Post – 2019-05-30

भारतीय समाज

हम तो आईना हैं. ‘गर आप खुश रहें तो रहें।
तोड़ भी दें तो हमें टूटने की आदत है।।

Post – 2019-05-28

Modi does not kill. He appropriates.
Even if you correctly judge his designs, you can not escape.
Beware of this python.

Post – 2019-05-28

‘मतिमतां च विलोक्य विमूढ़तां
विधिरहो बलवानिति मे मतिः।’

Post – 2019-05-27

रात अपनी है दिन भी अपना है,
नींद आई तो ख्वाब देखेंगे।।

Post – 2019-05-27

आत्मचिंतन

मैं राहुल गांधी के इस निर्णय को सही मानता हूँ कि उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं रहना चाहिए। कारण पार्टी की हार नहीं है, हार और जीत होती रहती है। पिछले आंकड़े को कुछ तो सुधारा है। कारण यह है कि अपनी समझ से उन्होंने एक पर एक ब्रह्मास्त्र दागते हुए शिष्टता की मर्यादाएं तोड़ दीं। भारतीय नागरिकों ने उनके हथियारों को मौन भाव से उन्हीं की ओर फेर दिया। भाषा की मर्यादा लांघने के बाद व्यक्ति समाज की नजर में गिर जाता है। अब उसका सामना किस मुंह से करेंगे।

हार-जीत के बाद केवल हारने वाले को ही नहीं, जीतने वाले को भी अपने अपने ढंग से आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। सामान्यतः जीतने वाले आत्मनिरीक्षण नहीं करते, क्योंकि सफल होने के बाद वे मान लेते हैं कि उन्होंने जो कुछ किया या नहीं किया, वह अचूक था। कहीं कोई चूक हुई ही नहीं और इसका प्रणाम है उनकी विजय।

इस सामान्य नियम के विपरीत कम से कम मोदी ने आत्मचिंतन किया कि जब उन्होने ‘सबका-साथ-सबका-विकास’ का संकल्प लिया था, और इसके अनुसार काम किया था, तो वे कौन सी कमियां थी जिनके कारण कुछ लोगों का साथ नहीं मिला। उसके प्रयत्न के बाद भी कुछ लोग जातिवाद से और कुछ दूसरे संप्रदायवाद से मुक्त क्यों नहीं हो पाए? इतनी भारी विजय के बाद होश हवास बनाए रखना राजनीतिक परिपक्वता का द्योतक है। मोदी ने अपने नए संकल्प में ‘सबका-साथ-सबका-विकास’ के साथ ‘सबका-विश्वास’ जोड़ दिया। उनके कहने और करने में एकरूपता देख कर मात्र इस घोषणा ने ही मुसलमानों के अविश्वास में सेंध लगा दी है।

राजनीतिक दलों में केवल कांग्रेस ने आत्म निरीक्षण किया और पाया की असाधारण पराजय के बाद भी कांग्रेस का नेतृत्व गांधी परिवार का ही कोई व्यक्ति कर सकता है, इसलिए राहुल की हार्दिक अनिच्छा के बावजूद भी उसका लगातार यह दोहराना कि उसके पास राहुल गांधी से अधिक योग्य कोई नहीं है, गलत नहीं है। पार्टी भी इस बात पर उतनी ही मुस्तैदी से डटी हुई है कि राहुल गांधी को अध्यक्ष पद पर रहना ही होगा । कांग्रेस ने इतने लंबे समय से जिस संस्कृति को बढ़ावा दिया है उसके कारण राजवंश के सभी दोष उसमें घर कर गए है। इस तरह पराजय ने पूरे संगठन के आत्मबल को नष्ट कर दिया है।

कांग्रेस का बचा रहना आज की परिस्थितियों में जितना जरूरी हो गया है, उतना पहले कभी नहीं था, क्योंकि आज से बीस साल पहले माकपा के सीमांत क्षेत्रों तक सिमटे रहने के बाद भी यह खुशखयाली पाली जा सकती थी कि वह एक प्रभावी विपक्ष की भूमिका का निर्वाह कर सकती है। उसके पास एक विजन था, जिसको लेकर उसके केंद्र में आने के सपने पाले जा सकते थे। आज उसकी दशा क्षेत्रीय दलों से भी बुरी है जिनके पास न विजन है, न दर्शन, न चरित्रबल, न मनोबल। लोकतंत्र के हित में है कि भले लंबे समय तक सत्ता किसी एक दल के पास रहे – लंबी योजनाओं के पूरा करने के लिए यह जरूरी भी है – परंतु एक प्रभावशाली विपक्ष लगातार उपस्थित रहना चाहिए जो अंकुश का काम करता है, और सत्ता को मतवाले हाथी की भूमिका में जाने से रोकता है।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने विपक्ष को पनपने ही नहीं दिया, इसलिए बंगाल में उसकी हार नहीं हुई, वह एक साथ ओझल हो गई। कांग्रेस के साथ भी यह दोष भले रहा हो परंतु उसने पूरे इतिहास में गैर लोकतांत्रिक हथकंडों का प्रयोग करके भिन्न विचारधारा के लोगों को जनप्रतिनिधि बनने में यदा कदा ही रुकावट डाली । धनबल का प्रयोग करने से बची रहती तो कांग्रेस अनेक दूसरी व्याधियों से ही बची रह सकी होती।

मुझे शिकायत इस बात की है कांग्रेस ने चिंतन किया ही नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष में चिंतन और आत्म चिंतन की योग्यता नहीं। उन्होंने केवल दोषारोपण किया, जबकि वह दोष दूसरों में उनके ही परिवार के कारण पैदा हुआ, और जैसा कि मुहावरा है सूप तो हंस सकता है, छलनी नहीं हंस सकती, जिसमें हजारों छेद हैं।

आत्ममंथन के मुद्दे निम्न प्रकार हो सकते थेः
1. क्या पिछले 5 वर्षों में उसने विपक्ष में रहते हुए एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका का निर्वाह किया? संसदीय कार्य में बाधा डालकर शोर मचाते हुए बिना सोचे समझे हर मुद्दे पर हंगामा करके इतने शक्तिशाली बहुमत वाली सरकार को विफल करने की नीति का जनता में क्या संदेश गया होगा और उसका निर्वाचन पर क्या असर पड़ा हो सकता है?

2. हिंदू कार्ड खेल कर, अपने को सच्चा ब्राह्मण सिद्ध करते हुए यदि कोई ईसाई यह सोचे कि उसे इसका लाभ मिलेगा, तो इतिहास पर ध्यान देना चाहिए। बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने का मामला हो या हिंदू बहुमत को अपनी ओर मोड़ने के लिए अपनाए गए दूसरे हथकंडे रहे हो उनका लाभ उस संगठन को मिला है जो हिंदू पहचान के साथ अपनी राजनीति करता रहा।

3, यह दल लंबे अरसे तक मुसलमानों में असुरक्षा की भावना पैदा करके उनको अपने वोट बैंक के रूप में काम में लाता रहा है। जब भी कांग्रेस ने हिंदू कार्ड खेला, एक ओर तो उसने अपनी विश्वसनीयता खोई, साथ ही उस वोटबैंक को किसी न किसी की ओर भागने को मजबूर किया। राजनीति में निस्पृहता, विश्वसनीयता, और सिद्धांतप्रियता ऐसी निधियां हैं जिनको खोने वाला लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। इसे कैसे और क्या कीमत देकर दुबारा पाया जा सकता है. यह विचारणीय था।

4, पिछले 5 वर्षों में अनेक ऐसी अराजक घटनाएं पर्दे के पीछे रहकर कराई गई जिनमें सीधे किसी का नाम लिया नहीं जा सकता, परंतु यह संदेह किया जा सकता कि प्रशासन की विफलता प्रमाणित करने के लिए उनको सुनियोजित ढंग से कराया जा रहा था, जिससे राष्ट्रीय जन धन की भारी क्षति हुई, और मतदाताओं का बहुत छोटा सा हिस्सा मानता था इसमें उस गुप्त मंत्रणा का प्रयोग किया जा रहा है जिसके प्रशिक्षण के लिए राहुल को अज्ञातवास करना पड़ता था। विचारणीय था कि क्या आगे भी यह नीति जारी रहनी चाहिए?

6. कांग्रेस के पास काडर कभी न था, सत्ता से निकटता कायम करके कुछ न कुछ हासिल करने वाले समर्थकों की भीड़ अवश्य थी। उसके सत्ता से हटते ही उसका उत्साह ठंढा पड़ जाता है। कांग्रेस शासन के केंद्र से चले रुपये के पचासी पैसे को यही हजम करता था। समर्थकों की भीड़ जुटाने के लिए उस तक कुछ न कुछ पहुंचाने का कोई नया तरीका निकाला जाना चाहिए। अब तो सीधे बैंक खाते में पैसा भेजने का रास्ता निकल आने के बाद सत्ता थमा दी जाए ताे भी उसे कुछ न मिलेगा। वही कांग्रेस का जनाधार है। जनाधार तैयार करने का क्या तरीका हो सकता है?

7.अंतिम समस्या मुद्दों की है। अब कोई मुद्दा ऐसा बचा ही नही जिसे वह अपना कह सके। राजीव गांधी ने सैम पित्रोदा की मदद से आधुनिकीकरण का एक मुद्दा अपने लिए पैदा किया था। कांग्रेस के सभी मुद्दों पर जिन पर वह काम भी नहीं कर पाई, भाजपा बढ़-चढ़कर नए विजन के साथ काम कर रही है। ऐसी ही स्थिति में भारतीय भाषाओं के व्यवहार को मुद्दा बनाया जा सकता था परंतु सोनिया गांधी की रुचि भारत से अधिक अपने मजहब को आगे बढ़ाने में है जिसके साथ अंग्रेजी का गहरा संबंध है, इसलिए वह मुद्दा भी उसके काम नहीं आ सकता। नया मुद्दा क्या हो सकता है इस पर उसके सिद्धांतकारों के विचार करना चाहिए था ।

8. हार की जिम्मेदारी लेते हुए त्यागपत्र देने का जो सिलसिला शुरू हुआ है वह कुछ ऐसा लगता है जैस ईंट दर ईंट टूट कर बिखर रही हो। सबसे पहली समस्या इसको रोकने की है, इसके तरीके पर विचार किया जाना चाहिए।

वंशवाद भले व्याधि हो । आज के भारत में कांग्रेस की देश को जरूरत है। पहली जरूरत जो भी संख्या बल है उसको लेकर बहुत जिम्मेदार विरोधी पक्ष के रूप में अपनी भूमिका तय करने की है। लड़कपन के सारे प्रयोग हो गए। परिपक्वता का दर्शन होना चाहिए।

Post – 2019-05-26

#नया_आपातकाल और #युगान्तर

मैं नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की विजय से इसलिए भी प्रसन्न हूँ कि इससे मेरे पूर्वानुमानों की पुष्टि हुई है। आज से 4 साल से भी पहले से मैं मोदी को भारत का सबसे योग्य नेता मानता था। इतिहास की समझ रखने वाले (उनका इतिहासकार होना जरूरी नहीं), वर्तमान में, अपने समय से आगे की बातें करते हैं, लोगों को इसे समझने में कठिनाई होती है। अपनी उतनी ही पुरानी एक पोस्ट में मैंने इतिहास की समझ रखने वाले को ‘त्रिकालदर्शी’ कहा था परन्तु इस दुर्भाग्य पर खेद जताया था कि हमारे बीच इतिहासकार हैं ही नहीं।

1
मोदी के महत्व को रेखांकित करते हुए 11,2. 2015 फेसबुक पोस्ट में, संवाद शैली मैं जो कुछ लिखा था उसकी कुछ पंक्तियां निम्न प्रकार हैंः

“पहले इस कटु सत्य को समझो कि मोदी एक विषेष ऐतिहासिक परिस्थिति की उपज है। इतिहास पुरुष है। उसे भारतीय जन समाज ने 2013 में तानाशाह के रूप में…”
“2013 में नहीं, 2014 में और तानाशाह के रूप में नहीं, प्रधानमन्त्री के रूप में। तानाशाह वह खुद बनना चाहता है। जब तुम इतनी मामूली बातें भी नहीं समझ पाते तो …”
मैंने उसे वाक्य पूरा करने ही नहीं दिया, “2014 में निर्वाचन हुआ और जनता पार्टी जीती। जनता ने तो 2013 में ही उपलब्ध तानाशाहों में से किसी एक को चुनना आरंभ कर दिया था – अडवानी को इतने नम्बर, राहुल को इतने, सोनिया को इतने, नीतीश को इतने और मोदी को इ-त-ने। एक बार नहीं, बार बार मोदी को इ-त-ने नम्बर मिलते रहे। जब किसी एक व्यक्ति को केन्द्र में रख कर पूरा चुनाव हो तो जीत या हार किसी दल की नहीं होती, तानाशाह की होती है।
“जनता का विश्वास कांग्रेस के कारनामों के कारण लोकतन्त्र से उठ गया था। वह तानाशाह चुन रही थी और मोदी को चुन लिया था। कर्मकांड 2014 में पूरा हुआ। कांग्रेस 2013 में मान चुकी थी कि वह हार गई और जल्दी जल्दी जो जर जमीन हथियाया जा सकता था उसे हथियाने पर जुट गई थी फिर भी एक आखिरी बाज़ी उसने लगाई, सबको भोजन का अधिकार. समाज ने समझा ‘सब कुछ खा जाने का अधिकार.’ उसने कांग्रेस को यह बता दिया कि देश-हित तुम्हारी प्राथमिकता नही. उसने उसे हराया नहीं धक्के देकर बाहर कर दिया, यह देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है परन्तु इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है?”
अकेली ऎसी पार्टी जिसका देशव्यापी जनाधार था, जो ही विकल्प बन सकती थी, उसने अपना नैतिक औचित्य खो दिया. वह हारी नही. लोकतंत्र में हार-जीत होती रहती है. कांग्रेस का सफाया हो गया … इस बार कांग्रेस हारी नही है, अपनी भ्रष्टता के कारण अपना नैतिक अधिकार खोकर धंस गई है और अब नेहरू परिवार से बाहर आकर भी अपने मलबे संभाल नही सकती. दुखद स्थिति है, पर है. क्या किया जा सकता है.
इसमें आशा की किरण एक ही है कि लोगों ने भले तानाशाह चुना हो, इस व्यक्ति को लोकतंत्र में इतना अडिग विश्वास है कि यह अपना विकल्प स्वयं पैदा करेगा. पर वह विकल्प या विपक्ष विकास की नीतियों से संचालित होगा, जाति और धर्म से नही.
“और जानते हो यह भी मोदी के कारण नही होगा, इतिहास के कारण होगा. पूंजीवादी विकास के कारण होगा. तानाशाही पूंजीवाद को रास नही आती. तानाशाही मध्यकालीन मनोवृत्ति है. मोदी को इसकी समझ है दूसरों को नही. वह बार बार इसकी याद दिलाते हैं कि यह लोकतंत्र की महिमा है कि एक चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री बन गया. यह भारत में उभरते पूंजीवादी दबाव की भी महिमा है या नहीं?
“जनता ने भले तानाशाह चुना हो वह तानाशाह लोकतान्त्रिक बने रहने कि लिए संघर्ष कर रहा है, दुश्मनो और सगों दोनों से एक साथ लड़ता हुआ.”
11/2/2015

2
अगले दिन की पोस्ट के कुछ अंश निम्न प्रकार थेः
त्रिकालदर्शी

“तुम एक दिन कह रहे थे, ‘इतिहासकार त्रिकालदर्शी होता है. ऋषि हो जाता है’. कहा था या नही?”
“कहा तो था.”
“आज भी मानते हो?”
“न मानने का कोई कारण नहीं.”
“तो यह देखो इतिहासकार क्या कहते है?” उसने हिन्दू का सम्पादकीय और समाचार वृत्त मेरे सामने कर दिया. …
अख़बार मेरे सामने पटकते हुए कहा, “देखो ये इतिहासकार क्या कहते है?”

मैंने पूछा ” इनमें इतिहासकार कौन है?”
वह हंसने लगा, “अब ऊँट आया पहाड़ के नीचे. मैं बताऊंगा ये कौन हैं?”
“बड़े लोग हैं, मैं भी जानता हूँ. पर इनमे इतिहासकार कौन है?” मैंने फिर दुहराया.
“तुम सीधे कहो कि ये इतिहासकार नही हैं.”
“यही तो कह रहा हूँ. और यह मैं नहीं कहता, ये बेचारे खुद कहते हैं कि ये धंधेबाज इतिहासकार हैं, प्रोफेशनल हिस्टोरियन. कहते हैं या नहीं?”
“कहते हैं. कहते इसलिए हैं कि ज़िंदगी भर इतिहास ही पढ़ाया है. प्रोफेसर रहे है हिस्ट्री के.”
“तो यह कहो कि इतिहास पढ़ाते रहे हैं. इतिहासकार क्यों कह दिया. जो आदमी ज़िन्दगी भर हिंदी साहित्य पढ़ाता रहा हो उसे साहित्यकार, आलोचक मान लोगे? जो फलसफा पढ़ाता रहा हो उसे फिलॉसफर मान लोगे. हद करते हो यार!”
“फिर तुम्ही बताओ कौन है इतिहासकार?”
“दूर-दूर तह कोई दिखाई नही देता. जो है उसे मैं खुद नहीं देख पाता. नाम लेना शिष्टाचार के विरुद्ध है, पर तुम देखना चाहो तो देख सकते हो.” …

“ये इतिहास के तथ्यों से अवगत हैं परन्तु उनका उपयोग ईमानदारी से नही करते. इसका असर समझ पर पड़ता है. …वकीलों जैसी स्थिति है. सत्य और न्याय की रक्षा नहीं, जीत एकमात्र कसौटी है. लफ़्फ़ाज़ी और आत्मविज्ञापन पर अधिक भरोसा करते हैं.
“सत्ता से जुड़े लोग, चाहे वह राजसत्ता हो या धर्मसत्ता, सफलता चाहते हैं, सत्य की प्रतिष्ठा नहीं. वे पक्षधर होते हैं, अतः समदर्शी और तत्वदर्शी नहीं हो सकते. … पक्षधर लोग तत्वद्रष्टा नही हो सकते. इतिहासकार जैसा कि तुमने याद रखा ऋषि होता है. दार्शनिक होता है वह. पूरी दुनिया में ऐसे द्रष्टा लम्बे समय बाद ही मिलते हैं. हम केवल यही कर सकते हैं कि निष्पक्ष होकर विचार करें और गलतियों का आभास मिलते ही उन्हें सुधार लें. इतिहासकार कहलाने के लिए इतना भी पर्याप्त है, परन्तु ये ऐसा नहीं करते.”…
“थोड़ा ठहर कर मैंने पूछा, “जानते हो, किसी भी अन्य शाखा का कोई विद्वान अपने को पेशेवर (पेशेवर समाजशास्त्री, पेशेवर अर्थशास्त्री आदि) नहीं कहता. पहले ये भी नही कहते थे. इन्होने अपने को पेशेवर इतिहासकार कब से और क्यों लिखना आरम्भ किया?”
वह नहीं जानता था. मैने बताया “1987 से.” …
“…ऐसे लोगों को तुम इतिहासकार कह सकते हो? ये इतिहास का पेशा करने वाले लोग हैं. इतिहासकार के पास दृष्टि होती है इनके पास कुर्सी रही है.”
“लेकिन एक बात तो मानोगे. अध्यापक बहुत अच्छे हैं”.
“वाक्कुशल हैं. अपनी बातों से मुग्ध कर देते हैं. अपनी गलत बातों को इस तरह रख लेते हैं की सुनने वाले को लगे यही सही है. पर अपने छात्रों को जान बूझ कर गलत इतिहास पढ़ाने वालों को अच्छा अध्यापक कह सकते हो? ये तो इतिहास के चार्ल्स शोभराज हैं. मशहूर वह भी कम नहीं है मगर वह अपनी सही जगह पर है, ये गलत जगह पर.
तुम कहोगे साहित्य और कला के भी चार्ल्स शोभराज होते है.
मैंने कहा, “तुम्हारे मुंह घी शक्कर!”
3.11.15
3
परंतु मैंने ये अंश अपनी दूरदर्शिता प्रमाणित करने के लिए नहीं अपितु इस तथ्य को रेखांकित करने के लिए कह रहा हूं कि
1. बुद्धिजीवियों के लगातार राजनीतीकरण के कारण वस्तुपरक चिंतन का इतना अभाव हो चला है कि सोचने का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है। सोचना मानने का पर्याय बन गया है। लोग बहुत लंबे सोच विचार के बाद उसी नतीजे पर पहुंच जाते हैं जिसे गलत मान कर सोचना विचारना आरंभ किया था। हाल की अकल्पनीय पराजय, जिसकी घोषणा मैंने महागठबंधन के समय ही कर दी थी, के बाद राजनीतिक दलों का आत्मचिंतन ही नहीं, बुद्धिजीवियों का भी आत्म चिंतन भी इसी का प्रमाण है। बुद्धिहीनता का बुद्धिजीवियों के भीतर ही संस्थाबद्ध हो जाना बौद्धिक आपातकाल है, जिसमें बोलने की आजादी तो इतनी है कि बुद्धिजीवी गालियों के नए मुहावरे अविष्कार करते और प्रयोग में लाते रहते हैं, और मान लेते हैं कि सोच रहे हैं।
2. कि केवल कांग्रेस ही नहीं सभी दल क्षरण और संभावित लोप की दिशा में बढ़ रहे हैं। उनके लोप का कारण उनकी सिद्धांतहीनता, या जिन सिद्धांतों के दावे वे करते रहे हैं उससे इतना भटक जाना है कि अब वापसी का रास्ता बंद हो गया। यदि प्रभावशाली विपक्ष ही समाप्त हो जाए, तो लोकतंत्र लोक निर्वाचित प्रतिनिधियों के बल पर जीवित नहीं रह सकता। तानाशाही अपनी संज्ञा से आए या विपक्ष की विकल्पहीनता के कारण, उसका आना अनिवार्य है।
3. कि राष्ट्रवाद स्वयं में कोई सिद्धांत नहीं है, और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसे राष्ट्रवाद मानता रहा है वह हिंदू राष्ट्रवाद रहा है। हिंदू की जितनी भी उदार व्याख्या की जाए, जातीयता राष्ट्रीयता नहीं हो सकती। यह उसी व्याधि का विस्तार है जिसमें सबसे पहले सैयद अहमद खान ने मुसलमानों को अलग कौम या राष्ट्र कहा था। राष्ट्रीयता केवल देशज हो सकती है उसी में सर्वसमावेशी भाव संभव है और उस संकीर्णता से भी मुक्ति है जो यूरोपीय राष्ट्रवाद में पाई जाती है और हिंदू राष्ट्रवाद में अपना ली गई थी।
4. कि मोदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को भारतीयता से, पूजा को स्वच्छता से, मंदिरवादियों को आर्थिक नीतिकारों से, जाति, क्षेत्र, मत मतांतरों को सर्वसमावेशी राष्ट्रीयता से जोड़कर, पहचान के संकीर्ण दायरो को तोड़ कर भारत के नागरिक की पहचान दी, जो पुरानी सोच के लोगों को इतना अविश्वसनीय लगता है कि वे आज भी इसे एक छलावा मानते हैं जबकि इसे व्यावहारिक रूप दिया जा चुका है, और जो बचा है उसकी प्रतिज्ञा नरेंद्र मोदी के नए ‘सबका विश्वास’ प्राप्त करने के संकल्प में है।
5. अभी कल तक लोग सिंगापुर मॉडल की बात करते थे, फिर गुजरात माडल की बात करने लगे। आने वाले कल को हमारे आसपास के सभी देश और दूर-दराज के भी कुछ देश मोदी द्वारा कायाकल्प किए जाने वाले भारत के मॉडल की बात करेंगे।

परंतु मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अंग्रेजी को एक जरूरी विदेशी भाषा के रूप में प्रश्रय देना और व्यवहार की भाषा के रूप में बाहर करके भारतीय भाषाओं को शिक्षा से लेकर प्रशासन तक की भाषा बनाना, जिसके साथ जनवाद का एक नया अध्याय आरंभ हो सकता है। मात्र इस परिवर्तन सेः
मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़ै गिरिवर गहन।

यही वह मुद्दा है जिसमें मोदी की विफलता के साथ आसन्न भविष्य में भाजपा का विकल्प तैयार किया और भारतीय जन को लामबंद किया जा सकता है।

Post – 2019-05-25

हँसो यह जानकर, हँसने का अपना व्याकरण भी है।
हुआ कारक गलत तो लानतों में डूब जाओगे।

Post – 2019-05-25

जब भी मैं तुझको याद करता हूं
तू ही, बस तू ही, याद आता है।
जब भी मैं तुझको भूल जाता हूं
अपना होना भी भूल जाता है।।

Post – 2019-05-24

हितोपदेश

पंचतंत्र को जिस दूसरे नाम से जाना जाता है वह है हितोपदेश। परंतु उसी हितोपदेश में एक कहानी बया और बंदर की आती है, जिसका सार सत्य है कि हारे हुए व्यक्ति या जुआड़ी को उसके हित के लिए उपदेश या सलाह नहीं देनी चाहिए। इससे वह अपमानित अनुभव करता है। नसीहत बहुत छोटी हैसियत के व्यक्ति द्वारा दी गई हो तो अपमान का यह बोध और अधिक प्रखर हो जाया करता है। सुधरने की जगह वह, अपनी गलती को अधिक हठपूर्वक दुहराता ही नहीं है, नसीहत देने वाले का सर्वनाश करते हुए अपने ‘ स्वाभिमान’ की रक्षा करना चाहता है।

इस शिक्षाप्रद कहानी का सारतत्व यह है कि ऐसे आदमी को उसकी विफलता के बाद सलाह मत दो जो अपने को तुमसे समझदार समझता है और अपनी इज्जत बचाने के लिए अपने को बर्बाद करने का खतरा मोल लेते हुए भी तुम्हें अवश्य बर्बाद कर देगा पर अपने से छोटे से सीखने को तैयार न होगा।

सूक्तियों से कितने लोगों ने सीखा है? वे ज्ञान बघारने के लिए होती हैं, सीखने के लिए नहीं होतीं, इसलिए पंचतंत्र की कहानियों का अनुवाद करने का दावा करते हुए भी मैंने उससे आज तक कुछ नहीं सीखा। अपने को समझा लिया कि जब हमारे देश के किसी आदमी ने पंचतंत्र की कहानियों से कुछ नहीं सीखा, तो मैं उनसे नसीहत लेकर अपनी परंपरा का उल्लंघन नहीं कर सकता।

साथ में यह दुर्बुद्धि पैदा हो जाती है कि तुम्हारा कोई साथी जिसे तुमने बार बार सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न किया हो, अपनी आदत के कारण ऐसी अवस्था में पड़ जाए जिसमें उसका सर्वनाश अवश्यंभावी हो तो क्या तुम इस बात का ख्याल करते हुए कि सुरक्षा इसी बात में है कि इसे कोई नसीहत न दी जाए, किनारा कस लोगे? मेरा उत्तर होता है, नहीं। मैं अपने जीते जी उसका सर्वनाश होने नहीं दूंगा, और मैं कहानी की शिक्षा भूल जाता हूं।

मैं अकेला ऐसा नादान नहीं हूं। अपनी जान का खतरा उठाते हुए भी दूसरों को, यहां तक कि अपरिचितों को भी बचाने की कोशिश करने वाले हितोपदेश की चिंता नहीं करते। इसे उनके भीतर काम करने वाली आत्मघाती प्रवृत्ति के अलावा क्या कह सकते हैं।

मैं जानता हूं हिंदी जगत में ही नहीं पूरे भारतवर्ष में बुद्धिजीवियों की जमात हो या ना हो, आत्मघातियों की एक जमात जरूर है जो दूसरों को होश हवास से काम लेने की नसीहत देती रहती है और स्वयं जज्बात से काम लेती है। बुद्धि और आवेग में कौन प्रबल है, कौन अधिक सही है, यह निर्णय करना जिंदगी में आसान नहीं हुआ करता।

मुझे अपनी नसीहत के कारण उसी शत्रु भाव से देखा गया जैसे कहानी के बंदर ने बया को देखा होगा। हर बार मुझे उपेक्षा और तिरस्कार का बोध होता रहा। यह मूल्य देने को तैयार था। परंतु जिन को समझाना चाहता था उनको समझाने में सफल नहीं हुआ। उन्होंने लगातार वही रास्ता अपनाया जिसके विषय में आज से 30 साल पहले मैंने चेतावनी दी थी कि आपका यह रवैया आप को कहीं का न छोड़ेगा। यदि उनका हठ , उनके निर्णय, उनकी प्रगति में सहायक होते, उनकी योजनाओं को सार्थक बनाते तो मैं उनसे सीखने के लिए उपस्थित हो जाता। ऐसा क्या है कि लगातार वे ही गलतियां करते रहे हैं जिनके परिणाम उनको लगातार भोगते रहना पड़ा और मेरी भविष्यवाणियां हर बार सही साबित हुईं?

मैं जानता हूं कि अपने पिछले इतिहास के कुछ दाग होते हैं जिन्हें किसी समाज को अपने अपने हिस्से के अनुसार धोना पड़ता है। जाति धर्म आदि के संकरे दायरे में काम करने वाले समग्र समाज को कितने रूपों में कितनी बार क्षति पहुंचा चुके हैं कि यदि वे उनसे बचना भी चाहें तो उनके लिए इस बात का सबूत दे पाना कठिन होता है कि वे राजनीतिक लाभ के लिए झांसा नहीं दे रहे हैं, सचमुच यह समझ चुके हैं कि उनके पूर्वजों ने गलत रास्ता अपनाया था और अब वे उन्हें दुहराना नहीं चाहते।

इस आश्वासन पर संदेह करने का लाभ उन टिप्पणीकारों को मिल सकता है जो भारतीय जनता पार्टी के सभी दावों, आश्वासनों यहां तक कि कार्यों पर संदेह करते रहे हैं।

परंतु उन्हें घेर घेर कर उसी चारदीवारी में हांक कर कैद करना, सांप्रदायिक भेद रेखा को हर कीमत पर केंद्रीय बनाए रखना अधिक बड़ा अपराध है।

सच तो यह है अपने को उदार, सर्व समावेशी सिद्ध करने का प्रयत्न करने वालों के संसार में उनके लिए भी जगह नहीं है जिन्होंने सबको आज तक अपना बनाकर रखने का प्रयत्न किया है और उनके लिए खुली जगह है जो अपने को अलग रखने के लिए भाषाई, क्षेत्रीय और सांप्रदायिक दीवारें खड़ी करते रहे हैं।

एक दुर्भाग्यपूर्ण सचाई यह है कि जिनको आप संकीर्ण और सांप्रदायिक कहते हैं, उनके पास विकास की योजना है, सबको साथ लेकर चलने का आश्वासन है, उन्होंने बिना किसी भेदभाव के अपनी सभी योजनाओं का लाभ सभी भारतीय नागरिकों को दिया है, वे भारत को राष्ट्र मानते हुए इसके प्रत्येक निवासी को इसका नागरिक मानते हुए उनके हितों के लिए लगातार चिंतित रहे हैं फिर भी उनको लांछित करने के अतिरिक्त आपके पास यदि कोई कार्यक्रम है तो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सांप्रदायिकता की खेती करना है।

सांप्रदायिक कौन है इसकी पहचान भारतीय नागरिकों को जितनी तेजी से हुई है, उसी अनुपात में आपको अपने अस्तित्व की रक्षा का संकट उग्र से उग्रतर होता दिखाई दे रहा है।

हैरानी इस बात पर भी होती है कि बुद्धिजीवी होने का दावा करने वाले लगातार घृणा प्रचार को अपना सबसे प्रभावशाली हथियार मानते आ रहे हैं, लगातार एक ही बात दुहराते रहने पर लोग किसी भी झूठ को भी सच मान लेते हैं, यह नाजियों का हथियार उनका एकमात्र हथियार बचा रह गया है।

सोचकर पीड़ा होती है। यदि ज्ञान और समझ है तो उसे सामने आना चाहिए। नफरत के लिए ज्ञान की जरूरत नहीं होती और भारत के नागरिकों को इतना ज्ञान अशिक्षित रहने के बाद भी है कि किसी भी बहाने से दूसरों से घृणा करने वाले मनोरोगी होते हैं। इनसे दूर रहना चाहिए। इनकी संगत में यह बीमारी किसी को भी लग सकती है। भारतीय जन ने अपनी रक्षा के लिए ऐसी सोच के लोगों से दूरी बनाकर रहने की समझ पैदा की है, जैसे मच्छरदानी लगा कर लोग मलेरिया के प्रकोप से अपने को बचाने का इंतजाम करते हैं।

जरूरत अफवाहों से बचने और तार्किक आलोचना प्रत्यालोचना की है जिसमें दूसरों को समझाया और अपनी गलतियों से बचा जा सके और देश की जनता से संवाद स्थापित किया जा सके न कि टूटे हुए हथियार संभालते हुए यह दुहराने की कि हम हार कर भागने वाले नहीं हैं। इस इरादे के साथ नए हथियार तो तैयार करें।

Post – 2019-05-23

#साहित्यकार_का_स्वाभिमान और इतिहासकार का दायित्व

बुद्धिजीवी की कोई एक भूमिका नहीं होती – शिक्षक और पत्रकार के रूप उसकी एक भूमिका होती है जिसमें उसका काम जानकारी देना होता है। कलाकार के रूप में वह अन्य बातों के साथ अपने समय के चरित्रों को चित्रित, अभिनीत या मूर्ति कर सकता है। संगीतकार और साहित्यकार के रूप में उसके क्षेत्र की स्वायत्तता इतनी पवित्र होती है कि अपनी भावनाओं को छोड़कर किसी के सम्मुख न झुक सकता है न उसकी प्रशस्ति कर सकता है । ऐसा करते ही वह बंदी जनों की कतार में खड़ा हो जाएगा । एक समय था, जब ईश्वर और देवताओं को छोड़कर किसी अन्य का गुणगान किया ही नहीं जा सकता था। देवताओं के समकक्ष इतिहासपुरुष या युग नायक भी हुआ करते थे। उन्हें यह महिमा जनता प्रदान करती थी जिसके गायन, कथन आदि से उसकी छवि उत्तरोत्तर ऊपर उठती हुई देवोपम हो जाया करती थी। सौंदर्य चेतना के विकास के साथ दुखी और अन्याय और अत्याचार के शिकार मनुष्य को वही महत्त्व प्राप्त हो गया जो देवताओं और जननायकों को प्राप्त था।

इतिहासकार की भूमिका और दायित्व इन सभी से अलग है। उसके लिए ऐसी कोई भी परिघटना जो हमारे सामाजिक, आर्थिक और आत्मिक जगत को बड़े पैमाने पर आंदोलित करता या बदलती है, वह भली हो या बुरी, कल्याणकारी हो या अनिष्टकारी; मनुष्य द्वारा, मनुष्यों के दल के द्वारा की गयी हो या प्राकृतिक कारणों से घटित हुई हो, या अकर्मण्यता, भ्रष्टता या विलासिता से उत्पन्न शून्य के कारण अपरिहार्य हो गयी हो। इतिहासकार के लिए घटना या क्रिया, और कारक (जीवन और व्याकरण दोनों में छह कारक होते है) और परिणाम का महत्त्व होता है, नैतिक मूल्यों के लिए उसके क्षेत्र में जगह नहीं होती। वह वर्णन करता है, मूल्यांकन नहीं करता।

मैं फेसबुक पर सामान्यतः इतिहासकार के रूप में उपस्थित रहता हूं । इसके बाद भी मैं जिस बिरादरी का सदस्य हूं वह बुद्धिजीवियों की साझी बिरादरी है, जिसका एक साझा स्वायत्तता का क्षेत्र है, जिसमें वह अपने अधिकारों की मांग करता है और किसी की दखलंदाजी का विरोध करता है, जिसके भीतर स्वायत्तता के कई उपक्षेत्र हैं, जिनकी न तो इन क्षेत्रों के लोगों को स्पष्ट समझ है, न उनका सम्मान करते हैं। समझ के स्तर पर भारतीय बुद्धिजीवियों में गिरावट इतनी जाहिर है कि बुद्धिजीवी अपने को सही साबित करने के लिए अनुभव और दृष्टिकोण की बात नहीं करते, सूक्तियां दोहराते हैं जो यदा कदा देसी पर सामान्यतः विदेशी होती हैं और उन पर सही उतरने का प्रयत्न करते हैं। सोचने समझने से इससे इतना आराम मिल गया है कि हासिल करने को ख्याति ही बची रहती है।

साहित्य क्या है ? समाज का दर्पण है। प्रेमचंद ने कहा था तो गलत कैसे हो सकता है ! साहित्यकार क्या है? राजनीति के आगे चलने वाला मशाल है। साहित्यकार क्या होता है? वह प्रगतिशील होता है।

ये विचार वह कहां प्रकट कर रहे थे? 1936 के पहले प्रगतिशील सम्मेलन के अवसर पर। क्या वह पहले से प्रगतिशील संघ के सदस्य थे? नहीं। प्रगतिशील संघ क्या था, समाजवादी या साम्यवादी सोच के साहित्यकारों का जमघट। अपनी प्रतिष्ठा के लिए प्रगतिशील संघ से जुड़े हुए लोगों के आग्रह पर वह उसमें शामिल होने के लिए तैयार हो गए और वह भाषण दिया। प्रगतिशील लेखक लेखक संघ के संयोजकों का लक्ष्य था प्रेमचंद को समाजवादी और साम्यवादी राजनीति का हिस्सा बनाना। इसका वे लगातार लाभ उठाते रहे और यह सिद्ध करते रहे कि प्रेमचंद ने अपनी बौद्धिक विकास यात्रा के अंतिम चरण पर साम्यवाद को स्वीकार कर लिया था। उनके उक्त कथन को इसका प्रमाण बनाया जाता है।

प्रेमचंद के जुमले हमारी सोच समझ की समस्याओं का बेड़ा पार कर देते हैं। प्रेमचंद के कथन निठल्ले मार्क्सवादियों के लिए नजर का काम नहीं करते, नजीरो का काम करते हैं। ऐसी उक्तियों का संग्रह कर दिया जाए तो वह गुटका प्रगतिशील साहित्यकारों का कुरान बन जाए। दिमागी ठहराव का ऐसा नमूना कहीं नहीं मिलेगा जैसा प्रगतिवादी सोच विचार में देखने में आता है । प्रगतिशील भारतीय लोकतंत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता की बात रखते हैं और अपने संगठनों में सोचने तक की स्वतंत्रता को सहन नहीं कर पाते। हम इसके लिए उनको दोष नहीं देते । संगठनों की मजबूरियां हुआ करती हैं परंतु या तो स्वीकार करना ही होगा कि बौद्धिक मामले में बंदी होते हैं। स्वतंत्रता को किन परिस्थितियों में, किन सीमाओं में, किन जिम्मेदारियों के साथ, किन कुर्बानियों के बाद प्राप्त किया जाता है इसका बोध भी उनके भीतर नहीं पाया जाता।

पहले हमें प्रेमचंद को समझना होगा, और फिर यह समझना होगा प्रेमचंद साहित्य के धर्म शास्त्र नहीं है। उन्होंने जो कुछ कहा उसके पीछे उनका चिंतन था और जिस रूप में कहा वह बिल्कुल सटीक हो पाया हो यह जरूरी नहीं। उदाहरण के लिए जैसे साहित्य से समाज ही गायब हो सामाजिक यथार्थ ही गायब हो तो वह साहित्य नहीं है। उन्होंने इसके लिए दर्पण का प्रयोग किया। दर्पण केवल दिखाता है दृष्टि नहीं देत। साहित्य दृष्टि भी देता है, दृश्य और परिदृश्य को बदलता भी है। वह एक साथ आईना भी होता है, सूक्ष्मदर्शी भी होता है और दूरबीन या दूरदर्शी होता है।

जब वह कह रहे थे साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल होता है तो राजनीतिज्ञों के सामने झुकने या उनके द्वारा सुझाए गए रास्ते पर चलने से इंकार कर रहे थे, जबकि प्रगतिशील लेखक संघ राजनीति के पीछे चलने की बात कर रहा था।

प्रेमचंद ने कहा कि साहित्यकार होता ही प्रगतिशील है तो वह कह रहे थे कि तुम उसकी प्रगतिशीलता को कम करके किसी राजनीति का बंधक बनाना चाहते हो। प्रेमचंद लेखक के लिए विचारधारा से जुड़े हुए बंधन का निषेध कर रहे थे।

भूमिका लंबी हो गई। स्वभाव की विवशता। परंतु इससे यह तो पता चल ही गया ही गया कि बौद्धिक आलस्य के कारण न तो हम सोच पा रहे हैं, न जिसे आप्त मान कर उद्धृत करते हैं, उसे देश काल, परिस्थिति और पृष्ठभूमि के संदर्भ में समझ ही पा रहे हैे। अपना काम करने की जगह जो कुछ दे सकते हैं उनके पीछे लगते हुए नारे लगाते हुए उसे पाने की आकांक्षा में उनके चाकर का काम कर रहे हैं, और इसकी क्षतिपूर्ति करने को मसीहाई अंदाज में बात भी कर रहे हैं ।##