Post – 2018-01-22

बतंगड़
(संपादित )

हमने यह बात सरसरी तौर पर कह दी कि हजार बारह सौ साल संस्कृत भाषियों का मध्येशिया से लेकर लघु एशिया तक अश्व व्यापार के चलते प्रभुत्व रहा और इसी क्रम में संस्कृत का यूरोप तक प्रसार हुआ। यह बात बहुतों की समझ में नहीं आएगी। कारण कई हैं, पर सबसे बड़ा कारण यह है कि जब पुरातत्व, नृतत्व, साहित्य, भाषा सभी से यह सिद्ध हो चुका है कि न तो आर्यों की कोई जाति थी, न ही भारतीय उपमहाद्वीप में किसी जनसमूह का साढ़े चार हजार साल ख्रिष्टाब्द पूर्व से आठ सौ ख्रिष्टाब्द पूर्व के बीच किसी रूप में प्रवेश हुआ था, तो भी राजनीतिक कारणों से जेएनयू के प्रोफेसर, छात्र, और उससे निकले बुद्धिजीवी सभी एक सुर से आज भी आर्य आक्रमण की बात पूरे विश्वास से दुहराते रहते हैं। इसमें उनकी हितबद्धता है क्योंकि इसस सत्तर में प्रस्तावित भारत को खंड खंड करने की उस घिनौनी किलपैट्रिक योजना को पूरा करने में उन्हें मदद मिलती है जिसके बौद्धिक उत्तराधिकारी आज के तथाविज्ञापित मार्क्सवादी और सेकुलरिस्ट हैं जो यह भूल चुके होंगे कि पश्चिमी पाकिस्तान के अपने ही पूर्वी हिस्से के मुसलमानों पर किए जा रहे अवर्णनीय अत्याचारों के विरुद्ध बांग्लादेश मुक्तिवाहिनी के उठ खड़े होने के कारण भारत में उमड़ रहे शरणार्थियों के सैलाब से परेशान इन्दिरा जी ने इसके कूटनीतिक समाधान के लिए अमेरिका के प्रेजिडेंट निक्सन और हेनरी किसिंगर से मुलाकात की थी। इस आपदा का लाभ उठाते हुए उन्होंने उन पर दबाव डाला था कि भारत को सोवियत संघ से दूरी बनानी चाहिए और अमरीका से संबंध सुधारना चाहिए। इन्दिरा जी ने मानवता से आधार पर और लोकतांत्रिक मूल्यों की र क्षा के आधार पर अमेरिका से सहयोग चाहा था न कि राष्ट्रीय नीतियों में समझौते के आधार पर। वह दृढ़ रहीं और यह निक्सन सरकार को इतना खला था कि किसिंगर ने उनके लिए गाली तक का प्रयोग किया था। शी इज ए बिच। उसके बाद लौट कर यह जानते हुए कि अमेरिका पूरी तरह पश्चिमी पाकिस्तान के साथ है वह कठोर फैसला लिया था जो इतिहास का हिस्सा है। अमेरिकी युद्धपोत जब तक हिन्द महासागर में प्रवेश करें, पाकिस्तानी जनरल ने हथियार डाल दिए थे। पाकिस्तान सिकुड़ कर पश्चिम तक सीमित रह गया था। किलपैट्रिक की बाल्कनाइजेशन आफ इंडिया इसी का जवाब थी और उस समय से ही यह पाकिस्तान की महत्कांक्षी योजनाओं में से एक है । कश्मीर में उसकी हर कीमत पर दखलअन्दाजी उसी नीति का विस्तार।

मार्क्सवादियों को मार्क्स के जो जुमले बहुत पसन्द है उनमें से एक है “इतिहास अपने को दुहराता है, पहले त्रासदी के रूप में और फिर भड़ैती के रूप में”(History repeats itself, first as tragedy, second as farce.) उसी इन्दरा जी के वंशधर और उसी कांग्रेस के उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाले और उसी कम्युनिस्ट पार्टी के उत्तराधिकारी जिससे दूरी बनाने को इन्दिरा जी खतरा उठाकर भी तैयार नहीं हुई थी, जब किलपैट्रिक की पाकिस्तान द्वारा चलाई जा रही भारत को खंड खंड करने की निरंतर योजनाएं बनाते और कार्यान्वित करते हुए “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशां अल्ला ! इंसां अल्ला!!” का नारा नेहरू विश्वविद्यालय में लगाने वालों के साथ खड़े होते हैं तो मार्क्सवाद की कम समझ रखने के कारण मैं तय नहीं कर पाता कि इतिहास अपने को त्रासदी के रूप में दुहरा रहा है या भड़ैती के रूप में? कोई कांग्रेसी यह बता पाएगा कि इन्दिराजी के समय की कांग्रेस सोनिया और राहुल युग में चित्त पड़ी है या पट्ट।

अपने तईं मैं केवल यह बता सकता हूं कि खरदिमाग किलपैट्रिक के विषय में एक आलोचक ने टिप्पणी की थी कि She is more fool than Fascist. अब टुकड़़े करने का खेल खेलने वाले, (वे पद्मावती के सम्मान की आड़ में अपने ही देश में आग लगाने वाले भी हो सकते हैं) स्वयं तय करके बता दें कि वे फासिस्ट से अधिक मूर्ख हैं या मूर्ख से अधिक फासिस्ट तो उनकी ईमानदारी पर विश्वास बढ़ेगा।

गलत इतिहास की राजनीतिक कारणों से फसल उगाने वाले, केवल गलत ही नहीं होते, वे अपनी सारी ताकत सही इतिहास से ध्यान हटाने में लगा देते हैं, इसलिए उनका मुकाबला, उनकी ही करनी से पैदा हुआ उससे भी गलत इतिहास ही बन पाता है जिसका प्रचार उसका मजाक उड़ाने के लिए वे स्वयं करते हैं। यदि ऐसा न होता तो मुझ जैसे संपर्क से कटे और कोने में दुबके व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि डार्विन का उद्विकास का सिद्धान्त गलत है क्योंकि बन्दर से आदमी पैदा नहीं हो सकता, यह भाजपा से जुड़े एक मंत्री को पता चल गया है, और अब मोहेंजोदड़ो के मध्य चरण पर जो अग्निकांड हुआ था वह उस ब्रह्मास्त्र का परिणाम था, जिसे महाभारत युद्ध के अन्त में चलाया गया था । वास्तव में यह परमाणु बम था, और इस लिहाज से परमाणु बम का आविष्कार भारत में पांच हजार साल पहले हो गया था। भले ये लोग राजनीति करने वाले लोग हों पर इनके प्रति मेरा सम्मान बढ़ गया है और गुस्सा इस इतिहास का उपहास करने वालों पर आ रहा है।

इसके दो कारण हैं। पहला यह कि इन्होंने यह साबित कर दिया कि सत्ता के भरोसे एक तरह का मूर्खतापूर्ण इतिहास लिखने वालों को, सत्ता बदल के बाद बदला हुआ मूर्खतापूर्ण इतिहास आरंभ करने वालों का सम्मान करना चाहिए कि ये उनकी ही परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, न कि उपहास। इससे छोटे बड़े का लिहाज करने की युगों पुरानी परंपरा की रक्षा होगी। जैसे छोटा बड़े का चरण छूता है उसी तरह छोटे मूर्ख को बड़े मूर्ख का सम्मान करना चाहिए। तय उन्हें ही करना है कि वे छोटे हैं या बड़े।

दूसरा कारण यह है कि ये कोई नई बात नहीं कर रहे हैं। दो तीन दशक पहले से अमेरिका के ईसाई इंटेलिजेंट बिगिनिंग के नाम से कर रहे थे, और सुमेरी सभ्यता के जन्मदाता के रूप में एलिंएंस की भूमिका पर लेख आदि लिख रहे थे तो इन्होंने उसका मजाक नहीं उड़ाया, अपितु अपनी सेवाएं ईसाइयत के प्रचार के लिए पर्यावरण तैयार करने के लिए अर्पित करते रहे, क्योंकि सेकुलरिज्म की उनकी खास समझ के अनुसार एनीथिंग अदर दैन हिन्दुइज्म इज सेकुलर ऐंड साइंटिफिक, वह सन्तों का चमत्कार हो या हीलींग टच आफ दि होली। एक बात और याद दिला दें कि अपने प्राचीन साहित्य से ऐसे ही तुक्के भिड़ाते हुए चीनी इतिहासकारों ने बहुत से दावे किए थे जिनमें से अनेक को नीढम को मानना पड़ा था, इसलिए नकारात्क सोच से यह तुक्केबाजी भी अच्छी है।

लीजिए, संस्कृत के प्रचार का तन्त्र, और मध्येशिया से लेकर लघु एशिया तक चलने वाले हजार डेढ़ हजार या इससे भी लंबे समय तक चलने वाली गतिविधि पर तो बात ही न हो पाई।

Post – 2018-01-21

लौकिक संस्कृत (5)

संस्कृत की क्लिष्टता का दूसरा कारण है द्विवचन का प्रयोग। यह किसी न किसी रूप में दुनिया की अनेकानेक प्राचीन भाषाओं में तलाशा गया है परन्तु संस्कृत ने इसे जिस पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया वह किसी अन्य में देखने में नहीं आता। संस्कृत के यूरोप तक प्रसार के चलते यह रोग लातिन, ग्रीक, जर्मनिक, स्लाव और लिथुआनी भाषाओं तक फैला और मध्येशिया से लेकर लघु एशिया तक संस्कृत भाषियों की हजार बारह सौ साल तक प्रभावशाली उपस्थिति और अश्वव्यापार की गतिविधियों के कारण इसकी छाप यूराल-अल्टाई बोलियों, हिब्रू और अरबी पर भी पड़ी, परन्तु स्लाव को छोड़कर किसी अन्य पर यह टिकाऊ प्रभाव नहीं डाल सका। ग्रीक में होमर की रचनाओं में यह प्रभाव अधिक गोचर है क्योंकि होमर लघु एशिया के थे जिसे क्लासिकी ग्रीक की जन्मभूमि कहा जा सकता है। जल्द ही ग्रीक इससे मुक्त हो गई। लातिन पर यह प्रभाव उससे भी क्षीण था, इसलिए उसने भी छुट्टी पा ली। पुरानी जर्मनिक में यह किंचित् अधिक स्पष्ट था, जिसका कारण तलाशना होगा। संस्कृत में यह वैदिक और अवेस्ता की तुलना में अधिक प्रबल हुआ और संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया सभी पर छाया रहा, जब कि संस्कृत की छायाजीवी बनी प्राकृत, पालि, अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं और बोलियों ने इसे धता बता दिया और इसके अभाव में किसी भाषा को कोई क्षति नहीं पहुंची। यह अनावश्यक बोझ है जिसका प्राचीन कृतियों के अध्येताओं के लिए कुछ औचित्य भले हो, परन्तु यदि संस्कृत को आधुनिक व्यवहार की भाषा बनने की रंचमात्र आकांक्षा है तो द्विवचन के जड़भार से मुक्त होना होगा और संभवतः संस्कृत को लोकप्रिय बनाने के लिए चल रहे प्रयोगों में इससे मुक्ति पाई जा चुकी हो।

पर सबसे क्रान्तिकारी खुलापन प्रायोगिक स्तर पर अपेक्षित है जिसे हासिल किया जा सके तो संस्कृत आधुनिक भारतीय भाषाओं से भी अधिक सरल और सर्वजनग्राह्य हो सकती है। इसे हम कल समझने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2018-01-21

लौकिक संस्कृत (5)

संस्कृत की क्लिष्टता का दूसरा कारण है द्विवचन का प्रयोग। यह किसी न किसी रूप में दुनिया की अनेकानेक प्राचीन भाषाओं में तलाशा गया है परन्तु संस्कृत ने इसे जिस पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया वह किसी अन्य में देखने में नहीं आता। संस्कृत के यूरोप तक प्रसार के चलते यह रोग लातिन, ग्रीक, जर्मनिक, स्लाव और लिथुआनी भाषाओं तक फैला और मध्येशिया से लेकर लघु एशिया तक संस्कृत भाषियों की हजार बारह सौ साल तक प्रभावशाली उपस्थिति और अश्वव्यापार की गतिविधियों के कारण इसकी छाप यूराल-अल्टाई बोलियों, हिब्रू और अरबी पर भी पड़ी, परन्तु स्लाव को छोड़कर किसी अन्य पर यह टिकाऊ प्रभाव नहीं डाल सका। ग्रीक में होमर की रचनाओं में यह प्रभाव अधिक गोचर है क्योंकि होमर लघु एशिया के थे जिसे क्लासिकी ग्रीक की जन्मभूमि कहा जा सकता है। जल्द ही ग्रीक इससे मुक्त हो गई। लातिन पर यह प्रभाव उससे भी क्षीण था, इसलिए उसने भी छुट्टी पा ली। पुरानी जर्मनिक में यह किंचित् अधिक स्पष्ट था, जिसका कारण तलाशना होगा। संस्कृत में यह वैदिक और अवेस्ता की तुलना में अधिक प्रबल हुआ और संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया सभी पर छाया रहा, जब कि संस्कृत की छायाजीवी बनी प्राकृत, पालि, अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं और बोलियों ने इसे धता बता दिया और इसके अभाव में किसी भाषा को कोई क्षति नहीं पहुंची। यह अनावश्यक बोझ है जिसका प्राचीन कृतियों के अध्येताओं के लिए कुछ औचित्य भले हो, परन्तु यदि संस्कृत को आधुनिक व्यवहार की भाषा बनने की रंचमात्र आकांक्षा है तो द्विवचन के जड़भार से मुक्त होना होगा और संभवतः संस्कृत को लोकप्रिय बनाने के लिए चल रहे प्रयोगों में इससे मुक्ति पाई जा चुकी हो।

पर सबसे क्रान्तिकारी खुलापन प्रायोगिक स्तर पर अपेक्षित है जिसे हासिल किया जा सके तो संस्कृत आधुनिक भारतीय भाषाओं से भी अधिक सरल और सर्वजनग्राह्य हो सकती है। इसे हम कल समझने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2018-01-21

लौकिक संस्कृत (5)

संस्कृत की क्लिष्टता का दूसरा कारण है द्विवचन का प्रयोग। यह किसी न किसी रूप में दुनिया की अनेकानेक प्राचीन भाषाओं में तलाशा गया है परन्तु संस्कृत ने इसे जिस पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया वह किसी अन्य में देखने में नहीं आता। संस्कृत के यूरोप तक प्रसार के चलते यह रोग लातिन, ग्रीक, जर्मनिक, स्लाव और लिथुआनी भाषाओं तक फैला और मध्येशिया से लेकर लघु एशिया तक संस्कृत भाषियों की हजार बारह सौ साल तक प्रभावशाली उपस्थिति और अश्वव्यापार की गतिविधियों के कारण इसकी छाप यूराल-अल्टाई बोलियों, हिब्रू और अरबी पर भी पड़ी, परन्तु स्लाव को छोड़कर किसी अन्य पर यह टिकाऊ प्रभाव नहीं डाल सका। ग्रीक में होमर की रचनाओं में यह प्रभाव अधिक गोचर है क्योंकि होमर लघु एशिया के थे जिसे क्लासिकी ग्रीक की जन्मभूमि कहा जा सकता है। जल्द ही ग्रीक इससे मुक्त हो गई। लातिन पर यह प्रभाव उससे भी क्षीण था, इसलिए उसने भी छुट्टी पा ली। पुरानी जर्मनिक में यह किंचित् अधिक स्पष्ट था, जिसका कारण तलाशना होगा। संस्कृत में यह वैदिक और अवेस्ता की तुलना में अधिक प्रबल हुआ और संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया सभी पर छाया रहा, जब कि संस्कृत की छायाजीवी बनी प्राकृत, पालि, अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं और बोलियों ने इसे धता बता दिया और इसके अभाव में किसी भाषा को कोई क्षति नहीं पहुंची। यह अनावश्यक बोझ है जिसका प्राचीन कृतियों के अध्येताओं के लिए कुछ औचित्य भले हो, परन्तु यदि संस्कृत को आधुनिक व्यवहार की भाषा बनने की रंचमात्र आकांक्षा है तो द्विवचन के जड़भार से मुक्त होना होगा और संभवतः संस्कृत को लोकप्रिय बनाने के लिए चल रहे प्रयोगों में इससे मुक्ति पाई जा चुकी हो।

पर सबसे क्रान्तिकारी खुलापन प्रायोगिक स्तर पर अपेक्षित है जिसे हासिल किया जा सके तो संस्कृत आधुनिक भारतीय भाषाओं से भी अधिक सरल और सर्वजनग्राह्य हो सकती है। इसे हम कल समझने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2018-01-20

लौकिक संस्कृत (४)

हम इस बात को दुहराना चाहते हैं कि पाणिनि का उद्देश्य संस्कृत को नियमित और आंचलिक प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करना मात्र था। वह इसी सीमा तक वैदिक और आंचलिक अनियमितताओं के दूर करना या संस्कृत करना चाहते थे, भाषा को दुरूह बनाने या अल्पजनग्राह्य बनाने का उनका कोई इरादा न था। उन्होंने (या कहें उनके सिद्धान्तों को निरूपित करते हुए किसी अन्य ने ने) पाणिनीय शिक्षा में उन दोषों को भी हतोत्साहित करने का प्रयत्न किया था जो संस्कृत के छात्रों और विद्वानों में आज तक पाए जाते हैं, ये दोष हैं गाते हुए पढ़ना (और बोलना), तेजी से पढ़ना (और बोलना), झूमते हुए पढ़ना (और बोलना), और जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ना (और बोलना)-
गीती, शीघ्री, शिरःकंपी यथालिखित पाठकः ।

प्रयोग पाठक का हुआ है, पर अभिप्राय वाचिक प्रस्तुति से है, जिसमें पढ़ना-बोलना दोनों आते हैं। यह है भाषा पर अधिकार होने की स्थिति में सहज, स्वाभाविक, निरहंकार भाव से पढ़ने और बोलने का तरीका। किसी को प्रभावित नहीं करना है, अपने मत को इस तरह प्रकट करना है कि सुननेवालों को हमारी बात समझ मे आ जाय और पढ़ते समय पाठ का अर्थ हमें स्वयं स्पष्ट होता चले।

इसमें अन्तिम अपेक्षा कि जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ने को दोष मानना बहुत रोचक है। कोई पाठक जैसा लिखा है वैसा ही न पढ़ेगा तो क्या कुछ और पढ़ेगा? यहां यह कहा गया है कि लिखित सामग्री का सन्धिविच्छेद करते हुए पाठ करें तो ही अर्थ समझ में आएगा। इस एक सीख पर ध्यान दिया गया होता तो संस्कृत की आधी दुरूहता समाप्त हो जाती और केवल इसे निर्देशक सिद्धान्त बना लेने के कारण ऋग्वेद जैसे डरावना माने जाने वाले ग्रन्थ का बिना टीका और भाष्य की सहायता लिए पाठ करना और अर्थ ग्रहण करना मेरे लिए काफी दूर तक संभव हो पाया। ऐसा नहीं कि मुझे अनुवाद और भाष्य देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती, इसकी नौबत कम आती है और अनुवादकों और भाष्यकारों की गलतियां तक पकड़ में आ जाती हैं। यह आप थोड़ी बहुत संस्कृत जानते हैं तो स्वयं आजमा कर देख सकते हैं।

इसे स्पष्ट करने के लिए हम ऋग्वेद के पहले ही सूक्त की पहली और दूसरी ऋचाओं को ही लें:
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति ।।

अब इसी के स्फुट (सन्धिविच्छेद सहित) पाठ पर ध्यान दें:
अग्निं ईळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं ऋत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभि: ऋषिभि: ईड्यो नूतनैः उत । स देवान् आ इह वक्षति ।।

अब पहली ऋचा में यदि कोई समस्या रह जाएगी तो ईळे को लेकर पर वह भी दूसरी ऋचा में आए ईड्य से दूर हो जाएगी। दूसरी ऋचा में इह से एक नया बोध होंगा कि भोजपुरी का इहां हिन्दी के यहां से अधिक पुराना है अर्थात् प्राचीनतर रूप या वैदिक की जड़ें कुरु पांचाल में नहीं भोजपुरी-मागधी क्षेत्र में हैं। संस्कृत के वहति का अधिक पुराना रूप वक्षति है, अर्थात् वह् धातु जिससे सं. वहन, वाहन और अंग्रेजी का वेहिकल आदि निकले हैं उसका पुराना रूप वघ् है जो बग्घी में उजागर है। हां इन बारीकियों को देखने के लिए नजर का सधना जरूरी है, पर एक बार सध जाने के बाद बोलियों, संस्कृत, और भारोपीय के विषय में दिमाग की जकड़बन्दी तार तार होने लगती है। हम जब वैदिक के गहन पाठके लिए पूरीतरह वैदिक के अध्ययन पर केन्द्रित पाठ की आवश्यकता पर बल देते हैं तो इसीलिए ।

Post – 2018-01-20

लौकिक संस्कृत (४)

हम इस बात को दुहराना चाहते हैं कि पाणिनि का उद्देश्य संस्कृत को नियमित और आंचलिक प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करना मात्र था। वह इसी सीमा तक वैदिक और आंचलिक अनियमितताओं के दूर करना या संस्कृत करना चाहते थे, भाषा को दुरूह बनाने या अल्पजनग्राह्य बनाने का उनका कोई इरादा न था। उन्होंने (या कहें उनके सिद्धान्तों को निरूपित करते हुए किसी अन्य ने ने) पाणिनीय शिक्षा में उन दोषों को भी हतोत्साहित करने का प्रयत्न किया था जो संस्कृत के छात्रों और विद्वानों में आज तक पाए जाते हैं, ये दोष हैं गाते हुए पढ़ना (और बोलना), तेजी से पढ़ना (और बोलना), झूमते हुए पढ़ना (और बोलना), और जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ना (और बोलना)-
गीती, शीघ्री, शिरःकंपी यथालिखित पाठकः ।

प्रयोग पाठक का हुआ है, पर अभिप्राय वाचिक प्रस्तुति से है, जिसमें पढ़ना-बोलना दोनों आते हैं। यह है भाषा पर अधिकार होने की स्थिति में सहज, स्वाभाविक, निरहंकार भाव से पढ़ने और बोलने का तरीका। किसी को प्रभावित नहीं करना है, अपने मत को इस तरह प्रकट करना है कि सुननेवालों को हमारी बात समझ मे आ जाय और पढ़ते समय पाठ का अर्थ हमें स्वयं स्पष्ट होता चले।

इसमें अन्तिम अपेक्षा कि जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ने को दोष मानना बहुत रोचक है। कोई पाठक जैसा लिखा है वैसा ही न पढ़ेगा तो क्या कुछ और पढ़ेगा? यहां यह कहा गया है कि लिखित सामग्री का सन्धिविच्छेद करते हुए पाठ करें तो ही अर्थ समझ में आएगा। इस एक सीख पर ध्यान दिया गया होता तो संस्कृत की आधी दुरूहता समाप्त हो जाती और केवल इसे निर्देशक सिद्धान्त बना लेने के कारण ऋग्वेद जैसे डरावना माने जाने वाले ग्रन्थ का बिना टीका और भाष्य की सहायता लिए पाठ करना और अर्थ ग्रहण करना मेरे लिए काफी दूर तक संभव हो पाया। ऐसा नहीं कि मुझे अनुवाद और भाष्य देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती, इसकी नौबत कम आती है और अनुवादकों और भाष्यकारों की गलतियां तक पकड़ में आ जाती हैं। यह आप थोड़ी बहुत संस्कृत जानते हैं तो स्वयं आजमा कर देख सकते हैं।

इसे स्पष्ट करने के लिए हम ऋग्वेद के पहले ही सूक्त की पहली और दूसरी ऋचाओं को ही लें:
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति ।।

अब इसी के स्फुट (सन्धिविच्छेद सहित) पाठ पर ध्यान दें:
अग्निं ईळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं ऋत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभि: ऋषिभि: ईड्यो नूतनैः उत । स देवान् आ इह वक्षति ।।

अब पहली ऋचा में यदि कोई समस्या रह जाएगी तो ईळे को लेकर पर वह भी दूसरी ऋचा में आए ईड्य से दूर हो जाएगी। दूसरी ऋचा में इह से एक नया बोध होंगा कि भोजपुरी का इहां हिन्दी के यहां से अधिक पुराना है अर्थात् प्राचीनतर रूप या वैदिक की जड़ें कुरु पांचाल में नहीं भोजपुरी-मागधी क्षेत्र में हैं। संस्कृत के वहति का अधिक पुराना रूप वक्षति है, अर्थात् वह् धातु जिससे सं. वहन, वाहन और अंग्रेजी का वेहिकल आदि निकले हैं उसका पुराना रूप वघ् है जो बग्घी में उजागर है। हां इन बारीकियों को देखने के लिए नजर का सधना जरूरी है, पर एक बार सध जाने के बाद बोलियों, संस्कृत, और भारोपीय के विषय में दिमाग की जकड़बन्दी तार तार होने लगती है। हम जब वैदिक के गहन पाठके लिए पूरीतरह वैदिक के अध्ययन पर केन्द्रित पाठ की आवश्यकता पर बल देते हैं तो इसीलिए ।

Post – 2018-01-20

लौकिक संस्कृत (४)

हम इस बात को दुहराना चाहते हैं कि पाणिनि का उद्देश्य संस्कृत को नियमित और आंचलिक प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करना मात्र था। वह इसी सीमा तक वैदिक और आंचलिक अनियमितताओं के दूर करना या संस्कृत करना चाहते थे, भाषा को दुरूह बनाने या अल्पजनग्राह्य बनाने का उनका कोई इरादा न था। उन्होंने (या कहें उनके सिद्धान्तों को निरूपित करते हुए किसी अन्य ने ने) पाणिनीय शिक्षा में उन दोषों को भी हतोत्साहित करने का प्रयत्न किया था जो संस्कृत के छात्रों और विद्वानों में आज तक पाए जाते हैं, ये दोष हैं गाते हुए पढ़ना (और बोलना), तेजी से पढ़ना (और बोलना), झूमते हुए पढ़ना (और बोलना), और जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ना (और बोलना)-
गीती, शीघ्री, शिरःकंपी यथालिखित पाठकः ।

प्रयोग पाठक का हुआ है, पर अभिप्राय वाचिक प्रस्तुति से है, जिसमें पढ़ना-बोलना दोनों आते हैं। यह है भाषा पर अधिकार होने की स्थिति में सहज, स्वाभाविक, निरहंकार भाव से पढ़ने और बोलने का तरीका। किसी को प्रभावित नहीं करना है, अपने मत को इस तरह प्रकट करना है कि सुननेवालों को हमारी बात समझ मे आ जाय और पढ़ते समय पाठ का अर्थ हमें स्वयं स्पष्ट होता चले।

इसमें अन्तिम अपेक्षा कि जैसा लिखा है ठीक उसी तरह पढ़ने को दोष मानना बहुत रोचक है। कोई पाठक जैसा लिखा है वैसा ही न पढ़ेगा तो क्या कुछ और पढ़ेगा? यहां यह कहा गया है कि लिखित सामग्री का सन्धिविच्छेद करते हुए पाठ करें तो ही अर्थ समझ में आएगा। इस एक सीख पर ध्यान दिया गया होता तो संस्कृत की आधी दुरूहता समाप्त हो जाती और केवल इसे निर्देशक सिद्धान्त बना लेने के कारण ऋग्वेद जैसे डरावना माने जाने वाले ग्रन्थ का बिना टीका और भाष्य की सहायता लिए पाठ करना और अर्थ ग्रहण करना मेरे लिए काफी दूर तक संभव हो पाया। ऐसा नहीं कि मुझे अनुवाद और भाष्य देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती, इसकी नौबत कम आती है और अनुवादकों और भाष्यकारों की गलतियां तक पकड़ में आ जाती हैं। यह आप थोड़ी बहुत संस्कृत जानते हैं तो स्वयं आजमा कर देख सकते हैं।

इसे स्पष्ट करने के लिए हम ऋग्वेद के पहले ही सूक्त की पहली और दूसरी ऋचाओं को ही लें:
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति ।।

अब इसी के स्फुट (सन्धिविच्छेद सहित) पाठ पर ध्यान दें:
अग्निं ईळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं ऋत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।।
अग्निः पूर्वेभि: ऋषिभि: ईड्यो नूतनैः उत । स देवान् आ इह वक्षति ।।

अब पहली ऋचा में यदि कोई समस्या रह जाएगी तो ईळे को लेकर पर वह भी दूसरी ऋचा में आए ईड्य से दूर हो जाएगी। दूसरी ऋचा में इह से एक नया बोध होंगा कि भोजपुरी का इहां हिन्दी के यहां से अधिक पुराना है अर्थात् प्राचीनतर रूप या वैदिक की जड़ें कुरु पांचाल में नहीं भोजपुरी-मागधी क्षेत्र में हैं। संस्कृत के वहति का अधिक पुराना रूप वक्षति है, अर्थात् वह् धातु जिससे सं. वहन, वाहन और अंग्रेजी का वेहिकल आदि निकले हैं उसका पुराना रूप वघ् है जो बग्घी में उजागर है। हां इन बारीकियों को देखने के लिए नजर का सधना जरूरी है, पर एक बार सध जाने के बाद बोलियों, संस्कृत, और भारोपीय के विषय में दिमाग की जकड़बन्दी तार तार होने लगती है। हम जब वैदिक के गहन पाठके लिए पूरीतरह वैदिक के अध्ययन पर केन्द्रित पाठ की आवश्यकता पर बल देते हैं तो इसीलिए ।

Post – 2018-01-19

लौकिक संस्कृत (३)

पाणिनि के समय में संभवत: संस्कृत का जनता से बिलगाव नहीं हुआ था। अनेकानेक जन भाषाओं के क्षेत्र में व्यापक संपर्क के लिए संस्कृत का प्रयोग होता था परन्तु क्षेत्रीय बोलियों के प्रभाव से इसका चरित्र बदला था। फिर भी यह माना जाता था कि उदीच्य की या कुरुपांचाल की संस्कृत अधिक शुद्ध है। शुद्धता के आग्रहशील अपने बच्चों को शिक्षा के लिए यहां भेजते थे और उनका अनुकरण करते हुए दूसरे अपना उच्चारण सुधारते थे । इसका कारण हम बता चुके हैं कि इसी क्षेत्र में कई हजार साल के लंबे दौर में संस्कृत का चरित्र निर्धारण हुआ था और मोटे तौर पर कहें तो इसी क्षेत्र में पाणिनीय वर्णमाला के सभी अक्षरों का सही उच्चारण संभव हो पाता है। यहां से जिस भी दिशा में चलें उच्चारण अशुद्ध होने लगता है। हालत यह कि बंगाल पहुंचते पहुंचते अकार अॉकार, इकार का ह्रस्व-दीर्घ में अभेद, ऐ और औ का एइ, ओइ मे परिवर्तन, ऋ, लृ, ण, य,व, ष, स, संयुक्ताक्षरों क्ष, ज्ञ, त्र की ध्वनियों का अभाव मिलता है।

हमने एक बहुत उलझे विषय को उठा लिया, जिसकी व्याख्या करने चलें तो बहुत लम्बा काम हो जाएगा, पर संक्षेप में कहें तो इस विकास रेखा को न समझ पाने के कारण संस्कृत का इतिहास लिखने वाले देसी-विदेशी सभी विद्वानों से भारी चूक हुई है। इनमें से कोई संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया के विविध चरणों को समझ ही न सका, न ही यह समझ सका कि किसी भी क्षेत्र की बोलचाल की भाषा न होते हुए भी यह व्यापक संचार के लिए संपर्क भाषा बन कर वैदिक काल या हड़प्पा सभ्यता की नीव से जो भिर्राना के साक्ष्यों से समझना चाहें तो सातवीं सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व तक जाती है, अपने नए रूप में ढलनी आरंभ हुई और विशिष्ट आर्थिक-सांस्कृतिक उपक्रमों से जुड़े श्रुधी और गंवार, अमीर-गरीब सभी के द्वारा बोली और समझी जाती थी, जब कि घरेलू स्तर पर सामान्य जन अपनी बोली बोलते थे जिनमें कुछ ऐसे तत्व थे जिन्हें द्रविड़ और मुंडा समुदायों की भाषाओं की विशेषता मानी जाती है और इसे बहुत झिझकते हुए वैदिक में मिला स्वीकार किया जाने लगा है।

पाणिनि से पहले जो वैयाकरण हुए उनके सामने मुख्य समस्या ऋग्वेद की भाषा को समझने की थी। हम फिर इस सवाल से बचना चाहेंगे कि यह समस्या पैदा क्यों हुई। संक्षेप में यह कि लंबे समय तक चलने वाली किसी प्राकृतिक त्रासदी के कारण जीवन रक्षा की समस्या इतनी उग्र हो गई कि पूरी सभ्यता नष्ट हो गई। असाधारण सम्मान के बाद भी वेदों की रक्षा तक संभव न रही, अर्थज्ञान का प्रशन तो उसके बाद आता है। दिन फिरे तो असाधारण प्रयत्न से देश-देशान्तर से जितना कुछ जुटाया जा सका उसका संकलित रूप ही हमें उपलब्ध है। इस परंपरा-विच्छेदन के कारण सदियों के अन्तराल के बाद तरह तरह की अटकलबाजियों से आगे बढ़ते हुए वे वेद का अर्थ समझने का प्रयत्न कर रहे थे। इसी क्रम में धातुओं की कल्पना और उनके बीजार्थ के निर्धारण के प्रयत्न भी हुए। इस प्रयत्न में दूसरे अनेक लोग लगे हुए थे, जिनके परिणाम वेदांग, संहिताएं और ब्राह्मण आदि हैं।

पाणिनि का प्रयत्न उस भाषा का उद्धार था जिसमें ऐसी एकरूपता आ गई थी कि वह देश-देशान्तर में बोली और समझी जाती थी, परन्तु आज जिसके इतने स्थानीय भेद हो चुके थे कि एक क्षेत्र की उसी भाषा को दूसरे क्षेत्र का व्यक्ति समझ ही नहीं सकता था। वह भाषा में वैदिक कालीन एक रूपता लाना चाहते थे परन्तु इस बीच में भाषाओं में जो वैदिक प्रयोग प्रयोगबाह्य हो गए थे, या स्वयं वैदिक भाषा में जो प्रयोग बाहुल्य थे उनका परिहार करते हुए।

पाणिनि के सामने तीन समस्यायें थीं। एक भाषा का एक मानक रूप जिसका कठोरता से निर्वाह किया जाय। दूसरा, ऐसे शब्द जो कालबाह्य हो चुके हैं या नितान्त आंचलिक हैं उनसे बचा जाय। तीसरा उच्चारण की एक रूपता जिसकी चिन्ता पहले भी थी, परन्तु इस दौर में जिसकी आवश्यकता पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ गई थी, पाणिनि पूरी वर्णमाला का पुनराख्यान और वर्गीकरण करते हुए उनके उच्चारण का तरीका बता रहे थे, उच्चारण के आभ्यन्तर और बाह्य प्रयत्न का संकेत देते हुए उच्चारण में हलन्त, अजन्त ध्वनियों के मात्राभेद से ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, स्वरित, अनुनासिक आदि का निर्देश देते हुए अपेक्षा कर रहे थे कि सभी के द्वारा एक जैसा उच्चारण हो जिससे उसी भाषा को बोलने, सुनने, समझने में किसी तरह की समस्या देश-काल भेद से उत्पन्न न हो। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी ओर से किसी तरह का अनुशासन नहीं रखा। अष्टाध्यायी के अन्य प्रसंगों को ध्यान में रखते हुए भी उन्होंने अपनी ओर से कुछ नहीं किया जो ऋग्वेद में उपलब्ध न था। अपनी समझ से वह भाषा को कठिन नहीं बना रहे थे, पर नियमित बनाने के क्रम में ही भाषा यान्त्रिक भाषा में बदल गई और पहले के संस्कृत के आंचलिक रूप जो बोले भले शिक्षित और संभ्रान्त जनों द्वारा जाते थे, पर अशिक्षितों द्वारा भी समझ लिए जाते थे, अब व्यापक जनसमाज से पूरी तरह कट गए।

इस प्रक्रिया को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। सामान्य बोलचाल की भाषा को सही सही बोलने के लिए हमें उन नियमों और प्रयत्नों को, यहां तक कि अक्षरों के क्रम और संख्या तक को जानने की आवश्यकता नहीं होती, जिनको समझाने के लिए पाणिनि को इतना श्रम करना पड़ा। बच्चा लोगों को बोलते सुनकर बोलना सीख जाता है। वु्याकरण जानने का भी झमेला नहीं रहता। परन्तु अपनी भाषा पर अधिकार के बाद भी सधे सुर ताल में अचूक गायन की शर्त हो तो यह अल्पजनसाध्य साधना में बदल जाता है। यदि संस्कृत को सर्वजनगम्य भाषा का रूप देना है तो लाख दावे करने के बाद भी वही भाषा नहीं रह सकती जिसकी नींव अपनी महत्वाकांक्षा नें पाणिनि ने रखी थी, इस प्रक्रिया को उलटना होगा। इसके लिए क्या करना होगा, इसकी चर्चा हम कल करेंगे।

आज इतना और कि पाणिनीय संस्कृत की कीमत पर यह काम नहीं किया जा सकता। साथ ही अपने पहले से चले आ रहे वैदिक साहित्य को समझने के जिस प्रयत्न को किनारे रख कर पाणिनि आगे बढ़ गए थे वह एक वेद की भाषा की समस्या नहीं है अपितु कई हजार साल के भाषा के पूर्ववर्ती इतिहास की समस्या है। इसकी घोर उपेक्षा हुई है। इसलिए संस्कृत के कतिपय़ मान्य विश्वविद्यालयों में संस्कृत के तीन विभागों की आवश्यकता है – लौकिक संस्कृत, पाणिनीय संस्कृत और आर्ष संस्कृत। अन्तिम दो को भी सरल बनाया जा सकता है, और संभवतः उस दिशा में कुछ प्रयत्न कई साल से हो भी रहा है।

Post – 2018-01-19

लौकिक संस्कृत (३)

पाणिनि के समय में संभवत: संस्कृत का जनता से बिलगाव नहीं हुआ था। अनेकानेक जन भाषाओं के क्षेत्र में व्यापक संपर्क के लिए संस्कृत का प्रयोग होता था परन्तु क्षेत्रीय बोलियों के प्रभाव से इसका चरित्र बदला था। फिर भी यह माना जाता था कि उदीच्य की या कुरुपांचाल की संस्कृत अधिक शुद्ध है। शुद्धता के आग्रहशील अपने बच्चों को शिक्षा के लिए यहां भेजते थे और उनका अनुकरण करते हुए दूसरे अपना उच्चारण सुधारते थे । इसका कारण हम बता चुके हैं कि इसी क्षेत्र में कई हजार साल के लंबे दौर में संस्कृत का चरित्र निर्धारण हुआ था और मोटे तौर पर कहें तो इसी क्षेत्र में पाणिनीय वर्णमाला के सभी अक्षरों का सही उच्चारण संभव हो पाता है। यहां से जिस भी दिशा में चलें उच्चारण अशुद्ध होने लगता है। हालत यह कि बंगाल पहुंचते पहुंचते अकार अॉकार, इकार का ह्रस्व-दीर्घ में अभेद, ऐ और औ का एइ, ओइ मे परिवर्तन, ऋ, लृ, ण, य,व, ष, स, संयुक्ताक्षरों क्ष, ज्ञ, त्र की ध्वनियों का अभाव मिलता है।

हमने एक बहुत उलझे विषय को उठा लिया, जिसकी व्याख्या करने चलें तो बहुत लम्बा काम हो जाएगा, पर संक्षेप में कहें तो इस विकास रेखा को न समझ पाने के कारण संस्कृत का इतिहास लिखने वाले देसी-विदेशी सभी विद्वानों से भारी चूक हुई है। इनमें से कोई संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया के विविध चरणों को समझ ही न सका, न ही यह समझ सका कि किसी भी क्षेत्र की बोलचाल की भाषा न होते हुए भी यह व्यापक संचार के लिए संपर्क भाषा बन कर वैदिक काल या हड़प्पा सभ्यता की नीव से जो भिर्राना के साक्ष्यों से समझना चाहें तो सातवीं सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व तक जाती है, अपने नए रूप में ढलनी आरंभ हुई और विशिष्ट आर्थिक-सांस्कृतिक उपक्रमों से जुड़े श्रुधी और गंवार, अमीर-गरीब सभी के द्वारा बोली और समझी जाती थी, जब कि घरेलू स्तर पर सामान्य जन अपनी बोली बोलते थे जिनमें कुछ ऐसे तत्व थे जिन्हें द्रविड़ और मुंडा समुदायों की भाषाओं की विशेषता मानी जाती है और इसे बहुत झिझकते हुए वैदिक में मिला स्वीकार किया जाने लगा है।

पाणिनि से पहले जो वैयाकरण हुए उनके सामने मुख्य समस्या ऋग्वेद की भाषा को समझने की थी। हम फिर इस सवाल से बचना चाहेंगे कि यह समस्या पैदा क्यों हुई। संक्षेप में यह कि लंबे समय तक चलने वाली किसी प्राकृतिक त्रासदी के कारण जीवन रक्षा की समस्या इतनी उग्र हो गई कि पूरी सभ्यता नष्ट हो गई। असाधारण सम्मान के बाद भी वेदों की रक्षा तक संभव न रही, अर्थज्ञान का प्रशन तो उसके बाद आता है। दिन फिरे तो असाधारण प्रयत्न से देश-देशान्तर से जितना कुछ जुटाया जा सका उसका संकलित रूप ही हमें उपलब्ध है। इस परंपरा-विच्छेदन के कारण सदियों के अन्तराल के बाद तरह तरह की अटकलबाजियों से आगे बढ़ते हुए वे वेद का अर्थ समझने का प्रयत्न कर रहे थे। इसी क्रम में धातुओं की कल्पना और उनके बीजार्थ के निर्धारण के प्रयत्न भी हुए। इस प्रयत्न में दूसरे अनेक लोग लगे हुए थे, जिनके परिणाम वेदांग, संहिताएं और ब्राह्मण आदि हैं।

पाणिनि का प्रयत्न उस भाषा का उद्धार था जिसमें ऐसी एकरूपता आ गई थी कि वह देश-देशान्तर में बोली और समझी जाती थी, परन्तु आज जिसके इतने स्थानीय भेद हो चुके थे कि एक क्षेत्र की उसी भाषा को दूसरे क्षेत्र का व्यक्ति समझ ही नहीं सकता था। वह भाषा में वैदिक कालीन एक रूपता लाना चाहते थे परन्तु इस बीच में भाषाओं में जो वैदिक प्रयोग प्रयोगबाह्य हो गए थे, या स्वयं वैदिक भाषा में जो प्रयोग बाहुल्य थे उनका परिहार करते हुए।

पाणिनि के सामने तीन समस्यायें थीं। एक भाषा का एक मानक रूप जिसका कठोरता से निर्वाह किया जाय। दूसरा, ऐसे शब्द जो कालबाह्य हो चुके हैं या नितान्त आंचलिक हैं उनसे बचा जाय। तीसरा उच्चारण की एक रूपता जिसकी चिन्ता पहले भी थी, परन्तु इस दौर में जिसकी आवश्यकता पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ गई थी, पाणिनि पूरी वर्णमाला का पुनराख्यान और वर्गीकरण करते हुए उनके उच्चारण का तरीका बता रहे थे, उच्चारण के आभ्यन्तर और बाह्य प्रयत्न का संकेत देते हुए उच्चारण में हलन्त, अजन्त ध्वनियों के मात्राभेद से ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, स्वरित, अनुनासिक आदि का निर्देश देते हुए अपेक्षा कर रहे थे कि सभी के द्वारा एक जैसा उच्चारण हो जिससे उसी भाषा को बोलने, सुनने, समझने में किसी तरह की समस्या देश-काल भेद से उत्पन्न न हो। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी ओर से किसी तरह का अनुशासन नहीं रखा। अष्टाध्यायी के अन्य प्रसंगों को ध्यान में रखते हुए भी उन्होंने अपनी ओर से कुछ नहीं किया जो ऋग्वेद में उपलब्ध न था। अपनी समझ से वह भाषा को कठिन नहीं बना रहे थे, पर नियमित बनाने के क्रम में ही भाषा यान्त्रिक भाषा में बदल गई और पहले के संस्कृत के आंचलिक रूप जो बोले भले शिक्षित और संभ्रान्त जनों द्वारा जाते थे, पर अशिक्षितों द्वारा भी समझ लिए जाते थे, अब व्यापक जनसमाज से पूरी तरह कट गए।

इस प्रक्रिया को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। सामान्य बोलचाल की भाषा को सही सही बोलने के लिए हमें उन नियमों और प्रयत्नों को, यहां तक कि अक्षरों के क्रम और संख्या तक को जानने की आवश्यकता नहीं होती, जिनको समझाने के लिए पाणिनि को इतना श्रम करना पड़ा। बच्चा लोगों को बोलते सुनकर बोलना सीख जाता है। वु्याकरण जानने का भी झमेला नहीं रहता। परन्तु अपनी भाषा पर अधिकार के बाद भी सधे सुर ताल में अचूक गायन की शर्त हो तो यह अल्पजनसाध्य साधना में बदल जाता है। यदि संस्कृत को सर्वजनगम्य भाषा का रूप देना है तो लाख दावे करने के बाद भी वही भाषा नहीं रह सकती जिसकी नींव अपनी महत्वाकांक्षा नें पाणिनि ने रखी थी, इस प्रक्रिया को उलटना होगा। इसके लिए क्या करना होगा, इसकी चर्चा हम कल करेंगे।

आज इतना और कि पाणिनीय संस्कृत की कीमत पर यह काम नहीं किया जा सकता। साथ ही अपने पहले से चले आ रहे वैदिक साहित्य को समझने के जिस प्रयत्न को किनारे रख कर पाणिनि आगे बढ़ गए थे वह एक वेद की भाषा की समस्या नहीं है अपितु कई हजार साल के भाषा के पूर्ववर्ती इतिहास की समस्या है। इसकी घोर उपेक्षा हुई है। इसलिए संस्कृत के कतिपय़ मान्य विश्वविद्यालयों में संस्कृत के तीन विभागों की आवश्यकता है – लौकिक संस्कृत, पाणिनीय संस्कृत और आर्ष संस्कृत। अन्तिम दो को भी सरल बनाया जा सकता है, और संभवतः उस दिशा में कुछ प्रयत्न कई साल से हो भी रहा है।

Post – 2018-01-19

लौकिक संस्कृत (३)

पाणिनि के समय में संभवत: संस्कृत का जनता से बिलगाव नहीं हुआ था। अनेकानेक जन भाषाओं के क्षेत्र में व्यापक संपर्क के लिए संस्कृत का प्रयोग होता था परन्तु क्षेत्रीय बोलियों के प्रभाव से इसका चरित्र बदला था। फिर भी यह माना जाता था कि उदीच्य की या कुरुपांचाल की संस्कृत अधिक शुद्ध है। शुद्धता के आग्रहशील अपने बच्चों को शिक्षा के लिए यहां भेजते थे और उनका अनुकरण करते हुए दूसरे अपना उच्चारण सुधारते थे । इसका कारण हम बता चुके हैं कि इसी क्षेत्र में कई हजार साल के लंबे दौर में संस्कृत का चरित्र निर्धारण हुआ था और मोटे तौर पर कहें तो इसी क्षेत्र में पाणिनीय वर्णमाला के सभी अक्षरों का सही उच्चारण संभव हो पाता है। यहां से जिस भी दिशा में चलें उच्चारण अशुद्ध होने लगता है। हालत यह कि बंगाल पहुंचते पहुंचते अकार अॉकार, इकार का ह्रस्व-दीर्घ में अभेद, ऐ और औ का एइ, ओइ मे परिवर्तन, ऋ, लृ, ण, य,व, ष, स, संयुक्ताक्षरों क्ष, ज्ञ, त्र की ध्वनियों का अभाव मिलता है।

हमने एक बहुत उलझे विषय को उठा लिया, जिसकी व्याख्या करने चलें तो बहुत लम्बा काम हो जाएगा, पर संक्षेप में कहें तो इस विकास रेखा को न समझ पाने के कारण संस्कृत का इतिहास लिखने वाले देसी-विदेशी सभी विद्वानों से भारी चूक हुई है। इनमें से कोई संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया के विविध चरणों को समझ ही न सका, न ही यह समझ सका कि किसी भी क्षेत्र की बोलचाल की भाषा न होते हुए भी यह व्यापक संचार के लिए संपर्क भाषा बन कर वैदिक काल या हड़प्पा सभ्यता की नीव से जो भिर्राना के साक्ष्यों से समझना चाहें तो सातवीं सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व तक जाती है, अपने नए रूप में ढलनी आरंभ हुई और विशिष्ट आर्थिक-सांस्कृतिक उपक्रमों से जुड़े श्रुधी और गंवार, अमीर-गरीब सभी के द्वारा बोली और समझी जाती थी, जब कि घरेलू स्तर पर सामान्य जन अपनी बोली बोलते थे जिनमें कुछ ऐसे तत्व थे जिन्हें द्रविड़ और मुंडा समुदायों की भाषाओं की विशेषता मानी जाती है और इसे बहुत झिझकते हुए वैदिक में मिला स्वीकार किया जाने लगा है।

पाणिनि से पहले जो वैयाकरण हुए उनके सामने मुख्य समस्या ऋग्वेद की भाषा को समझने की थी। हम फिर इस सवाल से बचना चाहेंगे कि यह समस्या पैदा क्यों हुई। संक्षेप में यह कि लंबे समय तक चलने वाली किसी प्राकृतिक त्रासदी के कारण जीवन रक्षा की समस्या इतनी उग्र हो गई कि पूरी सभ्यता नष्ट हो गई। असाधारण सम्मान के बाद भी वेदों की रक्षा तक संभव न रही, अर्थज्ञान का प्रशन तो उसके बाद आता है। दिन फिरे तो असाधारण प्रयत्न से देश-देशान्तर से जितना कुछ जुटाया जा सका उसका संकलित रूप ही हमें उपलब्ध है। इस परंपरा-विच्छेदन के कारण सदियों के अन्तराल के बाद तरह तरह की अटकलबाजियों से आगे बढ़ते हुए वे वेद का अर्थ समझने का प्रयत्न कर रहे थे। इसी क्रम में धातुओं की कल्पना और उनके बीजार्थ के निर्धारण के प्रयत्न भी हुए। इस प्रयत्न में दूसरे अनेक लोग लगे हुए थे, जिनके परिणाम वेदांग, संहिताएं और ब्राह्मण आदि हैं।

पाणिनि का प्रयत्न उस भाषा का उद्धार था जिसमें ऐसी एकरूपता आ गई थी कि वह देश-देशान्तर में बोली और समझी जाती थी, परन्तु आज जिसके इतने स्थानीय भेद हो चुके थे कि एक क्षेत्र की उसी भाषा को दूसरे क्षेत्र का व्यक्ति समझ ही नहीं सकता था। वह भाषा में वैदिक कालीन एक रूपता लाना चाहते थे परन्तु इस बीच में भाषाओं में जो वैदिक प्रयोग प्रयोगबाह्य हो गए थे, या स्वयं वैदिक भाषा में जो प्रयोग बाहुल्य थे उनका परिहार करते हुए।

पाणिनि के सामने तीन समस्यायें थीं। एक भाषा का एक मानक रूप जिसका कठोरता से निर्वाह किया जाय। दूसरा, ऐसे शब्द जो कालबाह्य हो चुके हैं या नितान्त आंचलिक हैं उनसे बचा जाय। तीसरा उच्चारण की एक रूपता जिसकी चिन्ता पहले भी थी, परन्तु इस दौर में जिसकी आवश्यकता पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ गई थी, पाणिनि पूरी वर्णमाला का पुनराख्यान और वर्गीकरण करते हुए उनके उच्चारण का तरीका बता रहे थे, उच्चारण के आभ्यन्तर और बाह्य प्रयत्न का संकेत देते हुए उच्चारण में हलन्त, अजन्त ध्वनियों के मात्राभेद से ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, स्वरित, अनुनासिक आदि का निर्देश देते हुए अपेक्षा कर रहे थे कि सभी के द्वारा एक जैसा उच्चारण हो जिससे उसी भाषा को बोलने, सुनने, समझने में किसी तरह की समस्या देश-काल भेद से उत्पन्न न हो। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी ओर से किसी तरह का अनुशासन नहीं रखा। अष्टाध्यायी के अन्य प्रसंगों को ध्यान में रखते हुए भी उन्होंने अपनी ओर से कुछ नहीं किया जो ऋग्वेद में उपलब्ध न था। अपनी समझ से वह भाषा को कठिन नहीं बना रहे थे, पर नियमित बनाने के क्रम में ही भाषा यान्त्रिक भाषा में बदल गई और पहले के संस्कृत के आंचलिक रूप जो बोले भले शिक्षित और संभ्रान्त जनों द्वारा जाते थे, पर अशिक्षितों द्वारा भी समझ लिए जाते थे, अब व्यापक जनसमाज से पूरी तरह कट गए।

इस प्रक्रिया को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। सामान्य बोलचाल की भाषा को सही सही बोलने के लिए हमें उन नियमों और प्रयत्नों को, यहां तक कि अक्षरों के क्रम और संख्या तक को जानने की आवश्यकता नहीं होती, जिनको समझाने के लिए पाणिनि को इतना श्रम करना पड़ा। बच्चा लोगों को बोलते सुनकर बोलना सीख जाता है। वु्याकरण जानने का भी झमेला नहीं रहता। परन्तु अपनी भाषा पर अधिकार के बाद भी सधे सुर ताल में अचूक गायन की शर्त हो तो यह अल्पजनसाध्य साधना में बदल जाता है। यदि संस्कृत को सर्वजनगम्य भाषा का रूप देना है तो लाख दावे करने के बाद भी वही भाषा नहीं रह सकती जिसकी नींव अपनी महत्वाकांक्षा नें पाणिनि ने रखी थी, इस प्रक्रिया को उलटना होगा। इसके लिए क्या करना होगा, इसकी चर्चा हम कल करेंगे।

आज इतना और कि पाणिनीय संस्कृत की कीमत पर यह काम नहीं किया जा सकता। साथ ही अपने पहले से चले आ रहे वैदिक साहित्य को समझने के जिस प्रयत्न को किनारे रख कर पाणिनि आगे बढ़ गए थे वह एक वेद की भाषा की समस्या नहीं है अपितु कई हजार साल के भाषा के पूर्ववर्ती इतिहास की समस्या है। इसकी घोर उपेक्षा हुई है। इसलिए संस्कृत के कतिपय़ मान्य विश्वविद्यालयों में संस्कृत के तीन विभागों की आवश्यकता है – लौकिक संस्कृत, पाणिनीय संस्कृत और आर्ष संस्कृत। अन्तिम दो को भी सरल बनाया जा सकता है, और संभवतः उस दिशा में कुछ प्रयत्न कई साल से हो भी रहा है।