Post – 2015-04-20

जनसत्ता ने संस्कृति को राजनीति के समकक्ष रखा है यह देखकर बड़ी रहत मिलती है. कम से कम साहित्यकार के दिन पुरे होने और साँस लेते हुए उसने कुछ किया भी था इसका पता चल जाता है. विजयमोहन सिंह बहुत मनस्वी आलोचक थे यह बात उनके निकट और अभिन्न आलोचकों को भी शोक और स्मरण के क्षणों में ही याद आया. पहले नहीं. अपने आप को लेकर हम सब इतने व्यस्त हैं कि देश दुनिया की खबर ही नहीं. खबर के नाम पर भी देश दुनिया गायब है. ढोल की आवाज़ ही बच रही है.

Post – 2015-04-13

मैं वह नहीं हूँ जिससे तू डरता है सितमगर
हूँ वह जो अपने शै से सिमटता चला जाये
मैं वह नहीं रखता था तनी रीढ़ कभी जो
हूँ वह जो ब आदाब शिफर में समा जाए
हम भूल चुके हैं कभी आज़ाद थे हम भी
मालिक से पूछते हैं कि बन्दा कहाँ जाये
4/12/2015 10:57:52 PM

Post – 2015-04-13

मैं वह नहीं हूँ जिससे तू डरता है सितमगर
हूँ वह जो अपने शै से सिमटता चला जाये
मैं वह नहीं रखता था तनी रीढ़ कभी जो
हूँ वह जो ब आदाब शिफर में समा जाए
हम भूल चुके हैं कभी आज़ाद थे हम भी
मालिक से पूछते हैं कि बन्दा कहाँ जाये
4/12/2015 10:57:52 PM

Post – 2015-04-05

कौन लिखता कौन पढ़ता है फिर भी कल तुक भिड़ा रहा था मैं.
12-30
संभलने पर भी देखो अपनी बर्वादी नहीं जाती
तुम्हारी याद! कहता हूँ, ‘चली जा’, पर नहीं जाती
कई किस्से जुड़े हैं जिनको मैंने खुद नहीं लिक्खा
मगर पढने चलूँ तो अपनी हैरानी नहीं जाती.
क़यामत के कई सफ़हे हैं जिनको हम भुगतते हैं
क़यामत है खुदाओं की भी हैवानी नहीं जाती
बहुत आगे बढ़ी है अपनी दुनिया फिर भी भटकी है
जो दानिशमंद हैं खुद उनकी नादानी नहीं जाती.
4/4/2015 10:12:57 PM

हम वहीँ थे जहाँ ज़माना था
जिसमें दिन-रात आना जाना था
फिर भी पहचान न पाये देखो
सच का कुछ ऐसा ताना बाना था.
4/4/2015 9:49:01 PM

सच यह नहीं है मैं किसी को कुछ नहीं कहता.
कहता हूँ कि सुनकर भी लगे कुछ नहीं कहता.
औरों को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है.
अपने को लुटाने के लिए कुछ नहीं कहता.
4/4/2015 9:24:00 PM

कितने अद्भुत लोगों के बीच
एक अनद्भुत व्यक्ति की तरह भटकता रहा मैं
हर गए बीते से पूछता
क्या तुमने मुझे देखा
क्या सचमुच दीखता हूँ मैं
]क्या तुमने मुझे सुना
क्या सचमुच पहुंचती है मेरी आवाज़ तुम तक
क्या बता सकते हो
मैं हूँ या नहीं.
4/4/2015 9:11:21 PM

Post – 2015-04-05

कौन लिखता कौन पढ़ता है फिर भी कल तुक भिड़ा रहा था मैं.
12-30
संभलने पर भी देखो अपनी बर्वादी नहीं जाती
तुम्हारी याद! कहता हूँ, ‘चली जा’, पर नहीं जाती
कई किस्से जुड़े हैं जिनको मैंने खुद नहीं लिक्खा
मगर पढने चलूँ तो अपनी हैरानी नहीं जाती.
क़यामत के कई सफ़हे हैं जिनको हम भुगतते हैं
क़यामत है खुदाओं की भी हैवानी नहीं जाती
बहुत आगे बढ़ी है अपनी दुनिया फिर भी भटकी है
जो दानिशमंद हैं खुद उनकी नादानी नहीं जाती.
4/4/2015 10:12:57 PM

हम वहीँ थे जहाँ ज़माना था
जिसमें दिन-रात आना जाना था
फिर भी पहचान न पाये देखो
सच का कुछ ऐसा ताना बाना था.
4/4/2015 9:49:01 PM

सच यह नहीं है मैं किसी को कुछ नहीं कहता.
कहता हूँ कि सुनकर भी लगे कुछ नहीं कहता.
औरों को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है.
अपने को लुटाने के लिए कुछ नहीं कहता.
4/4/2015 9:24:00 PM

कितने अद्भुत लोगों के बीच
एक अनद्भुत व्यक्ति की तरह भटकता रहा मैं
हर गए बीते से पूछता
क्या तुमने मुझे देखा
क्या सचमुच दीखता हूँ मैं
]क्या तुमने मुझे सुना
क्या सचमुच पहुंचती है मेरी आवाज़ तुम तक
क्या बता सकते हो
मैं हूँ या नहीं.
4/4/2015 9:11:21 PM

Post – 2015-04-04

सच यह नहीं है मैं किसी को कुछ नहीं कहता
कहता हूँ कि सुनकर भी लगे कुछ नहीं कहता
औरों को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है
अपने को लुटाने के लिए कुछ नहीं कहता
4/4/2015 9:24:00 PM

Post – 2015-04-04

सच यह नहीं है मैं किसी को कुछ नहीं कहता
कहता हूँ कि सुनकर भी लगे कुछ नहीं कहता
औरों को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है
अपने को लुटाने के लिए कुछ नहीं कहता
4/4/2015 9:24:00 PM

Post – 2015-04-04

कितने अद्भुत लोगों के बीच
एक अनद्भुत व्यक्ति की तरह भटकता रहा मैं
हर गए बीते से पूछता
क्या तुमने मुझे देखा
क्या सचमुच दीखता हूँ मैं
]क्या तुमने मुझे सुना
क्या सचमुच पहुंचती है मेरी आवाज़ तुम तक
क्या बता सकते हो
मैं हूँ या नहीं.

Post – 2015-04-04

कितने अद्भुत लोगों के बीच
एक अनद्भुत व्यक्ति की तरह भटकता रहा मैं
हर गए बीते से पूछता
क्या तुमने मुझे देखा
क्या सचमुच दीखता हूँ मैं
]क्या तुमने मुझे सुना
क्या सचमुच पहुंचती है मेरी आवाज़ तुम तक
क्या बता सकते हो
मैं हूँ या नहीं.

Post – 2015-04-03

हरसिंगार के फूल
फूले ही क्यों तुम
इतना दुर्बल मूल दंड
ढो न पाए अपना ही मकरंद भार
खिलने के साथ ही लुढक गए धूल में
पहली किरण की आंच से
सच का सामना तो करते
ओस के कण से भी कम पवित्र
फिर भी इतना अहंकार
3/31/2015 9:16:44 PM