Post – 2017-11-07

नोटबंदी की वजह से देश को लाखों करोड़ों का नुकसान : पूर्व पीएम मनमोहन सिंह

भूल सुधारः
नोटबंदी की वजह से देश के कुछ लोगों को लाखों करोड़ों का नुकसान : पूर्व पीएम मनमोहन सिंह

Post – 2017-11-07

चला था आपबीती सुनाने और कठोर सचाइयों को सह्य बनाना के चक्कर में खुदा बीती सुनाने लगा और अब इस तत्ववाली दलदल में फस गया कि अरबों ऐसे लोगों का मन रखने का लिए जो मोनते हैं कि खुदा, गॉड, ईश्वर या किसी भी भाषा में अपने किसी भी पर्याय से संबोधित किए जानावाले बन्दानवाज का अस्नेतित्व है और उसने आदमी को बनाया ही नहीं, उसे अपनी शक्ल तक दे दी, हम भी मोन लें कि ऐसा ही हुआ तो अपनी तो सवालों की भीड़ उठ खड़ी होती हैः
1. यदि उस ज़ीरो ने आदमी को अपनी शक्ल में बनाया तो उसकी शक्ल तो थी, फिर उसे निराकार तो नहीं कहा जा सकता?
2. उसने जब यह कायनात नहीं बनाई थी तब वह कहाँ था, कब से था, क्या कर रहा ?
३. उसकी शक्ल आदमी जैसी है तो उसे रहने को कोई जगह चाहिए थी. धरती और आसमान तो उसके हुक्म से बने उसे टिकने के लिए आसमान तो था ही नहीं?
४.आदमशक्ल था तो सांस तो लेना तो जीवित रहने के लिए जरूरी था. हवा तो बनी न थी, न कहीं रोशनी थी, वह देखता क्या रहा होगा?
५. वह जिस भी अवस्था में था, था. उसे यह पूरी कायनात बनाने की जरूरत क्या थी? किसके लिए बना रहा था ? आदमी के लिए तो नहीं. आदमी को तो उसने सबसे अंत में उसी प्रयोजन से बनाया होगा जिससे समूची सृष्टि को बनाया था. वह प्रयोजन क्या था?
६. आदमी को उसने खाक से बनाया और औरत को उस आदमी की पसली से तो दोनों में बेहतर बिल्डिंग मैटीरियल का इस्तेमाल किसे बनाने में हुआ ? यदि औरत के, तो दोनों में श्रेष्ठ कौन हुआ ?
७. यदि उसने मर्द को अपनी शक्ल दी तो औरत को किसकी शक्ल में बनाया ? क्या वह अर्धनारीश्वर था ? यदि नहीं तो क्या उसकी घरवाली भी थी जिसे उसने खुदा होने का एकाधिकार बचाए रखने के लिए पहले अपनी पसली से गढा हो और फिर उसकी शक्ल में औरतों को गढ़ा हो? इस दशा में मर्द जात की दबंगई कायम रहती है या रखी जा सकती है.
८. खुदा को अपने बन्दे क्यों पसंद हैं? अपनी रचना से वह इतना डरता क्यों है कि वह उसे बाँध कर रखना चाहता है?
९. बंदा का अर्थ आप जानते होंगे फिर भी कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो न जानते हों या जानकर भी जानने से कतराते हों. युद्ध में विजय के बाद बलाधिकृत जीवित सैनिकों को हाथ बाँध कर विजेता सरदार या सम्राट, वह जो भी हो उसके सामने लाया जाता था, उससे भी डरा रहता था कि कहीं वह उस पर हमला न कर दे . कायर कौन हुआ और बहादुर कौन हुआ? विजेता या विजित. किसने असमर्थ हो कर भी मरना कबूल किया -पर गुलाम बनने से इंकार किया . मात्र इस सोच के कारण कि वह मर सकता है , झुक नही सकता – हाथ पीठपीछे या आगे की और मोड़ कर या आगे की और बंध कर लाया जाता था वध के लिए.और वध कर दिया जाता था, अपनी सम्मान और स्वतंत्रता को प्राण से अधिक मूल्यवान समझाने वालों को शैतान की गिरफ्त में मान कर खुदा भी इनपर कहर वरपा करने का आदी था. वह उदारता उनके प्रति दिखाता था जो उसके समक्ष समर्पण कर देते थे. बाधने के लिए रस्सी की जरूरत न पडती, करबद्ध या मुश्कबद्ध की मुद्रा में उपस्थित होकर सर कटाने के लिए तत्पर भाव से जानुपात करते हुए सिर झुंका लेेते या दंडवत बिछ जाते थे कि सिर काटने में कोई परेशानी न हो, स्वेच्छा से, बिना चूं चपड़ किए गुलामी के लिए तैयार लोगों को खुदा का बंदा कहा जाता .
???
2

दी को जैसे ही इस बात का इल्म हुआ कि उसने आदम को शक्ल भले अपनी दी हो, उसने किसी फितरत से अक्ल शैतान की भी ले ली देखिए ली भी तो उस पसलीजात से जो दिल के इतने करीब होने के कारण दिल का लेन देन तो कर सकती है, पर दिमाग से काम ले ही नहीं सकती। पर उसमेें अक्ल के नाम पर भूसा भर दिया। पर यह खेती से पहले का आदेशग्राही भूसा था।

दी और हमारी हावरा है जाके पांव न फटी बेवाई, सो का जाने पीर पराई। अच्छा है छोटे बच्चों को बेवाई नहीं फटती, पर यदि नहलाने

Post – 2017-11-06

ला इलाह इल इंसान
मुझे अरबी तो दूर फारसी तक का इल्म नहीं। मैं जुआड़ियों की तरह ब्लैंक कार्ड फेकता हूं। लग गया तो तीर नहीं तुक्का। कई बार मेरे तुक्के को तीर बनते देख कर लोग कहते हैं ‘अहो मेधा! अहो मति:’ तो मजा आता है। इसी मजे की तलब में यह तुक्का यह सोच कर लगा बैठा कि इसका मतलब होगा ‘इंसान को छोड़ कर कोई अल्लाह नहीं।

यदि यह अर्थ गलत है तो जानकार लोग इसे सुधारें। मैं उसे अपनी ज्ञानव्यवस्था में जगह देकर पहले की व्यवस्था में बदलाव कर लूंगा जैसे हम नया फर्नीचर आने पर उसे जगह देने के लिए पहले की चीजों को सरका कर उसके लिए जगह बनाते हैं। परन्तु यदि यह सही है तो समस्या अधिक गंभीर हो जाती है।

अब समस्या का चरित्र बदल जाता है। सोचना यह पड़ता है कि किसने किसको बनाया। इंसान ने अल्लाह को या अल्लाह ने इंसान को। लो गलती हो गई। मुझे सारी भाषाओं, सभी मजहबों मे खुदा और बन्दे के पर्यायों का एक साथ उल्लेख करते हुए अपनी बात करनी चाहिए, आलस्य और अज्ञान के चलते एक ही का नाम लेकर रह गया, और ब्रह्म के सामने तन कर ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और अनलहक दहाड़ने, और बुदबुदाकर ‘अपनी जरूरतों से मैंने तुझे बनाया, तू सबको बनाता है अपनों को यह पढ़या।’ कहने वालों की याद तक न रही।

मेरा यह प्रमाद आपको भी पसंद न आया होगा और डर है मैं आप सबकी नजरों में गिरा न भी होऊं तो नजर में काफी उतर अवश्य गया होऊंगा। यदि
जल्ल तू, जलाल तू।
अंडों का अंडमान तू।
बंदों का बर्धमान तू
इल्मों का इल्मदान तू।
मेरी खता को देख कर
अपनी खता भी मान तू।
मरजी थी तेरी हो गया
डंडे को मत उछाल तू।
गर आ गयी समझ तुझे
आई बला को टाल तू ।
का कीर्तन करने से काम चल जाए तो मान लें, इसे लिखते हुए ही कीर्तन हो गया । लेकिन आदमी वह फितरती चीज है कि यदि खुदा ने उसे बनाया है तो भीवह खुदा से बड़ हो चुका है जैसे हमारी कृतियां हम से बड़ी हो जाती हैं और हम अमुक रचना वाले अमुक के रूप में जाने जाते हैं। जरूरत पड़ने पर तरह तरह के खुदा बना लेगा, और जरूरत न रही तो से सारे खुदाओं अपने खुदा को बचाने के बहाने मिटा सकता है। यदि हमारे कबीले के
खुदा को सभी अपना मान लें तो इतने खुदाओं की जरूरत क्या है, यदि न मानें तो उन्हे इन्सान कहाने का हक क्या है और जो इंसान नहीं हैं उनके लिए तो कबीलाई खुदाने कह ही रखा है कि वे तुम्हारे लिए बनाए गए हैं और तुम उनके साथ मनचाहा सलूक कर सकते हो। मार दिया जाय कि छोड़ दिया जाय, बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाय, यह फिल्मी गाना नहीं हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि यह मजहबी गाना है, गो मैं यह स्वीकार करना चाहता हूं कि मुझे अपनी समझ पर पूरा भरोसा नहीं।

लीजिए कि मैने प्रायश्चित्त कर लिया।

पिछली भूल सुधारते हुए, खुदाओं का कारोबार करके खुदा ने जिनको बनाया, उन्हें बनाते हुए अपना उल्लू सीधा करने वालों की राह में न आते हुए मैं भी मान लेता हूं कि सभी बनी हुई चीजों को ईश्वर ने बनाया, पर उसने एक ही गलती की कि उसने अपनी की छवि में इंसान बनाने का इरादा कर लिया और इसके साथ ही एक दूसरा विचार पैदा हुआ कि जनाब अपनी ही छवि मे इंसान को पैदा करके आप अपना दुश्मन पैदा कर रहे हो। या तो तुम रहोगे या वह। पर इरादा एक बार पैदा हो जाय तो वह कार्यान्वित हो कर ही रहता है। प्रेरणा और उद्भास के बाद सर्जक कितना निरुपाय और सृजन प्रक्रिया उस पर कितनी भारी पड़ती है इसे वे भावाकुल कवि भी जानते हैं जो तरुणाई में लोगों का रास्ता चलना भी मुश्किल कर देते हैं – पहले मेरी कविता सुनो और फिर आगे बढ़ो – और बाद में कहते हैं, पैसा हो तो कवियों का दरबार लगाया जा सकता है और फिर कुछ भी करके पैसा बनाने में लग जाते हैं, वे भी बता सकते हैं।

मुझे खेद इस बात का है कि खुदा और आदमी की जंग मे हारते सभी रहे, जीत की कोशिश में खुदा खुदा रहा ही नहीं और खुदा को मेटने की कोशिश में इंसान इंसान रह ही न पाया। कौन किससे बड़ा है, यह शीतयुद्ध जारी था उसी बीच एक नया खुदा पैदा हो गया। इसका नाम है विज्ञान। अहमस्मि नेतर:। यह अहं ब्रहमास्मि का नया पाठ है। यह ब्रह्म के सच्चिदानन्द का चित है, न इसमें सत है (इसे तो विज्ञान का मिथ्याचार और खुराफात के लिए जितना उपयोग है उसीसे जाना जा सकता है।), न आनन्द (इसे मौज मस्ती में वृद्धिके अनुपात में ही दुख और यातना के विस्तार में भी देखा जा सकता है)।

Post – 2017-11-05

अवधू तीन लोक सों न्यारो

प्रात: स्नान करना शरीर को स्वच्छ या निर्मल करना नहीं, शुद्ध करना है।

भारतीय समाज दो भागों में बंटा है। एक जो प्रात:स्नान करता है, और दूसरा जो सांध्यस्नान करता है। दुनिया के सारे लोग दिन में कामकाज करते और कामकाज के चलते धूल, मैल, पसीने से गंदे होते है, इसलिए शाम को शरीर की मैल साफ करने के लिए नहाते हैं। जो शरीर से केवल एक ही उत्पादक काम करते हैं और उसे भी पाप की तरह करते हैं वे अपने काम के बाद गंदे नहीं होते, अपवित्र हो जाते है और इसलिए स्वच्छता के लिए स्नान नहीं करते, शुद्धता के लिए स्नान करते हैं, सो पानी में एक डुबकी लगाने से भी उनका स्नान पूरा हो सकता है, यहां तक कि पानी छिड़ने से भी काम चल सकता है। पर इसी धक्के में अपने अगले जनम को सुधारने के लिए अपने ज्ञात अज्ञात पापों को भी धोते-बहाते रहते हैं।

परंपरा पुरानी है। ऋग्वेद का एक कवि कहता है, इदमापः प्रवहत यत् किंचित् दुरितं मयि l यद् वा अहं अभीदुद्रोह,यत वा शेप उतानृतम् ।
‘ये जल हमारे उन पापों को भी धो-बहा ले जायं, जिनका हमें भी पता नहीं, जो हमसे अनजाने में हो हो गए हों, जो मेरे मन में किसी के प्रति द्वेष पैदा हुए हों, या जो हमारे मुंह से गलत बात निकलने हुआ हो।’

नदी में स्नान का महत्व इसी पाप प्रक्षालन से जुड़ा है, पाप को धोने बहाने के लिए नदी में स्नान अधिक पवित्र और कुछ खास पर्वों पर स्नान अधिक उपयोगी रहा है, और नदियों में भी कुछ नदियां तो पाप धोने के लिए सीधे ब्रह्मा या विष्णु से पैदा होकर धरती पर उतरी और प्रवाहित हुई थीं। सरस्वती या गंगा जैसी नदियां पापहरण के लिए उतरी थी और अज्ञानी और लोभी जन इनका उपयोग नौवहन और सिंचाई के लिए करने से बाज न आते थे।

पर फिर सोचना पड़ता है कि क्या इतना संवेदनशील और पापभीरु समाज सचेत रूप में किसी के प्रति कोई अन्याय कर सकता था?

भटकने का डर है इसलिए यहां इतना ही कि जिस बौद्ध मत को सनातन या वैदिक मूल्यव्यवस्था से अधिक प्रगतिशील बताया जाता है, वह लगभग सभी मामलों में प्रतिगामी था। उसमें भौतिक जीवन की उपेक्षा थी। परलोकवाद न था, पर पूर्वजन्मों के कर्मफल और उसके भोग में विश्वास था, जो स्वर्ग नरक की पुरानी अवधारणा से अधिक खतरनाक था, क्योंकि इससे सामाजिक और आर्थिक विषमता को समर्थन मिलने लगा। एक ओर इसने वर्णव्यवस्था को धता बताते हुए सभी जनों के लिए अपने मत का, जिसे पहली बार इसने धर्म की संज्ञा दी, द्वार खोल दिया जो इसका एकमात्र प्रगतिशील कदम है। दूसरी ओर ब्रहमचर्य को इंद्रिय निग्रह तक सीमित करके और अहिंसा पर अनावश्यक बल दे कर, स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को पहले से अधिक हेय बनाया और अस्पृश्यता का पर्यावरण तैयार किया । इसका प्रगतिशील समझा जाने वाला कदम भी औपनिषदिक एकत्व या समभाव से आगे नहीं जा पाता। स्वच्छता का इसका मानदंड बहुत लचर था। आश्चर्य नहीं कि सामाजिक न्याय के लिेए विख्यात संत आन्दोलन ने अपनी प्रेरणा और भाषा बौद्ध मत से न लेकर उपनिषदों से ग्रहण की ।

भटकने से बचते हुए भी इतना तो भटक ही गए कि यह बता ही नहीं पाए कि प्रात:स्नाता और सान्ध्य स्नाता, शुद्धतावादी और स्वच्छतावादी जनों से ऊपर और इन दोनों के लिए स्पृहणीय एक तीसरा वर्ग भी होता है जिसके लिए ये सारी श्रेणियां बेकार होती हैं। इसमे पुराने समय के अवधूत, मध्यकाल के सूफी पीर, आधुनिक युग के अपने बचपन के अपने राम और विज्ञानयुग के महान आविष्कारक स्टीव जाॅब आते हैं। ये आत्मा से शुद्ध और स्वच्छ दोनों होते हैं इसलिए काया की गंदगी की ओर ध्यान नहीं देते । ये दूसरों को गन्दा दिखाई देने पर भी गन्दे नहीं होते न यह समझ पाते हैं कि वे भी गंदे हो सकते हैं। वे मानते हैं कि नहाना एक दंड है और उनकी मान्प्रयता का एक दार्शनिक आधार है। प्रकृति ने जब किसी दूसरे जानवर को नहाने की सजा नहीं दी, फिर आदमी पर ही यह अन्याय क्यों? नहाना अप्राकृतिक और अस्नात काया से उठनेवाली गंध को मर्दानाक्रीम और जनानाक्रीम की विज्ञापित भाषा मे विसर्गमुक्त भाव से झेलने की योग्यता का विकास करना प्राकृतिक भी है, आधुनिक भी है और, आज तो, सर्वविदित भी है।

आदमी को नहलाना, नहाने को बाध्य करना, न नहाने वालों से भेदभाव बरतना क्रूरता है और इस क्रूरता का शिकार मुझे बनना पडता था। उसे बयान करने का आज समय तो है नहीं।
कल कहेंगे जो आज कहना था
कल का कलिकाल में ठिकाना क्या।

Post – 2017-11-05

26Then God said, “Let us make mankind in our image, in our likeness, so that they may rule over the fish in the sea and the birds in the sky, over the livestock and all the wild animals,a and over all the creatures that move along the ground.”
27So God created mankind in his own image,
in the image of God he created them;
male and female he created them.
यदि ईश्वर ने मनुष्य को अपनी छवि में गढ़ा और मनुष्य उस को हृदयंगम करने के लिए उसे उसी छवि में गढ़ता है तो यह अपराध कैसे हो गया। इससे तो बिना किसी दलाल के सीधे उसका साक्षात्कार कहना होगा।

Post – 2017-11-04

याद करता हूं तुझे खुद को भूल जाता हूं।
तुमने भी याद किया है, कभी मुझको ऐसे ।।
बहुत मुश्किल है संभलना फरेब से अपने
सच अगर माना तो क्या मुझसे कहा है ऐसे।
नहीं, हर्गिज नहीं, पर सच से जुदा है क्या यह
सच के नुस्खों में ही सच ढूंढ़ रहे हों जैसे।
अपनी बर्वादियों के साथ खड़े हैं तन कर
फिर भी पहले भी हुए लोग हैं कैसे कैसे।।

Post – 2017-11-04

हमें भी देखिए, हम खुश नहीं हैं दुनिया से
मगर, दुख, फाड़ कर कपड़े, बयां नहीं करते।।
हमें भी देखिए, कुछ करते हैं, दुख दूर तो हो
हम कोसते नहीं, आहो फुगां नहीं करते ।।
हम सोचते हैं कि क्या करना है, क्या होना है
सुनते हैं सबकी किसी का कहा नहीं करते ।।
इतना सा फर्क है पर दूरियों को देखिए तो
जमीं वही है मगर हम मिला नहीं करते।।

Post – 2017-11-03

स्वच्छता और पवित्रता

मैं बचपन में बहुत गन्दा रहता था। उस छोटी उम्र में जब मुझे स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी उन पर थी जो सफाई और गंदगी का भेद जानते थे। उनके पास मेरे लिए कुछ नहीं था। समय तक नहीं। पिता जी छावनी पर रहते। दोपहर और शाम को खाना खाने लिए आते तो देख लेता, पर निकट जाने का साहस नहीं होता था। छावनी न होती, वह घर पर भी होते तो भी उनके पास अपनी संतानों के लिए समय नहीं हो सकता था।

दीदी को सहेलियों के साथ खेलने, कूदने से फुर्सत न थी। उसने सीना पिरोना और अक्षर ज्ञान कब और किससे पाया, यह मुझे पता न चला, पर वह किसी रहस्यमय तरीके से यह सब जानती थी। दूसरे किसी की अपेक्षा मैं दीदी से कुछ लगाव अनुभव करता था, परंतु उसका सारा स्नेह भैया के लिए था । कुछ ऐसे काम थे जिनके लिए भैया पकड में आ जाते थे क्योंकि वह मेरे बूते का था जैसे छावनी से दूध लाना, या रहेट्ठा (अरहर का सूखा डंठल) तोड़ कर या लकड़ी चीर कर जलावन के लिए घर में पहुचाना, पर जहां उन्हें लगता कि वह काम भी मुझसे कराया जा सकता, वह उसे भी मेरे ऊपर लाद कर उससे मुक्त हो जाते। वह इस समय का उपयोग ताश खेलने में करते। उनका मेरे प्रति कोई कर्तव्य न था, मैं उनसे छोटा था इसलिए न तो उनके आदेश की अवज्ञा कर सकता था, न उनसे हुज्जत कर सकता था। ऐसे कामों को संभाल मैंने उन्हें घर का कोई काम करते नही देखा। इसके बाद भी उनको सभी प्यार करते, माई को छोड़कर और वह उसी अनुपात में बिगड़ते गए थे। जिस एकमात्र कला का विकास किया था वह था झूठ बोलना और डींग हांकना।

बाबा साठ साल की उम्र मे ही अचलस्त से हो गए थे। मरने के बाद नरक से बचने के लिए वह जो जुगत भिड़ाते रहते थे उनके चलते ही उन्होंने कभी चारों धाम करने की ठान ली थी, याद नहीं आता ठीक कब। अजीब बात है। बाबा के प्रसंग में यह बात कभी ध्यान में आई ही नहीं और आज अचानक थैला तक याद आ गया जो ठीक इसी प्रयोजन के लिए सिला गया था। यह मारकीन के सात आठ गज कपड़े को दोहरा करके इस तरह सिला गया था कि दोनों सिरों पर तीन तीन फुट लंबे थैले बन जाएं और बीच का हिस्सा कंधे पर टांगने के लिए पट्टे का काम करे। आगे और पीछे लटकते इन थैलों में कपड़ा-लत्ता, लोटा डोरी, सत्तू, चिउड़ा, नमक, सब कसा गया था। अनुमान है कि इन थैलों के भीतर पैसा, रुपया रखने की थैलियां भी बनी रही होंगी। बाबा का स्वास्थ्य उस समय ठीक रहा होगा, पर उसकी कोई तसवीर नहीं उभरती, जब कि कसे हुए उन थैलों की उभरती है।

तीर्थयात्रा आज सैलानी पन का ही एक रूप है, परन्तु उन दिनों जब यातायात के सीमित साधन थे, या उससे भी पहले जब उनका भी अभाव था, यह सचमुच एक साधना थी। जाना तय था पहुंच पाना अनिश्चित था और लौट कर जीवित वापस आने का कोई ठिकाना न था। बहुत से लोग इस आशंका से कि कहीं ऐसी जगह हारी बीमारी में मौत न हो जाय कि किसी परिजन को खबर ही न लग सके, प्रस्थान से पहले अपनी प्रतीकात्मक अंत्येष्टि करके तीर्थ यात्रा पर निकलते। रास्ते में जहां कहीं सत्तू भूजा मोल मिल जाता खरीद कर खाते। थैले का सामान उन स्थितियों के लिए होता जब कहीं कुछ नहीं मिलता। वे अक्सर दल बनाकर निकलते। बाबा के मामले में उनके प्रस्थान का या ऐसे दल का कोई आभास नहीं। गए किसी दल के साथ ही थे क्योंकि एक आभासिक स्मृति उभरती लग रही है कि दूसरे लोग आगे चले गए थे, यह अकेले लौटे थे।

हुआ यह था कि उन्होंने पहला तीर्थ बद्रीनाथ को चुना था। ठंढ को झेलने के लिए धोती और चादर तो उपयुक्त हो नहीं सकते थे। शरीर भारी था। चढ़ाई में घुटने जवाब दे गए। गठिया की शिकायत और घुटनों को लपेटने के ऊनी पट्टों के साथ लौटे थे। पट्टों की याद है, उन्हें लपेटने के दृश्यों की भी याद है फिर भी इसका कालक्रम बैठ नहीं पाता। जिसे उन्होंने गठिया समझ लिया था वह गंठिया तो न था, क्योंकि कछ दिनों के बाद उनहोंने वह पट्टा लपेटना बन्द कर दिया था। परन्तु इसके बाद वह लगभग बैठ से गए थे। कहीं आने जाने के नाम पर मंगलवार की बाजार करने जाते, एकाध बार छावनी तक।

बद्रीनाथ की यात्रा से ही वह एक और बीमारी ले कर लौटे थे, या यदि यह पहले से थी तो इसके बाद उग्र हो गई थी। यह थी ब्राकाइटिस, जिसे वह दमा समझते थे। इसके बाद से ही उन्हें जाड़ा इतना अधिक सताता कि रुइभरे की माटाई के बाद भी सिहरते रहते थे। इन सभीका मिला जुला असर ही था कि वह दरवाजे से बंध कर रह मए थे और समय बिताने का उनका एक सहारा ताश का खेल बन गया था। अब उनकी देख संभाल के लिए दूसरों की जरूरत थी, वह किसी दूसरे की देख भाल नहीं कर सकते थे। उन्हें नहलाने के लिए रामबालक के लड़के सीता राम की सेवा ली जाने लगी थी।

बाबा दोपहर तक का समय कैसे बिताते इसका ठीक हिसाब नहीं मालूम । संभव है कुछ समय विश्वामित्र के साप्ताहिक अंक को पढ़ने में लगाते रहे हों, जिसमें साहित्य आदि के साथ पूरे सप्ताह के समाचारों का सार भी तिथिवार दिया होता था। साहित्य में उनकी कोई रुचि थी तो वह रामायण तक सीमित थी।

बाबा को समय काटने के लिए ताश खेलने की आदत पड़ गई थी. वह ताश के पत्तों का खर्च झेल सकते थे और संभव है ताश खेलने को उ न्नत मनोरंजन मानते रहे हों, इसलिए पच्छिमी गोसवारे में दो खांटों को जोड़ कर ताश खेलने वालों के लिए मंच तैयार कर दिया जाता और खिलाड़ी जुटते जाते जो खेल न पाते वे तमाशा देखते रहते और किसी जकके किसी काम से उठाने की स्थिति में अपनी बारी का इंतजार करते. खेल के नाम पर वे शाह काट से आगे कुछ न जानते थे. तमाशा देखने वालों में भैया भी शामिल होते । सभी इतने व्यस्त थे कि किसा के पास किसी और के लिए समय ही न था।

मैं गंदा इसलिए रहता था कि मैं समाज के उस पवित्र हिस्से का सदस्य था जिसे गंदा रहने, साफ सुथरी चीज को भी गंदा करते रहने की आदत है। वह सड़ांध और दुर्गंध के बीच, घंटों, दिनों, महीनों रह सकता है, पर उसे साफ करके उससे मुक्ति नहीं पा सकता, क्योंकि ऐसा करते ही उसकी पवित्रता नष्ट हो जाएगी। उसे स्वच्छ रखने के लिए गन्दे और अपवित्र आदमियों की जरूरत है। वह गंदा आदमी बनना किसी को पसंद न था।

Post – 2017-10-31

अग्निभिक्षा

चार पांच साल का बच्चा क्या कर सकता है इसे आप नहीं जान सकते। उससे क्या काम लिया जा सकता है यह काम लेने वाले जानते हैं। मुझे जो दो काम याद आते हैं उनका संबंध भिक्षाटन से है। भिक्षा देना और भिक्षा के लिए भटकना।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में भारत की आबादी तीस करोड़ से करोड़ से कुछ कम थी। जब बंकिम बाबू ने त्रिंश कोटि कल कल निनाद कराले लिखा था तब कुछ और कम रही होगी। इसका एक कारण यह रहा हो सकता है कि देवताओं की संख्या तैंतीस करोड़ थी इसलिए मनुष्यों के लिए जगह कम पड़ जाती रही होगी।

मेरे जन्म से घबरा कर अंग्रेजों ने जनगणना करा डाली कि कहीं मनुष्यों और देवताओं का अनुपात और बिगड़ने तो नहीं जा रहा। उन्हे पता चला कि हुआ उल्टा है, भारतीय इतिहास में पहली बार मनुष्यों की संख्या देवताओं से आगे चली गई है। अपनी प्रशंसा अपने मुंह से करते हुए संकोच होता है, पर आप चाहें तो कह सकते हैं कि मेरे जन्म के साल में मनुष्यता देवत्व पर भारी पड़ी। भारत की आबादी ३५ करोड़ हो गई थी। उससे चार पांच साल बाद जब के भिक्षाटन की बात कर रहा हूं आबादी अधिक से अधिक ३६ करोड़ रही होगी । फिर भी भिखारियों की बाढ़ सी आई रहती।
Inclusion of new area Actual increase of population
1881 253,896,330 1872-81 47,733,970 33,139,081 14,594,889 23.2
1891 287,314,671 1881-91 33,418,341 5,713,902 27,704,439 13.2
1901 294,361,05 1891-01 7,046,385 2,62,077 4,374,308 2.5
1911 315,156,396 1901-11 20,795,340 1,793,365 19,001,975 7.1
1921 318,942,480 1911-21 3,786,084 86,633 3,699,451 1.2
1931 352,837,778 1921-31 33,895,268 35,058 33,860,240 10.6

Total 1881-31 98,941,448 10,301,035 88,640,413 39.0

आबादी तब के भारत का दो तिहाई रह जाने के बाद भी उससे तीन गुने से अधिक हो चुकी है फिर भी आज गांवों में भीख मागने के लिए कोई नहीं आता, जब कि तब कोई घंटा खाली नहीं जाता था जब एक दो भिखारी हाजिर न हो जाते । उनका एक पैटर्न था, जिसमे यदि वे भीख के लिए मेरे घर का रुख करते और कोई दूसरा याचक द्वार पर खड़ा दिखाई दे जाता तो कन्नी काट कर दूसरी ओर चले जाते और कुछ समय लगाकर फिर उपस्थित होते। इसी तरह वे कई दिनों का अंतराल देकर आते, पर यदि उनके एक जत्थे की कल्पना करें तो वह सौ सवा सौ से अधिक का नहीं रहा होगा, जिसके इलाके में हमारा गांव आता था, इसलिए धीरे धीरे लोग उनके चेहरे और स्वभाव से परिचित हो जाते।

भिखारी कुछ पाने से पहले कुछ देता भी था, चाहे वह जयकार के रूप में हो या आशीर्वाद के रूप में या संगीत और भजन, गायन के रूप में। सबसे मार्मिक होता योगियों का सारंगीवादन और उसके साथ भरथरी का चरितगान। वे कुछ मागते नहीं थे। दरवाजे पर खड़े होकर पूरी तल्लीनता से सारंगी बजाते करुण रस का संचार करने लगते। कई बार तो महिलाएं ड्योढ़ी में पल्ले की ओट लेकर उनका गायन सुनने को इकट्ठा हो जातीं और यह भांप कर कि उनका गायन सुना जा रहा है वे देर तक गान करते रहते जैसे भिक्षा उनका पहला सरोकार न हो। यही हाल तमूरे पर सूर के पद गाने वालों का था ।

ये बातें मैने बाद में लक्ष्य कीं, परन्तु शैशव में योगियों से बहुत डर लगता । उनमें एक तो उस समय पहाड़ जैसा ऊंचा लगता। तामई रंग, बढ़े हुए बाल, लहराती दाढ़ी, नीचे से ऊपर तक गेरुआ बाना, कंधे से टखने तक सिले हुए गेरुआ गुद्दड़ का भारी धोकरा और ऊपर से बच्चों को डराने के लिए धोकरकसवा की कहानियॉं, जो लगता डराने वालों के लिए भी निरा कल्पित न थीं। वे मानतीं कि एकान्त में यदि कोई बच्चा मिल जाय तो वे जड़ी सुंघाकर उसे धोकरे में कस लेते हैं और ले जाकर उसे जोगी बना देते हैं। यह धारणा गलत थी, पर आशंका निराधार न थी। बच्चों को चुराकर बलि तक देने के प्रचलन उन्नीसवीं सदी में अधिक रहे हों, पर आज भी सुनने को मिलते हैं।

नर बलि के सबसे जघन्य कालों में उस पैमाने पर नरबलि न होती थी जितनी आज हो रही है। क्या कोई बता सकता है कि प्रतिवर्ष कितने हजार या लाख बच्चे गायब हो रहे हैं? कितने हजार विदेशी अंग प्रत्यारोपण के लिए भारत आते हैं जिनके कारण भारत चिकित्सा का नाभिक्षेत्र या हब बना हुआ है? कितने अनचाहे बच्चों का बोझ ढोने में अक्षम परन्तु देह धरे के दबाव में उनके जन्म को रोक न पाने के कारण उन्हें दो तीन सालों की उम्र में अपने पांवों पर खड़े होने के लिए खुला छोड़ देने वाले उनके वापस न आ पाने पर भारमुक्त अनुभव करते हैं और उनके लापता होने की रपट तक नहीं लिखवाते कि उनके मिल जाने की दशा में उनका भार झेलना होगा, यह मैं भी बता नहीं सकता, जब कि इसे अपनी जानकारी में घटित होते मैंने देखा है।

पहले जो कुछ अज्ञान और अन्धविश्वास के कारण, या मानसिक विकृति के कारण बहुत छोटे पैमाने पर होता था वही आज शिक्षित, पेशेवर चिकित्सकों के अधिक धनी होने का लालसा से पनपी अपराधीकरण के चलते दहला देने वाले पैमाने पर हो रहा है।

जो भी हो, जोगी के लंबे और नीचे भीख के अनाज से कुछ फैले धोकरे को देख कर मुझे लगता, हो सकता है उसमें किसी बच्चे को बेहोश करके डाल रखा हो और मौका मिले तो मुझे भी डाल लेगा, उसे भीख की डलिया पकड़ाते हुए मैं बहुत सावधान रहता था। इस कार्य में मैं माई के सहायक का काम करता। आवाज सुनकर एक हाथ में अनाज की डलिया और दूसरे हाथ से मुझे पकड़े ड्योढ़ी तक आती और फिर डलिया मुझे पकड़ा कर किल्ली खोल कर बाहर जाने पर डलिया मुझे थमा देती इसलिए आश्वस्त रहता कि वह मुझे नहीं पकड़ेगा।

भिखारियों को भीख बड़े आदर के साथ दिया जाता, फिर भी मैं समझता था भीख मांगना गर्हित काम है। इसके बाद भी मुझे स्वयं अग्निभिक्षा पर निकलना पड़ता।

यह बात मेरी समझ में कभी नहीं आई कि यह काम सन्ध्या को ही क्यों करना पड़ता। सुबह के लिए यदि पूरी रात आग जिला कर रखी जा सकती थी तो शाम के लिए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता था।

कभी इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि जगदीशका को कभी यही काम क्यों नहीं करना पड़ा। अब सोचता हूं तो लगता है काकी आग जिला कर रखती थीं परंतु माई को उनसे आग मांगने का साहस नहीं होता था। हो सकता है कभी किसी बहाने इन्कार करने के कारण अपमानित अनुभव किया हो, और अपमान से बचने के लिए उसे किसी दूसरे के घर से आग मंगाना पड़ता था। यह नित्य का क्रम था या कभी कभी यह होता था, यह कहना कठिन है , पर होता इतनी बार था कि मैं कोशिश करता कि जिस घर में इससे पहले गया था उसके यहां इतनी जल्द न जाऊं।

अग्निभिक्षा के लिए घर से कोई पात्र ले कर नहीं निकलता। रास्ते में ही कहीं खपड़ा नरिया चुनना होता। गावों में उन दिनों इनकी कमी न होती। बरसात से पहले खपरैल की मरम्मत के समय जो टुकड़े निकलते उनको ओरियानी के नीचे डाल दिया जाता जिससे बरसात में पानी की धार सीधे मिट्टी पर न गिर कर इन पर गिरे और नीचे गड्ढा न हो।

माई तो अग्निभिक्षा के अपमान से बच जाती पर मुझे प्राय: अपमानित होना पड़ता । कुछ घरों से तो सीधे लौटा दिया जाता, कुछ में माई को इस लापरवाही के लिए कोसने के बाद एक टुकड़ा सुलगता हुआ उपला मिल जाता। कहीं कहीं महिलाएं मुझे स्नेह से बैठा लेती और माई मेरे साथ कैसा बरताव करती है इसे कई बहानों से पता लगाने का प्रयत्न करतीं।

ऐसे अवसर पर मेरे मन में परिवार का स्वाभिमान जाग जाता, किसी के सम्मुख दैन्य न प्रकट करने का अभिमान जाग जाता और साथ ही एक काइंयापन भी जाग जाता कि यदि किसी से भी माई की शिकायत की तो यह खबर उस तक पहुंचेगी जरूर और फिर मेरी जो दुर्गति होगी उसकी कल्पना से सहमा रहता। इन तीनों का मिला जुला भाव ही रहता जिसमें मैं माई की बड़ाई करता।

सबसे तीखी झिड़की बचानी की मां से मिलती। वह दिन भर अपने दो कमरों के के आगे दो ओर से ऊंची छल्ली से घिरे मकान में रहतीं और किसी से न तो मिलतीं न कोई उनके पास जाता। दरवाजा चेचरे का था। मैने चेचरे को खटकाया और वह प्रकट हुईं और आग की याचना की तो उन्होंने झिड़कते हुए मना कर दिया और चेंचरा बंद कर लिया। मैं लौटने लगा तो चेंचरा खुला और उन्होंने वापस बुलाया। भीतर ले गईं। देर तक बड़बड़ाते हुए माई को लापरवाही के लिए कोसने के बाद आग दी।

कोसते तो सभी माई को ही लेकिन सुनना और अपमानित होना मुझे पड़ता था। उसे लौट कर यह भी बता न सकता था कि औरतें उसे कैसी खरी-खोटी सुनाती हैं।

मेरी सबसे अधिक दुर्गति तब होती जब हवा चलने से आग दहक जाती और खपरैल इतना गर्म हो जाता कि संभालना मुश्किल हो जाता । अब समस्या किसी दूसरे खपरैल की तलाश की हो जाती और आग के उस पर पलटने की। एक बार की याद है जब खपरैल हाथ से छूट गई और आग नीचे गिर कर बिखर गई । बड़ी मुश्किल से एक टुकड़ा घर तब जीता जागता पहुंचा पाया। जुगत क्या बैठाई थी यह याद नहीं।

अपने परिवार से बाहर के समाज से मेरा परिचय इस अग्निभिक्षा के माधयम से आरंभ हुआ था। यह एक तरह की मुठभेड़ थी। इसी के चलते बचानी की मां जिनके कर्कश स्वभाव के कारण सभी डरते, उनका दरवाजा मेरे लिए खुल गया और मेरे साथ जगदीशका, चन्नर का और शायद झीनक का भी शाम ढले उनके पास कहानियां सुनने जाने लगे थे। एक दो किस्से सुनाने के बाद वह कहतीं, ‘अब भगवान का जोड़ुआ खिस्सा होगा। मैं जो कुछ सूझता जोड़ता फिर कुछ ठिठकता हुआ जाने क्या क्या कहता और वह पूरे धीरज से सुनतीं, जहां रुकता वहां हौसला बढ़ाने के लिए वह उकसाती भी।

अब सन्दहवादियों को यह यह विश्वास दिलाना तो कठिन है कि मैंने अक्षरज्ञान से पहले अग्निभिक्षा अभियान में अपना पहला अनुसंधान पूरा कर लिया था और यह था आग किसी और के यहां मिले या नहीं, हुक्का पीने वाली महिलाओं के घरों में अवश्य मिल जाएगी, और अक्षर ज्ञान से पहने मैं कहानीकार भी बन चुका था। अनिश्चय सिर्फ एक बात को ले कर है कि बचानी की मां ने मेरी प्रतिभा की खोज की या मुझे अपने प्रयत्न से कहानीकार बनाया ।

पर मेरी विफलता यह कि मैंने न कहानी गढ़ने में दक्षता पाई, न बातें गढ़ने में। मै जोड़आ कहानीकार बना और जोड़ुआ विद्वान। एक बात में जानें कितनी बातें जुड़ती चली जाती हैं।