Post – 2018-04-14

भावजगत और जल
आज हम हर्ष, विषाद ईर्ष्या द्वेष, करुणा, तितिक्षा,अस्तेय, और अपरिग्रह पर विचार करेंगे।

हर्ष, हर> ह्री- लज्जा, ह्रास – क्षय, और हर्ष- प्रसन्नता के बीच क्या कोई संबंध हो सकता है ? यदि तर ,तरु,तृ.

मा नः वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः ।
मा हृणानस्य मन्यवे ।। 1.25.2 क्रुद्धस्य
यो व्यंसं जाहृषाणेन मन्युना, प्रवृद्धेन, प्रचंड
अनु त्वा पत्नीः हृषितं वयश्च, हर्षित
अध स्मास्य हर्षतो हृषीवतो, हर्षित आनन्दमग्न
सुन्वद्भ्यो रन्धया कं चिदव्रतं हृणायन्तं चिदव्रतम् । 1.132.4
कंचिद् – सर्वं अपि, क्रोषन्तं
श्रवस्यवो हृषीवन्तो, हर्ष से भरे हुए
यथा देव न हृणीषे न हंसि, न अप्रसन्न होओ, न हमारी जान लो
हृणीयमानो अप हि मदैयेः प्र मे देवानां व्रतपा उवाच । क्रोध करते हुए
राजाना क्षत्रमहृणीयमाना सहस्रस्थूणं बिभृथः सह द्वौ ।। 5.62.6 अकुप्यन्तौ
किं मे हव्यमहृणानो जुषेत, अकुप्यन्
किमस्मभ्यं जातवेदो हृणीषे द्रोघवाचस्ते निर्ऋथं सचन्ताम्
कृधी नो अह्रयो देव सवितः. अलज्जित,
उद्गो ह्रदमपिबज्जर्हृषाणः,
अर्चन्ति तोके तनये परिष्टिषु मेधसाता वाजिनमह्रये धने ।। 10.147.3 अलज्जाकरे धने
पादनिचृत्, (5 ह्रसीयसी वा ) गायत्री
पुरू सहस्रा जनयो न पत्नीः दुवस्यन्ति स्वसारो अह्रयाणम् । 1.62.10
पुरू सहस्रा जनयो न पत्नीः दुवस्यन्ति स्वसारो अह्रयाणम् । 1.62.10
त्वोतो वाज्यह्रयोऽभि पूर्वस्मादपरः । प्र दाश्वाँ अग्ने अस्थात् ।। 1.74.8
वरेण्यं वृणीमहे अह्रयं वाजमृग्मियम् ।3.2.4
उभा शंसा सूदय सत्यतातेऽनुष्ठुया कृणुह्यह्रयाण ।। 4.4.14
परिं चिद् वष्टयो दधुर्ददतो राधोऽह्रयं सुजाते अश्वसूनृते ।। 5.79.5 {21} ()

ये नः राधांस्यह्रया मघवानो अरासत सुजाते अश्वसूनृते ।। 5.79.6
अग्र एति युवतिरह्रयाणा प्राचिकितत्सूर्यं यज्ञं अग्निम् ।। 7.80.2
आ नो विश्वान्यश्विना धत्तं राधांस्यह्रया ।
उपस्तुतिं भोजः सूरिर्यो अह्रयः ।। 8.70.13
कृधी नो अह्रयो देव सवितः

तव राधः सोमपीथाय हर्षते ।

Post – 2018-04-13

भावजगत और जल- 2

(हम विवेचन को इसलिए संक्षिप्त रखना चाहते हैं कि अधिक सामग्री होने पर उसे आत्मसात करने में पाठकों कठिनाई हो सकती है। चर्चा लंबी चलेगी और जिनकी इसमें गहरी रुचि है वे ही अपने धैर्य को बनाए रख पाएंगे।)

कामना
कम्- जल,
> कमल- जल का फूल,
> कंपन- कंपकपी- ठंढे पानी में भींगने का परिणाम,
>कंबु- शंख,
>कमंडल, जलपात्र,
>कंबोज- जल से घिरा प्रदेश, ठंडा प्रदेश,
> कामना- 1. *जल की चाह, > २. आकांक्षा,
>काम्य – वांछित,
>कमनीय – सुंदर, जिस की कामना की जाए,
काम – आकांक्षा (कामः तदग्रे समवर्तत …), २. आसक्ति,
>कामदेव – आसक्ति का मानाविकरण ।
> कामिनी / कामुक
कम – अल्प, हीन, >कमी (हम पहले देख आए हैं कि लघुता और विराटता सूचक सभी शब्द
जल के पर्यायों से व्युत्पन्न हैं ।
फारसी – कम – अल्प/ निम्न (कम-अज-कम ) > कमजोर/ कमबख्त/ २. कमीना- नीच

इच्छा
इष् -. सोमलता को कुचलने पर फूटने वाले रस की ध्वनि (हिन्वानो वाचं इष्यसि पवमानविधर्मणि); पतली धार से पानी के निकलने की आवाज,
इष – १. जल, २. सोमरस,
> इच्छा – जल की कामना, आकांक्षा,
> इष्ट- इच्छित, उद्दिष्ट – अभिप्रेत,
> अनिष्ट – हानि,
> इष्टि- वृष्टि की कामना, इस कामना से किया जाने वाला रीतिविधान, यज्ञ, पुत्रेष्टि- पुत्र की कामना, पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाने वाला यज्ञ,
Eng. ease, wish, wishtful,
(अस+इष) अक्षि > ईक्षण – देखना,
Eng. eye, wise, vision
> ईश (नमो देवेभ्यो नम ईश एषां)- स्वामी, ईश्वर,
> ईषत् – तनिक, जरा सा, थोड़ा सा
इश् -ऊपर होना, अधिकार करना, अधीन बनाना (मा नो दुःशंस ईशता विवक्षसे)।
ईशे, (मा व स्तेन ईशत माघशंसः)
ईशते (महः राजान ईशते),
ईशिषे (त्वं ईशिषे वसूनाम् ),
इष्यति (व्रतेष्वपि सोम इष्यते।
ईशते – स्वामी बनता है अपने अधिकार में लेता है
तेजी से बाहर निकलना ( इष्यन् वाचमुपवक्तेव होतुः), तेजी से दौड़ना,
इषु – बाण,
इषुधि- तरकश,
Eng. issue ,निर्गम, वाद विषय,
इष्य – होने वाला, आगे आने वाला, भविष्य सूचक विभक्ति।

क्षमा / क्षान्ति – सहनशीलता, अपकार बदला न लेना,

धातुपाठ में चमु-, छमु-, जमु-, झमु अदने, और क्षमूष् सहने दिया गया है। ऐसी स्थिति में जाहिर है क्षमा और क्षान्ति के व्युत्पादन के लिए एक अलग धातु की कल्पना की गई।
चमु-, छमु-, जमु-, झमु- को खाने तक सीमित रखा गया, हम जानते हैं खाने और पीने में पहले अंतर नहीं किया जाता था और उस सीमा तक मुख विवर से ग्रहण किए जाने वाले सभी पदार्थों के लिए पीने या खाने का प्रयोग होता है । आदमी सिगरेट पीता है । गुस्सा पी जाने की सलाह दी जाती है। इसलिए हम चमु-, छमु-, जमु-, झमु जल के अर्थ में भी ग्रहण कर सकते थे। हम इनके साथ शमु को भी जोड़ सकते थे।
पदान्ते इत् स्यात के तर्क से अन्त्य उकार का लोप होने पर ये सभी एक ही नाद श्रंखला – चं / (चम् / चन्), छं / (छम् / छन्). जं /( जम् / जन्), झं /( झम्, झन्), सं /( सम् / सन्), शं /(शम् / शन्), क्षं/(क्षम्, क्षन्) में आ जाते हैं। अदन से इनका संबंध सीधा हो या न हो, परंतु पानी पीने से इनका संबंध बहुत स्पष्ट है।
पानी का दूसरा गुण शांत करना शमन करना होता है आग को बुझाने या क्रोध को शमित करने का होता ह, वह भी इन से जुड़ा हुआ है। चं, सं, शं परस्पर परिवर्तनीय हैं और शेष ध्वनियां घोषीकरण और महाप्राणीकरण मात्र है, और इन ध्वनियों के प्रति अनुराग रखने वाली बोलियों के कारण है इसलिए अनुनादी आधार पर हमारे लिए कोई समस्या नहीं पैदा करतीं।

चम् का प्रयोग ऋग्वेद में द्रव को उठाने के लिए प्रयुक्त चमू, चम्वी और चमस् और
क्रिया रूप चनस्यति (पुरुभुजा चनस्यतम्),
चन- भी के आशय में अव्ययों के निर्माण में(शूने भूम कदा चन, भवति किं चन प्रियम्, नहि अस्या अपरं चन जरसा मरते पतिः) आदि मैं पाते हैं। हम पहले कह आए हैं कि सर्वनामों, उपसर्गों, अव्ययों और विभक्तियों के निर्माण में जलपरक शब्दों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
सामान्य व्यवहार में
> चंबल,
> चमक,
> चमत्कार,
> चंदन,
> चंद्र,
> चंचल आदि में जल और जल के गुणों से संबंधित प्रयोग देखे जा सकते हैं।
जोरदार बारिश की ध्वनि का अनुकरण छमाछम के रूप में किया जाता है।
> शं का प्रयोग शांति, कल्याणकारी (शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे )
> शमन,
> शंभू,
> शांति आदि में देखा जा सकता है।
इस चर्चा को अधिक विस्तार देकर बोझिल बनाने की अपेक्षा हम इतना ही संकेत करना जरूरी समझते हैं कि अनुनादी ध्वनियों में संस्कृत की तुलना में बोलचाल की भाषाएं अधिक भरोसे की है और इसलिए उनमें पाए जाने वाले उच्चारण को अधिक प्राचीन या मूलभूत मानना होगा। हमारा विचार है कि क्षमा के लिए अलग से एक धातु की कल्पना संस्कृत भाषाविदों को इसलिए करनी पड़ी कि वे अनुमान के आधार पर शब्दों के मूल घटकों की तलाश कर रहे थे, न कि उस नैसर्गिक स्रोत की ओर ध्यान दे रहे थे जिसकी स्पष्ट समझ वैदिक भाषाविदों को थी।

Post – 2018-04-13

भावजगत और जल- 2

(हम विवेचन को इसलिए संक्षिप्त रखना चाहते हैं कि अधिक सामग्री होने पर उसे आत्मसात करने में पाठकों कठिनाई हो सकती है। चर्चा लंबी चलेगी और जिनकी इसमें गहरी रुचि है वे ही अपने धैर्य को बनाए रख पाएंगे।)

कामना
कम्- जल,
> कमल- जल का फूल,
> कंपन- कंपकपी- ठंढे पानी में भींगने का परिणाम,
>कंबु- शंख,
>कमंडल, जलपात्र,
>कंबोज- जल से घिरा प्रदेश, ठंडा प्रदेश,
> कामना- 1. *जल की चाह, > २. आकांक्षा,
>काम्य – वांछित,
>कमनीय – सुंदर, जिस की कामना की जाए,
काम – आकांक्षा (कामः तदग्रे समवर्तत …), २. आसक्ति,
>कामदेव – आसक्ति का मानाविकरण ।
> कामिनी / कामुक
कम – अल्प, हीन, >कमी (हम पहले देख आए हैं कि लघुता और विराटता सूचक सभी शब्द
जल के पर्यायों से व्युत्पन्न हैं ।
फारसी – कम – अल्प/ निम्न (कम-अज-कम ) > कमजोर/ कमबख्त/ २. कमीना- नीच

इच्छा
इष् -. सोमलता को कुचलने पर फूटने वाले रस की ध्वनि (हिन्वानो वाचं इष्यसि पवमानविधर्मणि); पतली धार से पानी के निकलने की आवाज,
इष – १. जल, २. सोमरस,
> इच्छा – जल की कामना, आकांक्षा,
> इष्ट- इच्छित, उद्दिष्ट – अभिप्रेत,
> अनिष्ट – हानि,
> इष्टि- वृष्टि की कामना, इस कामना से किया जाने वाला रीतिविधान, यज्ञ, पुत्रेष्टि- पुत्र की कामना, पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाने वाला यज्ञ,
Eng. ease, wish, wishtful,
(अस+इष) अक्षि > ईक्षण – देखना,
Eng. eye, wise, vision
> ईश (नमो देवेभ्यो नम ईश एषां)- स्वामी, ईश्वर,
> ईषत् – तनिक, जरा सा, थोड़ा सा
इश् -ऊपर होना, अधिकार करना, अधीन बनाना (मा नो दुःशंस ईशता विवक्षसे)।
ईशे, (मा व स्तेन ईशत माघशंसः)
ईशते (महः राजान ईशते),
ईशिषे (त्वं ईशिषे वसूनाम् ),
इष्यति (व्रतेष्वपि सोम इष्यते।
ईशते – स्वामी बनता है अपने अधिकार में लेता है
तेजी से बाहर निकलना ( इष्यन् वाचमुपवक्तेव होतुः), तेजी से दौड़ना,
इषु – बाण,
इषुधि- तरकश,
Eng. issue ,निर्गम, वाद विषय,
इष्य – होने वाला, आगे आने वाला, भविष्य सूचक विभक्ति।

क्षमा / क्षान्ति – सहनशीलता, अपकार बदला न लेना,

धातुपाठ में चमु-, छमु-, जमु-, झमु अदने, और क्षमूष् सहने दिया गया है। ऐसी स्थिति में जाहिर है क्षमा और क्षान्ति के व्युत्पादन के लिए एक अलग धातु की कल्पना की गई।
चमु-, छमु-, जमु-, झमु- को खाने तक सीमित रखा गया, हम जानते हैं खाने और पीने में पहले अंतर नहीं किया जाता था और उस सीमा तक मुख विवर से ग्रहण किए जाने वाले सभी पदार्थों के लिए पीने या खाने का प्रयोग होता है । आदमी सिगरेट पीता है । गुस्सा पी जाने की सलाह दी जाती है। इसलिए हम चमु-, छमु-, जमु-, झमु जल के अर्थ में भी ग्रहण कर सकते थे। हम इनके साथ शमु को भी जोड़ सकते थे।
पदान्ते इत् स्यात के तर्क से अन्त्य उकार का लोप होने पर ये सभी एक ही नाद श्रंखला – चं / (चम् / चन्), छं / (छम् / छन्). जं /( जम् / जन्), झं /( झम्, झन्), सं /( सम् / सन्), शं /(शम् / शन्), क्षं/(क्षम्, क्षन्) में आ जाते हैं। अदन से इनका संबंध सीधा हो या न हो, परंतु पानी पीने से इनका संबंध बहुत स्पष्ट है।
पानी का दूसरा गुण शांत करना शमन करना होता है आग को बुझाने या क्रोध को शमित करने का होता ह, वह भी इन से जुड़ा हुआ है। चं, सं, शं परस्पर परिवर्तनीय हैं और शेष ध्वनियां घोषीकरण और महाप्राणीकरण मात्र है, और इन ध्वनियों के प्रति अनुराग रखने वाली बोलियों के कारण है इसलिए अनुनादी आधार पर हमारे लिए कोई समस्या नहीं पैदा करतीं।

चम् का प्रयोग ऋग्वेद में द्रव को उठाने के लिए प्रयुक्त चमू, चम्वी और चमस् और
क्रिया रूप चनस्यति (पुरुभुजा चनस्यतम्),
चन- भी के आशय में अव्ययों के निर्माण में(शूने भूम कदा चन, भवति किं चन प्रियम्, नहि अस्या अपरं चन जरसा मरते पतिः) आदि मैं पाते हैं। हम पहले कह आए हैं कि सर्वनामों, उपसर्गों, अव्ययों और विभक्तियों के निर्माण में जलपरक शब्दों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
सामान्य व्यवहार में
> चंबल,
> चमक,
> चमत्कार,
> चंदन,
> चंद्र,
> चंचल आदि में जल और जल के गुणों से संबंधित प्रयोग देखे जा सकते हैं।
जोरदार बारिश की ध्वनि का अनुकरण छमाछम के रूप में किया जाता है।
> शं का प्रयोग शांति, कल्याणकारी (शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे )
> शमन,
> शंभू,
> शांति आदि में देखा जा सकता है।
इस चर्चा को अधिक विस्तार देकर बोझिल बनाने की अपेक्षा हम इतना ही संकेत करना जरूरी समझते हैं कि अनुनादी ध्वनियों में संस्कृत की तुलना में बोलचाल की भाषाएं अधिक भरोसे की है और इसलिए उनमें पाए जाने वाले उच्चारण को अधिक प्राचीन या मूलभूत मानना होगा। हमारा विचार है कि क्षमा के लिए अलग से एक धातु की कल्पना संस्कृत भाषाविदों को इसलिए करनी पड़ी कि वे अनुमान के आधार पर शब्दों के मूल घटकों की तलाश कर रहे थे, न कि उस नैसर्गिक स्रोत की ओर ध्यान दे रहे थे जिसकी स्पष्ट समझ वैदिक भाषाविदों को थी।

Post – 2018-04-13

भावजगत और जल- 2

(हम विवेचन को इसलिए संक्षिप्त रखना चाहते हैं कि अधिक सामग्री होने पर उसे आत्मसात करने में पाठकों कठिनाई हो सकती है। चर्चा लंबी चलेगी और जिनकी इसमें गहरी रुचि है वे ही अपने धैर्य को बनाए रख पाएंगे।)

कामना
कम्- जल,
> कमल- जल का फूल,
> कंपन- कंपकपी- ठंढे पानी में भींगने का परिणाम,
>कंबु- शंख,
>कमंडल, जलपात्र,
>कंबोज- जल से घिरा प्रदेश, ठंडा प्रदेश,
> कामना- 1. *जल की चाह, > २. आकांक्षा,
>काम्य – वांछित,
>कमनीय – सुंदर, जिस की कामना की जाए,
काम – आकांक्षा (कामः तदग्रे समवर्तत …), २. आसक्ति,
>कामदेव – आसक्ति का मानाविकरण ।
> कामिनी / कामुक
कम – अल्प, हीन, >कमी (हम पहले देख आए हैं कि लघुता और विराटता सूचक सभी शब्द
जल के पर्यायों से व्युत्पन्न हैं ।
फारसी – कम – अल्प/ निम्न (कम-अज-कम ) > कमजोर/ कमबख्त/ २. कमीना- नीच

इच्छा
इष् -. सोमलता को कुचलने पर फूटने वाले रस की ध्वनि (हिन्वानो वाचं इष्यसि पवमानविधर्मणि); पतली धार से पानी के निकलने की आवाज,
इष – १. जल, २. सोमरस,
> इच्छा – जल की कामना, आकांक्षा,
> इष्ट- इच्छित, उद्दिष्ट – अभिप्रेत,
> अनिष्ट – हानि,
> इष्टि- वृष्टि की कामना, इस कामना से किया जाने वाला रीतिविधान, यज्ञ, पुत्रेष्टि- पुत्र की कामना, पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाने वाला यज्ञ,
Eng. ease, wish, wishtful,
(अस+इष) अक्षि > ईक्षण – देखना,
Eng. eye, wise, vision
> ईश (नमो देवेभ्यो नम ईश एषां)- स्वामी, ईश्वर,
> ईषत् – तनिक, जरा सा, थोड़ा सा
इश् -ऊपर होना, अधिकार करना, अधीन बनाना (मा नो दुःशंस ईशता विवक्षसे)।
ईशे, (मा व स्तेन ईशत माघशंसः)
ईशते (महः राजान ईशते),
ईशिषे (त्वं ईशिषे वसूनाम् ),
इष्यति (व्रतेष्वपि सोम इष्यते।
ईशते – स्वामी बनता है अपने अधिकार में लेता है
तेजी से बाहर निकलना ( इष्यन् वाचमुपवक्तेव होतुः), तेजी से दौड़ना,
इषु – बाण,
इषुधि- तरकश,
Eng. issue ,निर्गम, वाद विषय,
इष्य – होने वाला, आगे आने वाला, भविष्य सूचक विभक्ति।

क्षमा / क्षान्ति – सहनशीलता, अपकार बदला न लेना,

धातुपाठ में चमु-, छमु-, जमु-, झमु अदने, और क्षमूष् सहने दिया गया है। ऐसी स्थिति में जाहिर है क्षमा और क्षान्ति के व्युत्पादन के लिए एक अलग धातु की कल्पना की गई।
चमु-, छमु-, जमु-, झमु- को खाने तक सीमित रखा गया, हम जानते हैं खाने और पीने में पहले अंतर नहीं किया जाता था और उस सीमा तक मुख विवर से ग्रहण किए जाने वाले सभी पदार्थों के लिए पीने या खाने का प्रयोग होता है । आदमी सिगरेट पीता है । गुस्सा पी जाने की सलाह दी जाती है। इसलिए हम चमु-, छमु-, जमु-, झमु जल के अर्थ में भी ग्रहण कर सकते थे। हम इनके साथ शमु को भी जोड़ सकते थे।
पदान्ते इत् स्यात के तर्क से अन्त्य उकार का लोप होने पर ये सभी एक ही नाद श्रंखला – चं / (चम् / चन्), छं / (छम् / छन्). जं /( जम् / जन्), झं /( झम्, झन्), सं /( सम् / सन्), शं /(शम् / शन्), क्षं/(क्षम्, क्षन्) में आ जाते हैं। अदन से इनका संबंध सीधा हो या न हो, परंतु पानी पीने से इनका संबंध बहुत स्पष्ट है।
पानी का दूसरा गुण शांत करना शमन करना होता है आग को बुझाने या क्रोध को शमित करने का होता ह, वह भी इन से जुड़ा हुआ है। चं, सं, शं परस्पर परिवर्तनीय हैं और शेष ध्वनियां घोषीकरण और महाप्राणीकरण मात्र है, और इन ध्वनियों के प्रति अनुराग रखने वाली बोलियों के कारण है इसलिए अनुनादी आधार पर हमारे लिए कोई समस्या नहीं पैदा करतीं।

चम् का प्रयोग ऋग्वेद में द्रव को उठाने के लिए प्रयुक्त चमू, चम्वी और चमस् और
क्रिया रूप चनस्यति (पुरुभुजा चनस्यतम्),
चन- भी के आशय में अव्ययों के निर्माण में(शूने भूम कदा चन, भवति किं चन प्रियम्, नहि अस्या अपरं चन जरसा मरते पतिः) आदि मैं पाते हैं। हम पहले कह आए हैं कि सर्वनामों, उपसर्गों, अव्ययों और विभक्तियों के निर्माण में जलपरक शब्दों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
सामान्य व्यवहार में
> चंबल,
> चमक,
> चमत्कार,
> चंदन,
> चंद्र,
> चंचल आदि में जल और जल के गुणों से संबंधित प्रयोग देखे जा सकते हैं।
जोरदार बारिश की ध्वनि का अनुकरण छमाछम के रूप में किया जाता है।
> शं का प्रयोग शांति, कल्याणकारी (शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे )
> शमन,
> शंभू,
> शांति आदि में देखा जा सकता है।
इस चर्चा को अधिक विस्तार देकर बोझिल बनाने की अपेक्षा हम इतना ही संकेत करना जरूरी समझते हैं कि अनुनादी ध्वनियों में संस्कृत की तुलना में बोलचाल की भाषाएं अधिक भरोसे की है और इसलिए उनमें पाए जाने वाले उच्चारण को अधिक प्राचीन या मूलभूत मानना होगा। हमारा विचार है कि क्षमा के लिए अलग से एक धातु की कल्पना संस्कृत भाषाविदों को इसलिए करनी पड़ी कि वे अनुमान के आधार पर शब्दों के मूल घटकों की तलाश कर रहे थे, न कि उस नैसर्गिक स्रोत की ओर ध्यान दे रहे थे जिसकी स्पष्ट समझ वैदिक भाषाविदों को थी।

Post – 2018-04-13

बदलती आ रही है, देखना आगे भी बदलेगी।
अगर खुद को नहीं बदला तो दुनिया छूट जाएगी।

Post – 2018-04-13

बदलती आ रही है, देखना आगे भी बदलेगी।
अगर खुद को नहीं बदला तो दुनिया छूट जाएगी।

Post – 2018-04-13

बदलती आ रही है, देखना आगे भी बदलेगी।
अगर खुद को नहीं बदला तो दुनिया छूट जाएगी।

Post – 2018-04-12

भावजगत और जल- 1

भावनाओं के साथ तो यूं भी -उद्गार, -उद्रेक, -प्रवाह, -आवेग जैसे उत्तरपद लग जाते हैं जिसके बाद जल और आर्द्रता से इनके सहज संबंध के विषय में कोई सन्देह रह ही नहीं जाता। हम समग्र विचार जगत या बौद्धिक आयास को भावलोक में रख कर यह चर्चा करना चाहते हैं। मोटे तौर पर वे सभी संकल्पनाएं जिनको भाववाचक संज्ञाओं रखा जाता है। इनकी संख्या विशाल है और इतना तो बिना कहे भी जाना जा सकता है कि इन सभी पर विचार करना किसी एक आदमी के वश की बात नहीं। अत: चुनिन्दा आंकड़ो के आधार पर अपने मन्तव्य को सही सिद्ध करने के संभावित आरोप से बचने के लिए हम इतना ही आश्वासन दे सकते हैं कि हम बिना किसी योजना के अनायास स्मरण आने वाले शब्दों पर विचार करेंगे और यदि किसी ने अपनी ओर से, परीक्षा के लिए ही सही, कोई शब्द या कार्य-व्यापार सुझाया तो उस पर भी विचार करने का प्रयत्न करेंगे।

स्नेह (प्रेम) स्नेह का मूल अर्थ पानी था। यह उसी स्न से व्युत्पन्न है जिससे स्नान, स्नापित (नापित), अं. Snow, , snail, snake,sneak, snook, snipe. यह रोचक है कि अपनी घपलेबाजी में मारिस ब्लूमफील्ड ने मूल भारोपीय जनों का निवास शीतप्रधान देश में सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया था कि वे हिम से परिचित थे. Vedic Concordance जैसी विख्यात कृति का सम्पादक इतना अनाड़ी नहीं हो सकता. जो लोग वैदिक साहित्य के असाधारण पांडित्य और संस्कृत भाषा पर असाधारण अधिकार रखते रहे हैं वे भी अपनी ख्याति का किस सीमा तक जाकर दुरूपयोग करते रहे हैं, इसका यह एक नमूना मात्र है,

स्न सर / स्र का वह रूप है जो नासिक्य प्रेमी समुदाय के सांस्कृतिक धारा में प्रवेश का परिणाम था. राजवाड़े ने इनकी वर्तमान में पहचान गुजरात के दक्षिणी अंचल में की थी. गुजराती और सिन्धी पशु व्यापार में अग्रणी थे और इन्होने मध्येशिया में एक बड़े क्षेत्र में अपना कारोबार जमाया था जिसकी उलटी व्याख्या करते हुए वे ही पश्चिमी पंडित सिंतास्ता (सिंधियों का या सैन्धव क्षेत्र) और अन्द्रोनोवो (अन्ध्रवृष्णिकों का नया क्षेत्र ) से चलने वाले आर्यों का आक्रमण दिखाते रहे, जब कि स्थिति उल्टी थी और थी भी आक्रमण के कारण नहीं, पशुपालन विद्या में इनकी अग्रता और पशु व्यापार में रूचि के कारण. यह कम रोचक नही है की वैदिक भाषा पर भी इनकी बोलियों का असर पडा था, पर अधिक नहीं, अतः स्न वाले रूप संस्कृत की तुलना में यूरोपीय बोलियों पर अधिक स्पष्ट है.

श्र = श्रयण, श्रव =स्राव, यश
श्रत-= सत्य-, श्रद्धा =निष्टा पूर्वक विश्वास भाव,
श्रम (पसीना लाने वाला काम),
श्रथ (थक कर निढाल),
श्लथ (थकान के बाद ढीला पड़) ,
शिथिल (ढीला, लापरवाह) आदि के व्युत्पादन में स्र/ स्ल/श्र की भूमिका थी जिससे अंग्रे. के shrink, slim, sleek, slink, slip, slow, sloth, sling आदि की उत्पत्ति की संभावना है.

श्री (सिर/ शिर / चिर; सिरि/ शिरि /चिरि)

घृणा ( घृ- क्षरण – छलकने की ध्वनि) >घृत – पानी (घृतं क्षरन्ति सिन्धवः)> रूधार्थ – घी; घृणि – धूप, पसीना । घृणा – करुणा , बौद्ध मत के विरोध में अर्थपरिवर्तन – घृणा- नफरत.

Post – 2018-04-12

भावजगत और जल- 1

भावनाओं के साथ तो यूं भी -उद्गार, -उद्रेक, -प्रवाह, -आवेग जैसे उत्तरपद लग जाते हैं जिसके बाद जल और आर्द्रता से इनके सहज संबंध के विषय में कोई सन्देह रह ही नहीं जाता। हम समग्र विचार जगत या बौद्धिक आयास को भावलोक में रख कर यह चर्चा करना चाहते हैं। मोटे तौर पर वे सभी संकल्पनाएं जिनको भाववाचक संज्ञाओं रखा जाता है। इनकी संख्या विशाल है और इतना तो बिना कहे भी जाना जा सकता है कि इन सभी पर विचार करना किसी एक आदमी के वश की बात नहीं। अत: चुनिन्दा आंकड़ो के आधार पर अपने मन्तव्य को सही सिद्ध करने के संभावित आरोप से बचने के लिए हम इतना ही आश्वासन दे सकते हैं कि हम बिना किसी योजना के अनायास स्मरण आने वाले शब्दों पर विचार करेंगे और यदि किसी ने अपनी ओर से, परीक्षा के लिए ही सही, कोई शब्द या कार्य-व्यापार सुझाया तो उस पर भी विचार करने का प्रयत्न करेंगे।

स्नेह (प्रेम) स्नेह का मूल अर्थ पानी था। यह उसी स्न से व्युत्पन्न है जिससे स्नान, स्नापित (नापित), अं. Snow, , snail, snake,sneak, snook, snipe. यह रोचक है कि अपनी घपलेबाजी में मारिस ब्लूमफील्ड ने मूल भारोपीय जनों का निवास शीतप्रधान देश में सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया था कि वे हिम से परिचित थे. Vedic Concordance जैसी विख्यात कृति का सम्पादक इतना अनाड़ी नहीं हो सकता. जो लोग वैदिक साहित्य के असाधारण पांडित्य और संस्कृत भाषा पर असाधारण अधिकार रखते रहे हैं वे भी अपनी ख्याति का किस सीमा तक जाकर दुरूपयोग करते रहे हैं, इसका यह एक नमूना मात्र है,

स्न सर / स्र का वह रूप है जो नासिक्य प्रेमी समुदाय के सांस्कृतिक धारा में प्रवेश का परिणाम था. राजवाड़े ने इनकी वर्तमान में पहचान गुजरात के दक्षिणी अंचल में की थी. गुजराती और सिन्धी पशु व्यापार में अग्रणी थे और इन्होने मध्येशिया में एक बड़े क्षेत्र में अपना कारोबार जमाया था जिसकी उलटी व्याख्या करते हुए वे ही पश्चिमी पंडित सिंतास्ता (सिंधियों का या सैन्धव क्षेत्र) और अन्द्रोनोवो (अन्ध्रवृष्णिकों का नया क्षेत्र ) से चलने वाले आर्यों का आक्रमण दिखाते रहे, जब कि स्थिति उल्टी थी और थी भी आक्रमण के कारण नहीं, पशुपालन विद्या में इनकी अग्रता और पशु व्यापार में रूचि के कारण. यह कम रोचक नही है की वैदिक भाषा पर भी इनकी बोलियों का असर पडा था, पर अधिक नहीं, अतः स्न वाले रूप संस्कृत की तुलना में यूरोपीय बोलियों पर अधिक स्पष्ट है.

श्र = श्रयण, श्रव =स्राव, यश
श्रत-= सत्य-, श्रद्धा =निष्टा पूर्वक विश्वास भाव,
श्रम (पसीना लाने वाला काम),
श्रथ (थक कर निढाल),
श्लथ (थकान के बाद ढीला पड़) ,
शिथिल (ढीला, लापरवाह) आदि के व्युत्पादन में स्र/ स्ल/श्र की भूमिका थी जिससे अंग्रे. के shrink, slim, sleek, slink, slip, slow, sloth, sling आदि की उत्पत्ति की संभावना है.

श्री (सिर/ शिर / चिर; सिरि/ शिरि /चिरि)

घृणा ( घृ- क्षरण – छलकने की ध्वनि) >घृत – पानी (घृतं क्षरन्ति सिन्धवः)> रूधार्थ – घी; घृणि – धूप, पसीना । घृणा – करुणा , बौद्ध मत के विरोध में अर्थपरिवर्तन – घृणा- नफरत.

Post – 2018-04-12

भावजगत और जल- 1

भावनाओं के साथ तो यूं भी -उद्गार, -उद्रेक, -प्रवाह, -आवेग जैसे उत्तरपद लग जाते हैं जिसके बाद जल और आर्द्रता से इनके सहज संबंध के विषय में कोई सन्देह रह ही नहीं जाता। हम समग्र विचार जगत या बौद्धिक आयास को भावलोक में रख कर यह चर्चा करना चाहते हैं। मोटे तौर पर वे सभी संकल्पनाएं जिनको भाववाचक संज्ञाओं रखा जाता है। इनकी संख्या विशाल है और इतना तो बिना कहे भी जाना जा सकता है कि इन सभी पर विचार करना किसी एक आदमी के वश की बात नहीं। अत: चुनिन्दा आंकड़ो के आधार पर अपने मन्तव्य को सही सिद्ध करने के संभावित आरोप से बचने के लिए हम इतना ही आश्वासन दे सकते हैं कि हम बिना किसी योजना के अनायास स्मरण आने वाले शब्दों पर विचार करेंगे और यदि किसी ने अपनी ओर से, परीक्षा के लिए ही सही, कोई शब्द या कार्य-व्यापार सुझाया तो उस पर भी विचार करने का प्रयत्न करेंगे।

स्नेह (प्रेम) स्नेह का मूल अर्थ पानी था। यह उसी स्न से व्युत्पन्न है जिससे स्नान, स्नापित (नापित), अं. Snow, , snail, snake,sneak, snook, snipe. यह रोचक है कि अपनी घपलेबाजी में मारिस ब्लूमफील्ड ने मूल भारोपीय जनों का निवास शीतप्रधान देश में सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया था कि वे हिम से परिचित थे. Vedic Concordance जैसी विख्यात कृति का सम्पादक इतना अनाड़ी नहीं हो सकता. जो लोग वैदिक साहित्य के असाधारण पांडित्य और संस्कृत भाषा पर असाधारण अधिकार रखते रहे हैं वे भी अपनी ख्याति का किस सीमा तक जाकर दुरूपयोग करते रहे हैं, इसका यह एक नमूना मात्र है,

स्न सर / स्र का वह रूप है जो नासिक्य प्रेमी समुदाय के सांस्कृतिक धारा में प्रवेश का परिणाम था. राजवाड़े ने इनकी वर्तमान में पहचान गुजरात के दक्षिणी अंचल में की थी. गुजराती और सिन्धी पशु व्यापार में अग्रणी थे और इन्होने मध्येशिया में एक बड़े क्षेत्र में अपना कारोबार जमाया था जिसकी उलटी व्याख्या करते हुए वे ही पश्चिमी पंडित सिंतास्ता (सिंधियों का या सैन्धव क्षेत्र) और अन्द्रोनोवो (अन्ध्रवृष्णिकों का नया क्षेत्र ) से चलने वाले आर्यों का आक्रमण दिखाते रहे, जब कि स्थिति उल्टी थी और थी भी आक्रमण के कारण नहीं, पशुपालन विद्या में इनकी अग्रता और पशु व्यापार में रूचि के कारण. यह कम रोचक नही है की वैदिक भाषा पर भी इनकी बोलियों का असर पडा था, पर अधिक नहीं, अतः स्न वाले रूप संस्कृत की तुलना में यूरोपीय बोलियों पर अधिक स्पष्ट है.

श्र = श्रयण, श्रव =स्राव, यश
श्रत-= सत्य-, श्रद्धा =निष्टा पूर्वक विश्वास भाव,
श्रम (पसीना लाने वाला काम),
श्रथ (थक कर निढाल),
श्लथ (थकान के बाद ढीला पड़) ,
शिथिल (ढीला, लापरवाह) आदि के व्युत्पादन में स्र/ स्ल/श्र की भूमिका थी जिससे अंग्रे. के shrink, slim, sleek, slink, slip, slow, sloth, sling आदि की उत्पत्ति की संभावना है.

श्री (सिर/ शिर / चिर; सिरि/ शिरि /चिरि)

घृणा ( घृ- क्षरण – छलकने की ध्वनि) >घृत – पानी (घृतं क्षरन्ति सिन्धवः)> रूधार्थ – घी; घृणि – धूप, पसीना । घृणा – करुणा , बौद्ध मत के विरोध में अर्थपरिवर्तन – घृणा- नफरत.