दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय
उसने बेकार की बहस से पिंड छुड़ाने के लिए सुझाया, ‘’हम अपनी बात शिक्षा तक सीमित रखें तो अधिक अच्छा हो!’’
‘’शिक्षा नहीं सामाजिक न्याय! देखो अधिक पाने, अधिक जुटाने, केवल अपनी सुरक्षा की अधिक चिन्ता से श्रम और प्रयत्न का रूप भी बदलता है, सृजनात्मकता भी आती है और आर्थिक विषमता भी पैदा होती है और इस आर्थिक विषमता के चलते सामाजिक विषमता भी पैदा होती है, भले वह शिलीभूत हो या न हो! यह एक प्रक्रिया है! प्रगति विषमतामूलक है! यथास्थितिवाद समतामूलक हो सकता है, यद्यपि यह केवल आदिम समाज और आदिम जीवनशैली तक सही था।”
‘’तुम्हें नहीं लगता, इस बहाने तुम आर्थिक विषमता को भी बनाए रखना चाहते हो और सामाजिक भेदभाव का भी समर्थन कर रहे हो! इन दोनों में से किसी से मुक्ति की चिन्ता तुम्हें नहीं है!’’
‘’आकांक्षा और सदभावना से यथार्थ की जटिल और कुटिल बनावट को नहीं समझा जा सकता! बिना किसी वस्तु के चरित्र को समझे उसे नहीं बदला जा सकता! तुम उल्टी दिशा से काम करते हो! बदलने की जल्दबाजी में समझने की जरूरत ही नहीं समझते, बल्कि समझ को उत्साह का शत्रु मान कर उससे काम लेने को कायरता या पलायनवाद कह कर उसे हतोत्साहित करते हो! बीच में सोचने की गुंजायश नहीं बचती! इसलिए आदर्श से आकर्षित हो कर पढ़े-लिखे, संवेदनशील लोगों की संख्या वामपंथ में भले बहुत बड़ी हो, अपने आकार और मुखरता के कारण, वह डरावना भले लगे, परन्तु जहाँ तक अक्ल से काम लेने का सवाल है इनमें और उन विचारधाराओं या विश्वासधाराओं से इनका कोई अन्तर नहीं है जिन्हें ये प्रतिक्रियावादी कह कर उनके लेखन को समझने का प्रयत्न तक नहीं करते कि वे अपने प्रभावक्षेत्र में किन तरीकों से, किस आधार पर किस मानसिकता का निर्माण कर रहे हैं । यही काम वे भी अपने से भिन्न विचारों के लेखन के विषय में करते हैं परन्तु् वामपंथियों से कुछ कम। वैचारिकता को ऐसे सभी संगठन हतोत्साहित करते हैं जो साध्य को सिद्ध करना चाहते हैं और इस बात की चिन्ता नहीं करते कि उनके साधन क्या और कैसे हैं। केवल युद्ध और प्रेम में सब कुछ जायज नहीं है, ‘जो पाना है उसे पाकर रहेंगे’, ‘लक्ष्य हासिल करके ही दम लेंगे’, ‘सफलता किसी भी कीमत पर’ जैसे प्रेरक वाक्यों से परिचालित सभी संगठनों में सोचना हासिल करने के तरीके से आगे या इधर-उधर नहीं जा सकता । इस माने में सेना, पुलिस, राजनीतिक संगठन, सामाजिक आन्दोलन सभी का चरित्र ‘कुछ भी जायज है’ के सिद्धान्त से ही परिचालित होता है ! इनकी सफलता का यह हाल कि जिन समस्याओं के कारण ये अस्तित्व में आते हैं वे कभी खत्म होने ही नहीं पातीं! समस्याओं के समाधान का आश्वासन देते हुए भी ये स्वयं समस्याओं के जनक बने रहते हैं!’’
‘’वाह! ‘इक जरा छेड़िए फिर देखिए क्या होता है!’ सीधे नहीं कह सकते थे कि मैं सामाजिक और आर्थिक विषमता को दूर करने का पक्षधर हूँ!’’
‘’कह तो सकता था, पर उस दशा में यह न कह पाता कि सामाजिक आर्थिक विषमता के नाम पर लोगों को संगठित करने वाले तुम स्वयं अपने अस्तित्व के लिए इनको दूर होने ही नहीं देना चाहते! समस्या सुलझ गई तो तुम्हारा क्या होगा? बेरोजगार हो जाओगे! इसलिए ‘विषमताओं को दूर करने के लिए पहले तुमको मिटाना या रास्ते से हटाना जरूरी है’, यह सन्देश तो दे ही नहीं पाता! और दूसरी ओर यदि मैं इतने संक्षेप में कह देता कि मैं इनके उन्मूलन में तुमसे अधिक रुचि रखता हूँ तो क्या तुम विश्वास कर लेते? कहते शब्दों से ‘हां’ कह रहा हूँ और अपनी व्याख्या से ‘ना’ कह रहा हूँ, क्योंकि मेरी व्याख्या तुम्हारी इच्छापूर्ति तो कर नहीं रही थी! उसमें तो बाधाओं, रुकावटों और संभावित खतरों को समझने तक की इच्छा नहीं है फिर नासमझी में किए गए कामों के परिणामों से बचा कैसे जा सकता है।”
‘’तुम परिवर्तन के लिए प्रयत्नतशील सभी संगठनों को समाप्त करते हुए, जो-चल-रहा-है-चलने-दो का समर्थन नहीं कर रहे हो? सीने पर हाथ रख कर कहो, क्या तुम सत्ता के साथ मिले हुए नहीं हो और इसीलिए यह चाहते ही नहीं कि कहीं कोई बदलाव आये। बदलाव के नाम पर दर्शन जरूर बघार देते हो, जिसका तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक उसे अमल में न लाया जाय।‘’
‘जिन्हें तुम परिवर्तन के लिए प्रयत्न शील संगठन कह रहे हो, वे परिवर्तन का सपना दिखा कर सत्ता पर कब्जा जमाने के लिए प्रयत्नशील संगठन हैं, इसे समझो। सत्ता से जुड़ाव को मैं बुद्धिजीवी के लिए शुभ लक्षण नहीं मानता। मैं कहता हूं सत्ता् का खेल खेलने वाले उतना ही परिवर्तन लाते हैं जिससे लगे कुछ हो रहा है, परन्तु समस्या बनी रहे और अधिक अच्छाा हो कि वह और विकृत रूप लेती चली जाए जिससे तुम बता सको कि हमारे इतने प्रयत्न के बाद भी यह हाल है तो तुम न रहे तब तो सत्यानाश हो जाएगा, जब कि सत्यानाश तुम्हारे कारण हो रहा है।‘’
वह झुंझला उठा, ‘’जब कोई संगठन ही न रहेगा तब परिवर्तन कैसे आयेगा यह बता सकते हो।‘’
’’विचार से। ऐसे विचार से जो सत्ता पर अधिकार करने के इरादे से न पैदा हुआ हो, समाज को बदलने के संकल्प से पैदा हुआ हो। तुम्हारे सोचने में और मेरे सोचने में एक मामूली सा फर्क है। तुम समझते हो सभी परिवर्तन राजनीति या सत्ता के माध्यम से ही संभव हैं इसलिए सत्ता पर अधिकार परिवर्तन के लिए जरूरी है। मैं मानता हूं चेतना के रूप में परिवर्तन, हमारी संवेदना में परिवर्तन सत्ता के माध्यम से संभव नहीं, परन्तु इन क्षेत्रों में सत्ता के हस्तेक्षेप से विकृतियां आ सकती हैं, गिरावट आ सकती है, सत्यानाश तक हो सकता है।
”तुम मान बैठे हो कि दर्शन वही सही है जिसके आधार पर संगठित हो कर परिवर्तन का प्रयत्न किया जाय, दूसरे दर्शन, साहित्य, कला आदि केवल बौद्धिक ऐयाशी है, जब कि मैं मानता हूं चेतना को बदलने का काम इनके द्वारा ही संभव है। तुम मानते हो सम्मान का एकमात्र मानदंड शक्तिसंचय है, मैं मानता हूं समाज को बदलने के लिए शक्ति, वैभव और अधिकार के प्रति उपेक्षा भाव रखते हुए काम करना है। जनमन में इसके प्रति गहन सम्मान होता है और इस सम्मान के कारण ऐसे व्यक्ति के कथन और आचरण का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसी के कारण या इसी का प्रदर्शन करके, अपने जीवन में संयम और त्याग भाव को उतारने के कारण ब्राहमणों ने राजशक्ति, धनशक्ति और शस्त्रबल से रहित होते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा कायम रखी और इसी काे न समझ पाने के कारण बौद्धमठ मौजमस्ती के अड्डों में बदल गए और अपनी चरम गिरावट में वे उस पंचमकारी गिरावट के शिकार हुए जिसे द्विवेदी जी लोक धर्म कहते थे और मैं गुरुत्वाीकर्षण के सम्मु ख अपने को निढाल छोड़ देना मानता हूं।‘’
’’मैं यह जानता था तुम अपनी ही व्याख्या से सिद्ध कर दोगे कि तुम वर्णवाद को मिटाने की सोच ही नहीं सकते क्योंकि तुम्हारी नजर में ब्राह्मण त्याग तपस्या की मूर्ति है और शूद्र नराधम जिसे उस दशा में रहना ही चाहिए जिसमें वह है।‘’
‘’तुम्हारी बुद्धि पर तरस आता है और उस हीन भावना पर भी जिसके कारण तुम उपमा में भी ब्राह्मण के किसी गुण की बात की जाय तो समझने की जगह मौके का फायदा उठाने को बेताब हो जाते हो। सिद्धों और सन्तों की बात करूं तो शायद तुम्हारी खोपड़ी में मेरी बात उतर जाये। सिद्ध आनन्दवादी थे, उनके चमत्काकर के उसी तरह चर्च थे जैसे उन्हीं की नकल पर असाधारण सिद्धि का प्रचार करने वाले सूफियों के, इसलिए व्यापक जनसमाज पर इनका उस तरह का प्रभाव न पड़ा जो आचार की शुचिता, त्याग, आदि के उन गुणों के कारण सन्तों की वाणी का समाज पर पड़ा और कुछ ने तो छोटी मोटी सामाजिक क्रान्ति ही कर दी, जैसे कबीर, नानक देव, और नामदेव आदि ने। समाज की चेतना को किसी सम्राट के किसी दान या फर्मान ने उतना प्रभावित न किया होगा जितना इन्होंने किया जो सत्ता , शक्ति और वैभव के प्रति उदासीन थे और सामाजिक विषमता से कातर।
’’ऐसे लोग जो समाज को बदलना चाहते हों, अपने जीवन को जनजीवन के समकक्ष रखते हुए उनमें इस बात की मांग को निर्णायक मांग बना दें कि हमें और कोई बराबरी तुम नहीं दे सकते शिक्षा की बराबरी दो, हमारी भाषा में हमारी उच्चरतम आकांक्षाओं की पूर्ति का अवसर प्रदान करो तो लोकतन्त्री में सत्ताम पर अधिकार जमाए बिना जनजागरण से वह असंभव प्रतीत होने वाला काम संभव हो सकता है। लोकतन्त्र् की मर्यादा की रक्षा करते हुए जनचेतना को बदलने से जैसे परिवर्तन संभव हैं वे सत्ता। में आ कर पुलिस और फौज या वजीफों के बल पर नहीं।‘’
‘’मैं तुम्हारी बात से पूरी तरह सहमत नहीं। पर इस पर आज बहस करना बेकार है। अब चलू?‘’