का कोश है, इसमे ऋषि का अर्थ दिया है – ‘अन्तःप्रेरणा सपन्न’ , an inspired person, ‘तपःपूत साधु, वीतराग’ a sanctified sage, an ascetic. ये आशय उस धातु में नहीो हैं। मारने और आहत करने का आशय उसी धातु में कैसे आ गया यह समझ में न आएगा। कारण इसका यह है कि कुछ और शब्द हैं जो ऋष् से आरंभ होते हैं – ऋष्टि – दोधारी तलवार, ऋष्य – एक मृग, और ऋषभ। इनके कारण यह खींज तान करके ये अर्बेथ मूल धातु पर आरोपित करने पड़े फिर भी पवित्रता, वीतरागता उसमें न अठ सकी।

रि में केवल गति है और रिष् में केवल हिंसा। रोचक यह है कि संस्कृत ही ऋष्टि के साथ रिष्टि भी उसी तलवार के आशय में प्रयुक्त है। अब एक नया प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या ऋ ध्वनि भी वैयाकरणों की रचना है. अब हम कल इसी समस्या को अनुनादी कोण से देखने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2018-04-04

भाषा और व्याकरण

व्याकरण से भाषा नहीं बनती, भाषा होती है और उसे बोलते हैं। अक्सर हम यह भी नहीं जानते कि हमारी भाषा का नाम क्या है। भाषा का व्याकरण होता है इसे अनपढ़ आदमी नहीं जानता। कुछ नियम होते हैं जिनको सीखने के बाद सही भाषा बोली जाती है उसके लिए इससे बड़ा मनोरंजन कोई हो ही नहीं सकता। कारण हम जिस सहजता से अपनी बोली के शब्द सीखते है, उसी तरह बिना किसी आयास के उन नियमों को आत्मसात करते चलते है। पहली बार किसी चीज से पाला पड़ने पर यह अवश्य पूछा जाता है, ‘इसे क्या कहते हैं’, पर यह कभी नहीं पूछा जाता कि इस बात को कैसे कहते है।

परन्तु किसी नई भाषा को सीखते समय हर चीज के साथ ‘इसे क्या कहते हैं, और बात के साथ, इसे कैसे कहते हैं, का सवाल खड़ा होता है। कहें, शब्दभंडार और व्याकरण दोनों की समस्या पराई भाषा के साथ या किसी भिन्न भाषा के प्रभाव के अनुपात में पैदा होती है। व्याकरण की प्रधानता भाषा के पराएपन की पहचान है।

भाषा की जाति नहीं होती, धर्म नहीं होता, उसका अपना क्षेत्र या प्रदेश होता है। यदि किसी कारण किसी क्षेत्र की भाषा में धर्म या जाति का दखल होता है तो उस दखल के अनुपात में ही, भाषा के भीतर एक ‘कूट’ भाषा का जन्म होता है जो उस समूह के भीतर समझी जाती है। इसी तर्क से संस्कृत को ब्राह्मणों की कूट भाषा और फारसी को विदेशी मूल के मुसलमानों की कूट भाषा बनी रही। सामान्य कामकाज स्थानीय जनों की भाषा के बिना चल नहीं सकता, इसलिए इनको भी जन भाषा सीखने की जरूरत पड़ती थी जब कि जन साधारण का काम अपनी बोली से चल जाता है और उसे इन भाषाओं को सीखने की बाध्यता नहीं होती। भाषा वह है जिसके बिना आप गूंगे हो जाते हैं और किसी क्षेत्र की भाषा वह है जिसे जाने बिना आप उस क्षेत्र में गूंगे बने रहते हैं। इस गूंगेपन से बचने की कोशिश में आक्रान्ताओं को भी विजितों की भाषा सीखनी पड़ती है और इसी न्याय से दिल्ली के आसपास की बोली को आधार बनाकर खड़ीबोली का विकास हुआ था जिसे हिन्दी, हिन्दवी, या रेख्ता कहा गया। अपनी बोली से कटने और दूसरे बोली क्षेत्रो के लिए भी व्यवहार्य होने के कारण और उसी अनुपात में इसके व्याकरण की आवश्यकता बढ़ती गई जब कि कौरवी के वयाकरण की उस क्षेत्र के लिए कोई आवश्यकता नहीं।

यहां हम भाषा के दो भेद करें । एक स्वाभाविक भाषा जिसका सर्वोत्तम रूप बोलियों में मिलता है जिनमें स्थानीयता का इतना गहरा पुट होता है कि एक बोली क्षेत्र के भीतर इनके अनेकानेक रूप पाए जाते हैं, जिनसे इनकी प्राचीनता पर सन्देह होता है जब कि कोई भी बोली किसी शेक्ष भाषा से बहुत पुरानी होती है। पूरे बोली क्षेत्र के लिए यदि शिक्षा की जरूरतों से इनमें से किसी का चुनाव करना हो तो उसका भी व्याकरण तैयार करना होगा। इसलिए बृहत्तर संचार के लिए इन बोली क्षेत्रों के बीच अलपतम आयास से समझी जा सकने वाली भाषाओं का प्राधान्य हो जाता है । हिन्दी प्रदेश इनमें सबसे विचित्र है जिसका निर्माण कौरवी पर आधारित खड़ीबोली के उत्थान से बहुत पहले ब्रज, डिंगल, अवधी और मैथिली के माध्यम से हो गया था । इसलिए
इसके उन्नयन में सबसे प्रधान भूमिका भोजपुरी की थी।

यहां मैं एक तथ्य पर बल देना चाहूंगा। किताबी या शैक्ष भाषाओं का प्राण बोलियों में बसता है। उनसे दूरी बनाने के क्रम में वे बेजान और इकहरी होती जाती हैं। व्याकरण की आवश्यकता इनको समझने के लिए होती है। कोई व्याकरण इनकी सभी असंगतियों को
संभाल नहीं पाता। बोलियां ऊपरी तौर पर अपार भिन्नताओं के बाद भी एक दूसरी से अधिक निकट होती हैं और इनकी पारस्परिक निकटता तथाकथित भाषा परिवारों की सीमाओं को पार कर जाती है, क्योंकि इन सभी की जड़ें आदिम स्रोतों तक जाती हैं। अत: अनुनादी स्रोत इनमें अधिक स्पषट होते है। शैक्ष भाषाओं में मानव हस्तक्षेप बढ़ जाता है, और इसके कारण उनकी व्याख्या का कोई नियम अधूरा और भ्रामक होता है।

संस्कृत को समझने के लिए जिन धातुओं को बहुनिष्ठता के आधार पर निकाला गया वे जैसा कि हम पहले शिकायत कर आए हैं न तो यह सझने में हमारी मदद करती हैं कि उनको वह अर्थ कैसे मिला, न मूल ध्वनि के समग्र फैलाव को समेट पाती है। कई बार एक ही शब्द को समझने के लिए अवसर के अनुसार एकाधिक धातुओं का सहारा लाना पड़ता है फर भी अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए ऋषि शब्द को लें। इसे ऋष् और रि धातुओं से समझाने का प्र्रयत्न किया जाता है। ऋष् का अर्थ है चलना। ऋष् गतौ। रि का भी वही अर्थ। पर ऋष् का एक और अर्थ है, मारना, आहत करना। मेरे सामने आप्टे का कोश है, इसमे ऋषि का अर्थ दिया है – ‘अन्तःप्रेरणा सपन्न’ , an inspired person, ‘तपःपूत साधु, वीतराग’ a sanctified sage, an ascetic. ये आशय उस धातु में नहीो हैं। मारने और आहत करने का आशय उसी धातु में कैसे आ गया यह समझ में न आएगा। कारण इसका यह है कि कुछ और शब्द हैं जो ऋष् से आरंभ होते हैं – ऋष्टि – दोधारी तलवार, ऋष्य – एक मृग, और ऋषभ। इनके कारण यह खींज तान करके ये अर्बेथ मूल धातु पर आरोपित करने पड़े फिर भी पवित्रता, वीतरागता उसमें न अठ सकी।

रि में केवल गति है और रिष् में केवल हिंसा। रोचक यह है कि संस्कृत ही ऋष्टि के साथ रिष्टि भी उसी तलवार के आशय में प्रयुक्त है। अब एक नया प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या ऋ ध्वनि भी वैयाकरणों की रचना है. अब हम कल इसी समस्या को अनुनादी कोण से देखने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2018-04-04

भाषा और व्याकरण

व्याकरण से भाषा नहीं बनती, भाषा होती है और उसे बोलते हैं। अक्सर हम यह भी नहीं जानते कि हमारी भाषा का नाम क्या है। भाषा का व्याकरण होता है इसे अनपढ़ आदमी नहीं जानता। कुछ नियम होते हैं जिनको सीखने के बाद सही भाषा बोली जाती है उसके लिए इससे बड़ा मनोरंजन कोई हो ही नहीं सकता। कारण हम जिस सहजता से अपनी बोली के शब्द सीखते है, उसी तरह बिना किसी आयास के उन नियमों को आत्मसात करते चलते है। पहली बार किसी चीज से पाला पड़ने पर यह अवश्य पूछा जाता है, ‘इसे क्या कहते हैं’, पर यह कभी नहीं पूछा जाता कि इस बात को कैसे कहते है।

परन्तु किसी नई भाषा को सीखते समय हर चीज के साथ ‘इसे क्या कहते हैं, और बात के साथ, इसे कैसे कहते हैं, का सवाल खड़ा होता है। कहें, शब्दभंडार और व्याकरण दोनों की समस्या पराई भाषा के साथ या किसी भिन्न भाषा के प्रभाव के अनुपात में पैदा होती है। व्याकरण की प्रधानता भाषा के पराएपन की पहचान है।

भाषा की जाति नहीं होती, धर्म नहीं होता, उसका अपना क्षेत्र या प्रदेश होता है। यदि किसी कारण किसी क्षेत्र की भाषा में धर्म या जाति का दखल होता है तो उस दखल के अनुपात में ही, भाषा के भीतर एक ‘कूट’ भाषा का जन्म होता है जो उस समूह के भीतर समझी जाती है। इसी तर्क से संस्कृत को ब्राह्मणों की कूट भाषा और फारसी को विदेशी मूल के मुसलमानों की कूट भाषा बनी रही। सामान्य कामकाज स्थानीय जनों की भाषा के बिना चल नहीं सकता, इसलिए इनको भी जन भाषा सीखने की जरूरत पड़ती थी जब कि जन साधारण का काम अपनी बोली से चल जाता है और उसे इन भाषाओं को सीखने की बाध्यता नहीं होती। भाषा वह है जिसके बिना आप गूंगे हो जाते हैं और किसी क्षेत्र की भाषा वह है जिसे जाने बिना आप उस क्षेत्र में गूंगे बने रहते हैं। इस गूंगेपन से बचने की कोशिश में आक्रान्ताओं को भी विजितों की भाषा सीखनी पड़ती है और इसी न्याय से दिल्ली के आसपास की बोली को आधार बनाकर खड़ीबोली का विकास हुआ था जिसे हिन्दी, हिन्दवी, या रेख्ता कहा गया। अपनी बोली से कटने और दूसरे बोली क्षेत्रो के लिए भी व्यवहार्य होने के कारण और उसी अनुपात में इसके व्याकरण की आवश्यकता बढ़ती गई जब कि कौरवी के वयाकरण की उस क्षेत्र के लिए कोई आवश्यकता नहीं।

यहां हम भाषा के दो भेद करें । एक स्वाभाविक भाषा जिसका सर्वोत्तम रूप बोलियों में मिलता है जिनमें स्थानीयता का इतना गहरा पुट होता है कि एक बोली क्षेत्र के भीतर इनके अनेकानेक रूप पाए जाते हैं, जिनसे इनकी प्राचीनता पर सन्देह होता है जब कि कोई भी बोली किसी शेक्ष भाषा से बहुत पुरानी होती है। पूरे बोली क्षेत्र के लिए यदि शिक्षा की जरूरतों से इनमें से किसी का चुनाव करना हो तो उसका भी व्याकरण तैयार करना होगा। इसलिए बृहत्तर संचार के लिए इन बोली क्षेत्रों के बीच अलपतम आयास से समझी जा सकने वाली भाषाओं का प्राधान्य हो जाता है । हिन्दी प्रदेश इनमें सबसे विचित्र है जिसका निर्माण कौरवी पर आधारित खड़ीबोली के उत्थान से बहुत पहले ब्रज, डिंगल, अवधी और मैथिली के माध्यम से हो गया था । इसलिए
इसके उन्नयन में सबसे प्रधान भूमिका भोजपुरी की थी।

यहां मैं एक तथ्य पर बल देना चाहूंगा। किताबी या शैक्ष भाषाओं का प्राण बोलियों में बसता है। उनसे दूरी बनाने के क्रम में वे बेजान और इकहरी होती जाती हैं। व्याकरण की आवश्यकता इनको समझने के लिए होती है। कोई व्याकरण इनकी सभी असंगतियों को
संभाल नहीं पाता। बोलियां ऊपरी तौर पर अपार भिन्नताओं के बाद भी एक दूसरी से अधिक निकट होती हैं और इनकी पारस्परिक निकटता तथाकथित भाषा परिवारों की सीमाओं को पार कर जाती है, क्योंकि इन सभी की जड़ें आदिम स्रोतों तक जाती हैं। अत: अनुनादी स्रोत इनमें अधिक स्पषट होते है। शैक्ष भाषाओं में मानव हस्तक्षेप बढ़ जाता है, और इसके कारण उनकी व्याख्या का कोई नियम अधूरा और भ्रामक होता है।

संस्कृत को समझने के लिए जिन धातुओं को बहुनिष्ठता के आधार पर निकाला गया वे जैसा कि हम पहले शिकायत कर आए हैं न तो यह सझने में हमारी मदद करती हैं कि उनको वह अर्थ कैसे मिला, न मूल ध्वनि के समग्र फैलाव को समेट पाती है। कई बार एक ही शब्द को समझने के लिए अवसर के अनुसार एकाधिक धातुओं का सहारा लाना पड़ता है फर भी अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए ऋषि शब्द को लें। इसे ऋष् और रि धातुओं से समझाने का प्र्रयत्न किया जाता है। ऋष् का अर्थ है चलना। ऋष् गतौ। रि का भी वही अर्थ। पर ऋष् का एक और अर्थ है, मारना, आहत करना। मेरे सामने आप्टे का कोश है, इसमे ऋषि का अर्थ दिया है – ‘अन्तःप्रेरणा सपन्न’ , an inspired person, ‘तपःपूत साधु, वीतराग’ a sanctified sage, an ascetic. ये आशय उस धातु में नहीो हैं। मारने और आहत करने का आशय उसी धातु में कैसे आ गया यह समझ में न आएगा। कारण इसका यह है कि कुछ और शब्द हैं जो ऋष् से आरंभ होते हैं – ऋष्टि – दोधारी तलवार, ऋष्य – एक मृग, और ऋषभ। इनके कारण यह खींज तान करके ये अर्बेथ मूल धातु पर आरोपित करने पड़े फिर भी पवित्रता, वीतरागता उसमें न अठ सकी।

रि में केवल गति है और रिष् में केवल हिंसा। रोचक यह है कि संस्कृत ही ऋष्टि के साथ रिष्टि भी उसी तलवार के आशय में प्रयुक्त है। अब एक नया प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या ऋ ध्वनि भी वैयाकरणों की रचना है. अब हम कल इसी समस्या को अनुनादी कोण से देखने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2018-04-04

भाषा पर चर्चा की भाषा या प्रस्तुति का रूप यदि ऐसा हो कि सुनने या पढ़ने वालों को उसे समझने में कठिनाई हो तो इस पर दुबारा सोचने की जरूरत है। जिन लोगों ने इसकी शिकायत की है उनका आभारी हूं। पर यह भी सच है कि फेस बुक पर स्थान की सीमा और विषय विस्तार से पाठकों की चिन्ता के अतिरिक्त मेरे साथ एक और भी चिन्ता है जिसे बड़ी खूबसूरती से मीर ने पेश किया है:
फुर्सते बूदो बाश यां कम है।
काम जो कुछ करो शिताब करो ।

८७ के पड़ाव पर अस्तित्व और दुनिया में टिके रहने की फुर्सत के कम होने और जितना अब तक किया लगभग उतना ही करने को बाकी रह जाने के कारण हाथ आए काम को जल्दी निपटाने की चिन्ता में भी बहुत सी बातें उतने विस्तार से नहीं रख पाता जो विषय से पूरी तरह अनभिज्ञ लोगों की समझ में आने के लिए जरूरी है। मेरा प्रयत्न होगा कि इस दूरी को कम कर सकूं। पर मेरा सुझाव है कि ऐसे लोगों को भी कुछ प्रयत्न करना चाहिए। मेरे द्वारा प्रयुक्त कोई शब्द समझ में न आए तो मुझसे उसका अर्थ न पूछें, शब्दकोश देखें। अब तो आन लाइन भी शब्दों का अर्थ जाना जा सकता है।

भाषा पर प्रस्तुत चर्चा, पसन्द की संख्या बढाने के लिए नहीं है । इसकी किश्तों को तब तक न पढ़ें जब तक ‘असंपादित’ लिखा है। बिना पूरा पढ़े आनन फानन में लाइक करने वालों के साथ मेरी मैत्री समाप्त भी हो सकती है, इसका ध्यान रखें।

मैं चाहता हूं मेरे वे मित्र जो विश्व विद्यालयों में रहे तो हिन्दी के प्रोफसर हैं पर अपनी उसी योग्यता के दम पर आए दिन देश की राजनीतिक दिशा सुधारने के लिए जुमलेबाजी से ले कर, छिद्रान्वेषी प्रवचन करते रहते हैं वे इस लेख माला में कमियां निकालें जो उनके अधिकार क्षेत्र में भी आता है, जिससे इसकी गुणवत्ता बढे और यदि ऐसा करने की योग्यता नहीं तो शर्म से डूब मरें कि वे अपने विषय को तो जानते नहीं, जिस विषय को जानते नहीं उसमें दखल दे कर लोगों को भ्रमित करते और अपनी साख को दांव पर लगाते हैं। यदि वे सचमुच इस विषय में बहुत कम जानते हैं तो प्रायश्चित्त स्वरूप पूरे मनोयोग से इनको पढ़ें और अपने प्रभाव क्षेत्र में इसका प्रसार करें जिससे उनके छात्र और उन छात्रों के छात्र उन की तरह मूर्ख न रह जायं।

अन्तत: कल की पोस्ट के पहले वाक्य का कुछ खुलासा कर दूं। मेरा आशय था कि तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषाशास्त्रीय सरोकारों से नहीं आरम्भ किया गया था अपितु राजनीतिक और नस्लवादी सरोकारों से आरंभ किया गया था इसलिए आरंभ से ही इसमें फरेब और अर्ध सत्यों का सहारा लिया गया, इसे अकादमिक जालसाजी का मनमोहक नमूना माना जा सकता है। इसकी पड़ताल आगे के लेखों में होनी है।

Post – 2018-04-04

भाषा पर चर्चा की भाषा या प्रस्तुति का रूप यदि ऐसा हो कि सुनने या पढ़ने वालों को उसे समझने में कठिनाई हो तो इस पर दुबारा सोचने की जरूरत है। जिन लोगों ने इसकी शिकायत की है उनका आभारी हूं। पर यह भी सच है कि फेस बुक पर स्थान की सीमा और विषय विस्तार से पाठकों की चिन्ता के अतिरिक्त मेरे साथ एक और भी चिन्ता है जिसे बड़ी खूबसूरती से मीर ने पेश किया है:
फुर्सते बूदो बाश यां कम है।
काम जो कुछ करो शिताब करो ।

८७ के पड़ाव पर अस्तित्व और दुनिया में टिके रहने की फुर्सत के कम होने और जितना अब तक किया लगभग उतना ही करने को बाकी रह जाने के कारण हाथ आए काम को जल्दी निपटाने की चिन्ता में भी बहुत सी बातें उतने विस्तार से नहीं रख पाता जो विषय से पूरी तरह अनभिज्ञ लोगों की समझ में आने के लिए जरूरी है। मेरा प्रयत्न होगा कि इस दूरी को कम कर सकूं। पर मेरा सुझाव है कि ऐसे लोगों को भी कुछ प्रयत्न करना चाहिए। मेरे द्वारा प्रयुक्त कोई शब्द समझ में न आए तो मुझसे उसका अर्थ न पूछें, शब्दकोश देखें। अब तो आन लाइन भी शब्दों का अर्थ जाना जा सकता है।

भाषा पर प्रस्तुत चर्चा, पसन्द की संख्या बढाने के लिए नहीं है । इसकी किश्तों को तब तक न पढ़ें जब तक ‘असंपादित’ लिखा है। बिना पूरा पढ़े आनन फानन में लाइक करने वालों के साथ मेरी मैत्री समाप्त भी हो सकती है, इसका ध्यान रखें।

मैं चाहता हूं मेरे वे मित्र जो विश्व विद्यालयों में रहे तो हिन्दी के प्रोफसर हैं पर अपनी उसी योग्यता के दम पर आए दिन देश की राजनीतिक दिशा सुधारने के लिए जुमलेबाजी से ले कर, छिद्रान्वेषी प्रवचन करते रहते हैं वे इस लेख माला में कमियां निकालें जो उनके अधिकार क्षेत्र में भी आता है, जिससे इसकी गुणवत्ता बढे और यदि ऐसा करने की योग्यता नहीं तो शर्म से डूब मरें कि वे अपने विषय को तो जानते नहीं, जिस विषय को जानते नहीं उसमें दखल दे कर लोगों को भ्रमित करते और अपनी साख को दांव पर लगाते हैं। यदि वे सचमुच इस विषय में बहुत कम जानते हैं तो प्रायश्चित्त स्वरूप पूरे मनोयोग से इनको पढ़ें और अपने प्रभाव क्षेत्र में इसका प्रसार करें जिससे उनके छात्र और उन छात्रों के छात्र उन की तरह मूर्ख न रह जायं।

अन्तत: कल की पोस्ट के पहले वाक्य का कुछ खुलासा कर दूं। मेरा आशय था कि तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषाशास्त्रीय सरोकारों से नहीं आरम्भ किया गया था अपितु राजनीतिक और नस्लवादी सरोकारों से आरंभ किया गया था इसलिए आरंभ से ही इसमें फरेब और अर्ध सत्यों का सहारा लिया गया, इसे अकादमिक जालसाजी का मनमोहक नमूना माना जा सकता है। इसकी पड़ताल आगे के लेखों में होनी है।

Post – 2018-04-04

भाषा पर चर्चा की भाषा या प्रस्तुति का रूप यदि ऐसा हो कि सुनने या पढ़ने वालों को उसे समझने में कठिनाई हो तो इस पर दुबारा सोचने की जरूरत है। जिन लोगों ने इसकी शिकायत की है उनका आभारी हूं। पर यह भी सच है कि फेस बुक पर स्थान की सीमा और विषय विस्तार से पाठकों की चिन्ता के अतिरिक्त मेरे साथ एक और भी चिन्ता है जिसे बड़ी खूबसूरती से मीर ने पेश किया है:
फुर्सते बूदो बाश यां कम है।
काम जो कुछ करो शिताब करो ।

८७ के पड़ाव पर अस्तित्व और दुनिया में टिके रहने की फुर्सत के कम होने और जितना अब तक किया लगभग उतना ही करने को बाकी रह जाने के कारण हाथ आए काम को जल्दी निपटाने की चिन्ता में भी बहुत सी बातें उतने विस्तार से नहीं रख पाता जो विषय से पूरी तरह अनभिज्ञ लोगों की समझ में आने के लिए जरूरी है। मेरा प्रयत्न होगा कि इस दूरी को कम कर सकूं। पर मेरा सुझाव है कि ऐसे लोगों को भी कुछ प्रयत्न करना चाहिए। मेरे द्वारा प्रयुक्त कोई शब्द समझ में न आए तो मुझसे उसका अर्थ न पूछें, शब्दकोश देखें। अब तो आन लाइन भी शब्दों का अर्थ जाना जा सकता है।

भाषा पर प्रस्तुत चर्चा, पसन्द की संख्या बढाने के लिए नहीं है । इसकी किश्तों को तब तक न पढ़ें जब तक ‘असंपादित’ लिखा है। बिना पूरा पढ़े आनन फानन में लाइक करने वालों के साथ मेरी मैत्री समाप्त भी हो सकती है, इसका ध्यान रखें।

मैं चाहता हूं मेरे वे मित्र जो विश्व विद्यालयों में रहे तो हिन्दी के प्रोफसर हैं पर अपनी उसी योग्यता के दम पर आए दिन देश की राजनीतिक दिशा सुधारने के लिए जुमलेबाजी से ले कर, छिद्रान्वेषी प्रवचन करते रहते हैं वे इस लेख माला में कमियां निकालें जो उनके अधिकार क्षेत्र में भी आता है, जिससे इसकी गुणवत्ता बढे और यदि ऐसा करने की योग्यता नहीं तो शर्म से डूब मरें कि वे अपने विषय को तो जानते नहीं, जिस विषय को जानते नहीं उसमें दखल दे कर लोगों को भ्रमित करते और अपनी साख को दांव पर लगाते हैं। यदि वे सचमुच इस विषय में बहुत कम जानते हैं तो प्रायश्चित्त स्वरूप पूरे मनोयोग से इनको पढ़ें और अपने प्रभाव क्षेत्र में इसका प्रसार करें जिससे उनके छात्र और उन छात्रों के छात्र उन की तरह मूर्ख न रह जायं।

अन्तत: कल की पोस्ट के पहले वाक्य का कुछ खुलासा कर दूं। मेरा आशय था कि तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषाशास्त्रीय सरोकारों से नहीं आरम्भ किया गया था अपितु राजनीतिक और नस्लवादी सरोकारों से आरंभ किया गया था इसलिए आरंभ से ही इसमें फरेब और अर्ध सत्यों का सहारा लिया गया, इसे अकादमिक जालसाजी का मनमोहक नमूना माना जा सकता है। इसकी पड़ताल आगे के लेखों में होनी है।

Post – 2018-04-03

भाषा का शास्त्र बनाम भाषाविज्ञान

भाषा विज्ञान के नाम पर कॉलेजों में जो कुछ पढ़ाया जाता है वह इंद्रजाल है। इसकी आधारशिला ही टेढ़ी रखी गई। संस्कृत भाषा और साहित्य जिस व्याकरण पर आधारित है उसका भी आधार गलत है। यह इस विश्वास पर आधारित है संस्कृत भाषा ही नहीं, चारों वेद तक सृष्टि से पहले अस्तित्व में थे।

जिस युग का यह विश्वास है, उसे हम सांस्कृतिक संक्रमण काल कह सकते हैं, यद्यपि संक्रमण का यह दौर भी बहुत लंबा है। इसमें वेदों की नए सिरे से खोज करने के साथ ही, उसका अर्थ समझने की भी छटपटाहट दिखाई देती है। अनिश्चय के इस दौर में एक चीज ही संदेह से परे थी। यह थी वेदों की प्रामाणिकता, उसी विनष्ट काल की उपलब्धियों तक पहुंचले की तो यप सारी व्यग्रता थी। उनमें जो कुछ भी लिखा था. उसका जितना भी जिस रूप में समझ में आ रहा था वह अकाट्य था।

हम पुरुष सूक्त की चर्चा पीछे कर आए, जिसमें कृषि कर्म को सृष्टि से और उससे अर्जित समृद्धि और अन्य उपलब्धियों को यज्ञपुरुष के अंगों में बदल दिया गया यज्ञ के रूपक को पूरा करने के लिए साम और यजुष सहित वेद को सृष्टि से पूर्ववर्ती कल्पित कर लिया गया अतः संस्कृत भाषा को सृष्टि से पहले से अस्तित्व में होना ही था । दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी भी शुरुआत एक गलत समझ के साथ हुई, और इसलिए असाधारण पांडित्य के बावजूद हमारा भाषाचिंतन गलत दिशा में चला गया।

यह बहस की बात नहीं है कि आदिम अवस्था का मनुष्य है निरक्षर था, उसकी भाषा एक बोली के रूप में भी नितांत अविकसित थी, जब कि वेदों की भाषा परिपक्वता के ऐसे चरण पर पहुंची हुई है कि उसके ही मानकों पर संस्कृत भाषा का ढांचा तैयार किया गया और इस क्रम में मानक संस्कृत को वैदिक भाषा की तुलना में अधिक संकुचित कर दिया गया । इस क्रम में आडंबर तो बढ़ा, परंतु उसी अनुपात में इसकी प्राणशक्ति क्षीण हुई, और यह व्यापक संपर्क से कट गई ।नहीं, कट गई कहना अर्धसत्य होगा। भाषा को निजी संपदा बनाने के लिए, इसे व्यापक जन समाज से काटकर अलग कर दिया गया। यह भाषा के स्थान पर कूट भाषा में बदल गई।

यहां मैं इतिहास के एक ऐसे पहलू की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जिसकी चर्चा तो मैंने कई बार की है परंतु इसके समग्र आयाम को स्वयं समझ नहीं पाया ।.यह है वह महाअकाल जिसकी चर्चा मैं करता हूं । उसके बाद ही खोई हुई सांस्कृतिक संपदा के पुनरुद्धार के क्रम में वह संक्रमण कॉल आया था जिसका ऊपर हमने उल्लेख किया है।

वह महाअकाल केवल पश्चिमी भारत तक सीमित नहीं था। यह मध्य एशिया और उससे आगे यूरोप तक एक चौड़ी पट्टी में फैला था। इससे आबादी का उत्तर दक्षिण की दिशा में जो पूरे विस्तार में पलायन हुआ, उसकी भारोपीय भाषा के प्रसार में बहुत निर्णायक भूमिका रही। मलेशिया में घोड़े का शिकार और पालन और प्रशिक्षण देते हुए अश्व-व्यापार करते हुए जो भारतीय व्यापारी (सिंधी और गुजराती ) बसे हुए थे उनका यूगोस्लाविया लिथुआनिया स्कैंडेनेविया की ओर विस्तार हुआ विस्तार हुआ और दक्षिण में एशिया माइनर के व्यापार केंद्रों पर इनका अधिकार हो गया, जिसका अन्य परिणाम था हित्ती, मितन्नी कस्सी जनों का प्रभुत्व।

भारत में मध्यदेश से दक्षिण की ओर गुजरात और उत्तर की ओर तथा पूर्व मगध की ओर पलायन और इन पिछड़े हुए क्षेत्रों का सांस्कृतिक उत्थान। परंतु इसका जो सबसे दुखद पक्ष था उस त्रासदी के दौरान हुए जनसंहार की दहशत के रूप में बना रहना । यह दहशत उनकी अंतश्चेतना में समा गई। बाहर से पूरी तरह कटने का प्रयास किया गया और केवल मध्य देश में सिकुड़कर रहने की चिंता भारतीय चेतना का अंग बन गई। विदेश यात्राएं वर्जित। समुद्री यात्राएं वर्जित। भारतीय भूभाग में, जिसमें उनके तीर्थ तक थे, प्रवेश करने पर धर्म का क्षय होने लगा और इसके लिए प्रायश्चित्त किया जाने लगा।

इसी व्यापक संकुचन का घरेलू पक्ष यह कि अपनी भाषा और संस्कृति की पवित्रता की रक्षा के लिए अपने ही समाज के वृहत्तर हिस्से से अपने को, अपनी भाषा को, कर्मकांड को बचा कर अपने आप में सिकुड़कर रहने की विवशता को श्रेष्ठता बोध से जोड़ दिया गया। इसकी दुर्भाग्यपूर्ण परिणति यह थी कि कार्य विभाजन पर निर्धारित वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई।

इस दौर की जिन उपलब्धियों पर हम गर्व करते हैं वह वास्तव में भारतीय समाज के अश्मी,भवन की प्रक्रिया का आरंभ है। इसकी गतिशीलता के अवरुद्ध होने की पहचान है। और इस दृष्टि से हम अपनी पूरी व्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन की मांग करते हैं।

भाषा के सवाल को केंद्र में रखते हुए अपना विचार आरंभ किया था , इसलिए इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि उक्त कारणों से वैदिक जड़ों की खोज करने वालों की समझ वैदिक चिंतकों से ठीक उलटी है।

जैसा कि हम पहले भी कह आए हैं, ऋग्वेदिक भाषा चिंतकों के अनुसार भाषा का जन्म प्राकृतिक परिवेश से हुआ, उसके सार्थक सुबोध और उच्चारण में सुगम ध्वनियों का चयन करते हुए मनुष्य भाषा का विकास हुआ। परंतु हमारे वैयाकरणों ने अपने बुद्धि बल से सार्थक इकाई का चयन करते हुए धातु का निर्धारण किया और उन में जुड़ने वाले प्रत्यय उपसर्ग और अंतःसर्ग के आधार पर पूरी भाषा का ढांचा तैयार किया और उसे नए शब्दों की सृष्टि की इंजीनियरी विकसित की।

यहां मैं दो तथ्यों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। यह सामान्य मान्यता है किसंस्कृत भारत के किसी भाग की बोलचाल की भाषा नहीं थी। पाणिनीय संस्कृत के विषय में यह सच है परंतु इसलिए कि उसे दुरूह और पवित्र बनाकर, सचेत रूप में, आम लोगों की पहुंच से काट लिया गया । वैदिक काल में यह संभ्रांत जनों को छोड़कर शेष समाज के लिए घरेलू बोलचाल की भाषा तो नहीं थी, परंतु् सार्वजनिक व्यवहार की ऐसी भाषा थी जिसे सभी समझ लेते थे और कुछ गलतियों के साथ स्वयं भी बोल लेते थे, जिसके प्रमाण ऋग्वेद में पाए जाते हैं। कहें ऋग्वेद के समय तक साहित्यिक और सांस्कृतिक संचार की भाषा लगभग वही थी जो आज अपने क्षेत्र में हिंदी है और वैदिक समाज में भी सामान्य घरेलू कामकाज में बोलियों का प्रयोग होता था जिनसे संस्कृत प्रभावित होती थी और जिनका प्रभाव साहित्यिक और सांस्कृतिक संचार की भाषा पर पड़ता था। पाणिनीय संस्कृत के बाद यह क्रम पूरी तरह बंद नहीं हुआ परंतु मंद अवश्य हो गया।

दूसरी बात जिसकी और मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं, वह यह है कि आधुनिक काल में तुलनात्मक भाषाविज्ञान का अध्ययन आरंभ हुआ तो वह पाणिनीय व्याकरण को आदर्श मान कर, उसी का हुबहु नकल करते हुए विकसित हुआ, इसलिए वह भी उल्टे सिरे से आरंभ हुआ अर्थात मानक भाषा की ओर से बोलियों तरफ यात्रा की गई और बोलियों को मानक भाषा के ह्रास से उत्पन्न मान लिया गया और भाषा की समझ को उलट दिया गया।

इसके लिए हम अकेले पाश्चात्य विद्वानों को दोष नहीं दे सकते। यह समझ स्वयं हमारे भाषा चिंतकों की थी जिनका उन्होंने आंख मूंदकर अनुसरण किया। यद्यपि मौलिक बनने के प्रयास में उन्होंने कुछ चीजों को उलट कर प्रस्तुत किया। उदाहरण के लिए, पाणिनीय विमर्श में उच्चारण की प्रक्रिया भीतर से बाहर की ओर है उन्होंने बाहर से भीतर की ओर कर दिया।
हास्यास्पद भले लगे परंतु चोरी के माल को छिपाने के लिए पर्दे की जरूरत तो होती ही है। उन्होंने उल्टी के बाद पलटी मारी, उसका नतीजा है उनका तुलनात्मक भाषाविज्ञान जो उतना ही पाखंडपूर्ण है जितना जितना मूर्खता पूर्ण और हास्यास्पद।

इस नतीजे पर पहुंचने के लिए मैंने लंबे समय तक काम किया है और उन दुर्बलताओं को पहचाना है जिनकी ओर आज तक विद्वान ने ध्यान नहीं दिया था।

उदाहरण के लिए धातुओं के विषय में जो उपलब्ध सामग्री थी उसका अध्ययन करने के बाद मैंने तीन तरह के विश्लेषण किए पहला अधिकतम धातुओं का सम्बन्ध गति, ध्वनि, और हिंसा से क्यों है. इसके परिणाम मैंने आर्य द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता में , अपनी तब की जान सीमा में प्रस्तुत किए थे। इसके बाद मैंने स्वयं तीन तरह के पाठ तैयार किए एक गण पाठ के आधार पर दूसरा अनुक्रम के अनुसार और तीसरा एक ही अर्थ में विभिन्न गणोंमें आने वाली धातुओं के रूप में ।

मैं यहां पर केवल एक पक्ष की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि यदि एक ही अर्थ में एक ही धातु तीन या चार गणों में हो या कहें उसकी रूपावली में अंतर हो,- तो इसका अर्थ है उस भाषा का उपयोग उतने भाषाई पृष्ठभूमियों से निकले हुए लोग कर रहे हैं। अर्थात संस्कृत में तीन चार भाषा परिवारों में गिने जाने वाले समुदायों का योगदान था। इसे हाल के दिनों में कुछ भाषा वैज्ञानिकों ने लक्ष्य तो किया है परंतु भाषा विज्ञान की वर्तमान सीमाओं के कारण उसे सही संदर्भ नहीं दे पाए हैं। अन्य सभी सीमाओं के रहते हुए भी वैदिक भाषा भारतीय अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा थी,जबकि संस्कृत को केवल ब्राह्मणों की भाषा बनाकर रख दिया गया।

भाषाओं के अध्ययन का आधार बदलने के बाद ही हम उनका वैज्ञानिक अध्ययन कर सकते हैं ।मेरा कार्य उसी दिशा में, मेरी सीमाओं को देखते हुए एक दुस्साहसिक प्रयत्न है। आज के दिन तक ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन भाषाशास्त्र रहा है और जब तक विज्ञान होने का दावा करता है, परंतु भाषा वैज्ञानिकों के उसे अपनी गोष्ठी में स्थान देने के उपयुक्त नहीं माना। ऐसा करके उन्होंने गलत नहीं किया है परंतु उनकी इस निराशा को भी सही नहीं माना जा सकता कि द्विकालिक अध्ययन वैज्ञानिक नहीं हो सकता। जहां आरंभ से ही सिर के बल चला गया हो, इस नतीजे पर पहुंचना कि चलने का तरीका वैज्ञानिक नहीं है, गलत नहीं कहा जा सकता। एक बार पांव से चल कर देखें और तब पता चलेगा इसमें कितने अंतर्विरोध हैं और कितनी समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान हो जाता है यह प्राकृतिक संगीत या सूनृता वाक् से मानवीय व्यवहार की भाषा की विकास यात्रा से ही संभव है। इसमें न तो धातु प्रत्यय उपसर्ग की पद्धति हमारी मदद कर सकती है और न ही पाश्चात्य विद्वानों का अध्ययन और उनकी उद्भावनाओं के आधार पर तैयार किया गया आद्य भारोपीय का धातुकोश। हम इनकी सीमाओं पर प्रमाणों के साथ कल विचार करेंगे।

Post – 2018-04-03

भाषा का शास्त्र बनाम भाषाविज्ञान

भाषा विज्ञान के नाम पर कॉलेजों में जो कुछ पढ़ाया जाता है वह इंद्रजाल है। इसकी आधारशिला ही टेढ़ी रखी गई। संस्कृत भाषा और साहित्य जिस व्याकरण पर आधारित है उसका भी आधार गलत है। यह इस विश्वास पर आधारित है संस्कृत भाषा ही नहीं, चारों वेद तक सृष्टि से पहले अस्तित्व में थे।

जिस युग का यह विश्वास है, उसे हम सांस्कृतिक संक्रमण काल कह सकते हैं, यद्यपि संक्रमण का यह दौर भी बहुत लंबा है। इसमें वेदों की नए सिरे से खोज करने के साथ ही, उसका अर्थ समझने की भी छटपटाहट दिखाई देती है। अनिश्चय के इस दौर में एक चीज ही संदेह से परे थी। यह थी वेदों की प्रामाणिकता, उसी विनष्ट काल की उपलब्धियों तक पहुंचले की तो यप सारी व्यग्रता थी। उनमें जो कुछ भी लिखा था. उसका जितना भी जिस रूप में समझ में आ रहा था वह अकाट्य था।

हम पुरुष सूक्त की चर्चा पीछे कर आए, जिसमें कृषि कर्म को सृष्टि से और उससे अर्जित समृद्धि और अन्य उपलब्धियों को यज्ञपुरुष के अंगों में बदल दिया गया यज्ञ के रूपक को पूरा करने के लिए साम और यजुष सहित वेद को सृष्टि से पूर्ववर्ती कल्पित कर लिया गया अतः संस्कृत भाषा को सृष्टि से पहले से अस्तित्व में होना ही था । दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी भी शुरुआत एक गलत समझ के साथ हुई, और इसलिए असाधारण पांडित्य के बावजूद हमारा भाषाचिंतन गलत दिशा में चला गया।

यह बहस की बात नहीं है कि आदिम अवस्था का मनुष्य है निरक्षर था, उसकी भाषा एक बोली के रूप में भी नितांत अविकसित थी, जब कि वेदों की भाषा परिपक्वता के ऐसे चरण पर पहुंची हुई है कि उसके ही मानकों पर संस्कृत भाषा का ढांचा तैयार किया गया और इस क्रम में मानक संस्कृत को वैदिक भाषा की तुलना में अधिक संकुचित कर दिया गया । इस क्रम में आडंबर तो बढ़ा, परंतु उसी अनुपात में इसकी प्राणशक्ति क्षीण हुई, और यह व्यापक संपर्क से कट गई ।नहीं, कट गई कहना अर्धसत्य होगा। भाषा को निजी संपदा बनाने के लिए, इसे व्यापक जन समाज से काटकर अलग कर दिया गया। यह भाषा के स्थान पर कूट भाषा में बदल गई।

यहां मैं इतिहास के एक ऐसे पहलू की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जिसकी चर्चा तो मैंने कई बार की है परंतु इसके समग्र आयाम को स्वयं समझ नहीं पाया ।.यह है वह महाअकाल जिसकी चर्चा मैं करता हूं । उसके बाद ही खोई हुई सांस्कृतिक संपदा के पुनरुद्धार के क्रम में वह संक्रमण कॉल आया था जिसका ऊपर हमने उल्लेख किया है।

वह महाअकाल केवल पश्चिमी भारत तक सीमित नहीं था। यह मध्य एशिया और उससे आगे यूरोप तक एक चौड़ी पट्टी में फैला था। इससे आबादी का उत्तर दक्षिण की दिशा में जो पूरे विस्तार में पलायन हुआ, उसकी भारोपीय भाषा के प्रसार में बहुत निर्णायक भूमिका रही। मलेशिया में घोड़े का शिकार और पालन और प्रशिक्षण देते हुए अश्व-व्यापार करते हुए जो भारतीय व्यापारी (सिंधी और गुजराती ) बसे हुए थे उनका यूगोस्लाविया लिथुआनिया स्कैंडेनेविया की ओर विस्तार हुआ विस्तार हुआ और दक्षिण में एशिया माइनर के व्यापार केंद्रों पर इनका अधिकार हो गया, जिसका अन्य परिणाम था हित्ती, मितन्नी कस्सी जनों का प्रभुत्व।

भारत में मध्यदेश से दक्षिण की ओर गुजरात और उत्तर की ओर तथा पूर्व मगध की ओर पलायन और इन पिछड़े हुए क्षेत्रों का सांस्कृतिक उत्थान। परंतु इसका जो सबसे दुखद पक्ष था उस त्रासदी के दौरान हुए जनसंहार की दहशत के रूप में बना रहना । यह दहशत उनकी अंतश्चेतना में समा गई। बाहर से पूरी तरह कटने का प्रयास किया गया और केवल मध्य देश में सिकुड़कर रहने की चिंता भारतीय चेतना का अंग बन गई। विदेश यात्राएं वर्जित। समुद्री यात्राएं वर्जित। भारतीय भूभाग में, जिसमें उनके तीर्थ तक थे, प्रवेश करने पर धर्म का क्षय होने लगा और इसके लिए प्रायश्चित्त किया जाने लगा।

इसी व्यापक संकुचन का घरेलू पक्ष यह कि अपनी भाषा और संस्कृति की पवित्रता की रक्षा के लिए अपने ही समाज के वृहत्तर हिस्से से अपने को, अपनी भाषा को, कर्मकांड को बचा कर अपने आप में सिकुड़कर रहने की विवशता को श्रेष्ठता बोध से जोड़ दिया गया। इसकी दुर्भाग्यपूर्ण परिणति यह थी कि कार्य विभाजन पर निर्धारित वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई।

इस दौर की जिन उपलब्धियों पर हम गर्व करते हैं वह वास्तव में भारतीय समाज के अश्मी,भवन की प्रक्रिया का आरंभ है। इसकी गतिशीलता के अवरुद्ध होने की पहचान है। और इस दृष्टि से हम अपनी पूरी व्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन की मांग करते हैं।

भाषा के सवाल को केंद्र में रखते हुए अपना विचार आरंभ किया था , इसलिए इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि उक्त कारणों से वैदिक जड़ों की खोज करने वालों की समझ वैदिक चिंतकों से ठीक उलटी है।

जैसा कि हम पहले भी कह आए हैं, ऋग्वेदिक भाषा चिंतकों के अनुसार भाषा का जन्म प्राकृतिक परिवेश से हुआ, उसके सार्थक सुबोध और उच्चारण में सुगम ध्वनियों का चयन करते हुए मनुष्य भाषा का विकास हुआ। परंतु हमारे वैयाकरणों ने अपने बुद्धि बल से सार्थक इकाई का चयन करते हुए धातु का निर्धारण किया और उन में जुड़ने वाले प्रत्यय उपसर्ग और अंतःसर्ग के आधार पर पूरी भाषा का ढांचा तैयार किया और उसे नए शब्दों की सृष्टि की इंजीनियरी विकसित की।

यहां मैं दो तथ्यों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। यह सामान्य मान्यता है किसंस्कृत भारत के किसी भाग की बोलचाल की भाषा नहीं थी। पाणिनीय संस्कृत के विषय में यह सच है परंतु इसलिए कि उसे दुरूह और पवित्र बनाकर, सचेत रूप में, आम लोगों की पहुंच से काट लिया गया । वैदिक काल में यह संभ्रांत जनों को छोड़कर शेष समाज के लिए घरेलू बोलचाल की भाषा तो नहीं थी, परंतु् सार्वजनिक व्यवहार की ऐसी भाषा थी जिसे सभी समझ लेते थे और कुछ गलतियों के साथ स्वयं भी बोल लेते थे, जिसके प्रमाण ऋग्वेद में पाए जाते हैं। कहें ऋग्वेद के समय तक साहित्यिक और सांस्कृतिक संचार की भाषा लगभग वही थी जो आज अपने क्षेत्र में हिंदी है और वैदिक समाज में भी सामान्य घरेलू कामकाज में बोलियों का प्रयोग होता था जिनसे संस्कृत प्रभावित होती थी और जिनका प्रभाव साहित्यिक और सांस्कृतिक संचार की भाषा पर पड़ता था। पाणिनीय संस्कृत के बाद यह क्रम पूरी तरह बंद नहीं हुआ परंतु मंद अवश्य हो गया।

दूसरी बात जिसकी और मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं, वह यह है कि आधुनिक काल में तुलनात्मक भाषाविज्ञान का अध्ययन आरंभ हुआ तो वह पाणिनीय व्याकरण को आदर्श मान कर, उसी का हुबहु नकल करते हुए विकसित हुआ, इसलिए वह भी उल्टे सिरे से आरंभ हुआ अर्थात मानक भाषा की ओर से बोलियों तरफ यात्रा की गई और बोलियों को मानक भाषा के ह्रास से उत्पन्न मान लिया गया और भाषा की समझ को उलट दिया गया।

इसके लिए हम अकेले पाश्चात्य विद्वानों को दोष नहीं दे सकते। यह समझ स्वयं हमारे भाषा चिंतकों की थी जिनका उन्होंने आंख मूंदकर अनुसरण किया। यद्यपि मौलिक बनने के प्रयास में उन्होंने कुछ चीजों को उलट कर प्रस्तुत किया। उदाहरण के लिए, पाणिनीय विमर्श में उच्चारण की प्रक्रिया भीतर से बाहर की ओर है उन्होंने बाहर से भीतर की ओर कर दिया।
हास्यास्पद भले लगे परंतु चोरी के माल को छिपाने के लिए पर्दे की जरूरत तो होती ही है। उन्होंने उल्टी के बाद पलटी मारी, उसका नतीजा है उनका तुलनात्मक भाषाविज्ञान जो उतना ही पाखंडपूर्ण है जितना जितना मूर्खता पूर्ण और हास्यास्पद।

इस नतीजे पर पहुंचने के लिए मैंने लंबे समय तक काम किया है और उन दुर्बलताओं को पहचाना है जिनकी ओर आज तक विद्वान ने ध्यान नहीं दिया था।

उदाहरण के लिए धातुओं के विषय में जो उपलब्ध सामग्री थी उसका अध्ययन करने के बाद मैंने तीन तरह के विश्लेषण किए पहला अधिकतम धातुओं का सम्बन्ध गति, ध्वनि, और हिंसा से क्यों है. इसके परिणाम मैंने आर्य द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता में , अपनी तब की जान सीमा में प्रस्तुत किए थे। इसके बाद मैंने स्वयं तीन तरह के पाठ तैयार किए एक गण पाठ के आधार पर दूसरा अनुक्रम के अनुसार और तीसरा एक ही अर्थ में विभिन्न गणोंमें आने वाली धातुओं के रूप में ।

मैं यहां पर केवल एक पक्ष की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि यदि एक ही अर्थ में एक ही धातु तीन या चार गणों में हो या कहें उसकी रूपावली में अंतर हो,- तो इसका अर्थ है उस भाषा का उपयोग उतने भाषाई पृष्ठभूमियों से निकले हुए लोग कर रहे हैं। अर्थात संस्कृत में तीन चार भाषा परिवारों में गिने जाने वाले समुदायों का योगदान था। इसे हाल के दिनों में कुछ भाषा वैज्ञानिकों ने लक्ष्य तो किया है परंतु भाषा विज्ञान की वर्तमान सीमाओं के कारण उसे सही संदर्भ नहीं दे पाए हैं। अन्य सभी सीमाओं के रहते हुए भी वैदिक भाषा भारतीय अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा थी,जबकि संस्कृत को केवल ब्राह्मणों की भाषा बनाकर रख दिया गया।

भाषाओं के अध्ययन का आधार बदलने के बाद ही हम उनका वैज्ञानिक अध्ययन कर सकते हैं ।मेरा कार्य उसी दिशा में, मेरी सीमाओं को देखते हुए एक दुस्साहसिक प्रयत्न है। आज के दिन तक ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन भाषाशास्त्र रहा है और जब तक विज्ञान होने का दावा करता है, परंतु भाषा वैज्ञानिकों के उसे अपनी गोष्ठी में स्थान देने के उपयुक्त नहीं माना। ऐसा करके उन्होंने गलत नहीं किया है परंतु उनकी इस निराशा को भी सही नहीं माना जा सकता कि द्विकालिक अध्ययन वैज्ञानिक नहीं हो सकता। जहां आरंभ से ही सिर के बल चला गया हो, इस नतीजे पर पहुंचना कि चलने का तरीका वैज्ञानिक नहीं है, गलत नहीं कहा जा सकता। एक बार पांव से चल कर देखें और तब पता चलेगा इसमें कितने अंतर्विरोध हैं और कितनी समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान हो जाता है यह प्राकृतिक संगीत या सूनृता वाक् से मानवीय व्यवहार की भाषा की विकास यात्रा से ही संभव है। इसमें न तो धातु प्रत्यय उपसर्ग की पद्धति हमारी मदद कर सकती है और न ही पाश्चात्य विद्वानों का अध्ययन और उनकी उद्भावनाओं के आधार पर तैयार किया गया आद्य भारोपीय का धातुकोश। हम इनकी सीमाओं पर प्रमाणों के साथ कल विचार करेंगे।

Post – 2018-04-03

भाषा का शास्त्र बनाम भाषाविज्ञान

भाषा विज्ञान के नाम पर कॉलेजों में जो कुछ पढ़ाया जाता है वह इंद्रजाल है। इसकी आधारशिला ही टेढ़ी रखी गई। संस्कृत भाषा और साहित्य जिस व्याकरण पर आधारित है उसका भी आधार गलत है। यह इस विश्वास पर आधारित है संस्कृत भाषा ही नहीं, चारों वेद तक सृष्टि से पहले अस्तित्व में थे।

जिस युग का यह विश्वास है, उसे हम सांस्कृतिक संक्रमण काल कह सकते हैं, यद्यपि संक्रमण का यह दौर भी बहुत लंबा है। इसमें वेदों की नए सिरे से खोज करने के साथ ही, उसका अर्थ समझने की भी छटपटाहट दिखाई देती है। अनिश्चय के इस दौर में एक चीज ही संदेह से परे थी। यह थी वेदों की प्रामाणिकता, उसी विनष्ट काल की उपलब्धियों तक पहुंचले की तो यप सारी व्यग्रता थी। उनमें जो कुछ भी लिखा था. उसका जितना भी जिस रूप में समझ में आ रहा था वह अकाट्य था।

हम पुरुष सूक्त की चर्चा पीछे कर आए, जिसमें कृषि कर्म को सृष्टि से और उससे अर्जित समृद्धि और अन्य उपलब्धियों को यज्ञपुरुष के अंगों में बदल दिया गया यज्ञ के रूपक को पूरा करने के लिए साम और यजुष सहित वेद को सृष्टि से पूर्ववर्ती कल्पित कर लिया गया अतः संस्कृत भाषा को सृष्टि से पहले से अस्तित्व में होना ही था । दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी भी शुरुआत एक गलत समझ के साथ हुई, और इसलिए असाधारण पांडित्य के बावजूद हमारा भाषाचिंतन गलत दिशा में चला गया।

यह बहस की बात नहीं है कि आदिम अवस्था का मनुष्य है निरक्षर था, उसकी भाषा एक बोली के रूप में भी नितांत अविकसित थी, जब कि वेदों की भाषा परिपक्वता के ऐसे चरण पर पहुंची हुई है कि उसके ही मानकों पर संस्कृत भाषा का ढांचा तैयार किया गया और इस क्रम में मानक संस्कृत को वैदिक भाषा की तुलना में अधिक संकुचित कर दिया गया । इस क्रम में आडंबर तो बढ़ा, परंतु उसी अनुपात में इसकी प्राणशक्ति क्षीण हुई, और यह व्यापक संपर्क से कट गई ।नहीं, कट गई कहना अर्धसत्य होगा। भाषा को निजी संपदा बनाने के लिए, इसे व्यापक जन समाज से काटकर अलग कर दिया गया। यह भाषा के स्थान पर कूट भाषा में बदल गई।

यहां मैं इतिहास के एक ऐसे पहलू की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जिसकी चर्चा तो मैंने कई बार की है परंतु इसके समग्र आयाम को स्वयं समझ नहीं पाया ।.यह है वह महाअकाल जिसकी चर्चा मैं करता हूं । उसके बाद ही खोई हुई सांस्कृतिक संपदा के पुनरुद्धार के क्रम में वह संक्रमण कॉल आया था जिसका ऊपर हमने उल्लेख किया है।

वह महाअकाल केवल पश्चिमी भारत तक सीमित नहीं था। यह मध्य एशिया और उससे आगे यूरोप तक एक चौड़ी पट्टी में फैला था। इससे आबादी का उत्तर दक्षिण की दिशा में जो पूरे विस्तार में पलायन हुआ, उसकी भारोपीय भाषा के प्रसार में बहुत निर्णायक भूमिका रही। मलेशिया में घोड़े का शिकार और पालन और प्रशिक्षण देते हुए अश्व-व्यापार करते हुए जो भारतीय व्यापारी (सिंधी और गुजराती ) बसे हुए थे उनका यूगोस्लाविया लिथुआनिया स्कैंडेनेविया की ओर विस्तार हुआ विस्तार हुआ और दक्षिण में एशिया माइनर के व्यापार केंद्रों पर इनका अधिकार हो गया, जिसका अन्य परिणाम था हित्ती, मितन्नी कस्सी जनों का प्रभुत्व।

भारत में मध्यदेश से दक्षिण की ओर गुजरात और उत्तर की ओर तथा पूर्व मगध की ओर पलायन और इन पिछड़े हुए क्षेत्रों का सांस्कृतिक उत्थान। परंतु इसका जो सबसे दुखद पक्ष था उस त्रासदी के दौरान हुए जनसंहार की दहशत के रूप में बना रहना । यह दहशत उनकी अंतश्चेतना में समा गई। बाहर से पूरी तरह कटने का प्रयास किया गया और केवल मध्य देश में सिकुड़कर रहने की चिंता भारतीय चेतना का अंग बन गई। विदेश यात्राएं वर्जित। समुद्री यात्राएं वर्जित। भारतीय भूभाग में, जिसमें उनके तीर्थ तक थे, प्रवेश करने पर धर्म का क्षय होने लगा और इसके लिए प्रायश्चित्त किया जाने लगा।

इसी व्यापक संकुचन का घरेलू पक्ष यह कि अपनी भाषा और संस्कृति की पवित्रता की रक्षा के लिए अपने ही समाज के वृहत्तर हिस्से से अपने को, अपनी भाषा को, कर्मकांड को बचा कर अपने आप में सिकुड़कर रहने की विवशता को श्रेष्ठता बोध से जोड़ दिया गया। इसकी दुर्भाग्यपूर्ण परिणति यह थी कि कार्य विभाजन पर निर्धारित वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई।

इस दौर की जिन उपलब्धियों पर हम गर्व करते हैं वह वास्तव में भारतीय समाज के अश्मी,भवन की प्रक्रिया का आरंभ है। इसकी गतिशीलता के अवरुद्ध होने की पहचान है। और इस दृष्टि से हम अपनी पूरी व्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन की मांग करते हैं।

भाषा के सवाल को केंद्र में रखते हुए अपना विचार आरंभ किया था , इसलिए इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि उक्त कारणों से वैदिक जड़ों की खोज करने वालों की समझ वैदिक चिंतकों से ठीक उलटी है।

जैसा कि हम पहले भी कह आए हैं, ऋग्वेदिक भाषा चिंतकों के अनुसार भाषा का जन्म प्राकृतिक परिवेश से हुआ, उसके सार्थक सुबोध और उच्चारण में सुगम ध्वनियों का चयन करते हुए मनुष्य भाषा का विकास हुआ। परंतु हमारे वैयाकरणों ने अपने बुद्धि बल से सार्थक इकाई का चयन करते हुए धातु का निर्धारण किया और उन में जुड़ने वाले प्रत्यय उपसर्ग और अंतःसर्ग के आधार पर पूरी भाषा का ढांचा तैयार किया और उसे नए शब्दों की सृष्टि की इंजीनियरी विकसित की।

यहां मैं दो तथ्यों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। यह सामान्य मान्यता है किसंस्कृत भारत के किसी भाग की बोलचाल की भाषा नहीं थी। पाणिनीय संस्कृत के विषय में यह सच है परंतु इसलिए कि उसे दुरूह और पवित्र बनाकर, सचेत रूप में, आम लोगों की पहुंच से काट लिया गया । वैदिक काल में यह संभ्रांत जनों को छोड़कर शेष समाज के लिए घरेलू बोलचाल की भाषा तो नहीं थी, परंतु् सार्वजनिक व्यवहार की ऐसी भाषा थी जिसे सभी समझ लेते थे और कुछ गलतियों के साथ स्वयं भी बोल लेते थे, जिसके प्रमाण ऋग्वेद में पाए जाते हैं। कहें ऋग्वेद के समय तक साहित्यिक और सांस्कृतिक संचार की भाषा लगभग वही थी जो आज अपने क्षेत्र में हिंदी है और वैदिक समाज में भी सामान्य घरेलू कामकाज में बोलियों का प्रयोग होता था जिनसे संस्कृत प्रभावित होती थी और जिनका प्रभाव साहित्यिक और सांस्कृतिक संचार की भाषा पर पड़ता था। पाणिनीय संस्कृत के बाद यह क्रम पूरी तरह बंद नहीं हुआ परंतु मंद अवश्य हो गया।

दूसरी बात जिसकी और मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं, वह यह है कि आधुनिक काल में तुलनात्मक भाषाविज्ञान का अध्ययन आरंभ हुआ तो वह पाणिनीय व्याकरण को आदर्श मान कर, उसी का हुबहु नकल करते हुए विकसित हुआ, इसलिए वह भी उल्टे सिरे से आरंभ हुआ अर्थात मानक भाषा की ओर से बोलियों तरफ यात्रा की गई और बोलियों को मानक भाषा के ह्रास से उत्पन्न मान लिया गया और भाषा की समझ को उलट दिया गया।

इसके लिए हम अकेले पाश्चात्य विद्वानों को दोष नहीं दे सकते। यह समझ स्वयं हमारे भाषा चिंतकों की थी जिनका उन्होंने आंख मूंदकर अनुसरण किया। यद्यपि मौलिक बनने के प्रयास में उन्होंने कुछ चीजों को उलट कर प्रस्तुत किया। उदाहरण के लिए, पाणिनीय विमर्श में उच्चारण की प्रक्रिया भीतर से बाहर की ओर है उन्होंने बाहर से भीतर की ओर कर दिया।
हास्यास्पद भले लगे परंतु चोरी के माल को छिपाने के लिए पर्दे की जरूरत तो होती ही है। उन्होंने उल्टी के बाद पलटी मारी, उसका नतीजा है उनका तुलनात्मक भाषाविज्ञान जो उतना ही पाखंडपूर्ण है जितना जितना मूर्खता पूर्ण और हास्यास्पद।

इस नतीजे पर पहुंचने के लिए मैंने लंबे समय तक काम किया है और उन दुर्बलताओं को पहचाना है जिनकी ओर आज तक विद्वान ने ध्यान नहीं दिया था।

उदाहरण के लिए धातुओं के विषय में जो उपलब्ध सामग्री थी उसका अध्ययन करने के बाद मैंने तीन तरह के विश्लेषण किए पहला अधिकतम धातुओं का सम्बन्ध गति, ध्वनि, और हिंसा से क्यों है. इसके परिणाम मैंने आर्य द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता में , अपनी तब की जान सीमा में प्रस्तुत किए थे। इसके बाद मैंने स्वयं तीन तरह के पाठ तैयार किए एक गण पाठ के आधार पर दूसरा अनुक्रम के अनुसार और तीसरा एक ही अर्थ में विभिन्न गणोंमें आने वाली धातुओं के रूप में ।

मैं यहां पर केवल एक पक्ष की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि यदि एक ही अर्थ में एक ही धातु तीन या चार गणों में हो या कहें उसकी रूपावली में अंतर हो,- तो इसका अर्थ है उस भाषा का उपयोग उतने भाषाई पृष्ठभूमियों से निकले हुए लोग कर रहे हैं। अर्थात संस्कृत में तीन चार भाषा परिवारों में गिने जाने वाले समुदायों का योगदान था। इसे हाल के दिनों में कुछ भाषा वैज्ञानिकों ने लक्ष्य तो किया है परंतु भाषा विज्ञान की वर्तमान सीमाओं के कारण उसे सही संदर्भ नहीं दे पाए हैं। अन्य सभी सीमाओं के रहते हुए भी वैदिक भाषा भारतीय अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा थी,जबकि संस्कृत को केवल ब्राह्मणों की भाषा बनाकर रख दिया गया।

भाषाओं के अध्ययन का आधार बदलने के बाद ही हम उनका वैज्ञानिक अध्ययन कर सकते हैं ।मेरा कार्य उसी दिशा में, मेरी सीमाओं को देखते हुए एक दुस्साहसिक प्रयत्न है। आज के दिन तक ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन भाषाशास्त्र रहा है और जब तक विज्ञान होने का दावा करता है, परंतु भाषा वैज्ञानिकों के उसे अपनी गोष्ठी में स्थान देने के उपयुक्त नहीं माना। ऐसा करके उन्होंने गलत नहीं किया है परंतु उनकी इस निराशा को भी सही नहीं माना जा सकता कि द्विकालिक अध्ययन वैज्ञानिक नहीं हो सकता। जहां आरंभ से ही सिर के बल चला गया हो, इस नतीजे पर पहुंचना कि चलने का तरीका वैज्ञानिक नहीं है, गलत नहीं कहा जा सकता। एक बार पांव से चल कर देखें और तब पता चलेगा इसमें कितने अंतर्विरोध हैं और कितनी समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान हो जाता है यह प्राकृतिक संगीत या सूनृता वाक् से मानवीय व्यवहार की भाषा की विकास यात्रा से ही संभव है। इसमें न तो धातु प्रत्यय उपसर्ग की पद्धति हमारी मदद कर सकती है और न ही पाश्चात्य विद्वानों का अध्ययन और उनकी उद्भावनाओं के आधार पर तैयार किया गया आद्य भारोपीय का धातुकोश। हम इनकी सीमाओं पर प्रमाणों के साथ कल विचार करेंगे।

Post – 2018-04-03

बिजली का न पहरा न तो पर्दे का दखल ही
मैं अपने अंधेरे में बहुत पुरसुकून था।।
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