Post – 2017-01-14

हिन्दुत्व के प्रति घृणा – 11

‘‘अजीब बात करते हो यार । पहले यह तो बताते कि यदि घृणा का यह कारोबार चार पांच हजार साल से या जैसा तुम कहते हो, उससे भी पहले से चला आ रहा है तो इस्लाम को अलग निशाना क्‍यों बनाया । हिन्‍दू हैं ही इसके काबिल । तुम तो
हिन्दुओं के प्रति मुसलमानों की घृणा को या मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं की घृणा का राजनीतिक उपयोग करना चाहते हो।’ सोचा संक्रान्ति की शुभकामना देने आया होगा और घर में घुसते और आसन ग्रहण करने से पहले ही उसने हमला कर दिया। जब तक बात दूसरे जनों तक थी वह पढ़ कर चुप रहा पर अब तो बात इस्लाम पर आ गई ! हद है, उसे यह दिन भी देखना था!

मैं हंसने लगा, ‘‘पहले आराम से बैठो तो सही । ठंढ इतनी अधिक है कि यह भी नहीं कह सकता कि ठंढा पानी पीकर अपना दिमाग ठंढा कर लो, चाय का पानी गर्म होने तक अपना दिमाग सन्तुलित करो फिर गर्मजोशी से बातें होगी! तब तक रेवड़ियां खाओ!’’

‘‘अपनी बात मनवाने के लिए रिश्‍वत दे रहे हो’’, उसने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं तो पहले ही इसके लिए तैयार हो कर आया था!’’

और कुछ देर बाद चाय की चुस्की के साथ पहल मैंने ही की, ‘‘यदि हम समझना चाहे कि हिन्दुओं के प्रति विदेशियों में पांच हजार साल पहले से चली आ रही घृणा और इस्लामी जुनून में हिन्दुओं के प्रति घृणा में क्या अन्तर है, तो कहना होगा, पहले घृणा करने वाले अपने पिछड़ेपन के बोध से क्षुब्ध थे। उनके पास सांस्कृतिक स्तर पर देने को कुछ नहीं था, भौतिक स्तर पर उनके संसाधनों का दोहन हो रहा था और उसमें उनकी सहायता या सेवा के बदले में कुछ लाभ हो रहा था, परन्तु देने को वह भी नहीं था। अपनी विवशता का यह बोध भी उन्हें क्षुब्ध करता था।

”वैदिक या भारतीय मूल्यों को अपनाना चाहने के बाद भी उनकी समकक्षता में न आ पाने की ग्लानि के कारण हीनता से बचने के लिए अपने दुर्गुणों को भी एक गुण बना कर उनमें उसके अभाव को रेखांकित करते हुए अपने को उनसे ऊंचा सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहे। अरस्तू ने ज्ञान और कौशल के क्षेत्र में एशियाइयों की श्रेष्ठता स्वीकार करते हुए जिस स्पिरिट की कमी को रेखांकित किया था और उसे यूरोप के लोगों की विशेषता बताया उसके लिए सही शब्द दबंगई या हेकड़ी है जो अनपढ़ों, गंवारों के भीतर शि‍क्षितों और संभ्रान्त जनों के प्रति पाई जाती है और जिसके लिए उत्तर भारत में जाट, अहीर, ठाकुर और भूमिहार बदनाम रहे है। शिक्षा, ज्ञान और संस्कारों के साथ इसमें कमी आ जाती है परन्तु जातीय दुर्गुणों पर गर्व करने वालों को इस पर काबू पाने में लंबा समय लगता है! कई बार तो इसमें शताब्दियां और सहस्राब्दियां लग जाती हैं फिर भी यह दूर नहीं होता क्योंकि यह अपनी विशिष्ट पहचान का हिस्सा बन चुका होता है।यह अपने आत्मबल को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है।

सच कहें तो पश्चिम की वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक अग्रता के समक्ष अपने दैन्य से क्षुब्ध हो कर अपनी अस्मिता को बचाने के लिए अध्यात्म की महिमा और आध्यात्मिकता को भारत की विषिष्ट उपलब्धि और भौतिकता से त्रस्त मानवता के उद्धार के एक मात्र विकल्प के रूप में इसे ही प्रस्तुत करते हुए हम स्वयं भी यही करते आए है। एक ओर पिछड़े रह जाने की पीड़ा से उत्पन्न हीनता, दूसरी ओर उनकी समकक्षता में आने की बेतहाशा कोशिश और तीसरी ओर किसी भी शर्त पर अपने अस्तित्व की रक्षा करने का प्रयत्न।

तात्विक दृष्टि से गलत होते हुए भी यह एक अनुशंसनीय काम है । इसमें अपने रक्षणीय को बचाने और इसके साथ ही पूरी छानबीन से दूसरों के अनुकरणीय और ग्राह्य तत्वों के ग्रहण से हम विकास के नाम पर वैविध्य को समाप्त करते हुए अपने को अधिकाधिक अरक्षणीय बनाने से बचे रहते हैं।’’

विस्तार से उसे डर लगता है। वह हां या ना में जवाब सुनने और देने का आदी है। समझने से भी डर इसलिए लगता है कि इसमें फंसने पर अपनी मान्यताओं या प्रतिश्रुतियों से विचलित होने की संभावना बनी रहती है। उसे हस्तक्षेप करना ही था, ‘‘अजीब गावदी हो, अनुकरणीय और ग्राह्य तत्वों का निषेध करते हुए जहालत में पड़े रहने को तुम एक दुर्लभ गुण और अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी शर्त मानते हो? तुम्हारी इसी तरह की बेवकूफियों की तलब ने तो मुझे खींच कर यहां पहुंचा दिया वर्ना यहां आना और नरक में पहुंचना दोनो बराबर।’’

‘‘नरक का रास्ता आसान होता है! उसके लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता ! पतन के लिए आयास नहीं करना होता, नरक के लिए साधना नहीं करनी होती सारे काम गुरुत्वाकर्षण कर देता है। केवल स्वर्ग में पहुंचना कठिन होता है, जैसे मेरे पास तक! पहुंचने के दोनों रास्तों में भीड़ इतनी कि कुछ रास्ते में ही दम तोड़ बैठते है और बाकी को यहां के दरवान घुसने नहीं देते ! असमायी वै स्वर्गो लोकः ! स्वर्ग में प्रवेश आसान नहीं ! तुम्हारा भाग्य है कि मेरे नाम के स्मरण से इसमें पहुंच गए!’’

कुछ बोलने की जगह वह ताली बजाने लगा!

मैं कुछ गंभीर हो गया, क्योंकि इस परिहास में विषय ही लुप्त हुआ जा रहा था, ‘‘देखो, यदि तुम समझते हो कि सर्वश्रेष्ठ जैसा कुछ होता है और उसे पाने के लिए हमें अपनी निजी विशेषताओं को छोड़ कर उसे ही ग्रहण कर लेना चाहिए और अपने को भूल जाना चाहिए, तो यह एक भ्रम है! सामान्यता की कसौटी पर सही उतरने वाला आदमी सबसे दयनीय मिलेगा, सबसे अधिक तनाव में। चलने के लिए रास्ते होते हैं, सर्वोपरि को तलवार की धार पर चलना होता है! इसलिए सर्वश्रेष्ठ का अनुकरण भी सांस्कृतिक आत्महत्या है! इससे जो इकहरापन पैदा होता है, वह लुढ़कता है तो फिर उठ नहीं पाता।

‘‘इसी तरह अपनी निजता की रक्षा के तकाजे से अपने दुर्गुणों तक को बचाने का समर्थन नहीं किया जा सकता । परन्तु एक बात तो यह कि गुण और दुर्गुण भी सापेक्ष्य होते हैं। एक परिस्थिति में जो दुर्गुण है वही दूसरे में गुण बन जाता है। वैविघ्य का बना रहना अधिक महत्वपूर्ण है।’’

उसे लगा मैं इस बहाने समग्रतवाद का विरोध कर रहा हूं, ‘‘हम इसी को बुद्धिजीवियों का ढुलमुलपन कहते हैं। वे मानवता के सबसे बड़े दुश्‍मनन है ! अपनी अपनी ढफली, अपना अपना राग! सर्वश्रेष्ठ खतरनाक है इसलिए निकृष्टता को जारी रखो। विविधता को बचाना कि कहीं एकरूपता न आ जाए। सभी समान न बन जाएं। यू पीपुल!’’ गुस्‍स्‍ेा में वह अंग्रेजी बोलने लगता है ।

मैं आवेष मे नहीं आया, ‘‘विविधता के दोष भी हैं गुण भी हैं। गुण अधिक हैं! हमने सर्वश्रेष्ठ की चिन्ता और सबको वैसा बनाने के उन्माद में उससे अधिक सत्यानाश किया जितना विविधता में संभव था। अपने से भिन्न को मिटा कर, या मिटाने के प्रयत्न में हम यह तक नहीं समझ पाते कि हम हैं क्या और हैं कहां। विविधता हमारे स्वभाव में ही है, प्रकृति में है, एकरूपता तो आद्य रूपों में पाया जाता है, परम तत्व में, एककोशीय जीवों में, अमीबा में, तुम्हारे जैसे मूर्खों में। विकास के साथ एकोऽहं बहुस्याम की प्रक्रिया काम करती है! बहु स्याम बहुधा स्याम की प्रक्रिया काम करती है। इसे एकरूपतावादी या एकपिंडीय सोच के लोग समझ नहीं पाते। एक आदर्श व्यवस्था में विविधता का लोप नहीं हो सकता, विविधता का समायोजन ऐसा होना चाहिए कि सभी अपनी उच्चतम संभावना तक पहुंच सकें।

‘‘एकान्विति मे, चाहे वह सर्वोत्तम के रूप में पेश की जाय, समग्र ऊर्जा एकदिश हो जाती है इसलिए वह बहुत शक्तिशा ली प्रतीत होता है, पर होता सबसे कमजोर है। एकचक्रा न वर्तते। एक पहिया चल नहीं पाता, संतुलन के लिए दूसरा पहिया तो होना ही चाहिए।

”सर्वोत्तम की तलाश ने ही तानाशाही, समग्रतावाद, फासिज्म, स्वच्छन्दता, निरंकुशता का रूप लिया और इसी कारण कुछ समय के लिए सबसे शक्तिशाली व्यवस्थाएं प्रतीत होती हैं, परन्तु ये अपने पहले नायक को लिए दिए उसके साथ ही अनगिन तबाहियां पैदा करके समाप्त हो जाती है। निर्णय के वैविध्य और शक्ति के इसी विकेन्द्रण के कारण लोकतन्त्र अपनी असंख्य कमियों के बाद भी बहुत सारे सदमे झेल लेता है!’’

‘‘सहस्रपाद गोजर की तरह !’’ उसने कटाक्ष किया !

मैंने उसकी ओर ध्या नही न दिया, ‘‘कुछ मतो और विश्‍वासों में अपने को सर्वश्रेष्ठ मान कर शेष को या तो अपने जैसा बनाने या उनको मिटाने का जुनून है । जब यह ईसाइयत में दिखाई देता है तो हम देख नहीं पाते। कहते हैं, अच्छा बनने में बुराई क्या है। यही जब इस्लाम में बुराई को भी अच्छाई बताने के क्रम मे सामने आता है तो यह दलील सुनने मे आती है कि इतने सामाजिक स्तरों को देखते हुए इसे अपनाने में क्या बुराई है। परन्तु इसी को जब हिटलर व्यावहारिक रूप देता है तो हम उसकी भर्त्‍सना तो करते हैं परन्तु इस श्रेष्ठतावाद की पूजा के परिणामों को नहीं समझ पाते!

‘‘हम, तुम्हारी मूर्खता से उस सवाल से ही हट गए जिसे तुमने इतने विश्‍वास से उठाया था। यह कि पुरातन, विदेशी जनों के भारत के प्रति आकर्षण और हिन्दुओं से घृणा और इस्लाम के बाद उन हिन्दुओं से मुसलमानों की घृणा का अन्तर क्या है।

”मैंने कहा पहला हिन्दुओं जैसा बनने, फिर भी न बन पाने के कारण उपजी हीनभावना की क्षतिपूर्ति वाली घृणा थी। वह केवल हिन्दुओं से थी।

” इस्लाम की घृणा के दो चरण हैं, पहले चरण में यह हिन्दुओं के विरुद्ध नहीं, सभी गैरमुसलमानों के प्रति है ! इसमें उन जैसा बनने की लालसा और उसमें विफलताजन्य हीनतबोध नहीं है, अपितु दूसरों को, और इसलिए हिन्दुओं को भी अपने से गिरा हुआ समझ कर उनको मिटाने या अपने जैसा बनाने की जिद है। इसके लिए वे क्रूरतम कृत्य करते हुए न ग्लानि अनुभव कर सकते थे, न क्षोभ क्योंकि जो मुसलमान नहीं है वह इंसान है ही नहीं । दूसरे इसमें जानने की लालसा नहीं, जो जानने को है वह जाना जा चुका है! भक्त के लिए भगवान को जान लिया फिर जानने को कुछ बचता ही नहीं। बाकी सारा ज्ञान तो माया या भ्रम है जिसे मिटा दें तो भगवद् भजन अबाध हो! इस्लाम भक्ति संप्रदाय का जघन्यतम रूप है क्योंकि भक्ति में जो अभक्त है उसका परिहार करने से ही काम चल जाता है, इस्लाम इसे संहार का रूप दे देता है। फिर भी हीनताजनिक घृणा इसके मूल में नहीं है।

‘‘इसकी घृणा उस हीनता से पैदा होती है जो अपने अमानवीय अत्याचारों के बाद भी उस अभिमान को तोड़ने में विफल रहता है जिसके कारण अत्याचार सहने वाले उसे अत्याचार के कारण उससे अधिक घृणा करते मिलते हैं जितना उसने इनके प्रति अपने मन में पाल रखा है।

”दूसरे किसी देश में पूरे देश को मुसलमान बनाने में सौ दो सौ साल से अधिक का समय नहीं लगा था पर एक हजार साल तक के प्रयत्न के बाद भी इसे दस बारह प्रतिशत से अधिक हिन्दुओं को मुसलमान बनाने में सफलता नहीं मिली । इस विरोध के पीछे उन्हें ब्राह्मणों के प्रभाव और उनकी शैतानी शिक्षा का हाथ दिखाई देता था। यह घृणा ब्राह़मणों और पारसियों के प्रति थी जो मरने को तैयार थे, परन्तु धर्म बदलने को तैयार नहीं!

इतने बल प्रयोग के बाद भी इस्लाम स्वीकार कराने में विफलता ने एक खीझ या दबे हुए हीनता भाव को जन्म दिया हो सकता है जिसने गैरमुस्लिमों के प्रति क्रोध को हिन्दुओं के प्रति घृणा में बदला हो सकता है, परन्तु यह मिटाने और बदलने की दिशा में अधिक प्रवृत्त था, हिन्दुओं के लिए गालियां जिस हीन भावना से हिन्दुओं की समकक्षता में आने में विफल विदेशी देते रहे वह इस्लाम में न मिलेगा। यहां तक कि काफिर जैसा तिरस्कारपूर्ण शब्द भी अपनी विषाक्तता खो बैठा !’’

‘‘सरदर्द की गोली होगी कोई ?’’

मैं जानता था वह क्या कह रहा था ! चुप लगा गया!

Post – 2017-01-14

उस सैनिक कीशिकायत में कुछ अतिरंजना हो सकती है, कुछ स्‍थानीय समस्‍या भी हो सकती है, परन्‍तु सेना में अनुशासन हो यह जरूरी है अौर सैनिकों का आत्‍मसम्‍मान बना रहे यह भी जरूरी है। सेना में बहुत कुछ है, जिसको अनुशासन के नाम पर होने दिया जाता है जो दूर होनी चाहिए। मोदी को इस बात का श्रेय है विविध प्रकार की पीड़ाएं भोग रहे लोगों की अपेक्षाएं पहली बार जाग रही हैं और उनकी ओर पहली बार ध्‍यान दिया जा रहा है । उस सिपाही के साहस को जिसने अपने खाने को लेकर शिकायत सामाजिक माध्‍यम से की दुस्‍साहस कहना होगा। यदि सामाजिक माध्‍यम से उसे प्रधानमंत्री तक ही अपनी शिकायत पहुंचानी थी तो उसे पहले प्रधानमंत्री को लिखना चाहिए था जिनको असाध्‍य बीमारी से ग्रस्‍त साधनहीन, शिक्षा, विवाह, विदेश में फंंसे स्‍वजनों, विदेश यात्रा में बाधक तत्‍वो
जैसे अनगिनत कष्‍ट झेलने वाले लोगों ने यहां तक कि अपने गांव के भोड़े नाम को बदलनवाने जैसे विचित्र समस्‍याओं से पीडि़तों ने अपना दुख पहुंचाया है और उनकी पीड़ा का निवारण करने का बिना किसी भेदभाव के प्रयत्‍न हुए हैं जिसके प्रमाण हैं। फिर भी इस दुस्‍साहस के परिणाम स्‍वरूप सैनिकों की अपनी शिकायतों और सुझावों के लिए पहली बार प्रबंध और इसकी उच्‍चतम स्‍तर तक पहुंच का कुछ श्रेय उसे भी जाता है।
आकांक्षाओं का इतना सैलाब, जिनका समाधान जिस साधन संपन्‍नता की अपेक्षा रखता है वह तो जादू से नहीं हो सकता परन्‍तु उनको पूरा करने की कोशिश से ही ये जागती भी हैं। आज से पहले इसका नमूना नही देखा गया। दलित घरों में खाना खा कर फोटो खिचवाने वाले और उन्‍हें उनके भाग्‍य पर छोड़ आने वाले अवश्‍य दिखाई दिये । मोदी की असाधारण लोकप्रियता, और उनसे पहली बार न्‍याय पाने के विश्‍वास को तराजू मान कर ही यह समझा जा सकता है कि मुद्रा संकट को जतना ने तमाम उकसावों के बाद, नकारात्‍मक टिप्‍पणियों के बाद लगातार बिना किसी उकसावे के कैसे झेला। उकसावे में आए अन्‍त में तो रिजर्वबैंक के वे लोग जिनकी मिली भगत से नयी मुद्रा चुपचाल करोड़ों करोड़ गलत हाथों में पहुंच गयी थी और मुद्रा संकट को अधिक गहरा बनाने का प्रयास किया गया था। कल को दूसरे बैंकों की यूनियनें भी आ सकती है और पर वे जनता के दुख से नहीं अपनी संलिप्‍तता के कारण आएंगी ऐसा मेरा अनुमान है । मोदी सरकार ही इतना साहसिक कदम उठा सकती थी और वही जनसमर्थन के बल पर इसे उस किनारे की ओर लगा सकती थी कि कष्‍ट आज भी समाप्‍त नहीं, पर लोगों को राहत अनुभव होने लगी है। लोगों के दुख देखने वालों ने अपनी खेती की, दुख से उबरने का नुस्‍खा नहीं दिया। इससे भी चिंन्तित और विकल मोदी ही थे यह समझने के लिए उनकी इसी साल के अक्‍तूबर और नवंवर के पहले पखवार के चित्र की तुलना उनके आज के चेहरे मे आए बदलाव से की और समझी जा सकती है।

Post – 2017-01-13

मैं ऐसे सभी लोगों के साथ हूं जो खादी ग्राामोद्योग के कैंलंंडर पर गांधी जी के चित्र के स्‍थान पर चर्खा चलाते नरेन्‍द्र मोदी के चित्र की भर्त्‍सना करते हैं। परसनैलिटी कल्‍ट का रोग मोदी में है यह उनके वेश वेशान्‍तर में लक्ष्‍य किया जा सकता था और जिसका उपहास भी किया गया पर जिसे मैं अभाव में पले व्‍यक्ति की इच्‍छापूर्ति मानता रहा हूं । अब वहीं दमित लालसा उन्‍हें गांधी का अनुगामी नहीं, मायावती और मुलायम का अनुगामी सिद्ध करने जा रही है। मैं आज भी उनका वकील हूं और इस नाते समय रहते इस भंवर से उबरने की सलाह देता हूं । उन्‍हें स्‍वयं जिस किसी ने ऐसा किया हो उसकी निन्‍दाकरनी चाहिए, एेेसी दुर्लालसाएं जगाने वाले चापलूसों से सावधान रहना चाहिए अन्‍यथा यह वह जमकातर है जिसमें लोग हाथी सहित डूब जाते हैं और जीते जी बुत बन जाते हैं ।

Post – 2017-01-12

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 10

हिन्दुओं के मन में यदि इतर समाजों और देशों के लोगों से परहेज सा था तो इसका एक कारण शुचिता, आचार, खानपान आदि के विषय में उनका इनके मानकों पर खरा न उतरना और जीवनमूल्यों में उनका भिन्न होना। हिंसा, अस्तेय, दंभ और छलछद्म को गर्व का विषय मानने वाले समाजों को वे ओछी नजर से देखते थे । इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। इसके ब्‍यौरे में हम न जाएंगे।

उनके आदर्श को मानवीय गरिमा की पराकाष्ठा माना जा सकता है परन्तु इन मूल्यों का निर्वाह प्रकृति की कृपणता के कारण सभी क्षेत्रों के लोग नहीं कर सकते थे! इनके संपर्क में आने वाले अपनी जीवनशैली भले इतर कारणों से न बदल सकें, परन्तु वे अपने तई इसके कायल भी होते थे और इनका अनुकरण भी करते थे। ऐसा जिस सीमा तक कर पाते थे समाज में वे स्वयं अनुकरणीय बन जाते थे और इसी प्रक्रिया से वैदिक भाषा, संस्कृति, दर्शन, कौश्‍ाल , कुछ दूर तक रीति-रिवाज, वेषभूषा, सज्जा का भी अनुकरण और प्रसार हुआ था!

मैकाय ने फर्दर एक्सकेवेशन्स के दूसरे खंड में एक लम्बी तालिका, ठीक याद नहीं पर संभवतः तीस चालीस पन्नों का, उन गोचर हड़प्पन तत्वों का यूनान से ले कर मध्येशिया तक, ठीक उस क्षेत्र में हड़प्‍पा सभ्‍यता के घटकों का प्रसार दिखाया है जिसमें भारतीय आर्यभषा का प्रसार हुआ था। यदि किसी बात का ध्यान उन्हें नहीं रहा तो वह है इसे भारतीय आर्य भाषा के क्षेत्र तक विस्तृत और उसी तक सीमित कहने का जो उनके बाद किसी भारतीय पुरातत्वविद ने भी नहीं कहा!

यह दुस्साहस मुझे करना पड़ा और इसी के आधार पर दि वेदिक हड़प्पन्स में यह दावा करने का साहस हुआ कि The Vedic Culture was co-extensive and co-terminus with the Harappan civilization । इस तथ्य का उल्लेख इसलिए जरूरी है कि एक ओर वैदिक सभ्यता के अग्रदूतों से दूसरे लोग कुछ दबते हुए, यह भी अनुभव करते थे कि वे हमसे आगे बढ़े हुए हैं, हमें उनसे सीखना, उनके अनुसार बनना और वैसा होने क प्रयत्न करना चाहिए, वहीं अपने प्रति उनके वर्चस्वी रवैये के कारण उनसे दबी चिढ़ और घृणा भी अनुभव करते थेा यह हिन्दुओं के लिए उनकी भाषा में गालियों, भर्त्‍सनाओं के रूप में प्रकट हुई जो ईमान से ले कर चरित्र और कभी कदा अक्ल तक पर आक्षेप का रूप लेती है! ये गालियां भी उनकी अपनी संस्कृति की ही उपज थीं और जैसा कि हम पहले कहते रहे हैं गालियां जिसे दी जा रही है उनके चरित्र को नहीं, गालीदेने वाले के चरित्र को ही उजागर करती हैं, ये भी उनके समाज में व्‍याप्‍त विकृतियों को ही व्‍यक्‍त करती थ्‍ाीं ।

इसलिए निंदा नहीं, अनुकरण ही किसी के मूल्यांकन का आधार हो सकता है। सफल होने वाले अपने परिवार तक में दूसरों को अपनी तुलना में जो लोग हेय बना देते हैं, उनसे उस परिवार के असफल व्यक्ति अपना संबन्ध जोड़ कर अपनी छवि भी सुधारते हैं, हीनता भी अनुभव करते हैं, और उस घृणा को भी दबाने के प्रयत्न में रहते हैं जो उनकी तुलना में अपनी हीनता से उनके मन में पैदा होती है।

यह एक नैसर्गिक प्रक्रिया है ! महत्वपूर्ण बात यह कि उन्होंने इसके बाद भी उनके जैसा बनने का प्रयत्न किया और जितना बन पाए उसी को अपना सर्वोत्कृष्ट मान कर उस पर गर्व करते रहे । ईरानी हों, स्लाव और लिथुआनी हों, या लघु एशियाई हों या उससे आगे ग्रीक, रोमन, जर्मन, केल्ट हों, उन्हें तुलना के लिए भी वैदिक भाषा और संस्कृति ही मिले थे, गर्व भी उनसे प्राप्त तत्वों पर ही था जो उनकी ग्रहण क्षमता के अनुसार यूरोप में अलग अलग थे, परन्तु सभी का जुड़ाव संस्कृत और वैदिक समाज से ही था, जाहिर है ईर्ष्‍या और घृणा के लिए भी ये ही मिले थे!

पश्चिमोत्तर से होने वाले आक्रमण भारतीय सभ्यता के लिए हड़प्पा काल से ही या सच कहें तो उससे बहुत पहले से चिन्ता का विषय रहे हैं और उनकी क्रूरता की कहानियां सदा से लोगों के मन में दहशत पैदा करती रही हैं! इसके जिस इतिहास को मैं उजागर करना चाहता हूं उसको समझाना चाहूं भी तो नहीं समझा सकता क्योंकि ग्रहणशीलता का भी एक अपेक्षित ज्ञान-स्तर होता है। उस काल पर पहुंचने पर आक्रमण घर वापसी के आन्तरिक दबाव का रूप ले लेते हैं और फिर वे अपनी संपदा का दोहन करके मालामाल होने वालों से अपनी ही अपहृत संपदा को हासिल करने का अभियान बन जाते हैं और यह समझ इतिहास की व्याख्या को एक ऐसा रूप देती है जिसके लिए केवल भारत के इतिहासकार ही नहीं पूरी दुनिया के इतिहासवेत्ताओं में कोई तैयार न होगा, क्योंकि विश्‍व इतिहास की जो समझ पैदा की गई है वह खासी उथली है, सभ्यता की परिभाषा तक लंगड़ी है और इसे मैं समय मिला तो बाद में समझाने का प्रयत्न करूंगा।

इस समय तो छोटे मुंह बड़ी बात प्रतीत होने वाली इस कथा को विराम देते हुए इतना ही निवेदन करें कि वैदिक कालीन त्रसदस्यु से ले कर शकारि (कहना चाहें तो शक्रारि कह लें), विक्रमादित्य ने जिसे इतिहासकारों ने मिथक करार दे दिया था और जिसकी स्वर्णमुद्रा की खोज के बाद वह मिथक से इतिहास में प्रवेश कर गया, उसके समय तक जिस किसी ने ऐसे आक्रमणों को निरस्त किया, वही उसकी गौरवगाथा का कारण बन गया!

इसके बाद भी जिसने भारत पर विजय पा ली वह सांस्कृतिक स्तर पर हार गया यह कहना अविवेकपूर्ण होगा, क्योंकि सांस्कृतिक ग्रहणशीलता पराजय नहीं, एक भिन्न प्रकार की विजय होती है जिसमें भौतिक विजय के बाद आत्मोत्थान का अवसर मिलता है! भले इसके प्रेरक वे हों जिन पर तुमने असंख्य अत्याचार करते हुए विजय पाई। यह उनके आत्मविस्तार और आक्रान्ताओं के आत्मोत्थान की एक ऐसी जटिल गाथा है कि इसकी कड़ियां सुलझाने चलें तो हो सकता है हमें अपने अभी प्रकट किए गए विचारों में भी संशोधन करना पड़े, क्योंकि विजय के बाद उन्‍हें शिष्यता और आत्मशुद्धि के चरणों से भी उन्हें गुजरना ही पड़ा था।

परन्तु उन्हीं उपद्रवी या आक्रमणकारी समुदायों के इस्लाम में दीक्षित हो जाने के बाद जो आक्रमण हुए उनमें विजय पाने के बाद भी उनके एकाक्षरी पांडित्य के कारण न कुछ जानने को बचा था, न सीखने को, न अपनी जीवन शैली में बदलाव का विवेक बचा था।

यह एक विचित्र तरह की मुठभेड़ थी । और इसका आरंभ उन्होंने किया जिन्हें असंख्य और कल्पनातीत अत्याचारों का बार बार सामना करने के बाद धर्मान्तरित होना पड़ा था और धर्मान्तरित होने की कुछ पुश्‍तों के बाद ही अपने को सच्चा मुसलमान साबित करने के जोम में दहशत और वहशत को सभ्यता और श्रेष्ठता का मानदंड मान कर यह जिद पालनी पड़ी थी कि जानने लायक जो कुछ है वह हमारे एकाक्षरी ग्रन्थ में है जिसका उनमें से निन्यानबे दशमलव निन्यानबे प्रतिशत ने दर्शन भी न किया होगा, जैसे वेद पुराण का नाम लेने वाले हिन्दुओं में उसी अनुपात में लोग दर्शन तक नहीं कर पाते थे, न कर पाए थे!

परीक्षा से गुजरते हुए अपने को मुस्लिम समुदाय में स्वीकार्य बनाने के लिए इस देश में भी लोगों को हिन्‍दू द्रोह के प्रमाण देने पड़े हैं और इनके कारण जितने गलत काम हुए हैं उतने गलत काम अरब भी भारत में आ कर नहीं कर सकते थे।

इकबाल हों या जिन्ना या कश्‍मीर के धर्मान्तरित हिन्दू, जिनमें से कुछ के नामों के साथ्‍ा आज भी, कुछ बदले रूप में, हिन्दू उपनाम दिखाई देते हैं, सब हिन्दू ही थे। यह मैं किसी की महिमा को कम करने के लिए नहीं कह रहा हूं अपितु सामाजिक मनोविज्ञान की एक समस्या के रूप मे इसे अध्ययन का एक क्षेत्र मान कर चिन्हित कर रहा हूं!

यदि आप राहुल जी की मध्येशिया का इतिहास ही देखें तो पता चल जाएगा कि ईरानियों को इस्लाम का विरोध करने, उससे बचे रहने के लिए कितना लंबा संघर्ष करना पड़ा था, कितना अपमानित होना पड़ा था, परन्तु लाचार कर दिए जाने के बाद उनमें अपने को असली मुसलमान साबित करने की होड़ लग गई! यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी मेरी जानकारी पर भरोसा करने वाला धोखा खाएगा, इसलिए इसे कल तक सोचने के लिए स्थगित रखते हैं।

Post – 2017-01-12

जोगी, सन्‍यासी, साधु, साध्वियां जो संसार को त्‍याग चुके हैं, भले ‘नारि मुई घर संपति नासी, मुड़़ मुड़ाइ भये सन्‍यासी’ वाले तर्क से या वह सांसारिक लोगों से अलग कोना है वहां किसी तरह की रोक टोक नहीं है इस कारण, या गद्दी या मठ के उत्‍तराधिकारी होने के कारण, इन्‍हें दुनिया का ज्ञान नहीं, ये एकान्‍तवासी सभा संसद के योग्‍य भी नहीं, कहें न सभ्‍य कहे जा सकते हैं, न इनसे संयत भाषा और संयत व्‍यवहार की आशा की जानी चाहिए । ये अ’सामाजिक प्रकृृति के एकान्‍तवासी राजनीति में दखल दें यह समाज और देश के हित में नहीं है । जो घर नहीं संभाल सके वे देश काेे क्‍या संभालेंगे । इसलिए मुल्‍लो मौलवियों सहित इन सभी पर राजनीति में भाग लेने से चुनाव आयोग को प्रतिबन्धित कर देना चाहिए ।

Post – 2017-01-11

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास- 9

हमें इस बात का सही अनुमान नहीं है कि देशान्तर में अपने स्वर्ग बसा कर रहने वाले लोगों के सहायक, सेवक, रक्षक कहां और कैसे रहते थे? उनके बीच के संबंध कैसे थे? यदि भिन्न भाषाभाषी भारतीय उनके बीच थे तो उनकी गतिविधियां क्या थीं। उनका स्थानीय जनों से संपर्क का रूप क्या था? एक बात कुछ साफ लगती है कि पांटिक क्षेत्र या अश्‍वक्षेत्र को छोड़ कर अन्यत्र उनकी भाषा का ऐसा प्रभाव नहीं पड़ा जिसे याद किया जाता परन्तु आर्य भाषा का भी ऐसा प्रभाव न पड़ा कि स्थानीय स्तर पर वहां भी भारत के अन्य परिवारों में रखी जाने वाली भाषाओं के स्पष्ट प्रभाव की बात की जाती। इसका एक कारण यह हो सकता है कि दूसरे क्षेत्रों में कोई ऐसी गतिविधि नहीं थी जिसके कारण वैदिक अभिजात वर्ग या श्रेष्ठिवर्ग की सेवा में लगे लोग स्थानीय जनों से सीधे संपर्क में आ पाते, जैसे खनन और खनिज द्रव्यों का प्रसाधन, जब कि अश्‍वक्षेत्र में सैंधव और अन्ध्र जनों को तारपान या जंगली घोड़े को पकड़ने, साधने आदि के क्रम में स्थानीय जनों से सीधा संपर्कं जरूरी था और संभव है इनका स्थानीय आबादी में विलय भी हो गया हो, जिसके कारण उनकी भाषाओं का प्रभाव साफ लक्ष्य किया गया। यह अलग बात है कि मुंडा का प्रभाव जिनता साफ दिखाई देता है उतना द्रविड़ का नहीं जिसके इक्के दुक्के शब्द खींच तान कर उन भाषाओं में आज से पांच हजार साल पहले से तलाशे गए है।

सच कहें तो सिन्ताश्‍ता और आन्द्रोनोवो के या उन अनेक संस्कृतियों के जो अश्‍वक्षेत्र में पाई जाती हैं, भाषाई उपस्तर का अध्ययन नहीं किया गया है और सभी में केवल संस्कृत से साम्य रखने वाले शब्दों पर ध्यान दिया गया। जिस पहलू पर ध्यान दिया गया वह था आर्यों के आगमन के लिए पूर्वकल्पित काल से मेल खाने वाले दौर में कुछ लोगों के उस क्षेत्र से पूर्व की ओर बढ़ने के पुरातात्विक प्रमाण क्योंकि उस काल की भाषा के साक्ष्य थे नहीं, आज उस अंचल की भाषा का इस दृष्टि से अध्ययन और विवेचन करने की जरूरत नहीं अनुभव की गई । यदि ध्यान गया तो दूसरे पहलुओं पर जिनमें एक था अन्त्येष्ठि का तरीका । इसके दो तत्व रोचक हैं, एक यह कि मरने के बाद भी आदमी को वैभव की जरूरत पड़ती है इसलिए अभिजात मृतकों की समाधियों से विपुल संपदा का उद्धार और दूसरा था सहमरण या पति के साथ पत्नी के भी मृत्युबान्धवी होने और दफन किए जाने की प्रथा।

सच पूछें तो जो बता रहा हूं उसका मुझे भी कुछ अधभूला बिसरा ही स्मरण है। हम यह मान सकते हैं कि सुरक्षा की सारी सावधानियों के बाद भी स्थानीय जनों से इन प्रवासियों का संबन्ध उतना तनाव भरा नहीं रहा होगा। इससे आगे स्लाव और बाल्टिक क्षेत्र में आधी पुरानी याद और आधी बाद की जानकारी के आधार पर यह याद बनी रह गई थी कि गंगा के तट से वेदज्ञ लोग आए थे और उन्होंने पहली बार वहां ज्ञान का प्रसार किया था। वहां का समाज मातृप्रधान था इसलिए पौरोहित्य का काम वहां की महिलाओं ने संभाला था।

किन विषेष परिस्थितियों में संस्कृत भाषा से प्रभावित एक समुदाय किन अन्तरालों या पड़ावों से गुजरता हुआ अश्‍वक्षेत्र से ब्रिटेन पहुंचा था जिसकी पहचान अंग्रेजी में केल्टिक तत्वों के रूप में की गई है और जिसके कारण अंग्रेजी के बहुत से शब्द सीधे संस्कृत से जुड़ते हैं, यह पता लगाने का प्रयत्न नहीं किया गया। परन्तु यदि यह प्रस्थान किसी दबाव में हुआ हो तो हम स्थानीय जनों से संबंध और उनकी भारतीयों के प्रति प्रतिक्रिया को इस आधार पर समझ नहीं सकते। अतः इनको हम तब तक के लिए स्थगित रख सकते हैं जब तक स्थिति अधिक स्पष्ट न हो जाय।

हमने इसका उल्लेख इसलिए किया कि इतिहासकारों के बीच मान्य दो भ्रान्तियों का निराकरण कर सकें। पहला यह कि घोड़े के पालन का आरंभ आर्यों ने किया और दूसरा यह कि अरायुक्त पहिये का आविष्कार आर्यों ने किया, ये दोनों मान्यताएं गलत हैं। अश्‍वपालन और प्रशिक्षण के क्षेत्र में पहल आर्यों की नहीं सैन्धव जनों की थी जो बहुत पहले से यह काम करते आए थे और ऋग्वेद में पहिए और रथनिर्माण में दक्ष भृगुगण थे – एतं वां स्तोमं अश्विनौ अकर्म अतक्षाम भृगवो न रथम्। भृगुगण यज्ञ और इन्द्र की श्रेष्‍ठता को नहीं मानते थे, वरुण को सर्वोपरि मानते थे- हता मखं न भृगवः! वैदिक अभिजातवर्ग, जो खेती में नहीं वाणिज्य में आगे बढ़ा हुआ था सबका अपनी योजना के अनुसार उपयोग में ला रहा था और बहु स्तरीय और बहुभाषी तत्वों की अपनी साझेदारी से आगे बढ़े इस समाज में भाषा, विचार, संस्कार सभी पर उसकी छाप थी और सामान्य व्यवहार में उसी क सहारा लिया जाता था।

वैदिक समाज अपने समय को देखते हुए सबसे शक्तिाशाली था, सबसे सभ्य था, सबके लिए अनुकरणीय था, यह विभिन्न भौगोलिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों में देखा जा सकता परन्तु इसने अपनी शक्ति, ज्ञान और कौशल को संयत और अनुशासित और संवेदनशील बना कर रखा था और उसकी यह अग्रता तक, दमन और उत्पीड़न से परहेज तक, बर्बर अवस्थाओं में जीने वालों को आश्‍चर्यजनक लगता था। इस अनुशासन के कारण ही वे पूर्व, जिसका अर्थ उस समय ईरान और भारत था, यद्यपि यह उनके लिए लघु एशिया था जिस पर और जिसके आसपास की आबादी पर इन्होंने अपने आभिजात्य का ऐसा प्रभाव कायम किया था कि वहां की सोच, साहित्य, विचार, धर्म और दर्शन सभी को इन्होंने प्रभावित किया ।
यह आरंभ हुआ उसी अश्‍व व्यापार से जिस पर इनका एकाधिकार था और इस नई पण्यवस्तु के कारण इन्होंने असीरियनो से व्यापार का एकाधिकार छीन लिया था और उनके केन्द्र कानेस (kanes) पर 2000 ईपू में हावी हो गए थे और हजार डेढ़ हजार साल तक अपना वर्चस्व बनाए रहे। कहें यह सांस्‍कृतिक प्रसार भारत से मध्‍येशिया और वहां से अश्‍वव्‍यपार के चलते लघु एशिया और आस पास के क्षेत्र में हुआ लगता है।

इनके वर्चस्व का आधार सैन्यबल नहीं था, न्याय बल था। वहां के दमन और उत्पीड़न के जवाब मे, सहृदयता और सहानुभूति पूर्वक प्रजावत्सलता दिखाते हुए शासन। इस व्यवहार में उन्हे लोकप्रियता दी उसके कारण वे पश्चिम एशिया के सबसे प्रभावशाली अभिजात बने रहे और कुछ क्षेत्रों में राजकाज भी संभाला जिनकी वंशावलियां इतनी बार दुहराई गई हैं कि यह जानते हुए भी कि हमारे मित्रों में कुछ ऐसे भी होंगे जिन्हें उनका पता न होगा, हम उसे छोड़ना उचित समझते हैं।

परन्तु इस प्रजावत्सलता का प्रतिलाभ जनता के सम्मान और उन पर लगाए गए देय भाग को बिना छल कपट के चुकाते रहने को भी निरंकुशता का प्रमाण बनाया जा सकता था और बनाया गया। जिस ओरिएंटल डिस्पाटिज्म की बात हाल में मिल ने उठाई, जिसे उसे पढ़ कर मार्क्‍स ने बिना छान बीन किए मान लिया और जिसे आज भी पश्चिमी विद्वान दुहराते मिल जाएंगे वह उस हीन भावना की उपज थी जिसके समझ वे बर्बर सिद्ध होते थे और अपनी नजर में और दूसरों की नजर में गिरने से बचने के लिए यह आरोप वे पूरब के लोगों, या एशियावासियों पर डाल कर मुक्त होना चाहते थे। ग्रीक दार्शनिकों में से कुछ ने अपनी इसी जुगुप्सा को यह स्वीकार करते हुए व्यक्त किया था कि पूर्व के लोग अधिक ज्ञानी और सूझबूझ वाले हैं, परन्तु उनमें वह ओजस्विता या स्पिरिट नहीं पाई जाती जो यूरोप के लोगों में मिलती थी। ध्यान रहे कि यह टिप्पणी अरस्तू की हैः

Aristotle asserted that oriental despotism was not based on force, but on consent. Hence, fear could not be said to be its motivating force, but rather the servile nature of those enslaved, which would feed upon the power of the despot master. Within ancient Greek society, every Greek man was free and capable of holding office; both able to rule and be ruled. In contrast, among the barbarians, all were slaves by nature. Another difference Aristotle espoused was based on climates. He observed that the peoples of cold countries, especially those of Europe, were full of spirit but deficient in skill and intelligence, and that the peoples of Asia, although endowed with skill and intelligence, were deficient in spirit and hence were subjected to slavery. Possessing both spirit and intelligence, the Greeks were free to govern all other peoples (Politics 7.1327b)

भारतीय सन्दर्भ में राजा के विषय में दो स्पष्ट धारणाएं मिलती हैं ! एक तो यह कि वह राज्य का संचालन प्रजा से वसूले गए कर के बल पर करता है इसलिए वह जनभक्ष है – जनभक्षो न राजा । दूसरे यह कि प्रतापी राजा प्रजा के लिए उसी तरह उत्पीड़क होता है जैसे निदाघ का सूर्य धरती को तप्त कर देता है – तपन्ति शत्रुं स्वर्ण भूमा महासेनासः अमेभिः ऐषाम् । दूसरा यह कि आदर्श राजा प्रजा का वैसा ही हितैषी होता है जैसा कोई मित्र- हितमित्रो न राजा। राजा निरंकुशता के कारण नहीं, सत्य, न्याय और सदाशयता के कारण आदरणीय होता था – ऋतेन य ऋतजातो विवावृधे राजा देव ऋतं बृहत्। बर्बरता की स्थिति से उभरे पश्चिमी जगत में बात बात पर झगड़ा, फसाद उनकी ओजस्विता का प्रमाण प्रतीत हो सकती थी, परन्तु यह एक क्षतिपूर्ति थी जिसकी जड़े हजार साल गहरी थीं जिसमें वे अपनी भाषा, संस्कृति और दर्शन सब कुछ उसी पूर्व से ग्रहण करने को प्रेरित हुए थे जिसके तन्त्र पर यदि काम हुआ भी हो तो वह हमारी जानकारी में नहीं है परन्तु अन्‍यथ उपलब्‍ध प्रमाणों को झुठलाया नहीं जा सकता था! यह याद रहे कि जिस त्राय के राजा प्रियम पर ग्रीकों ने आक्रमण किया था और उस नगर को तबाह किया था उसके पीछे एशियाइयों, कहें पूरबियों के प्रति आक्रोश का स्वर पहचानना कठिन नहीं है। यह भी ध्यान देने की बात है कि महाकवि होमर ग्रीक नहींं एशियाई था और ग्रीक का प्रसार एशिया माइनर में था, उसका विकास भी यहीं हुआ हो सकता है और आगे चल कर उसका विस्तार ग्रीस के कबीलों के बीच हुआ जो बहुत बाद तक कबीलाई संस्करों से मुक्त नहीं हो पाए थे!

Post – 2017-01-11

ज्ञान की सिद्धावस्‍था

(यह आज की पोस्‍ट नहीं है। अक्‍तूबर के एक पोस्‍ट का अंश है। कर्णसिंह चौहान की वाल पर कल विचारधारा के उपयोग और उसे फेंक कर किनारे करने का एक विवाद पढ़ा था और आज अपनी पुस्‍तक के पांचवां खंड की प्रेस कापी बनाने समय इन पंक्तियों से गुजरा तो लगा इस प्रसंग में इसकी याद दिलाना उचित हो सकता है। )

”कम्युनिस्ट होने के साथ ही व्यक्ति उसी सिद्धावस्था में पहुंच जाता है जिसमें अति अनुशासित संगठन पहुंच जातें हैं। जिसमें मजहबी लोग होते और जिसमें उस मजहब को अपनाने वाले, उसे अपनाने के साथ पहुंच जाते हैं।

”एक मजेदार घटना याद आ गई । आज से पचीस साल पहले की बात है। शायर का नाम याद नहीं, शायरी भी कुछ खास नहीं, लेकिन उसकी एक नज्म की टेक थी, ‘बदलेगा जमाना लाख मगर, कुरआन न बदला जाएगा।’ और इस पर श्रोता लहालोट हुए जा रहे थे। लोग जोश में थे और मुझे हंसी आ रही थी। कारण तीन थे। पहले तो उस महाशय को यह पता नहीं था कि कुरआन के भी कई संस्करण मिलते हैं जिनमें कुछ अंतर है इसलिए सभी प्राचीन कृतियों की तरह कुरान में भी कुछ फेेर बदल हुआ है। दूसरे उसे यह नहीं मालूम कि कुरआन ही नहीं, दूसरे ग्रन्थ भी यथातथ्य ही रखे जाते हैं और रहते हैं। उसमें कोई दूसरा बदलाव नहीं करता। इस मानी में कुरआन को जानबूझ कर बदलने वाला या उसके पाठ से छेड़छाड करने वाला या तो मूर्ख होगा या पागल और नहीं तो उसका अन्तःपाठ करते हुए उसका आलोचनात्मक संस्करण तैयार करने वाला कोई बुद्धिमान।

”प्रत्येक लिखित या मुद्रित पाठ की अपनी पवित्रता होती है। उसका धर्मग्रन्थ होना जरूरी नहीं। हंसी इस बात पर खास तौर से आ रही थी वह कुरानषरीफ के प्रति लोकश्रद्धा का इस्तेमाल करते हुए कह रहा था कि हम अपने समाज में कोई प्रगति, कोई परिवर्तन आने नहीं देंगे। जो ऐसा करेगा उससे निबट लेंगे। समय गुजरता जाय, कुरआन जिस काल और परिस्थितियों में लिखा गया था, वे बदल जाएं, परन्तु हम उसी काल में पड़े रहेगे, आगे बढ़ेंगे नहीं, न अपने को बदलेंगे, न किसी दूसरे को बदलने देंगे। इबारत कुछ कह रही थी, इशारत कुछ, अदा कुछ । इसका पाठ बनता था, ‘बदलेगा जमाना लाख मगर मुसलमान न खुद को बदलेगा।’

”डार्विन के अनुसार जो बदले हुए समय, चुनौतियों या परिस्थितियों के अनुसार अपने को बदल नहीं पाता वह अनफिट हो जाता है, बचा नहीं रह पाता। हंसी इस बात पर आ रही थी कि इतनी नासमझी की बात पर इतने सारे लोग झूम रहे है। कविता का अर्थ शब्दों में नहीं, उनके विपर्यय में भी होता है और युगसन्दर्भ में भी। यह बहुवर्तिता ही कविता को अगाध बनाती है। इनके संदर्भ में उन्हीं उक्तियों के नये अर्थ खुलते जाते हैं और नई व्याख्यायें होती जाती हैं।

”अब यदि कोई पूछें कि भई, तुम्हें इस कविता पर तीन कारणों से हंसी आ रही थी तो क्या, तीनों के लिए तुमने तीन बार हंस कर दिखाया? तो कहूंगा कि हंसी की कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि हंसने चलो तो रोना आता है। पर मैं हंसना तो दूर रो भी न सका था, क्योंकि रोता भी तो किसी पर असर तो होने वाला न था।

”यह प्रसंग इसलिए याद आ गया कि तुम उसी सिद्धावस्था को पहुंच चुके हो जिसमें न कुछ ऐसा नया जानना रह जाता है जो तुम्हारे माने से अनमेल पड़े, न सोचना रह जाता है, इस डर से कि सोचना फंडामेंटल से अलग जाना है, रिविजनिज्म है और ऐसों को अपमानित करके निकाल दिया जाता है कि वे किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहते। यह व्यक्ति, विचारधारा और संस्था के एक जीवन्त सत्ता से फॉसिल, जीवाश्‍म में बदलने का सूचक है।

”इसके फलस्वरूप पचास साल से ऐसे लोग जो कुछ दुहराते जा रहे हैं और यह तक नहीं देख पाते कि इस बीच बहुत कुछ बदला है, कि देश काल भेद से कोई भी परिघटना, उसकी नकल करो तो भी वही नहीं रह जाती, वह उतनी ही दृढ़ता से ऐसे संगठनों, संस्थाओं और विचारधाराओं के षिखर पर बने हुए हैं।

”मैं सिद्धावस्था से डरता हूं इसलिए यह बोध मुझमें बचा रह गया है कि सचाई तो स्थान, काल के साथ, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक परिवर्तनों के अनुसार बदलती रहती है, इसलिए एक ही काल में कोई एक मूल्यांककन सभी पर घटित नहीं होगाा। चिन्ता केवल यह कि, पचास साल तक सर्वसन्दर्भ निरपेक्ष भाव से एक ही मुहावरा दुहराने वाले अश्‍मीभूत विचारों के लोगों से संवाद कैसे स्थापित हो?

एक ही रास्ता है, तर्क, प्रमाण, और औचित्य का। उसका वे ध्यान नहीं रखते। गालियों को तर्क बना लेते हैं।

अभी कल की पोस्ट पर किसी ने कहा, ‘मोदी पुराण।‘ कुछ कह सकते हैं, ‘मोदी भक्त।’ तुम कहना चाहो तो कह सकते हो मैं मोदी का वकील हूं। मैं मान लूंगा । मैं तो उस आदमी को जिसे तुम गालियां देते रहे हो इतिहास पुरुष मानता हूं, जरूरत पड़ेे तो अतिरंजना भी कर सकता हूं। उनके खिलाफ जहर उगलने वालों सेे मोदी के वकील की जिरह का जवाब क्यों नहीं देते बनता। चोर चोर चिल्ला कर, लोगों की भीड जुटा कर, खुद ही उसे फांसी देने का प्रयास करने वालों को, बचाव पक्ष का जवाब तो देना चाहिए। यह संगसार कब तक चलेगा और संगसार करते हुए भी अपने को तर्कवादी कहने की निर्लज्जता कब तक जारी रहेगा। यह बताने का साहस आज तक कोई जुटा नहीं पाया और किसी कोने से किसी के बयान को मोदी का बयान सिद्ध करकेे उसे फांसी पर चढ़ाने का फन्दा लिए ऐसे कमअक्ल भी घूम रहे हैं कि कोई पूछे कि ये है तो बता भी न सकें।

Post – 2017-01-10

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास -8

कुछ लोग प्राचीन वैदिक भूभाग को ईरान से ले कर भारत तक विस्तृत मानते हैं और इसका राजनीतिक प्रयोग इस रूप में करते हैं कि ये भाग धीरे धीर हमसे कटते गए और इस विभाजन की अन्तिम कड़ी 1947 के विभाजन को मानते हैं।हम अपने साक्ष्यों से इसका खंडन होते पाते हैं।

हम दिखा आये हैं कि सिन्धु के पार का पूरा भूभाग वैदिक प्रभाव और संस्कृत भाषा से वंचित था। आज भी पंजाबी में उस बोली का प्रभाव बना रह गया है जिसमें घोष महाप्राण ध्वनियां नहीं थीं। सिंधु सौवीर के आर्यावर्त से बाहर रहने के विश्‍वास का उल्लेख हम पीछे कर आए है। गांधारों ने या कहें गन्धर्वों ने अपनी पण्यवस्तुओं के बदले में वाणी का वरण किया और उनका उस पर इतना अच्छा अधिकार हो गया कि देवों को वाणी को वापस बुलाने के लिए गा बजा कर उसे रिझाना पड़ा या मानक उच्चारण उनसे सीखने की जरूरत पड़ने लगी।

यह उन आर्थिक गतिविधियों की प्रखरता से संभव हुआ जिसका सही अनुमान केवल हड़प्पा के पुरातात्विक प्रमाणों से नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि खनिज संपदा के दोहन के स्थलों और क्षेत्रों पर पुरातात्विक पहचान संभव नहीं है, न संभव है स्थानीय जनों के विरोध, प्रतिरोध का सही अनुमान । परन्तु जब राहुल जी शालातुर निवासी पाणिनि को पठान कहते हैं तो अफगानिस्तान पर संस्कृत के प्रभाव का कुछ अनुमान हो जाता है। अफगानिस्तान के लिए आर्याना संज्ञा का प्रयोग होता था जो आज भी अफगान एयरलाइन के लिए प्रयोग में है। इसके बाद आता है आर्यों की सक्रियता का दूसरा क्षेत्र जिसे भी आर्याना कहा जा सकता है और जो ईरान बन गया आर्यों की यह संज्ञा ऐर्यानेम वैजा (Airyanem Vaejah) तक पहुंचता है ।

अफगानिस्तान के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र जिसे काफिरिस्तान कहा जाता था उसमें सोमरस के लिए विकल्प के रूप द्राक्षा रस निकाल कर उत्सव मनाया जाता था और इसे इन्द्र कुन या इन्द्रोद्यान की संज्ञा मिली थी! आज इसे नूरिस्तान या आलोक का देश कहा जाता है इसका पुराना नाम कामदेश था। धर्मान्तरण के मामले में इस्लामपरस्तों को सबसे कठिन संघर्ष इनसे ही करना पड़ा था । 1886 तक इसमें इस्लाम का प्रवेश नहीं हो पाया था। इन जनों को काफिर और इस क्षेत्र को काफिरिस्तान की संज्ञा भी उन्होंने ही दी होगी। इनमें इस्लाम न मानने वालों की संख्या बीसवीं शताब्दी तक बनी रह गई थी।

हम कह सकते हैं कि यह सबसे निकट का स्वर्ग या इन्द्रलोक था, वसुकन्नी या दजला की एक सहायक नदी वसु के तट पर बसी नगरी सबसे दूरस्थ स्वर्ग थी जिसकी समृद्धि के कारण इसका नाम संपदा की खान या वसुकन्नी पड़ गया था! इन नगरी का उल्लेख और इस पर असुरों के आक्रमण और उससे मुक्ति का हवाला गोपथ ब्राह्मण में आया है – वसोः धाराणां ऐन्द्र नगरम् ! तं असुरा परि उपेयुः … बीच में ईरान और मध्येशिया में ऐसे बहुत सारे स्वर्ग या प्राचीररक्षित बस्तियां थीं।

आक्रामकता और नृशंसता के लिए कुख्यात जनों के बीच अपनी बस्तियां बसाना और अपनी गतिविधियों के चलते पूरे क्षे़त्र में अपनी भाषा और संस्कृति का प्रभाव डालना इनके प्रभुत्व, संगठन और शक्ति को प्रकट करता है। हो सकता है स्थानीय जन यायावरी के कारण आरंभ में बड़ी संख्या में संगठित न हो पाए हों और यह भी संभव है कि बाद में संगठन और नेतृत्व में वहीं बस गए और स्थानीय आबादी में खप गए ऐसे जनों का भी हाथ रहा हो, जो अपने स्‍वर्ग से बाहर न निकले हों, परन्तु इसे प्रमाणित करने के लिए हमारे पास बहुत अधिक जानकारी नहीं है । वह हमारी विषयसीमा में भी नहीं आता।

परन्तु स्वर्ग के सुख, उसके भोग, उसकी जीवनशैली, उसकी अप्सराओं, संगीत और नृत्य से अपना मनोरंजन करने वाले इन्द्रदेवों का स्थानीय जनों पर क्या प्रभाव पड़ता रहा होगा इसका हम अनुमान ही लगा सकते हैं, क्योंकि उनकी पुरानी कथाएं इस्लाम के प्रभाव में दुर्लभ हो चुकी हैं और लेखन का प्रचार यदि सीमित रहा भी हो तो भी ईरानी में अवेस्ता को छोड़ कर किसी का लिखित साहित्य नहीं है।

अफगानिस्तान के उत्तरी भाग बदख्शां का पुराना नाम कोकनद प्रदेश था और कोकचा नदी जिसके पार संगमर्मर की पहाड़ियों में लाजवर्द की खानें है, और जिन तक इस नदी को पार करके ही पहुंचा जा सकता है, जाहिर है कोक नद के नाम से प्रसिद्ध था और इसी क्षेत्र में बसी बस्ती काइजिल कुम थी जहां से इन गतिविधियों का संचालन होता रहा लगता है।

मेरी समझ से ऋग्‍वेद में सरमा और पणियों के संवाद में चट्टानों में दबी जिन गायों/निधियों को बृहस्पति अंगिरा जनों की मदद से तोड़कर निकालते हैं(अयं निधिः सरमेे अद्रिबुध्नो गोभि: अश्‍वेभि: वसुभि: निऋष्टो । रक्षन्ति तं पणयो ये सुगोपा रेकु पदं अलकं आ जगन्थ ।। 10.108.7) ये उन चट्टानों से चमकती हुई बाहर आती है। यह बदख्शां की उन विख्यात लाजवर्द की खानों का प्रतीकात्मक चित्रण जिसमें पणियों द्वारा छिपा कर रखी गई निधि को वैदिक खनिकर्मी उनके विरोध के बावजूद खोद कर लाते हैं। इसमें इन गायों को सूप में जैसे जव भूसी से अलग किया जाता है उस तरह अलग करते दिखाया गया है। इनका वर्णन बहुत स्पष्ट और सटीक हैः( साधु अर्या अतिथिनीः इषिराः स्पार्हाः सुवर्णा अनवद्यरूपाः । बृहस्पतिः पर्वतेभ्यो वितूर्या निर्गा ऊपे यवमिव स्थिविभ्यः ।। 10.68.3).

हमारी रुचि केवल इस बात में है कि यदि पणिगण जिनके क्षेत्र में ये खानें आती हैं अपनी संपदा केे अपदोहन का विरोध करते हैं और यह धमकाते हैं कि हम इन्द्र को देख लेंगे, पर अपनी निधि को नहीं ले जाने देंगे और फिर भी विवश अनुभव करते हैं और यह सुझाव देते हैं कि इन्‍द्र आएं हम उनके साथ सहयोग करेंगे, उन्‍हें अपना सरदार बना लेंगे तो आरंभ में उनके संबंध वैदिक जनों से तनावपूर्ण ही रहे होंगे और अपनी लाचारी में धीरे धीरे, भले वैदिक धौंस को इस हद तक स्वीकार कर लिया कि उनको संस्कृत पर द्रविड़ लक्षणों वाले पंजाब की संस्कृत से अधिक अच्छा अधिकार हो गया तो दबे आक्रोश, विवशता और घृणा की भावना और उससे इनके लिए भर्त्‍सना और निन्‍दा परक प्रयोगों का अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

परन्तु सबसे मुखर है ईरान का दबा आक्रोश जो एक ओर तो वैदिक संस्कृति से इतनी गहराई तक प्रभावित हुआ कि यह वकालत की जाती रही कि यदि अवेस्ता की भाषा का उतना ही पुराना रूप उपलब्ध हो जितना पुराना ऋग्वेद है तो उसकी भाषा वैदिक से प्राचीन सिद्ध होगी और इस तर्क से उन्होने यह प्रचारित करने का प्रयास किया कि इंडोईरानी की बाद की शाखा इंडो आर्यन है जब कि भारत से लेकर लघु एशिया से लेकर लिथुआनिया, लैटविया और यूगोस्लाविया तक और, ईरानी के तद्भवीकरण के अपवाद को छोड़, पूरे क्षेत्र पर वैदिक का एकक्षत्र साम्राज्य दिखाई देता है।

इसी तरह अवेस्ता की प्राचीनता को एक पूर्ववर्ती संस्कृति से निकला सिद्ध करने के लिए ठीक वही तर्क काम में लाया जाता रहा जिसे विलियम जोंस ने गढ़ा थाः
the religion of the Magi is derived from the same source as that of the Indian Rishis, that is, from the religion followed by the common forefathers of the Iranians and Indians, the Indo-Iranian religion. The Mazdean belief is, therefore, composed of two different strata; the one comprises all the gods, myths, and ideas which were already in existence during the Indo-Iranian period, whatever changes they may have undergone during the actual Iranian period; the other comprises the gods, myths, and ideaswhich were only developed after the separation of the two religions.( James Darmesteter, Intro. Zend Avesta, SBES part I)

अवेस्ता के कवि जरथुस्त्र या जरदुस्त्र का मूल नाम है जरद्वस्त्र या सुनहले बाने वाला कवि है । यह सुनहला रंग केसरिया या गैरिक वस्त्र है और इनका प्रवेश
सीधे भारत से नहीं, मध्येषिया से ईरान में हुआ था जहां वह पहले से बसे और अधिकार जमाए बांधवों या आर्यभाषा भाषी सेठों के माध्यम से अपना प्रभाव जमाते है। उन्होंने अपनी प्रतिभा और प्रभाव से पूर्ववर्ती वैदिक कर्मकांड आदि के विरुद्ध पर्यावरण तैयार किया था न कि पुराने धर्म और विश्‍वास की झलक उनमें पाई जाती हैः The priests of the ancient faith were now alarmed. They attempted to dissuade the prophet from disturbing the peace of the people. They met often to argue with him on the questions he was raising, but were foiled in the controversies. They felt themselves humiliated before the people and gave up meeting the prophet. They began to work against him and tried in all possible manners to frustrate the effect he was daily producing upon his hearers. They were accustomed to fatten upon the profits of the elaborate ceremonials and rich sacrifices that people offered under their guidance. They were renowned as exorcists who cast out demons, who read dreams, prognosticated the future, warded off the effect of the evil eye and, with ingenious charlatanism, had prospered among the credulous and superstitious. Zarathushtra reproved their greed and avarice. He exhorted the people to give up these superstitious practices and warned them that they were causing great harm by following such false teachers.39 His denunciation of their practices made them furious and now they sought his ruin. They accused him of preaching doctrines that were subversive of the religion of their forefathers and the established form of worship, and of blaspheming their gods. They incited the people to oppose him and made frantic appeals to the rulers of the land to drive him out from their midst.
Zarathushtra’s heart was burning with indignation against these hypocrisies. With his holy spirit aglow with righteous wrath, he called these Pharisees and Scribes of Iran, Kavis and Karapans or seeingly blind and hearingly deaf. These terms belong to the Indo-Iranian period and were evidently used in a good sense, before the Aryan groups separated. They share the fate of the cardinal word daeva and are assigned derogatory meaning in the Gathas. The Vedic hymns use the word kavi in the sense of a sage. It is freely applied to the seers and to Soma priests. It is further used as an epithet of gods. Agni, in particular, bears this honoured title.40 In the Gathas the word is curiously used with a double meaning. It is given a bad connotation whenever it is applied to the priests of the Daeva-worshippers. But the second Iranian dynasty is known as the Kavi or Kianian [Kayanian]. Its renowned kings who lived before the coming of Zarathushtra were Kavi Kavata, Kavi Usa, and Kavi Haosrava. Even Vishtaspa, who later became the royal patron of the new religion, retains this title and Zarathushtra speaks of him as Kavi Vishtaspa.41 It is significant, however, that Vishtaspa is the last king who shares this epithet with his royal predecessors. The kings who succeed him and with whom the dynasty dies out do not share the title. To the class of the Kavi belong the Karapan, corresponding to Skt. kalpa, ‘ritual,’ and the Usij, Skt. ushijah.

यहां हम इस विषय पर चर्चा करें तो बहक जाएंगे। संक्षेप में यह कहना ही पर्याप्त है कि वैदिक समाज के प्रति ईरानियों की घृणा इस हद तक है कि देव /दएव/शब्द ही इसमें दुष्टता का या शैतानी का पर्याय बन जाता है और इन्द्र की भी निन्दा की जाती है। सबसे रोचक है मागियों या मगों का वहां प्रभाव भी है जो भारतीय भूभाग में दलित बनने को बाध्य हुए! यहां उनकी उपस्थिति छठीं सहस्राब्दी ईपू से महगरा, मगहर आदि स्थायी बस्तियों से प्रमाणित होती है। यदि उस संघर्ष के फलस्वरूप उन्हें भारत से बाहर जाना पड़ा हो या यदि भारत की तरह ही उनके जत्थे ईरान तक पहले से बसे रहे हों और ईरानी क्षेत्र में उनका प्रभाव बढ़ा हो, तो यह हमारी ज्ञानसीमा से बाहर की बात है। इस पर गहनता से काम करने के बाद ही यह पेच सुलझ सकता है।

घृणा के ये बीज यदि शोषण दोहन और दंभ प्रदर्शन के कारण भारत से बाहर भारतीयों के विषय में बने रहे हों तो यह बात समझ में आती है, परन्तु सांस्कृतिक अग्रता, शिष्टता और न्यायप्रियता से भी घृणा पैदा हो सकती है इसकी चर्चा हम कल करेंगे।

Post – 2017-01-09

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 7

सिन्ताश्‍ता और आन्द्रोनोवो संस्कृतियों के लक्षण कुछ बाद में अपनी चरित्रगत विशिष्टताओं और वैविध्यों के साथ प्रकट हुए परन्तु एक बात पर कोई विमति नहीं दिखाई देती कि उस क्षेत्र में बहुत पहले से तीन भाषाभाषी समुदायों के लोग उपस्थित थे। ये तीन भाषाएं आज की शब्दावली में आर्य, द्रविड़ और मुंडा है! भारत में इन समुदायों की पृथक उपस्थिति है, इनके मेल से बनी भाषाएं भी मिलती हैं और इनके विभेद भी मिलते हैं। यह अलग विषय है और इस पर यहां चर्चा नहीं हो सकती।

मध्येशिया के विषय में हमारी जानकारी बहुत सीमित है और उस क्षेत्र की भाषाओं में, यहां तक कि मंगोल आदि में भी इनके कुछ तत्वों को तलाशा जा सकता है और आस्ट्रिया, उक्रेन और फिनलैंड आदि में मुंडारी तत्वों के प्रभाव अधिक गोचर हैं जिनके कारण इनको फिनोउग्रियन की संज्ञा दी गई है।

हम उस पांडित्य से बच कर अपनी बात रखना चाहते हैं जिसकी हर इबारत बार बार और कई तरीकों से दुहराए जाने के कारण सही, और जांचने के बाद गलत सिद्ध होती है। मुझे यदि अपनी समझ पर इतना भरोसा होता कि मैं मान पाता कि मैं यूरोप के असाधारण प्रतिभा और ज्ञानसंपन्न विद्वानों से अधिक प्रखर, अधिक ज्ञानी हूं, तो मुझे उनकी नीयत पर शक करने का कारण नहीं मिलता। मैं यह जानता हूं कि मैं उस ज्ञान और क्षमता का व्यक्ति हूं जिसे मीडियाकर या मध्यम समझ का व्यक्ति कहा जाता है इसलिए मुझे यह शिकायत करनी होती है कि जो बात मुझ जैसे मन्दबुद्धि की भी समझ में आती है वह उनकी समझ में क्यों न आई और यदि आई तो वे इसे छिपा क्यों ले गए!

परन्तु हम अपने प्रख्यात विद्वानों के विषय में क्या कहें। कहने को कुछ बचता है तो प्रचार शक्ति जिनके पास हो वे ऐसे असंभव काम भी कर सकते हैं जो तलवार भांजने वालों से संभव नहीं!

वे अपनी योजना के तहत बताते रहे कि उस क्षेत्र में (काला सागर के उत्‍तर दद्यनीपर और नीस्‍तर नदियों के अश्‍वबहुुल क्षेत्र) जिसे अमेरिकी पुरातत्वविद मारिजा जिंबुतास ने कुर्गान संस्कृति कहा था, उसमें आर्यभाषा भाषियों की सबसे पुरातन उपस्थिति दिखाई देती है और इसके प्रमाण उन्होंने अपने ढंग से दिए थे और यह बताया था कि ये उस क्षेत्र के अभिजात जन थे! अश्‍व पालन और अश्‍व प्रशिक्षण इन्होंने आरंभ किया । अश्‍वपालन करने वाले भी उनके सहायक थे और संभवत: उनके द्वारा संरक्षित भी। व्‍यापार पर स्‍वामित्‍व उनका था।

मैं जिंबुतास की ईमानदारी पर सन्देह नहीं करता, पर वह उस बहु प्रचारित मान्यता के प्रभाव में आ गई थीं कि आर्यजन पशुपालक थे और अश्‍वपालन का काम भी उन्होने ही आरंभ किया। यह सच है कि पशुपालन का आरंभ भारत में हुआ। परन्तु हमें यह भी समझना होगा कि पशुपालन है क्या।

जब आप पशुओं को घेर कर, उनका शिकार करते है, तात्कालिक उपयोग से अधिक पड़ने वालों काे बाद के लिए रोक कर रखते हो और उनका बाद में मांसाहार करते हैं तो यह रेवड़बन्दी है और जब आप उनको किसी अन्य स्रोत के लिए प्रयोग में लाते हों और उसमें अनुपयोगी को आहार के लिए प्रयोग में लाते हों तो यह पशुपालन है!

इसमें बकरी, भेड़, गाय और कुछ बाद में भैंस और उूंट का पालन किया गया! इस अन्य उपयोग में उनकी भारवहन क्षमता, गति आदि अनेक घटक आते हैं। जिनका कोई अन्य उपयोग नहीं हो सकता उनका मांसाहार किया जाता रहा है, जैसे हिरन, और दूध देने वाले जानवरों के नर । दूसरा कोई उपाय न था। इसलिए अन्य उपयोग में न आने वाले नर पशुओं और पक्षियों का वध होता रहा है, क्‍योंकि इसके बिना उनको जिला कर रखने का आर्थिक भार इतना अधिक होता कि इसका निर्वाह नहीं किया जा सकता था।

जिस चरण से आगे किसी प्राणी के नर का भी इतर उपयोग करने की सूझ पैैदा हुई उस चरण से आगे उसको बचाने की चिन्ता आरंभ हो हुई और अशिक्षित समाजों में इसे व्यवहार्य बनाने के लिए इसे वर्जना का रूप दिया गया । फतवा उसी का रूप है और यह इस बात की आशंका पैदा करता है कि क्या प्रचार और शिक्षा के साधनों के विकास के बाद वर्जना का सहारा लेने वाला समाज आघुनिक है या आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है!

बर्जना के बहुत सारे रूप हैं जिनमें प्राण जाय पर प्राणी न जाये की स्थिति आ जाती है, परन्तु है यह आधुनिक चुनौतियों के प्रतिकूल ही और जिस समाज में यह बना रहता है उसे पीछे ले जाने की योजना का अंग ही।

हम निवेदन यह कर रहे थे कि प्रचारतन्त्र के बल पर आर्यों को, यदि इस शब्द का प्रयोग वैदिक समाज के लिए या उसके व्यापारियों के लिए करते हुए उन्हें गंवार, पशुचारी, उपद्रवी आदि सिद्ध किया गया, तो उसका कहीं कोई साहित्यिक या पुरातात्विक प्रमाण न था। जिस बात के प्रमाण थे परन्तु उसको नकारा जा रहा था । और इसके दबाव में हमारे ऐसे विद्वान भी जिनको आत्मगौरव से शून्य नहीं माना जा सकता, वे भी ‘लगता तो नहीं है पर जब इतने लोग कर रहे हैं तो हो सकता है ऐसा ही हो’ के दबाव में आ कर उसका प्रतिरोध नहीं कर सके।

जहां जहां आर्यभाषाभाषियों की उपस्थिति के क्षीणतम प्रमाण पाए गए थे, उनमें कहीं भी उनको पशुपालक नहीं पाया गया! कुर्गान संस्कृति हो या मध्येशिया के वे स्थल – डैश्‍ली, सपल्ली, बख्‍तर मर्गियान संकुल – या इससे बहुत पहले उस संस्कृति जिसे कुर्गान संस्कृति का नाम दिया गया था, या लघु एशिया और ईरान में, सभी में उनके पुरातात्विक अवश्‍ोष यह प्रमाणित करते है कि वे अपने परिवेश के नागर संस्करों वाले, अपनी अलग-थलग प्राचीरवेष्ठित बस्ती बसा कर रहने वाले सर्वाधिक सभ्य जन थे, परन्तु इस पुरातत्व से उनकी काल्पनिक मान्यता की पुष्टि नहीं हो रही थी, इसलिए यह घोषित कर दिया कि आर्यों का पुरातत्व है ही नहीं! आर्य शब्‍द का अर्थ भी सभी मानते हैं सभ्‍य और सुसंस्‍क़त है । वे अपने को स्‍वयं अग्रणी मानते थे – तिस्र: प्रजा आर्या ज्‍योतिरग्रा ।

ऐसे स्थल या केन्द्र जो विदेशों में बसे थे, वे अधिक नहीं थे। उनका सही हिसाब किसी के पास न था। इनको स्वर्ग कहा जाता था, हम इसमें सुधार करते हुए इन्हें स्वर्गोपम कह सकते हैं, जैसे सुमेरी दिलमुन को या बहरीन में बने अड्डे को मानते थे या अरब भारत को जन्नतनिशां कहते थे या हम कश्‍मीर को कहने के आदी रहे हैं।

जहां सम्पन्नता, सौन्दर्य और वैभव हो वह स्वर्ग है इसलिए पुराने ग्रंथों में स्वर्ग की विविध दूरियां बताते हुए उनकी संख्या सात, नौ आदि बताई जाती थी।

हम यहां केवल यह प्रश्‍न करना चाहते हैं कि यदि ये अपने को दूसरों से इतना ऊपर समझते थे तो इनका स्थानीय जनों के प्रति व्यवहार क्या रहा होगा। इनकी अग्रता से चमत्कृत स्थानीय जन उन जैसा बनने का प्रयत्न करते हुए भी उनसे कितना अपमानित अनुभव करते रहे होंगे और इनसे कितनी घृणा पालते रहे होंगे? प्रेम तो नहीं कर सकते थे, उनके अनुचर या सहायक बनने को बाध्य थे, यह दूसरी बात थी ।

इसका दूसरा पक्ष यह कि व्यापार आदि कारणों से देशान्तर में जाने वाले और वहीं लंबे समय तक बस जाने वालों को भी भारतीय मूल भूमि से चिपके रहने वाले या केवल सार्थवाह का अंग बने रहने वाले, क्या सम्मान की दृष्टि से देखते रह सकते थे! वे इनके लिए व्रात्य या व्रतच्युत और पुनः संस्कार और प्रायश्चित के बाद ही समाज में प्रतिष्ठा पाने का अधिकारी मानते थे।

स्वयं अपने ही जनों में इसकी भिन्न प्रतिक्रियाएं होती रही होंगी परन्तु आर्यो के अपने श्रेष्ठताबोध और दूसरों के प्रति अवज्ञा भाव, म्लेच्छ, मृध्रवाज, वध्रिवाच आदि कह कर उनका अपमान, उनके मन में आर्यों के प्रति सम्मान का भाव जगाता रहा होगा या भयमिश्रित अनुपालन का ओर क्षतिपूर्ति के रूप में जुगुप्सा और घृणा का ?

हम इसका अनुमान ही कर सकते हैं क्योंकि इसके लिखित प्रमाण विरल हैं परन्तु उनको न सही परिप्रेक्ष्य में रखा गया न ही समझने का प्रयत्न किया गया। इन प्रमाणों की जितनी जानकारी है उस पर कल विचार करेंगे।