Post – 2018-01-18

लौकिक संस्कृत (2)

यदि स्टीफेन हाकिंग्स का दृढ़ संकल्प प्रेरक न होता तो चारपाई पर निष्क्रिय पड़ा रहता । उनको नमन पूर्वक हम कल की चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं।

जिन दिनों राजदरबारों में संस्कृत का आदर था उन दिनों भी संस्कृत बोलने और लिखने वाले दुर्लभ थे। इसका एक प्रमाण पुराभिलेखों में ताम्रपत्रादि में पाई जानेवाला अशुद्धियॉं हैं। इसी का दूसरा पक्ष यह है कि संस्कृत में गद्य साहित्य का विकास न हो सका। किसी इतर भाषा में गाना गा लेना आसान है, पर जरूत पड़ने पर गद्य में कुछ कहना पड़े तो असलित सामने आ जाती है । पद्य में पुराने पद बन्धों की स्मृति उसी तर्ज पर कुछ गढ़ने जोड़ने में सहायक होती है। जिन दिनों खड़ीबोली कविता के उपयुक्त नहीं समझी जाती थी पूरे हिन्दी प्रदेश के कवि ब्रजभाषा में कविता करते थे जब कि ब्रजभाषा नहीं बोल सकते थे। भाषा पर अधिकार गद्य पर अधिकार से प्रकट होता है, यह बात संस्कृतज्ञों को भी मालूम थी- गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति । गद्य का विकास बोलचाल की भाषा पर निर्भर करता है। संस्कृत को योजनाबद्ध रूप में बोलचाल से अलग करके ब्राह्मणों ने अपनी कूट भाषा बना कर अपनी कालकोठरी में बन्द कर लिया। यह मानुषी वाक् से पारुषी वाक् बना दी गई।

यह तो रही कल की पोस्ट में छूटे रह गए कुछ बिन्दुओं का स्मरण ।

अब हम आज की समस्या पर आएं, साथ ही यह देखें कि संस्कृत में वह कौन सी विशेषता है कि लोक भाषाएं कला, प्रविधि, दर्शन और विज्ञान के उपयोग के लिए संस्कृत पर इतनी निर्भर करने लगती हैं कि वे संस्कृतमय हो कर संस्कृत की ही तरह अपनी बोली से दूर चली जाती हैं परन्तु उनके प्रसार और व्यवहार का क्षेत्र बढ़ जाता है, जैसा प्राकृत और पाली के साथ हुआ और कुछ दूर तक हिन्दी के साथ भी हो चुका है।

परन्तु इससे पहले हम दो बातों पर विचार करेंगे। पहला उन बिन्दुओं से संबंधित है जो अंग्रजी की कमियों को इंगित करते हुए एक दो मित्रों ने संस्कृत की क्लिष्टता का बचाव किया है और दूसरा इस बात से कि क्या संस्कृत को लौकिक संस्कृत बनाकर सामान्य बोलचाल की भाषा बनाया जा सकता है ? दूसरे प्रासंगिक प्रशन भी हैं जिनसे हम बचना चाहें तो अपने विषय के साथ न्याय नहीं कर सकते।

हमने संस्कृत की निखोटता को नहीं, इसके व्याकरण की जटिलता और व्याकरण से भाषाशिक्षा आदि की ओर ध्यान आकृष्ट किया था और अंग्रेजी के दोष गिनाने वालों में कुछ को पता होगा कि अंग्रेजी की वर्तनी के दोष को लेकर बर्नर्ड शा (Bernard Shaw on Language) ने कितनी तल्ख टिप्पणी की है । इसके बावजूद अंग्रेजी इंगलैंड के और उच्चारणभेद के साथ अमेरिका और आस्ट्रेलिया तथा दूसरे देशों में जहां उनके परिवार बसे हैं. वहां के बच्चे-बूढ़े सभी अंग्रेजी बोलते, समझते, पढ़ते, लिखते हैं। दूसरों को भिन्न भाषाई परिवेश में रहते हुए अंग्रेजी सीखनी होती है इसलिए शब्दभंडार से लेकर व्याकरण तक किताबों से सीखना पड़ता है इसके बाद भी जितने लोग अंग्रेजी लिख, पढ़ और बोल लेते हैं संस्कृत सीखने वालों में उसके शतांश भी ऐसा क्यों नहीं कर पाते जब कि 75 प्रतिशत शब्दभंडार से वे अपनी भाषाओं के माध्यम से परिचित होते हैं?

रही बात संस्कृत के लोकव्यवहार की भाषा बन पाने की समस्या। इसका सफल प्रयोग मैं देख चुका हं, यद्यपि उस किशोरवय में मुझे यह प्रयोग हास्यास्पद प्रतीत होता था, जैसे मेरा यह प्रस्ताव आप में से बहुतों को लग रहा होगा।

मेरे गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर भलुआन के एक ठिगने कद के बहुत ओजस्वी व्यक्ति थे, नाम विन्ध्याचलशर्मा शास्त्री। उन्होंने एकाएक ठान लिया कि वह संस्कृत छोड़ दूसरी कोई भाषा बोलेंगे ही नहीं। उनको अपनी बात समझाने में कभी परेशानी नहीं हुई। परन्तु उनकी संस्कृत व्यावहारिक संस्कृत थी –
द्वि आणकस्य जलेबीं देहि। इक्कया गच्छ।
सुनकर आरंभ में लोग मुस्कराते। बाद में मुस्कराना भी बन्द हो गया। आजीवन वह अपने व्रत पर कायम रहे।

संस्कृत से हमारी भाषाएं और भाषाओं से बोलियां नहीं पैदा हुईं, अपितु आर्थिक विकास के क्रम में हारसंग्रह के आदिम चरण के मानवयूथों के परस्पर निकट आने और वृहत्तर सामाजिक इकाइयों के गठन के चलते आदिम बोलियों का अधिक समर्थ बोलियों, भाषाओं और फिर संपर्क भाषाओं के गठन और क्रमिक मानकीकरण से वैदिक का प्रादुर्भाव हआ। यह प्रक्रिया कई हजार साल में सारस्वत क्षेत्र में पूरी हुुई और तब से आजतक यह क्षेत्र व्यापक प्रसारक्षेत्र वाली भाषाओं के मानकीकरण का केन्द्र बना हुआ है।

जिस तथ्य को मै यहां रेखांकित करना चाहता हूं वह यह कि वैदिक या संस्कृत शुद्ध भाषाएं नहीं हैं, बहुत सी बोलियों के मेल से बनी भाषाएं हैं और बोलियों से क्रमशः दूर होती हैं, न कि बोलियों का जन्म संस्कृत के विघटन से हुआ है।

चर्चा आज भी अधूरी रह गई। कल सही।

Post – 2018-01-18

लौकिक संस्कृत (2)

यदि स्टीफेन हाकिंग्स का दृढ़ संकल्प प्रेरक न होता तो चारपाई पर निष्क्रिय पड़ा रहता । उनको नमन पूर्वक हम कल की चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं।

जिन दिनों राजदरबारों में संस्कृत का आदर था उन दिनों भी संस्कृत बोलने और लिखने वाले दुर्लभ थे। इसका एक प्रमाण पुराभिलेखों में ताम्रपत्रादि में पाई जानेवाला अशुद्धियॉं हैं। इसी का दूसरा पक्ष यह है कि संस्कृत में गद्य साहित्य का विकास न हो सका। किसी इतर भाषा में गाना गा लेना आसान है, पर जरूत पड़ने पर गद्य में कुछ कहना पड़े तो असलित सामने आ जाती है । पद्य में पुराने पद बन्धों की स्मृति उसी तर्ज पर कुछ गढ़ने जोड़ने में सहायक होती है। जिन दिनों खड़ीबोली कविता के उपयुक्त नहीं समझी जाती थी पूरे हिन्दी प्रदेश के कवि ब्रजभाषा में कविता करते थे जब कि ब्रजभाषा नहीं बोल सकते थे। भाषा पर अधिकार गद्य पर अधिकार से प्रकट होता है, यह बात संस्कृतज्ञों को भी मालूम थी- गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति । गद्य का विकास बोलचाल की भाषा पर निर्भर करता है। संस्कृत को योजनाबद्ध रूप में बोलचाल से अलग करके ब्राह्मणों ने अपनी कूट भाषा बना कर अपनी कालकोठरी में बन्द कर लिया। यह मानुषी वाक् से पारुषी वाक् बना दी गई।

यह तो रही कल की पोस्ट में छूटे रह गए कुछ बिन्दुओं का स्मरण ।

अब हम आज की समस्या पर आएं, साथ ही यह देखें कि संस्कृत में वह कौन सी विशेषता है कि लोक भाषाएं कला, प्रविधि, दर्शन और विज्ञान के उपयोग के लिए संस्कृत पर इतनी निर्भर करने लगती हैं कि वे संस्कृतमय हो कर संस्कृत की ही तरह अपनी बोली से दूर चली जाती हैं परन्तु उनके प्रसार और व्यवहार का क्षेत्र बढ़ जाता है, जैसा प्राकृत और पाली के साथ हुआ और कुछ दूर तक हिन्दी के साथ भी हो चुका है।

परन्तु इससे पहले हम दो बातों पर विचार करेंगे। पहला उन बिन्दुओं से संबंधित है जो अंग्रजी की कमियों को इंगित करते हुए एक दो मित्रों ने संस्कृत की क्लिष्टता का बचाव किया है और दूसरा इस बात से कि क्या संस्कृत को लौकिक संस्कृत बनाकर सामान्य बोलचाल की भाषा बनाया जा सकता है ? दूसरे प्रासंगिक प्रशन भी हैं जिनसे हम बचना चाहें तो अपने विषय के साथ न्याय नहीं कर सकते।

हमने संस्कृत की निखोटता को नहीं, इसके व्याकरण की जटिलता और व्याकरण से भाषाशिक्षा आदि की ओर ध्यान आकृष्ट किया था और अंग्रेजी के दोष गिनाने वालों में कुछ को पता होगा कि अंग्रेजी की वर्तनी के दोष को लेकर बर्नर्ड शा (Bernard Shaw on Language) ने कितनी तल्ख टिप्पणी की है । इसके बावजूद अंग्रेजी इंगलैंड के और उच्चारणभेद के साथ अमेरिका और आस्ट्रेलिया तथा दूसरे देशों में जहां उनके परिवार बसे हैं. वहां के बच्चे-बूढ़े सभी अंग्रेजी बोलते, समझते, पढ़ते, लिखते हैं। दूसरों को भिन्न भाषाई परिवेश में रहते हुए अंग्रेजी सीखनी होती है इसलिए शब्दभंडार से लेकर व्याकरण तक किताबों से सीखना पड़ता है इसके बाद भी जितने लोग अंग्रेजी लिख, पढ़ और बोल लेते हैं संस्कृत सीखने वालों में उसके शतांश भी ऐसा क्यों नहीं कर पाते जब कि 75 प्रतिशत शब्दभंडार से वे अपनी भाषाओं के माध्यम से परिचित होते हैं?

रही बात संस्कृत के लोकव्यवहार की भाषा बन पाने की समस्या। इसका सफल प्रयोग मैं देख चुका हं, यद्यपि उस किशोरवय में मुझे यह प्रयोग हास्यास्पद प्रतीत होता था, जैसे मेरा यह प्रस्ताव आप में से बहुतों को लग रहा होगा।

मेरे गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर भलुआन के एक ठिगने कद के बहुत ओजस्वी व्यक्ति थे, नाम विन्ध्याचलशर्मा शास्त्री। उन्होंने एकाएक ठान लिया कि वह संस्कृत छोड़ दूसरी कोई भाषा बोलेंगे ही नहीं। उनको अपनी बात समझाने में कभी परेशानी नहीं हुई। परन्तु उनकी संस्कृत व्यावहारिक संस्कृत थी –
द्वि आणकस्य जलेबीं देहि। इक्कया गच्छ।
सुनकर आरंभ में लोग मुस्कराते। बाद में मुस्कराना भी बन्द हो गया। आजीवन वह अपने व्रत पर कायम रहे।

संस्कृत से हमारी भाषाएं और भाषाओं से बोलियां नहीं पैदा हुईं, अपितु आर्थिक विकास के क्रम में हारसंग्रह के आदिम चरण के मानवयूथों के परस्पर निकट आने और वृहत्तर सामाजिक इकाइयों के गठन के चलते आदिम बोलियों का अधिक समर्थ बोलियों, भाषाओं और फिर संपर्क भाषाओं के गठन और क्रमिक मानकीकरण से वैदिक का प्रादुर्भाव हआ। यह प्रक्रिया कई हजार साल में सारस्वत क्षेत्र में पूरी हुुई और तब से आजतक यह क्षेत्र व्यापक प्रसारक्षेत्र वाली भाषाओं के मानकीकरण का केन्द्र बना हुआ है।

जिस तथ्य को मै यहां रेखांकित करना चाहता हूं वह यह कि वैदिक या संस्कृत शुद्ध भाषाएं नहीं हैं, बहुत सी बोलियों के मेल से बनी भाषाएं हैं और बोलियों से क्रमशः दूर होती हैं, न कि बोलियों का जन्म संस्कृत के विघटन से हुआ है।

चर्चा आज भी अधूरी रह गई। कल सही।

Post – 2018-01-18

लौकिक संस्कृत (2)

यदि स्टीफेन हाकिंग्स का दृढ़ संकल्प प्रेरक न होता तो चारपाई पर निष्क्रिय पड़ा रहता । उनको नमन पूर्वक हम कल की चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं।

जिन दिनों राजदरबारों में संस्कृत का आदर था उन दिनों भी संस्कृत बोलने और लिखने वाले दुर्लभ थे। इसका एक प्रमाण पुराभिलेखों में ताम्रपत्रादि में पाई जानेवाला अशुद्धियॉं हैं। इसी का दूसरा पक्ष यह है कि संस्कृत में गद्य साहित्य का विकास न हो सका। किसी इतर भाषा में गाना गा लेना आसान है, पर जरूत पड़ने पर गद्य में कुछ कहना पड़े तो असलित सामने आ जाती है । पद्य में पुराने पद बन्धों की स्मृति उसी तर्ज पर कुछ गढ़ने जोड़ने में सहायक होती है। जिन दिनों खड़ीबोली कविता के उपयुक्त नहीं समझी जाती थी पूरे हिन्दी प्रदेश के कवि ब्रजभाषा में कविता करते थे जब कि ब्रजभाषा नहीं बोल सकते थे। भाषा पर अधिकार गद्य पर अधिकार से प्रकट होता है, यह बात संस्कृतज्ञों को भी मालूम थी- गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति । गद्य का विकास बोलचाल की भाषा पर निर्भर करता है। संस्कृत को योजनाबद्ध रूप में बोलचाल से अलग करके ब्राह्मणों ने अपनी कूट भाषा बना कर अपनी कालकोठरी में बन्द कर लिया। यह मानुषी वाक् से पारुषी वाक् बना दी गई।

यह तो रही कल की पोस्ट में छूटे रह गए कुछ बिन्दुओं का स्मरण ।

अब हम आज की समस्या पर आएं, साथ ही यह देखें कि संस्कृत में वह कौन सी विशेषता है कि लोक भाषाएं कला, प्रविधि, दर्शन और विज्ञान के उपयोग के लिए संस्कृत पर इतनी निर्भर करने लगती हैं कि वे संस्कृतमय हो कर संस्कृत की ही तरह अपनी बोली से दूर चली जाती हैं परन्तु उनके प्रसार और व्यवहार का क्षेत्र बढ़ जाता है, जैसा प्राकृत और पाली के साथ हुआ और कुछ दूर तक हिन्दी के साथ भी हो चुका है।

परन्तु इससे पहले हम दो बातों पर विचार करेंगे। पहला उन बिन्दुओं से संबंधित है जो अंग्रजी की कमियों को इंगित करते हुए एक दो मित्रों ने संस्कृत की क्लिष्टता का बचाव किया है और दूसरा इस बात से कि क्या संस्कृत को लौकिक संस्कृत बनाकर सामान्य बोलचाल की भाषा बनाया जा सकता है ? दूसरे प्रासंगिक प्रशन भी हैं जिनसे हम बचना चाहें तो अपने विषय के साथ न्याय नहीं कर सकते।

हमने संस्कृत की निखोटता को नहीं, इसके व्याकरण की जटिलता और व्याकरण से भाषाशिक्षा आदि की ओर ध्यान आकृष्ट किया था और अंग्रेजी के दोष गिनाने वालों में कुछ को पता होगा कि अंग्रेजी की वर्तनी के दोष को लेकर बर्नर्ड शा (Bernard Shaw on Language) ने कितनी तल्ख टिप्पणी की है । इसके बावजूद अंग्रेजी इंगलैंड के और उच्चारणभेद के साथ अमेरिका और आस्ट्रेलिया तथा दूसरे देशों में जहां उनके परिवार बसे हैं. वहां के बच्चे-बूढ़े सभी अंग्रेजी बोलते, समझते, पढ़ते, लिखते हैं। दूसरों को भिन्न भाषाई परिवेश में रहते हुए अंग्रेजी सीखनी होती है इसलिए शब्दभंडार से लेकर व्याकरण तक किताबों से सीखना पड़ता है इसके बाद भी जितने लोग अंग्रेजी लिख, पढ़ और बोल लेते हैं संस्कृत सीखने वालों में उसके शतांश भी ऐसा क्यों नहीं कर पाते जब कि 75 प्रतिशत शब्दभंडार से वे अपनी भाषाओं के माध्यम से परिचित होते हैं?

रही बात संस्कृत के लोकव्यवहार की भाषा बन पाने की समस्या। इसका सफल प्रयोग मैं देख चुका हं, यद्यपि उस किशोरवय में मुझे यह प्रयोग हास्यास्पद प्रतीत होता था, जैसे मेरा यह प्रस्ताव आप में से बहुतों को लग रहा होगा।

मेरे गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर भलुआन के एक ठिगने कद के बहुत ओजस्वी व्यक्ति थे, नाम विन्ध्याचलशर्मा शास्त्री। उन्होंने एकाएक ठान लिया कि वह संस्कृत छोड़ दूसरी कोई भाषा बोलेंगे ही नहीं। उनको अपनी बात समझाने में कभी परेशानी नहीं हुई। परन्तु उनकी संस्कृत व्यावहारिक संस्कृत थी –
द्वि आणकस्य जलेबीं देहि। इक्कया गच्छ।
सुनकर आरंभ में लोग मुस्कराते। बाद में मुस्कराना भी बन्द हो गया। आजीवन वह अपने व्रत पर कायम रहे।

संस्कृत से हमारी भाषाएं और भाषाओं से बोलियां नहीं पैदा हुईं, अपितु आर्थिक विकास के क्रम में हारसंग्रह के आदिम चरण के मानवयूथों के परस्पर निकट आने और वृहत्तर सामाजिक इकाइयों के गठन के चलते आदिम बोलियों का अधिक समर्थ बोलियों, भाषाओं और फिर संपर्क भाषाओं के गठन और क्रमिक मानकीकरण से वैदिक का प्रादुर्भाव हआ। यह प्रक्रिया कई हजार साल में सारस्वत क्षेत्र में पूरी हुुई और तब से आजतक यह क्षेत्र व्यापक प्रसारक्षेत्र वाली भाषाओं के मानकीकरण का केन्द्र बना हुआ है।

जिस तथ्य को मै यहां रेखांकित करना चाहता हूं वह यह कि वैदिक या संस्कृत शुद्ध भाषाएं नहीं हैं, बहुत सी बोलियों के मेल से बनी भाषाएं हैं और बोलियों से क्रमशः दूर होती हैं, न कि बोलियों का जन्म संस्कृत के विघटन से हुआ है।

चर्चा आज भी अधूरी रह गई। कल सही।

Post – 2018-01-17

लौकिक संस्कृत

इस विषय पर मैंने एक मित्र की पोस्ट पर अपनी टिप्पणी दी थी, जिसमें यह सुझाया था कि यदि आधुनिक ग्रीक की तरह पाणिनीय संस्कृत की तरह लौकिक संस्कृत बनाया जा सके तो यह एक जीवन्त और अखिल भारतीय व्यवहार की सर्वमान्य भाषा बन सकती है। इस पर अनेक मतामत आए, इसलिए अपने मत को कुछ विस्तार से रखना जरूरी लगा।

यदि हमें भारतीय मानस को अंग्रेजी की जकड़बन्दी से मुक्त करना है, तो हमें आधुनिक ग्रीक की तरह लौकिक संस्कृत की जरूरत हे। इसके जानकारों के लिए पाणिनीय संस्कृत सीखना आसान हो जाएगा। जीवित भाषा ही नहीं प्रत्येक जीवित प्राणी, पौधा, व्यक्ति, संस्था में बदलाव आता है। वह लौकिक संस्कृत में भी होगा। बदलाव जीवन्तता का और इसका अभाव जड़ता या निष्प्राणता का प्रमाण। जीवित चलता है, जड़ को ढोना पड़ता है। संंस्कृत को ढोया जाता रहा है। द्वादश वर्ष पठेत् व्याकरणम् । जिस भाषा का व्याकरण समझने में बारह साल लग जायं, वह किसके काम आएगी

संस्कृत के छात्रों को अक्षरज्ञान के बाद अष्टाध्यायी रटाई जाती थी। इसका बड़ा अच्छा चित्रण माखनलाल चतुर्वेदी की जीवनी में ऋषि जैमिनी कृष्ण बरुआ ने उन्हीं के शब्दों में दिया है। उसके बाद लघुकौमुदी से साधनिका, फिर अमरकोश को कठस्थ करना। यह उनका अनुभव था। हो सकता है अन्य पाठशालाओं का तरीका भिन्न हो पर अधिक भिन्न नहीं था। मैने स्वयं इसका अनुभव किया है। यह सर्जनात्मकता को कुंद करने और सहज ज्ञेय को असाधारण जपाट श्रम और रटन्त बुद्धि से लंबे अभ्यास से अर्जित किया जाता है। संस्कृत का विद्वान अपने ज्ञान पर नहीं अपने श्रम पर गर्व करता है। वह युगों पुराने ज्ञान को जिसका एक अंश मानव स्वभाव से जुड़ा है और नीतिवाक्यों या सूक्तियों के रूप में उपलब्ध है इसलिए स्थायी महत्व का है अपनी परम उपलब्धि मानता और अवसर कुअवसर दुहराता है। तुलसी की कृपा से रामायण का पाठ करने वाले मात्र साक्षर सदगृहस्त के व्यावहारिक ज्ञान से ऐसे पंडितों का ज्ञान अधिक नहीं होता, फिर भी जब वही बात फर्राटे के बोलता है तो भाषा की दुरूहता और संस्कृत के प्रति आदर के कारण मूल को समझे बिना भी खासा रोब पड़ता है।

सच तो यह है कि संस्कृत का विद्वान संस्कृत का विद्वान संस्कृत बोलना नहीं जानता। वह धाराप्रवाह उदगार करता हे। वह श्रोता को अपनी बात समझाना और उसके मतामत को जानना नहीं चाहता, वह उसे आतंकित करना चाहता हे और इसलिए कंठस्थ को दूसरो की अपेक्षा अधिक वेग से उद्वमित करता है जो संस्कृत जाननेवालों में भी केवल उन्हीं के पल्ले पड़ता है जो पहले उससे कंठस्थ किए रहते हैं। इसे सुनना भी नहीं कहा जा सकता। इसे बौद्धिक जुगाली करना अवश्य कहा जा सकता है।

संस्कृत को जीवित रखने के लिए तीन काम जरूरी हेः
1. संस्कृत को संवाद की, सोचविचार की भाषा बनाना, जिसे लौकिक संस्कृत कह आए हं। यह आसान काम नहीं है। इसकी कुछ समस्यायें हैं। इस पर हम कल चर्चा करेंंगे
2. पाणिनीय संस्कृत के लिए अलग पीठ की स्थापना।
3- ठीक ऐसा ही पीठ की वैदिक के लिए स्थापना
इनमें विरोध पैदा न होगा, अपितु ये एक दूसरे के उत्कर्ष मे सहायक होंगे।

Post – 2018-01-17

लौकिक संस्कृत

इस विषय पर मैंने एक मित्र की पोस्ट पर अपनी टिप्पणी दी थी, जिसमें यह सुझाया था कि यदि आधुनिक ग्रीक की तरह पाणिनीय संस्कृत की तरह लौकिक संस्कृत बनाया जा सके तो यह एक जीवन्त और अखिल भारतीय व्यवहार की सर्वमान्य भाषा बन सकती है। इस पर अनेक मतामत आए, इसलिए अपने मत को कुछ विस्तार से रखना जरूरी लगा।

यदि हमें भारतीय मानस को अंग्रेजी की जकड़बन्दी से मुक्त करना है, तो हमें आधुनिक ग्रीक की तरह लौकिक संस्कृत की जरूरत हे। इसके जानकारों के लिए पाणिनीय संस्कृत सीखना आसान हो जाएगा। जीवित भाषा ही नहीं प्रत्येक जीवित प्राणी, पौधा, व्यक्ति, संस्था में बदलाव आता है। वह लौकिक संस्कृत में भी होगा। बदलाव जीवन्तता का और इसका अभाव जड़ता या निष्प्राणता का प्रमाण। जीवित चलता है, जड़ को ढोना पड़ता है। संंस्कृत को ढोया जाता रहा है। द्वादश वर्ष पठेत् व्याकरणम् । जिस भाषा का व्याकरण समझने में बारह साल लग जायं, वह किसके काम आएगी

संस्कृत के छात्रों को अक्षरज्ञान के बाद अष्टाध्यायी रटाई जाती थी। इसका बड़ा अच्छा चित्रण माखनलाल चतुर्वेदी की जीवनी में ऋषि जैमिनी कृष्ण बरुआ ने उन्हीं के शब्दों में दिया है। उसके बाद लघुकौमुदी से साधनिका, फिर अमरकोश को कठस्थ करना। यह उनका अनुभव था। हो सकता है अन्य पाठशालाओं का तरीका भिन्न हो पर अधिक भिन्न नहीं था। मैने स्वयं इसका अनुभव किया है। यह सर्जनात्मकता को कुंद करने और सहज ज्ञेय को असाधारण जपाट श्रम और रटन्त बुद्धि से लंबे अभ्यास से अर्जित किया जाता है। संस्कृत का विद्वान अपने ज्ञान पर नहीं अपने श्रम पर गर्व करता है। वह युगों पुराने ज्ञान को जिसका एक अंश मानव स्वभाव से जुड़ा है और नीतिवाक्यों या सूक्तियों के रूप में उपलब्ध है इसलिए स्थायी महत्व का है अपनी परम उपलब्धि मानता और अवसर कुअवसर दुहराता है। तुलसी की कृपा से रामायण का पाठ करने वाले मात्र साक्षर सदगृहस्त के व्यावहारिक ज्ञान से ऐसे पंडितों का ज्ञान अधिक नहीं होता, फिर भी जब वही बात फर्राटे के बोलता है तो भाषा की दुरूहता और संस्कृत के प्रति आदर के कारण मूल को समझे बिना भी खासा रोब पड़ता है।

सच तो यह है कि संस्कृत का विद्वान संस्कृत का विद्वान संस्कृत बोलना नहीं जानता। वह धाराप्रवाह उदगार करता हे। वह श्रोता को अपनी बात समझाना और उसके मतामत को जानना नहीं चाहता, वह उसे आतंकित करना चाहता हे और इसलिए कंठस्थ को दूसरो की अपेक्षा अधिक वेग से उद्वमित करता है जो संस्कृत जाननेवालों में भी केवल उन्हीं के पल्ले पड़ता है जो पहले उससे कंठस्थ किए रहते हैं। इसे सुनना भी नहीं कहा जा सकता। इसे बौद्धिक जुगाली करना अवश्य कहा जा सकता है।

संस्कृत को जीवित रखने के लिए तीन काम जरूरी हेः
1. संस्कृत को संवाद की, सोचविचार की भाषा बनाना, जिसे लौकिक संस्कृत कह आए हं। यह आसान काम नहीं है। इसकी कुछ समस्यायें हैं। इस पर हम कल चर्चा करेंंगे
2. पाणिनीय संस्कृत के लिए अलग पीठ की स्थापना।
3- ठीक ऐसा ही पीठ की वैदिक के लिए स्थापना
इनमें विरोध पैदा न होगा, अपितु ये एक दूसरे के उत्कर्ष मे सहायक होंगे।

Post – 2018-01-17

लौकिक संस्कृत

इस विषय पर मैंने एक मित्र की पोस्ट पर अपनी टिप्पणी दी थी, जिसमें यह सुझाया था कि यदि आधुनिक ग्रीक की तरह पाणिनीय संस्कृत की तरह लौकिक संस्कृत बनाया जा सके तो यह एक जीवन्त और अखिल भारतीय व्यवहार की सर्वमान्य भाषा बन सकती है। इस पर अनेक मतामत आए, इसलिए अपने मत को कुछ विस्तार से रखना जरूरी लगा।

यदि हमें भारतीय मानस को अंग्रेजी की जकड़बन्दी से मुक्त करना है, तो हमें आधुनिक ग्रीक की तरह लौकिक संस्कृत की जरूरत हे। इसके जानकारों के लिए पाणिनीय संस्कृत सीखना आसान हो जाएगा। जीवित भाषा ही नहीं प्रत्येक जीवित प्राणी, पौधा, व्यक्ति, संस्था में बदलाव आता है। वह लौकिक संस्कृत में भी होगा। बदलाव जीवन्तता का और इसका अभाव जड़ता या निष्प्राणता का प्रमाण। जीवित चलता है, जड़ को ढोना पड़ता है। संंस्कृत को ढोया जाता रहा है। द्वादश वर्ष पठेत् व्याकरणम् । जिस भाषा का व्याकरण समझने में बारह साल लग जायं, वह किसके काम आएगी

संस्कृत के छात्रों को अक्षरज्ञान के बाद अष्टाध्यायी रटाई जाती थी। इसका बड़ा अच्छा चित्रण माखनलाल चतुर्वेदी की जीवनी में ऋषि जैमिनी कृष्ण बरुआ ने उन्हीं के शब्दों में दिया है। उसके बाद लघुकौमुदी से साधनिका, फिर अमरकोश को कठस्थ करना। यह उनका अनुभव था। हो सकता है अन्य पाठशालाओं का तरीका भिन्न हो पर अधिक भिन्न नहीं था। मैने स्वयं इसका अनुभव किया है। यह सर्जनात्मकता को कुंद करने और सहज ज्ञेय को असाधारण जपाट श्रम और रटन्त बुद्धि से लंबे अभ्यास से अर्जित किया जाता है। संस्कृत का विद्वान अपने ज्ञान पर नहीं अपने श्रम पर गर्व करता है। वह युगों पुराने ज्ञान को जिसका एक अंश मानव स्वभाव से जुड़ा है और नीतिवाक्यों या सूक्तियों के रूप में उपलब्ध है इसलिए स्थायी महत्व का है अपनी परम उपलब्धि मानता और अवसर कुअवसर दुहराता है। तुलसी की कृपा से रामायण का पाठ करने वाले मात्र साक्षर सदगृहस्त के व्यावहारिक ज्ञान से ऐसे पंडितों का ज्ञान अधिक नहीं होता, फिर भी जब वही बात फर्राटे के बोलता है तो भाषा की दुरूहता और संस्कृत के प्रति आदर के कारण मूल को समझे बिना भी खासा रोब पड़ता है।

सच तो यह है कि संस्कृत का विद्वान संस्कृत का विद्वान संस्कृत बोलना नहीं जानता। वह धाराप्रवाह उदगार करता हे। वह श्रोता को अपनी बात समझाना और उसके मतामत को जानना नहीं चाहता, वह उसे आतंकित करना चाहता हे और इसलिए कंठस्थ को दूसरो की अपेक्षा अधिक वेग से उद्वमित करता है जो संस्कृत जाननेवालों में भी केवल उन्हीं के पल्ले पड़ता है जो पहले उससे कंठस्थ किए रहते हैं। इसे सुनना भी नहीं कहा जा सकता। इसे बौद्धिक जुगाली करना अवश्य कहा जा सकता है।

संस्कृत को जीवित रखने के लिए तीन काम जरूरी हेः
1. संस्कृत को संवाद की, सोचविचार की भाषा बनाना, जिसे लौकिक संस्कृत कह आए हं। यह आसान काम नहीं है। इसकी कुछ समस्यायें हैं। इस पर हम कल चर्चा करेंंगे
2. पाणिनीय संस्कृत के लिए अलग पीठ की स्थापना।
3- ठीक ऐसा ही पीठ की वैदिक के लिए स्थापना
इनमें विरोध पैदा न होगा, अपितु ये एक दूसरे के उत्कर्ष मे सहायक होंगे।

Post – 2018-01-15

सोचना अपने आप से टकराना हे, अपनी बद्धमूल धारणाओं को जांचना, अपनी गांठों को खोलना। यह आत्ममंथन है। अंतर्द्न्द्व। जो लोग लंबे समय से किसी एक ही मत पर कायम हैें उन्होंने उतने समय से सोचना स्थगित कर चुके हें।

Post – 2018-01-15

सोचना अपने आप से टकराना हे, अपनी बद्धमूल धारणाओं को जांचना, अपनी गांठों को खोलना। यह आत्ममंथन है। अंतर्द्न्द्व। जो लोग लंबे समय से किसी एक ही मत पर कायम हैें उन्होंने उतने समय से सोचना स्थगित कर चुके हें।

Post – 2018-01-15

सोचना अपने आप से टकराना हे, अपनी बद्धमूल धारणाओं को जांचना, अपनी गांठों को खोलना। यह आत्ममंथन है। अंतर्द्न्द्व। जो लोग लंबे समय से किसी एक ही मत पर कायम हैें उन्होंने उतने समय से सोचना स्थगित कर चुके हें।

Post – 2018-01-15

दर्द की एक ही दवा है बस
हो न ऐसा कि वह दवा आए ।
आप आए यही बहुत कुछ है
आप खुश हैं ये इत्तला आए ।।