Post – 2015-11-23

यही जाना कि कुछ न जाना हाय

‘मैं तुमसे फिर वही सवाल करता हूँ क्या तुम्हें कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में कुछ अता पता है, या जो जी में आया बक जाते हो।’

‘पार्टी के बारे में तो तब पता होता जब पार्टी के भीतर रहा होता। उसकी नौबत नहीं आई। जो पार्टियाँ भारतीय दृश्यपट पर थीं उनमें सबसे अधिक सुथरी पार्टी या कहो भ्रष्टाचार से मुक्त, सदाशयी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ही लगती रही। इसलिए दूसरों की अपेक्षा इसके प्रति लगाव था।‘

फिर यह लगाव कम कैसे हुआ?

“कम नहीं हुआ, मोहभंग सा हुआ।
1983 में मैंने हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य के दोनों भाग लिखे थे। इसके प्रकाशन में चार साल का जो विलम्ब हुआ वह आइसीएचआर की राजनीति के चलते हुआ। प्रकाशन के बाद आलोचना करने की जगह इसे दबाने, जिज्ञासा करने वालों को बहकाने का प्रयत्न जिस बड़े और सुनियोजित रूप में किया गया उसने मोहभंग पैदा किया और फिर एक एक चीज की जाँच करने चला तो लगा यहाँ तो कोई काम सही तरीके से किया ही नहीं गया और प्राचीन इतिहास को योजनाबद्ध रूप में कुत्सित बनाने का प्रयत्न लाभ के लोभ में किया गया। 1995 में अंग्रेजी में दि वेदिक हड़प्पन्स के प्रकाशन के बाद जब वह देश विदेश में आयोजित सेमिनारों में चर्चा में आई उसके बाद आर्य आक्रमण और आर्यो के बाहर से आने की मान्यताओं को गलत मान कर पुनर्विचार आरंभ हुआ परन्तु उसमें भी जितनी खींचतान अपने को मार्क्सवादी कहने वाले भारतीय इतिहासकारों ने किया वह विस्मयकारी था।’’

“बस इतनी सी बात पर तुमने पूरी पार्टी को, उसके सारे किये कराये पर पानी फेर दिया? आत्मरति की हद है!”

“यह इतनी सी या उतनी सी बात नहीं होती। इसे चक्षुखोलक अंजन कहते हैं। आई ओपेनर। लम्बे समय तक तुम बिना सोचे-विचारे मान्यताओं के बहाव में बहते और उसी के भीतर उछल-कूद करते चले जाते हो और फिर किसी झटके से जब आँख खुलती है तो पाते हो यहाँ तो कुछ भी ठीक नहीं है। यह मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूँ यह भी मार्क्स कहीं कह गए हैं। प्रसंग मुझे याद नहीं पर उन्होंने उसके सर्वत्र होने के सन्दर्भ में कही है, शायद शोशण के बारे में, कि वह तत्व हमारे चारों ओर होता है और पहले हमारा ध्यान उधर नहीं गया रहता है और फिर जब ध्यान जाता है तो हैरानी होती है कि मैंने इससे पहले इसे देखा क्यों नहीं।“

‘‘सिर्फ तुम्हें दिखाई दे रही है?’’

‘‘ठीक कहते हो, जो अपना पूरा जीवन उसी में लगा चुके हों, सट्टा बाजार की भाषा में अपनी सारी जमापूँजी दाव पर लगा चुके हों वे इस आघात से बचने के लिए देख कर भी मानने से इन्कार कर देंगे और आगे भी आँख बन्द किए रहेंगे।“

‘‘क्या-क्या दिखाई दिया तुम्हें, समझूँ तो।’’

‘‘पहली चीज तो वही जिसे मार्क्स और ऐंगेल्स भी अपनी हड़बड़ी के कारण नहीं देख सके थे कि एक नई व्यवस्था इतनी कमजोर नहीं होती कि उसे उभार के समय ही उखाड़ फेंका जाय। कम्युनिस्ट मैंनिफेस्टो को दुबारा देखो। उन्होंने पूँजीवाद को सार्वभौम मान लिया। और इसलिए मान लिया अब उसके ऊपर प्रहार करके इसे हटाया और नई साम्यवादी व्यवस्था को लाया जा सकता है। गलती करने वाले वह अकेले नहीं थे। दूसरी सोच वाले भी थे। पूँजीवाद के खात्मे के लिए बाहर से प्रयत्न की जरूरत नहीं थी, उसके भीतर से जर्जर होने की प्रतीक्षा और उसके लिए तैयारी की जरूरत थी। वह नहीं की गई। पहले महायुद्ध में अजेय रूस को बर्वादी पर लाकर स्वतः वह विक्षोभ पैदा कर दिया जिसका लाभ उठा कर सत्ता परिवर्तन कर दिया गया। परन्तु इसमें मेनशेविक जो मानते थे कि अभी साम्यवाद का चरण नहीं आया है, लोकतांत्रिक व्यवस्था और पूँजीवादी विकास का मार्ग उचित रहेगा, अधिक सही थे और मार्क्सवाद की उनकी समझ लेनिन से अच्छी थी। प्रतिस्पर्धी पूँजीवादी शक्ति के रूप में रूस के उभार के बाद वि श्व पूँजीवाद का परिदृश्य क्या होता इसकी हम आज कल्पना नहीं कर सकते।“

‘‘मान लो यह सच ही हो तो क्या इतिहास में लौट कर गलतियाँ सुधारी जाती हैं?”

‘‘लौटना संभव ही नहीं। अभी जो शब्द मेरे मुँह से निकल चुके हैं, उनमें से एक अक्षर को भी
अनकहा नहीं किया जा सकता।’’

‘‘फिर?’’

‘‘उस इतिहास का वि श्लेषण किया जा सकता है कि हम यह समझ सकें कि हमसे और कौन कौन सी चूकें किन-किन कारणों से हुई हैं और उस समग्र समझ से आज की अपनी भूमिका तय कर सकें, न कि लाज बचाने के लिए आत्मनिरीक्षण से मुँह चुराते हुए, लकीर पीटते चलें, अपने को नेस्त नाबूद करने तक कबाड़ा करते चलें।”

‘‘तुम्ही से सुनना चाहता हूँ कौन कौन सी चूकें हमसे हुईं।“

‘‘देखो, विज्ञान का एक नियम है कि कि प्रकृति को समझ कर उसी में से अपने नियमों को तलाश कर उसे बदला जा सकता है। तुम्हें मार्क्स की वह इबारत याद न होगी जिसमें उन्होंने कहा था, कि एक समय आएगा जब भौतिक विज्ञानों को मानवविज्ञानों को समाहित कर लेना होगा, उसी तरह मानव विज्ञान भौतिक विज्ञान को आत्मसात् कर लेगा: जब एक ही विज्ञान रह जाएगा।
Natural science will in time incorporate into itself the science of man, just as the science of man will incorporate into itself natural science: there will be one science.
Marx, Private Property and Communism (1844)

“यह तो हुई भविष्य की बात, परन्तु जैसे भौतिक विज्ञान भूत तत्वों की समझ से उन्हें बदलता है, उसी तरह समाज की गहरी समझ से ही समाज को बदला जा सकता है और इसे समझने का सबसे सही तरीका है इतिहास को समझना, उसकी कारक शक्तियों की पहचान और उनसे अपने औजारों का निर्माण। यह किया ही नहीं गया।

“तुमने इतिहास को समझने की जगह, उसे गढ़ना आरंभ कर दिया। गढ़ना ही नहीं इस तरह विकृत करना कि सोच कर नैतिक और बौद्धिक गिरावट पर आश्चर्य होता है। परन्तु इस पर शाम को चर्चा करेंगे।

Post – 2015-11-22

यह दिल मांगे मोर

‘एक बात बताओ, जब तुम खुद मानते हो कि तुम्हारी किसी विशय अच्छी जानकारी नहीं है तो क्या तुम्हें पागल कुत्ते ने काट खाया है कि उस पर बोले बिना रह नहीं सकते? कम्युनिस्ट पार्टी और आन्दोलन के बारे में जब आधिकारिक ज्ञान नहीं है तो चुप रहना चाहिए था। तुम्हीं ने मुझे पढ़ाया था न, तावदेव शोभते मूर्खः यावद् किंचिन्नभाशयेत्। चुप रहते तो भरम तो बना रहा होता।’’ दोस्त है तो वैचारिक मतभेद के बाद भी सही सलाह तो देगा ही।
मैंने बिना हत्प्रभ हुए कहा, ‘‘पागल कुत्ते आसानी से पहचान में आ जाते हैं, लेकिन पागल आदमियों को समझने में समय लगता है। उनके काटों का पता लगाने में और भी लम्बा समय लगता है। इस लम्बे और मुश्किल काम को आसान बनाने के लिए यह बताते हुए बोलना ही पड़ता है।’’
‘‘फिर वही जलेबी बनाने की कला!’’
मैं तुम्हें एक सचाई बताना चाहता हूँ, जो सचाई से हट कर कहानी बनी और फिर भुला दी गई। एक किसान था। बड़ी किस्मत से उसे कोकाकोला का बोतल पीने को मिला। बोतल मुँह से लगा कर पीने की आदत न थी, इसलिए गिलास में तो ढालना ही था। ढालने का भी तरीका मालूम न था इसलिए उसके न चाहते भी कुछ छलक कर नीचे गिर ही जाना था। तुम होते तो कहते गिर गया तो गिर गया, उस पर पछताना क्या। पर वह बेचारा किसान इतनी अनमोल चीज बर्वाद हो गई। न चाहकर भी उधर देखने को विवश था। क्या देखता है कि चारों तरफ से चींटियाँ उसकी गन्ध से या जैसे भी उसके पास धिर आई हैं।“
“मीठी चीज हो, उसे चींटियाँ और मक्खियाँ न घेर लें तो उसे अपनी मिठास पर शर्म आएगी। यह तो होना ही था।“
“पर फिर देखा तो पाया वे चींटियाँ जो उसे चूसने पर लगी थीं मरी पड़ी है। हैसियत ऐसी नहीं, न ही यह व्यावहारिक था कि कोकाकोला, पेप्सीकोला या किसी अन्य कोला से कृमिनाशक का काम ले, फिर भी उसने सोचा कि इसमें पानी मिला कर देखें यह कृमियों का सफाया करता है या नहीं। वह घोल बढ़ाता गया और उस निर्णायक बिन्दु पर पहुँचा जहाँ से आगे उसका प्रभाव कम हो जाता था। उसने पाया यह तो कीटनाशकों से कई गुना सस्ता और कई गुना प्रभावकारी है, इसलिए कीटनाशक के रूप में उसका ही प्रयोग करता रहा। जब यह रहस्य सामने आया कि पेय द्रवों में कीटनाशक मनुष्य के लिए हानिकारक स्तर तक मिलाए जाते हैं तो किसी तरह वह सूचना और प्रसार के केन्द्र में आ गया और उसके बाद वह लुप्त ही हो गया। हम उसका नाम तक नहीं जानते। यह भी न स्वीकार करेंगे कि वह उस पाये का तो नहीं पर उस मिजाज का वैज्ञानिक था जिसके लिए हम जेम्स वैट और अल्वा एडिसन को याद करते हैं। वे उस अर्थव्यवस्था की उपज थे जिसको उन आविष्कारों और युक्तियों के लाभ की संभावनाएँ दीखती थीं और हमारा किसान उस अर्थव्यवस्था के विरोध में अपने प्रयोग और उसके परिणामों के साथ खड़ा था, और हम उसका नाम तक नहीं जानते। कितना शर्मनाक है।’’
‘शर्मनाक’ का प्रयोग मैंने जान बूझ कर उसको चोट पहुँचाने के लिए किया था, फिर उसने अपने को सँभालते हुए कुछ कहना चाहा। मैंने मौका ही न दिया। पूछा, इतने ज्ञानी हो, सीपीएमएल का मतलब जानते हो।
जानता हूँ पर मानता नहीं, इसका पूरा पाठ है कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट।
मानता तो मैं भी नहीं परन्तु अपने प्राण निछावर करके भी समाज को बदलने का संकल्प लेने वाले मेधावी और अनमोल रतन तो उसे ही चुनते हैं? उनके उद्घोष से प्रभावित युवकों को इस शब्द का न तो अर्थ पता होता है न ही उस परिणाम का बोध जिसके तहत वे अपने अधिकार क्षेत्र को आगे बढ़ने ही नहीं देते। न शिक्षा, न स्वास्थ्य व्यवस्था, न आर्थिक विकास। इतना क्रूर नियन्त्रण और अपनी प्रजा का उत्पीड़न तो क्रूर शासकों ने भी नहीं किया होगा। फिर भी सपने के प्रति जीवन उत्सर्ग करने वालों की कतार जारी है।“
“यह बताओ, तुमने उनसे कभी पूछा कि सीपीएमएल को बदल कर उन्होंने सीपीएमएम क्यों नहीं किया। आखिर चाइनार प्रेजिडेंट आमादेर प्रेजीडेंट का नारा और पोस्टर तो वे ही लगा रहे थे?” ‘‘भई, लेनिन के सामने माओज्देदुंग तो उन्नीस ही पड़ेंगे न।“
‘‘मेरी जो समझ है उसमें माओ के सामने लेनिन छोटे पड़ते हैं। माओ वैज्ञानिक सोच रखते थे। जानते हो वैज्ञानिक युग कर आरंभ हुआ था या वैज्ञानिक विकास के लिए एक संस्था किस नारे के साथ स्थापित हुई थी। इसका नारा था प्रयोग। जो तुम सिद्धान्त से जानते हो, उसे परख कर देखो कि वह सही भी है या नहीं। सिद्धान्त और प्रयोग या व्यवहार के बीच से सत्य के अन्वेषण की प्रक्रिया यहाँ से आरंभ हुई। भौतिक विज्ञानों ने तो इसे अपना लिया, सामाजिक विज्ञानों ने इसे समझा ही नहीं। इसे समझने वाला एक मात्र दार्शनिक माओ थे जिसने कहा पैक्सिस अर्थात् सिद्धान्त और प्रयोग और परिणाम पर ध्यान दो। इसी के चलते उन्होंने सांस्कृतिक क्रान्ति की। इसे कई तरह से बदनाम करने की कोशिश की गई। परन्तु मैं यह जानना चाहता हूँ कि चाइनार प्रेजिडेंट आमादेर प्रेजीडेंट के नारे के साथ रंगभूमि में पधारने वालों ने कभी माओ को उचित सम्मान दिया? क्या उन्होंने अपने दल का नाम मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट इसलिए नहीं रखा कि ब्रिटेन में एक इसी नाम की पार्टी का जन्म हो चुका था, भले वे चाइनाज प्रेजीडेंट आमादेर प्रेजीडेंट को अपने लिए व्यर्थ मानते रहे हों।“
वह मेरी ओर अचरज से देखने लगा, ‘‘तुम यह सब कहाँ से इकट्ठा करते हो।’’
‘‘सूचना के विस्तार के साथ किताबी बातें किताबी लोगों के नियन्त्रण से बाहर चली गई हैं। जो दुर्लभ है वह दृष्टि। जरूरत है कागज की लेखी के साथ आंखिन देखी की। इससे धन्धेबाजों की दूकानें फीकी पड़ जाती है। वे तिलमिलाने लगते है। सच पर परदा सूचनाओं के ताने बाने से बुना होता है इसलिए कम सूचना रखने वाला भी अपनी नजर से काम लेने के कारण उन पर भारी पड़ता है और वे नारेबाजी करने लगते हैं। प्रेस उनके हाथ में है, प्रचारतन्त्र में वे घुसे हुए हैं इसलिए उनकी अनर्गल बातें भी सही लगती हैं। परन्तु यह बताओ, मार्क्स के बाद सबसे वैज्ञानिक सोच रखने वाले, सिद्धान्त को प्रयोग पर परखने वाले वैज्ञानिक चिन्तक का नाम उनकी श्रद्धा के बाद भी उनके धड़े के नाम में क्यों नहीं आया? लेनिन, माफ करना, मेरी किताबी जानकारी मामूली है, फिर भी दुस्साहस के कारण कहना चाहता हूँ कि माओ के सामने लेनिन नगण्य है और इस तथ्य को समझने में असमर्थ दल ने यह लौट कर देखने का कभी प्रयत्न न किया कि वह जो कर रहा है उसका परिणाम क्या हो रहा है।
‘‘तुमको एक अन्य क्रूर सचाई दिखा दें। तुम जानते हो, ये जो हमारी अर्थव्यवस्था, अर्थात् बाजार को काबू में रखते हैं, उनका अपना ज्ञान कितना है?’’
‘‘धेले का।’’
‘‘यही तुमसे सुनना चाहता था। फिर भी उनके नीचे असाधारण योग्यता वाले विद्वान काम करते हैं और वे उनकी परख से गुजरने को बाध्य होते हैं। वे उनकी योग्यता को जानते हैं, परन्तु उसकी कसौटी उसके परिणाम को मानते हैं। आप इतने ज्ञानी हो, पहले से अधिक, पर आप ने जो कुछ किया उससे पैदा क्या हुआ और उससे हमे लाभ क्या हुआ।,
“यही सवाल अपने विद्वानों से पूछने की हिम्मत जुटानी पड़ेगी कि अपने असाधारण पुस्तकीय ज्ञान के बावजूद तुमने जो व्यवस्था बनाई उसने हमें क्या दिया है, समाज को क्या दिया है और तुम्हें क्या देकर उसने हमें जो मिल सकता था, उससे हमें वंचित कर दिया है।“
“यार तुम रौ में आते हो तो समझ में नहीं आता कि कह क्या रहे हो।“
“ठीक है, समझाने के लिए मुझे फिर उसी पेय पर आना पड़ेगा जिसकी चर्चा एक बार आई और फिर सदा के लिए दब गई। क्यो? शोर मचाने वाले खरीद लिए गए। उसके बाद वह पेय एक नए ड्रग के साथ बाजार में आया और यह दिल माँगे मोर के विज्ञापन के साथ। अर्थात् उसमें कोई ऐसा तत्व मिला दिया गया है कि प्यास बुझाने के लिए आप उसे पीते हैं और उस रसायन के कारण प्यास और बढ़ जाती है। उसकी लत सी पड़ने लगती है फिर भी आपके जानकार लोग चुप हैं और इसके बाद यदि कोई किसान या भुक्तभोगी आवाज उठाए भी तो वह दब जाएगी। यह दिल माँगे मोर की तर्ज पर। हमें बिकाऊ विषेशज्ञों की जगह अपनी आँख से काम लेने वालों के साथ खड़ा होना है जिनके पास सही जुमले नहीं हैं कि वे अपने सच को बयान कर सकें और उनके विरुद्ध खड़ा करना है जो अपने बिकाऊ जुमले बाजी के सैलाब से उस अनुभूत सत्य को छिपा लेते हैं। मुझे गूँगों की आवाज बनने के लिए बताना पड़ता है कि मैं किसी विषय को जितना जानता हूँ उससे अधिक का दावा नहीं करता, परन्तु वे जितना जानते हैं उससे अधिक का ढिढोरा पीटते हैं और अपने जाने हुए का भी वह हिस्सा छिपा लेते हैं जो उनके स्वार्थ से अनमेल पड़ता है इसलिए समझ के स्तर पर काफी नीचे और हमारे लिए बेकार सिद्ध होते हैं. आज की नब्बे प्रतिशत समस्याओं की जड़ वे ही हैं, इसलिए अपनी सीमित जानकारी के बावजूद हस्तक्षेप करना पड़ता है. मेरी स्थिति उस किसान की सी है, जिसे ओझल कर दिया जाना है जिससे यह दिल मांगे मोर का बाजार बना रहे.”
“सत्य मेरे साथ है ढिढोरा उनके साथ. तुम भी उनके हे साथ हो भाई. मुझे अकेला पड़ना ही है.”
11/22/2015 8:15:07 AM

Post – 2015-11-21

हर एक को ये गुमाँ है इधर को देखते हैं
“तुमने पूरे कम्युनिस्ट आन्दोलन का अवमूल्यन करके मुस्लिम लीग की बराबरी पर पहुँचा दिया? क्या यह उचित है?”
“नहीं। यह गलत है। यदि ऐसा लगता है तो मेरे कहने में कोई कमी रह गई।“
“अब ठीक है।“
“जब तुम किसी एक पक्ष पर बात कर रहे हो तो हर मौके पर उनके समग्र को रखते चलो तो कुछ समझ मे आएगा ही नहीं। इसलिए वैज्ञानिक प्रयोगों में समग्र में से एक एक तत्व को अलग करके, आइसोलेट करके, उन्हें समझना पड़ता है और फिर मूल्य निर्णय के समय सभी पक्षों पर विचार करते हुए निर्णय करना पड़ता है।
‘‘फिर भी हम पूरे विवेचन में अपने ही विचारों के दबाव में एक दिशा में बह जाते हैं और कुछ पहलू छूट जाते हैं, यह हमेशा, हर बार होता है। ऐसा मुझसे भी होता रहता है। धीरज से, बहुत सँभल कर, एक-एक शब्द तोल कर, सन्तुलित कथन करने वाले विरल होते हैं। इसे वे लम्बी साधना से प्राप्त करते हैं, और उनके कथन का जादू जैसा असर होता है। वह योग्यता अर्जित तो करना चाहता हूँ, कर नहीं पाया हूँ।
रही हमारे देश की कम्युनिस्ट पार्टी की बात, या क्रान्ति की बात। इसका विचार पूँजीवादी शोषण और दोहन के उस पैशाचिक चेहरे से घबरा कर उन बौद्धिक प्रतिक्रियाओं से हुआ था जिनमें विक्षाभ अधिक था दिशा स्पष्ट नहीं थी। दीपस्तंभ थीं विफल रूसी क्रान्तियाँ जिनके नारे सामन्ती तन्त्र पर वज्राघात थे परन्तु जिनका सबसे अधिक उपयोग पूँजीवादी औद्योगिक क्रान्ति ने किया। इसलिए विक्षोभ के कुछ रूपों में स्वतन्त्रता और समानता तक के अपहरण की बात थी जो फासिज्म बन कर उभरा। एनार्की का अनुवाद हम अराजकता कर देते हैं, जो गलत है। यह राजसत्ता से मुक्ति और अपना प्रबन्ध स्थानीय इकाइयों द्वारा करने और राज्य को कुछ अन्तर्देशीय गतिविधियों तक सीमित रखने की बात थी जो साम्यवाद में भी आया। सबसे खतरनाक रूप था विनाशवाद या निहिलिज्म, जो आत्मकेन्द्रिता का वह रूप है जिसमें ‘आप मरे जब परलै होय’ का मुहावरा निकला है, या जिससे जोश की वह जोशीली परन्तु सर्वनाशवादी पंक्तियाँ निकली थीं, ‘जिस खेत से दहकाँ को मयस्सर न हो रोटी, उस खेत के हर खोशए गन्दुम को जला दो।’
“विक्षुब्ध स्थितियों की प्रतिक्रियाएँ ऐसी ही होती हैं।“
भारतीय स्वतन्त्रता अभियान के तेज होने के साथ इसी तरह का विक्षोभ उस जमात में भी था जिन्हें डर था कि उनका वर्चस्व लोकतान्त्रिक व्यवस्था में छिन जाएगा, या शायद उनके साथ बदले की भावना से काम किया जाएगा और उनकी तौहीन होगी। इनका एक कोण जमीदारों और तालुकेदारों से जुड़ा था, जिनमें दोनों जमातों के लोग थे और जिनकी प्रेरणा से मुसलिम लीग और हिन्दू महासभा का जन्म हुआ था और जिनकी चिन्ताएँ इन दोनों संगठनों के व्यवहार में प्रकट थीं। इन सभी में ‘करें तो क्या करें और जाएँ तो जाएँ कहाँ’ वाली बेचैनी और दिशाहीनता थी। लीगी और हिन्दूमहासभाई चेतना के लोग कांग्रेस के भीतर भी थे, बाहर भी थे। इन सभी में अभिजनवादिता का तत्व प्रधान था। लोकतन्त्र में विश्वास कम था। सुयोग्य का शासन जाहिलों के शासन से अच्छा है का भाव था। इकबाल की वह पंक्ति ‘जमहूरियत एक तर्जे हुकूमत है कि जिसमें बन्दों को गिना करते हैं तोला नहीं करते।’ इसी दिशाहीनता की एक अभिव्यक्ति पाकिस्तान की माँग थी जिसकी नींव 1906 में ही पड़ गई थी और जिसके नामकरण का श्रेय रहमत अली को दिया जाता है। ये चिन्तित होने वाले लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से आगे जा कर अपने समुदाय के हित से कातर लोग थे और इसलिए मेरी नजर में आदरणीय भी।“
“कम से कम अपने निजी स्वार्थ के लिए पूरे देश को बेच खाने वालों से तो अच्छे ही थे।“
“कम्युनिस्ट पार्टी स्थापना भी इसी दिशाहीनता के बीच से हुई थी जिसे प्रेरणा रूसी क्रान्ति की सफलता से मिली थी न कि मार्क्सवाद के अध्ययन और विवेचन तथा अपने देश और समाज में उसकी उपादेयता की समझ से। जन्म तिथियाँ भी दो बताई जाती हैं। एक के अनुसार 25 दिसम्बर 1925 को कानपुर में आयोजित प्रथम सम्मेलन में हुई थी जब कि दूसरी समझ के अनुसार उससे पाँच साल पहले ताशकन्द में दूसरे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के कुछ ही बाद 17 अक्तूबर 1920 में। इस के स्थापक सदस्यों में एम.एन.राय, उनकी पत्नी एल्विन ट्रेंट राय, अबनी मुखर्जी और उनकी पत्नी रोजा फितिंगोफ, मुहम्मद अली (अहमद हसन), मोहम्मद सफीक़ सिद्दीक, रफीक अहमद, सुल्तान अहमद खान थे । कहते हैं ऐसे कई भारतीय कम्युनिस्ट ग्रुप विदेश में अन्यत्र भी गठित किए गए थे। इसमें दो बातें स्पष्ट हैं। एक तो इसके संस्थापक जमीन से उठे हुए लोग थे और भारतीय सचाई से उनका परिचय नहीं था। दूसरे ये रूसी क्रान्ति की सफलता से प्रेरित थे जिनके पास मार्क्सवाद क्रान्ति की कामना के बाद पहुँचा। मोटे तौर पर यही बात कानपुर अधिवेशन के विषय में भी कही जा सकती थी परन्तु इसका एक स्थानीय या देशज आधार भी था। रूस की क्रान्ति रूसी परिस्थितियों की उपज थी जिसमें जारशाही का विरोध था। भारतीय भूमि में ब्रितानी सत्ता का विरोध कांग्रेस कर रही थी। कम्युनिस्ट पार्टी का गठन उस सत्ता से टकराने की चिन्ता से न हुआ अपितु लोकतांत्रिक व्यवस्था की जगह रूस जैसा कुछ करने से हुआ था।
‘‘मोटी बात यह कि तुम मानते हो कम्युनिस्ट पार्टी कुछ उत्साही लोगों की बौद्धिक सन्तान थी, न कि भारतीय यथार्थ की उपज?’’
‘‘इससे भी आगे, मैं यह मानता हूँ कि यह ऐसे उत्साही लोगों की सन्तान थी जिनको भारतीय यथार्थ का ज्ञान भी नहीं था और उूपर से नीचे उतरना चाहते थे। मिसाल के लिए राय जो 1925 के अधिवेशन में भी प्रेरक बने थे अनुशीलन, युगान्तर आदि समूहों से संपर्क कायम करते हुए बंगाल में अपनी शाखा स्थापित करना चाहते थे जो मुजफ्फर अहमद के नेतृत्व में स्थापित हुई। इसी तरह पार्टी भारतीय राष्ट्रीय और मुक्ति चेतना पर आकाशबेलि की तरह फैल रही थी और अपनी जड़ें जमाने की जगह उस महाबृक्ष का रस चूसते हुए उसे कमजोर कर रही थी। इसलिए लम्बे समय तक इसमें दो तत्व हावी रहे एक विदेशी परामर्श, विदेशों पर निर्भरता और दूसरे किसी न किसी तरह व्यापक जनाधार की तलाश, जो विदेशी भाषा, सामन्ती जीवनशशैली और बौद्धिक स्नाबरी के रहते संभव ही न थी। इसी बीच किसी ‘दूरदर्शी’ ने यह सुझा दिया कि यदि द्विराष्ट्र सिद्धान्त को मान लिया जाय तो पूरा मुस्लिम जनमत हमारे साथ आ जाएगा और एक झटके मे एक व्यापक जनाधार मिल जाएगा। इसे लपक लिया गया और इसके परिणाम स्वरूप मुस्लिम लीग की सोच का प्रवेश कम्युनिस्ट पार्टी में हुआ, परन्तु इसका लाभ कम्युनिस्टों को नहीं, लीग को मिला।“
“यदि कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन न मिला होता तो जनमतसंग्रह के ठीक पहले का मुसलिम मतों का विभाजन के पक्ष में वह ध्रुवीकरण न होता और वह योजना ही फेल हो जाती।“
“चलो बहुत बाद में दबे सहमे सुर में माना गया कि हमसे चूक हो गई, परन्तु इसका अहसास होने के बाद भी क्या पार्टी का चरित्र बदला?
“ऊपर से नीचे उतरने के क्रम में आकाशबेलि वाली शैली में ही अपने क्रान्तिकारी आश्वासनों और विराट सपनों से प्रबुद्धवर्ग को -पत्रकारों, लेखकों, अभिनेताओं आदि को – जिनकी प्रचारशक्ति के बारे में किसी टिप्पणी की आवश्य कता नहीं, आकर्षित करने के आयोजन हुए जिनमें इप्टा आदि के नाम से हम इतने अभिभूत हो जाते हैं कि पता चले अमुक इप्टा से जुड़ा रहा या उसकी उपज है तो रक्तसंचार बढ़ जाता है। इसमें उस उग्रता को भी नरम बनाना पड़ा और नेहरू में भी क्रान्तिकारी पक्षधरता दिखाई देने लगी। इसमें सबसे अग्रणी भूमिका पी. सी. जोशी की थी। आल इंडिया प्रोग्रेसिव राइटर्स असोशिएशन की स्थापना भी 1935 में लंन्दन में हुई थी और इसमें भी जमीन की समझ से अधिक भावुकता का ही पुट था। सामाजिक स्तर पर प्रगति के नाम पर केवल हिन्दू समाज की विकृतियों को दूर करने के लिए इसके मूल्यों और सांस्कृतिक प्रतीकों का उपहास और भर्त्सना का सहारा लिया जाता रहा। हम प्रगति और परंपरा, रूढ़ि और परंपरा के भेद आदि पर चलने वाली बहसों को देखें तो यह देख कर हैरानी होती है कि ये सारी बहसें हिन्दू समाज तक सीमित थी। इसे हिन्दू देश बनाने का जितना काम दक्षिण पन्थियों ने न किया होगा उतना अपने को प्रगतिशील कहने वालों ने किया। दो तरह की नागरिकता, एक पर कानून लागू और दूसरे पर नहीं, यह करना भी दक्षिण पन्थियों के वश का नहीं था। इसकी परिणति सबसे बुरी हिन्दी प्रदेश में हुई जिसमें उर्दू और हिन्दी के बीच चुनाव उतना निर्णायक नहीं था जितना अरबी लिपि और नागरी लिपि के बीच का चुनाव। मुझे लगता है, मेरा अघ्ययन भी कम है और समझ भी सुथरी नहीं है, इस हिन्दी प्रतिरोध ने कम्युनिस्ट आन्दोलन को हिन्दी क्षेत्र में प्रवेश करने से रोका, इसकी भाषा को अंग्रेजी रहने दिया और इसी चिढ़ का परिणाम यह कि जिसे रामविलास जी हिन्दी प्रदेश कहते हैं, उसकी वैधता को स्वीकार न करने वाले इसे काउ बेल्ट कहने के बाद स्वीकार कर लेते हैं।“
मेरा अध्ययन अतीत इतिहास को ले कर चलता रहा है इसलिए इन सबकी एक मोटी ही जानकारी मुझे है अपना मत सामने रखते हुए भी डर लगता है कि कहीं मुझसे अपनी नासमझी के कारण कोई चूक न हो गई हो ।

Post – 2015-11-20

न समझे हैं न समझेंगे कभी हिन्दोस्ताँ वाले
छिपे दुबके रहेंगे अपने अपने आशियानों में।
कुलों में जातियों, फिरकों में मजहब के झमेलों में
फसाना बन कर रहना चाहते हैं वे फसानों में।।

अदायगी की दाद दी तो वह सिर पर सवार हो गया। बोला लो कुछ और सुनाता हूँ।
मैंने रोक दिया। धीरज की परीक्षा मत लो। है तो यह इक़बाल की पैरोडी ही न।
उसका उत्साह ठंडा पड़ गया। मानना पड़ा कि है तो पैरोडी ही, पर बताया कि उर्दू में पैरोडी को ऊँचा दर्जा हासिल है। लोग दूसरों के मिसरे ले कर अगला मिसरा ठोंक देते हैं और इसी से अपने को उसकी बराबरी का मान कर आईने के सामने अपनी पीठ थपथपाते हैं। फिर एकाएक छलांग लगाया, ‘यह बताओ, तुम्हें मुस्लिम लीग से ही घृणा क्यों है?’’
जी में आया एक जोर का मुक्का उसके मुँह पर, सीधे नाक पर, मारूँ और पूछूँ यह खयाल तुझे आया कहाँ से? पर सोचा मेरे मुक्के से इसका कुछ बिगड़े या न बिगड़े, उत्तेजित हो कर वह जो घूँसा जमाएगा, उससे मेरे होश हवास गुम हो जाएँगे। इसलिए समझदारी का आविष्कार करते हुए कहा, ‘‘क्या मैं यह नहीं कह आया हूँ कि जो जिससे घृणा करता है उसे समझ नहीं सकता?’’
उसके पास कोई जवाब नहीं था, चुप रहा, पर उस तरह की चुप्पी जिसका अर्थ होता है, उत्तर नहीं सूझ रहा है परन्तु मैं तुम्हारे विचार से सहमत नहीं हूँ।
‘‘मैं जानता था। सहमत होने या समझने के लिए भी कुछ समझ तो होनी चाहिए’’
‘‘पहेलियाँ मत बुझाओ।“
क्या तुम्हें पता है कि मुस्लिम लीग अंग्रेजों की चाल से ही नहीं, हमारी मूर्खता और बंगाली स्वार्थपरता से पैदा हुई थी। देखो यह मेरी समझ है। कोई दूसरा इसकी छानबीन करे तो इसमें गलतियाँ निकल सकती हैं।“
“मैं समझूँ तो, कि तुम कहना क्या चाहते हो।“
देखो, अंग्रेजों ने कलकत्ता को अपनी राजधानी बनाया। इसमें ही शिक्षा और अमलातन्त्र तैयार करने के अपने प्रयोग किए। अंग्रेजी राज के नीचे से एक बंगाली राज आरंभ हुआ। बंगाल एक बड़ा राज्य था। इसके भीतर बिहार का भी काफी हिस्सा आता था। असम और ओडिशा का भी समावेश इसी में था। इनकी शिक्षा की भाषा बंगला कर दी गई थी। अध्यापक, डाक्टर, वकील, सरकारी नौकर सब में बंगालियों का प्रभुत्व था और हालत यह की बंगालियों को लम्बे समय तक मुगालता रहा की वे एक सुपीरियर रेस हैं। उनके आचार व्यवहार में इसकी छाया आज तक बची मिलेगी। बंगाली आधिपत्यवाद के चलते ओड़िया, मैथिल, असमिया और पूर्वी बंगाल की भाषाओं को बांग्ला की बोलियाँ माना जाता था। स्थानीय लोग इससे असन्तुष्ट और कुंठित अनुभव करते थे, परन्तु यह आधिपत्य भाव बंगाल के उदार माने जाने वाले लोगों में भी था। ठीक उस समय जब कांग्रेस स्वायत्तता की माँग की दिशा में बढ़ रही प्रशा सनिक तकाजे की आड़ में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने में ब्रिटिश कूटनीति को सफलता मिली। यदि कुछ परिपक्वता दिखाई जाती, इस प्र शासनिक विभाजन को प्र शासन की समस्या मान कर इसकी ओर ध्यान न दिया गया होता तो इसने दोफाँक बटवारे का रूप नहीं लिया होता। इसकी सबसे बड़ी विषेशता थी कि कांग्रेस के भीतर हो या बाहर सभी मुसलमान विभाजन के पक्ष में थे, और सभी हिन्दू इसके विरोध में। कहें मनोवैज्ञानिक आधार पर पाकिस्तान की नींव इसी समय पड़ गई थी जिससे वह सूत्र निकला था कि मुसलमान हिन्दुओं के साथ सुख-चैन से नहीं रह सकते। जिन्ना ने इसे अधिक तार्किक बना दिया। मोटे तौर पर तुम कह सकते हो, सभी मुसलमानों के भीतर मुस्लिम लीगी चेतना दबे या खुले रूप में बनी रही है, जब कि हिन्दुओं में इसने इतना स्पष्ट तेवर नहीं लिया फिर भी इससे बचा शायद ही कोई था।“
“तुम इसे बहुत इकहरा बना दे रहे हो।“
“हाँ इकहरा तो है, इकहरा इसलिए है कि हम इसके उजागर पक्ष को ले रहे हैं। चेतना के स्तर पर इसकी जड़ें बहुत पीछे तक, तुम कहना चाहो तो मध्यकाल तक, और आगे बढ़ना चाहो तो मुहम्मद साहब तक और उससे भी पीछे ले जाना चाहो तो ईसाइयत के विस्तार काल या उसके जन्म काल तक ले जा सकते हो। हम कोई निर्णय लेते समय कई युगों और युगान्तरों के सूत्रों से प्रभावित होते हैं। वे दिखाई नहीं देते पर उनका दबाब कम निर्णायक नहीं होता।“
“तुम्हारा जवाब नहीं भाई! भइस बिआनी मोहबा गढ़ में पढ़वा गिरा फरुख्खाबाद! लीग को लिए दिए पहुँच गए ईसाइयत के जन्म तक।“
“इसलिए कि मुस्लिम मनोरचना के निर्माण में सामी पृष्ठभूमि का बहुत बड़ा हाथ है परन्तु मुहम्मद साहब ने उस प्रभाव को मेरे अनुमान से ईसाइयों से अपनाया था और कुछ दूर तक उन्हें ही माडल बनाया था। यह जो हिजाब है, यानी बुरका का चलन ईसाई ननों से आया लगता है । जिस कबीले में मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था वह तो मातृप्रधान था और जिन बद्दुओं के बीच उनका बचपन बीता था उसमें तो महिलाओं को बहुत स्वतन्त्रता थी। यह ईद, बकरीद, बुतपरस्ती का विरोध सब, नामकरण और माइथालोजी तक। जालीदार टोपी जो हाल में बड़ी लोकप्रिय हुई है पोप के सर पर भी दिखाई दे जायेगी। तो मुस्लिम मनोरचना में अस्मिता के ये जो सूत्र हैं बहुत दूर तक जाते हैं और समय समय पर बखेड़े इनके माध्यम से ही पैदा किए जाते रहे हैं।
“और बंगाल के जिस बटवारे की बात कर रहा हूँ वह भी सन 1904 में या 1905 में एकाएक नहीं आ गया। इसकी तैयार उन्नीसवीं शताब्दी में ही आरंभ हो गई थी।“
“विश्वास नहीं होता। तुम अक्सर अति पर चले जाते हो।“
“पहले सुनो। जान बीम्स ने जो बहुत अच्छा भाषाषास्त्री था और जिसने कंपैरेटिव ग्रामर आफ आर्यन लैंग्वेजेज लिखा था, उसकी मदद से या उकसावे से फकीर मोहन सेनापति ने ओडिया जागरण का मन्त्र फूँका और उसे एक अलग स्वतन्त्र पहचान दिलवाई। असमिया को अलग पहचान के लिए हेमचन्द्र बरुआ, शायद यही नाम था, वे संघर्ष से जुड़े थे। बंगालियों को यह जो अग्रता मिली थी वह कलकत्ता केन्द्रित थी इसलिए जैसे ओड़िया, असमिया और मैथिल भाषी नौकरियों और अन्य मामलों में उपेक्षित अनुभव करते थे उसी तरह पूर्वी बंगाल के लोग भी अपने को उपेक्षित अनुभव करते थे। पूर्वी बंगाल में मुसलिम आबादी अधिक थी, इसलिए प्रषासनिक सुविधा की आड़ में कहो, या सचमुच इस तकाजे से जब उसे बंगाल से अलग प्रान्त बनाने की घोशणा की गई तो पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं ने इसे बंगभंग की संज्ञा दे कर हिंसक आन्दोलन आरंभ कर दिया। यह बंगभंग से अधिक उनके अपने वर्चस्व की लड़ाई थी। अब यहाँ से एक भौगोलिक विभाजन ने साम्प्रदायिक विभाजन का रूप ले लिया। 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ था, 1906 में इसे हिन्दू मुस्लिम हितों का प्रश्न बना कर मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका में हुई यद्यपि इसमें भाग लेने वाले 3000 प्रतिनिधियों में भारत के अमीर मुसलमानों के प्रतिनिधि ही थे।
मुस्लिम लीग की सबसे बड़ी दुर्बलता सर सैयद की उस आकांक्षा से पैदा हुई जो उन्होंने इंग्लैंड दर्शन के बाद, इंग्लैंड की हर दृष्टि से अग्रता देख कर उनके निकट आने की आकांक्षा में वैसे ही विश्वविद्यालय का सपना देखा और शिक्षा में मुस्लिम पिछड़ेपन को दूर करने के लिए शिक्षा का भार अंग्रेज प्रिंसिपल को दे दिया। जब कि मालवीय जी ने इस तरह की भूल नहीं की। संस्कृत कालेजो की बात अलग थी। वे सरकारी पहल पर खोले गए थे और सरकार ही उनके प्रिंसिपल की नियुक्ति करती थी। इसके माध्यम से वह संस्कृत विद्वानों में अपनी पसन्द का प्राचीन भारतीय इतिहास उतारती रही और इसलिए इन कालेजों के माध्यम से निकले संस्कृत विद्वान आर्य आक्रमणवादी बनते चले गए। शिक्षित मुस्लिम समाज की मनोरचना के निर्माण का काम उन्हें सौंप देना जो उस समाज का अपने लिए उपयोग करना चाहते थे, एक भारी भूल थी।
परन्तु भुलाया नहीं जाना चाहिए कि आरंभ में मुस्लिम लीग मुस्लिम हितों की चिन्ता करने के लिए बनी थी। स्वतन्त्रता आन्दोलन तेज होने के साथ इस संभावना से इसने दहशत का रूप लेना शुरू किया और फिर हिन्दू-द्रोह ही नहीं हिन्दू जान-माल और सम्मान को मिटाने की डरावनी मुहिम बनती चली गई। अलगाव को तीखा करने के हथकंडे अपनाने लगी जो कलकत्ता के दंगे में या सुहरावर्दी के डाइरेक्ट ऐक्शन में देखने में आया। यह जानते हुए कि दंगा इतना बड़ा रूप लेगा तो पहले हिन्दू भले अधिक मारे जाएँ अन्ततः मुसलमानों को ही भुगतना होगा। उस दंगे में हिन्दुओं से अधिक मुसलमान मारे गए थे। पर नफरत की नहीं तो दहशत की दीवार खड़ी करने के उद्देश्य में तो सफल हो ही गए। हैरानी की बात यह कि जिन्ना पाकिस्तान की माँग मनवाने के लिए डाइरेक्ट ऐक्शन की खुली धमकी दे रहे थे और नोआखाली आदि में जो हुआ उसने मुस्लिम लीग का चेहरा अधिक हिन्दूद्वेषी बना दिया ।
दुख की बात यह है कि इसी मुसलिम लीग की आत्मा का प्रवेश वामपन्थी आन्दोलन में हिन्दू समाज को विकृतियों का घर, इसके इतिहास को मलिताओं से ग्रस्त और हिन्दू सांस्कृतिक प्रतीकों को जहालत का प्रमाण बताते हुए, इन्हें दूर करने के नाम पर अभियान चलाए जाते रहे। जितना ही अधिक तेज आन्दोलन उतना ही अधिक गर्हित होता हुआ हिन्दू समाज। इसी के अनुरूप इतिहास लिखवाये जाते रहे, फिल्मों में इसे जगह जगह घुसाया जाता रहा, साहित्य में इसे प्रोत्साहन दिया जाता रहा और तर्कवाद के नाम पर बहुत कुछ ऐसा किया जाता रहा है जो न किया जाता तो पूरे देश का भला था। मुस्लिम हितों की चिन्ता करने वाली लीग को मैं उचित मानता हूँ और उसकी परिणति को देश और मुसलिमों सहित पूरे समाज के लिए अनिष्टकारी मानता हूँ।“

Post – 2015-11-19

आ बैल मुझे मार!

“आ बैल मुझे मार! मुहावरा सुना है कभी?” आज उसके हाथ में अखबार नहीं एक पतली सी किताब थी।
“बैल लगते तो नहीं तुम। सींग की जगह हाथ में किताब है।“
“तुमने कहा था न पहले परिभाषित करो फिर बात करो, तो यह रहा फासिज्म का मतलब। देखो इसे।“
“देख लिया, अब बताओ।“
“तुम जानते हो संघ का मतलब क्या होता है?”
“जो मतलब तुम लगाते हो, वह मैं कैसे जान सकता हूँ?”
“संघ का मतलब ही है फासिज्म।“
“मैंने सोचा तुम संघ का मतलब संहार लगा रहे हो।“
“वह भी यार। देखो फासिज्म जिस लातिन शब्द फासिओ से बना है, उसका मतलब है लट्ठों का ऐसा गट्ठर जिनके बीच एक कुल्हाड़ा भी छिपा है। अर्थ है संगठितशक्ति और आक्रामकता तो हुआ न संघ का मतलब फासिज्म। जानते हो इसका सबसे पहले मुसोलिनी ने फ्रांस की क्रान्ति से उपजे बराबरी, स्वतंत्रता और भाईचारा के नारों के विरोध में, ‘राजनिष्ठा, आज्ञाकारिता, नागरिकों के भी सैन्यीकरण और युद्ध से शक्ति विस्तार के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया था।“
“तुमने ताजा-ताजा ज्ञान प्राप्त किया है, और बताओ।“
“इसके कुछ तत्व हैं। चरम दक्षिण पन्थ, राष्ट्रवादिता, नस्लवाद, लोकतन्त्र में अविश्वास, तानाशाही, देशभक्ति, और सांस्कृतिक अस्मिता की खोज। इसमें भी वे सारे तत्व पाये जाते हैं।“
मैंने कहा, “सुनते हैं इसका दौर 1919 से 1944 तक ही रहा। अब वह दफ्न हो गया। जहाँ पैदा हुआ था वहाँ भी । जहाँ जहाँ फैला वहाँ वहाँ भी इसका रूप बदलता गया। और अब तो दुनिया में कहीं नहीं रह गया।“
देख सको तो पाओगे कि वह इस देश में भी है और न देखना चाहो तो देखने वालों की आँखें फोड़ दो। वह तो तुम करोगे ही।“
“मैं नहीं करूँगा पर अपने को सही साबित करने के लिए तुम अपनी आँखें फोड़ लोगे और चिल्लाओगे भी कि देखो इसने मेरी आँखें फोड़ दी, अब तो इसे फासिस्ट कहो।“
वह हँसने लगा, “सच कहो तो तुम्हें मिटाने के लिए मैं यह भी कर सकता हूँ।“
“कोई फर्क नहीं पड़ेगा। देखने का काम आँखों से आज भी नहीं ले रहे हो तब लेने की झंझट ही न रह जाएगी। मैंने कुछ बातें गाँठ बाँधने के लिए कही थी, उनमें एक यह था कि किसी भी परिघटना की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ होती हैं जिनके निर्माण में केवल उसका हाथ नहीं होता। दूसरा कालक्रम में सभी के चरित्र में बदलाव आता है।“
“यह बात कभी नहीं कही।“
“चलो इन्हीं शब्दों में नहीं कह पाया होउूँगा। फिर कहा था यदि पहले घटित के बहुत से घटक अन्यत्र मौजूद हो, एक दो ही घट-बढ़ जायँ तो नतीजा इतना बदल जाएगा कि कहने को वह भले वही रहे, आचरण या प्रतिफलन बदल जाएगा। यदि तुमको केमिस्ट्री का थोड़ा भी ज्ञान हो तो इसे आसानी से समझ सकते हो। ताप में, माप में, घटक में, अनुपात में मामूली भिन्नता उसको वही नहीं रहने देती जिसे हम बनाना चाहते थे। समाज की भी एक केमिस्ट्री होती है। घटनाओं की भी।
“तुम दुनिया भर की बातें सुनते जुटाते रहे पर उन तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया जो इसकी कोशिश के बावजूद इसके चरित्र को बदल रही थी। तुम जानते हो जिन दिनों लीग और अभिजात मुस्लिम परिवार एक अलग मुस्लिम देश निकालने की बात कर रहे थे, और यह शोर बहुत तेज हो गया था उन्हीं दिनों वह किताब आई थी जिसमें हिन्दू देश और उसमें रहने वाले अहिन्दुओं को उसी तर्ज पर दूसरी कोटि का नागरिक मानने या नागरिकता से वंचित करने आदि की बातें आई थीं। लेकिन उसी पुस्तक का एक दूसरा संस्करण भी उसी साल उसी संस्था से आया था जिसमें एम एस अणे की भूमिका थी जिसमें उन संकीर्णताओं की, संकुचित राष्ट्रवाद की अव्यावहारिकता विश्व सन्दर्भ में इनको रखते हुए सिद्ध की गई थी। उस पर तुम कभी घ्यान नहीं देते कि स्वयं उसी विचारधारा में उसकी सीमाओं को लक्ष्य किया जाने लगा था, क्योंकि उससे तुम आग लगाने का वह काम नहीं कर पाओगे, जो करते आ रहे हो। उसके दो टुकड़े इस प्रकार हैं
10 – He seeks to define “nation.” From the Latin word “Natio’ meaning birth or race and signified a tribe or social group with a same language. Later in the mediaval universities it was used to establish voting rights. 11 – But there is no scholarly work on the subject in any language. Of those who he notes as having written on it, one is Israel Zangwill.
25 – People thinking about the problem of Muslims often forget to distinguish between nation and state. “No modern State has denied the resident minorities of different nationalities rights of citizenship of the State.” Foreword by Lokanayak M.S.Ane
अब मैं बार-बार इसी विषय पर नहीं लौटूँगा। कहना यह है कि सब कुछ जितना इकहरा बना कर दिखाया जाता है उतना होता नहीं है। हम अपने बच्चों तक को अपनी इच्छानुसार नहीं ढाल पाते। हम अपने आग्रह में जितना ही कठोर होंगे, उतने ही उल्टे स्वभाव या दृष्टिकोण की संभावना होगी। एक आदमी हिन्दू नाम से अखबार निकालेगा, उसी की औलाद को उसी हिन्दू से हिन्दू नाम से इतनी चिढ़ हो जाएगी कि उसकी हर चीज की भर्त्सना उसी अखबार से करने की नीति अपना लेगा। निर्मल चंद्र चटर्जी का पुत्र सोमनाथ चटर्जी हिन्दू महासभा का कट्टर आलोचक कम्युनिस्ट बन जायेगा हो। नाम कम्युनिस्ट पार्टी रहेगा, आत्मा में लीग का एजेंडा घुस जाएगा।“
“इसी तरह मैं कहूँ कि तुम अपने को सच्चा मार्क्सवादी कहोगे और तुम्हारी आत्मा में आरएसएस घुस आएगा, तो क्या गलत होगा?”
“ऐसा लगे तो मैं अपने को ही दोष दूँगा। कहा था न कि यदि श्रोता नहीं समझ पाता, या गलत समझ लेता है तो दोष वक्ता का ही है। यही बात समग्र व्यवहार के विषय में भी कही जा सकती है जिसमें बोलना, लिखना, जीवनशैली सभी आते हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति घबराहट में ऐसा कहे, उससे जवाब न देते बने तब कहे, तो मैं उसके साथ सहानुभूति रख सकता हूँ। यदि वह कोई उदाहरण देते हुए बताए तो मैं उसका उपकार मानूँगा और अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाऊँगा।
“खैर, मेरी समझ से, फासिज्म एक ऐसी चीज है जो पूँजीवादी विकास के बाद, उसी से उत्पन्न समस्याओं के बीच से कोई सही रास्ता निकालने की अनेक कोशिशों के बीच एक दार्शनिक चिन्तन की परिणति थी जिसमें फिक्टे और हीगेल जैसे प्रकांड विद्वानों के दर्शन का भी हाथ था, और जिसकी जड़ें मैकिआवेली से होते हुए ग्रीस तक उतरी मिलेंगी। इसके एक रूप सिंडिकेटवाद का जो राज की सत्ता को ही नकारता था, और जिसने अराजकतावाद को जन्म दिया था और जिसके प्रवक्ता प्रूधों थे, उनका प्रभाव मार्क्स पर भी पड़ा था गो मार्क्स उससे बाहर आ गए थे। पर कम्यून की स्वायत्तता और राज्य के खात्मे की बात कम्युनिज्म में भी आई। यह प्रूधों ही था जिसने धन के एकत्रीभवन को चोरी की संज्ञा दी थी। विचारों की एक खलबली के बीच पैदा हुआ था फासीवाद और नाजीवाद इसलिए इसके भिन्न रूपों में कम्युनिस्ट समग्रतावाद को भी गिना जाता है। मेरी योग्यता इस पर अकादमिक बहस करने की नहीं है, न ही उसकी जरूरत समझता।
“मैं केवल यह कह सकता हूँ कि जैसे फलों, फूलों, यहाँ तक कि जीव प्रजातियों का एक अनुकूल प्राकृतिक और भौतिक परिवेश होता है उसी तरह कुछ विचारों, आन्दोलनों के साथ भी है। यूरोप में जो हुआ वह दूसरी जगह नहीं हो सकता, परन्तु किताबी ज्ञान रखने वाले अपनी सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को समझे बिना उन्हें झपटने की कोशिश कर सकते हैं और इस तरह की कोशिश में खासा सत्यानाश कर सकते हैं। जरूरत उन लक्षणों को पहचानने और उनसे बचने की है।
“संघ ने अपने चरित्र में बहुत बदलाव किया है। दबाव के चलते किया है। भारत की सामाजिक बहुलता में फासीवाद पनप ही नहीं सकता, परन्तु इसके कुछ लक्षणों को पाकिस्तान ने अपनाया और उसका फल भोग रहा है।
“फासिज्म के अन्तिम गठजोड़ वाले नाजीवाद का एक दुर्गुण था झूठ को सच बनाने की कला। संचार माध्यमों पर नियन्त्रण। विचार माध्यमों का नियन्त्रण। अपने झूठ को प्रचारित करने के लिए प्रगल्भ वक्तृता या ओरेटरी का सहारा। इसके लिए प्रशिक्षण केन्द्र खोलना। भिन्न विचारों के प्रति घृणा का प्रसार, लगातार एक ही झूठ को दुहराते हुए उसे एक खौफनाक औजार बना देना। इन सबका सहारा आपात काल के समय से सत्ता में पैठ बना कर तुम करते रहे हो। फासिस्ट तो तुम हो भाई। वे तो फासिज्म का धोखा है, जो खेतों में चिड़ियों और जानवरों को डराने के लिए खड़ा कर दिया जाता है। उनकी हालत में तो इतना बदलाव आ गया है कि एक समय में उनका रणनीतिकार कहता था कि उसके हिन्दू देश में इतर जनों के लिए जगह नहीं होगी, फिर सुधार किया कि उन्हें इसे ही अपनी जन्म भूमि, कर्मभूमि और धर्मभूमि मानना होगा। फिर लगा कुछ ज्यादती हो गई, तो नारा लगाने लगे कम से कम इस भूमि की बन्दना तो करनी ही होगी, बन्दे मातरम् तो कहना ही होगा। अन्त में वह भी दब गई और अब पुकारते हैं भाई हमे मुसलमानों इसाइयों की बराबरी का दर्जा तो दो, सबके लिए समान कानून तो बनाओ, वे कानून जो रीति से नहीं मानव अधिकारों से जुड़े हुए हैं और इस बराबरी की माँग को भी तुम सांप्रदायिकता करार दे बैठते हो। जितनी भर्त्सना उनकी तुम करते आए हो उतनी तो नाजियों ने भी यहूदियों की नहीं की होगी। मौका मिले तो तुम इनके साथ क्या कर सकते हो, पता नहीं ।
“देखो फासिज्म का सबसे प्रधान लक्षण है लोकतन्त्र का विरोध। इसी से अराजकतावाद, फासिज्म, कम्युनिज्म सभी का जन्म हुआ है। आज जो तुम्हारा गुस्सा है वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने हुए व्यक्ति को, वह कुछ अच्छा भी करना चाहे तो, हम करने नहीं देंगे। उसे बदनाम करके गिरा कर दम लेगे। भई बदनाम करने की ताकत, घृणा का प्रसार करने की ताकत तुम्हारे पास और फासिस्ट वह! बात गले नहीं उतरती यार!”

Post – 2015-11-18

इतिहास पुरुष की वापसी

‘‘तुम्हारे इतिहास पुरुष की तो वापसी की गिनती शुरू हो गई। मैं तो उस दिन को सोच कर डर जाता हूँ, जब इतिहास उसे हा शिए पर डाल देगा और उसके साथ तुम भी हा शिए पर चले जाओगे।’’ वह खासे उत्साह में था।
‘‘तुम्हारी महिमा में कुछ विरुदावलियाँ बहुत पुराने जमाने से लिखी जाती रही हैं, कभी पढ़ा है तुमने?’’
वह उत्सुकता से मेरी ओर देखने लगा।
‘‘वैसे विरुदावली तो मेरी भी लिखी गई है, पर मैं उसका पाठ स्वयं कर लेता हूँ, दूसरे किसी को इतने छोटे काम के लिए कष्ट क्या देना!’’
‘‘बताओगे भी क्या लिखा है या पहेलियाँ ही बुझाते रहोगे।’’
‘‘तुम्हारी महिमा का गान तो अनन्त है, पर दो ही पर्याप्त होंगे। एक हिन्दी में दूसरी देवभाषा में। हिन्दी में है, ‘मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहिं विरंचि सम।’ गरज कि मैं कितना भी समझाउूँ कोई बात तुम्हारे भेजे में घुस ही नहीं सकती, और संस्कृत में है, ‘तावदेव शोभते मूर्खः यावत् किंचिन्नभाषते।’ अर्थात् जब तक तुम मेरी बात चुपचाप सुनते रहते हो तब तक भरम बना रहता है और मुँह खोलते ही असलियत जाहिर हो जाती है।’’
मेरी बात सुनते हुए वह मुस्कराता रहा, ‘‘और तुम्हारी महिमा में क्या लिखा है?’’
‘‘‘वक्तुरेव हि तज्जाढ्यं यत्र श्रोता न बुझ्यते।’ कि अगर मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती है, तो यह मेरी जड़ता है।’’
‘‘चलो हिसाब बराबर!’’
‘‘बराबर कैसे होगा। मैं समझाता हूँ तुम समझ जाते हो, फिर अगले दिन सारे किए कराए पर पानी फिर जाता है। फिर वहीं से शुरू करते हो, इसे कम्बलबुद्धि मूर्ख कहा जाता है।“
‘‘मुझे यह सोच कर मजा आ रहा है कि तुम असलियत भाँप कर अभी से सदमे में आ गए हो। अन्तिम चोट तो तुम सँभाल ही नहीं पाओग। मुझे उसकी नहीं, तुम्हारी फिक्र हो रही है!’’ सच। उसने चिन्ता जताते हुए चिन्तित होने का अभिनय भी करना चाहा।
मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो उसने आगे जोड़ा, ‘एक आदमी एक चुनाव जीत गया तो तुमने उसे इतिहास पुरुष बना दिया। तो बिहार के चुनाव ने यह दिखा दिया कि इतिहास तुम्हें ठुकरा चुका है। अब देखो तो तुम्हारा इतिहास पुरुष न विकास कर पा रहा है, न महँगाई रोक पा रहा है, न विदेशों में जमा पैसे वापस ला पा रहा है, न अपने साथियों और सहयोगियों की नकेल कस पा रहा है। जिसे एक छोटी सी सफलता पर तुमने इतिहास पुरुष बना दिया था और कहने लगे थे उसे जो वह चाहे करने दो उसे इतिहास ने धक्के देना शुरू कर दिया न। कमाल की समझ है। इसी पापुलिज्म से फासिज्म पैदा होता है, भाई। इसी पापुलिज्म से हिटलर और उसका राष्ट्रवाद पैदा हुआ था, नाजीवाद। हम इसे आने नहीं दे सकते। हम अपनी जान देकर भी इसे रोकेंगे।’’
मैं तो सचमुच घबरा गया। जान दे बैठा तो बात किससे करूँगा। समझाया, देखो, तुम्हें जान देने की जरूरत नहीं है। सिर्फ अक्ल से काम लेने से काम चल जाएगा। पहली बात तो यह समझो कि जब मैं इतिहास पुरुष कहता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इतिहास बदल सकता है। कालदेव के सामने तो मैं पहले ही बता चुका हूँ कि एक व्यक्ति तो क्या पूरे पूरे आन्दोलन और दल तक एक तुच्छ खिलौने से अधिक कुछ नहीं। मेरा मतलब सिर्फ यह था कि वह इतिहास के एक खास बिन्दु पर पैदा प्रशासनिक शून्य को भरने के लिए कालदेव द्वारा सबसे उपयुक्त व्यक्ति उसे ही पाया गया था। चुनाव से एक साल पहले ही यह घाषित हो गया था कि हमारे मनमोहन सिंह उस कागज के टुकड़े से भी गए बीते हैं जिसे राहुल ने सार्वजनिक रूप से फाड़ कर फेंक दिया था। जो बात राहुल और उसकी अभिभाविका को पता नहीं थी, वह यह कि आर्थिक अपराधों में सीधी और खुलेआम संलिप्तता के कारण इतिहास ने उन्हें भी फाड़ कर फेंक दिया है। उसके बाद ही जनमत संग्रहों में इस शून्य को भरने वाले व्यक्ति के रूप में मोदी का चुनाव हो गया था। यह कालदेव का चुनाव था। जनता के सहज मन की अभिव्यक्ति जिस पर चुनावी प्रचार की कीचड़ और कालिख का निशान न था। इसके बाद चुनाव एक औपचारिकता थी। यदि मोदी कुछ नहीं करते एक वाक्य का भाषण देते कि आप यदि चाहते हैं कि मैं इस देश का नेतृत्व करूँ तो केवल मुझे नहीं, जिसे जिसे मैं कहूँ उसे भी चुन कर भेजिए कि मैं पूरे श्रम और सहयोग से काम कर सकूँ तो भी नतीजा वही होता जो बेकार की डंकेबाजी से हुई। ढोल नगारे से बहुत कम लाभ होता है और अक्सर तो नुकसान होता है।
‘‘यदि मनमोहन सिंह उतने बेअसर, हो कर भी अनुपस्थित, न होते और कांग्रेस का आलाकमान यह सोच कर कि अपने दिन लद गए जो हाथ लगे समेट लो की हड़बड़ी में न आ गया होता तो चुनाव दलों के बीच होता, व्यक्तियों के बीच नहीं। परन्तु यह जो ताबड़तोड़ हुआ वह वह भी कालदेव के इशारे पर ही, विनाशकाले विपरीत बुद्धि के तर्क से ही, या जैसा कहते हैं देवता लाठी डंडे से नहीं मारते हैं, मति ही फेर देते हैं, और तुम खुद अपने विनाश की प्रक्रिया तेज कर देते हो, इसे कालदेव का इशारा और इतिहास पुरुष का चयन कह सकते हो। इससे पहले ऐसी नौबत कभी नहीं आई थी। इतनी बात समझ में आई या कुछ कमी रह गई है।’’
‘‘मैं तो उस पर बहस ही नहीं कर रहा था। मैं तो कह रहा था उसे उसी इतिहास ने वापस लौटाना शुरू कर दिया है और उसका सदमा तुम्हें झेलना पड़ेगा।’’
‘‘तुम्हें यह भूल गया कि मैंने विचारक और संस्कृतिकर्मी और यहाँ तक कि छात्रों और अध्यापको तक को व्यावहारिक राजनीति से अलग रहने की बात कही थी। इससे उनका अपना काम प्रभावित होता है। राजनीति की समझ तक प्रभावित होती है। अच्छे बुरे का फर्क नहीं रह जाता। जिस राजनीति से जुड़े हो, सिर्फ उसे सही मानने की आदत पड़ जाती है। निर्णय क्षमता खत्म हो जाती है। इसलिए मेरे विचार को चुनाव परिणाम प्रभावित नहीं कर सकते। और अगर चुनावी हार से ही वापसी शुरू होनी थी तो यह बात तो इससे भी अधिक सशक्त रूप में दिल्ली के चुनाव ने घोषित किया था। बिहार की स्थिति तो फिर भी अच्छी है।’’
‘‘तुम कहना चाहते हो, बिहार के चुनाव परिणामों से तुम्हें निराशा नहीं हुई?’’
‘‘निराशा हुई, पर उन कारणों से नहीं, जिन्हें तुम गिना रहे हो, या अखबार लट्ठ ले कर पीट रहे हैं। निराशा हुई इतिहास पुरुष की हार से।’’
वह उछल पड़ा, ‘‘भई यही तो मैं कह रहा था।’’
‘‘तुम तो यह भी नहीं जानते कि बिहार के सन्दर्भ में इतिहासपुरुष कौन था? उसी प्रशासनिक शून्य से जो दूसरा संभावित विकल्प उभरा था वह नीतीश कुमार थे। उनसे आशा थी कि यदि विविध कारणों से मोदी को अवसर नहीं मिलता है तो स्वच्छ प्रशासन और विकासोन्मुखी दिशा नीतीश दे सकते हैं।“
‘‘नीतीश तो जीत ही गए। कल शपथ ग्रहण करेंगे।“
‘‘देखो, बिहार में मोदी बनाब नीतीश चुनाव नहीं था, सुशील बनाम नीतीश था। बिहार के लिए नरेन्द्र मोदी उपलब्ध नहीं थे। हर हालत में नीतीश को जीतना था। नरेन्द्र मोदी इतिहास के संकेत के विरुद्ध अपनी शक्ति आजमा रहे थे। मैं यह भी कह आया हूँ अपार शक्ति भी कालदेव के रास्ते में धूल गर्द साबित होती है। निष्प्रभाव। शक्ति अधिक लगी तो परिणाम अधिक विपरीत होंगे। इसलिए नीतीश अकेले दम पर उसी तरह जीत सकते थे जिस तरह केन्द्र के लिए मोदी जीते थे। वह चुनाव से पहले ही हार गए और हारते चले गए। तुम एक हारे हुए मुख्यमन्त्री को कल शपथ लेते देखोगे।“
‘‘अजीब आदमी हो। मुँह छिपाने को यही बहाना मिला था। कहते तो मैं अपना रूमाल निकाल कर दे देता।“
‘‘ पहली हार गठबन्धन के रूप में आई। जिस भ्रष्टाचार के विरुद्ध उन्हें इतिहास पुरुष के रूप में चुना गया था, उसके लिए विख्यात दल के साथ गठबन्धन। दूसरी नरवसनेस के रूप में आई, तान्त्रिक के पास भागने लगे। तीसरा, विकास का स्थान जातिवादी समीकरण ने ले लिया और जातिवाद को उभारतने के लिए उस विज्ञापन एजेंसी की मदद लेनी पड़ी जिसे यह भ्रम था कि मोदी का प्रचारतन्त्र उसके हाथ में था इसलिए वह जीते थे। और अन्तिम परिणाम इसके अनुरूप होना ही था, जातिवादी समीकरण में आगे पढ़ने वाला सहयोगी आगे पहुँच गया, निर्णयशक्ति उसके पास आ गई, नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने से ले कर बाद के सभी निर्णय, जैसे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने से ले कर बाद के निर्णय पीछे से लिए जाते थे। सकल लब्धि यह कि विकास पीछे चला गया जातिवाद की वापसी हो गई। इतिहास आगे चला गया वर्तमान पीछे लौट गया। मैं इतिहासपुरुष की इस त्रासदी से दुखी हूँ। भाजपा की हार से नहीं।“
उसे काटो तो खून नहीं। मैंने अन्त में जोड़ा, ‘‘और वह जो फासिज्म वासिज्म की बात है न उसका एक जवाब इतिहासपुरुष ने अन्तर्राष्ट्रीय मंच से दिया है। ध्यान दिया तुमने?”
उसकी समझ में नहीं आया, मैं कह क्या रहा हूँ। मैंने कहा, ‘‘उसने कहा, जिन शब्दों और प्रवृत्तियों से खतरा है उनका अवसरवादी उपयोग न करो, डिफाइन करो। परिभाषित करो और फिर बात करो। जो बात उसने टेररिज्म के विषय में यूएनओ में कही, वही वह तुमसे कहता आया है। पहले सम्प्रदायवाद, भगवावाद, फासिज्म को परिभाषिात करो फिर बात करो। बताओ जो सबका साथ सबका विकास का सपना ले कर चलता है वह क्या है और जो जाति, धर्म समुदाय के नाम पर बाँट कर रखना चाहता है वह क्या है।“

Post – 2015-11-17

हम भी रहते थे उस जमाने में जिसको बर्वाद कर दिया तूने

“तुम को कभी कभी पीटने का मन करता है।“
“इसमें बुराई क्या है। जिसके पास जो औजार है उसी का इसतेमाल तो करेगा। अक्ल होती तो अक्ल की बात करते नहीं है तो लाठी डंडे से ही बात करो। खाली हाथ क्यों चले आए, लाठी- डंडा ले कर आना चाहिए था। खाली हाथ क्यों चले आए।
मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। मुझे अपनी बात रखने का मौका दिए बिना ही उठ जाते हो, ‘चलो, अब चलें! के अन्दाज में। यह बात करने का कोई तरीका है?
“तो अब कह लो, जो कल न कह पाए।“
“तुम पढ़ते लिखते हो भी या जो जी में आया बकते चले जाते हो?”
“सोचता हूँ जब पढ़ने वाले आसपास हैं तो उनको सुन कर जान लूँगा, देखने वाले कम हैं, जितना देख सकूँ देखूँ। तुम बताओ क्या पढ़ना रह गया मुझसे?”
“तुमने कहा, सारे दंगे कांग्रेस ने कराए हैं। उस शोध कार्य का पता है जिसमें बताया गया है कि दंगे इसलिए भड़कते रहे कि पुलिस बल का सांप्रदायीकरण हो गया था। और जानते हो, यह ऐसी पाये की बात है, जिसके लिए अंग्रेजी में एक मुहावरा है, ‘फ्राम हार्सेज माउथ।“
“मुहावरे कई बार समझ में नहीं आते। तुम कह रहे हो वह सांप्रदायिक हो चुका था, और बता रहा था कि वह कैसे सांप्रदायिक हुआ?”
“नहीं, वह सांप्रदायिक हो चुका होता तो यह बताता क्यों। वह अकेला बच रहा था और दूसरे सभी सांप्रदायिक हो चुके थे।“
“क्या उसमें यह भी है कि कब तक सांप्रदायिक नहीं थे और कब और किन कारणों से सांप्रदायिक होने लगे और सांप्रदायीकरण की व्याधि कयों इस कदर फैलती चली गई कि उसके सिवा कोई बचा ही नहीं।“
“वह अचकचाया।“
“फिर तुमने मुहावरा भी गलत चुना। घोडे के मुँह से नहीं, तुम्हें कहना चाहिए था साईस के मुँह से। वह जिसे घोड़ों को साधने और सही खूराक देने, सही हालत में रखने की जिम्मेदारी दी गई थी, वह अपना काम करना तो जानता ही नहीं था, दोष उनको दे रहा था जो उसकी लापरवाही या बेवकूफी से सांप्रदायिक होते चले गए थे। इसके लिए भी अंग्रेजी में और हिन्दी में भी और सच कहो तो दूसरी भाषाओं में भी मुहावरा मिल जाएगा । अंग्रेजी का मुहावरा है अनाड़ी कारीगर अपने औजार को दोष देता है। ए बैड वर्कमैन ब्लेम्स हिज़ टूल्स। इसका हिन्दी रूप हैं नाच न आए आँगन टेढ़ा। और मैंने दूसरी भाषाओं में भी इसलिए कह दिया कि इसी बीच तमिल मुहावरा ‘नाट्ट माट्टादु तेवळियाळुक्कु कूलम् कोणम्” याद आ गया अर्थात नाच न जानने वाली देवदासी आँगन को टेढ़ा लगता है। खैर, तुम उस आदमी से कभी मिले हो?”
“मिलने न मिलने से क्या होता है?”
“मिलते तो पता चलता कि वह नजदीक की चीजों को देख पाता है या नही?”
“तुम्हें बातों को विचित्र बनाने का रोग है।“
“भई ये लोग जो सर्विसेज की तैयारी करते हैं न, उन्हें बहुत दूर की चीजें देखने की ऐसी आदत पड़ जाती है कि नजदीक की चीजें देख नहीं पाते। वे चर्मचक्षु से नहीं लोभचक्षु से देखने लगते हैं। वह दोहा, बिहारी का है, शायद, ‘दिये लोभ चसमा चखनु लघु पुनि बड़ो दिखाय।’ तो उन्हें थोड़ी भी चीज बहुत बड़ी और बहुगुणित दिखाई देने लगती है। उसे जब अपने विभाग को, कम से कम अपने अधीनस्थ बल को अपने नियन्त्रण में रखना चाहिए था, निर्देशों- आदेशों का सही पालन करना सिखाना था तब उस जरूरी काम को छोड़ कर वह शोध कार्य करने लग गया। शोध की प्रेरणा और सूझ या तो कहीं से मिली होगी या उसने खुद ही भाँप लिया होगा कि कहाँ से किस तरह क्या हासिल किया जा सकता है। यह बताओ इतने निकम्मे साईस को सिपहसालार का ओहदा मिला या नहीं?”
“सिपहसालार तो वह पहले से था। उसे और क्या चाहिए था?”
“कुछ उससे भी बड़ा। वह जिसे मैंने कहा था, छोटा मोटा उपराज्य!”
वह थोड़ी देर सोचता सा लगा और फिर जोर की धौल मेरी जाँघ पर मारते हुए हँसा, ‘‘अब समझा, अब समझा, हाँ भाई मिला तो, मिला तो, वह वाइस चान्सलर हो गया था।“
‘‘तुम पता यह भी लगाना कि वह अलीगढ़ पावर सेंटर से तो नहीं जुड़ा। मैंने सुना जुड़ा था। वहाँ से जुड़ने के बाद लोग अपना काम भूल जाते हैं और इतिहासकार बन जाते हैं, इतिहास में हिन्दुओं को शास्त्रीय गालियाँ देने की योग्यता अर्जित कर लेते हैं। कोसंबी जैसा विलक्षण प्रतिभा का आदमी अलीगढ़ पावर सेंटर से जुड़ने के बाद अपनी डगर भूल गया था।
मैंने सुना इसने भी रास्ता उधर ही मोड़ लिया था। उस पावर सेंटर का प्रताप ऐसा है कि उसे इतिहास का निर्माता कहा जाता है। उसके कंट्रोलर की महिमा में जो प्रशस्ति ग्रन्थ प्रकाशित हुआ था और जिसमें साम्प्रदायिक पैंतरेबाजी में माहिर सारे इतिहासकारों के लेख थे उसका शीर्षक कुछ ऐसा ही था। इतिहास निर्माता जैसा। इतिहास में केवल यह तलाश कर के कोई ला दे कि हिन्दू इतिहास, हिन्दू समाज, हिन्दू मूल्य कितने गर्हित है, हिन्दू समाज कितना सांप्रदायिक है, हिन्दी और हिन्दुस्तान सांप्रदायिकता से जुड़े हुए पद है, हिन्दी में लिखते हुए भी हिन्दी लेखकों को हिन्दीवाला कहने की आदत पड़ जाय तो उसे बाँस लगाकर उूपर चढ़ा दिया जाता है। उूपर वह चढ़ भी गया, अपना पुलिस का महकमा सँभाल न पाने वाले को उठा कर सर्वाधिकार संपन्न कुलपति बना दिया गया।’’
‘‘तुम विषय से भाग रहे हो और व्यक्तिगत आरोप लगा रहे हो जिसे तुम स्वयं भी अच्छा नहीं मानते।“
‘‘मेरा तो इस ओर ध्यान भी उसी ने दिलाया। उसने अपने ही पत्र के संपादकीय में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष को सांप्रदायिक करार दे दिया और बताया कि वह इस पद के योग्य नहीं थे और इसे जोड़ तोड़ से हासिल किया है। तब मुझे सचमुच वह जोड़-तोड़ दिखाई दिया जो इस व्यक्ति ने किया था। अरे भई जोड़ तोड़ की भी अपनी साधना होती है। ये साधक लोग है सिद्धि प्राप्त भी।
”लगातार दस साल तक या कम से कम सौ अंकों तक एक पत्रिका अपने पैसे से निकाल कर वह ऐसे तैसे को भेजता रहा और इस तरह संपर्कसूत्र जोड़ते हुए उन भाषाओं के प्रतिनिधियों तक को पटा लिया जिनको हिन्दी साहित्यकारों से चिढ़ थी। अज्ञेय तक जिसे न पा सके उसे उसने पहली बार पाया। योग्यता इतनी बुरी नहीं। वक्ता अच्छा है, एक विश्वविद्यालय में अध्यक्ष रह चुका है और जैसा मैं पहले कह चुका हूँ संस्थाओं के शीर्ष पदो पर दोयम दर्जे के साहित्यकारों और विद्वानों को या चुके हुए लोगों को ही जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ प्रतिभा की नहीं प्रबन्धन की आवश्यकता होती है।
“परन्तु इस आत्मप्रक्षेपण में ही तुम्हारे शोधकर्ता का अपना रहस्य और अपना जोड़तोड़ भी उजागर हो गया। तभी तो कहता हूँ हम जो लिखते या बोलते हैं उसे लोग अपने ढंग से पढ़ते और सुनते हैं और अपने को परदे से ढकने की को शिश में भी लोग अपने को नंगा कर देते हैं।”
‘‘तुम जिसके पीछे पड़ जाते हो…’’
‘‘पीछे मैं नहीं पड़ा। मोर्चे पर तुमने सिपाही को खड़ा कर दिया । इसे तो यह भी पता नहीं कि वह जो नतीजा निकाल रहा था उसका मतलब क्या है?
‘‘मतलब भी तुम्हीं बता दो।’’
‘‘मतलब यह है कि जिस नतीजे पर पहुँच कर भी वह उसका सारा दोष अपनों पर मढ़ देता है, वे सीधे एक नरसंहार के अपराधी हैं जिसके लिए अर्धसैन्य बल को उकसाया गया था। वे यदि स्वतः ऐसा कर बैठे तो उनके विरुद्ध शीघ्र और कठोर कार्रवाई सरकार को करनी थी, उसने उन्हें संरक्षण दिया। उन्हें बचाने का काम किया। अर्थात् पुलिस बल को कांग्रेसी दौर में योजनाबद्ध रूप में सांप्रदायिकत बनाया जाता रहा जिससे सांप्रदायिक समस्या बनी रहे और इसका चुनावी लाभ उठाया जा सके। असहिष्णुता कांग्रेस पैदा करती है और आज भी कर रही है।’’
‘‘बात तो हैरान करने वाली है पर, यार, नतीजा तो यही निकलता है।’’
‘‘देखो, पुलिस बल को अपनी ट्रेनिंग के दौरान कोई ऐसा पाठ नहीं पढ़ाया जाता जिससे उसे सांप्रदायिक बनाया जा सके। यदि पुलिस बल का सांप्रदायीकरण हो गया है तो इसके दो ही कारण हो सकते हैं। उस समाज का सांप्रदायीकरण हो चुका है, जिसमें से पुलिस बल के लोग आते हैं, और अलीगढ़ पावर सेंटर के लिए इतना ही काफी है।
“परन्तु यह सही होता तो उस समय से ही सत्ता दक्षिणपन्थी हाथों में होती जो नहीं थी। वह कांग्रेस को ही वोट दे रही थी। अतः हिन्दु समाज का सांप्रदायीकरण नहीं हुआ था न हुआ है।
“अब दूसरा विकल्प बच जाता है, कि पुलिस बल को सत्ताधारी राजनीति योजनाबद्ध रूप में सांप्रदायिक बना रही थी। उससे कहा तुर्कमान गेट तोड़ दो तो तोड़ने वालों के साथ खड़ी हो गई, मेरठ महियाना या हाशिमपुरा कांड करा दो तो कराने को तैयार हो गई। वह तो हुक्म का इतना ताबेदार है कि सत्ता में बैठा आदमी कहे भैंस खोजने पर जुट जाओ तो भैंस खोजने चल देती है। पकड़े हुए अपराधी को छोड़ने को कहो तो छोड़ कर हाथ साबुन से धोने लगती है कि कहीं अपराधी की गन्ध उसके हाथ न लगी रह गई हो।
“वास्तविक अपराधी का बचाव करने के कारण तुम्हारे शोधार्थी की भी मुरादें पूरी हुईं और अलीगढ़ पावर सेंटर की भी पूरी हुईं, नहीं तो आइ एस की तर्ज पर पहला जघन्य अपराध तो कांग्रेस के प्रशासन में हुआ था और उस समय अलीगढ़ केन्द्र में खामोशी थी और आज वही किसी का ठीकरा किसी के सिर फोड़ता हुआ चीत्कार कर रहा है।
11/17/2015 1:10:54 PM

Post – 2015-11-16

सूच्याग्रा हि अनर्थकाः

“तुम तो गुजरात में जो हुआ उसका भी जिम्मा कांग्रेस पर डाल सकते हो।“
डाल सकता हूँ, पर डालूँगा नहीं।
वह हँसने लगा। डाल सकते हो जरा सुनूँ तो कैसे।
तुम्हे मालूम है बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद अयोध्या में इस बाबरी मस्जिद गिराए जाने के विरोध में साहित्यकारों, पत्रकारों, कलाकारों एक प्रदर्शन हुआ था। उसमें मुझसे भी चलने को कहा गया तो तैयार हो गया। पूछा, ‘टिकट का पैसा किसके पास भेज दूँ।‘ जबाब मिला, ‘उसका इन्तजाम हो गया है।‘ मैंने कहा, ‘उस हालत में मैं नहीं जा सकता, क्योंकि जिस भी ऐजेंसी ने भाड़े की व्यवस्था की है, वह मेरा इस्तेमाल कर रही है।‘ यह आयोजन सहमत ने किया था। स्पे शल ट्रेन का पैसा और उूपर से एक मोटी रकम उसी कांग्रेस ने दिया था जिसके विरुद्ध नुक्कड़ नाटक करते हुए सफदर हाशमी शहीद हुए थे। इसे चिता पर रोटी सेंकना भी कह सकते हो। तुम जानते हो उसके बाद सफदर हाशमी की पत्नी, क्या नाम है उसका, माला हाशमी या जो कुछ भी हो, उसने सहमत से नाता तोड़ लिया था। मुमकिन है बाद में उससे जुड़ भी गई हो। अब सहमत नुक्कड़ नाटकों के लिए नहीं धन्धेबाजी और शगल के लिए जाना जाता है।“
“मैं पूछ रहा हूँ कुछ और तुम बहक गए सहमत की ओर।“
“तो अयोध्या में जो प्रदर्शन हुआ था उसमें रामकथा से सम्बन्धित बहुत सारी सामग्री थी। मेरी अपनी पुस्तक ‘अपने अपने राम’ भी थी। अनर्गल बहुत कुछ था। जोर अनर्गल पर ही था। असल में इसमें प्रतिशोध का भाव था न कि समझ पैदा करने का प्रयत्न । प्रदर्शन का ठीक ठीक रूप क्या था यह मैं नहीं जानता, परन्तु संघ से जुड़े कुछ तत्वों ने वहाँ भारी बखेड़ा किया था। मानबहादुर सिंह ने मुझे बाद में बताया कि यदि मैं वहाँ होता तो मेरी जान भी जा सकती थी। अगर वह आयोजन उसमें भाग लेने वालों के अपने पैसे से हुआ होता और मुझे यह कोई अग्रिम सूचना देता कि वहाँ मुझ पर हमला होगा तो मैं उसके बाद भी उसमें शामिल हुआ होता और यदि मारपीट से पहले कहा-सुनी का मौका मिलता तो उन्हें समझाने का प्रयत्न भी करता कि राम की जो महिमा अपने अपने राम में है वैसा इससे पहले की किसी कृति में नहीं।“
“तुम फिर भटक गए।“
“भटका नहीं हूँ। मैं कह रहा हूँ कि यदि उस प्रदर्शन की प्रतिक्रिया ऐसी उग्रता ले लेती जैसी गोधरा में देखने में आई और उसके बाद इसने भयानक आयाम लिया होता तो उसकी जितनी जिम्मेदारी अर्जुन सिंह पर आती उतनी ही जिम्मेदारी मैं गुजरात के दंगों के लिए मोदी की मानता हूँ।“
बाबरी कांड के दस साल पूरे होने पर स्पेशल ट्रेन में स्वयं सेवक भर कर भेजने की व्यवस्था उन्होंने की थी और वह भीड़ उस तरह की सुशिक्षित भी नहीं थी जो सहमत वाले प्रदर्शन थी। वे जिस तरह के उत्तेजक नारे लगाते हुए घूम रहे थे उसे टीवी पर देख कर मेरा खून खौल रहा था और मैं मैं घबरा रहा था कि इसके परिणाम बहुत अनिष्टकर हो सकते हैं।
“अनियन्त्रित भीड़ संचित उूर्जा का ऐसा भंडार होता है जिसका यदि किसी रूप में उन्मोचन हो वह ध्वंसकारी ही होगा। प्राकृतिक प्रकोप की तरह। यदि किसी तरह की छेड़छाड़ हो जाती तो यह अयोध्या में ही बहुत विकट रूप ले सकता था। गोधरा में इस भीड़ का चरित्र, नारेबाजी या कृत्य क्या था यह पता नहीं, परन्तु गोधरा सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदन शील क्षेत्र है।
“एक दुर्घटना हो गई और तुमने पूरे क्षेत्र को संवेदन शील ठहरा दिया।“
“गोधरा में 1947 के बाद1952, 1959, 1961, 1965, 1967, 1972, 1974, 1980, 1983, 1989 और 1990 में दंगे भड़क चुके थे। और यह संभव है कि पेट्रोल आदि पहले से ही जुटा लिया गया हो कि आने पर खबर लेंगे। गोधरा के बाद गुजरात घटित होना ही था।“
चाणक्य का एक सूत्र है, ‘सूच्याग्रा हि अनर्थकाः भवन्ति’ । सुई की नोक जैसी चूक भी बहुत बड़े अनर्थ का कारण बन जाती है। इस बोध को हमारे यहाँ कई रूपों में दुहराया जाता रहा है। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को अपने किसी भी कथन या कार्य में कितनी सावधानी बरतनी चाहिए यह तो इस सूत्र में है ही। उस चूक के बाद नियन्त्रण आपके हाथ से निकल जाता है, कालदेव आगे के चक्र को सँभाल लेते हैं।“
“फिर आग ए कालदेव पर।“
“कालदेव से मेरा मतलब उन अज्ञात, दृश्य-अदृश्य अनन्त तत्वों से है जिनको चिन्हित या परिभाषित नहीं किया जा सकता।
“तो मैं उस पहली चूक के लिए, जो ही अपने निर्णय और विवेक और नियन्त्रण की सीमा में थी, मोदी को जिम्मेदार मानता रहा हूँ। गुजरात को नियन्त्रित करने में कुछ प्रमाद भी हो सकता है और कुछ सबक सिखाने का भाव भी। यह स्वाभाविक है। लेकिन इसकी तुलना उन दंगों से नहीं की जा सकती जो सोच समझ कर कांग्रेस द्वारा कराए जाते रहे और जिसमें पुलिस या अर्धसैनिक बल किसी की भी मदद ली जाती रही है।“
“तुम तो हद कर देते हो।“
“देखो मध्यकाल में शासकों ने, उनके अमलों ने हिन्दुओं पर बहुत अत्याचार किए, परन्तु कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए। ब्रितानी काल में सारे दंगे अंगे्रजों की खुली या दबी शह पर किए जाते रहे और इसी के बल पर उन्होंने मुसलमानों को यह भी समझा लिया था कि वे तभी तक सुरक्षित हैं जब तक अंग्रेजी शासन है। तुम्हें याद है न सर सैयद ने क्या कहा था।“
“कभी इतने विस्तार से सैयद अहमद को पढ़ा नहीं।“
“उनका मानना था कि यदि भारत को स्वतन्त्रता मिल भी जाय तो यूरोप का कोई दूसरा देश इस पर आक्रमण करके इसे अपने अधीन कर लेगा और किसी अन्य यूरोपीय देश का प्रशासन अंग्रेजी प्र शासन से बहुत कठोर और बुरा है इसलिए अंग्रेजों के अधीन रह कर ही हम प्रगति कर सकते हैं, इसलिए ब्रिटिश सरकार को यहाँ अनन्त काल तक रहना चाहिए।
और कुछ ऐसा ही विश्वास हिन्दूफोबिया पैदा करके कांग्रेस ने मुस्लिम वोट सुनिश्चित करने के लिए पैदा किया और इसको बनाए रखने के लिए दंगे भी कराती रही और यह डर दिखा कर कि हिन्दूशासन से तो यह हर हालत में अच्छा है, इसका जितना लाभ उठा सकती थी, उठाती रही। हम केवल यह जानते हैं 1950 से 1990 के बीच 2500 दंगे हुए थे और उस दौर में शासन कांग्रेस का ही था।
“तुम बातें तो अच्छी गढ़ लेते हो यह जानता था, अब लगता है आँकड़े भी गढ़ लेते हो। कहाँ से मिला यह आँकड़ा।“
“17.12.1990 को टाइम्स आफ इंडिया में संसद में विजय कुमार मल्होत्रा के बयान की रपट में यह दावा था।“
“और तुमने मान लिया?”
“तब तक मानना पड़ेगा जब तक कोई दूसरा अधिक भरोसे का स्रोत नहीं मिल जाता क्योंकि संसद में किसी ने इसका खंडन नहीं किया था।“
“किया भी हो तो टाइम्स आफ इंडिया का उस दौर का संपादक उसे छापता ही नहीं।“
“तुम जानते हो वोटबैंक की राजनीति कौन करता आया है? बाँट कर रखने के हथकंडे कौन अपनाता आया है? दहशतगर्दी करते हुए भी हिन्दू फोबिया उभार कर रक्षक की भूमिका में कौन आता रहा है? नहीं जानते हो तो पता लगाओ। तब पता लगेगा कि अंग्रेजों से बाँटो और राज करो की नीति विरासत में किसने ली, फिर खुद इस नतीजे पर पहुँच जाओगे कि जब तक उसका शासन रहेगा दंगों से, घृणा और दंगे-फसाद से और असुरक्षा के हथकंडों से मुक्ति नहीं मिल सकती।“
“हिन्दू संगठनों का जो चरित्र पहले था उसमें सचमुच इनका चेहरा डरावना बना दिया गया था, परन्तु अब पहली बार एक व्यक्ति ऐसा आया है जो आपसी लड़ाई से आगे विकास की दि शा में ले जाने की बात करता है और उस पहली चूक के बाद उसने आज तक कथनी या करनी के स्तर पर ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे उसका यह दावा ढोंग लगे। वही सैयद अहमद के उस सपने को भी पूरा कर सकता है जिसकी ओर तुम्हारा ध्यान न गया होगा।
वह मेरी ओर देखने लगा ।
“उनका मानना था कि हिन्दू और मुसलमान आपसी मेल&जोल से ही अपना अधिकतम विकास कर सकते हैं। वह इसी दिशा में भीतरी और बाहरी दबावों के बीच काम कर रहा है। उसे काम करने दो। आलोचना करो, फतवेबाजी बन्द करो।“

Post – 2015-11-14

इतिहास की गति – 2

“जब तुम कह रहे थे कि किसी परिघटना के असंख्य घटक होते हैं जिनमें से कोई एक न होता तो या तो वह घटित ही नहीं होती या किसी दूसरे रूप में घटित होती तो क्या तुम कुछ लोगों को जिम्मेदारी से बचाने के लिए कह रहे थे?”
“देखो इतिहास को हम पूरी तरह नहीं समझ सकते। मार्क्स जब कहते हैं कि व्यक्ति अपने आप में कुछ नहीं होता वह अपने युग की अभिव्यक्ति होता है या ऐसा ही कुछ तो वह व्यक्ति की भूमिका को नकारते नहीं हैं। यह रेखांकित करते हैं कि वह जो कुछ करता या करने का प्रयत्न करते हुए नहीं कर पाता वह अकेले उसके कारण नहीं होता। इसलिए वह इतिहास की समझ पर जोर देते हैं परन्तु कितने मार्क्सवादी हैं जो इसको समझते या इसका ध्यान रखते हैं। तुम देखो तो अधिकांश तो इतिहास से ही नहीं, उन स्रोतों तक से नफरत करते हैं जिनसे इतिहास को समझा जा सकता है और दूसरे हैं जो उन स्रोतों में ही जहर घोलते हैं कि इतिहास की समझ पैदा ही न होने पाए। तुम्हारे पेशेवर इतिहासकार तो लगातार यही करते आ रहे हैं।“
“तुम अपनी बात कहो, फिर हवाई सफर पर मत निकलो।“
“मैं हवाई सफर नहीं कर रह था न भाग रहा था। कह मात्र इतना रहा था कि मैं जहां से आरंभ कररूंगा उसके पीछे भी बहुत कुछ अदृश्य रह जाएगा।“
“फिर भी।“
“देखो पुरातत्व की एक नियमावली है, एक आचारसंहिता है और उसके संरक्षण के लिए कुछ कानून कायदे हैं, जैसे यही कि 1947 में में पुरातात्विक स्थल जिस भी हालत में था उससे किसी तरह की छेड़ छाड़ नहीं की जाएगी।“
“यह तो मैं भी जानता हूं।“
“इसके अनुसार ही जो मन्दिर, मस्जिद, पहले से पुरातत्व की संपदा है, उसमें पूजा-नमाज़ आदि नहीं होता उसमें पूजा वगैरह नहीं की जाएगी, उसमें कोई सजावट जोड़ तोड़ नहीं की जाएगी, यहां तक कि मरम्मत करते समय भी इस बात कर ध्यान रखा जाएगा कि यह लक्ष्य किया जा सके कि यहां पहले कुछ टूट गया था।“
“यह भी जानता हूं।“
“अब यह बताओ कि किसी देश का राष्ट्रपति ही इसका उल्लंघन करे तो क्या कहोगे?”
“किसकी बात कर रहे हो तुम?”
“फखरुद्दीन अली अहमद की। उन्होंने कहा कि पहले जवानी में मैंने एक बार कुदसिया मस्जिद में नमाज पढ़ा था इसलिए एक बार पढूंगा।“
“यह शुरुआत थी और उसके बाद दिल्ली के ही नहीं दूसरी जगहों पर भी धीरे धीरे दखल बढ़ने लगा और उनमें ढांचागत बदलाव भी किए जाने लगे। पुरातत्व विभाग शिकायत करता तो पुलिस से कोई मदद नहीं मिलती। समस्या को सांप्रदायिक नुक्ते से देखा जाने लगता और वह पीछे हट जाती। यह प्रवृत्ति जिसे धार्मिक मुखौटे वाला अतिक्रमण कह सकते हो बेरोक टोक बढ़ता रहा है यह तुम जानते हो, उसी का यह दूसरा रूप था लेकिन इसकी जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग पर नहीं थी।
“जिन दिनों भारतीय पुरातत्व के महानिदेशक पद पर मुनीश जोशी थे उन दिनों यह प्रवृत्ति रोकने के एक कोशिश उन्होंने ने की थी पर कोई नतीजा नहीं निकला। यह बात सबको मालूम थी कि जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से उछाला गया उसका नाम मस्जिदे जन्मस्थान था। वह राम मन्दिर तोड़ कर ही बनाई गई थी भले यह सुल्तानी दबदबे का सिक्का जमाने के लिए किया गया हो या मजहबी जुनून में या दोनों इरादों से। उसकी पुरानी तस्वीर पर नज़र डालो तो भी पता चल जाएगा कि यह एक भव्य ढांचे को तोड़ कर उसके मलमे के उूपर बनाई गई थी। तुलसी दास जब ‘मसीत को सोइबो’ की बात करते हैं तो वह यही मसीत है। इसके बाद दहशत का माहौल जारी रहा और लोगों ने घरों के अन्दर पूजापाठ के कोने या अपने अपने मन्दिर बना कर पूजा पाठ शुरू किए जिसका अन्देशा होने पर भी कुछ सिरफिरे घरों में घुस कर उन्हें तोड़ देते थे जिसमा दुखड़ा तुलसी दास रोते दिखाई देते हैं। यह स्थिति अकबर के समय तक बनी हुई थी क्योंकि अकबर स्वयं उदार हो सकते थे उनके अधीनस्थ अधिकारी और सिपहसालार उनके समय में भी अपनी ही करते थे।“
“तुमने उनका वह दोहा पढ़ा है न ‘गोंड़ गंवार नृपाल कलि जवन महामहिपाल’’ कि सिलबट्टे तक को यह कह कर तोड़ देते थे कि इसकी भी पूना की जाती होगी। अयोध्या में रामभक्ति ऐसी कि घर-घर में मन्दिर थे पर कोई सार्वजनिक मन्दिर नहीं। तुलसी तो कलिकाल को दोष देकर सब्र कर लेते थे पर यह बात आम जानकारी में थी कि यह रामजन्मभूमि पर बनी मस्जिद है।
खीझे हुए मुनीश जोशी ने स्वराज्यप्रकाश गुप्त को जो संघ से जुड़े थे और शाखा में भी जाते थे, कहा कि वह राममन्दिर के सवाल को क्यों नहीं उठाते।
“अब फिर क्या था। स्वराज्य प्रकाश गुप्त की पहल थी जिसमें साधुओं संन्तों का वह जमघट और प्रदर्शन लालकिले के सामने हुआ था और इसी के साथ हुआ था विश्वहिन्दू परिषद और का गठन। इसके साथ ही भाजपा पर लद गया था मन्रि का कार्यक्रम, साधुओं का जमघट और राजनीतीकरण और विश्व हिन्दूपरिषद का अभियान
पेशेवर इतिहासकारों ने सर्वविदित और सर्वमानय को सन्दिग्ध बनाने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया। वे ठोस प्रमाण की मांग करने लगे। राम की ऐतिहासिकता का सवाल उठाते रहे। गरज की राम ऐतिहासिक हों तो ही उनका मन्दिर बन सकता है अन्यथा नहीं। ये इतने चालाक लोग हैं कि इन्हें हर मसले को उलझाना आता है और अच्छे अच्छों को मूर्ख बनाना आता है, पर किसी परिघटना को समझते केवल इसक कोण से हैं कि इससे उनको क्या मिलेगा। सवाल पेशे का ठहरा। वे लोगों को मूर्ख बनाते रहे। इसके बाद जरूररत हुई ठोस प्रमाणों की तो
मुनीश ने ब्रजबासी लाल को जो रामकथा से जुड़े स्थलों की खुदाई कर चुके थे इसके सटे पड़ोस में खुदाई का कार्यभार दिया और वहां पुरातात्विक प्रमाण भी निकल आए।
ये उनको भी झुठलाने का प्रयत्न करते रहे। खैर अब तो मामला कोर्ट कचहरी का बन चुका है और उससे हमें मोई लेना देना नहीं।
मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि अप्रिय से अप्रिय सत्य को झुठलाने या छिपाने से इतिहास विषाक्त होता है और इतनी समझ जिनमें नहीं है वे चाकरी-पेशा भले करते हों, इतिहासकार नहीं हैं।
“स्वराज्य प्रकाश गुप्त की हैसियत क्या थी? विद्वान थे वह। बहुत अच्छे पुरातत्वविद थे। परन्तु अपनी चाकरी से अलग थे मात्र संघ के स्वयंसेवक। अकेले उनका निर्णय। भाजपा से उनको नफरत के हद तक चिढ़ थी क्योंकि उनका मानना था कि ये लोग राजनीतिक लाभ के लिए कोई समझौता कर सकते हैं। उनके हस्तक्षेप के कारण सन्तसमाज का राजनीतीकरण और विश्व हिन्दू परिषद दोनों का भाजपा के उपर लद जाना कितनी छोटी सी घटना और कितना बड़ा मोड़.
“तुम जानते हो भाजपा की मन्दिर की लड़ाई अकादमिक स्तर पर स्वराज्यप्रकाश गुप्त लड़ते रहे। कम से कम प्रधानता उनकी ही थी।
“अरे भाई वह तो तुम्हारे भी दोस्त थे, रोका क्यों नहीं।“
“मैं तो उनकी शाखा का मजाक उड़ाता था और निकर कल्ट का भी। पर जब तुम्हें कुछ सिखा नहीं पाता तो उन्हें कैसे सिखा पाता।
“यह सब सबाल्टर्न मामला है। कहने में कुछ इधर उधर भी हो जैसा याद रह गया है बता दिया। सकता है। दरयाफ्त करते ठीक कर लेना। अब तुम स्वयं देखो, यदि इनमें से कोई भी कड़ी गुम होती तो घटनाक्रम क्या दिशा लेता। इसलिए इतिहास में किसी को अपराधी सिद्ध कर ना आसान है उसे और अकेले उसे जिम्मेदार मानना गलत है। जब तुम इस तरह व्याख्या करना सीख जाते हो तो जो विषाक्त था उसका विष समाप्त हो जाता है और वह अपराधी स्ख्यं एक निमित्त बन कर रह जाता है।
तोल्स्तोय युद्ध और शान्ति के उपसंहार में यही तो करते हैं जिसमें नैपोलियन महानायक से एक तुच्छ खिलौने में बदल जाता है। मात्र एक निमित्त।
“और ठीक यही बात जो तोल्सतोय कहते हैं गीताकार कहता है जिसमें वह काल प्रवाह में कर्ता को मात्र एक निमित्त मानता और बनने की सलाह देता है। कालोस्मि लोकान्द्वायकृत प्रवृद्ध: लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। भारत में इतिहास भी था और एक गहरा इतिहासबोध भी था, मानोगे?”
“तुम तो निरे भाग्यवादी हो भाई। भाग्यवाद ने इस देश का बेड़ा कितना डुबोया है इसका पता है?”
“मैं नहीं जानता भाग्यवाद की तुम्हारी व्याख्या क्या है, पर मेरी समझ से जो मानता है उसके बस का कुछ नहीं, जो भाग्य में लिखा होगा वही होगा और इस सोच के कारण जिसकी कर्मठता घट जाती है वह भाग्यवादी है। जो मानता है भले हमारे वश में सब कुछ न हो परन्तु हमारे किए ही जो होना है उसके बिना तो उतना भी नहीं बदलेगा जो मैं बदल सकता हूं या बदलने का प्रयत्न करता हूं और इसलिए अधिक तत्परता से, अविचलित भाव से काम करता है, वह कर्मयोगी है। और जो सोचता है मैं जो चाहूं कर सकता हूं, वह जितना भी विद्वान या शक्ति-साधन-सम्पन्न हो, वह उसी अनुपात में प्रचंड मूर्ख है और सत्यानाश की जड़ भी। मैं अपने को दूसरी श्रेणी में गिनता हूं और तुम चाहो भी तो अपने को तीसरी श्रेणी में आने से बचा नहीं सकते।“
11/14/2015 3:42:02 PM