Post – 2018-02-09

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यदि हम पुराण कथाओं की अन्त: प्रकृति या उसकी रचना प्रक्रिया की समझ रखते हैं तो वे उस युग को समझने में उतनी ही सहायक हो सकते हैं जैसे आज तक का साहित्य अपने-अपने कालों को समझने में सहायक होता है। यह न भूलना चाहिए कि पुराण अपनी सीमा में विश्वकोश हैं, परन्तु पुराण कथाएं लेखनपूर्व चरणों की साहित्यिक रचनाएं होती थीं, जिनका चरित्र बाद की उपदेश कथाओं जैसा था। सच कहें तो उपदेश कथाएं उसी परंपरा का विस्तार हैं। इनकी सोद्देश्यता इनका प्राण है। दुर्भाग्य से हाल के दिनों में इसकी समझ राजनीतिक लाभ के लिए जान बूझ कर नष्ट की गई है, और इनका उपयोग वहशीपन पैदा करने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि अशान्ति क्रान्ति का वहम तो पैदा कर ही लेती है।

यदि आप विविध चरणों पर देवासुर संग्राम को लें तो आहारसंचय के चरण से लेकर सभ्यता के कई चरणों का इतिहास चित्रवत सामने आ जाएगा । यहां हम केवल समुद्रमंथन की कथा की चर्चा करेंगे। इस कथा में सुदूर व्यापार को प्रतीकबद्ध किया गया है। सुदूर व्यापार में आज के दक्षिण एशियाई भूभाग से ले कर आर्यभाषा का पूरा प्रसारक्षेत्र आ जाता है । उल्लेख तो समुद्रमंथन का है, पर इसमें जलमार्ग और स्थलमार्ग दोनों से गहन सक्रियता – चरैवेति चरैवेति – आ जाती है। इसके दो तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी है । पहला यह कि जिस वासुकी नाग को रस्सी बना समुद्र का मंथन किया गया उससे जो विषैली फुफकार छूटती थी उसे देव झेल नहीं सकते, इसलिए फन के सिरे को असुर पकड़ते हैं और पूंछ वाले सिरे को देव समाज संभालता है। यह याद दिला दें कि जिस अमृत के लिए ‘समुद्रमंथन’ किया जा रहा था वह सोना था – अमृतं हिरण्यम् ; व्यापारिक लाभ था। गाय और घोड़ा समुद्र से तो नहीं निकल सकते, पर कच्छ और गुजरात गायों घोड़ों के लिए और गीर के वन गजराज के लिए प्रसिद्ध हैं । कच्छ के एक स्थल का नाम घोड़ेवाली वाडी (मंडी) है जहां से हड़प्पाकालीन अवशेष मिलने का दावा किया गया है।

जिस तथ्य की ओर हम ध्यान दिलाना चाहते हैं वह यह कि जोखिम भरा और कठिन श्रम, खतरों से बचाव का काम असुर करते है, पर पहल, वितरण व्यवस्था देवों के हाथ में रहती है।

सभ्यता का पूरा तंन्त्र श्रमिकों, कारीगरों, आविष्कारकों आदि पर निर्भर रहा है जब कि कतर-व्यौंत से संपत्ति संग्रह और साधनों पर अधिकार करने वाले पहल और प्रबन्धन अपने हाथ में रखते रहे हैं, और अधिकतम उत्पाद या लाभ अपने पास रख कर केवल उतना ही उत्पादकों को देते रहे हैं, जिससे उसका भरण-पोषण होता रहे और नई सूझ-बूझ वाले कारीगर/विशेषज्ञ कुछ मौज मस्ती में रह सकें, जब कि उनके मन में इस बेईमानी को लेकर असन्तोष रहा है और समय-समय पर वे इसके लिए विद्रोह भी करते रहे हैं। इसे देवासुर संग्राम, या मार्क्सवादी शब्दावली में शोषक और शोषित का टकराव कहा जा सकता है। इसी अर्थ में मार्क्स के इस कथन को समझा जा सकता है कि पहले के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है जिसका बहुत भोंड़ा अर्थ भारत में वर्ण ही वर्ग है, कर लिया गया। दुनिया के सभी देशों में संपत्ति पर अधिकार करने वालों और संपत्ति से वंचित रह गए या कर दिए जाने वालों का और अपने श्रम और योग्यता को उनकी सेवा में लगाकर जीविका अर्जित करने वालों के दो वर्ग रहे हैं। भारत में इस व्यवस्था को अधिक अचूक बना लिया गया था।

यदि आर्य विशेषण का प्रयोग स्वामी और वैश्य के लिए होता रहा है और यदि वैश्य के अधिकार में संपत्ति के तीनों स्रोत – कृषि वाणिज्य, गोरक्षा या पशुपालन रहा है, तो वैश्य और स्वामी दोनों का अर्थ एक ही हुआ। ऐसी दशा में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी वैश्यों के उपजीवी, रक्षा और अनिष्ट निवारण की योग्यताओं के कारण उसके आश्रित हुए जिनकी अन्य भूमिकाओं में एक हुआ, उत्पादक वर्ग को नियन्त्रित रखना। आर्य शब्द का आशय ही नहीं इस पूरे तन्त्र का जितना स्पष्ट प्रतिबिंबन ऋग्वेद में है वैसा मेरी जानकारी में किसी अन्य कृति में नहीं है । यह ध्यान रहे कि स्वामिवर्ग और समाज के नियंत्रण और प्रबन्धन में उसका सहायक या अनुषंगी वर्ग कुछ भी उत्पादित नहीं करता था।

संस्कृत भाषी आर्य यदि कहीं अन्यत्र से भारत में आए होते, परन्तु उस समाज के क्रतुविद या वैज्ञानिकों, कलाविदों और श्रमिकों की भूमिका को भी इस सुझाव में स्थान दिया गया होता, और हम बिना तोड़ मरोड़ के उन सामाजिक और आर्थिक संबंधों को समझ पाते तो उस दशा में उन्हें आदि काल से भारत का निवासी सिद्ध करने वाले मुझे दुराग्रही ही नहीं, इतिहास को समझने में बाधक और उपद्रवी भी लगते।

परन्तु यहां सारा जोर लूटने, मारने, कब्जा जमाने पर था और यह काम इतनी धूर्तता से किया गया जैसी जुआड़ियों और अपराधियों में भी देखने में नहीं आती । सभ्यता के निर्माताओं को जादू की छड़ी से गायब कर दिया गया, सभ्यता का श्रेय उसका विनाश करने वाले दुर्दान्त, बर्बर, रक्तपिपाशुओं को दे दिया गया। बाद में समय समय पर वैसे ही बर्बर और रक्तपिपाशु जत्थों को भारतीय समाज में नई ऊर्जा का संचार करने वाला सिद्ध किया जाता रहा, और सबसे बड़ी बात यह कि यह तर्क खड़ा किया जाता रहा कि भारत में सदा से आक्रमणकारी ही सत्ता पर अधिकार करके राज्य करते रहे हैं, इसलिए जो अधिकार उन्हें हासिल था वह अंग्रेजों को भी हासिल है। यह उनकी जरूरत थी यह समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि मार्क्सवादी इतिहासकारों की कौन सी जरूरत थी कि वे उपनिवेशवादियों और मिशनरियों के साथ लामबंद होते रहे और यूरोपीय इतिहासकारों की शरारत को उजागर करने वाले भारतीय इतिहासकारों का उपहास करते और पाठ्यक्रमों से बाहर करते रहे।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि वे भारतीय सभ्यता के निर्माण में आर्येतर समाज की विशेषत: असवर्ण समुदायों की भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए जब कि एक मार्क्सवादी के रूप में उन्हें इनकी भूमिका को केन्द्रीयता देनी चाहिए थी। हम आगे यह देखेंगे कि आर्यों को जिन भी बातों का श्रेय दिया जाता है उनमें से कोई भी उनकी खोज या आविष्कार नहीं है। उनका श्रेय असुर कहे जाने वाले जनों को है जिन्हे कोसंबी ने हैवान कह कर दरकिनार कर दिया था।

Post – 2018-02-08

इतिहास का ध्वंस

हमने उन आततायियों के बारे में सुन रखा है जिन्होंने धार्मिक उन्माद में अनुपम कलाकृतियों को नष्ट किया, उन को रौंद कर, अपवित्र करके पैशाचिक आनन्द लेते रहे, आराधना स्थलों को मटियामेट करते हुए पुरातन वास्तुकृतियों की स्मृति तक मिटा दी, शिक्षाकेन्द्रों को ध्वस्त किया और ग्रन्थागारों को जलाकर खाक किया कि दुनिया से ज्ञान-विज्ञान समाप्त हो जाये, और लोग उनके धर्मग्रन्थ में क्या लिखा, केवल उस पर विश्वास करने को बाध्य हो जायं, किसी तरह का तर्क-वितर्क तक न करें और यदि करें तो इसे धर्मद्रोह करार दे कर उनकी हत्या कर दी जाए।

हमें यह सबसे जघन्य कार्य प्रतीत होता है, यद्यपि ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो भावी निर्माण की कोई स्पष्ट कल्पना के बिना भी हर तरह की तोड़फोड़ को एक श्लाघ्य काम मानते हों, क्योंकि यदि पुराना नष्ट हो गया तो कुछ तो नया बनेगा ही। अत: मूर्तिभंजक उनके कोश में श्लाघा का अर्थ रखता है। यदि नई कृति परंपरा से हट कर और अधिक प्रभावशाली हो तो ऐसे रचनाकार को भी चौंकाने के लिए मूर्तिभंजक कह दिया जाता है। (परन्तु क्या युगान्तरकारी सर्जना को ध्वंस का पर्याय बनाया जा सकता है? यदि बनाया गया तो यह किस मानसिकता का सूचक है? गाली को अपनी संज्ञा बनाने वाले, गाली को अपनी बनाने वाले, उसी को अपने प्रतिरोध और सर्जनात्मकता का घोष बनाने वाले, और विद्रोह के तेवर के बावजूद युगों के अपमान से दहकने वाले और इसके बावजूद अपमान बोध से न उबर पाने वाले समाजों की पीड़ा का अध्ययन अभी तक हुआ नहीं है)।

परंतु हमने जिन पैशाचिक और सभ्यताद्रोही कृत्यों का हवाला दिया वे उतने ध्वंसकारी नहीं हैं जितना कुतर्क और अपव्याख्या से इतिहास को नष्ट करना। कारण भौतिक ध्वंस के बाद भी भग्न प्रतिमाएं और वास्तुकृतियां इस कुकृत्य की याद दिलाती रहती है, ज्ञानसंपदा का बहुत कुछ नष्ट होने बाद इतना कुछ बचा रहता, या जुटा लिया जाता है कि इसे हानि तो कहा जा सकता है सर्वनाश नहीं। मनोबल पर इसका असर नहीं पड़ता। अपव्याख्या से सांस्कृतिक विनाश ही नहीं किया जाता, अपितु इसके मलबे को इस हद तक शिरोधार्य बना दिया जाता है, कुतर्कों का खंडन करते हुए सांस्कृतिक पुनरुद्धार का प्रयत्न डरावना प्रतीत होने लगता है सबसे प्रबुद्ध माना जाने वाला तबका, जिसे यह काम करना चाहि, वह किसी न किसी बहाने सांस्कृतिक विनाश करने वालों के साथ लामबन्द हो जाता है । कम से कम हमारा जातीय अनुभव यही रहा है।

सभ्यताएं जहां देशज प्रतीत होती हैं वहां भी देशज नहीं होती हैं। उनके निर्माण में इतने सुदूर ज्ञात और अज्ञात देशों और इतने युगों के ईंट गारे लगे होते हैं कि उनका चरित्र सार्वभौम और बहुकालिक होता है और हम इस विषय में सावधान हों या नहीं, अपने वर्तमान में भी हम एक साथ कई कालों को जीते हैं। यह बात सभ्यता के उत्थान से लेकर आज तक के सभी चरणों पर लागू होती है। अत: किसी भी कारण से किसी भी सभ्यता या संस्कृति की अपव्याख्या मानव सभ्यता के प्रतिअपघात है। यह उन प्रधान कारणों में से एक है कि ज्ञान विज्ञान में आकाश के तारे तोड़ने के मुहावरे साकार करने वाले अपनी ही धरती को उस नरक में बदलते जा रहे हैं जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

बात केवल इतिहास की नहीं है, यदि आप किसी वस्तु, क्रिया या विचार को समझना चाहते हैं तो उसे जहां, जिस रूप में पाते हैं उसी रूप में, अपनी ओर से किसी तरह का घालमेल किए बिना ही समझ सकते हैं। समझने के बाद यह तय कर सकते हैं कि इसका हम क्या उपयोग कर सकते हैं, या इससे क्या सीख सकते हैं।

परन्तु यदि आप किसी पर हावी होना चाहते हैं, और पहली ही पहचान में आपको लगे यदि इससे टकराया तो यह हमें नष्ट कर देगा तो आप के पास दो विकल्प बच रहते हैं। या तो आप उससे बच कर, दूरी बना कर रहें या उसे मिटाने का प्रयत्न करें।

इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि हिंदू मूल्य-व्यवस्था, संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य में उपलब्ध वांग्मय – साहित्य, पुराण, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, धर्म-विश्वास – से यूरोपियनों का जब भी, जितना परिचय हुआ, इसने या तो उन्हें अभिभूत किया अथवा आतंकित किया। पहले का परिणाम मैक्नाटन जैसे लोग थेईसाई प्रचारकों को गालियां देते हुए उन्हें जाहिल और धर्मान्ध कहते थे और कहते थे धर्म और दर्शन के मामले में हिन्दुओं को वे कुछ सिखा नहीं सकते और जिनकी रुझान को देखते हुए मिशनरी शोर मचाने लगे थे कि यदि यही हाल रहा तो कंपनी का शासन और इसके शेयरधारकों की चांदी तो रहेगी, पर सारे अंग्रेज हिन्दू हो जाएंगे, इसलिए कंपनी को इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वह राजशक्ति का प्रयोग करते हुए हिन्दुओं के धर्मान्तरण में सहायक हो।

अत: संस्कृत साहित्य का अध्ययन इसमें रचित कृतियों को समझने के लिए नहीं अपितु कुतर्क से इनको नष्ट करने के लिए आरंभ हुआ, इसके लिए धनबल और जनबल का प्रबन्ध किया गया, और कंपनी सरकार कितना आगे बढ़ कर इसके लिए सत्ता का प्रयोग कर रही थी इसे इस बात से ही समझा जा सकता हैं कि वह अपने ही सिपाहियों की धार्मिक संवेदना और आर्थिक विवशता को जानते हुए उनके ईसाई बनने का रास्ता तैयार करना चाह रही थी जिसके विरुद्ध आक्रोश स्वतंत्रता संग्राम के नियत तिथि से पहले आरंभ होने का कारण बना था।

रोचक बात यह है कि हिन्दुत्व के किले पर गोलाबारी करने की बात वे खुल कर करते थे, इसलिए आश्चर्य होता है कि इस पर हमारे अपने विद्वानों ने उस समय ध्यान क्यों नहीं दिया । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जैसे वे कुछ पुस्तकों और पत्रिकाओं के अंकों मे प्रकाशित सामग्री के कारण वे उन्हें प्रतिबन्धित कर देते थे, प्रतियां जब्त कर लेते थे, प्रेस ऐक्ट के दबाव से ऐसी सामग्री छपने नहीं देते थे, उसी तरह कुछ सामग्री ऐसी रही हो सकती है जिसे केवल यूरोपीय विद्वानों के लिए ही सुलभ कराते रहे हों। हमें इस बात पर आश्चर्य अवश्य होता है कि जब वे भारतीय लेखकों के, अपने लिए असुविधाजनक व्याख्याओं और निष्कर्षों को खारिज करने के लिए उन्हें देशप्रेम से प्रेरित बताते थे, तो किसी ने खुले रूप में स्वीकार किए जाने वाले हमलों को धर्मांधता से प्रेरित कह कर उनकी आलोचना क्यों नहीं की।

Post – 2018-02-08

इतिहास का ध्वंस

हमने उन आततायियों के बारे में सुन रखा है जिन्होंने धार्मिक उन्माद में अनुपम कलाकृतियों को नष्ट किया, उन को रौंद कर, अपवित्र करके पैशाचिक आनन्द लेते रहे, आराधना स्थलों को मटियामेट करते हुए पुरातन वास्तुकृतियों की स्मृति तक मिटा दी, शिक्षाकेन्द्रों को ध्वस्त किया और ग्रन्थागारों को जलाकर खाक किया कि दुनिया से ज्ञान-विज्ञान समाप्त हो जाये, और लोग उनके धर्मग्रन्थ में क्या लिखा, केवल उस पर विश्वास करने को बाध्य हो जायं, किसी तरह का तर्क-वितर्क तक न करें और यदि करें तो इसे धर्मद्रोह करार दे कर उनकी हत्या कर दी जाए।

हमें यह सबसे जघन्य कार्य प्रतीत होता है, यद्यपि ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो भावी निर्माण की कोई स्पष्ट कल्पना के बिना भी हर तरह की तोड़फोड़ को एक श्लाघ्य काम मानते हों, क्योंकि यदि पुराना नष्ट हो गया तो कुछ तो नया बनेगा ही। अत: मूर्तिभंजक उनके कोश में श्लाघा का अर्थ रखता है। यदि नई कृति परंपरा से हट कर और अधिक प्रभावशाली हो तो ऐसे रचनाकार को भी चौंकाने के लिए मूर्तिभंजक कह दिया जाता है। (परन्तु क्या युगान्तरकारी सर्जना को ध्वंस का पर्याय बनाया जा सकता है? यदि बनाया गया तो यह किस मानसिकता का सूचक है? गाली को अपनी संज्ञा बनाने वाले, गाली को अपनी बनाने वाले, उसी को अपने प्रतिरोध और सर्जनात्मकता का घोष बनाने वाले, और विद्रोह के तेवर के बावजूद युगों के अपमान से दहकने वाले और इसके बावजूद अपमान बोध से न उबर पाने वाले समाजों की पीड़ा का अध्ययन अभी तक हुआ नहीं है)।

परंतु हमने जिन पैशाचिक और सभ्यताद्रोही कृत्यों का हवाला दिया वे उतने ध्वंसकारी नहीं हैं जितना कुतर्क और अपव्याख्या से इतिहास को नष्ट करना। कारण भौतिक ध्वंस के बाद भी भग्न प्रतिमाएं और वास्तुकृतियां इस कुकृत्य की याद दिलाती रहती है, ज्ञानसंपदा का बहुत कुछ नष्ट होने बाद इतना कुछ बचा रहता, या जुटा लिया जाता है कि इसे हानि तो कहा जा सकता है सर्वनाश नहीं। मनोबल पर इसका असर नहीं पड़ता। अपव्याख्या से सांस्कृतिक विनाश ही नहीं किया जाता, अपितु इसके मलबे को इस हद तक शिरोधार्य बना दिया जाता है, कुतर्कों का खंडन करते हुए सांस्कृतिक पुनरुद्धार का प्रयत्न डरावना प्रतीत होने लगता है सबसे प्रबुद्ध माना जाने वाला तबका, जिसे यह काम करना चाहि, वह किसी न किसी बहाने सांस्कृतिक विनाश करने वालों के साथ लामबन्द हो जाता है । कम से कम हमारा जातीय अनुभव यही रहा है।

सभ्यताएं जहां देशज प्रतीत होती हैं वहां भी देशज नहीं होती हैं। उनके निर्माण में इतने सुदूर ज्ञात और अज्ञात देशों और इतने युगों के ईंट गारे लगे होते हैं कि उनका चरित्र सार्वभौम और बहुकालिक होता है और हम इस विषय में सावधान हों या नहीं, अपने वर्तमान में भी हम एक साथ कई कालों को जीते हैं। यह बात सभ्यता के उत्थान से लेकर आज तक के सभी चरणों पर लागू होती है। अत: किसी भी कारण से किसी भी सभ्यता या संस्कृति की अपव्याख्या मानव सभ्यता के प्रतिअपघात है। यह उन प्रधान कारणों में से एक है कि ज्ञान विज्ञान में आकाश के तारे तोड़ने के मुहावरे साकार करने वाले अपनी ही धरती को उस नरक में बदलते जा रहे हैं जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

बात केवल इतिहास की नहीं है, यदि आप किसी वस्तु, क्रिया या विचार को समझना चाहते हैं तो उसे जहां, जिस रूप में पाते हैं उसी रूप में, अपनी ओर से किसी तरह का घालमेल किए बिना ही समझ सकते हैं। समझने के बाद यह तय कर सकते हैं कि इसका हम क्या उपयोग कर सकते हैं, या इससे क्या सीख सकते हैं।

परन्तु यदि आप किसी पर हावी होना चाहते हैं, और पहली ही पहचान में आपको लगे यदि इससे टकराया तो यह हमें नष्ट कर देगा तो आप के पास दो विकल्प बच रहते हैं। या तो आप उससे बच कर, दूरी बना कर रहें या उसे मिटाने का प्रयत्न करें।

इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि हिंदू मूल्य-व्यवस्था, संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य में उपलब्ध वांग्मय – साहित्य, पुराण, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, धर्म-विश्वास – से यूरोपियनों का जब भी, जितना परिचय हुआ, इसने या तो उन्हें अभिभूत किया अथवा आतंकित किया। पहले का परिणाम मैक्नाटन जैसे लोग थेईसाई प्रचारकों को गालियां देते हुए उन्हें जाहिल और धर्मान्ध कहते थे और कहते थे धर्म और दर्शन के मामले में हिन्दुओं को वे कुछ सिखा नहीं सकते और जिनकी रुझान को देखते हुए मिशनरी शोर मचाने लगे थे कि यदि यही हाल रहा तो कंपनी का शासन और इसके शेयरधारकों की चांदी तो रहेगी, पर सारे अंग्रेज हिन्दू हो जाएंगे, इसलिए कंपनी को इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वह राजशक्ति का प्रयोग करते हुए हिन्दुओं के धर्मान्तरण में सहायक हो।

अत: संस्कृत साहित्य का अध्ययन इसमें रचित कृतियों को समझने के लिए नहीं अपितु कुतर्क से इनको नष्ट करने के लिए आरंभ हुआ, इसके लिए धनबल और जनबल का प्रबन्ध किया गया, और कंपनी सरकार कितना आगे बढ़ कर इसके लिए सत्ता का प्रयोग कर रही थी इसे इस बात से ही समझा जा सकता हैं कि वह अपने ही सिपाहियों की धार्मिक संवेदना और आर्थिक विवशता को जानते हुए उनके ईसाई बनने का रास्ता तैयार करना चाह रही थी जिसके विरुद्ध आक्रोश स्वतंत्रता संग्राम के नियत तिथि से पहले आरंभ होने का कारण बना था।

रोचक बात यह है कि हिन्दुत्व के किले पर गोलाबारी करने की बात वे खुल कर करते थे, इसलिए आश्चर्य होता है कि इस पर हमारे अपने विद्वानों ने उस समय ध्यान क्यों नहीं दिया । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जैसे वे कुछ पुस्तकों और पत्रिकाओं के अंकों मे प्रकाशित सामग्री के कारण वे उन्हें प्रतिबन्धित कर देते थे, प्रतियां जब्त कर लेते थे, प्रेस ऐक्ट के दबाव से ऐसी सामग्री छपने नहीं देते थे, उसी तरह कुछ सामग्री ऐसी रही हो सकती है जिसे केवल यूरोपीय विद्वानों के लिए ही सुलभ कराते रहे हों। हमें इस बात पर आश्चर्य अवश्य होता है कि जब वे भारतीय लेखकों के, अपने लिए असुविधाजनक व्याख्याओं और निष्कर्षों को खारिज करने के लिए उन्हें देशप्रेम से प्रेरित बताते थे, तो किसी ने खुले रूप में स्वीकार किए जाने वाले हमलों को धर्मांधता से प्रेरित कह कर उनकी आलोचना क्यों नहीं की।

Post – 2018-02-08

इतिहास का ध्वंस

हमने उन आततायियों के बारे में सुन रखा है जिन्होंने धार्मिक उन्माद में अनुपम कलाकृतियों को नष्ट किया, उन को रौंद कर, अपवित्र करके पैशाचिक आनन्द लेते रहे, आराधना स्थलों को मटियामेट करते हुए पुरातन वास्तुकृतियों की स्मृति तक मिटा दी, शिक्षाकेन्द्रों को ध्वस्त किया और ग्रन्थागारों को जलाकर खाक किया कि दुनिया से ज्ञान-विज्ञान समाप्त हो जाये, और लोग उनके धर्मग्रन्थ में क्या लिखा, केवल उस पर विश्वास करने को बाध्य हो जायं, किसी तरह का तर्क-वितर्क तक न करें और यदि करें तो इसे धर्मद्रोह करार दे कर उनकी हत्या कर दी जाए।

हमें यह सबसे जघन्य कार्य प्रतीत होता है, यद्यपि ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो भावी निर्माण की कोई स्पष्ट कल्पना के बिना भी हर तरह की तोड़फोड़ को एक श्लाघ्य काम मानते हों, क्योंकि यदि पुराना नष्ट हो गया तो कुछ तो नया बनेगा ही। अत: मूर्तिभंजक उनके कोश में श्लाघा का अर्थ रखता है। यदि नई कृति परंपरा से हट कर और अधिक प्रभावशाली हो तो ऐसे रचनाकार को भी चौंकाने के लिए मूर्तिभंजक कह दिया जाता है। (परन्तु क्या युगान्तरकारी सर्जना को ध्वंस का पर्याय बनाया जा सकता है? यदि बनाया गया तो यह किस मानसिकता का सूचक है? गाली को अपनी संज्ञा बनाने वाले, गाली को अपनी बनाने वाले, उसी को अपने प्रतिरोध और सर्जनात्मकता का घोष बनाने वाले, और विद्रोह के तेवर के बावजूद युगों के अपमान से दहकने वाले और इसके बावजूद अपमान बोध से न उबर पाने वाले समाजों की पीड़ा का अध्ययन अभी तक हुआ नहीं है)।

परंतु हमने जिन पैशाचिक और सभ्यताद्रोही कृत्यों का हवाला दिया वे उतने ध्वंसकारी नहीं हैं जितना कुतर्क और अपव्याख्या से इतिहास को नष्ट करना। कारण भौतिक ध्वंस के बाद भी भग्न प्रतिमाएं और वास्तुकृतियां इस कुकृत्य की याद दिलाती रहती है, ज्ञानसंपदा का बहुत कुछ नष्ट होने बाद इतना कुछ बचा रहता, या जुटा लिया जाता है कि इसे हानि तो कहा जा सकता है सर्वनाश नहीं। मनोबल पर इसका असर नहीं पड़ता। अपव्याख्या से सांस्कृतिक विनाश ही नहीं किया जाता, अपितु इसके मलबे को इस हद तक शिरोधार्य बना दिया जाता है, कुतर्कों का खंडन करते हुए सांस्कृतिक पुनरुद्धार का प्रयत्न डरावना प्रतीत होने लगता है सबसे प्रबुद्ध माना जाने वाला तबका, जिसे यह काम करना चाहि, वह किसी न किसी बहाने सांस्कृतिक विनाश करने वालों के साथ लामबन्द हो जाता है । कम से कम हमारा जातीय अनुभव यही रहा है।

सभ्यताएं जहां देशज प्रतीत होती हैं वहां भी देशज नहीं होती हैं। उनके निर्माण में इतने सुदूर ज्ञात और अज्ञात देशों और इतने युगों के ईंट गारे लगे होते हैं कि उनका चरित्र सार्वभौम और बहुकालिक होता है और हम इस विषय में सावधान हों या नहीं, अपने वर्तमान में भी हम एक साथ कई कालों को जीते हैं। यह बात सभ्यता के उत्थान से लेकर आज तक के सभी चरणों पर लागू होती है। अत: किसी भी कारण से किसी भी सभ्यता या संस्कृति की अपव्याख्या मानव सभ्यता के प्रतिअपघात है। यह उन प्रधान कारणों में से एक है कि ज्ञान विज्ञान में आकाश के तारे तोड़ने के मुहावरे साकार करने वाले अपनी ही धरती को उस नरक में बदलते जा रहे हैं जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

बात केवल इतिहास की नहीं है, यदि आप किसी वस्तु, क्रिया या विचार को समझना चाहते हैं तो उसे जहां, जिस रूप में पाते हैं उसी रूप में, अपनी ओर से किसी तरह का घालमेल किए बिना ही समझ सकते हैं। समझने के बाद यह तय कर सकते हैं कि इसका हम क्या उपयोग कर सकते हैं, या इससे क्या सीख सकते हैं।

परन्तु यदि आप किसी पर हावी होना चाहते हैं, और पहली ही पहचान में आपको लगे यदि इससे टकराया तो यह हमें नष्ट कर देगा तो आप के पास दो विकल्प बच रहते हैं। या तो आप उससे बच कर, दूरी बना कर रहें या उसे मिटाने का प्रयत्न करें।

इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि हिंदू मूल्य-व्यवस्था, संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य में उपलब्ध वांग्मय – साहित्य, पुराण, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, धर्म-विश्वास – से यूरोपियनों का जब भी, जितना परिचय हुआ, इसने या तो उन्हें अभिभूत किया अथवा आतंकित किया। पहले का परिणाम मैक्नाटन जैसे लोग थेईसाई प्रचारकों को गालियां देते हुए उन्हें जाहिल और धर्मान्ध कहते थे और कहते थे धर्म और दर्शन के मामले में हिन्दुओं को वे कुछ सिखा नहीं सकते और जिनकी रुझान को देखते हुए मिशनरी शोर मचाने लगे थे कि यदि यही हाल रहा तो कंपनी का शासन और इसके शेयरधारकों की चांदी तो रहेगी, पर सारे अंग्रेज हिन्दू हो जाएंगे, इसलिए कंपनी को इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वह राजशक्ति का प्रयोग करते हुए हिन्दुओं के धर्मान्तरण में सहायक हो।

अत: संस्कृत साहित्य का अध्ययन इसमें रचित कृतियों को समझने के लिए नहीं अपितु कुतर्क से इनको नष्ट करने के लिए आरंभ हुआ, इसके लिए धनबल और जनबल का प्रबन्ध किया गया, और कंपनी सरकार कितना आगे बढ़ कर इसके लिए सत्ता का प्रयोग कर रही थी इसे इस बात से ही समझा जा सकता हैं कि वह अपने ही सिपाहियों की धार्मिक संवेदना और आर्थिक विवशता को जानते हुए उनके ईसाई बनने का रास्ता तैयार करना चाह रही थी जिसके विरुद्ध आक्रोश स्वतंत्रता संग्राम के नियत तिथि से पहले आरंभ होने का कारण बना था।

रोचक बात यह है कि हिन्दुत्व के किले पर गोलाबारी करने की बात वे खुल कर करते थे, इसलिए आश्चर्य होता है कि इस पर हमारे अपने विद्वानों ने उस समय ध्यान क्यों नहीं दिया । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जैसे वे कुछ पुस्तकों और पत्रिकाओं के अंकों मे प्रकाशित सामग्री के कारण वे उन्हें प्रतिबन्धित कर देते थे, प्रतियां जब्त कर लेते थे, प्रेस ऐक्ट के दबाव से ऐसी सामग्री छपने नहीं देते थे, उसी तरह कुछ सामग्री ऐसी रही हो सकती है जिसे केवल यूरोपीय विद्वानों के लिए ही सुलभ कराते रहे हों। हमें इस बात पर आश्चर्य अवश्य होता है कि जब वे भारतीय लेखकों के, अपने लिए असुविधाजनक व्याख्याओं और निष्कर्षों को खारिज करने के लिए उन्हें देशप्रेम से प्रेरित बताते थे, तो किसी ने खुले रूप में स्वीकार किए जाने वाले हमलों को धर्मांधता से प्रेरित कह कर उनकी आलोचना क्यों नहीं की।

Post – 2018-02-06

कोई व्यक्ति मेरे ही लिखे को मेरे पेज पर अपने नाम के साथ टैग करता है तो क्या मुझे उसे अमित्र करना चाहिए या नहीं? कृपया शेयर करें, टैग नहीं। शेयर भी कुछ विलंब से, संपादन के बाद। मैं प्रशंसा के लिए नहीं, संवाद के लिए फेसबुक पर पोस्ट करता हूं जिससे दूसरा पक्ष भी सामने आए और मुझे भी अपनी त्रुटियां पता चलें। टिप्पणी में निर्मम रहें।

Post – 2018-02-06

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Post – 2018-02-06

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Post – 2018-02-06

इतिहास का अन्त!

अमेरिकी समाजशास्त्री, राजविद और अर्थशास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा ने १९९२ में अपनी पुस्तक The end of History and the last man में यह प्रतिपादित करके लोगों को चौंका दिया कि ‘सारी दुनिया में उदार लोकतंत्रों की स्थापना हो चुकी है, बाजार आधारित पूंजीवाद का सिक्का जम चुका है, पूरी दुनिया ने पाश्चात्य जीवनशैली अपना ली है, इसिलए मानव विकास अपनी पूर्णता पर पहुंच गया है । अब न तो आगे मनुष्य के विकास की संभावना है, नट समाज व्यवस्था में कोई परिवर्तन संभव है, न ही अर्थव्यवस्था में। जाहिर है इतिहास का अन्त हो चुका है।’ इससे भी अधिक जाहिर यह है कि यह सोवियत संघ के विघटन के बाद ‘विश्व विजय करके दिखलायें, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा’ से प्रेरित अमेरिमी महत्वाकांक्षा का प्रचार वाक्य था, जिसे फुकुयामा ने पहले हंटिंग्टन की तरह एक लेख के रूप में लिखा था, और फिर १९९२ में पुस्तकाकार प्रकाशित किया था। इसे असाधारण प्रचार तो मिलना ही था। हिन्दी के आलोचक ‘सबसे पहले मैं’ की होड़ में ऐसे प्रचार की नीयत और नियति को समझे बिना इस पर टूट पड़ते हैं, और कुछ समय तक यही राग दरबारी राग बना रहता है, सो इसके साथ भी ऐसा हुआ।

सामान्यत: भारतीय मार्क्सवादी लेखक ऐसे लेखन को सीआईए की साजिश मान कर पढ़ते ही नहीं (सक्रिय राजनीति को सारा समय देने के कारण पढ़ते वैसे भी कम हैं), पर एक मोटा अंदाज लगा लेते हैं कि इसमें क्या लिखा गया होगा, और गाहे-ब-गाहे लिखते-बोलते समय उसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं। यह पहला अवसर था कि वे यह तक भूल गए कि, जैसा नाम से ही प्रकट था, यह मार्क्सवाद के, और पूंजीवाद के बाद के अवश्यंभावी चरण, साम्यवाद, के खंडन में लिखी गई, एक मूर्खतापूर्ण स्थापना है, उन्होंने इसे अपने ढंग से समझा ही नहीं, जो कुछ समझ में आया उसे दृढ़ता से लागू करने पर आ गए।

उन्होंने प्रचारित करना आरंभ किया कि उन्होंने भारत का जैसा इतिहास लिखा है उसके साथ इतिहासलेखन का अन्त हो गया है, और अब उसकी गलतियां निकालने का और उससे भिन्न इतिहास लेखन का काम बन्द हो जाना चाहिए। यदि हुआ तो उसे संशोधनवाद माना जाएगा, और ऐसा पर्यावरण तैयार करना आरंभ किया कि कोई ऐसी पुस्तक को पढ़ने न पाए।

कायिक हिंसा के लेकर वाचिक हिंसा में अटल विश्वास के कारण, कम्युनिस्ट गालियों को विचारो से अधिक ऊंचा स्थान देते हैं, यह तो सबको पता है, पर जिन्हें यह भ्रम है कि वे केवल गन्दी गालियां ही देना जानते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि संशोधनवाद कम्युनिस्ट गालीकोश का ऐसा शव्द है जिसे शिष्ट गालियों में ही रखा जा सकता है।

इसलिए उनके इस अभियान को मैं सही मानता था, यद्यपि यही इस बात का भी प्रमाण था कि उनका लिखा इतिहास वैज्ञानिता की ढोल तो पीटता था, पर वैज्ञानिक नहीं था।

हैरानी इस बात पर हुई कि जब इसका भी असर नहीं हुआ तो एक नया अभियान चलाया गया कि इतिहास का अन्त हुआ हो या नहीं, पर इतिहास के ज्ञान का अंत हो चुका है क्योंकि इतिहास का ज्ञान वर्तमान की समझ में बाधक है। इतिहास की चिन्ता वर्तमान से पलायन है। इतिहास से अधिक उर्वर पुराण और मिथक हैं क्यकोंकि इनमें मनचाही तोड़ मरोड़ की अनंत संभावनाएॆ हैं। इतिहास में जो लिखा जाना था वह लिखा जा चुका है, यहां तक कि जो पढ़ा जाना था वह पढ़ा भी जा चुका है, इसलिए अब उसे भुला दिया जाना चाहिए। इसके समर्थन में जो बोलना जानता था वह बोलने लगा, जो कविता लिख सकता था कविता लिखने लगा, यहां तक कि जो सिर्फ सर हिलाना जानता था वह ‘हां भइ हां’ करने लगा। अजीब तर्क दिए जाने लगे: नाव नदी पार कराने के लिए है। समझदार आदमी नदी पार करने के बाद नाव को छोड़ कर आगे बढ़ जाता है, मूर्ख नाव को कन्धे पर लाद लेते हैं।

मैं, सच कहें तो, ऐसे वज्र मूर्खों में हूं जो यह तक नहीं समझ पाते कि इतिहास किसी खास वैतरणी को पार करने के लिए भाड़े की नौका है और उसे पार करने के लिए ही उसकी जरूरत होती है। पानी में इतिहास हमारा बोझ उठाता है और पार होने के बाद यदि उसे साथ रखा तो वह हमारे ऊपर भार बन जाएगा। मुझे यह भ्रम था और है कि इतिहास अतीत के संगत अनुभवों का क्रमबद्ध ज्ञान है, जो बीते को बदलना तो दूर किसी चीज को टस से मस नहीं कर सकता, पर वर्तमान को समझने और बदलने में सहायक हो सकता है, इसलिए इससे भागने वाले वे गैरजिम्मेदार और अहंकारी लोग होते हैं जिन्होंने अतीत को समझने की जगह तोड़फोड़ की, और वर्तमान में भी केवल तोड़फोड़ ही करना चाहते हैं।

फिर भी मैंने प्रयत्न करके यह समझना चाहा कि वे नौका का उपयोग किस नदी को पार करने के लिए करना चाहते थे? जिस नौका से पार करना चाहते थे, उसे किसने बनाया था? कौन चला रहा था? कि वे उसमें चुपचाप बैठ ही नहीं गए थे, हांक लगाकर दूसरों को भी बुला रहे थे कि इस नौका पर सवार हो जाओ नहीं तो डूब जाओगे। अच्छे नंबर लाना और अच्छी श्रेणी लानी हो तो इतिहास जरूर लो। अच्छी नौकरी पानी हो तो इतिहास से बच कर कहां जाओगे? और इससे आसान विषय कहां पाओगे? जानने को कुछ नहीं है, हमने जो हाई स्कूल के बच्चों के लिए लिख दिया, उसे मानने से ही काम चल जाएगा, सीसीएस (सेंट्रल सिविल सर्विस) से लेकर पीसीएस तक, प्रेप से लेकर मेन और अन्तरव्यूह तक।

इनका जोर ज्ञान पर नहीं इतिहास के मलबे को लाद कर पार उतरने और उतारने पर था।

इतिहास बीत कर भी व्यर्थ नहीं होता, गुजर जाने के बाद भी बहुत कुछ बनाकर अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है, जिसमें कुछ सड़ और बुस भी जाती हैं और उन्हे फेंका न जाय तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाय।

मार्क्स के प्रस्तावों और विचारों में भी कुछ ऐसा है जो त्याज्य है, जैसे हिंसा, क्योंकि परमाणु युग में हिंसा के सहारे यांत्रिक साम्यवाद तक का सार्वभौम विस्तार नहीं हो सकता, या जैसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले कल कारखाने। या जैसे क्रान्ति की हड़बड़ी, क्योंकि पूंजीवाद के सार्वभौम विस्तार से पहले अभाव और भुखमरी की स्थितियां पैदा करने के बाद भी पूंजीवाद संकट में नहीं आ सकता। जब तक कुछ देश उत्पादक हैं शेष उनके बाजार, तब तक वह अमानवीय तरीके अपना कर भी अपने को, सामरिक तैयारी के बल पर बचा लेगा। परन्तु जिस दिन बाजार स्वयं भी उत्पादक बन जाएगा, उस दिन न अपने घर को छोड़ उसे बाजार मिलेगा, न उन्हें जिनका बाजार वह पहले बना हुआ था। अपने समस्त खुराफात के बाद भी वह इसे झेल नहीं पाएगा। यह होगा उसका आत्मध्वंस। यह होगा लघु उद्योगों से अपनी जरूरतों के लिए उत्पादन जिससे न फालतू उत्पादन होगा न आदमी फालतू होंगे। गांधीवादी मार्क्सवाद का दौर मानवता का एकमात्र विकल्प हैं, जिसकी आकांक्षा मार्क्स में थी पर उपाय गांधी ने अपनी ग्राम्य और पुरातन संस्कृति से आविष्कृत किया। बिरादरी पंचायतों वाला असहयोग भी आंदोलन का रूप ले सकता है, यह केवल गांधी की सूझ थी। इतिहास अपने को जिन्दा रखने के लिए अकल्पनीय परिवर्तन करता रहता है।

Post – 2018-02-06

इतिहास का अन्त!

अमेरिकी समाजशास्त्री, राजविद और अर्थशास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा ने १९९२ में अपनी पुस्तक The end of History and the last man में यह प्रतिपादित करके लोगों को चौंका दिया कि ‘सारी दुनिया में उदार लोकतंत्रों की स्थापना हो चुकी है, बाजार आधारित पूंजीवाद का सिक्का जम चुका है, पूरी दुनिया ने पाश्चात्य जीवनशैली अपना ली है, इसिलए मानव विकास अपनी पूर्णता पर पहुंच गया है । अब न तो आगे मनुष्य के विकास की संभावना है, नट समाज व्यवस्था में कोई परिवर्तन संभव है, न ही अर्थव्यवस्था में। जाहिर है इतिहास का अन्त हो चुका है।’ इससे भी अधिक जाहिर यह है कि यह सोवियत संघ के विघटन के बाद ‘विश्व विजय करके दिखलायें, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा’ से प्रेरित अमेरिमी महत्वाकांक्षा का प्रचार वाक्य था, जिसे फुकुयामा ने पहले हंटिंग्टन की तरह एक लेख के रूप में लिखा था, और फिर १९९२ में पुस्तकाकार प्रकाशित किया था। इसे असाधारण प्रचार तो मिलना ही था। हिन्दी के आलोचक ‘सबसे पहले मैं’ की होड़ में ऐसे प्रचार की नीयत और नियति को समझे बिना इस पर टूट पड़ते हैं, और कुछ समय तक यही राग दरबारी राग बना रहता है, सो इसके साथ भी ऐसा हुआ।

सामान्यत: भारतीय मार्क्सवादी लेखक ऐसे लेखन को सीआईए की साजिश मान कर पढ़ते ही नहीं (सक्रिय राजनीति को सारा समय देने के कारण पढ़ते वैसे भी कम हैं), पर एक मोटा अंदाज लगा लेते हैं कि इसमें क्या लिखा गया होगा, और गाहे-ब-गाहे लिखते-बोलते समय उसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं। यह पहला अवसर था कि वे यह तक भूल गए कि, जैसा नाम से ही प्रकट था, यह मार्क्सवाद के, और पूंजीवाद के बाद के अवश्यंभावी चरण, साम्यवाद, के खंडन में लिखी गई, एक मूर्खतापूर्ण स्थापना है, उन्होंने इसे अपने ढंग से समझा ही नहीं, जो कुछ समझ में आया उसे दृढ़ता से लागू करने पर आ गए।

उन्होंने प्रचारित करना आरंभ किया कि उन्होंने भारत का जैसा इतिहास लिखा है उसके साथ इतिहासलेखन का अन्त हो गया है, और अब उसकी गलतियां निकालने का और उससे भिन्न इतिहास लेखन का काम बन्द हो जाना चाहिए। यदि हुआ तो उसे संशोधनवाद माना जाएगा, और ऐसा पर्यावरण तैयार करना आरंभ किया कि कोई ऐसी पुस्तक को पढ़ने न पाए।

कायिक हिंसा के लेकर वाचिक हिंसा में अटल विश्वास के कारण, कम्युनिस्ट गालियों को विचारो से अधिक ऊंचा स्थान देते हैं, यह तो सबको पता है, पर जिन्हें यह भ्रम है कि वे केवल गन्दी गालियां ही देना जानते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि संशोधनवाद कम्युनिस्ट गालीकोश का ऐसा शव्द है जिसे शिष्ट गालियों में ही रखा जा सकता है।

इसलिए उनके इस अभियान को मैं सही मानता था, यद्यपि यही इस बात का भी प्रमाण था कि उनका लिखा इतिहास वैज्ञानिता की ढोल तो पीटता था, पर वैज्ञानिक नहीं था।

हैरानी इस बात पर हुई कि जब इसका भी असर नहीं हुआ तो एक नया अभियान चलाया गया कि इतिहास का अन्त हुआ हो या नहीं, पर इतिहास के ज्ञान का अंत हो चुका है क्योंकि इतिहास का ज्ञान वर्तमान की समझ में बाधक है। इतिहास की चिन्ता वर्तमान से पलायन है। इतिहास से अधिक उर्वर पुराण और मिथक हैं क्यकोंकि इनमें मनचाही तोड़ मरोड़ की अनंत संभावनाएॆ हैं। इतिहास में जो लिखा जाना था वह लिखा जा चुका है, यहां तक कि जो पढ़ा जाना था वह पढ़ा भी जा चुका है, इसलिए अब उसे भुला दिया जाना चाहिए। इसके समर्थन में जो बोलना जानता था वह बोलने लगा, जो कविता लिख सकता था कविता लिखने लगा, यहां तक कि जो सिर्फ सर हिलाना जानता था वह ‘हां भइ हां’ करने लगा। अजीब तर्क दिए जाने लगे: नाव नदी पार कराने के लिए है। समझदार आदमी नदी पार करने के बाद नाव को छोड़ कर आगे बढ़ जाता है, मूर्ख नाव को कन्धे पर लाद लेते हैं।

मैं, सच कहें तो, ऐसे वज्र मूर्खों में हूं जो यह तक नहीं समझ पाते कि इतिहास किसी खास वैतरणी को पार करने के लिए भाड़े की नौका है और उसे पार करने के लिए ही उसकी जरूरत होती है। पानी में इतिहास हमारा बोझ उठाता है और पार होने के बाद यदि उसे साथ रखा तो वह हमारे ऊपर भार बन जाएगा। मुझे यह भ्रम था और है कि इतिहास अतीत के संगत अनुभवों का क्रमबद्ध ज्ञान है, जो बीते को बदलना तो दूर किसी चीज को टस से मस नहीं कर सकता, पर वर्तमान को समझने और बदलने में सहायक हो सकता है, इसलिए इससे भागने वाले वे गैरजिम्मेदार और अहंकारी लोग होते हैं जिन्होंने अतीत को समझने की जगह तोड़फोड़ की, और वर्तमान में भी केवल तोड़फोड़ ही करना चाहते हैं।

फिर भी मैंने प्रयत्न करके यह समझना चाहा कि वे नौका का उपयोग किस नदी को पार करने के लिए करना चाहते थे? जिस नौका से पार करना चाहते थे, उसे किसने बनाया था? कौन चला रहा था? कि वे उसमें चुपचाप बैठ ही नहीं गए थे, हांक लगाकर दूसरों को भी बुला रहे थे कि इस नौका पर सवार हो जाओ नहीं तो डूब जाओगे। अच्छे नंबर लाना और अच्छी श्रेणी लानी हो तो इतिहास जरूर लो। अच्छी नौकरी पानी हो तो इतिहास से बच कर कहां जाओगे? और इससे आसान विषय कहां पाओगे? जानने को कुछ नहीं है, हमने जो हाई स्कूल के बच्चों के लिए लिख दिया, उसे मानने से ही काम चल जाएगा, सीसीएस (सेंट्रल सिविल सर्विस) से लेकर पीसीएस तक, प्रेप से लेकर मेन और अन्तरव्यूह तक।

इनका जोर ज्ञान पर नहीं इतिहास के मलबे को लाद कर पार उतरने और उतारने पर था।

इतिहास बीत कर भी व्यर्थ नहीं होता, गुजर जाने के बाद भी बहुत कुछ बनाकर अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है, जिसमें कुछ सड़ और बुस भी जाती हैं और उन्हे फेंका न जाय तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाय।

मार्क्स के प्रस्तावों और विचारों में भी कुछ ऐसा है जो त्याज्य है, जैसे हिंसा, क्योंकि परमाणु युग में हिंसा के सहारे यांत्रिक साम्यवाद तक का सार्वभौम विस्तार नहीं हो सकता, या जैसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले कल कारखाने। या जैसे क्रान्ति की हड़बड़ी, क्योंकि पूंजीवाद के सार्वभौम विस्तार से पहले अभाव और भुखमरी की स्थितियां पैदा करने के बाद भी पूंजीवाद संकट में नहीं आ सकता। जब तक कुछ देश उत्पादक हैं शेष उनके बाजार, तब तक वह अमानवीय तरीके अपना कर भी अपने को, सामरिक तैयारी के बल पर बचा लेगा। परन्तु जिस दिन बाजार स्वयं भी उत्पादक बन जाएगा, उस दिन न अपने घर को छोड़ उसे बाजार मिलेगा, न उन्हें जिनका बाजार वह पहले बना हुआ था। अपने समस्त खुराफात के बाद भी वह इसे झेल नहीं पाएगा। यह होगा उसका आत्मध्वंस। यह होगा लघु उद्योगों से अपनी जरूरतों के लिए उत्पादन जिससे न फालतू उत्पादन होगा न आदमी फालतू होंगे। गांधीवादी मार्क्सवाद का दौर मानवता का एकमात्र विकल्प हैं, जिसकी आकांक्षा मार्क्स में थी पर उपाय गांधी ने अपनी ग्राम्य और पुरातन संस्कृति से आविष्कृत किया। बिरादरी पंचायतों वाला असहयोग भी आंदोलन का रूप ले सकता है, यह केवल गांधी की सूझ थी। इतिहास अपने को जिन्दा रखने के लिए अकल्पनीय परिवर्तन करता रहता है।

Post – 2018-02-06

इतिहास का अन्त!

अमेरिकी समाजशास्त्री, राजविद और अर्थशास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा ने १९९२ में अपनी पुस्तक The end of History and the last man में यह प्रतिपादित करके लोगों को चौंका दिया कि ‘सारी दुनिया में उदार लोकतंत्रों की स्थापना हो चुकी है, बाजार आधारित पूंजीवाद का सिक्का जम चुका है, पूरी दुनिया ने पाश्चात्य जीवनशैली अपना ली है, इसिलए मानव विकास अपनी पूर्णता पर पहुंच गया है । अब न तो आगे मनुष्य के विकास की संभावना है, नट समाज व्यवस्था में कोई परिवर्तन संभव है, न ही अर्थव्यवस्था में। जाहिर है इतिहास का अन्त हो चुका है।’ इससे भी अधिक जाहिर यह है कि यह सोवियत संघ के विघटन के बाद ‘विश्व विजय करके दिखलायें, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा’ से प्रेरित अमेरिमी महत्वाकांक्षा का प्रचार वाक्य था, जिसे फुकुयामा ने पहले हंटिंग्टन की तरह एक लेख के रूप में लिखा था, और फिर १९९२ में पुस्तकाकार प्रकाशित किया था। इसे असाधारण प्रचार तो मिलना ही था। हिन्दी के आलोचक ‘सबसे पहले मैं’ की होड़ में ऐसे प्रचार की नीयत और नियति को समझे बिना इस पर टूट पड़ते हैं, और कुछ समय तक यही राग दरबारी राग बना रहता है, सो इसके साथ भी ऐसा हुआ।

सामान्यत: भारतीय मार्क्सवादी लेखक ऐसे लेखन को सीआईए की साजिश मान कर पढ़ते ही नहीं (सक्रिय राजनीति को सारा समय देने के कारण पढ़ते वैसे भी कम हैं), पर एक मोटा अंदाज लगा लेते हैं कि इसमें क्या लिखा गया होगा, और गाहे-ब-गाहे लिखते-बोलते समय उसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं। यह पहला अवसर था कि वे यह तक भूल गए कि, जैसा नाम से ही प्रकट था, यह मार्क्सवाद के, और पूंजीवाद के बाद के अवश्यंभावी चरण, साम्यवाद, के खंडन में लिखी गई, एक मूर्खतापूर्ण स्थापना है, उन्होंने इसे अपने ढंग से समझा ही नहीं, जो कुछ समझ में आया उसे दृढ़ता से लागू करने पर आ गए।

उन्होंने प्रचारित करना आरंभ किया कि उन्होंने भारत का जैसा इतिहास लिखा है उसके साथ इतिहासलेखन का अन्त हो गया है, और अब उसकी गलतियां निकालने का और उससे भिन्न इतिहास लेखन का काम बन्द हो जाना चाहिए। यदि हुआ तो उसे संशोधनवाद माना जाएगा, और ऐसा पर्यावरण तैयार करना आरंभ किया कि कोई ऐसी पुस्तक को पढ़ने न पाए।

कायिक हिंसा के लेकर वाचिक हिंसा में अटल विश्वास के कारण, कम्युनिस्ट गालियों को विचारो से अधिक ऊंचा स्थान देते हैं, यह तो सबको पता है, पर जिन्हें यह भ्रम है कि वे केवल गन्दी गालियां ही देना जानते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि संशोधनवाद कम्युनिस्ट गालीकोश का ऐसा शव्द है जिसे शिष्ट गालियों में ही रखा जा सकता है।

इसलिए उनके इस अभियान को मैं सही मानता था, यद्यपि यही इस बात का भी प्रमाण था कि उनका लिखा इतिहास वैज्ञानिता की ढोल तो पीटता था, पर वैज्ञानिक नहीं था।

हैरानी इस बात पर हुई कि जब इसका भी असर नहीं हुआ तो एक नया अभियान चलाया गया कि इतिहास का अन्त हुआ हो या नहीं, पर इतिहास के ज्ञान का अंत हो चुका है क्योंकि इतिहास का ज्ञान वर्तमान की समझ में बाधक है। इतिहास की चिन्ता वर्तमान से पलायन है। इतिहास से अधिक उर्वर पुराण और मिथक हैं क्यकोंकि इनमें मनचाही तोड़ मरोड़ की अनंत संभावनाएॆ हैं। इतिहास में जो लिखा जाना था वह लिखा जा चुका है, यहां तक कि जो पढ़ा जाना था वह पढ़ा भी जा चुका है, इसलिए अब उसे भुला दिया जाना चाहिए। इसके समर्थन में जो बोलना जानता था वह बोलने लगा, जो कविता लिख सकता था कविता लिखने लगा, यहां तक कि जो सिर्फ सर हिलाना जानता था वह ‘हां भइ हां’ करने लगा। अजीब तर्क दिए जाने लगे: नाव नदी पार कराने के लिए है। समझदार आदमी नदी पार करने के बाद नाव को छोड़ कर आगे बढ़ जाता है, मूर्ख नाव को कन्धे पर लाद लेते हैं।

मैं, सच कहें तो, ऐसे वज्र मूर्खों में हूं जो यह तक नहीं समझ पाते कि इतिहास किसी खास वैतरणी को पार करने के लिए भाड़े की नौका है और उसे पार करने के लिए ही उसकी जरूरत होती है। पानी में इतिहास हमारा बोझ उठाता है और पार होने के बाद यदि उसे साथ रखा तो वह हमारे ऊपर भार बन जाएगा। मुझे यह भ्रम था और है कि इतिहास अतीत के संगत अनुभवों का क्रमबद्ध ज्ञान है, जो बीते को बदलना तो दूर किसी चीज को टस से मस नहीं कर सकता, पर वर्तमान को समझने और बदलने में सहायक हो सकता है, इसलिए इससे भागने वाले वे गैरजिम्मेदार और अहंकारी लोग होते हैं जिन्होंने अतीत को समझने की जगह तोड़फोड़ की, और वर्तमान में भी केवल तोड़फोड़ ही करना चाहते हैं।

फिर भी मैंने प्रयत्न करके यह समझना चाहा कि वे नौका का उपयोग किस नदी को पार करने के लिए करना चाहते थे? जिस नौका से पार करना चाहते थे, उसे किसने बनाया था? कौन चला रहा था? कि वे उसमें चुपचाप बैठ ही नहीं गए थे, हांक लगाकर दूसरों को भी बुला रहे थे कि इस नौका पर सवार हो जाओ नहीं तो डूब जाओगे। अच्छे नंबर लाना और अच्छी श्रेणी लानी हो तो इतिहास जरूर लो। अच्छी नौकरी पानी हो तो इतिहास से बच कर कहां जाओगे? और इससे आसान विषय कहां पाओगे? जानने को कुछ नहीं है, हमने जो हाई स्कूल के बच्चों के लिए लिख दिया, उसे मानने से ही काम चल जाएगा, सीसीएस (सेंट्रल सिविल सर्विस) से लेकर पीसीएस तक, प्रेप से लेकर मेन और अन्तरव्यूह तक।

इनका जोर ज्ञान पर नहीं इतिहास के मलबे को लाद कर पार उतरने और उतारने पर था।

इतिहास बीत कर भी व्यर्थ नहीं होता, गुजर जाने के बाद भी बहुत कुछ बनाकर अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है, जिसमें कुछ सड़ और बुस भी जाती हैं और उन्हे फेंका न जाय तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाय।

मार्क्स के प्रस्तावों और विचारों में भी कुछ ऐसा है जो त्याज्य है, जैसे हिंसा, क्योंकि परमाणु युग में हिंसा के सहारे यांत्रिक साम्यवाद तक का सार्वभौम विस्तार नहीं हो सकता, या जैसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले कल कारखाने। या जैसे क्रान्ति की हड़बड़ी, क्योंकि पूंजीवाद के सार्वभौम विस्तार से पहले अभाव और भुखमरी की स्थितियां पैदा करने के बाद भी पूंजीवाद संकट में नहीं आ सकता। जब तक कुछ देश उत्पादक हैं शेष उनके बाजार, तब तक वह अमानवीय तरीके अपना कर भी अपने को, सामरिक तैयारी के बल पर बचा लेगा। परन्तु जिस दिन बाजार स्वयं भी उत्पादक बन जाएगा, उस दिन न अपने घर को छोड़ उसे बाजार मिलेगा, न उन्हें जिनका बाजार वह पहले बना हुआ था। अपने समस्त खुराफात के बाद भी वह इसे झेल नहीं पाएगा। यह होगा उसका आत्मध्वंस। यह होगा लघु उद्योगों से अपनी जरूरतों के लिए उत्पादन जिससे न फालतू उत्पादन होगा न आदमी फालतू होंगे। गांधीवादी मार्क्सवाद का दौर मानवता का एकमात्र विकल्प हैं, जिसकी आकांक्षा मार्क्स में थी पर उपाय गांधी ने अपनी ग्राम्य और पुरातन संस्कृति से आविष्कृत किया। बिरादरी पंचायतों वाला असहयोग भी आंदोलन का रूप ले सकता है, यह केवल गांधी की सूझ थी। इतिहास अपने को जिन्दा रखने के लिए अकल्पनीय परिवर्तन करता रहता है।