Post – 2018-02-05

इतिहास और मनोभग्नता

मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं कि मेरे पूर्वज भारत के मूल निवासी थे या कहीं अन्यत्र से आकर बसे थे। मुझे यह मालूम है कि दिल्ली में कम से कम 20 बार अपना ठिकाना और तीन बार स्थाई पता बदलना पड़ा और अब गाजियाबाद (क्रासिंग रिपब्लिक) के जिस मकान में रहता हूं, वह संभवतः मेरा अंतिम स्थाई पता रहे। मेरे पुत्र और पुत्री (और जामाता) अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं। मेरे जन्मस्थान (गगहा, गोरखपुर) में आज से पैंतालीस पीढ़ी पहले मेरे कुल के आदि पुरुष बाबा सक्त (शक्ति) सिंह ने सतासीनरेश से दहेज में मिले चौरासी पर अधिकार किया था। इस के लिए उन्होंन यहां पहले से बसे थारुओं का छल और क्रूरता से दमन और उन्मूलन किया था। इससे पहले वे फैजाबाद जिले के विड़हर में आबाद थे। बिड़हर का मतलब आपको न मालूम हो तो इसे बिरहोर पढ़ने पर पता चल जाएगा यहां पहले बिरहोर जनों का निवास था। हमारा परिचय देते हुए हमें पलुआर (पालीवाल) क्षत्रिय बताया जाता है, क्योंकि मध्यकाल में कभी हमारे पूर्वज हरदोई के पाली नामक स्थान से जान और मान बचा कर पूर्व की ओर भागे थे। हमारे साथ मुस्लिम शासकों ने जैसा बर्ताव किया था वैसा ही हमारे पूर्वजों ने कमजोर पाकर बिना उनके किसी अपराध के बिरहोरों और थारुओं (स्थविरों, या बौद्ध मतावलंबी) के साथ किया। मैं इस लघु इतिहासवृत्त के किसी भी खंड का समर्थन नहीं करता, कुछ की भर्त्सना करता हूं, फिर भी उत्तराधिकार में भूमि का जो हिस्सा मेरे नाम है उसे अपना मानता हूं।

तरुणाई के आगमन के साथ मूछें आईं तो हुआ कुछ ऐसा कि नाक के ठीक नीचे बाल उगेही नहीं । इसमें समय लगा। टाड का इतिहास तो नहीं पढ़ा था पर उसकी कुछ मोटी बातें पता थीं जिनमें से एक थी हूणों की शुद्धि करके उनको अग्निवंशी क्षत्रिय बनाना। हम अपने को अग्निवंशी तो नहीं, चंद्रवंशी कहते थे और अपना संबंध पांडवों से जोड़ते थे । यह भी मानते थे कि जनमेजय के नागयज्ञ के समय प्राणरक्षा के लिए जिन नागों ने कसम खाई कि वे कभी उनके वंश के किसी व्यक्ति को नहीं काटेंगे वे ही जीवित बचे थे और इसका निर्वाह वे आज तक करते हैं। प्रमाण यह कि आजतक किसी पालीवाल की मौत सांप के काटने से नहीं हुई।
पर हमारा गोत्रनाम था बैयाघर अर्थात् व्याघ्र है। गोत्रनाम ऋषियों के नाम पर होते हैं कोई जानवर, वह कितना भी शक्तिशाली हो, उसका गोत्रनाम तभी हो सकता था जब यह किसी को नकली रूप में दिया गया हो।

इसमें एक तत्व यह भी जुड़ा था कि मैं तब तक जिस पाली से अपना संबंध जोड़ता था, वह हरदोई का पाली न होकर राजस्थान का पाली था, अर्थात् अपने को क्षत्रिय नहीं राजपूत मानता था, इसलिए मानता था कि मूलतः हम लोग हूण हैं जिन्हें आबू पर्वत पर यज्ञ के आयोजन से राजपूत क्षत्रिय बनाया गया था।

प्रसंग आने पर मैं स्वयं इसे बताता भी था। यदि मित्रो में कोई मेरे सामने ही मेरा मजाक उड़ाता हुआ अपने को असली सिद्ध करने के लिए मुझे नकली क्षत्रिय कहता तो मुझे कोई परेशानी नहीं होती। बाद में जब पता चला कि व्याघ्रपाद नाम के ऋषि हुए हैं जो वसिष्ठ की वंश परंपरा में थे और यह कि हमारा संबंध राजस्थान के पाली से नहीं, हरदोई के पाली से है, और हमारा हूणों से कोई संबंध नहीं, तब भी मेरे लिए यह मात्र एक सूचना थी, परन्तु इस सूचना की एक आप्तता थी और इस आप्तता को मै किसी कीमत पर नष्ट नहीं होने दे सकता था। न छिपा कर, न दबा कर, न अतिरंजित करके, न इससे मुंह चुरा कर।

इन तथ्यों को याद करता हूं तो लगता है, मैं इतिहासकार नहीं बना, ऐतिहासिक वस्तुपरकता कहीं मेरे स्वभाव में था। यह बहुत छोटी अवस्था से मेरी चेतना का हिस्सा था कि हम कहां पैदा हुए, किस परिवार, समाज या देश में पैदा हुए, यह हमारे गर्व या ग्लानि का विषय नहीं है, क्योंकि इस पर हमारा वश नहीं था। इसके अच्छा या बुरा होने का लाभ या नुकसान हमें अवश्य होता है।

हम जहां हैं वहीं अनन्त काल से हैं, वहां से हिले डोले ही नहीं, यह गर्व की बात नहीं हो सकती, न ही हम अपने जीवन में किसी एक ही जगह खूंटे की तरह गड़ कर रहना चाहेंगे। परिस्थितियां ऐसी अवश्य हो सकती हैं, जिनमें हमारा अपनी जगह से हटना संभव न हो पाए या ऐसा करना घाटे का विकल्प प्रतीत हो।

परन्तु हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि हम जहां, या जहां जहां थे वहां किन परिस्थितियों में पहुंचे और जिस अवस्था में थे उससे आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। पर ये जानकारियां मात्र तथ्य हैं जिनका ज्ञान इसलिए जरूरी है कि इसके अभाव में हमारे अपने निर्णय और कार्य प्रभावित हो सकते हैं। हम उन गलतियों को दुहरा सकते हैं जिनसे सही जातीय अनुभवों के आलोक में बच सकते थे और उन अवसरों को खो सकते हैं जिनका लाभ हमें मिल सकता था।

हम जिस देश, अंचल, परिवेश और परिवार में, जिस समाज, संस्कृति और व्यवस्था में पैदा हुए हैं वह किस दशा में है और किस दिशा में जा रहा है और इसमें हमारी क्या भूमिका है यह और केवल यह हमारे गर्व, सन्तोष या ग्लानि का विषय हो सकता है। सूचनाएं आवेग से जितनी ही मुक्त हों, उतनी ही आप्त या पवित्र होती हैं और इन्हें किसी भी आग्रह से विकृत करना अपराध है क्योंकि सूचनाओं की पूंजी से ही हमारे ज्ञान और चेतना का निर्माण होता है, और सूचनाओं की विकृति हमारे ज्ञान को कुंठित और चेतना को विकृत करती है, जब कि अपूर्ण जानकारी के साथ अनिश्चय तो बना रहता है, परन्तु वह न तो ऐसी पंगुता पैदा करती है न मनोविकृति। कहें विकृत जानकारी आधारहीन भले हो, आधिकारिक और निशचयात्मक होती है, और सोचने विचारने की भी छूट नहीं देती जब कि अज्ञान या अधूरा ज्ञान हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है और पूरा होने की एक ऐसी यात्रा होता है जो कभी पूरी नहीं होती क्योंकि ज्ञान का विस्तार अज्ञान के महावृत्त का विस्तार करता है।

परन्तु एक स्थिति ऐसी भी होती है जिसमें विकृत सूचना निश्चयात्मक होने के बाद भी अन्तर्विरोधी बनी रहती है। यह मनोभग्नता, या शीजोफ्रेनिया पैदा करती। और यदि यह इतिहास के साथ हो पूरा समाज या इस सूचना व्यापार से जुड़ा समाज मनोभग्नता का शिकार हो सकता है। यहां तक कि वह अपनी मनोभग्नता पर गर्व करते हुए यथार्थ को देखने समझने से इन्कार कर सकता है। कुछ मनोभग्न रचनाकारों (काफ्का, नीट्शे, प्रूस्त, वान गाग आदि) को उदाहृत करते हुए The Divided Self के लेखक आर डी लैंग ने इनको The Birds of Paradise में, अपनी अलग ही दुनिया में खोए रहने वाले लोगों की, संज्ञा दी है।

औपनिवेशिक इतिहासकारों ने अपनी जरूरत, नस्ली पूर्वाग्रह और प्रशासनिक विवशता में ऐसा विकृत और अन्तर्विरोधी इतिहास रचा और उन्होंने कुछ ऐसी जुगत से अपने झूठ को सच और सच को झूठ बनाए रखा कि इसके कुछ दूर तक शिकार तथाकथित राष्ट्रवादी भी हुए। उन्होंने केवल इतना किया था कि अतीत की जिन उपलब्धियों को वे आंख मूंद कर नकार रहे थे उनके प्रमाण देते हुए उनका खंडन कर रहे थे। यह साम्राज्यवादियों के हित में था कि वे इनको राष्ट्रवादी या देशप्रेम से कातर अर्थात् भावावेश में आ कर महिमामंडन करने वाला इतिहासकार कह कर उनके प्रमाणों को नकारने का और सामान्य पाठकों का ध्यान उस ओर से हटाने का प्रयत्न करें। परन्तु मार्क्सवादी इतिहासकारों और समझदारों के कौन से हित उन इतिहासकारों के काम, प्रमाण और साख को संप्रदायवादी कह कर गिराने से सिद्ध हो रहा था। उन्होंने केवल हिन्दू समाज को पुरानपंथिता से मुक्त करने के नाम पर स्वयं सांप्रदायिक इतिहास लिखा और औपनिवेशिक इतिहास को उसके चरम पर पहुंचा दिया। इस तरह उन्होंने एक ऐसा आत्मनिषेधवादी बुद्धिजीवी वर्ग पैदा किया जो बर्ड्स आफ पैराडाइज की याद दिलाता है। मैं इसे मार्क्सवादी इतिहासलेखन की सबसे बड़ी विफलता तो मानता हूं, इस बात का दृष्टांत भी मानता हूं कि कैसे इतिहास की गलत व्याख्या से वर्तमान में खंडित चेतना या दुचित्तापन पैदा किया जा सकता है।

Post – 2018-02-05

इतिहास और मनोभग्नता

मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं कि मेरे पूर्वज भारत के मूल निवासी थे या कहीं अन्यत्र से आकर बसे थे। मुझे यह मालूम है कि दिल्ली में कम से कम 20 बार अपना ठिकाना और तीन बार स्थाई पता बदलना पड़ा और अब गाजियाबाद (क्रासिंग रिपब्लिक) के जिस मकान में रहता हूं, वह संभवतः मेरा अंतिम स्थाई पता रहे। मेरे पुत्र और पुत्री (और जामाता) अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं। मेरे जन्मस्थान (गगहा, गोरखपुर) में आज से पैंतालीस पीढ़ी पहले मेरे कुल के आदि पुरुष बाबा सक्त (शक्ति) सिंह ने सतासीनरेश से दहेज में मिले चौरासी पर अधिकार किया था। इस के लिए उन्होंन यहां पहले से बसे थारुओं का छल और क्रूरता से दमन और उन्मूलन किया था। इससे पहले वे फैजाबाद जिले के विड़हर में आबाद थे। बिड़हर का मतलब आपको न मालूम हो तो इसे बिरहोर पढ़ने पर पता चल जाएगा यहां पहले बिरहोर जनों का निवास था। हमारा परिचय देते हुए हमें पलुआर (पालीवाल) क्षत्रिय बताया जाता है, क्योंकि मध्यकाल में कभी हमारे पूर्वज हरदोई के पाली नामक स्थान से जान और मान बचा कर पूर्व की ओर भागे थे। हमारे साथ मुस्लिम शासकों ने जैसा बर्ताव किया था वैसा ही हमारे पूर्वजों ने कमजोर पाकर बिना उनके किसी अपराध के बिरहोरों और थारुओं (स्थविरों, या बौद्ध मतावलंबी) के साथ किया। मैं इस लघु इतिहासवृत्त के किसी भी खंड का समर्थन नहीं करता, कुछ की भर्त्सना करता हूं, फिर भी उत्तराधिकार में भूमि का जो हिस्सा मेरे नाम है उसे अपना मानता हूं।

तरुणाई के आगमन के साथ मूछें आईं तो हुआ कुछ ऐसा कि नाक के ठीक नीचे बाल उगेही नहीं । इसमें समय लगा। टाड का इतिहास तो नहीं पढ़ा था पर उसकी कुछ मोटी बातें पता थीं जिनमें से एक थी हूणों की शुद्धि करके उनको अग्निवंशी क्षत्रिय बनाना। हम अपने को अग्निवंशी तो नहीं, चंद्रवंशी कहते थे और अपना संबंध पांडवों से जोड़ते थे । यह भी मानते थे कि जनमेजय के नागयज्ञ के समय प्राणरक्षा के लिए जिन नागों ने कसम खाई कि वे कभी उनके वंश के किसी व्यक्ति को नहीं काटेंगे वे ही जीवित बचे थे और इसका निर्वाह वे आज तक करते हैं। प्रमाण यह कि आजतक किसी पालीवाल की मौत सांप के काटने से नहीं हुई।
पर हमारा गोत्रनाम था बैयाघर अर्थात् व्याघ्र है। गोत्रनाम ऋषियों के नाम पर होते हैं कोई जानवर, वह कितना भी शक्तिशाली हो, उसका गोत्रनाम तभी हो सकता था जब यह किसी को नकली रूप में दिया गया हो।

इसमें एक तत्व यह भी जुड़ा था कि मैं तब तक जिस पाली से अपना संबंध जोड़ता था, वह हरदोई का पाली न होकर राजस्थान का पाली था, अर्थात् अपने को क्षत्रिय नहीं राजपूत मानता था, इसलिए मानता था कि मूलतः हम लोग हूण हैं जिन्हें आबू पर्वत पर यज्ञ के आयोजन से राजपूत क्षत्रिय बनाया गया था।

प्रसंग आने पर मैं स्वयं इसे बताता भी था। यदि मित्रो में कोई मेरे सामने ही मेरा मजाक उड़ाता हुआ अपने को असली सिद्ध करने के लिए मुझे नकली क्षत्रिय कहता तो मुझे कोई परेशानी नहीं होती। बाद में जब पता चला कि व्याघ्रपाद नाम के ऋषि हुए हैं जो वसिष्ठ की वंश परंपरा में थे और यह कि हमारा संबंध राजस्थान के पाली से नहीं, हरदोई के पाली से है, और हमारा हूणों से कोई संबंध नहीं, तब भी मेरे लिए यह मात्र एक सूचना थी, परन्तु इस सूचना की एक आप्तता थी और इस आप्तता को मै किसी कीमत पर नष्ट नहीं होने दे सकता था। न छिपा कर, न दबा कर, न अतिरंजित करके, न इससे मुंह चुरा कर।

इन तथ्यों को याद करता हूं तो लगता है, मैं इतिहासकार नहीं बना, ऐतिहासिक वस्तुपरकता कहीं मेरे स्वभाव में था। यह बहुत छोटी अवस्था से मेरी चेतना का हिस्सा था कि हम कहां पैदा हुए, किस परिवार, समाज या देश में पैदा हुए, यह हमारे गर्व या ग्लानि का विषय नहीं है, क्योंकि इस पर हमारा वश नहीं था। इसके अच्छा या बुरा होने का लाभ या नुकसान हमें अवश्य होता है।

हम जहां हैं वहीं अनन्त काल से हैं, वहां से हिले डोले ही नहीं, यह गर्व की बात नहीं हो सकती, न ही हम अपने जीवन में किसी एक ही जगह खूंटे की तरह गड़ कर रहना चाहेंगे। परिस्थितियां ऐसी अवश्य हो सकती हैं, जिनमें हमारा अपनी जगह से हटना संभव न हो पाए या ऐसा करना घाटे का विकल्प प्रतीत हो।

परन्तु हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि हम जहां, या जहां जहां थे वहां किन परिस्थितियों में पहुंचे और जिस अवस्था में थे उससे आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। पर ये जानकारियां मात्र तथ्य हैं जिनका ज्ञान इसलिए जरूरी है कि इसके अभाव में हमारे अपने निर्णय और कार्य प्रभावित हो सकते हैं। हम उन गलतियों को दुहरा सकते हैं जिनसे सही जातीय अनुभवों के आलोक में बच सकते थे और उन अवसरों को खो सकते हैं जिनका लाभ हमें मिल सकता था।

हम जिस देश, अंचल, परिवेश और परिवार में, जिस समाज, संस्कृति और व्यवस्था में पैदा हुए हैं वह किस दशा में है और किस दिशा में जा रहा है और इसमें हमारी क्या भूमिका है यह और केवल यह हमारे गर्व, सन्तोष या ग्लानि का विषय हो सकता है। सूचनाएं आवेग से जितनी ही मुक्त हों, उतनी ही आप्त या पवित्र होती हैं और इन्हें किसी भी आग्रह से विकृत करना अपराध है क्योंकि सूचनाओं की पूंजी से ही हमारे ज्ञान और चेतना का निर्माण होता है, और सूचनाओं की विकृति हमारे ज्ञान को कुंठित और चेतना को विकृत करती है, जब कि अपूर्ण जानकारी के साथ अनिश्चय तो बना रहता है, परन्तु वह न तो ऐसी पंगुता पैदा करती है न मनोविकृति। कहें विकृत जानकारी आधारहीन भले हो, आधिकारिक और निशचयात्मक होती है, और सोचने विचारने की भी छूट नहीं देती जब कि अज्ञान या अधूरा ज्ञान हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है और पूरा होने की एक ऐसी यात्रा होता है जो कभी पूरी नहीं होती क्योंकि ज्ञान का विस्तार अज्ञान के महावृत्त का विस्तार करता है।

परन्तु एक स्थिति ऐसी भी होती है जिसमें विकृत सूचना निश्चयात्मक होने के बाद भी अन्तर्विरोधी बनी रहती है। यह मनोभग्नता, या शीजोफ्रेनिया पैदा करती। और यदि यह इतिहास के साथ हो पूरा समाज या इस सूचना व्यापार से जुड़ा समाज मनोभग्नता का शिकार हो सकता है। यहां तक कि वह अपनी मनोभग्नता पर गर्व करते हुए यथार्थ को देखने समझने से इन्कार कर सकता है। कुछ मनोभग्न रचनाकारों (काफ्का, नीट्शे, प्रूस्त, वान गाग आदि) को उदाहृत करते हुए The Divided Self के लेखक आर डी लैंग ने इनको The Birds of Paradise में, अपनी अलग ही दुनिया में खोए रहने वाले लोगों की, संज्ञा दी है।

औपनिवेशिक इतिहासकारों ने अपनी जरूरत, नस्ली पूर्वाग्रह और प्रशासनिक विवशता में ऐसा विकृत और अन्तर्विरोधी इतिहास रचा और उन्होंने कुछ ऐसी जुगत से अपने झूठ को सच और सच को झूठ बनाए रखा कि इसके कुछ दूर तक शिकार तथाकथित राष्ट्रवादी भी हुए। उन्होंने केवल इतना किया था कि अतीत की जिन उपलब्धियों को वे आंख मूंद कर नकार रहे थे उनके प्रमाण देते हुए उनका खंडन कर रहे थे। यह साम्राज्यवादियों के हित में था कि वे इनको राष्ट्रवादी या देशप्रेम से कातर अर्थात् भावावेश में आ कर महिमामंडन करने वाला इतिहासकार कह कर उनके प्रमाणों को नकारने का और सामान्य पाठकों का ध्यान उस ओर से हटाने का प्रयत्न करें। परन्तु मार्क्सवादी इतिहासकारों और समझदारों के कौन से हित उन इतिहासकारों के काम, प्रमाण और साख को संप्रदायवादी कह कर गिराने से सिद्ध हो रहा था। उन्होंने केवल हिन्दू समाज को पुरानपंथिता से मुक्त करने के नाम पर स्वयं सांप्रदायिक इतिहास लिखा और औपनिवेशिक इतिहास को उसके चरम पर पहुंचा दिया। इस तरह उन्होंने एक ऐसा आत्मनिषेधवादी बुद्धिजीवी वर्ग पैदा किया जो बर्ड्स आफ पैराडाइज की याद दिलाता है। मैं इसे मार्क्सवादी इतिहासलेखन की सबसे बड़ी विफलता तो मानता हूं, इस बात का दृष्टांत भी मानता हूं कि कैसे इतिहास की गलत व्याख्या से वर्तमान में खंडित चेतना या दुचित्तापन पैदा किया जा सकता है।

Post – 2018-02-05

इतिहास और मनोभग्नता

मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं कि मेरे पूर्वज भारत के मूल निवासी थे या कहीं अन्यत्र से आकर बसे थे। मुझे यह मालूम है कि दिल्ली में कम से कम 20 बार अपना ठिकाना और तीन बार स्थाई पता बदलना पड़ा और अब गाजियाबाद (क्रासिंग रिपब्लिक) के जिस मकान में रहता हूं, वह संभवतः मेरा अंतिम स्थाई पता रहे। मेरे पुत्र और पुत्री (और जामाता) अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं। मेरे जन्मस्थान (गगहा, गोरखपुर) में आज से पैंतालीस पीढ़ी पहले मेरे कुल के आदि पुरुष बाबा सक्त (शक्ति) सिंह ने सतासीनरेश से दहेज में मिले चौरासी पर अधिकार किया था। इस के लिए उन्होंन यहां पहले से बसे थारुओं का छल और क्रूरता से दमन और उन्मूलन किया था। इससे पहले वे फैजाबाद जिले के विड़हर में आबाद थे। बिड़हर का मतलब आपको न मालूम हो तो इसे बिरहोर पढ़ने पर पता चल जाएगा यहां पहले बिरहोर जनों का निवास था। हमारा परिचय देते हुए हमें पलुआर (पालीवाल) क्षत्रिय बताया जाता है, क्योंकि मध्यकाल में कभी हमारे पूर्वज हरदोई के पाली नामक स्थान से जान और मान बचा कर पूर्व की ओर भागे थे। हमारे साथ मुस्लिम शासकों ने जैसा बर्ताव किया था वैसा ही हमारे पूर्वजों ने कमजोर पाकर बिना उनके किसी अपराध के बिरहोरों और थारुओं (स्थविरों, या बौद्ध मतावलंबी) के साथ किया। मैं इस लघु इतिहासवृत्त के किसी भी खंड का समर्थन नहीं करता, कुछ की भर्त्सना करता हूं, फिर भी उत्तराधिकार में भूमि का जो हिस्सा मेरे नाम है उसे अपना मानता हूं।

तरुणाई के आगमन के साथ मूछें आईं तो हुआ कुछ ऐसा कि नाक के ठीक नीचे बाल उगेही नहीं । इसमें समय लगा। टाड का इतिहास तो नहीं पढ़ा था पर उसकी कुछ मोटी बातें पता थीं जिनमें से एक थी हूणों की शुद्धि करके उनको अग्निवंशी क्षत्रिय बनाना। हम अपने को अग्निवंशी तो नहीं, चंद्रवंशी कहते थे और अपना संबंध पांडवों से जोड़ते थे । यह भी मानते थे कि जनमेजय के नागयज्ञ के समय प्राणरक्षा के लिए जिन नागों ने कसम खाई कि वे कभी उनके वंश के किसी व्यक्ति को नहीं काटेंगे वे ही जीवित बचे थे और इसका निर्वाह वे आज तक करते हैं। प्रमाण यह कि आजतक किसी पालीवाल की मौत सांप के काटने से नहीं हुई।
पर हमारा गोत्रनाम था बैयाघर अर्थात् व्याघ्र है। गोत्रनाम ऋषियों के नाम पर होते हैं कोई जानवर, वह कितना भी शक्तिशाली हो, उसका गोत्रनाम तभी हो सकता था जब यह किसी को नकली रूप में दिया गया हो।

इसमें एक तत्व यह भी जुड़ा था कि मैं तब तक जिस पाली से अपना संबंध जोड़ता था, वह हरदोई का पाली न होकर राजस्थान का पाली था, अर्थात् अपने को क्षत्रिय नहीं राजपूत मानता था, इसलिए मानता था कि मूलतः हम लोग हूण हैं जिन्हें आबू पर्वत पर यज्ञ के आयोजन से राजपूत क्षत्रिय बनाया गया था।

प्रसंग आने पर मैं स्वयं इसे बताता भी था। यदि मित्रो में कोई मेरे सामने ही मेरा मजाक उड़ाता हुआ अपने को असली सिद्ध करने के लिए मुझे नकली क्षत्रिय कहता तो मुझे कोई परेशानी नहीं होती। बाद में जब पता चला कि व्याघ्रपाद नाम के ऋषि हुए हैं जो वसिष्ठ की वंश परंपरा में थे और यह कि हमारा संबंध राजस्थान के पाली से नहीं, हरदोई के पाली से है, और हमारा हूणों से कोई संबंध नहीं, तब भी मेरे लिए यह मात्र एक सूचना थी, परन्तु इस सूचना की एक आप्तता थी और इस आप्तता को मै किसी कीमत पर नष्ट नहीं होने दे सकता था। न छिपा कर, न दबा कर, न अतिरंजित करके, न इससे मुंह चुरा कर।

इन तथ्यों को याद करता हूं तो लगता है, मैं इतिहासकार नहीं बना, ऐतिहासिक वस्तुपरकता कहीं मेरे स्वभाव में था। यह बहुत छोटी अवस्था से मेरी चेतना का हिस्सा था कि हम कहां पैदा हुए, किस परिवार, समाज या देश में पैदा हुए, यह हमारे गर्व या ग्लानि का विषय नहीं है, क्योंकि इस पर हमारा वश नहीं था। इसके अच्छा या बुरा होने का लाभ या नुकसान हमें अवश्य होता है।

हम जहां हैं वहीं अनन्त काल से हैं, वहां से हिले डोले ही नहीं, यह गर्व की बात नहीं हो सकती, न ही हम अपने जीवन में किसी एक ही जगह खूंटे की तरह गड़ कर रहना चाहेंगे। परिस्थितियां ऐसी अवश्य हो सकती हैं, जिनमें हमारा अपनी जगह से हटना संभव न हो पाए या ऐसा करना घाटे का विकल्प प्रतीत हो।

परन्तु हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि हम जहां, या जहां जहां थे वहां किन परिस्थितियों में पहुंचे और जिस अवस्था में थे उससे आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। पर ये जानकारियां मात्र तथ्य हैं जिनका ज्ञान इसलिए जरूरी है कि इसके अभाव में हमारे अपने निर्णय और कार्य प्रभावित हो सकते हैं। हम उन गलतियों को दुहरा सकते हैं जिनसे सही जातीय अनुभवों के आलोक में बच सकते थे और उन अवसरों को खो सकते हैं जिनका लाभ हमें मिल सकता था।

हम जिस देश, अंचल, परिवेश और परिवार में, जिस समाज, संस्कृति और व्यवस्था में पैदा हुए हैं वह किस दशा में है और किस दिशा में जा रहा है और इसमें हमारी क्या भूमिका है यह और केवल यह हमारे गर्व, सन्तोष या ग्लानि का विषय हो सकता है। सूचनाएं आवेग से जितनी ही मुक्त हों, उतनी ही आप्त या पवित्र होती हैं और इन्हें किसी भी आग्रह से विकृत करना अपराध है क्योंकि सूचनाओं की पूंजी से ही हमारे ज्ञान और चेतना का निर्माण होता है, और सूचनाओं की विकृति हमारे ज्ञान को कुंठित और चेतना को विकृत करती है, जब कि अपूर्ण जानकारी के साथ अनिश्चय तो बना रहता है, परन्तु वह न तो ऐसी पंगुता पैदा करती है न मनोविकृति। कहें विकृत जानकारी आधारहीन भले हो, आधिकारिक और निशचयात्मक होती है, और सोचने विचारने की भी छूट नहीं देती जब कि अज्ञान या अधूरा ज्ञान हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है और पूरा होने की एक ऐसी यात्रा होता है जो कभी पूरी नहीं होती क्योंकि ज्ञान का विस्तार अज्ञान के महावृत्त का विस्तार करता है।

परन्तु एक स्थिति ऐसी भी होती है जिसमें विकृत सूचना निश्चयात्मक होने के बाद भी अन्तर्विरोधी बनी रहती है। यह मनोभग्नता, या शीजोफ्रेनिया पैदा करती। और यदि यह इतिहास के साथ हो पूरा समाज या इस सूचना व्यापार से जुड़ा समाज मनोभग्नता का शिकार हो सकता है। यहां तक कि वह अपनी मनोभग्नता पर गर्व करते हुए यथार्थ को देखने समझने से इन्कार कर सकता है। कुछ मनोभग्न रचनाकारों (काफ्का, नीट्शे, प्रूस्त, वान गाग आदि) को उदाहृत करते हुए The Divided Self के लेखक आर डी लैंग ने इनको The Birds of Paradise में, अपनी अलग ही दुनिया में खोए रहने वाले लोगों की, संज्ञा दी है।

औपनिवेशिक इतिहासकारों ने अपनी जरूरत, नस्ली पूर्वाग्रह और प्रशासनिक विवशता में ऐसा विकृत और अन्तर्विरोधी इतिहास रचा और उन्होंने कुछ ऐसी जुगत से अपने झूठ को सच और सच को झूठ बनाए रखा कि इसके कुछ दूर तक शिकार तथाकथित राष्ट्रवादी भी हुए। उन्होंने केवल इतना किया था कि अतीत की जिन उपलब्धियों को वे आंख मूंद कर नकार रहे थे उनके प्रमाण देते हुए उनका खंडन कर रहे थे। यह साम्राज्यवादियों के हित में था कि वे इनको राष्ट्रवादी या देशप्रेम से कातर अर्थात् भावावेश में आ कर महिमामंडन करने वाला इतिहासकार कह कर उनके प्रमाणों को नकारने का और सामान्य पाठकों का ध्यान उस ओर से हटाने का प्रयत्न करें। परन्तु मार्क्सवादी इतिहासकारों और समझदारों के कौन से हित उन इतिहासकारों के काम, प्रमाण और साख को संप्रदायवादी कह कर गिराने से सिद्ध हो रहा था। उन्होंने केवल हिन्दू समाज को पुरानपंथिता से मुक्त करने के नाम पर स्वयं सांप्रदायिक इतिहास लिखा और औपनिवेशिक इतिहास को उसके चरम पर पहुंचा दिया। इस तरह उन्होंने एक ऐसा आत्मनिषेधवादी बुद्धिजीवी वर्ग पैदा किया जो बर्ड्स आफ पैराडाइज की याद दिलाता है। मैं इसे मार्क्सवादी इतिहासलेखन की सबसे बड़ी विफलता तो मानता हूं, इस बात का दृष्टांत भी मानता हूं कि कैसे इतिहास की गलत व्याख्या से वर्तमान में खंडित चेतना या दुचित्तापन पैदा किया जा सकता है।

Post – 2018-02-04

सत्यानासी (२)

कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता साम्यवाद की विफलता नहीं है, न ही यह मार्क्सवाद की व्यर्थता का प्रमाण है। यह उन असावधानियों की देन है, जिनमें से कुछ कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में भी दिखाई देती हैं। अपनी विफलता के बाद भी कम्युनिस्ट आन्दोलन ने, विशेषत: रूसी क्रान्ति ने, केवल सोवियत संघ को ही नहीं, उससे प्ररित और क्रांति की दिशा में अग्रसर देशों को ही नहीं, समस्त पूंजीवादी देशों को भी अपने दबाव से जितना लोकोन्मुख और कल्याणकारी बनाया उसका सही आकलन करने की न तो मुझमें योग्यता है न ही हमारी आज की चर्चा में उसकी जरूरत।

हमारी चिन्ता में यह अवश्य शामिल है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चरित्र दुनिया के दूसरे सभी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों से विपरीत क्यों रहा? मन में यह सवाल अवश्य पैदा होता है कि इसने सांप्रदायिक चरित्र क्यों अपना लिया? इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यभार हिन्दू समाज तक सीमित क्यों रहे और वे भी इसकी जड़ें खोदने तक सीमित क्यों रहे? इसने इतिहास का दो तरह का पाठ क्यों किया जिसमें एक काल खंड के बारे में उपनिवेशवादी व्याख्या पूरी तरह सही बन गई और दूसरे के विषय में सरासर गलत मानी जाती रही? इन सवालों के उत्तर हम नहीं देना चाहेंगे, वे हमारी सोच की दिशा बदल सकते हैं, परन्तु विफलताओं की मीमांसा करने वालों को इन अप्रिय सवालों से दो चार होना होगा, अन्यथा वे गालियों के रियाज को ही मार्क्सवाद का नया कार्यभार बना लेंगे।

हम जिस एक प्रश्न को रेखांकित करना चाहते हैं वह यह कि जिन भी देशों ने क्रान्ति करने में सफलता पाई उनकी तुलना में भारत की स्थिति क्रान्ति के लिए सबसे अनुकूल थी। यहां औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की लंबी छटपटाहट और आक्रोश था और दूसरी ओर आर्थिक विषमता से जुड़ी सामाजिक विषमता भी थी।

यहां शोषितों और सामाजिक स्तरभेद के शिकार लोगों को संगठित करना अधिक आसान था, क्योंकि वे दूसरे देशों की फ्यूडल व्यवस्था के शिकार दलित समाज की तरह बिखरे नहीं, अपितु बिरादरी पंचायतों के माध्यम से पहले से संगठित समुदाय थे। एक बिरादरी के रूप में वे शक्तिशाली इतने थे कि असह्य स्थितियों में बिरादरी पंचायत का फैसला होने पर ये उन जमीदारों और भूस्वामियों से असहयोग कर सकते और उन्हें अपनी सेवाओं से वंचित कर सकते थे जिनसे सामान्यत: वे आंख तक नहीं मिला सकते थे। ऐसी स्थिति में उस पेशे से जुडा कहीं का कोई व्यक्ति उसकी सेवा के लिए तैयार नहीं हो सकता था। कहें जरूरत किसी अन्य देश की तुलना में अधिक होने के बाद भी उनके भीतर पैठ बनाना और उनको बड़े संगठन का अंग बनाना, उनमें आत्मविश्वास पैदा करना मजदूरों को संगठित करने की अपेक्षा अधिक आसान था।

ऐसी स्थिति मे उनको संगठित करने का प्रयत्न क्यों नहीं किया गया? जब किसानों को पार्टी से जोड़ने का खयाल आया भी तो भी दायरा बड़े और मझोले भूस्वामियों तक सीमित क्यों रह गया जब कि वे ही भूमिहीन कृषि मजदूरों के शोषक हुआ करते थे।

इन सभी सवालों का जवाब यह है कि उन्हें न तो अपने देश और समाज की समझ थी, न समझने की आकांक्षा थी । वे पश्चिमी समाज को अपने समाज पर आरोपित करके, इसे समझने का प्रयत्न कर रहे थे जैसे पाश्चात्य साहित्य पर मुग्ध हमारे लेखक उस साहित्य में व्यक्त अनुभूतियों और विचारों को स्वयं आत्मसात् करके उसका आरोपण अपने समाज पर करके उसका चित्रण करके इतना बारीक कात लेते हैं कि उनका साहित्य उनके जैसों की परिधि को पार ही नहीं कर पाता।

इन दोनों के बीच गहरा संबंध है। शोषित और दलित जनता से जुड़ने के लाख दावों के बावजूद प्रगतिशील साहित्य अपने समाज से जितना कटा रहा है उतना कटा दरबारी साहित्य तक नहीं रहा क्योंकि दरबारी होते हुए भी वह इस देश और समाज की अनुभूतियों और आकांक्षाओं का साहित्य था।

मुझे लगता है कि मार्क्सवादी सोच में एक खास तरह की यांत्रिकता इसलिए आ गई कि इसमें भौतिक पक्ष पर एकांगी बल दिया गया और यह मान लिया गया कि चेतना भौतिक परिस्थितियों की उपज है, भौतिक परिस्थितियों को बदल कर चेतना को इच्छित रूप में बदला जा सकता है।

यह अतिवाद था। इसमें इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया कि समान भौतिक परिस्थितियों में चेतना के रूप कितने भिन्न होते हैं और निरा भौतिक भी इतने ज्ञात और ज्ञेय घटकों से बना होता कि सबका हमें बोध तक नहीं होता, उनको नियंत्रित करना तो दूर की बात है। मार्क्स के अपने चिन्तन में उतना इकहरापन नहीं है जो नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे का मंसूबा रखने वाले भारतीय मार्क्सवादियों में यथार्थ से कटे रहने और इसकी क्षतिपूर्ति के रूप में खयालों को यथार्थ मान लेने के कारण देखने में आता है। इसका चरित्र निर्धारण जिस दौर में हुआ उसमें अपनी जीवनशैली में नवाबी और अभिव्यक्ति में आग उगलने वाले लफ्फाजियों का जैसा जमघट कम्युनिस्ट पार्टी मे था, वैसा किसी अन्य दल में कभी नहीं रहा। मार्क्सवाद में आस्था रखने वाले उस धड़े में भी नहीं, जिसे सोशलिस्ट कह कर अलग कर दिया गया।

इन दोनों में बुनियादी अंतर यह था कि सोसलिस्टों (समाजवादियों) की जड़ें भारतीय समाज और मूल्यव्यस्था में थीं, जब कि कम्युनिस्टों की मानसिकता उपनिवेशवादी थी। समाजवादी समाज को बदलना चाहते थे, जब कि कम्युनिस्ट सत्ता पर कब्जा जमाना चाहते थे। पहले की आस्था लोकतंत्र में थी, दूसरे की तानाशाही में। पहले को समाज के कल्याण के लिए समाजवाद चाहिए था, दूसरे को अपना सिक्का जमानेके लिए। सच यह है कि कम्युनिस्टों में अधिकांश ऐसे थे जिन्हें लोकतांत्रिक भारत की कल्पना से डर लगता था, उसमें अपना भविष्य असुरक्षित लगता था। इनमें ऊंचे रुतबे के लोग थे, अलपसंख्यक सिंड्रोम से ग्रस्त मानसिकता के लोग थे, और इन्होंने अपने प्रभाव से कम्युनिस्ट आन्दोलन को इतना बदला कि जिन्ना के प्रशंसक लीग से बाहर यदि कहीं मिल सकते थे तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में और लीग की योजनाओं पर कहीं काम होता रहा तो कम्युनिस्ट पार्टियों में।

क्रान्ति के सपनों के दिन लद गए तो सामाजिक क्रान्ति के नाम पर पुराण कथाओं को आधार बना कर अतीत में प्रचलित और आज अव्यावहारिक बन चुकी व्यवस्थाओं के विरोध के नाम पर सामाजिक उपद्रव भड़काने के अवसर तैयार करने में इसकी सारी ऊर्जा व्यय होती है। हिन्दू समाज को तोड़ने का ईसाइयत और मुसलिम लीग का कार्यभार इसका एक मात्र कार्यभार रह गया है।

जो इतिहास की इतनी मोटी समझ रखते हैं कि यह विश्वास पाल सकें कि वे अपने बुद्धिबल से मिथक को इतिहास और इतिहास को मिथक बना सकते हैं, वे ही यह विश्वास पाल सकते हैं कि वे समाज को तोड़ कर समाज को और देश की संपत्तियों को नष्ट करके देश को मजबूत बना सकते हैं।

जो इतिहास को नहीं समझता वह न तो वर्तमान को समझ सकता है, न अपने समाज को, न अपने आप को। वह यह भी नहीं सझ सकता कि वह कर क्या रहा है और उसके परिणाम क्या होंगे। उदाहरण के लिए मार्क्सवाद का प्रधान लक्ष्य आर्थिक विषमता का उन्मूलन रहा है। सामाजिक विषमता का प्रधान कारण भी वह इसी को मानता रहा है। पूंजीपति आर्थिक लूट जारी रखने के लिए इस प्रयास में रहता है कि जन आक्रोश को सामाजिक समस्याओं की ओर मोड़ दिया जाय जिससे उसे मनमानी करने की पूरी छूट मिल सके।

आज जब बीच बीच में यह राग अलापा जाता है कि धनी गरीब के बीच की खाई गहरी होती जा रही है, कि देश की ८७ प्रतिशत पूंजी केवल १ प्रतिशत पूंजीपतियों के पास जमा है और ९९ प्रतिशत को केवल २३ प्रतिशत पर निर्भर रहना पड़ रहा है, उस समय सामाजिक विक्षोभ को अपना प्रमुख कार्यभार बना कर कोई किसका साथ दे रहा है या किसकी लूट के लिए पर्यावरण तैयार कर रहा है? महिषासुर को हथियार बना कर, निषिद्ध खान पान का उत्सव मना कर या ऐसे ही दूसरे आयोजनों के माध्यम से वह आज की लड़ाई को किस युग के मैदान में उतर कर लड़ रहा है? यदि यही वैज्ञानिक तरीका है तो विज्ञान को नये रूप में परिभाषित करना होगा।

मेरे पाठकों में बहुतों को लग रहा होगा कि मेरा मार्क्सवाद का ज्ञान बहुत अच्छा नहीं है, और उनसे मैं स्वयं भी सहमत होना चाहूंगा, परन्तु मार्क्सवाद विचारदर्शन नहीं, कार्यदर्शन है। दुनिया को बदलने का दर्शन और इसकी परख इस आधार पर ही की जा सकता है कि भारतीय कम्युनिस्टों ने भारतीय समाज को किस रूप में बदला है, कहां तक बदला है, और वर्तमान में किनके साथ और किनके विरुद्ध हैं। इतिहास में आपकी नासमझी का स्रोत क्या रहा है और परिणाम क्या हुए?

हम इतिहास में केवल उस दुराग्रह की बात करेंगे जिसके चलते अयोध्या से लेकर राम तक, सरस्वती से लेकर सभ्यता या सभ्यता की प्रेरणा तक सब कुछ पश्चिम से आयात किया जाता रहा, और जब उस इतिहास को ध्वस्त कर दिया गया, और वैदिक और सैंधव सभ्यता का अभेद सिद्ध हो गया तो इतिहास की जगह थीम्स आफ हिस्ट्री पढ़ाई जाने लगी और हमले से तौबा किया गया पर फिर भी हड़प्पा सभ्यता को अनार्य बना कर पढ़ाया जाता रहा और वैदिक काल को परवर्ती कड़ी के रूप में पेश किया जाता रहा। आज भी स्थिति बदली न होगी और इसके आलोचकों की तरह मैं भी मानता हूं कि भाजपा की शिक्षा और संस्कृति की समझ खासी भोथरी है।

आज तो यह काम संभव ही नहीं, कल क्या रूप ले, पता नहीं।

Post – 2018-02-04

सत्यानासी (२)

कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता साम्यवाद की विफलता नहीं है, न ही यह मार्क्सवाद की व्यर्थता का प्रमाण है। यह उन असावधानियों की देन है, जिनमें से कुछ कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में भी दिखाई देती हैं। अपनी विफलता के बाद भी कम्युनिस्ट आन्दोलन ने, विशेषत: रूसी क्रान्ति ने, केवल सोवियत संघ को ही नहीं, उससे प्ररित और क्रांति की दिशा में अग्रसर देशों को ही नहीं, समस्त पूंजीवादी देशों को भी अपने दबाव से जितना लोकोन्मुख और कल्याणकारी बनाया उसका सही आकलन करने की न तो मुझमें योग्यता है न ही हमारी आज की चर्चा में उसकी जरूरत।

हमारी चिन्ता में यह अवश्य शामिल है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चरित्र दुनिया के दूसरे सभी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों से विपरीत क्यों रहा? मन में यह सवाल अवश्य पैदा होता है कि इसने सांप्रदायिक चरित्र क्यों अपना लिया? इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यभार हिन्दू समाज तक सीमित क्यों रहे और वे भी इसकी जड़ें खोदने तक सीमित क्यों रहे? इसने इतिहास का दो तरह का पाठ क्यों किया जिसमें एक काल खंड के बारे में उपनिवेशवादी व्याख्या पूरी तरह सही बन गई और दूसरे के विषय में सरासर गलत मानी जाती रही? इन सवालों के उत्तर हम नहीं देना चाहेंगे, वे हमारी सोच की दिशा बदल सकते हैं, परन्तु विफलताओं की मीमांसा करने वालों को इन अप्रिय सवालों से दो चार होना होगा, अन्यथा वे गालियों के रियाज को ही मार्क्सवाद का नया कार्यभार बना लेंगे।

हम जिस एक प्रश्न को रेखांकित करना चाहते हैं वह यह कि जिन भी देशों ने क्रान्ति करने में सफलता पाई उनकी तुलना में भारत की स्थिति क्रान्ति के लिए सबसे अनुकूल थी। यहां औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की लंबी छटपटाहट और आक्रोश था और दूसरी ओर आर्थिक विषमता से जुड़ी सामाजिक विषमता भी थी।

यहां शोषितों और सामाजिक स्तरभेद के शिकार लोगों को संगठित करना अधिक आसान था, क्योंकि वे दूसरे देशों की फ्यूडल व्यवस्था के शिकार दलित समाज की तरह बिखरे नहीं, अपितु बिरादरी पंचायतों के माध्यम से पहले से संगठित समुदाय थे। एक बिरादरी के रूप में वे शक्तिशाली इतने थे कि असह्य स्थितियों में बिरादरी पंचायत का फैसला होने पर ये उन जमीदारों और भूस्वामियों से असहयोग कर सकते और उन्हें अपनी सेवाओं से वंचित कर सकते थे जिनसे सामान्यत: वे आंख तक नहीं मिला सकते थे। ऐसी स्थिति में उस पेशे से जुडा कहीं का कोई व्यक्ति उसकी सेवा के लिए तैयार नहीं हो सकता था। कहें जरूरत किसी अन्य देश की तुलना में अधिक होने के बाद भी उनके भीतर पैठ बनाना और उनको बड़े संगठन का अंग बनाना, उनमें आत्मविश्वास पैदा करना मजदूरों को संगठित करने की अपेक्षा अधिक आसान था।

ऐसी स्थिति मे उनको संगठित करने का प्रयत्न क्यों नहीं किया गया? जब किसानों को पार्टी से जोड़ने का खयाल आया भी तो भी दायरा बड़े और मझोले भूस्वामियों तक सीमित क्यों रह गया जब कि वे ही भूमिहीन कृषि मजदूरों के शोषक हुआ करते थे।

इन सभी सवालों का जवाब यह है कि उन्हें न तो अपने देश और समाज की समझ थी, न समझने की आकांक्षा थी । वे पश्चिमी समाज को अपने समाज पर आरोपित करके, इसे समझने का प्रयत्न कर रहे थे जैसे पाश्चात्य साहित्य पर मुग्ध हमारे लेखक उस साहित्य में व्यक्त अनुभूतियों और विचारों को स्वयं आत्मसात् करके उसका आरोपण अपने समाज पर करके उसका चित्रण करके इतना बारीक कात लेते हैं कि उनका साहित्य उनके जैसों की परिधि को पार ही नहीं कर पाता।

इन दोनों के बीच गहरा संबंध है। शोषित और दलित जनता से जुड़ने के लाख दावों के बावजूद प्रगतिशील साहित्य अपने समाज से जितना कटा रहा है उतना कटा दरबारी साहित्य तक नहीं रहा क्योंकि दरबारी होते हुए भी वह इस देश और समाज की अनुभूतियों और आकांक्षाओं का साहित्य था।

मुझे लगता है कि मार्क्सवादी सोच में एक खास तरह की यांत्रिकता इसलिए आ गई कि इसमें भौतिक पक्ष पर एकांगी बल दिया गया और यह मान लिया गया कि चेतना भौतिक परिस्थितियों की उपज है, भौतिक परिस्थितियों को बदल कर चेतना को इच्छित रूप में बदला जा सकता है।

यह अतिवाद था। इसमें इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया कि समान भौतिक परिस्थितियों में चेतना के रूप कितने भिन्न होते हैं और निरा भौतिक भी इतने ज्ञात और ज्ञेय घटकों से बना होता कि सबका हमें बोध तक नहीं होता, उनको नियंत्रित करना तो दूर की बात है। मार्क्स के अपने चिन्तन में उतना इकहरापन नहीं है जो नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे का मंसूबा रखने वाले भारतीय मार्क्सवादियों में यथार्थ से कटे रहने और इसकी क्षतिपूर्ति के रूप में खयालों को यथार्थ मान लेने के कारण देखने में आता है। इसका चरित्र निर्धारण जिस दौर में हुआ उसमें अपनी जीवनशैली में नवाबी और अभिव्यक्ति में आग उगलने वाले लफ्फाजियों का जैसा जमघट कम्युनिस्ट पार्टी मे था, वैसा किसी अन्य दल में कभी नहीं रहा। मार्क्सवाद में आस्था रखने वाले उस धड़े में भी नहीं, जिसे सोशलिस्ट कह कर अलग कर दिया गया।

इन दोनों में बुनियादी अंतर यह था कि सोसलिस्टों (समाजवादियों) की जड़ें भारतीय समाज और मूल्यव्यस्था में थीं, जब कि कम्युनिस्टों की मानसिकता उपनिवेशवादी थी। समाजवादी समाज को बदलना चाहते थे, जब कि कम्युनिस्ट सत्ता पर कब्जा जमाना चाहते थे। पहले की आस्था लोकतंत्र में थी, दूसरे की तानाशाही में। पहले को समाज के कल्याण के लिए समाजवाद चाहिए था, दूसरे को अपना सिक्का जमानेके लिए। सच यह है कि कम्युनिस्टों में अधिकांश ऐसे थे जिन्हें लोकतांत्रिक भारत की कल्पना से डर लगता था, उसमें अपना भविष्य असुरक्षित लगता था। इनमें ऊंचे रुतबे के लोग थे, अलपसंख्यक सिंड्रोम से ग्रस्त मानसिकता के लोग थे, और इन्होंने अपने प्रभाव से कम्युनिस्ट आन्दोलन को इतना बदला कि जिन्ना के प्रशंसक लीग से बाहर यदि कहीं मिल सकते थे तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में और लीग की योजनाओं पर कहीं काम होता रहा तो कम्युनिस्ट पार्टियों में।

क्रान्ति के सपनों के दिन लद गए तो सामाजिक क्रान्ति के नाम पर पुराण कथाओं को आधार बना कर अतीत में प्रचलित और आज अव्यावहारिक बन चुकी व्यवस्थाओं के विरोध के नाम पर सामाजिक उपद्रव भड़काने के अवसर तैयार करने में इसकी सारी ऊर्जा व्यय होती है। हिन्दू समाज को तोड़ने का ईसाइयत और मुसलिम लीग का कार्यभार इसका एक मात्र कार्यभार रह गया है।

जो इतिहास की इतनी मोटी समझ रखते हैं कि यह विश्वास पाल सकें कि वे अपने बुद्धिबल से मिथक को इतिहास और इतिहास को मिथक बना सकते हैं, वे ही यह विश्वास पाल सकते हैं कि वे समाज को तोड़ कर समाज को और देश की संपत्तियों को नष्ट करके देश को मजबूत बना सकते हैं।

जो इतिहास को नहीं समझता वह न तो वर्तमान को समझ सकता है, न अपने समाज को, न अपने आप को। वह यह भी नहीं सझ सकता कि वह कर क्या रहा है और उसके परिणाम क्या होंगे। उदाहरण के लिए मार्क्सवाद का प्रधान लक्ष्य आर्थिक विषमता का उन्मूलन रहा है। सामाजिक विषमता का प्रधान कारण भी वह इसी को मानता रहा है। पूंजीपति आर्थिक लूट जारी रखने के लिए इस प्रयास में रहता है कि जन आक्रोश को सामाजिक समस्याओं की ओर मोड़ दिया जाय जिससे उसे मनमानी करने की पूरी छूट मिल सके।

आज जब बीच बीच में यह राग अलापा जाता है कि धनी गरीब के बीच की खाई गहरी होती जा रही है, कि देश की ८७ प्रतिशत पूंजी केवल १ प्रतिशत पूंजीपतियों के पास जमा है और ९९ प्रतिशत को केवल २३ प्रतिशत पर निर्भर रहना पड़ रहा है, उस समय सामाजिक विक्षोभ को अपना प्रमुख कार्यभार बना कर कोई किसका साथ दे रहा है या किसकी लूट के लिए पर्यावरण तैयार कर रहा है? महिषासुर को हथियार बना कर, निषिद्ध खान पान का उत्सव मना कर या ऐसे ही दूसरे आयोजनों के माध्यम से वह आज की लड़ाई को किस युग के मैदान में उतर कर लड़ रहा है? यदि यही वैज्ञानिक तरीका है तो विज्ञान को नये रूप में परिभाषित करना होगा।

मेरे पाठकों में बहुतों को लग रहा होगा कि मेरा मार्क्सवाद का ज्ञान बहुत अच्छा नहीं है, और उनसे मैं स्वयं भी सहमत होना चाहूंगा, परन्तु मार्क्सवाद विचारदर्शन नहीं, कार्यदर्शन है। दुनिया को बदलने का दर्शन और इसकी परख इस आधार पर ही की जा सकता है कि भारतीय कम्युनिस्टों ने भारतीय समाज को किस रूप में बदला है, कहां तक बदला है, और वर्तमान में किनके साथ और किनके विरुद्ध हैं। इतिहास में आपकी नासमझी का स्रोत क्या रहा है और परिणाम क्या हुए?

हम इतिहास में केवल उस दुराग्रह की बात करेंगे जिसके चलते अयोध्या से लेकर राम तक, सरस्वती से लेकर सभ्यता या सभ्यता की प्रेरणा तक सब कुछ पश्चिम से आयात किया जाता रहा, और जब उस इतिहास को ध्वस्त कर दिया गया, और वैदिक और सैंधव सभ्यता का अभेद सिद्ध हो गया तो इतिहास की जगह थीम्स आफ हिस्ट्री पढ़ाई जाने लगी और हमले से तौबा किया गया पर फिर भी हड़प्पा सभ्यता को अनार्य बना कर पढ़ाया जाता रहा और वैदिक काल को परवर्ती कड़ी के रूप में पेश किया जाता रहा। आज भी स्थिति बदली न होगी और इसके आलोचकों की तरह मैं भी मानता हूं कि भाजपा की शिक्षा और संस्कृति की समझ खासी भोथरी है।

आज तो यह काम संभव ही नहीं, कल क्या रूप ले, पता नहीं।

Post – 2018-02-04

सत्यानासी (२)

कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता साम्यवाद की विफलता नहीं है, न ही यह मार्क्सवाद की व्यर्थता का प्रमाण है। यह उन असावधानियों की देन है, जिनमें से कुछ कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में भी दिखाई देती हैं। अपनी विफलता के बाद भी कम्युनिस्ट आन्दोलन ने, विशेषत: रूसी क्रान्ति ने, केवल सोवियत संघ को ही नहीं, उससे प्ररित और क्रांति की दिशा में अग्रसर देशों को ही नहीं, समस्त पूंजीवादी देशों को भी अपने दबाव से जितना लोकोन्मुख और कल्याणकारी बनाया उसका सही आकलन करने की न तो मुझमें योग्यता है न ही हमारी आज की चर्चा में उसकी जरूरत।

हमारी चिन्ता में यह अवश्य शामिल है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चरित्र दुनिया के दूसरे सभी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों से विपरीत क्यों रहा? मन में यह सवाल अवश्य पैदा होता है कि इसने सांप्रदायिक चरित्र क्यों अपना लिया? इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यभार हिन्दू समाज तक सीमित क्यों रहे और वे भी इसकी जड़ें खोदने तक सीमित क्यों रहे? इसने इतिहास का दो तरह का पाठ क्यों किया जिसमें एक काल खंड के बारे में उपनिवेशवादी व्याख्या पूरी तरह सही बन गई और दूसरे के विषय में सरासर गलत मानी जाती रही? इन सवालों के उत्तर हम नहीं देना चाहेंगे, वे हमारी सोच की दिशा बदल सकते हैं, परन्तु विफलताओं की मीमांसा करने वालों को इन अप्रिय सवालों से दो चार होना होगा, अन्यथा वे गालियों के रियाज को ही मार्क्सवाद का नया कार्यभार बना लेंगे।

हम जिस एक प्रश्न को रेखांकित करना चाहते हैं वह यह कि जिन भी देशों ने क्रान्ति करने में सफलता पाई उनकी तुलना में भारत की स्थिति क्रान्ति के लिए सबसे अनुकूल थी। यहां औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की लंबी छटपटाहट और आक्रोश था और दूसरी ओर आर्थिक विषमता से जुड़ी सामाजिक विषमता भी थी।

यहां शोषितों और सामाजिक स्तरभेद के शिकार लोगों को संगठित करना अधिक आसान था, क्योंकि वे दूसरे देशों की फ्यूडल व्यवस्था के शिकार दलित समाज की तरह बिखरे नहीं, अपितु बिरादरी पंचायतों के माध्यम से पहले से संगठित समुदाय थे। एक बिरादरी के रूप में वे शक्तिशाली इतने थे कि असह्य स्थितियों में बिरादरी पंचायत का फैसला होने पर ये उन जमीदारों और भूस्वामियों से असहयोग कर सकते और उन्हें अपनी सेवाओं से वंचित कर सकते थे जिनसे सामान्यत: वे आंख तक नहीं मिला सकते थे। ऐसी स्थिति में उस पेशे से जुडा कहीं का कोई व्यक्ति उसकी सेवा के लिए तैयार नहीं हो सकता था। कहें जरूरत किसी अन्य देश की तुलना में अधिक होने के बाद भी उनके भीतर पैठ बनाना और उनको बड़े संगठन का अंग बनाना, उनमें आत्मविश्वास पैदा करना मजदूरों को संगठित करने की अपेक्षा अधिक आसान था।

ऐसी स्थिति मे उनको संगठित करने का प्रयत्न क्यों नहीं किया गया? जब किसानों को पार्टी से जोड़ने का खयाल आया भी तो भी दायरा बड़े और मझोले भूस्वामियों तक सीमित क्यों रह गया जब कि वे ही भूमिहीन कृषि मजदूरों के शोषक हुआ करते थे।

इन सभी सवालों का जवाब यह है कि उन्हें न तो अपने देश और समाज की समझ थी, न समझने की आकांक्षा थी । वे पश्चिमी समाज को अपने समाज पर आरोपित करके, इसे समझने का प्रयत्न कर रहे थे जैसे पाश्चात्य साहित्य पर मुग्ध हमारे लेखक उस साहित्य में व्यक्त अनुभूतियों और विचारों को स्वयं आत्मसात् करके उसका आरोपण अपने समाज पर करके उसका चित्रण करके इतना बारीक कात लेते हैं कि उनका साहित्य उनके जैसों की परिधि को पार ही नहीं कर पाता।

इन दोनों के बीच गहरा संबंध है। शोषित और दलित जनता से जुड़ने के लाख दावों के बावजूद प्रगतिशील साहित्य अपने समाज से जितना कटा रहा है उतना कटा दरबारी साहित्य तक नहीं रहा क्योंकि दरबारी होते हुए भी वह इस देश और समाज की अनुभूतियों और आकांक्षाओं का साहित्य था।

मुझे लगता है कि मार्क्सवादी सोच में एक खास तरह की यांत्रिकता इसलिए आ गई कि इसमें भौतिक पक्ष पर एकांगी बल दिया गया और यह मान लिया गया कि चेतना भौतिक परिस्थितियों की उपज है, भौतिक परिस्थितियों को बदल कर चेतना को इच्छित रूप में बदला जा सकता है।

यह अतिवाद था। इसमें इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया कि समान भौतिक परिस्थितियों में चेतना के रूप कितने भिन्न होते हैं और निरा भौतिक भी इतने ज्ञात और ज्ञेय घटकों से बना होता कि सबका हमें बोध तक नहीं होता, उनको नियंत्रित करना तो दूर की बात है। मार्क्स के अपने चिन्तन में उतना इकहरापन नहीं है जो नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे का मंसूबा रखने वाले भारतीय मार्क्सवादियों में यथार्थ से कटे रहने और इसकी क्षतिपूर्ति के रूप में खयालों को यथार्थ मान लेने के कारण देखने में आता है। इसका चरित्र निर्धारण जिस दौर में हुआ उसमें अपनी जीवनशैली में नवाबी और अभिव्यक्ति में आग उगलने वाले लफ्फाजियों का जैसा जमघट कम्युनिस्ट पार्टी मे था, वैसा किसी अन्य दल में कभी नहीं रहा। मार्क्सवाद में आस्था रखने वाले उस धड़े में भी नहीं, जिसे सोशलिस्ट कह कर अलग कर दिया गया।

इन दोनों में बुनियादी अंतर यह था कि सोसलिस्टों (समाजवादियों) की जड़ें भारतीय समाज और मूल्यव्यस्था में थीं, जब कि कम्युनिस्टों की मानसिकता उपनिवेशवादी थी। समाजवादी समाज को बदलना चाहते थे, जब कि कम्युनिस्ट सत्ता पर कब्जा जमाना चाहते थे। पहले की आस्था लोकतंत्र में थी, दूसरे की तानाशाही में। पहले को समाज के कल्याण के लिए समाजवाद चाहिए था, दूसरे को अपना सिक्का जमानेके लिए। सच यह है कि कम्युनिस्टों में अधिकांश ऐसे थे जिन्हें लोकतांत्रिक भारत की कल्पना से डर लगता था, उसमें अपना भविष्य असुरक्षित लगता था। इनमें ऊंचे रुतबे के लोग थे, अलपसंख्यक सिंड्रोम से ग्रस्त मानसिकता के लोग थे, और इन्होंने अपने प्रभाव से कम्युनिस्ट आन्दोलन को इतना बदला कि जिन्ना के प्रशंसक लीग से बाहर यदि कहीं मिल सकते थे तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में और लीग की योजनाओं पर कहीं काम होता रहा तो कम्युनिस्ट पार्टियों में।

क्रान्ति के सपनों के दिन लद गए तो सामाजिक क्रान्ति के नाम पर पुराण कथाओं को आधार बना कर अतीत में प्रचलित और आज अव्यावहारिक बन चुकी व्यवस्थाओं के विरोध के नाम पर सामाजिक उपद्रव भड़काने के अवसर तैयार करने में इसकी सारी ऊर्जा व्यय होती है। हिन्दू समाज को तोड़ने का ईसाइयत और मुसलिम लीग का कार्यभार इसका एक मात्र कार्यभार रह गया है।

जो इतिहास की इतनी मोटी समझ रखते हैं कि यह विश्वास पाल सकें कि वे अपने बुद्धिबल से मिथक को इतिहास और इतिहास को मिथक बना सकते हैं, वे ही यह विश्वास पाल सकते हैं कि वे समाज को तोड़ कर समाज को और देश की संपत्तियों को नष्ट करके देश को मजबूत बना सकते हैं।

जो इतिहास को नहीं समझता वह न तो वर्तमान को समझ सकता है, न अपने समाज को, न अपने आप को। वह यह भी नहीं सझ सकता कि वह कर क्या रहा है और उसके परिणाम क्या होंगे। उदाहरण के लिए मार्क्सवाद का प्रधान लक्ष्य आर्थिक विषमता का उन्मूलन रहा है। सामाजिक विषमता का प्रधान कारण भी वह इसी को मानता रहा है। पूंजीपति आर्थिक लूट जारी रखने के लिए इस प्रयास में रहता है कि जन आक्रोश को सामाजिक समस्याओं की ओर मोड़ दिया जाय जिससे उसे मनमानी करने की पूरी छूट मिल सके।

आज जब बीच बीच में यह राग अलापा जाता है कि धनी गरीब के बीच की खाई गहरी होती जा रही है, कि देश की ८७ प्रतिशत पूंजी केवल १ प्रतिशत पूंजीपतियों के पास जमा है और ९९ प्रतिशत को केवल २३ प्रतिशत पर निर्भर रहना पड़ रहा है, उस समय सामाजिक विक्षोभ को अपना प्रमुख कार्यभार बना कर कोई किसका साथ दे रहा है या किसकी लूट के लिए पर्यावरण तैयार कर रहा है? महिषासुर को हथियार बना कर, निषिद्ध खान पान का उत्सव मना कर या ऐसे ही दूसरे आयोजनों के माध्यम से वह आज की लड़ाई को किस युग के मैदान में उतर कर लड़ रहा है? यदि यही वैज्ञानिक तरीका है तो विज्ञान को नये रूप में परिभाषित करना होगा।

मेरे पाठकों में बहुतों को लग रहा होगा कि मेरा मार्क्सवाद का ज्ञान बहुत अच्छा नहीं है, और उनसे मैं स्वयं भी सहमत होना चाहूंगा, परन्तु मार्क्सवाद विचारदर्शन नहीं, कार्यदर्शन है। दुनिया को बदलने का दर्शन और इसकी परख इस आधार पर ही की जा सकता है कि भारतीय कम्युनिस्टों ने भारतीय समाज को किस रूप में बदला है, कहां तक बदला है, और वर्तमान में किनके साथ और किनके विरुद्ध हैं। इतिहास में आपकी नासमझी का स्रोत क्या रहा है और परिणाम क्या हुए?

हम इतिहास में केवल उस दुराग्रह की बात करेंगे जिसके चलते अयोध्या से लेकर राम तक, सरस्वती से लेकर सभ्यता या सभ्यता की प्रेरणा तक सब कुछ पश्चिम से आयात किया जाता रहा, और जब उस इतिहास को ध्वस्त कर दिया गया, और वैदिक और सैंधव सभ्यता का अभेद सिद्ध हो गया तो इतिहास की जगह थीम्स आफ हिस्ट्री पढ़ाई जाने लगी और हमले से तौबा किया गया पर फिर भी हड़प्पा सभ्यता को अनार्य बना कर पढ़ाया जाता रहा और वैदिक काल को परवर्ती कड़ी के रूप में पेश किया जाता रहा। आज भी स्थिति बदली न होगी और इसके आलोचकों की तरह मैं भी मानता हूं कि भाजपा की शिक्षा और संस्कृति की समझ खासी भोथरी है।

आज तो यह काम संभव ही नहीं, कल क्या रूप ले, पता नहीं।

Post – 2018-02-04

जो बात मैने रोहित वेमुला की आत्महत्या पर कही थी वही अंकित की हत्या पर कहना चाहूंगा। मृत्यु पर राजनीति करने वाले क्रूर होते हैं और कानून के अमल में बाधक होते हैं।

Post – 2018-02-04

जो बात मैने रोहित वेमुला की आत्महत्या पर कही थी वही अंकित की हत्या पर कहना चाहूंगा। मृत्यु पर राजनीति करने वाले क्रूर होते हैं और कानून के अमल में बाधक होते हैं।

Post – 2018-02-04

जो बात मैने रोहित वेमुला की आत्महत्या पर कही थी वही अंकित की हत्या पर कहना चाहूंगा। मृत्यु पर राजनीति करने वाले क्रूर होते हैं और कानून के अमल में बाधक होते हैं।

Post – 2018-02-02

सत्यानासी

मैंने बचपन में यह नाम नहीं सुना था। भारतीय कृषि और वानिकी को चौपट करके खाद्यान्न के मामले में परनिर्भर बनाने के कुछ विश्वासघाती उपक्रम किसी देश द्वारा किए गए। इसी का परिणाम था कुछ वनस्पतियों का बहुत कम समय में भारत के सुदूर कोनों में फैल जाना। इनका नामकरण यदि पारिभाषिक शब्दावली तैयार करने वाली संस्था ने किया होता तो इनका अर्थ जानने के लिए मूल भाषा के नाम या उसके अंग्रेजी अनुवाद को जानने की विवशता होती फिर भी, उसे देखकर भी, उसके गुण-दोष का पता न चलता। पर हुआ यह कि ये वनस्पतियां हिन्दी निदेशालय की आंख में धूल डाल कर सीधे गांव देहात तक फैल गईं। नामकरण उनको करना पड़ा जो धातु-उपसर्ग-प्रत्यय की समझ नहीं रखते, परन्तु भाषा की आत्मा की परख रखते है।

एक को उन्होंने नाम दिया गाजर घास, क्योंकि इसकी पत्तियां गाजर की पत्ती जैसी होती है। दूसरे को नाम दिया बेहया। ऐसा निर्लज्ज पौधा जिसे काट दो, सुखा दो, फिर भी कहीं से थोड़ी सी भी नमी मिल गई तो हरा ही नहीं हो जाता, इतनी तेजी से फैलता, और बढ़ता है कि इससे निपटना मुश्किल हो जाता है। तीसरे के लिए किसी ने नाम चुना सत्यानासी(शी)। मुझे इसकी शक्ल की सही याद नहीं, पर शायद यह दक्षिणी अमेरिका के वर्षावनों का वह पजीवी पौधा है जो बड़े से बड़े पेड़ से चिपक कर उसके रस का दोहन करता हुआ लहलहाता रहे और उसे सुखा दे पर एक बार चिपक जाने के बाद उसे काट कर अलग नहीं किया जा सकता।

भारतीय राजनीति में कम्युनिज्म का प्रवेश भी सत्यानासी की तरह ही हुआ। इसने जिस जिस का स्पर्श किया उसका सत्यानाश करके रख दिया, यह मेरा मोटा अनुमान है क, योंकि इसने अपने आन्दोलनों के माध्यम से निकम्मेपन को महिमामंडित करके कामचोरी को, फिर काम कराने के लिए रिश्वतखोरी को बढ़ावा दिया और मिलावट को विचार के स्तर से लेकर वस्तु के स्तर पर प्रोत्साहित किया, गो इनमें से कोई घोषित रूप मे उसकी कार्ययोजना का अंग नहीं था, न ही यह कहा जा सकता है कि कम्युनिस्ट आन्दोलन से समाज के सबसे भ्रष्ट लोग आकर्षित हुए थे।

सत्ता से सहयोग के कुछ विरल मौकों को छोड़ दें तो कम्युनिस्ट होना नैतिक विवेक और मानवीय संवेदनशीलता ही नहीं बौद्धिक प्रखरता का भी सूचक था जिसमें अपने लिए कुछ पाने का नहीं, अपितु एक आदर्श सामाजिक आर्थिक भविष्य के लिए अपने हितों और जीवन तक को न्यौछावर करने की आकांक्षा ही बलवती हुआ करती थी और इसी के कारण कम्युनिस्ट पार्टी का कार्डधारक अपने को गौरवान्वित और किसी कारण इससे वंचित किए जाने को अपमानजनक समझता था और कई बार इस सम्मान को बचाने के लिए अपमानजनक शर्तें मानने तक को तैयार हो जाता था।

चूक कहां हुई कि परिणाम इरादे के विपरीत होते चले गए, यह शोध का विषय हो सकता है जो विचार और अभिव्यक्ति के अभाव में संभव नहीं और जिसकी छूट गुप्त गतिविधियों और हिंसक तरीकों को अपनाने वाला कोई संगठन तो दे ही नहीं सकता अपने सभी सदस्यों को अंपनी अतरंग गतिविधियों और योजनाओं को जानने का अधिकार तक नहीं दे सकता। लक्ष्य पवित्र हो तो उसे प्राप्त करने के लिए अपवित्र या गर्हित तरीका अपनाया जा सकता है, यह तो हिंसाका रास्ता चुनने में ही अंतर्निहित है। शोषण परोक्ष हिंसा है, और युगों से चली आ रही इस हिंसा को समाप्त करने के लिए किसी पैमाने पर हिंसा की जा सकती है। यह हिंसा होते हुए भी हिंसा नहीं, हिंसा का खात्मा है। विरोधों की निकटता का सिद्धान्त – वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। कम्युनिस्ट हिंसा हिंसा न भवति! असुर की पहचान बदल जाती हैं, असुरसंहार जारी रहता है ।

हिंसा की आदत पड़ जाने पर नए बहाने तलाश लिए जाते हैंहिंसा को उचित ठहराने के। ऐसा न होता तो क्रान्ति के योद्धाओं को उनके ही साथियों ने न मारा होता। देवासुर संग्राम के कई दौरों के बाद प्राचीन भारत ने अहिंसा का मूल्य समझा था। हिंसा से मुक्त कोई दौर था यह दावा नहीं कर सकता, पर एक मूल्य के रूप अहिंसा भारतीय चेतना में इतनी गहराई तक उतर गई कि नरहत्या का प्रायश्चित ही नहीं उपयोगी जीवों – कुत्ता, बिल्ली, गाय – की अनजाने भी मृत्यु हो जाने पर अपमानजनक और यातनाप्रद प्रायश्चित से गुजरने के बाद ही व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी का जीवन बिता सकता था। यह वर्णनिरपेक्ष रूप में पूरे भारतीय समाज पर घटित होता था, और जो आखेटजीवी इस मर्यादा का पालन नहीं करते रहे हैं उन्हें चांडाल कहा जाता था।

ठीक ऐसी ही वितृष्णा छल, प्रपंच, विश्वासघात आदि के प्रति रही है। इसलिए गुप्त योजनाओं वाले संगठनों के प्रति रही है। उन्हें अपराधकर्मी माना जाता रहा है। यदि भारतीय मानस की इतनी समझ भी होती तो कम्युनिस्टों ने भारतीय संदर्भ में सही कार्यदर्शन अपनाया होता। रक्तक्रांति और गुप्त गतिविधियां पाश्चात्य मनोरचना के अनुरूप हैं जिसमे साध्य ही अंतिम कसौटी है जिसके लिए गर्हित तरीका भी अपनाया जा सकता है, जहां प्यार और युद्ध में सब कुछ जायज है, परंतु भारतीय मूल्यचेतना प्यार और युद्ध में भी मर्यादा की रक्षा न कर पानेवाला समाज की नजर में गिर जाता है।

इसलिए भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन विदेशों मे शिक्षित और पाश्चात्य शिक्षाप्राप्त होनहार नौजवानों के आकर्षण का केन्द्र भले बना हो, सामान्य अल्पशिक्षित और अशिक्षित भारतीय समाज के लिए विकर्षक ही बना रहा। जो बात भाषा के विषय में कही जाती है कि इसकी कसौटी इसका लिखित रूप या सुशिक्षित लोग नहीं, अनपढ़ और अल्पशिक्षित समाज है, ठीक यही बात जातीय मानस के विषय में भी सही है जिसकी चेतना में युगों पुराने जातीय मूल्य सर्वाधिक सुरक्षित रहते हैं, जब कि इससे ठीक उल्टी पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली इसे छिन्न-भिन्न या नष्ट करने को अपना कार्यभार मानता है और अपने अनुरूप ढलने से बिदकते पाकर वह इसे मूर्ख और सिरफिरा मानता है।

यह कुछ वैसी ही सोच है जो मजहबी मामले में अपना सद्धर्म न अपनाने वाले के विषय में मिशनरी रखते हैं। इस रहस्य को समझने का प्रयत्न ही नहो किया गया कि मूल्यान्तरण धर्मान्तरण से अधिक दुष्कर है और यहां जब हम मूल्यप्रणाली की बात कर रहे हैं तो अनपढ़ और अल्पशिक्षित की तरह वर्णविभाजन से परे, नागर, ग्राम्य और आटविक समग्र भारतीय समाज की बात कर रहे हैं, और जिसे हिन्दू कह कर संबोधित किया जाता रहा है वह वर्णव्यवस्था से नहीं, मूल्यव्यवस्था से जुड़ा समाज है। इसके किसी हिस्से को कम्युनिष्ट विचारधारा आकर्षित नहो कर सकी, बल्कि विकर्षक लगती रही।

मैं नहीं जानता कम्युनिष्टों के लिए कौमनष्ट का प्रयोग पहले किसने किया था। इसे किसी दल के माध्यम से प्रचारित नहीं किया गया फिर भी यह प्रयोग में रहा और इसके साथ कुछ वैसा ही भाव जुड़ा रहा जो सत्यानासी के साथ जुड़ा मिलता है। हार्दिकता के इस अभाव के कारण अपने बुलंद इरादों के बाद भी इसकी भूमिका विनाशकारी अधिक रही. निर्माणकारी कम। यह भारतीय मानस में जगह न बना सका और जातीय स्वाभिमान से रिक्त पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त अल्प पर मुखर तबके के भीतर सिमटा रहा।