Post – 2018-04-19

सभावती विदथी एव सं वाक्

मैं सोशल मीडिया को एक पवित्र मंच मानता हूं । इसकी मर्यादा की रक्षा करते हुए ही हम वैचारिक आदान-प्रदान के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं। यह विश्व की सबसे बड़ी महासभा है अतः इसके सदस्य के रूप में हमारक उत्तरदायित्व भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है।

पुरानी बातें कुछ लोगों को बासी और बेकार लगती है परंतु इसके बाद भी अपने घर परिवार की मूल्यवान चीजें वे भी भचा कर रखते हैं। इस देश में सभा की मर्यादाओं में एक मर्यादा यह रही है की ऊंची आवाज में या आरोप लगाते हुए या अनर्गल बात न की जाए ताकि वाद विवाद का स्वस्थ पर्यावरण बना रहे । ऋग्वेद का मैं अक्सर हवाला देता हूं क्योंकि मेरा अधिकतम समय ऋग्वेद की पेथियां उलटते पलटते बीता है और उसके वाक्य मेरी स्मृति में दर्ज हैं और मेरे लिए निर्देशक का काम करते हैं, इसलिए इस विषय में भी वहीं से बात शुरू करें। सुपेशा, अपने शरीर को अच्छी तरह वस्त्र में ढकी हुई स्त्री़ की उपमा सभा में प्रयोग में आने वाली संयत और मर्यादित तथा सांकेतिक भाषा से दी गई हैः
गुहा चरन्ती मनुषः न योषा सभावती विदथी एव सं वाक् ।। 1.167.3

एक अन्य प्रसंग में ऊंची आवाज में गर्हित कथन को दंडनीय मानने का संकेत है -समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापयामुया । यहां गधे का वध करने की बात नहीं की जा रही है, यह तो उनके लिए बहुत उपयोगी पशु था, और उसका स्वभाव भी बदलना उनके वश में न था। यह है सभा में ऊंची आवाज में अनर्गल प्रलाप वाला व्यक्ति।

बाद के कालों में गणराज्यों में भी इस मर्यादा का बहुत ही कठोरता से पालन किया जाता था।

जो लोग प्राचीन उपलब्धियों को बड़े गर्व से याद करते हैं उनका गर्व भी याद के साथ ही समाप्त हो जाता है उनके आचरण में मैंने आदर्शों का पालन तो दूर उनके निकट पहुंचने की गंभीर कोशिश तक देख नहीं पाता। जो अतीत के गौरवशाली पक्ष को अपनी जुगिप्सा से याद करते हैं उन्होंने तो कर्कश, विक्षोभकारी, उद्वेगकारी उद्गारों को अपने क्रान्तिकारी तेवर की पहचान बना रखा है। उनकी कर्कशता और आक्रामकता के कारण, जौ समय समय पर नितान्त कुरुचिपूर्ण हो जाती है, हमारी गौरवशाली संस्था, संसद में भी विचार विमर्श नहीं हो पाता फिर एक ऐसे मंच के विषय में बहुत अधिक आशाएं पालना उचित नहीं, जिसमें शामिल लोगों के चेहरे नहीं दिखाई देते, केवल उनके कथन ही परिक्रमा लगाते रहते हैं, अर्थात आमने सामने का लिहाज तक नहीं रहता। फिर भी, मैं घोर आसावादी होने के कारण बीच-बीच में संयत भाषा के प्रयोग के लिए आग्रह करता रहता हूं, क्योंकि वही एक चीज है जो विरोधी विचारों के बीच भी आदान प्रदान का रास्ता बनाए रख सकती है।

.ह देख कर दुख होता है कि जिनका मैं उनके अध्ययन, ज्ञान, आयु और काम के कारण आदर करता हूं वह भी अक्सर शिथिल भाषा का प्रयोग करते हैं,अपनी समझ से गालियां भी देते हैं और जब तक उनकी गालियां उनकी सांकेतिकता के बाद भी अभद्र प्र तीत होती हैं। ऐसे लोगों के प्रति आदर घटता है। वामी, कामी, प्रेस्टीच्यूट, भक्त, जैसे प्रयोग तो इतने धड़ल्ले से होने लगे हैं कि जैसे इनका प्रयोग करते समय व्यक्ति को कहीं कोई झिझक महसूस ही न हो।

आज मैंने एक पोस्ट में सड़क की गाली प्रयोग होते हुए देखा। मैं याद दिला दूं हमारे मित्रों की गालियां किसी अन्य तक पहुंचती हों या नहीं, जैसा मैंने हिंसक, अपमानजनक व्यवहार के बारे में कहा था, वह हो किसी के साथ, मुझ तक अवश्य पहुंचता है, उसी तरह गालियां किसी को भी दी जाएं। मुझे अवश्य पहुंचती है , क्योंकि मैं उस समाज से अपने को अभिन्न मानता हूं, जिसका वह भी एक सदस्य है। वह जो कर रहा है मेरे समाज का ही एक व्यक्ति कर रहा है। अपने आचरण पर उसे लज्जा भले न आती हो मुझे लज्जा अनुभव होती है।

मैं मानता हूं एक लेखक की भूमिका एक नैदानिक, एक चिकित्सक, और एक शिक्षक की होती है, इसलिए मैं बार-बार ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करता हूं । यह प्रयास व्यर्थ भी नही गया है । इसलिए मैं उस व्यक्ति का नाम लिए बिना कुछ बातें अंतिम रूप से कहना चाहता हूं।

1. जब आप गंदे शब्दों का प्रयोग करते हैं तो सबसे पहले आप की जबान गंदी होती है। जिसके लिए आपने गंदे शब्दों का प्रयोग किया, उस तक वे पहुंचे या न पहुंचे हैं परंतु, आप की जबान तो आपके मुंह में रह ही जाती है। उस जवान को अपने मुंह में रख करें आप सुखी नहीं अनुभव कर सकते और यदि करते हैं तो आपको शक्ल से मनुष्य होते हुए भी जीव कोटि में अपनी सही जगह का पता अवश्य लगाना चाहिए।

2. यदि किसी के पास सही तर्क प्रमाण और साक्ष्य हों तो कठोर भाषा की आवश्यकता ही न पड़े। दूसरे व्यक्ति को निरुत्तर करने के लिए उतना ही पर्याप्त है। इसलिए गर्हित भाषा का प्रयोग करने वाला स्वतः यह स्वीकार करता है कि वह गलत है उसके पास केवल घृणा और दुर्भावना है अर्थात गाली तो वह दे रहा है परंतु हर दृष्टि से गर्हित वही सिद्ध होता है।

3. यह एक ऐसा वेदर-ओ-दीवार का घर है जिसमें किसी के भी प्रवेश की छूट है अतः आयु, शिक्षा, संस्कार लिंग और धर्म की सीमाओं की चिंता किए बिना सभी लोग किसी चर्सचा में म्मिलित हो सकते हैं और होते हैं । उनमें जो असभ्य हैं उनको चुटकी बजा कर सभ्य तो नहीं बनाया जा सकता, परंतु उनकी एक कमजोरी का फायदा अवश्य उठाया जा सकता है । उनमें सभी अपने को अधिक चालाक, अधिक विट्टी और अधिक ऊंची हैसियत का दिखाने का प्रयत्न अवश्य करते हैं। यदि इस मंच से जुड़कर वे यह दिखाना चाहते हैं कि वे सचमुच अच्छी हैसियत के हैं तो भाषा के माधयम से ही उन्हें यह सिद्ध करना चाहिए कि वे अच्छे खानदान के हैं, उनके माता-पिता अच्छे संस्कारों के हैं या थे, और वे भी अच्छी संगत में रहे हैं। यदि इसका ध्यान रखें तो Facebook पर प्रयोग में आने वाली भाषा का स्तर सुधर सकता है और अपने विचारों को तर्क और प्रमाणों के साथ भावावेश से बचकर प्रकट करने की आदत पड़ सकती है।

Post – 2018-04-18

आतंकित और असुरक्षित अनुभव करने का अधिकार

सुनते हैं आसिफा उस बकरवाल की लड़की है लड़की थी जिसने सबसे पहले सियाचिन पर पाकिस्तानियों की गतिविधि की सूचना भारतीय सैनिकों को दी थी. यह गलत भी हो सकता है. सुना है वह पिता भी CBI इंक्वायरी चाहता है। भी गलत हो सकता है। सुना है वह भी इस केस की सुनवाई जम्मू कश्मीर से बाहर कहीं चाहता है। यह भी किसी का गढा हुआ बयान हो सकता है। सुनते हैं आंदोलन करने वाले वकील भी सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे, जिसकी मांग जिन्हें अभियुक्त बनाया गया है, वे कर रहे थे. हो सकता है ऐसा करना भी अभियुक्तों का समर्थन करना हो। सुना है असहायता वे नारको टेस्ट कराने की मांग कर रहे हैं। हो सकता है, यह न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने का उन का तरीका हो।

सामान्यतः किसी जांच प्रक्रिया में कोई भी जांचकर्ता एक साथ अनेक संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी जांच आरंभ करता है क्योंकि उनके संदर्भ में कुछ प्रमाण होते हैं। जिनके सबसे शशक्त प्रमाण होते हैं उनको वह पहले जांचता है और आगे बढ़ने पर उसके खंडित होने पर वह उसको छोड़कर दूसरी संभावनाओं पर ध्यान देता है। यह भी संभव है कि वह सभी संभावनाओं को एक साथ टटोलना आरंभ करें परंतु साक्ष्य या बयान में किसी एक कड़ी के अनमेल होने पर पूरी जांच की दिशा बदल जाती है। इस मामले में मैंने हर कड़ी को असंभव पाया।

हो सकता है मेरे सोचने का देखने का तरीका गलत हो। हो सकता है, जम्मू कश्मीर सरकार अभियुक्तों को सिद्धदोष ठहराने और जल्दी से जल्दी फांसी देने को उचित न्याय मानती हो। हमारे बहुत से मित्र जो मुझसे कम संवेदनशील नहीं हैं, चाहते हैं कि जल्द से जल्द अभियुक्तों को फांसी दे कर न्याय की माग को पूरा कर दिया जाए। किसी भी कारण से किसी तरह की देरी उन्हें सहन नहीं है।

हो सकता है, मैं अपनी चिंता प्रकट करके स्वयं अपराधियों का साथ दे रहा हूं। परंतु इन सारी और पहले से तय सच्चाईयों के बीच मुझे असुरक्षित अनुभव करने का अधिकार तो है ही। मैं स्वयं अपने को ऐसी स्थिति में रख कर देखता हूं तो प्रचार तंत्र और शासन तंत्र की शक्ति के साथ बुद्धिजीवियों गठजोड़ के सामने अपने को यह सोच कर कितना असहाय पाता हूं कि मेरी उम्र ज्ञान स्वभाव सभी के बावजूद इन्हीं की दुहाई देते हुए घृणा को और उग्र करते मेरे ऊपर ऐसा प्रहार हो सकता है और मैं निर्दोष होते हुए भी अपने को निर्दोष साबित नहीं कर सकता।

वास्तविक अपराधियों को छिपाने बचाने और बलि के लिए किसी को भी चुन कर फांसी पर चढ़ा देने का यह न्याय मुझे आतंकित करता है। मेैरे मित्र कहते हैं, आतंकित और असुरक्षित अनुभव करने का अधिकार भी केवल उन्हें है, मुझे नहीं है।

Post – 2018-04-18

आतंकित और असुरक्षित अनुभव करने का अधिकार

सुनते हैं आसिफा उस बकरवाल की लड़की है लड़की थी जिसने सबसे पहले सियाचिन पर पाकिस्तानियों की गतिविधि की सूचना भारतीय सैनिकों को दी थी. यह गलत भी हो सकता है. सुना है वह पिता भी CBI इंक्वायरी चाहता है। भी गलत हो सकता है। सुना है वह भी इस केस की सुनवाई जम्मू कश्मीर से बाहर कहीं चाहता है। यह भी किसी का गढा हुआ बयान हो सकता है। सुनते हैं आंदोलन करने वाले वकील भी सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे, जिसकी मांग जिन्हें अभियुक्त बनाया गया है, वे कर रहे थे. हो सकता है ऐसा करना भी अभियुक्तों का समर्थन करना हो। सुना है असहायता वे नारको टेस्ट कराने की मांग कर रहे हैं। हो सकता है, यह न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने का उन का तरीका हो।

सामान्यतः किसी जांच प्रक्रिया में कोई भी जांचकर्ता एक साथ अनेक संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी जांच आरंभ करता है क्योंकि उनके संदर्भ में कुछ प्रमाण होते हैं। जिनके सबसे शशक्त प्रमाण होते हैं उनको वह पहले जांचता है और आगे बढ़ने पर उसके खंडित होने पर वह उसको छोड़कर दूसरी संभावनाओं पर ध्यान देता है। यह भी संभव है कि वह सभी संभावनाओं को एक साथ टटोलना आरंभ करें परंतु साक्ष्य या बयान में किसी एक कड़ी के अनमेल होने पर पूरी जांच की दिशा बदल जाती है। इस मामले में मैंने हर कड़ी को असंभव पाया।

हो सकता है मेरे सोचने का देखने का तरीका गलत हो। हो सकता है, जम्मू कश्मीर सरकार अभियुक्तों को सिद्धदोष ठहराने और जल्दी से जल्दी फांसी देने को उचित न्याय मानती हो। हमारे बहुत से मित्र जो मुझसे कम संवेदनशील नहीं हैं, चाहते हैं कि जल्द से जल्द अभियुक्तों को फांसी दे कर न्याय की माग को पूरा कर दिया जाए। किसी भी कारण से किसी तरह की देरी उन्हें सहन नहीं है।

हो सकता है, मैं अपनी चिंता प्रकट करके स्वयं अपराधियों का साथ दे रहा हूं। परंतु इन सारी और पहले से तय सच्चाईयों के बीच मुझे असुरक्षित अनुभव करने का अधिकार तो है ही। मैं स्वयं अपने को ऐसी स्थिति में रख कर देखता हूं तो प्रचार तंत्र और शासन तंत्र की शक्ति के साथ बुद्धिजीवियों गठजोड़ के सामने अपने को यह सोच कर कितना असहाय पाता हूं कि मेरी उम्र ज्ञान स्वभाव सभी के बावजूद इन्हीं की दुहाई देते हुए घृणा को और उग्र करते मेरे ऊपर ऐसा प्रहार हो सकता है और मैं निर्दोष होते हुए भी अपने को निर्दोष साबित नहीं कर सकता।

वास्तविक अपराधियों को छिपाने बचाने और बलि के लिए किसी को भी चुन कर फांसी पर चढ़ा देने का यह न्याय मुझे आतंकित करता है। मेैरे मित्र कहते हैं, आतंकित और असुरक्षित अनुभव करने का अधिकार भी केवल उन्हें है, मुझे नहीं है।

Post – 2018-04-18

आतंकित और असुरक्षित अनुभव करने का अधिकार

सुनते हैं आसिफा उस बकरवाल की लड़की है लड़की थी जिसने सबसे पहले सियाचिन पर पाकिस्तानियों की गतिविधि की सूचना भारतीय सैनिकों को दी थी. यह गलत भी हो सकता है. सुना है वह पिता भी CBI इंक्वायरी चाहता है। भी गलत हो सकता है। सुना है वह भी इस केस की सुनवाई जम्मू कश्मीर से बाहर कहीं चाहता है। यह भी किसी का गढा हुआ बयान हो सकता है। सुनते हैं आंदोलन करने वाले वकील भी सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे, जिसकी मांग जिन्हें अभियुक्त बनाया गया है, वे कर रहे थे. हो सकता है ऐसा करना भी अभियुक्तों का समर्थन करना हो। सुना है असहायता वे नारको टेस्ट कराने की मांग कर रहे हैं। हो सकता है, यह न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने का उन का तरीका हो।

सामान्यतः किसी जांच प्रक्रिया में कोई भी जांचकर्ता एक साथ अनेक संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी जांच आरंभ करता है क्योंकि उनके संदर्भ में कुछ प्रमाण होते हैं। जिनके सबसे शशक्त प्रमाण होते हैं उनको वह पहले जांचता है और आगे बढ़ने पर उसके खंडित होने पर वह उसको छोड़कर दूसरी संभावनाओं पर ध्यान देता है। यह भी संभव है कि वह सभी संभावनाओं को एक साथ टटोलना आरंभ करें परंतु साक्ष्य या बयान में किसी एक कड़ी के अनमेल होने पर पूरी जांच की दिशा बदल जाती है। इस मामले में मैंने हर कड़ी को असंभव पाया।

हो सकता है मेरे सोचने का देखने का तरीका गलत हो। हो सकता है, जम्मू कश्मीर सरकार अभियुक्तों को सिद्धदोष ठहराने और जल्दी से जल्दी फांसी देने को उचित न्याय मानती हो। हमारे बहुत से मित्र जो मुझसे कम संवेदनशील नहीं हैं, चाहते हैं कि जल्द से जल्द अभियुक्तों को फांसी दे कर न्याय की माग को पूरा कर दिया जाए। किसी भी कारण से किसी तरह की देरी उन्हें सहन नहीं है।

हो सकता है, मैं अपनी चिंता प्रकट करके स्वयं अपराधियों का साथ दे रहा हूं। परंतु इन सारी और पहले से तय सच्चाईयों के बीच मुझे असुरक्षित अनुभव करने का अधिकार तो है ही। मैं स्वयं अपने को ऐसी स्थिति में रख कर देखता हूं तो प्रचार तंत्र और शासन तंत्र की शक्ति के साथ बुद्धिजीवियों गठजोड़ के सामने अपने को यह सोच कर कितना असहाय पाता हूं कि मेरी उम्र ज्ञान स्वभाव सभी के बावजूद इन्हीं की दुहाई देते हुए घृणा को और उग्र करते मेरे ऊपर ऐसा प्रहार हो सकता है और मैं निर्दोष होते हुए भी अपने को निर्दोष साबित नहीं कर सकता।

वास्तविक अपराधियों को छिपाने बचाने और बलि के लिए किसी को भी चुन कर फांसी पर चढ़ा देने का यह न्याय मुझे आतंकित करता है। मेैरे मित्र कहते हैं, आतंकित और असुरक्षित अनुभव करने का अधिकार भी केवल उन्हें है, मुझे नहीं है।

Post – 2018-04-18

मैं छाती चीर कर भी अपना सच दिखला नहीं सकता

राजनीतिक जुमलेबाजी के माहौल में जहां सच दलों के साथ बदलता रहता है समस्या विचारों की हत्या करने और उन्हें जीवित रखने के बीच चुनाव की होती है। समस्या बड़बोलेपन और तर्कसंगत विचारों को संयुक्त भाषा में रखने के विकल्पों में से एक के चुनाव की होती है। जिन लोगों के पास पूरा सच और एकमात्र सच जमा होता है, वे अपने से असहमत होने वालों की नैतिक या भौतिक हत्या करने के लिए किसी सीमा तक जा सकते हैं। सच पर कब्जा करने में वे इतनी जल्दबाजी करते हैं कि पूरी इमारत सुनने से पहले अपने नतीजे निकाल लेते हैं । नतीजे निकालने नहीं होते, वे उनके स्टाक में होते हैं और वे उनको अमल में लाने के तिए मौके की तलाश में रहते हैं इसनिए उनकी आहट मिलते ही उन्हे दबोच लेते हैं। ऐसे लोगों की आक्रामक सचाई के भीतर से वास्तविकता की खोज करना असंभव बना दिया जाता है। मेरा यह बोध दिनों अधिक प्रखर हुआ है और उसी अनुपात में मेरी असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

अभी इमरजेंसी लगी नहीं थी पर संजय गांधी की बदतमीजियां और उन पर इंदिरा गांधी का मौन सार्वजनिक हो चुका था। संजय गांधी ने एक महिला जज को मिनी बस में थप्पड़ मारा था। जब इसकी सूचना मिली तो मुझे लगा वह थप्पड़ मेरे गाल पर भी पडा है। ठीक ऐसा ही अनुभव तब हुआ था एक SP के साथ उन्होंने ऐसा ही बर्ताव किया था। ठीक ऐसा ही हर त्रासदी के साथ होता है। मुझे ऐसा इसलिए लगता है की चेतना के स्तर पर मैं स्वतः भुक्तभोगी की स्थिति में पहुंच जाता हूं।

कई बार बस से गुजरते बाहर सड़क पर किसी अन्याय को, खासकर किसी स्त्री या बच्चे पर, होते देख कर अक्सर चीख पड़ता था, और लोग चौंक कर देखने लगते तो लज्जित भी अनुभव करता था कि आखिर देखा तो कई ने था, किसी के मुंह से चीख या फटकार क्यों नहीं लिकली। यदि विश्वास होता मै दूसरों से अधिक संवेदनशील हूं, तो लज्जित अनुभव न करता। व्याधि मानता हूं, पर है तो है।

सामाजिक त्रासदियों पर जो लोग ऐसी स्थितियों में राजनीति प्रेरित रुख अपनाते हैं वे मुझे संवेदनाशून्य, क्रूर और डरावने लगते हैं। वास्तविक अपराधियों को छिपाने बचाने और बलि के लिए किसी को भी चुन कर जल्द से जल्द शूली पर चढ़ा देने का उनका न्याय मुझे आतंकित करता है। उनका दुश्मन कोई और होता है और उसे अपने रास्ते से हटाने क् लिए हत्या किसी और की कर रहे होते। कराला काली की तरह उन्हें केवल बलि चाहिए, जो भी राह में आ जाय।

Post – 2018-04-18

मैं छाती चीर कर भी अपना सच दिखला नहीं सकता

राजनीतिक जुमलेबाजी के माहौल में जहां सच दलों के साथ बदलता रहता है समस्या विचारों की हत्या करने और उन्हें जीवित रखने के बीच चुनाव की होती है। समस्या बड़बोलेपन और तर्कसंगत विचारों को संयुक्त भाषा में रखने के विकल्पों में से एक के चुनाव की होती है। जिन लोगों के पास पूरा सच और एकमात्र सच जमा होता है, वे अपने से असहमत होने वालों की नैतिक या भौतिक हत्या करने के लिए किसी सीमा तक जा सकते हैं। सच पर कब्जा करने में वे इतनी जल्दबाजी करते हैं कि पूरी इमारत सुनने से पहले अपने नतीजे निकाल लेते हैं । नतीजे निकालने नहीं होते, वे उनके स्टाक में होते हैं और वे उनको अमल में लाने के तिए मौके की तलाश में रहते हैं इसनिए उनकी आहट मिलते ही उन्हे दबोच लेते हैं। ऐसे लोगों की आक्रामक सचाई के भीतर से वास्तविकता की खोज करना असंभव बना दिया जाता है। मेरा यह बोध दिनों अधिक प्रखर हुआ है और उसी अनुपात में मेरी असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

अभी इमरजेंसी लगी नहीं थी पर संजय गांधी की बदतमीजियां और उन पर इंदिरा गांधी का मौन सार्वजनिक हो चुका था। संजय गांधी ने एक महिला जज को मिनी बस में थप्पड़ मारा था। जब इसकी सूचना मिली तो मुझे लगा वह थप्पड़ मेरे गाल पर भी पडा है। ठीक ऐसा ही अनुभव तब हुआ था एक SP के साथ उन्होंने ऐसा ही बर्ताव किया था। ठीक ऐसा ही हर त्रासदी के साथ होता है। मुझे ऐसा इसलिए लगता है की चेतना के स्तर पर मैं स्वतः भुक्तभोगी की स्थिति में पहुंच जाता हूं।

कई बार बस से गुजरते बाहर सड़क पर किसी अन्याय को, खासकर किसी स्त्री या बच्चे पर, होते देख कर अक्सर चीख पड़ता था, और लोग चौंक कर देखने लगते तो लज्जित भी अनुभव करता था कि आखिर देखा तो कई ने था, किसी के मुंह से चीख या फटकार क्यों नहीं लिकली। यदि विश्वास होता मै दूसरों से अधिक संवेदनशील हूं, तो लज्जित अनुभव न करता। व्याधि मानता हूं, पर है तो है।

सामाजिक त्रासदियों पर जो लोग ऐसी स्थितियों में राजनीति प्रेरित रुख अपनाते हैं वे मुझे संवेदनाशून्य, क्रूर और डरावने लगते हैं। वास्तविक अपराधियों को छिपाने बचाने और बलि के लिए किसी को भी चुन कर जल्द से जल्द शूली पर चढ़ा देने का उनका न्याय मुझे आतंकित करता है। उनका दुश्मन कोई और होता है और उसे अपने रास्ते से हटाने क् लिए हत्या किसी और की कर रहे होते। कराला काली की तरह उन्हें केवल बलि चाहिए, जो भी राह में आ जाय।

Post – 2018-04-18

मैं छाती चीर कर भी अपना सच दिखला नहीं सकता

राजनीतिक जुमलेबाजी के माहौल में जहां सच दलों के साथ बदलता रहता है समस्या विचारों की हत्या करने और उन्हें जीवित रखने के बीच चुनाव की होती है। समस्या बड़बोलेपन और तर्कसंगत विचारों को संयुक्त भाषा में रखने के विकल्पों में से एक के चुनाव की होती है। जिन लोगों के पास पूरा सच और एकमात्र सच जमा होता है, वे अपने से असहमत होने वालों की नैतिक या भौतिक हत्या करने के लिए किसी सीमा तक जा सकते हैं। सच पर कब्जा करने में वे इतनी जल्दबाजी करते हैं कि पूरी इमारत सुनने से पहले अपने नतीजे निकाल लेते हैं । नतीजे निकालने नहीं होते, वे उनके स्टाक में होते हैं और वे उनको अमल में लाने के तिए मौके की तलाश में रहते हैं इसनिए उनकी आहट मिलते ही उन्हे दबोच लेते हैं। ऐसे लोगों की आक्रामक सचाई के भीतर से वास्तविकता की खोज करना असंभव बना दिया जाता है। मेरा यह बोध दिनों अधिक प्रखर हुआ है और उसी अनुपात में मेरी असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

अभी इमरजेंसी लगी नहीं थी पर संजय गांधी की बदतमीजियां और उन पर इंदिरा गांधी का मौन सार्वजनिक हो चुका था। संजय गांधी ने एक महिला जज को मिनी बस में थप्पड़ मारा था। जब इसकी सूचना मिली तो मुझे लगा वह थप्पड़ मेरे गाल पर भी पडा है। ठीक ऐसा ही अनुभव तब हुआ था एक SP के साथ उन्होंने ऐसा ही बर्ताव किया था। ठीक ऐसा ही हर त्रासदी के साथ होता है। मुझे ऐसा इसलिए लगता है की चेतना के स्तर पर मैं स्वतः भुक्तभोगी की स्थिति में पहुंच जाता हूं।

कई बार बस से गुजरते बाहर सड़क पर किसी अन्याय को, खासकर किसी स्त्री या बच्चे पर, होते देख कर अक्सर चीख पड़ता था, और लोग चौंक कर देखने लगते तो लज्जित भी अनुभव करता था कि आखिर देखा तो कई ने था, किसी के मुंह से चीख या फटकार क्यों नहीं लिकली। यदि विश्वास होता मै दूसरों से अधिक संवेदनशील हूं, तो लज्जित अनुभव न करता। व्याधि मानता हूं, पर है तो है।

सामाजिक त्रासदियों पर जो लोग ऐसी स्थितियों में राजनीति प्रेरित रुख अपनाते हैं वे मुझे संवेदनाशून्य, क्रूर और डरावने लगते हैं। वास्तविक अपराधियों को छिपाने बचाने और बलि के लिए किसी को भी चुन कर जल्द से जल्द शूली पर चढ़ा देने का उनका न्याय मुझे आतंकित करता है। उनका दुश्मन कोई और होता है और उसे अपने रास्ते से हटाने क् लिए हत्या किसी और की कर रहे होते। कराला काली की तरह उन्हें केवल बलि चाहिए, जो भी राह में आ जाय।

Post – 2018-04-17

संतापसूचक शब्द और जल (2)

अर – जल से व्युत्पन्न शब्दों में ‘अरण्ड’ आता है । बार बार इस बात की याद दिलाना जरूरी नहीं की घी, तेल आदि के लिए रूढ़ शब्दों का मूल अर्थ पानी रहा है। इस मामले में अर का अर्थ तेल, या पानी जैसा द्रव पदार्थ है, जिसमें इसके फल की आकृति ‘अंड’ या गोलाकार जोड़कर अरंड बना है और उसमें हीनार्थक ‘-ई’ लगाकर ‘अरंडी’ शब्द बना है। इसका अर्थ है कि ‘अर’ का भी प्रयोग भी कभी तेल के लिए कर लिया जाता था ।

कुछ लोग यह समझते हैं, और इसमें संस्कृत के विद्वान और कोशकार भी शामिल हैं, कि तेल के लिए संस्कृत शब्द ‘तैल’ है। तिलहनों में सबसे पहले तिल की खेती आरम्भ हुई, और तेल तिल से निकला है, इसलिए उसका अपत्यार्थक रूप तैल है। मैं एक बार किसी अन्य प्रसंग में बता चुका हूं कि दिल्ली की स्थानीय भाषा में है आज भी पानी के लिए तेल शब्द का प्रयोग जब तब होता है, यह मुझे अपने पार्क के माली से पता चला था। मैंने उसे पौधों में पानी देने को कहा तो उसने खुरपी से मिट्टी उलटकर कहा, ‘ताऊ यामें घणों तेल है।’ ऋग्वेद में सिंचित भूमि के लिए तिल्विल का प्रयोग हुआ हैः

भद्रे क्षेत्रे निमिता तिल्विले वा सनेम मध्वो अधिगर्तस्य ।। 5.62.7 यह है सोम की बुवाई का तरीका है, भूमि को अच्छी तरह जोत कर (भद्रे क्षेत्रे), उसे नम (तिल्विल) बना कर, नालियां बनाकर, नालियों में सोम के टुकड़े बोए जाते थे। जिनको यह भ्रम बना रह गया हो कि सोम गन्ना नहीं था, वे गन्ने की बुवाई के बारे में जानकारी बढ़ा सकते हैं।

सभ्यता के विकास को समझने मैं सहायक संकेतों में इस तरह की सूचनाएं बहुत महत्वपूर्ण है। तेल का पता मनुष्य को बहुत बाद में चला। पहले वह अरंडी को पत्थर पर कूट कर उसके गूदे से बालों को मसलकर उन्हें चिकना बनाता था । इस तरह की प्राचीन सूचनाएं बहुत बाद तक कैसे स्थांतरित होती रहीं, यह सोच कर हैरानी होती है। तेल के आविष्कार के कई हजार साल बाद, यह सूचना कालिदास को उपलब्ध थी, जिन्होंने कण्व आश्रम के छात्रों के संदर्भ में इसका और वल्कल का उल्लेख किया है।

जो भी हो, तेल के विषय में जानकारी तिल की खेती आरंभ होने से पहले भारतीय समाज को थी। अतः खाने चबाने के लिए तिल को कूटते समय उन्हें इसके भीतर आर्द्रता या चिकनाई का पता चला होगा इसलिए तिल के लिए उन्होंने इस शब्द का प्रयोग किया गया होगा। संभवतया नामकरण तैल किया गया हो, और बाद में भूल सुधारने की कोशिश में है एक नई भूल कर दी गई हो।

संताप
संताप में उपसर्ग ‘सं’ का अर्थ जल है, इसी तरह प्रताप, अनुताप, आदि में भी, प्र ( प्ल), और अनु का अर्थ भी जल है। स्वयं ताप और तप पानी की बूंद के गिरने से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण की देन हैं, इसलिए इनका प्रयोग आग और धूप प्रभाव के आशय में होने लगा। परंतु, यह निर्मितियां धातु प्रत्यय और उपसर्ग की भाषाई युक्ति का विकास होने के बाद की हैं, जब इन्होंने एक नया रूढ़ आशय ग्रहण कर लिया था, इसलिए वर्तमान विवेचन में हम इनको जल से सीधे व्युत्पन्न नहीं मान सकते। यही बात पश्चाताप पर भी लागू होती है। मैंने ‘अनु’ का अर्थ भी जल बताया है जबकि हम इसके उपसर्ग रूप से ही परिचित हैं, इसलिए इसका अर्थ जल करना प्रयत्नसाध्य लग सकता है। परंतु एक तो दूसरे सभी उपसर्गों का एक अर्थ जल है, दूसरे अनुक और अनूक दो ही ऐसे शब्द हैं जिनमें अनु का प्रयोग उपसर्ग के रूप में नहीं हुआ लगता है। पहले का अर्थ लालची है, आकांक्षी है और कामना लालसा आदि के लिए सभी शब्द जल से संबंधित है। मेरे अनुमान का आधार केवल इतना ही है। तप/टप = जल और अं . tub तथा आँखों के दबदबाने के सम्बन्ध को इसी तर्क से समझा जा सकता है.

सताना । यातना। यंत्रणा
शातन या चातन, जिनसे सत् और सताना का संबंध है, उस क्रिया की देन हैं जो किसी रसीले डंठल, या लता का रस निकालने के लिए की जाती थी। अर्थात कूटना, कुचलना या पीसना। इस सिरे से विचार करने पर हम पाते हैं भोजपुरी का जांत शब्द जो चात, सात की शृंखला में आता है, यंत्र की अपेक्षा पुराना है (यद्यपि इसका नासिक्य प्रयोग यंत्र से प्रभावित लगता है) और यंत्र संस्कृतीकरण है, जिससे यातना और यंत्रणा की उत्पत्ति हुई है। गणित करना और खंडित करना दोनों का अर्थ एक ही था बंगाल में आज भी आटा पिसाने को गुणा करना का प्रयोग चलता है। विषाद,अवसाद और निषाद आदि में यही सातना और सताना पाया जा सकता है, जबकि प्रसाद में हिस्सा पाने, अर्थात बंटवारे का भाव तथा प्रसीद में पसीजने या द्रवित होने का भाव है जो जल की याद दिलाता है।

संस्कृत के आचार्यों का यह विचार रहा है कि उपसर्ग के प्रभाव से धातुओं में नया अर्थ पैदा हो जाता है, (उपसर्गेण धात्वर्थो बलाद अन्यत्र नीयते) परंतु यह अर्थ नया नहीं होता जातीय अवचेतन में बने रह गए पुरातन आशयों का पुनर आविष्कार होता है। भाषा में बलपूर्वक कुछ भी नहीं होता, परंतु इसके तरीके इतनी जटिल और दूरगामी हैं कि उनको पकड़ पाने में हम हमेशा सफल नहीं हो सकते।

क्रमशः

Post – 2018-04-17

संतापसूचक शब्द और जल (2)

अर – जल से व्युत्पन्न शब्दों में ‘अरण्ड’ आता है । बार बार इस बात की याद दिलाना जरूरी नहीं की घी, तेल आदि के लिए रूढ़ शब्दों का मूल अर्थ पानी रहा है। इस मामले में अर का अर्थ तेल, या पानी जैसा द्रव पदार्थ है, जिसमें इसके फल की आकृति ‘अंड’ या गोलाकार जोड़कर अरंड बना है और उसमें हीनार्थक ‘-ई’ लगाकर ‘अरंडी’ शब्द बना है। इसका अर्थ है कि ‘अर’ का भी प्रयोग भी कभी तेल के लिए कर लिया जाता था ।

कुछ लोग यह समझते हैं, और इसमें संस्कृत के विद्वान और कोशकार भी शामिल हैं, कि तेल के लिए संस्कृत शब्द ‘तैल’ है। तिलहनों में सबसे पहले तिल की खेती आरम्भ हुई, और तेल तिल से निकला है, इसलिए उसका अपत्यार्थक रूप तैल है। मैं एक बार किसी अन्य प्रसंग में बता चुका हूं कि दिल्ली की स्थानीय भाषा में है आज भी पानी के लिए तेल शब्द का प्रयोग जब तब होता है, यह मुझे अपने पार्क के माली से पता चला था। मैंने उसे पौधों में पानी देने को कहा तो उसने खुरपी से मिट्टी उलटकर कहा, ‘ताऊ यामें घणों तेल है।’ ऋग्वेद में सिंचित भूमि के लिए तिल्विल का प्रयोग हुआ हैः

भद्रे क्षेत्रे निमिता तिल्विले वा सनेम मध्वो अधिगर्तस्य ।। 5.62.7 यह है सोम की बुवाई का तरीका है, भूमि को अच्छी तरह जोत कर (भद्रे क्षेत्रे), उसे नम (तिल्विल) बना कर, नालियां बनाकर, नालियों में सोम के टुकड़े बोए जाते थे। जिनको यह भ्रम बना रह गया हो कि सोम गन्ना नहीं था, वे गन्ने की बुवाई के बारे में जानकारी बढ़ा सकते हैं।

सभ्यता के विकास को समझने मैं सहायक संकेतों में इस तरह की सूचनाएं बहुत महत्वपूर्ण है। तेल का पता मनुष्य को बहुत बाद में चला। पहले वह अरंडी को पत्थर पर कूट कर उसके गूदे से बालों को मसलकर उन्हें चिकना बनाता था । इस तरह की प्राचीन सूचनाएं बहुत बाद तक कैसे स्थांतरित होती रहीं, यह सोच कर हैरानी होती है। तेल के आविष्कार के कई हजार साल बाद, यह सूचना कालिदास को उपलब्ध थी, जिन्होंने कण्व आश्रम के छात्रों के संदर्भ में इसका और वल्कल का उल्लेख किया है।

जो भी हो, तेल के विषय में जानकारी तिल की खेती आरंभ होने से पहले भारतीय समाज को थी। अतः खाने चबाने के लिए तिल को कूटते समय उन्हें इसके भीतर आर्द्रता या चिकनाई का पता चला होगा इसलिए तिल के लिए उन्होंने इस शब्द का प्रयोग किया गया होगा। संभवतया नामकरण तैल किया गया हो, और बाद में भूल सुधारने की कोशिश में है एक नई भूल कर दी गई हो।

संताप
संताप में उपसर्ग ‘सं’ का अर्थ जल है, इसी तरह प्रताप, अनुताप, आदि में भी, प्र ( प्ल), और अनु का अर्थ भी जल है। स्वयं ताप और तप पानी की बूंद के गिरने से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण की देन हैं, इसलिए इनका प्रयोग आग और धूप प्रभाव के आशय में होने लगा। परंतु, यह निर्मितियां धातु प्रत्यय और उपसर्ग की भाषाई युक्ति का विकास होने के बाद की हैं, जब इन्होंने एक नया रूढ़ आशय ग्रहण कर लिया था, इसलिए वर्तमान विवेचन में हम इनको जल से सीधे व्युत्पन्न नहीं मान सकते। यही बात पश्चाताप पर भी लागू होती है। मैंने ‘अनु’ का अर्थ भी जल बताया है जबकि हम इसके उपसर्ग रूप से ही परिचित हैं, इसलिए इसका अर्थ जल करना प्रयत्नसाध्य लग सकता है। परंतु एक तो दूसरे सभी उपसर्गों का एक अर्थ जल है, दूसरे अनुक और अनूक दो ही ऐसे शब्द हैं जिनमें अनु का प्रयोग उपसर्ग के रूप में नहीं हुआ लगता है। पहले का अर्थ लालची है, आकांक्षी है और कामना लालसा आदि के लिए सभी शब्द जल से संबंधित है। मेरे अनुमान का आधार केवल इतना ही है। तप/टप = जल और अं . tub तथा आँखों के दबदबाने के सम्बन्ध को इसी तर्क से समझा जा सकता है.

सताना । यातना। यंत्रणा
शातन या चातन, जिनसे सत् और सताना का संबंध है, उस क्रिया की देन हैं जो किसी रसीले डंठल, या लता का रस निकालने के लिए की जाती थी। अर्थात कूटना, कुचलना या पीसना। इस सिरे से विचार करने पर हम पाते हैं भोजपुरी का जांत शब्द जो चात, सात की शृंखला में आता है, यंत्र की अपेक्षा पुराना है (यद्यपि इसका नासिक्य प्रयोग यंत्र से प्रभावित लगता है) और यंत्र संस्कृतीकरण है, जिससे यातना और यंत्रणा की उत्पत्ति हुई है। गणित करना और खंडित करना दोनों का अर्थ एक ही था बंगाल में आज भी आटा पिसाने को गुणा करना का प्रयोग चलता है। विषाद,अवसाद और निषाद आदि में यही सातना और सताना पाया जा सकता है, जबकि प्रसाद में हिस्सा पाने, अर्थात बंटवारे का भाव तथा प्रसीद में पसीजने या द्रवित होने का भाव है जो जल की याद दिलाता है।

संस्कृत के आचार्यों का यह विचार रहा है कि उपसर्ग के प्रभाव से धातुओं में नया अर्थ पैदा हो जाता है, (उपसर्गेण धात्वर्थो बलाद अन्यत्र नीयते) परंतु यह अर्थ नया नहीं होता जातीय अवचेतन में बने रह गए पुरातन आशयों का पुनर आविष्कार होता है। भाषा में बलपूर्वक कुछ भी नहीं होता, परंतु इसके तरीके इतनी जटिल और दूरगामी हैं कि उनको पकड़ पाने में हम हमेशा सफल नहीं हो सकते।

क्रमशः

Post – 2018-04-17

संतापसूचक शब्द और जल (2)

अर – जल से व्युत्पन्न शब्दों में ‘अरण्ड’ आता है । बार बार इस बात की याद दिलाना जरूरी नहीं की घी, तेल आदि के लिए रूढ़ शब्दों का मूल अर्थ पानी रहा है। इस मामले में अर का अर्थ तेल, या पानी जैसा द्रव पदार्थ है, जिसमें इसके फल की आकृति ‘अंड’ या गोलाकार जोड़कर अरंड बना है और उसमें हीनार्थक ‘-ई’ लगाकर ‘अरंडी’ शब्द बना है। इसका अर्थ है कि ‘अर’ का भी प्रयोग भी कभी तेल के लिए कर लिया जाता था ।

कुछ लोग यह समझते हैं, और इसमें संस्कृत के विद्वान और कोशकार भी शामिल हैं, कि तेल के लिए संस्कृत शब्द ‘तैल’ है। तिलहनों में सबसे पहले तिल की खेती आरम्भ हुई, और तेल तिल से निकला है, इसलिए उसका अपत्यार्थक रूप तैल है। मैं एक बार किसी अन्य प्रसंग में बता चुका हूं कि दिल्ली की स्थानीय भाषा में है आज भी पानी के लिए तेल शब्द का प्रयोग जब तब होता है, यह मुझे अपने पार्क के माली से पता चला था। मैंने उसे पौधों में पानी देने को कहा तो उसने खुरपी से मिट्टी उलटकर कहा, ‘ताऊ यामें घणों तेल है।’ ऋग्वेद में सिंचित भूमि के लिए तिल्विल का प्रयोग हुआ हैः

भद्रे क्षेत्रे निमिता तिल्विले वा सनेम मध्वो अधिगर्तस्य ।। 5.62.7 यह है सोम की बुवाई का तरीका है, भूमि को अच्छी तरह जोत कर (भद्रे क्षेत्रे), उसे नम (तिल्विल) बना कर, नालियां बनाकर, नालियों में सोम के टुकड़े बोए जाते थे। जिनको यह भ्रम बना रह गया हो कि सोम गन्ना नहीं था, वे गन्ने की बुवाई के बारे में जानकारी बढ़ा सकते हैं।

सभ्यता के विकास को समझने मैं सहायक संकेतों में इस तरह की सूचनाएं बहुत महत्वपूर्ण है। तेल का पता मनुष्य को बहुत बाद में चला। पहले वह अरंडी को पत्थर पर कूट कर उसके गूदे से बालों को मसलकर उन्हें चिकना बनाता था । इस तरह की प्राचीन सूचनाएं बहुत बाद तक कैसे स्थांतरित होती रहीं, यह सोच कर हैरानी होती है। तेल के आविष्कार के कई हजार साल बाद, यह सूचना कालिदास को उपलब्ध थी, जिन्होंने कण्व आश्रम के छात्रों के संदर्भ में इसका और वल्कल का उल्लेख किया है।

जो भी हो, तेल के विषय में जानकारी तिल की खेती आरंभ होने से पहले भारतीय समाज को थी। अतः खाने चबाने के लिए तिल को कूटते समय उन्हें इसके भीतर आर्द्रता या चिकनाई का पता चला होगा इसलिए तिल के लिए उन्होंने इस शब्द का प्रयोग किया गया होगा। संभवतया नामकरण तैल किया गया हो, और बाद में भूल सुधारने की कोशिश में है एक नई भूल कर दी गई हो।

संताप
संताप में उपसर्ग ‘सं’ का अर्थ जल है, इसी तरह प्रताप, अनुताप, आदि में भी, प्र ( प्ल), और अनु का अर्थ भी जल है। स्वयं ताप और तप पानी की बूंद के गिरने से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण की देन हैं, इसलिए इनका प्रयोग आग और धूप प्रभाव के आशय में होने लगा। परंतु, यह निर्मितियां धातु प्रत्यय और उपसर्ग की भाषाई युक्ति का विकास होने के बाद की हैं, जब इन्होंने एक नया रूढ़ आशय ग्रहण कर लिया था, इसलिए वर्तमान विवेचन में हम इनको जल से सीधे व्युत्पन्न नहीं मान सकते। यही बात पश्चाताप पर भी लागू होती है। मैंने ‘अनु’ का अर्थ भी जल बताया है जबकि हम इसके उपसर्ग रूप से ही परिचित हैं, इसलिए इसका अर्थ जल करना प्रयत्नसाध्य लग सकता है। परंतु एक तो दूसरे सभी उपसर्गों का एक अर्थ जल है, दूसरे अनुक और अनूक दो ही ऐसे शब्द हैं जिनमें अनु का प्रयोग उपसर्ग के रूप में नहीं हुआ लगता है। पहले का अर्थ लालची है, आकांक्षी है और कामना लालसा आदि के लिए सभी शब्द जल से संबंधित है। मेरे अनुमान का आधार केवल इतना ही है। तप/टप = जल और अं . tub तथा आँखों के दबदबाने के सम्बन्ध को इसी तर्क से समझा जा सकता है.

सताना । यातना। यंत्रणा
शातन या चातन, जिनसे सत् और सताना का संबंध है, उस क्रिया की देन हैं जो किसी रसीले डंठल, या लता का रस निकालने के लिए की जाती थी। अर्थात कूटना, कुचलना या पीसना। इस सिरे से विचार करने पर हम पाते हैं भोजपुरी का जांत शब्द जो चात, सात की शृंखला में आता है, यंत्र की अपेक्षा पुराना है (यद्यपि इसका नासिक्य प्रयोग यंत्र से प्रभावित लगता है) और यंत्र संस्कृतीकरण है, जिससे यातना और यंत्रणा की उत्पत्ति हुई है। गणित करना और खंडित करना दोनों का अर्थ एक ही था बंगाल में आज भी आटा पिसाने को गुणा करना का प्रयोग चलता है। विषाद,अवसाद और निषाद आदि में यही सातना और सताना पाया जा सकता है, जबकि प्रसाद में हिस्सा पाने, अर्थात बंटवारे का भाव तथा प्रसीद में पसीजने या द्रवित होने का भाव है जो जल की याद दिलाता है।

संस्कृत के आचार्यों का यह विचार रहा है कि उपसर्ग के प्रभाव से धातुओं में नया अर्थ पैदा हो जाता है, (उपसर्गेण धात्वर्थो बलाद अन्यत्र नीयते) परंतु यह अर्थ नया नहीं होता जातीय अवचेतन में बने रह गए पुरातन आशयों का पुनर आविष्कार होता है। भाषा में बलपूर्वक कुछ भी नहीं होता, परंतु इसके तरीके इतनी जटिल और दूरगामी हैं कि उनको पकड़ पाने में हम हमेशा सफल नहीं हो सकते।

क्रमशः