Post – 2018-02-14

भारतीय समाज

हमारी समस्याओं का जवाब किसी किताब में नहीं लिखा है, उनसे कुछ दृष्टियों से मिलती-जुलती समस्याओं के जवाब अवश्य किताबों में मिल जाएंगे। जरूरी नहीं कि वे सही हों या पूरे हों। हमारी समस्याएं, दूसरों से भिन्न होती हैं, और इनका समाधान हमें ही ढूंढ़ना होता है। जरूरी नहीं कि जो समाधान हम तलाशें वे सही हों, या उनके परिणाम हमारी अपेक्षा के अनुरूप हों।

इतिहास में समाधान केवल समझ के स्तर पर होता है। गुत्थियों के सलझने के रूप में। अंधेरे में रौशनी पड़ने की तरह। इसका आरंभ छूटी हुई कड़ियों की तलाश या उपलब्ध समाधानों के बेतुकेपन की पहचान और इस जिज्ञासा से होता है कि क्या ऐसा हुआ हो सकता है? यदि नहीं तो क्या रहा हो सकता है? या जो बेतुका लगते हुए भी वास्तविकता है वह किन परिस्थितियों में संभव हुआ हो सकता है?

हमारा प्रश्न यह है कि यदि आर्य विरुद वाला समुदाय इतना डरा हुआ था, तो सभी प्रकार की संपदाओं पर उन्होंने ऐसा अधिकार कैसे कर लिया कि अपने से ताकतवर वर्ण को भी अपना उपजीवी बना कर रख सकें, या अपने से अधिक चालाक लोगों को अपना आश्रित बना कर रख सकें? इससे भी रोचक यह कि जो उसके आश्रित या उपजीवी हैं, वे सामाजिक हैसियत में उसे अपने से नीचा समझें और उसे स्वयं भी इस पर आपत्ति न हो । इन प्रश्नों से गुजरे बिना हम भारतीय समाज-रचना की जटिलता को नहीं समझ सकते, न वर्ण व्यवस्था कि उस अतिजीविता को समझ सकते हैं जो धर्म बदलने के बाद भी चेतना में बनी रहती है।

इस विषय में हमें सबसे महत्वपूर्ण सूचना पुरावृत्तों से मिलती है जो पुराणों के अतिरिक्त दूसरे प्राचीन ग्रन्थों में मिलते हैं। यह दुखद है कि पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा इतिहास के नाम पर किए जा रहे अनर्थ को सबसे कड़ी चुनौता इन पुरावृत्तों से मिलती है इसलिए इनकी विश्वसनीयता को नष्ट करके इन्हें निष्प्रभाव कर दिया गया।

पर पौराणिक इतिवृत्त को मैं यदि पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा लिखे या उनके अनुकरण में लिखे गए भारतीय इतिहास से अधिक भरोसे का मानता हूं तो इसलिए नहीं कि कालांकित और तथ्यपरक इतिहास से मुझे चिढ़ है, बल्कि इसलिए कि इसकी आड़ में कुत्सित राजनीति की जाती रही है और ध्यान शासकों पर अधिक रहा, समाज को ओझल कर दिया गया और ऊपर से एक और सीमा यह भी कि इसकी परिधि में हमारे अतीत का एक लघु काल-प्रसार ही आ पाता है।

पुराण इतिहास नहीं हैं परंतु उसका प्रसार इतना लंबा हि यह अपनी कल्पना में प्रथम मानव तक पहुंच जाता है, मोटे तौर पर यह वहां तक के जातीय अनुभव का एकमात्र स्रोत है जहां से लेखन का उपयोग सामान्य कामकाज में होने लगता है, और लिखित सामग्री इतिहास लेखन का स्रोत बन जाती है।

यह सच है कि इनमें अतिरंजना और मुक्त कल्पनाशीलता से अधिक काम लिया गया है, फिर भी वह बिना किसी आयास के पकड़ में आ जाती है, इसलिए उससे कोई हानि नहीं होती। इसका यथालिखित पाठ भटकानेवाला जरूर है, पर कथा का नाभिकीय सत्य अकाट्य है। उससे किसी राजा महाराजा के जीवन और कृतित्व पर प्रकाश नहीं पड़ता, अपितु समाज किन अनुभवों हे गुजरा है, इस पर प्रकाश पड़ता है।

पुराणों में लिंग और वर्ण के पूर्वाग्रह उस तरह काम नहीं करते जैसे स्मृतियों में और अपर पक्ष के सद्गुणों का उल्लेख तो किया ही गया है अपनी कमियों पर भी उंगली उठाई गई है, इसलिए इनमें अपेक्षाकृत अधिक वस्तुपरकता पाई जाती है।

भारतीय समाज की निर्मिति में कितनी जातीयताओं का योगदान है, इसका ठीक ठीक अनुमान हम नहीं लगा सकते। स्पष्ट कर दें कि यहां मैं जातीयता का प्रयोग भाषाई समुदाय के लिए कर रहा हूं। जिस चरण पर इनका जमाव उस भौगोलिक क्षेत्र के किसी न किसी अंचल में हुआ जिसके लिए आज दक्षिण एशिया का प्रयोग होता है, इनकी संख्या क्या थी, यह हम नहीं तय कर सकते, परन्तु इतना निश्चय के साथ कह सकते हैं कि यह संख्या तीन या चार नहीं थी, न ही भारत में आज व्यवहार में आने वाली बोलियों के कोई आद्य रूप थे जिनके ह्रास से वे बोलियां पैदा हुईं, जिनको विशेष परिवारों में बांट कर रखा गया है।

तुलनात्मक भाषाविज्ञान राजनीति का रौरव नरक और प्रकांड पंडितों की नासमझी का अखाड़ा है जिन्हें केवल एक जिद ने कि वे अपने अध्यवसाय और बुद्धिबल से यह सिद्ध करके दिखा देंगे कि समस्त ज्ञान विज्ञान यूरोप से पूरे एशिया में फैला है, उन्हे कूड़े की देदीप्यमान ढेरियों में बदल दिया। अमूल्य सूचनाओं के भंडार, पर व्यर्थ।

इतने प्रकांड विद्वानों के प्रति जिनका शिष्य होना तक मुझ जैसे अगण्य के लिए सौभाग्य की बात हो, इतनी कठोर टिप्पणी करने का दुस्साहस मैं इसलिए कर बैठा क्योंकि वे अपने ही प्रतिपादित सिद्धांत से उल्टा काम कर रहे थे कि मानक भाषाएं अनेकानेक बोलियों में से किसी एक के किन्हीं कारणों से प्रमुखता पाने के कारण क्रमिक उत्थान से अस्तित्व में आती हैं, न कि बोलियां किसी मानक भाषा के क्षरण से पैदा होती हैं।

अब यदि हम तथाकथित आर्य भाषाओं/ बोलियों में किसी एक ही वस्तु के लिए, मिसाल के लिए पांव के लिए प्रयुक्त – पांव/पद/पैर, गोड़/गड/डग, लात, *लग/लंग (हिं लंगी लगाना, लंगड़ा, अं. लेग) – पर्यायों पर ध्यान दें तो ही समझ सकते हैं कि प्रत्येक बोली के गठन में कितनी जातीयताओं का हाथ है। इसमें एक ही शब्द के जो रूपभेद हैं उनके पीछे भी इतर भाषाई प्रभाव है।

आहार संग्रह के चरण पर इनके जत्थे जगह जगह अपने से भिन्न भाषाई समुदाय के बीच पहुंच चुके थे और इस तरह सबमें बहुतेरे मिले हुए थे, इसकी क्षीण चेतना हमारी परंपरा में मिलती है। यहां नस्ली भेद की जगह सभी एक ही प्रजापति की संतानें हैं। प्रजापति के अनेकानेक अर्थ लिए गए हैं जिसके अनुसार प्राकृतिक परिवेश भी प्रजापति है – जो प्रजा का पालन करता है वह प्रजापति। जिनसे दुश्मनी है वे भी अपने ही सौतेले भाई या सपत्न हैं। पिता एक, माताएं भिन्न। अन्तर मान्यताओं का, न कि रक्त का। एक देव, तो दूसरा दनुज/दानव। दनुज क्यों, क्योंकि इनका धर्म था आदिम अवस्था का मिल बांट कर खाना, जो अपने पास है दूसरे के मांगने या उसके पास न होने की दशा में मुक्त भाव से देना।

दानवों की कहानियां दानशीलता की कहानियां हैं, देवों की कहानियां छल क्षद्म से अपहरण और विश्वासघात की कहानियां। इस सवाल को लेकर जो कथाएं रची गई हैं उनके झमेले पड़े बिना हम कह सकते हैं कि पौराणिक इतिहास की सही समझ हमारे सामाजिक सौहार्द की नींव बन सकती है। यहां देव परंपरा या जिसे कुछ लोग हड़बड़ी और दिमाग की गड़बड़ी में ब्राह्मणवादी परंपरा कह सकते हैं, उसमें ज्ञान के मामले में देवगुरु बृहस्पति से कम सम्मान असुरगुरु शुक्राचार्य का नहीं है।

अब इस सर्वविदित पृष्ठभूमि को समझ लेने के बाद हमारे लिए आगे के विकास और टकराव को समझने में आसानी होगी।

Post – 2018-02-14

भारतीय समाज

हमारी समस्याओं का जवाब किसी किताब में नहीं लिखा है, उनसे कुछ दृष्टियों से मिलती-जुलती समस्याओं के जवाब अवश्य किताबों में मिल जाएंगे। जरूरी नहीं कि वे सही हों या पूरे हों। हमारी समस्याएं, दूसरों से भिन्न होती हैं, और इनका समाधान हमें ही ढूंढ़ना होता है। जरूरी नहीं कि जो समाधान हम तलाशें वे सही हों, या उनके परिणाम हमारी अपेक्षा के अनुरूप हों।

इतिहास में समाधान केवल समझ के स्तर पर होता है। गुत्थियों के सलझने के रूप में। अंधेरे में रौशनी पड़ने की तरह। इसका आरंभ छूटी हुई कड़ियों की तलाश या उपलब्ध समाधानों के बेतुकेपन की पहचान और इस जिज्ञासा से होता है कि क्या ऐसा हुआ हो सकता है? यदि नहीं तो क्या रहा हो सकता है? या जो बेतुका लगते हुए भी वास्तविकता है वह किन परिस्थितियों में संभव हुआ हो सकता है?

हमारा प्रश्न यह है कि यदि आर्य विरुद वाला समुदाय इतना डरा हुआ था, तो सभी प्रकार की संपदाओं पर उन्होंने ऐसा अधिकार कैसे कर लिया कि अपने से ताकतवर वर्ण को भी अपना उपजीवी बना कर रख सकें, या अपने से अधिक चालाक लोगों को अपना आश्रित बना कर रख सकें? इससे भी रोचक यह कि जो उसके आश्रित या उपजीवी हैं, वे सामाजिक हैसियत में उसे अपने से नीचा समझें और उसे स्वयं भी इस पर आपत्ति न हो । इन प्रश्नों से गुजरे बिना हम भारतीय समाज-रचना की जटिलता को नहीं समझ सकते, न वर्ण व्यवस्था कि उस अतिजीविता को समझ सकते हैं जो धर्म बदलने के बाद भी चेतना में बनी रहती है।

इस विषय में हमें सबसे महत्वपूर्ण सूचना पुरावृत्तों से मिलती है जो पुराणों के अतिरिक्त दूसरे प्राचीन ग्रन्थों में मिलते हैं। यह दुखद है कि पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा इतिहास के नाम पर किए जा रहे अनर्थ को सबसे कड़ी चुनौता इन पुरावृत्तों से मिलती है इसलिए इनकी विश्वसनीयता को नष्ट करके इन्हें निष्प्रभाव कर दिया गया।

पर पौराणिक इतिवृत्त को मैं यदि पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा लिखे या उनके अनुकरण में लिखे गए भारतीय इतिहास से अधिक भरोसे का मानता हूं तो इसलिए नहीं कि कालांकित और तथ्यपरक इतिहास से मुझे चिढ़ है, बल्कि इसलिए कि इसकी आड़ में कुत्सित राजनीति की जाती रही है और ध्यान शासकों पर अधिक रहा, समाज को ओझल कर दिया गया और ऊपर से एक और सीमा यह भी कि इसकी परिधि में हमारे अतीत का एक लघु काल-प्रसार ही आ पाता है।

पुराण इतिहास नहीं हैं परंतु उसका प्रसार इतना लंबा हि यह अपनी कल्पना में प्रथम मानव तक पहुंच जाता है, मोटे तौर पर यह वहां तक के जातीय अनुभव का एकमात्र स्रोत है जहां से लेखन का उपयोग सामान्य कामकाज में होने लगता है, और लिखित सामग्री इतिहास लेखन का स्रोत बन जाती है।

यह सच है कि इनमें अतिरंजना और मुक्त कल्पनाशीलता से अधिक काम लिया गया है, फिर भी वह बिना किसी आयास के पकड़ में आ जाती है, इसलिए उससे कोई हानि नहीं होती। इसका यथालिखित पाठ भटकानेवाला जरूर है, पर कथा का नाभिकीय सत्य अकाट्य है। उससे किसी राजा महाराजा के जीवन और कृतित्व पर प्रकाश नहीं पड़ता, अपितु समाज किन अनुभवों हे गुजरा है, इस पर प्रकाश पड़ता है।

पुराणों में लिंग और वर्ण के पूर्वाग्रह उस तरह काम नहीं करते जैसे स्मृतियों में और अपर पक्ष के सद्गुणों का उल्लेख तो किया ही गया है अपनी कमियों पर भी उंगली उठाई गई है, इसलिए इनमें अपेक्षाकृत अधिक वस्तुपरकता पाई जाती है।

भारतीय समाज की निर्मिति में कितनी जातीयताओं का योगदान है, इसका ठीक ठीक अनुमान हम नहीं लगा सकते। स्पष्ट कर दें कि यहां मैं जातीयता का प्रयोग भाषाई समुदाय के लिए कर रहा हूं। जिस चरण पर इनका जमाव उस भौगोलिक क्षेत्र के किसी न किसी अंचल में हुआ जिसके लिए आज दक्षिण एशिया का प्रयोग होता है, इनकी संख्या क्या थी, यह हम नहीं तय कर सकते, परन्तु इतना निश्चय के साथ कह सकते हैं कि यह संख्या तीन या चार नहीं थी, न ही भारत में आज व्यवहार में आने वाली बोलियों के कोई आद्य रूप थे जिनके ह्रास से वे बोलियां पैदा हुईं, जिनको विशेष परिवारों में बांट कर रखा गया है।

तुलनात्मक भाषाविज्ञान राजनीति का रौरव नरक और प्रकांड पंडितों की नासमझी का अखाड़ा है जिन्हें केवल एक जिद ने कि वे अपने अध्यवसाय और बुद्धिबल से यह सिद्ध करके दिखा देंगे कि समस्त ज्ञान विज्ञान यूरोप से पूरे एशिया में फैला है, उन्हे कूड़े की देदीप्यमान ढेरियों में बदल दिया। अमूल्य सूचनाओं के भंडार, पर व्यर्थ।

इतने प्रकांड विद्वानों के प्रति जिनका शिष्य होना तक मुझ जैसे अगण्य के लिए सौभाग्य की बात हो, इतनी कठोर टिप्पणी करने का दुस्साहस मैं इसलिए कर बैठा क्योंकि वे अपने ही प्रतिपादित सिद्धांत से उल्टा काम कर रहे थे कि मानक भाषाएं अनेकानेक बोलियों में से किसी एक के किन्हीं कारणों से प्रमुखता पाने के कारण क्रमिक उत्थान से अस्तित्व में आती हैं, न कि बोलियां किसी मानक भाषा के क्षरण से पैदा होती हैं।

अब यदि हम तथाकथित आर्य भाषाओं/ बोलियों में किसी एक ही वस्तु के लिए, मिसाल के लिए पांव के लिए प्रयुक्त – पांव/पद/पैर, गोड़/गड/डग, लात, *लग/लंग (हिं लंगी लगाना, लंगड़ा, अं. लेग) – पर्यायों पर ध्यान दें तो ही समझ सकते हैं कि प्रत्येक बोली के गठन में कितनी जातीयताओं का हाथ है। इसमें एक ही शब्द के जो रूपभेद हैं उनके पीछे भी इतर भाषाई प्रभाव है।

आहार संग्रह के चरण पर इनके जत्थे जगह जगह अपने से भिन्न भाषाई समुदाय के बीच पहुंच चुके थे और इस तरह सबमें बहुतेरे मिले हुए थे, इसकी क्षीण चेतना हमारी परंपरा में मिलती है। यहां नस्ली भेद की जगह सभी एक ही प्रजापति की संतानें हैं। प्रजापति के अनेकानेक अर्थ लिए गए हैं जिसके अनुसार प्राकृतिक परिवेश भी प्रजापति है – जो प्रजा का पालन करता है वह प्रजापति। जिनसे दुश्मनी है वे भी अपने ही सौतेले भाई या सपत्न हैं। पिता एक, माताएं भिन्न। अन्तर मान्यताओं का, न कि रक्त का। एक देव, तो दूसरा दनुज/दानव। दनुज क्यों, क्योंकि इनका धर्म था आदिम अवस्था का मिल बांट कर खाना, जो अपने पास है दूसरे के मांगने या उसके पास न होने की दशा में मुक्त भाव से देना।

दानवों की कहानियां दानशीलता की कहानियां हैं, देवों की कहानियां छल क्षद्म से अपहरण और विश्वासघात की कहानियां। इस सवाल को लेकर जो कथाएं रची गई हैं उनके झमेले पड़े बिना हम कह सकते हैं कि पौराणिक इतिहास की सही समझ हमारे सामाजिक सौहार्द की नींव बन सकती है। यहां देव परंपरा या जिसे कुछ लोग हड़बड़ी और दिमाग की गड़बड़ी में ब्राह्मणवादी परंपरा कह सकते हैं, उसमें ज्ञान के मामले में देवगुरु बृहस्पति से कम सम्मान असुरगुरु शुक्राचार्य का नहीं है।

अब इस सर्वविदित पृष्ठभूमि को समझ लेने के बाद हमारे लिए आगे के विकास और टकराव को समझने में आसानी होगी।

Post – 2018-02-13

इतिहास में जगह

राजेन्द्र यादव ने दलित लेखकों और महिला रचनाकारों को जितना खुला मंच दिया, वह उनसे पहले के किसी संपादक ने नही। उन्होंने इतिहास और पुराण की जितनी मुखरता से निंदा की वह भी उनके स्वभाव के अनुरूप था। उनकी पीड़ा यह थी कि यह ब्राह्मणों और क्षत्रियों की महिमागान के अतिरिक्त क्या है? इसमें हम, अर्थात् शूद्र और दलित कहां हैं? उनको एक उपन्यास बहुत क्रान्तिकारी लगा उसमें बड़े प्रभावशाली ढंग से यह चित्रित किया गया था कि कैसे वैदिक चरवाहे दिन में गोरू चराते थे और रात में गायन करते थे, और वे गान ही ऋग्वेद के सूक्त बन गए। उपन्यासकार ने दिल्ली वि.वि. में प्राचीन इतिहास के विभागाध्यक्ष रह चुके दो व्यक्तियों के नाम अपने उपन्यास की ऐतिहासिक प्रामाणिकता के लिए भी उल्लेख किये थे। यादव जी को पहली बार लगा कि शुद्ध आर्य तो यादव ही हैं ।उन्होंने मुझसे उसकी समीक्षा लिखने को कहा तो मैने समीक्षा लिख दी। समीक्षा पढ़ कर उन्हें खिन्न होना ही था। उन्होंने फोन पर कहा, भइ, तुमने तो भुस्स भर दिया। मैने सुझाया समीक्षा को लेखक के पास भेज दें और वह अपने बचाव जो कुछ कहे, समीक्षा के साथ उसे भी प्रकाशित करें। उन्होंने वैसा ही किया, पर बात नहीं बनी। उपन्यासकार इतिहासकार तो था नहीं, जहां तक याद है उसने दिल्ली के इतिहासकारों की मान्यता का हवाला दे कर अपना बचाव किया था।

इसका दुखद पक्ष यह कि यादव जी की रुचि इस रचना के साथ इतनी मुश्किल से इतिहास में पैदा हुई थी, क्योंकि पहली बार इतिहास में अपनी जगह दिखाई दी थी, वह समीक्षा के साथ ही लुप्त हो गई।

हमने इसकी चर्चा इसलिए की कि यह बता सकें कि यादव जी का यह प्रश्न बहुत सार्थक था कि इस इतिहास में हमारी जगह कहां है। इस प्रश्न को इतनी बेबाकी से उनसे पहले यदि किसी ने उठाया था तो उसका मुझे पता नहीं। कोई शहर या देश कितना भी सुंदर क्यों न हो, उससे हमारी आत्मीयता नहीं हो सकती। परंतु उसमें हमारा अपना घर हो – वह झोपड़े से लेकर महल तक कुछ भी हो, इससे फर्क नहीं पड़ता – वह पूरा शहर, पूरा देश हमारा अपना हो जाता है। इतिहास के साथ भी ऐसा ही है।

यहां मैं कुछ बातों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। पहली यह कि यदि मैने यह मान लिया होता कि शुद्धरक्त आर्य यादव ही हैं तो भी यह झूठी दिलासा से आगे नहीं बढ़ पाता। झूठी दिलासा से संशय पैदा होता है, वह आत्मविश्वास नहीं जो अपनी सही पहचान से पैदा होती है।

दूसरी पाश्चात्य इतिहासकारों ने शूद्रों और आटविक जनों के अपने ठिकानों को नष्ट करके उनकी पहचान को मिटाने का जघन्य अपराध किया और यदि श्रमिकों, दलितों, आटविक जनों को इतिहास में अपनी जगह तलाशनी है तो सवर्णों से अधिक उनकी जरूरत है कि वे उस इतिहास से मुक्ति पाएं जिसमे उनको एक सत्वहीन बनाने वाली जलवायु की उपज बता कर उनको नैसर्गिक रूप से सभी योग्यताओं से शून्य बताकर उनके अपने कृतित्व का सारा श्रेय पश्चिम से आनेवाली एक कल्पित आर्यजाति को दे दिया गया।

तीसरी बात यह कि जिस परंपरागत इतिहास पुराण को ब्राह्मणों की रचना कह कर उससे इतना परहेज किया जाता रहा उसकी अनेक सीमाओं के बाद भी, शूद्रों और आटविक जनों को जितना महत्व दिया गया है, उतना दुनिया के अन्य किसी देश में शासकों द्वारा श्रमिकों और वंचितों को नहीं दिया गया होगा।

चौथी बात यह कि जिन पुराणों को ब्राह्मणों की रचना बता कर कोसा जाता रहा है उनके रचनाकार ब्राह्मण थे ही नहीं। वे आदिम अवस्था से चली आरही गाथा परंपरा से, व्यास परंपरा से जुड़े रचनाकार रहे है। ये आसुरी परंपरा से जुड़े, भृगुवंशी रहे हैं। पुरातन ज्ञान परंपरा के रक्षक और वाहक होने के कारण नष्टप्राय वेद हों या पुराण, इनको संजोने, संभालने, प्रचारित करने में इनकी अग्रणी भूमिका थी। ये यज्ञ, कर्मकांड के विरोधी – हता मखं न भृगवः – और बौद्धिक आंदोलनकारी रहे हैं।

पांचवीं बात यह कि इतिहास में अपनी जगह ऊंची रखने की चिंता के कारण ही ईरान और अरब में अपनी जड़ों पर गर्व करने वाले आर्यों की जातीयता और उनके आक्रमण की कहानियों के ध्वस्त हो जाने के बाद भी पूरे जी जान से उसे पुनरुज्जीवित करने के लिए छटपटाते रहे हैं । हमारा दुर्भाग्य कि ऐसे ही लोगों को इतिहास का निर्माता कहा जाता रहा है। ध्यान रहे प्रो. इर्फान के अभिनन्दन ग्रंथ का शीर्षक है हिस्ट्री इन दि मेकिंग।

और अंतिम बात यह कि इतिहास पकवानों की थाली नहीं है कि फर्मायश पर परोस दी जाय, इसकी खोज करनी होती है। जिन्हें शिकायत है कि इतिहास में उनकी जगह कहां है, उन्होंने इसे खोजने की दिशा में कितना काम किया?

Post – 2018-02-13

इतिहास में जगह

राजेन्द्र यादव ने दलित लेखकों और महिला रचनाकारों को जितना खुला मंच दिया, वह उनसे पहले के किसी संपादक ने नही। उन्होंने इतिहास और पुराण की जितनी मुखरता से निंदा की वह भी उनके स्वभाव के अनुरूप था। उनकी पीड़ा यह थी कि यह ब्राह्मणों और क्षत्रियों की महिमागान के अतिरिक्त क्या है? इसमें हम, अर्थात् शूद्र और दलित कहां हैं? उनको एक उपन्यास बहुत क्रान्तिकारी लगा उसमें बड़े प्रभावशाली ढंग से यह चित्रित किया गया था कि कैसे वैदिक चरवाहे दिन में गोरू चराते थे और रात में गायन करते थे, और वे गान ही ऋग्वेद के सूक्त बन गए। उपन्यासकार ने दिल्ली वि.वि. में प्राचीन इतिहास के विभागाध्यक्ष रह चुके दो व्यक्तियों के नाम अपने उपन्यास की ऐतिहासिक प्रामाणिकता के लिए भी उल्लेख किये थे। यादव जी को पहली बार लगा कि शुद्ध आर्य तो यादव ही हैं ।उन्होंने मुझसे उसकी समीक्षा लिखने को कहा तो मैने समीक्षा लिख दी। समीक्षा पढ़ कर उन्हें खिन्न होना ही था। उन्होंने फोन पर कहा, भइ, तुमने तो भुस्स भर दिया। मैने सुझाया समीक्षा को लेखक के पास भेज दें और वह अपने बचाव जो कुछ कहे, समीक्षा के साथ उसे भी प्रकाशित करें। उन्होंने वैसा ही किया, पर बात नहीं बनी। उपन्यासकार इतिहासकार तो था नहीं, जहां तक याद है उसने दिल्ली के इतिहासकारों की मान्यता का हवाला दे कर अपना बचाव किया था।

इसका दुखद पक्ष यह कि यादव जी की रुचि इस रचना के साथ इतनी मुश्किल से इतिहास में पैदा हुई थी, क्योंकि पहली बार इतिहास में अपनी जगह दिखाई दी थी, वह समीक्षा के साथ ही लुप्त हो गई।

हमने इसकी चर्चा इसलिए की कि यह बता सकें कि यादव जी का यह प्रश्न बहुत सार्थक था कि इस इतिहास में हमारी जगह कहां है। इस प्रश्न को इतनी बेबाकी से उनसे पहले यदि किसी ने उठाया था तो उसका मुझे पता नहीं। कोई शहर या देश कितना भी सुंदर क्यों न हो, उससे हमारी आत्मीयता नहीं हो सकती। परंतु उसमें हमारा अपना घर हो – वह झोपड़े से लेकर महल तक कुछ भी हो, इससे फर्क नहीं पड़ता – वह पूरा शहर, पूरा देश हमारा अपना हो जाता है। इतिहास के साथ भी ऐसा ही है।

यहां मैं कुछ बातों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। पहली यह कि यदि मैने यह मान लिया होता कि शुद्धरक्त आर्य यादव ही हैं तो भी यह झूठी दिलासा से आगे नहीं बढ़ पाता। झूठी दिलासा से संशय पैदा होता है, वह आत्मविश्वास नहीं जो अपनी सही पहचान से पैदा होती है।

दूसरी पाश्चात्य इतिहासकारों ने शूद्रों और आटविक जनों के अपने ठिकानों को नष्ट करके उनकी पहचान को मिटाने का जघन्य अपराध किया और यदि श्रमिकों, दलितों, आटविक जनों को इतिहास में अपनी जगह तलाशनी है तो सवर्णों से अधिक उनकी जरूरत है कि वे उस इतिहास से मुक्ति पाएं जिसमे उनको एक सत्वहीन बनाने वाली जलवायु की उपज बता कर उनको नैसर्गिक रूप से सभी योग्यताओं से शून्य बताकर उनके अपने कृतित्व का सारा श्रेय पश्चिम से आनेवाली एक कल्पित आर्यजाति को दे दिया गया।

तीसरी बात यह कि जिस परंपरागत इतिहास पुराण को ब्राह्मणों की रचना कह कर उससे इतना परहेज किया जाता रहा उसकी अनेक सीमाओं के बाद भी, शूद्रों और आटविक जनों को जितना महत्व दिया गया है, उतना दुनिया के अन्य किसी देश में शासकों द्वारा श्रमिकों और वंचितों को नहीं दिया गया होगा।

चौथी बात यह कि जिन पुराणों को ब्राह्मणों की रचना बता कर कोसा जाता रहा है उनके रचनाकार ब्राह्मण थे ही नहीं। वे आदिम अवस्था से चली आरही गाथा परंपरा से, व्यास परंपरा से जुड़े रचनाकार रहे है। ये आसुरी परंपरा से जुड़े, भृगुवंशी रहे हैं। पुरातन ज्ञान परंपरा के रक्षक और वाहक होने के कारण नष्टप्राय वेद हों या पुराण, इनको संजोने, संभालने, प्रचारित करने में इनकी अग्रणी भूमिका थी। ये यज्ञ, कर्मकांड के विरोधी – हता मखं न भृगवः – और बौद्धिक आंदोलनकारी रहे हैं।

पांचवीं बात यह कि इतिहास में अपनी जगह ऊंची रखने की चिंता के कारण ही ईरान और अरब में अपनी जड़ों पर गर्व करने वाले आर्यों की जातीयता और उनके आक्रमण की कहानियों के ध्वस्त हो जाने के बाद भी पूरे जी जान से उसे पुनरुज्जीवित करने के लिए छटपटाते रहे हैं । हमारा दुर्भाग्य कि ऐसे ही लोगों को इतिहास का निर्माता कहा जाता रहा है। ध्यान रहे प्रो. इर्फान के अभिनन्दन ग्रंथ का शीर्षक है हिस्ट्री इन दि मेकिंग।

और अंतिम बात यह कि इतिहास पकवानों की थाली नहीं है कि फर्मायश पर परोस दी जाय, इसकी खोज करनी होती है। जिन्हें शिकायत है कि इतिहास में उनकी जगह कहां है, उन्होंने इसे खोजने की दिशा में कितना काम किया?

Post – 2018-02-13

इतिहास में जगह

राजेन्द्र यादव ने दलित लेखकों और महिला रचनाकारों को जितना खुला मंच दिया, वह उनसे पहले के किसी संपादक ने नही। उन्होंने इतिहास और पुराण की जितनी मुखरता से निंदा की वह भी उनके स्वभाव के अनुरूप था। उनकी पीड़ा यह थी कि यह ब्राह्मणों और क्षत्रियों की महिमागान के अतिरिक्त क्या है? इसमें हम, अर्थात् शूद्र और दलित कहां हैं? उनको एक उपन्यास बहुत क्रान्तिकारी लगा उसमें बड़े प्रभावशाली ढंग से यह चित्रित किया गया था कि कैसे वैदिक चरवाहे दिन में गोरू चराते थे और रात में गायन करते थे, और वे गान ही ऋग्वेद के सूक्त बन गए। उपन्यासकार ने दिल्ली वि.वि. में प्राचीन इतिहास के विभागाध्यक्ष रह चुके दो व्यक्तियों के नाम अपने उपन्यास की ऐतिहासिक प्रामाणिकता के लिए भी उल्लेख किये थे। यादव जी को पहली बार लगा कि शुद्ध आर्य तो यादव ही हैं ।उन्होंने मुझसे उसकी समीक्षा लिखने को कहा तो मैने समीक्षा लिख दी। समीक्षा पढ़ कर उन्हें खिन्न होना ही था। उन्होंने फोन पर कहा, भइ, तुमने तो भुस्स भर दिया। मैने सुझाया समीक्षा को लेखक के पास भेज दें और वह अपने बचाव जो कुछ कहे, समीक्षा के साथ उसे भी प्रकाशित करें। उन्होंने वैसा ही किया, पर बात नहीं बनी। उपन्यासकार इतिहासकार तो था नहीं, जहां तक याद है उसने दिल्ली के इतिहासकारों की मान्यता का हवाला दे कर अपना बचाव किया था।

इसका दुखद पक्ष यह कि यादव जी की रुचि इस रचना के साथ इतनी मुश्किल से इतिहास में पैदा हुई थी, क्योंकि पहली बार इतिहास में अपनी जगह दिखाई दी थी, वह समीक्षा के साथ ही लुप्त हो गई।

हमने इसकी चर्चा इसलिए की कि यह बता सकें कि यादव जी का यह प्रश्न बहुत सार्थक था कि इस इतिहास में हमारी जगह कहां है। इस प्रश्न को इतनी बेबाकी से उनसे पहले यदि किसी ने उठाया था तो उसका मुझे पता नहीं। कोई शहर या देश कितना भी सुंदर क्यों न हो, उससे हमारी आत्मीयता नहीं हो सकती। परंतु उसमें हमारा अपना घर हो – वह झोपड़े से लेकर महल तक कुछ भी हो, इससे फर्क नहीं पड़ता – वह पूरा शहर, पूरा देश हमारा अपना हो जाता है। इतिहास के साथ भी ऐसा ही है।

यहां मैं कुछ बातों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। पहली यह कि यदि मैने यह मान लिया होता कि शुद्धरक्त आर्य यादव ही हैं तो भी यह झूठी दिलासा से आगे नहीं बढ़ पाता। झूठी दिलासा से संशय पैदा होता है, वह आत्मविश्वास नहीं जो अपनी सही पहचान से पैदा होती है।

दूसरी पाश्चात्य इतिहासकारों ने शूद्रों और आटविक जनों के अपने ठिकानों को नष्ट करके उनकी पहचान को मिटाने का जघन्य अपराध किया और यदि श्रमिकों, दलितों, आटविक जनों को इतिहास में अपनी जगह तलाशनी है तो सवर्णों से अधिक उनकी जरूरत है कि वे उस इतिहास से मुक्ति पाएं जिसमे उनको एक सत्वहीन बनाने वाली जलवायु की उपज बता कर उनको नैसर्गिक रूप से सभी योग्यताओं से शून्य बताकर उनके अपने कृतित्व का सारा श्रेय पश्चिम से आनेवाली एक कल्पित आर्यजाति को दे दिया गया।

तीसरी बात यह कि जिस परंपरागत इतिहास पुराण को ब्राह्मणों की रचना कह कर उससे इतना परहेज किया जाता रहा उसकी अनेक सीमाओं के बाद भी, शूद्रों और आटविक जनों को जितना महत्व दिया गया है, उतना दुनिया के अन्य किसी देश में शासकों द्वारा श्रमिकों और वंचितों को नहीं दिया गया होगा।

चौथी बात यह कि जिन पुराणों को ब्राह्मणों की रचना बता कर कोसा जाता रहा है उनके रचनाकार ब्राह्मण थे ही नहीं। वे आदिम अवस्था से चली आरही गाथा परंपरा से, व्यास परंपरा से जुड़े रचनाकार रहे है। ये आसुरी परंपरा से जुड़े, भृगुवंशी रहे हैं। पुरातन ज्ञान परंपरा के रक्षक और वाहक होने के कारण नष्टप्राय वेद हों या पुराण, इनको संजोने, संभालने, प्रचारित करने में इनकी अग्रणी भूमिका थी। ये यज्ञ, कर्मकांड के विरोधी – हता मखं न भृगवः – और बौद्धिक आंदोलनकारी रहे हैं।

पांचवीं बात यह कि इतिहास में अपनी जगह ऊंची रखने की चिंता के कारण ही ईरान और अरब में अपनी जड़ों पर गर्व करने वाले आर्यों की जातीयता और उनके आक्रमण की कहानियों के ध्वस्त हो जाने के बाद भी पूरे जी जान से उसे पुनरुज्जीवित करने के लिए छटपटाते रहे हैं । हमारा दुर्भाग्य कि ऐसे ही लोगों को इतिहास का निर्माता कहा जाता रहा है। ध्यान रहे प्रो. इर्फान के अभिनन्दन ग्रंथ का शीर्षक है हिस्ट्री इन दि मेकिंग।

और अंतिम बात यह कि इतिहास पकवानों की थाली नहीं है कि फर्मायश पर परोस दी जाय, इसकी खोज करनी होती है। जिन्हें शिकायत है कि इतिहास में उनकी जगह कहां है, उन्होंने इसे खोजने की दिशा में कितना काम किया?

Post – 2018-02-11

आर्यों ने क्या किया
(लेख लंबा होकर भी अधूरा ही रह गया)

यदि कोई पूछे आर्यों ने क्या किया तो, इसका उत्तर होगा, ‘उन्होंने खेती की, व्यापार किया और धन के दूसरे स्रोतों को अपने अधिकार में रखा, अपनी सेवा में लगाया, क्षत्रियों को अपनी और अपने माल असबाब की रक्षा के काम पर और ब्राह्मणों को यज्ञ, पूजा और कीर्तन के माध्यम से देव शक्तियों अनुकूल बनाते हुए अपने अनिष्ट के निवारण के काम पर, और शूद्रों को श्रम और दक्षता के दूसरे उपक्रमों में अपनी सहायता के काम पर लगाए रखा।‘ दूसरे शब्दों में कहें तो, उनका सारा प्रयत्न संपदा और संसाधनों को अपने अधिकार में रखने और समाज का ऐसा प्रबंधन करने तक सीमित था जिससे वे संपदा पर अपना अधिकार बनाए रख सकें।

अब इस समस्या पर एक दूसरे सिरे से विचार करें : क्या क्षत्रिय या ब्राहमण को आर्य कहा जा सकता था? यह प्रश्न कुछ ऐसा ही है जैसे यह पूछना कि क्या उन्हें आज सेठ, महाजन, साहूकार कहा जाता है? नहीं, सामुदायिक रूप से इनका प्रयोग वैश्यों के लिए भी नहीं किया जाता है। वैश्यों में भी किसी गरीब बनिये के लिए इन शब्दों का प्रयोग प्रयोग करें तो व्यंग्य जैसा लगेगा। ये शब्द हैं मात्र आदरसूचक पर इनका प्रयोग हैसियत से जुड़ा है, वह धन संपदा की आढ्यता से जुड़ा है। अन्य व्यक्तियों के सम्मानित होने पर, चाहे वह वय के कारण हो, या योग्यता के कारण हो, स्वदेश में इसका भेदक प्रयोग होता था, इसलिए श्रेष्ठता या बड़प्पन का भाव स्पष्ट था। विदेशों में बड़े साहूकारों के ही अड्डे थे इसलिए उनका परिसर और फिर उसके कार्यकलाप के क्षेत्र के लिए संभवत: इसका प्रयोग होता रहा।

देश में हों या परदेस में, ये निश्चिन्त कहीं नहीं रह पाते थे। बस्तियां तो रक्षा प्राचीर बना कर बसाते ही थे जिनमें बाहर के किसी व्यक्ति का प्रवेश बहुत सीमित और काफी जांच पड़ताल के बाद ही संभव था, कारोबार के सिलसिले में या माल-असबाब लेकर चलते समय, रास्ते में जान-माल का संकट बढ़ जाता था। सच कहें तो अपने घर में भी वे चैन की नींद नहीं सो पाते थे।

यहां हम ऋग्वेद के कुछ मंत्रों का ग्रिफिथ द्वारा किया गया अनुवाद यह समझने के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं कि खींचतान के बाद भी उनके अनुवाद में भी इस बात की चिंता पूरे ऋग्वेद में पाई जाती है कि वे सभ्य और शांति प्रेमी लोग थे जो एक ऐसे परिवेश में, जिसमें शेष जगत बर्बरता से ग्रस्त था, तरह-तरह के संकटों से घिरे हुए थे और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था के बाद भी देवताओं से गुहार लगाते थे कि वे उनकी रक्षा करें:
स नः दूरात् च असात् च नि मर्दत्घात अघायोः ।
पाहि सदं इत् विश्वायुः ।।
Lord of all life, from near; from far, do thou, O Agni evermore
Protect us from the sinful man. 1-27-3

ऊर्ध्वः नः पाहि अंहसः निकेतुना विश्वं समत्रिणं दह ।
कृधी न ऊर्ध्वान् च रथाय जीवसे विदा देवेषु नः दुवः ।।
Erect, preserve us from sore trouble; with thy flame burn thou each ravening demon dead.
Raise thou us up that we may walk and live. so thou shalt find our worship mid the Gods. 1-36-14

पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः । पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य ।।
Preserve us, Agni, from the fiend, preserve us from malicious wrong.
Save us from him who fain would injure us or slay, Most Youthful, thou with lofty light. 1-36-15

स शेवृधमधि धाः द्यम्नमस्मे महि क्षत्रं जनाषाट् इन्द्र तव्यम् ।
रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीन् राये च नः स्वपत्यै इषः धाः ।।
So give us, Indra, bliss-increasing glory give us great sway and strength that conquers people.
Preserve our wealthy patrons, save our princes; vouchsafe us wealth and food with noble offspring. 1-54-11

त्वं नः अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवः दुरितादभीके ।
प्र नः वाजान् रथ्यः अश्वबुध्यान् इषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै ।।
Indra, preserve thou us from this affliction Thunder-armed, save us from the misery near us.
Vouchsafe us affluence in chariots, founded on horses, for our food and fame and gladness. 1.121.14

मैंने एक ही मंडल के कुछ सूक्तों में प्रयुक्त पाहि (प्राण रक्षा करो) को तलाश कर इन नमूनों को पेश किया है। पूरे ऋग्वेद में इसकी आवर्तिता बहुत अधिक है। रक्षा की पुकार के लिए त्राहि (त्राहिमां मां देवा निजुरो वृकस्य), अव (जहां यह क्रिया रूप में प्रयुक्त है। इन्द्र वाजेषु नो अव सहस्र प्रधनेषु च) आदि का भी प्रयोग हुआ है, पर साथ ही देवताओं से याचना की गई है कि ‘ऐसी नौबत न आने पाए’ जिसमें ‘मा’ का और ‘न’ प्रयोग हुआ है (मा नो दु:शंस ईशत – दुष्ट हमारे ऊपर हावी न हो जाय)। अन्यथा भी वे अपने भयभीत रहने की बात करते हैं (स्वप्ने भयं भीरवे मह्यं आस – मुझ भय-कातर जन को सपने में भी डर सताता रहता है)। दूसरे सन्दर्भों में भी बार बार उनकी चिन्ता प्रकट होती है – ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं न: वृकात् अघायो:।

जब मैं कहता हूं यह पूरा पाठ, यह गढ़ा हुआ इतिहास जालसाजी का नमूना है तो इसलिए कि इसमें जबरदस्ती, धौंस के बल पर हर कड़ी को उलट कर पेश किया गया। जो डरा हुआ था उसे हत्यारा, क्रूर, युद्धोन्मादी सिद्ध किया गया। जिस पर लुटेरों, बटमारों का हमला हो रहा था, उसे एक सभ्यता पर आक्रमणकारी सिद्ध कर दिया गया। इसका लगातार कई कोनों से, जिनमें भी इसी तरह की धांधली की गई थी, इस तरह शोर मचाया जाता रहा कि, वैदिक का ज्ञान न सही, किसी ने पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किए गए अनुवादों तक को नहीं देखा, जिनमें सारी खींचतान के बाद भी, उन अनुवादकों तक ने स्वीकार किया था कि ऋग्वेद में आक्रमण का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

हम आर्यों के काम काज की बात कर रहे थे, और माल-मता संभालने और उससे जुड़ी आशंकाओं के अनावश्यक विस्तार में चले गए। हम जिस प्रश्न को केन्द्र में रखना चाहते थे वह यह कि जिन कामों का श्रेय हम आर्यों को देते रहे हैं क्या वे उन्हें करते भी रहे हैं?

आर्यों को जाली इतिहास में भी पशुपालक बताया गया है और वर्ण धर्म में भी गोरक्षा उनका कार्य भार माना गया है। कृषि और वाणिज्य तो माना ही गया है? क्या यह संभव है कि वही व्यक्ति खेती भी करे और गोरू भी चराए ? या वह खेती भी करे और वाणिज्य भी करे? यदि नहीं तो मानना होगा कि पशुपालन करने वालों और किसानी करने वालों को भी आर्य कहा जाता था। यदि ऐसा नहीं है तो मानना होगा आर्य धन दौलत का जुगाड़ करने और उसी के बल पर दूसरों से वे काम कराता था और स्वयं उनके लिए साधन जुटाता, उन की निगरानी करने का काम करता था।

ऋग्वेद में ऐसे संकेत आए हैं जिनसे प्रकट होता है कि पशुओं का मालिक कोई और है और उन्हें चराने वाला (गोप) कोई दूसरा। खेत का मालिक कोई और है और कीनाश या हलवाहा अलग से एक पेशा बन चुका था। संक्षेप में कहें तो ऋग्वेद में कार्यविभाजन हो चुका है, और ऐसा वर्ग अस्तित्व में आ चुका है जो केवल अपने श्रम और दक्षता के माधयम से अपनी जिविका अर्जित करता था, स्वामित्व दूसरे के हाथ में था जो इसके श्रम के उत्पाद को तो अपना मानता ही था, उत्पादक के काम का श्रेय भी उसे ही दिया जाता था। ऐसा आर्यों के हमले की बात करने वालों की कृतियों में खास तौर से इसलिए किया गया कि बर्बर जनों को सभ्यता का जनक सिद्ध किया जा सके।

उदाहरण के लिए उनके द्वारा दावा यह किया जाता रहा कि अश्वपालन का, वन्य अश्व को पकड़ने, पालने, प्रशिक्षित करने का काम आर्यों ने किया, परन्तु भारतीय स्रोत और परंपरा कहते हैं कि अश्व वैदिक समाज को सिन्धियों के माध्यम से प्राप्त होता था और इसलिए इसका एक पर्याय सैंधव है। दूसरी ओर हम पाते हैं कि जिस मध्य एशिया से आर्यों को भारत पर हमला कराया जाता था, उस पर सिन्धियों का दबदबा इतना था कि उसे सिन्तास्ता या सिन्धियों का देश कहा जाता रहा। ये सिन्धी सिन्धु नद के क्षेत्र से वहां जा कर बसें थे, क्योंकि उन्होंने कतिपय नदियों का नामकरण सिन्धु की सहायिकाओं के नाम पर रखा था। इसके दो सरलार्थ हुए । एक यह कि वे वैदिक आर्यों के लिए अश्व का कारोबार करते थे, इसलिए उनकी संपर्क भाषा संस्कृत हो चुकी थी। अश्व और उसके रंग आदि के नाम इसी कारण संस्कृत में है। दूसरी संभावना यह कि उनके अश्वपालन की दक्षता का उपयोग वैदिक व्यापारी कर रहे थे। कारोबार के मालिक ये थे और सहायक या असली काम में उन्होंने सिन्धी जनों को लगा रखा था।

इसकी पुष्टि पश्चिम एशिया के उन अभिलेखों और देवनामों और व्यक्तिनामों से होती है, जो सभी वैदिक हैं, पर अशवपालन पर जो पाठ था जिसकी भाषा प्राकृत या संस्कृत का अपभ्रंश है, परन्तु प्रशिक्षक का नाम किक्कुली है, जो निश्चय ही अवैदिक है। इस तरह अश्वपालन का जो श्रेय आर्यों को दिया जाता रहा वह गलत था, इसका श्रेय इतर जनों को जाता है।

यह कहना भी गलत है कि आर्यों ने पहिए का आविष्कार किया । हमने एक शोधपत्र में यह बताया था कि पहिए के आविष्कार तीन-चार भिन्न भाषाई समुदाय के लोग कर रहे थे, जिनमें एक आर्यभाषी भी थे, परन्तु अरायुक्त पहिए का आविष्कार भृगुओं ने किया था जो असुर परंपरा के थे।

प्रसंगवश यह भी जिक्र कर दें कि अश्व शब्द के परवर्ती प्रयोग के कारण पाश्चात्य विद्वान इसे घास के मैदानों (स्तेप) के घोड़ों का नाम मान कर घोड़ा लेकर आने वाले आर्यों की छवि तैयार करते रहे। अश्व कच्छ से आयात किए जाने वाले गधे के लिए प्रयोग में आ रहा था। अश्व के अनेकश: पर्यायों मे से कौन भारतीय घोड़े के लिए प्रयोग में आ रहा था इसे हम छोड़ सकते हैं, पर यह याद दिलाना जरूरी है कि स्तेप के घोड़े के लिए वे ककुहास का प्रयोग करते थे। ककुभ का अर्थ टीला या पहाड़ की चोटी भी होता है इसलिए पश्चिम एशिया की बाजार में जब उन्होंने इसे उतारा तो इसे वहां की भाषा में भी पहाड़ी गधा कहा गया।

हम अपनी पुरानी बात को पुन: दुहराते हुए अन्त करें कि भारतीय सभ्यता का औद्योगिक तथा प्रौद्योगिक विकास तथाकथित शूद्रों और अन्य जनों पर निर्भर रहा है। वैदिक आर्यों की भूमिका पहल और प्रेरणा की रह गई थी ।

Post – 2018-02-11

आर्यों ने क्या किया
(लेख लंबा होकर भी अधूरा ही रह गया)

यदि कोई पूछे आर्यों ने क्या किया तो, इसका उत्तर होगा, ‘उन्होंने खेती की, व्यापार किया और धन के दूसरे स्रोतों को अपने अधिकार में रखा, अपनी सेवा में लगाया, क्षत्रियों को अपनी और अपने माल असबाब की रक्षा के काम पर और ब्राह्मणों को यज्ञ, पूजा और कीर्तन के माध्यम से देव शक्तियों अनुकूल बनाते हुए अपने अनिष्ट के निवारण के काम पर, और शूद्रों को श्रम और दक्षता के दूसरे उपक्रमों में अपनी सहायता के काम पर लगाए रखा।‘ दूसरे शब्दों में कहें तो, उनका सारा प्रयत्न संपदा और संसाधनों को अपने अधिकार में रखने और समाज का ऐसा प्रबंधन करने तक सीमित था जिससे वे संपदा पर अपना अधिकार बनाए रख सकें।

अब इस समस्या पर एक दूसरे सिरे से विचार करें : क्या क्षत्रिय या ब्राहमण को आर्य कहा जा सकता था? यह प्रश्न कुछ ऐसा ही है जैसे यह पूछना कि क्या उन्हें आज सेठ, महाजन, साहूकार कहा जाता है? नहीं, सामुदायिक रूप से इनका प्रयोग वैश्यों के लिए भी नहीं किया जाता है। वैश्यों में भी किसी गरीब बनिये के लिए इन शब्दों का प्रयोग प्रयोग करें तो व्यंग्य जैसा लगेगा। ये शब्द हैं मात्र आदरसूचक पर इनका प्रयोग हैसियत से जुड़ा है, वह धन संपदा की आढ्यता से जुड़ा है। अन्य व्यक्तियों के सम्मानित होने पर, चाहे वह वय के कारण हो, या योग्यता के कारण हो, स्वदेश में इसका भेदक प्रयोग होता था, इसलिए श्रेष्ठता या बड़प्पन का भाव स्पष्ट था। विदेशों में बड़े साहूकारों के ही अड्डे थे इसलिए उनका परिसर और फिर उसके कार्यकलाप के क्षेत्र के लिए संभवत: इसका प्रयोग होता रहा।

देश में हों या परदेस में, ये निश्चिन्त कहीं नहीं रह पाते थे। बस्तियां तो रक्षा प्राचीर बना कर बसाते ही थे जिनमें बाहर के किसी व्यक्ति का प्रवेश बहुत सीमित और काफी जांच पड़ताल के बाद ही संभव था, कारोबार के सिलसिले में या माल-असबाब लेकर चलते समय, रास्ते में जान-माल का संकट बढ़ जाता था। सच कहें तो अपने घर में भी वे चैन की नींद नहीं सो पाते थे।

यहां हम ऋग्वेद के कुछ मंत्रों का ग्रिफिथ द्वारा किया गया अनुवाद यह समझने के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं कि खींचतान के बाद भी उनके अनुवाद में भी इस बात की चिंता पूरे ऋग्वेद में पाई जाती है कि वे सभ्य और शांति प्रेमी लोग थे जो एक ऐसे परिवेश में, जिसमें शेष जगत बर्बरता से ग्रस्त था, तरह-तरह के संकटों से घिरे हुए थे और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था के बाद भी देवताओं से गुहार लगाते थे कि वे उनकी रक्षा करें:
स नः दूरात् च असात् च नि मर्दत्घात अघायोः ।
पाहि सदं इत् विश्वायुः ।।
Lord of all life, from near; from far, do thou, O Agni evermore
Protect us from the sinful man. 1-27-3

ऊर्ध्वः नः पाहि अंहसः निकेतुना विश्वं समत्रिणं दह ।
कृधी न ऊर्ध्वान् च रथाय जीवसे विदा देवेषु नः दुवः ।।
Erect, preserve us from sore trouble; with thy flame burn thou each ravening demon dead.
Raise thou us up that we may walk and live. so thou shalt find our worship mid the Gods. 1-36-14

पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः । पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य ।।
Preserve us, Agni, from the fiend, preserve us from malicious wrong.
Save us from him who fain would injure us or slay, Most Youthful, thou with lofty light. 1-36-15

स शेवृधमधि धाः द्यम्नमस्मे महि क्षत्रं जनाषाट् इन्द्र तव्यम् ।
रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीन् राये च नः स्वपत्यै इषः धाः ।।
So give us, Indra, bliss-increasing glory give us great sway and strength that conquers people.
Preserve our wealthy patrons, save our princes; vouchsafe us wealth and food with noble offspring. 1-54-11

त्वं नः अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवः दुरितादभीके ।
प्र नः वाजान् रथ्यः अश्वबुध्यान् इषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै ।।
Indra, preserve thou us from this affliction Thunder-armed, save us from the misery near us.
Vouchsafe us affluence in chariots, founded on horses, for our food and fame and gladness. 1.121.14

मैंने एक ही मंडल के कुछ सूक्तों में प्रयुक्त पाहि (प्राण रक्षा करो) को तलाश कर इन नमूनों को पेश किया है। पूरे ऋग्वेद में इसकी आवर्तिता बहुत अधिक है। रक्षा की पुकार के लिए त्राहि (त्राहिमां मां देवा निजुरो वृकस्य), अव (जहां यह क्रिया रूप में प्रयुक्त है। इन्द्र वाजेषु नो अव सहस्र प्रधनेषु च) आदि का भी प्रयोग हुआ है, पर साथ ही देवताओं से याचना की गई है कि ‘ऐसी नौबत न आने पाए’ जिसमें ‘मा’ का और ‘न’ प्रयोग हुआ है (मा नो दु:शंस ईशत – दुष्ट हमारे ऊपर हावी न हो जाय)। अन्यथा भी वे अपने भयभीत रहने की बात करते हैं (स्वप्ने भयं भीरवे मह्यं आस – मुझ भय-कातर जन को सपने में भी डर सताता रहता है)। दूसरे सन्दर्भों में भी बार बार उनकी चिन्ता प्रकट होती है – ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं न: वृकात् अघायो:।

जब मैं कहता हूं यह पूरा पाठ, यह गढ़ा हुआ इतिहास जालसाजी का नमूना है तो इसलिए कि इसमें जबरदस्ती, धौंस के बल पर हर कड़ी को उलट कर पेश किया गया। जो डरा हुआ था उसे हत्यारा, क्रूर, युद्धोन्मादी सिद्ध किया गया। जिस पर लुटेरों, बटमारों का हमला हो रहा था, उसे एक सभ्यता पर आक्रमणकारी सिद्ध कर दिया गया। इसका लगातार कई कोनों से, जिनमें भी इसी तरह की धांधली की गई थी, इस तरह शोर मचाया जाता रहा कि, वैदिक का ज्ञान न सही, किसी ने पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किए गए अनुवादों तक को नहीं देखा, जिनमें सारी खींचतान के बाद भी, उन अनुवादकों तक ने स्वीकार किया था कि ऋग्वेद में आक्रमण का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

हम आर्यों के काम काज की बात कर रहे थे, और माल-मता संभालने और उससे जुड़ी आशंकाओं के अनावश्यक विस्तार में चले गए। हम जिस प्रश्न को केन्द्र में रखना चाहते थे वह यह कि जिन कामों का श्रेय हम आर्यों को देते रहे हैं क्या वे उन्हें करते भी रहे हैं?

आर्यों को जाली इतिहास में भी पशुपालक बताया गया है और वर्ण धर्म में भी गोरक्षा उनका कार्य भार माना गया है। कृषि और वाणिज्य तो माना ही गया है? क्या यह संभव है कि वही व्यक्ति खेती भी करे और गोरू भी चराए ? या वह खेती भी करे और वाणिज्य भी करे? यदि नहीं तो मानना होगा कि पशुपालन करने वालों और किसानी करने वालों को भी आर्य कहा जाता था। यदि ऐसा नहीं है तो मानना होगा आर्य धन दौलत का जुगाड़ करने और उसी के बल पर दूसरों से वे काम कराता था और स्वयं उनके लिए साधन जुटाता, उन की निगरानी करने का काम करता था।

ऋग्वेद में ऐसे संकेत आए हैं जिनसे प्रकट होता है कि पशुओं का मालिक कोई और है और उन्हें चराने वाला (गोप) कोई दूसरा। खेत का मालिक कोई और है और कीनाश या हलवाहा अलग से एक पेशा बन चुका था। संक्षेप में कहें तो ऋग्वेद में कार्यविभाजन हो चुका है, और ऐसा वर्ग अस्तित्व में आ चुका है जो केवल अपने श्रम और दक्षता के माधयम से अपनी जिविका अर्जित करता था, स्वामित्व दूसरे के हाथ में था जो इसके श्रम के उत्पाद को तो अपना मानता ही था, उत्पादक के काम का श्रेय भी उसे ही दिया जाता था। ऐसा आर्यों के हमले की बात करने वालों की कृतियों में खास तौर से इसलिए किया गया कि बर्बर जनों को सभ्यता का जनक सिद्ध किया जा सके।

उदाहरण के लिए उनके द्वारा दावा यह किया जाता रहा कि अश्वपालन का, वन्य अश्व को पकड़ने, पालने, प्रशिक्षित करने का काम आर्यों ने किया, परन्तु भारतीय स्रोत और परंपरा कहते हैं कि अश्व वैदिक समाज को सिन्धियों के माध्यम से प्राप्त होता था और इसलिए इसका एक पर्याय सैंधव है। दूसरी ओर हम पाते हैं कि जिस मध्य एशिया से आर्यों को भारत पर हमला कराया जाता था, उस पर सिन्धियों का दबदबा इतना था कि उसे सिन्तास्ता या सिन्धियों का देश कहा जाता रहा। ये सिन्धी सिन्धु नद के क्षेत्र से वहां जा कर बसें थे, क्योंकि उन्होंने कतिपय नदियों का नामकरण सिन्धु की सहायिकाओं के नाम पर रखा था। इसके दो सरलार्थ हुए । एक यह कि वे वैदिक आर्यों के लिए अश्व का कारोबार करते थे, इसलिए उनकी संपर्क भाषा संस्कृत हो चुकी थी। अश्व और उसके रंग आदि के नाम इसी कारण संस्कृत में है। दूसरी संभावना यह कि उनके अश्वपालन की दक्षता का उपयोग वैदिक व्यापारी कर रहे थे। कारोबार के मालिक ये थे और सहायक या असली काम में उन्होंने सिन्धी जनों को लगा रखा था।

इसकी पुष्टि पश्चिम एशिया के उन अभिलेखों और देवनामों और व्यक्तिनामों से होती है, जो सभी वैदिक हैं, पर अशवपालन पर जो पाठ था जिसकी भाषा प्राकृत या संस्कृत का अपभ्रंश है, परन्तु प्रशिक्षक का नाम किक्कुली है, जो निश्चय ही अवैदिक है। इस तरह अश्वपालन का जो श्रेय आर्यों को दिया जाता रहा वह गलत था, इसका श्रेय इतर जनों को जाता है।

यह कहना भी गलत है कि आर्यों ने पहिए का आविष्कार किया । हमने एक शोधपत्र में यह बताया था कि पहिए के आविष्कार तीन-चार भिन्न भाषाई समुदाय के लोग कर रहे थे, जिनमें एक आर्यभाषी भी थे, परन्तु अरायुक्त पहिए का आविष्कार भृगुओं ने किया था जो असुर परंपरा के थे।

प्रसंगवश यह भी जिक्र कर दें कि अश्व शब्द के परवर्ती प्रयोग के कारण पाश्चात्य विद्वान इसे घास के मैदानों (स्तेप) के घोड़ों का नाम मान कर घोड़ा लेकर आने वाले आर्यों की छवि तैयार करते रहे। अश्व कच्छ से आयात किए जाने वाले गधे के लिए प्रयोग में आ रहा था। अश्व के अनेकश: पर्यायों मे से कौन भारतीय घोड़े के लिए प्रयोग में आ रहा था इसे हम छोड़ सकते हैं, पर यह याद दिलाना जरूरी है कि स्तेप के घोड़े के लिए वे ककुहास का प्रयोग करते थे। ककुभ का अर्थ टीला या पहाड़ की चोटी भी होता है इसलिए पश्चिम एशिया की बाजार में जब उन्होंने इसे उतारा तो इसे वहां की भाषा में भी पहाड़ी गधा कहा गया।

हम अपनी पुरानी बात को पुन: दुहराते हुए अन्त करें कि भारतीय सभ्यता का औद्योगिक तथा प्रौद्योगिक विकास तथाकथित शूद्रों और अन्य जनों पर निर्भर रहा है। वैदिक आर्यों की भूमिका पहल और प्रेरणा की रह गई थी ।

Post – 2018-02-11

आर्यों ने क्या किया
(लेख लंबा होकर भी अधूरा ही रह गया)

यदि कोई पूछे आर्यों ने क्या किया तो, इसका उत्तर होगा, ‘उन्होंने खेती की, व्यापार किया और धन के दूसरे स्रोतों को अपने अधिकार में रखा, अपनी सेवा में लगाया, क्षत्रियों को अपनी और अपने माल असबाब की रक्षा के काम पर और ब्राह्मणों को यज्ञ, पूजा और कीर्तन के माध्यम से देव शक्तियों अनुकूल बनाते हुए अपने अनिष्ट के निवारण के काम पर, और शूद्रों को श्रम और दक्षता के दूसरे उपक्रमों में अपनी सहायता के काम पर लगाए रखा।‘ दूसरे शब्दों में कहें तो, उनका सारा प्रयत्न संपदा और संसाधनों को अपने अधिकार में रखने और समाज का ऐसा प्रबंधन करने तक सीमित था जिससे वे संपदा पर अपना अधिकार बनाए रख सकें।

अब इस समस्या पर एक दूसरे सिरे से विचार करें : क्या क्षत्रिय या ब्राहमण को आर्य कहा जा सकता था? यह प्रश्न कुछ ऐसा ही है जैसे यह पूछना कि क्या उन्हें आज सेठ, महाजन, साहूकार कहा जाता है? नहीं, सामुदायिक रूप से इनका प्रयोग वैश्यों के लिए भी नहीं किया जाता है। वैश्यों में भी किसी गरीब बनिये के लिए इन शब्दों का प्रयोग प्रयोग करें तो व्यंग्य जैसा लगेगा। ये शब्द हैं मात्र आदरसूचक पर इनका प्रयोग हैसियत से जुड़ा है, वह धन संपदा की आढ्यता से जुड़ा है। अन्य व्यक्तियों के सम्मानित होने पर, चाहे वह वय के कारण हो, या योग्यता के कारण हो, स्वदेश में इसका भेदक प्रयोग होता था, इसलिए श्रेष्ठता या बड़प्पन का भाव स्पष्ट था। विदेशों में बड़े साहूकारों के ही अड्डे थे इसलिए उनका परिसर और फिर उसके कार्यकलाप के क्षेत्र के लिए संभवत: इसका प्रयोग होता रहा।

देश में हों या परदेस में, ये निश्चिन्त कहीं नहीं रह पाते थे। बस्तियां तो रक्षा प्राचीर बना कर बसाते ही थे जिनमें बाहर के किसी व्यक्ति का प्रवेश बहुत सीमित और काफी जांच पड़ताल के बाद ही संभव था, कारोबार के सिलसिले में या माल-असबाब लेकर चलते समय, रास्ते में जान-माल का संकट बढ़ जाता था। सच कहें तो अपने घर में भी वे चैन की नींद नहीं सो पाते थे।

यहां हम ऋग्वेद के कुछ मंत्रों का ग्रिफिथ द्वारा किया गया अनुवाद यह समझने के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं कि खींचतान के बाद भी उनके अनुवाद में भी इस बात की चिंता पूरे ऋग्वेद में पाई जाती है कि वे सभ्य और शांति प्रेमी लोग थे जो एक ऐसे परिवेश में, जिसमें शेष जगत बर्बरता से ग्रस्त था, तरह-तरह के संकटों से घिरे हुए थे और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था के बाद भी देवताओं से गुहार लगाते थे कि वे उनकी रक्षा करें:
स नः दूरात् च असात् च नि मर्दत्घात अघायोः ।
पाहि सदं इत् विश्वायुः ।।
Lord of all life, from near; from far, do thou, O Agni evermore
Protect us from the sinful man. 1-27-3

ऊर्ध्वः नः पाहि अंहसः निकेतुना विश्वं समत्रिणं दह ।
कृधी न ऊर्ध्वान् च रथाय जीवसे विदा देवेषु नः दुवः ।।
Erect, preserve us from sore trouble; with thy flame burn thou each ravening demon dead.
Raise thou us up that we may walk and live. so thou shalt find our worship mid the Gods. 1-36-14

पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः । पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य ।।
Preserve us, Agni, from the fiend, preserve us from malicious wrong.
Save us from him who fain would injure us or slay, Most Youthful, thou with lofty light. 1-36-15

स शेवृधमधि धाः द्यम्नमस्मे महि क्षत्रं जनाषाट् इन्द्र तव्यम् ।
रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीन् राये च नः स्वपत्यै इषः धाः ।।
So give us, Indra, bliss-increasing glory give us great sway and strength that conquers people.
Preserve our wealthy patrons, save our princes; vouchsafe us wealth and food with noble offspring. 1-54-11

त्वं नः अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवः दुरितादभीके ।
प्र नः वाजान् रथ्यः अश्वबुध्यान् इषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै ।।
Indra, preserve thou us from this affliction Thunder-armed, save us from the misery near us.
Vouchsafe us affluence in chariots, founded on horses, for our food and fame and gladness. 1.121.14

मैंने एक ही मंडल के कुछ सूक्तों में प्रयुक्त पाहि (प्राण रक्षा करो) को तलाश कर इन नमूनों को पेश किया है। पूरे ऋग्वेद में इसकी आवर्तिता बहुत अधिक है। रक्षा की पुकार के लिए त्राहि (त्राहिमां मां देवा निजुरो वृकस्य), अव (जहां यह क्रिया रूप में प्रयुक्त है। इन्द्र वाजेषु नो अव सहस्र प्रधनेषु च) आदि का भी प्रयोग हुआ है, पर साथ ही देवताओं से याचना की गई है कि ‘ऐसी नौबत न आने पाए’ जिसमें ‘मा’ का और ‘न’ प्रयोग हुआ है (मा नो दु:शंस ईशत – दुष्ट हमारे ऊपर हावी न हो जाय)। अन्यथा भी वे अपने भयभीत रहने की बात करते हैं (स्वप्ने भयं भीरवे मह्यं आस – मुझ भय-कातर जन को सपने में भी डर सताता रहता है)। दूसरे सन्दर्भों में भी बार बार उनकी चिन्ता प्रकट होती है – ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं न: वृकात् अघायो:।

जब मैं कहता हूं यह पूरा पाठ, यह गढ़ा हुआ इतिहास जालसाजी का नमूना है तो इसलिए कि इसमें जबरदस्ती, धौंस के बल पर हर कड़ी को उलट कर पेश किया गया। जो डरा हुआ था उसे हत्यारा, क्रूर, युद्धोन्मादी सिद्ध किया गया। जिस पर लुटेरों, बटमारों का हमला हो रहा था, उसे एक सभ्यता पर आक्रमणकारी सिद्ध कर दिया गया। इसका लगातार कई कोनों से, जिनमें भी इसी तरह की धांधली की गई थी, इस तरह शोर मचाया जाता रहा कि, वैदिक का ज्ञान न सही, किसी ने पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किए गए अनुवादों तक को नहीं देखा, जिनमें सारी खींचतान के बाद भी, उन अनुवादकों तक ने स्वीकार किया था कि ऋग्वेद में आक्रमण का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

हम आर्यों के काम काज की बात कर रहे थे, और माल-मता संभालने और उससे जुड़ी आशंकाओं के अनावश्यक विस्तार में चले गए। हम जिस प्रश्न को केन्द्र में रखना चाहते थे वह यह कि जिन कामों का श्रेय हम आर्यों को देते रहे हैं क्या वे उन्हें करते भी रहे हैं?

आर्यों को जाली इतिहास में भी पशुपालक बताया गया है और वर्ण धर्म में भी गोरक्षा उनका कार्य भार माना गया है। कृषि और वाणिज्य तो माना ही गया है? क्या यह संभव है कि वही व्यक्ति खेती भी करे और गोरू भी चराए ? या वह खेती भी करे और वाणिज्य भी करे? यदि नहीं तो मानना होगा कि पशुपालन करने वालों और किसानी करने वालों को भी आर्य कहा जाता था। यदि ऐसा नहीं है तो मानना होगा आर्य धन दौलत का जुगाड़ करने और उसी के बल पर दूसरों से वे काम कराता था और स्वयं उनके लिए साधन जुटाता, उन की निगरानी करने का काम करता था।

ऋग्वेद में ऐसे संकेत आए हैं जिनसे प्रकट होता है कि पशुओं का मालिक कोई और है और उन्हें चराने वाला (गोप) कोई दूसरा। खेत का मालिक कोई और है और कीनाश या हलवाहा अलग से एक पेशा बन चुका था। संक्षेप में कहें तो ऋग्वेद में कार्यविभाजन हो चुका है, और ऐसा वर्ग अस्तित्व में आ चुका है जो केवल अपने श्रम और दक्षता के माधयम से अपनी जिविका अर्जित करता था, स्वामित्व दूसरे के हाथ में था जो इसके श्रम के उत्पाद को तो अपना मानता ही था, उत्पादक के काम का श्रेय भी उसे ही दिया जाता था। ऐसा आर्यों के हमले की बात करने वालों की कृतियों में खास तौर से इसलिए किया गया कि बर्बर जनों को सभ्यता का जनक सिद्ध किया जा सके।

उदाहरण के लिए उनके द्वारा दावा यह किया जाता रहा कि अश्वपालन का, वन्य अश्व को पकड़ने, पालने, प्रशिक्षित करने का काम आर्यों ने किया, परन्तु भारतीय स्रोत और परंपरा कहते हैं कि अश्व वैदिक समाज को सिन्धियों के माध्यम से प्राप्त होता था और इसलिए इसका एक पर्याय सैंधव है। दूसरी ओर हम पाते हैं कि जिस मध्य एशिया से आर्यों को भारत पर हमला कराया जाता था, उस पर सिन्धियों का दबदबा इतना था कि उसे सिन्तास्ता या सिन्धियों का देश कहा जाता रहा। ये सिन्धी सिन्धु नद के क्षेत्र से वहां जा कर बसें थे, क्योंकि उन्होंने कतिपय नदियों का नामकरण सिन्धु की सहायिकाओं के नाम पर रखा था। इसके दो सरलार्थ हुए । एक यह कि वे वैदिक आर्यों के लिए अश्व का कारोबार करते थे, इसलिए उनकी संपर्क भाषा संस्कृत हो चुकी थी। अश्व और उसके रंग आदि के नाम इसी कारण संस्कृत में है। दूसरी संभावना यह कि उनके अश्वपालन की दक्षता का उपयोग वैदिक व्यापारी कर रहे थे। कारोबार के मालिक ये थे और सहायक या असली काम में उन्होंने सिन्धी जनों को लगा रखा था।

इसकी पुष्टि पश्चिम एशिया के उन अभिलेखों और देवनामों और व्यक्तिनामों से होती है, जो सभी वैदिक हैं, पर अशवपालन पर जो पाठ था जिसकी भाषा प्राकृत या संस्कृत का अपभ्रंश है, परन्तु प्रशिक्षक का नाम किक्कुली है, जो निश्चय ही अवैदिक है। इस तरह अश्वपालन का जो श्रेय आर्यों को दिया जाता रहा वह गलत था, इसका श्रेय इतर जनों को जाता है।

यह कहना भी गलत है कि आर्यों ने पहिए का आविष्कार किया । हमने एक शोधपत्र में यह बताया था कि पहिए के आविष्कार तीन-चार भिन्न भाषाई समुदाय के लोग कर रहे थे, जिनमें एक आर्यभाषी भी थे, परन्तु अरायुक्त पहिए का आविष्कार भृगुओं ने किया था जो असुर परंपरा के थे।

प्रसंगवश यह भी जिक्र कर दें कि अश्व शब्द के परवर्ती प्रयोग के कारण पाश्चात्य विद्वान इसे घास के मैदानों (स्तेप) के घोड़ों का नाम मान कर घोड़ा लेकर आने वाले आर्यों की छवि तैयार करते रहे। अश्व कच्छ से आयात किए जाने वाले गधे के लिए प्रयोग में आ रहा था। अश्व के अनेकश: पर्यायों मे से कौन भारतीय घोड़े के लिए प्रयोग में आ रहा था इसे हम छोड़ सकते हैं, पर यह याद दिलाना जरूरी है कि स्तेप के घोड़े के लिए वे ककुहास का प्रयोग करते थे। ककुभ का अर्थ टीला या पहाड़ की चोटी भी होता है इसलिए पश्चिम एशिया की बाजार में जब उन्होंने इसे उतारा तो इसे वहां की भाषा में भी पहाड़ी गधा कहा गया।

हम अपनी पुरानी बात को पुन: दुहराते हुए अन्त करें कि भारतीय सभ्यता का औद्योगिक तथा प्रौद्योगिक विकास तथाकथित शूद्रों और अन्य जनों पर निर्भर रहा है। वैदिक आर्यों की भूमिका पहल और प्रेरणा की रह गई थी ।

Post – 2018-02-09

(2)

यदि हम पुराण कथाओं की अन्त: प्रकृति या उसकी रचना प्रक्रिया की समझ रखते हैं तो वे उस युग को समझने में उतनी ही सहायक हो सकते हैं जैसे आज तक का साहित्य अपने-अपने कालों को समझने में सहायक होता है। यह न भूलना चाहिए कि पुराण अपनी सीमा में विश्वकोश हैं, परन्तु पुराण कथाएं लेखनपूर्व चरणों की साहित्यिक रचनाएं होती थीं, जिनका चरित्र बाद की उपदेश कथाओं जैसा था। सच कहें तो उपदेश कथाएं उसी परंपरा का विस्तार हैं। इनकी सोद्देश्यता इनका प्राण है। दुर्भाग्य से हाल के दिनों में इसकी समझ राजनीतिक लाभ के लिए जान बूझ कर नष्ट की गई है, और इनका उपयोग वहशीपन पैदा करने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि अशान्ति क्रान्ति का वहम तो पैदा कर ही लेती है।

यदि आप विविध चरणों पर देवासुर संग्राम को लें तो आहारसंचय के चरण से लेकर सभ्यता के कई चरणों का इतिहास चित्रवत सामने आ जाएगा । यहां हम केवल समुद्रमंथन की कथा की चर्चा करेंगे। इस कथा में सुदूर व्यापार को प्रतीकबद्ध किया गया है। सुदूर व्यापार में आज के दक्षिण एशियाई भूभाग से ले कर आर्यभाषा का पूरा प्रसारक्षेत्र आ जाता है । उल्लेख तो समुद्रमंथन का है, पर इसमें जलमार्ग और स्थलमार्ग दोनों से गहन सक्रियता – चरैवेति चरैवेति – आ जाती है। इसके दो तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी है । पहला यह कि जिस वासुकी नाग को रस्सी बना समुद्र का मंथन किया गया उससे जो विषैली फुफकार छूटती थी उसे देव झेल नहीं सकते, इसलिए फन के सिरे को असुर पकड़ते हैं और पूंछ वाले सिरे को देव समाज संभालता है। यह याद दिला दें कि जिस अमृत के लिए ‘समुद्रमंथन’ किया जा रहा था वह सोना था – अमृतं हिरण्यम् ; व्यापारिक लाभ था। गाय और घोड़ा समुद्र से तो नहीं निकल सकते, पर कच्छ और गुजरात गायों घोड़ों के लिए और गीर के वन गजराज के लिए प्रसिद्ध हैं । कच्छ के एक स्थल का नाम घोड़ेवाली वाडी (मंडी) है जहां से हड़प्पाकालीन अवशेष मिलने का दावा किया गया है।

जिस तथ्य की ओर हम ध्यान दिलाना चाहते हैं वह यह कि जोखिम भरा और कठिन श्रम, खतरों से बचाव का काम असुर करते है, पर पहल, वितरण व्यवस्था देवों के हाथ में रहती है।

सभ्यता का पूरा तंन्त्र श्रमिकों, कारीगरों, आविष्कारकों आदि पर निर्भर रहा है जब कि कतर-व्यौंत से संपत्ति संग्रह और साधनों पर अधिकार करने वाले पहल और प्रबन्धन अपने हाथ में रखते रहे हैं, और अधिकतम उत्पाद या लाभ अपने पास रख कर केवल उतना ही उत्पादकों को देते रहे हैं, जिससे उसका भरण-पोषण होता रहे और नई सूझ-बूझ वाले कारीगर/विशेषज्ञ कुछ मौज मस्ती में रह सकें, जब कि उनके मन में इस बेईमानी को लेकर असन्तोष रहा है और समय-समय पर वे इसके लिए विद्रोह भी करते रहे हैं। इसे देवासुर संग्राम, या मार्क्सवादी शब्दावली में शोषक और शोषित का टकराव कहा जा सकता है। इसी अर्थ में मार्क्स के इस कथन को समझा जा सकता है कि पहले के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है जिसका बहुत भोंड़ा अर्थ भारत में वर्ण ही वर्ग है, कर लिया गया। दुनिया के सभी देशों में संपत्ति पर अधिकार करने वालों और संपत्ति से वंचित रह गए या कर दिए जाने वालों का और अपने श्रम और योग्यता को उनकी सेवा में लगाकर जीविका अर्जित करने वालों के दो वर्ग रहे हैं। भारत में इस व्यवस्था को अधिक अचूक बना लिया गया था।

यदि आर्य विशेषण का प्रयोग स्वामी और वैश्य के लिए होता रहा है और यदि वैश्य के अधिकार में संपत्ति के तीनों स्रोत – कृषि वाणिज्य, गोरक्षा या पशुपालन रहा है, तो वैश्य और स्वामी दोनों का अर्थ एक ही हुआ। ऐसी दशा में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी वैश्यों के उपजीवी, रक्षा और अनिष्ट निवारण की योग्यताओं के कारण उसके आश्रित हुए जिनकी अन्य भूमिकाओं में एक हुआ, उत्पादक वर्ग को नियन्त्रित रखना। आर्य शब्द का आशय ही नहीं इस पूरे तन्त्र का जितना स्पष्ट प्रतिबिंबन ऋग्वेद में है वैसा मेरी जानकारी में किसी अन्य कृति में नहीं है । यह ध्यान रहे कि स्वामिवर्ग और समाज के नियंत्रण और प्रबन्धन में उसका सहायक या अनुषंगी वर्ग कुछ भी उत्पादित नहीं करता था।

संस्कृत भाषी आर्य यदि कहीं अन्यत्र से भारत में आए होते, परन्तु उस समाज के क्रतुविद या वैज्ञानिकों, कलाविदों और श्रमिकों की भूमिका को भी इस सुझाव में स्थान दिया गया होता, और हम बिना तोड़ मरोड़ के उन सामाजिक और आर्थिक संबंधों को समझ पाते तो उस दशा में उन्हें आदि काल से भारत का निवासी सिद्ध करने वाले मुझे दुराग्रही ही नहीं, इतिहास को समझने में बाधक और उपद्रवी भी लगते।

परन्तु यहां सारा जोर लूटने, मारने, कब्जा जमाने पर था और यह काम इतनी धूर्तता से किया गया जैसी जुआड़ियों और अपराधियों में भी देखने में नहीं आती । सभ्यता के निर्माताओं को जादू की छड़ी से गायब कर दिया गया, सभ्यता का श्रेय उसका विनाश करने वाले दुर्दान्त, बर्बर, रक्तपिपाशुओं को दे दिया गया। बाद में समय समय पर वैसे ही बर्बर और रक्तपिपाशु जत्थों को भारतीय समाज में नई ऊर्जा का संचार करने वाला सिद्ध किया जाता रहा, और सबसे बड़ी बात यह कि यह तर्क खड़ा किया जाता रहा कि भारत में सदा से आक्रमणकारी ही सत्ता पर अधिकार करके राज्य करते रहे हैं, इसलिए जो अधिकार उन्हें हासिल था वह अंग्रेजों को भी हासिल है। यह उनकी जरूरत थी यह समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि मार्क्सवादी इतिहासकारों की कौन सी जरूरत थी कि वे उपनिवेशवादियों और मिशनरियों के साथ लामबंद होते रहे और यूरोपीय इतिहासकारों की शरारत को उजागर करने वाले भारतीय इतिहासकारों का उपहास करते और पाठ्यक्रमों से बाहर करते रहे।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि वे भारतीय सभ्यता के निर्माण में आर्येतर समाज की विशेषत: असवर्ण समुदायों की भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए जब कि एक मार्क्सवादी के रूप में उन्हें इनकी भूमिका को केन्द्रीयता देनी चाहिए थी। हम आगे यह देखेंगे कि आर्यों को जिन भी बातों का श्रेय दिया जाता है उनमें से कोई भी उनकी खोज या आविष्कार नहीं है। उनका श्रेय असुर कहे जाने वाले जनों को है जिन्हे कोसंबी ने हैवान कह कर दरकिनार कर दिया था।

Post – 2018-02-09

(2)

यदि हम पुराण कथाओं की अन्त: प्रकृति या उसकी रचना प्रक्रिया की समझ रखते हैं तो वे उस युग को समझने में उतनी ही सहायक हो सकते हैं जैसे आज तक का साहित्य अपने-अपने कालों को समझने में सहायक होता है। यह न भूलना चाहिए कि पुराण अपनी सीमा में विश्वकोश हैं, परन्तु पुराण कथाएं लेखनपूर्व चरणों की साहित्यिक रचनाएं होती थीं, जिनका चरित्र बाद की उपदेश कथाओं जैसा था। सच कहें तो उपदेश कथाएं उसी परंपरा का विस्तार हैं। इनकी सोद्देश्यता इनका प्राण है। दुर्भाग्य से हाल के दिनों में इसकी समझ राजनीतिक लाभ के लिए जान बूझ कर नष्ट की गई है, और इनका उपयोग वहशीपन पैदा करने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि अशान्ति क्रान्ति का वहम तो पैदा कर ही लेती है।

यदि आप विविध चरणों पर देवासुर संग्राम को लें तो आहारसंचय के चरण से लेकर सभ्यता के कई चरणों का इतिहास चित्रवत सामने आ जाएगा । यहां हम केवल समुद्रमंथन की कथा की चर्चा करेंगे। इस कथा में सुदूर व्यापार को प्रतीकबद्ध किया गया है। सुदूर व्यापार में आज के दक्षिण एशियाई भूभाग से ले कर आर्यभाषा का पूरा प्रसारक्षेत्र आ जाता है । उल्लेख तो समुद्रमंथन का है, पर इसमें जलमार्ग और स्थलमार्ग दोनों से गहन सक्रियता – चरैवेति चरैवेति – आ जाती है। इसके दो तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी है । पहला यह कि जिस वासुकी नाग को रस्सी बना समुद्र का मंथन किया गया उससे जो विषैली फुफकार छूटती थी उसे देव झेल नहीं सकते, इसलिए फन के सिरे को असुर पकड़ते हैं और पूंछ वाले सिरे को देव समाज संभालता है। यह याद दिला दें कि जिस अमृत के लिए ‘समुद्रमंथन’ किया जा रहा था वह सोना था – अमृतं हिरण्यम् ; व्यापारिक लाभ था। गाय और घोड़ा समुद्र से तो नहीं निकल सकते, पर कच्छ और गुजरात गायों घोड़ों के लिए और गीर के वन गजराज के लिए प्रसिद्ध हैं । कच्छ के एक स्थल का नाम घोड़ेवाली वाडी (मंडी) है जहां से हड़प्पाकालीन अवशेष मिलने का दावा किया गया है।

जिस तथ्य की ओर हम ध्यान दिलाना चाहते हैं वह यह कि जोखिम भरा और कठिन श्रम, खतरों से बचाव का काम असुर करते है, पर पहल, वितरण व्यवस्था देवों के हाथ में रहती है।

सभ्यता का पूरा तंन्त्र श्रमिकों, कारीगरों, आविष्कारकों आदि पर निर्भर रहा है जब कि कतर-व्यौंत से संपत्ति संग्रह और साधनों पर अधिकार करने वाले पहल और प्रबन्धन अपने हाथ में रखते रहे हैं, और अधिकतम उत्पाद या लाभ अपने पास रख कर केवल उतना ही उत्पादकों को देते रहे हैं, जिससे उसका भरण-पोषण होता रहे और नई सूझ-बूझ वाले कारीगर/विशेषज्ञ कुछ मौज मस्ती में रह सकें, जब कि उनके मन में इस बेईमानी को लेकर असन्तोष रहा है और समय-समय पर वे इसके लिए विद्रोह भी करते रहे हैं। इसे देवासुर संग्राम, या मार्क्सवादी शब्दावली में शोषक और शोषित का टकराव कहा जा सकता है। इसी अर्थ में मार्क्स के इस कथन को समझा जा सकता है कि पहले के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है जिसका बहुत भोंड़ा अर्थ भारत में वर्ण ही वर्ग है, कर लिया गया। दुनिया के सभी देशों में संपत्ति पर अधिकार करने वालों और संपत्ति से वंचित रह गए या कर दिए जाने वालों का और अपने श्रम और योग्यता को उनकी सेवा में लगाकर जीविका अर्जित करने वालों के दो वर्ग रहे हैं। भारत में इस व्यवस्था को अधिक अचूक बना लिया गया था।

यदि आर्य विशेषण का प्रयोग स्वामी और वैश्य के लिए होता रहा है और यदि वैश्य के अधिकार में संपत्ति के तीनों स्रोत – कृषि वाणिज्य, गोरक्षा या पशुपालन रहा है, तो वैश्य और स्वामी दोनों का अर्थ एक ही हुआ। ऐसी दशा में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी वैश्यों के उपजीवी, रक्षा और अनिष्ट निवारण की योग्यताओं के कारण उसके आश्रित हुए जिनकी अन्य भूमिकाओं में एक हुआ, उत्पादक वर्ग को नियन्त्रित रखना। आर्य शब्द का आशय ही नहीं इस पूरे तन्त्र का जितना स्पष्ट प्रतिबिंबन ऋग्वेद में है वैसा मेरी जानकारी में किसी अन्य कृति में नहीं है । यह ध्यान रहे कि स्वामिवर्ग और समाज के नियंत्रण और प्रबन्धन में उसका सहायक या अनुषंगी वर्ग कुछ भी उत्पादित नहीं करता था।

संस्कृत भाषी आर्य यदि कहीं अन्यत्र से भारत में आए होते, परन्तु उस समाज के क्रतुविद या वैज्ञानिकों, कलाविदों और श्रमिकों की भूमिका को भी इस सुझाव में स्थान दिया गया होता, और हम बिना तोड़ मरोड़ के उन सामाजिक और आर्थिक संबंधों को समझ पाते तो उस दशा में उन्हें आदि काल से भारत का निवासी सिद्ध करने वाले मुझे दुराग्रही ही नहीं, इतिहास को समझने में बाधक और उपद्रवी भी लगते।

परन्तु यहां सारा जोर लूटने, मारने, कब्जा जमाने पर था और यह काम इतनी धूर्तता से किया गया जैसी जुआड़ियों और अपराधियों में भी देखने में नहीं आती । सभ्यता के निर्माताओं को जादू की छड़ी से गायब कर दिया गया, सभ्यता का श्रेय उसका विनाश करने वाले दुर्दान्त, बर्बर, रक्तपिपाशुओं को दे दिया गया। बाद में समय समय पर वैसे ही बर्बर और रक्तपिपाशु जत्थों को भारतीय समाज में नई ऊर्जा का संचार करने वाला सिद्ध किया जाता रहा, और सबसे बड़ी बात यह कि यह तर्क खड़ा किया जाता रहा कि भारत में सदा से आक्रमणकारी ही सत्ता पर अधिकार करके राज्य करते रहे हैं, इसलिए जो अधिकार उन्हें हासिल था वह अंग्रेजों को भी हासिल है। यह उनकी जरूरत थी यह समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि मार्क्सवादी इतिहासकारों की कौन सी जरूरत थी कि वे उपनिवेशवादियों और मिशनरियों के साथ लामबंद होते रहे और यूरोपीय इतिहासकारों की शरारत को उजागर करने वाले भारतीय इतिहासकारों का उपहास करते और पाठ्यक्रमों से बाहर करते रहे।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि वे भारतीय सभ्यता के निर्माण में आर्येतर समाज की विशेषत: असवर्ण समुदायों की भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए जब कि एक मार्क्सवादी के रूप में उन्हें इनकी भूमिका को केन्द्रीयता देनी चाहिए थी। हम आगे यह देखेंगे कि आर्यों को जिन भी बातों का श्रेय दिया जाता है उनमें से कोई भी उनकी खोज या आविष्कार नहीं है। उनका श्रेय असुर कहे जाने वाले जनों को है जिन्हे कोसंबी ने हैवान कह कर दरकिनार कर दिया था।