Post – 2017-10-25

क्या बिल गेट्स के कुकर्म हमारे अभक्त और मनसा विभक्त मित्रों की चिंता का विषय नहीं हैं?

Post – 2017-10-23

चित्रलेखन की परंपरा

क्या आपने चित्रलेखा नाम सुना है? क्या आप चित्रगुप्त नामक यमराज के लेखाकार से परिचित हैं? क्या आपने यह समझने की कोशिश की है कि भूमि के लेखाकार या कायस्थ (कार्यस्थ) अपना आदि पूर्वज जिस चित्रगुप्त को मानते हैं वह अपना अपना हिसाब किताब चित्रलिपि में लिखते थे और आज भी वह वर्णमाला से परिचित नहीं हो पाए हैं, उन महिलाओं की तरह जिन्हें शिक्षा से वंचित कर दिया गया था, परंतु जो चित्र लिपि में अपने भावों को प्रकट करती रहीं और इतिहास की चिंदियों को संजोने का काम करती रहीं जो कुछ विशेष आयोजनों तक सिमट कर रह गया। ऐसा ही एक अवसर है नव वधू के कक्ष का भित्तिचित्र जिसे कोहबर कहते हैं। कोहबर का अर्थ आप शायद न जानते हों। इसमें कोह तो खोह या गुफा है और बर घर का अपभ्रंश।

अब आप चाहें तो इस परंपरा को उस प्राचीन अवस्था से जोड़ सकते हैं जब हमारे पूर्वज शैलाश्रयों में रहते थे। इससे संभव है भीमबेटका के चित्रों का आशय समझने मां भी कुछ मदद मिले। भीम बेटका के चित्रों में कई युगों की कलाकारी देखने को मिलती है. कुछ तो बहुत प्राचीन और कुछ केवल दो चार हज़ार साल पुरानी। कभी लोग विवशता में गुफाओं में रहते थे तो बाद में कुछ लोग साधना या एकांतवास के लिए उनमे बसते रहे। सभ्यता के विकास के बावजूद कुछ जन अपनी प्राचीन परिपाटी के प्रति आसक्ति के कारण पिछड़े रहे तो कुछ को सभ्याता के क्रम में पैदा विषमता के कारण पिछली अवस्थाओं में रहने को विवश किया गया। ऐसा कूोई युग न था जब हमारा समाज एक साथ चिर आदिम अवस्थाओं से लेकर अति उन्नत अवस्था में एक साथ जीवित न रहा हो, फिर भी कुछ भी अपने आदिम निरालेपन को बचाए रह सका हो।

चित्र लिपि के साथ भी यही हुआ। इसका इतिहास हड़प्पा की मुद्राओं और चिन्हित भाँड़ो आदि से उससे अधिक पुराना है जितना पुराना आज से हड़प्पा का चरण। हड़प्पा को हम भूल गए थे इसके बाद भी उससे पांच सात हजार साल पहले की अवस्थाओं की स्मृति की हम रक्षा कर सके तो उन कथाओं के कारण जिन को चित्रलेखन के माध्यम से जीवित और उनके भाष्य के माध्यम से दृष्टिगोचर बनाते रहे।

यह याद मुझे उस चित्रलेखन के कारण आ गई जो अन्नकूट के अवसर पर गोबर से बनाया जाता था और जिसके कारण इसे हमारे यहाँ गोधन कहते थे। यह उस गोवर्धन पूजा से अलग है जो कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने के रूप में किन्ही क्षेत्रों में मनाया जाता है। यह पंडितों पुरोहितों की रचना है और मुझे दुविधा हुई कि यह ठीक परवा के दिन मनाया जाता था या अगले दिन तो अंतरजाल से शंकानिवारण करना चाहा तो पाया सभी में इसे श्रीकृष्ण के गोवर्धन उठाने के उपलक्ष्य में आयोजित माना गया है, कुछ उसी तरह जैसे दीपावली को राम की लंकाविजय के बाद अयोध्या वापसी के साथ जोड़ने की परम्परा है।

मैंने ऐसे ही घालमेल के बहुत सारे नमूनों को ध्यान में रख कर कहा था कि लाभ लोभ के वशीभूत सुपठित लोगों ने इतिहास का सत्यानाश किया है और महिलाओं ने और पिछड़े जुनों ने इसे अपनी अनमोल निधि के रूप में बचाने का प्रयत्न किया है। कमाल यह कि राम की अयोध्या वापसी के अगले ही दिन कृष्ण ने पर्वत उठा लिया।

गोवर्धन की कथा प्रतीकात्मक है, और विषयांतर के भय से मैं उसको न उठाऊँगा। परंतु गोवर्धन उठाने की प्रचलित कथा के अनुसार इंद्र का प्रकोप प्रलयंकर वृष्टि बन कर आया था जब कि क्वार के मध्य में ही वर्षा समाप्त हो जाती है और भूमि की आर्द्रता घटने लगती है। भूमि कार्तिक के मध्य तक जोताई के योग्य हो जाती है। अतः यह कृषि कर्म के आरंभ का पर्व है। कृष्ण का नहीं, बलराम (संकर्षण) का पर्व और एक तरह इंद्र की जीत का पर्व है, क्योंकि इन्द्र हल आधारित कृषि के जनक माने गए हैं जब भूमि पर स्वामित्व कायम हो गया था और कृषिकर्मी वर्ग उस पर आश्रित हो गया था – इंद्रः आसीत् सीरपतिः शतक्रतुः कीनाशः आसन् मरुतः सुदानव।

पर इसके साथ ही वह उन्नत व्यापार के भी देवता हैं। खुले हाथ लुटाने वाले दानी हैं। ऋग्वेद में क्षीरसागर वाले विष्णु और लक्ष्मी नहीं हैं, इंद्र हैं और भोग-विलास वाली इंद्राणी हैं।

अभिभुवेऽ विश्वजिते धनजिते स्वर्जिते सत्राजिते नृजिते उर्वराजिते ।
अश्वजिते गोजिते अब्जिते भर इन्द्राय सोमं यजताय हर्यतम् ।। ऋ. 2.21.1

भूरिदा भूरि देहि नो मा दभ्रं भूर्या भर ।
भूरि घेदिन्द्र दित्ससि ।। 4.32.20

अब इसे इसके ठीक पहले के दारिद्र्य भगाने के सूर्प-नाद के साथ आरंभ श्रीवृदधि के बहुमुखी प्रयत्नों पर दृष्टिपात करेः
1. किसान बैलों की आवभगत करता है। उन्हें साल में एक दिन, बिना कोई काम किए, जौ आदि की खिचड़ी और पकवान खाने को मिलता है। अगले दिन से उसे जीतोड़ मेहनत करनी है। इससे ही मुहावरा चला है, परुआ (परिवा का) बैल। इसका गाय या गोवंश से सीधा संबंध नहीं है।

2. इसके अगला दिन भैयादूज । सच कहें तो यह बनियों का पर्व है, बहनें अपने भाई से मिलने जा रही हैं जिसे या तो सुदूर व्यापार पर जाना है । भाई एक खतरनाक यात्रा पर जा रहा है इसलिए देना-पावना निपटा चुका है।

3. शरद् ऋतु वै वैश्य ऋतुः। इसी शरत् की उत्कंठा जीवेम शरदः शतम्, पश्येम शरदः शतम्, शृणुयाम शरदः शतम्, अदीनाः श्याम शरदः शतम् में व्यक्त हुई है:

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिव्र्यशेम देवहितं यदायुः ।।
शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ।। ऋ.1.89.8-9

4. इसी ऋतु में राज्यविस्तार के इच्छुक या पुरोहितों द्वारा प्रेरित राजा विजय के लिए निकलते थे, यह सर्वविदित है, जिसमें इतना और याद दिलाया जा सकता है कि इंद्र युद्ध और विजय के भी देवता हैः

मां नरः स्वश्वा वाजयन्तः मां वृताः समरणे हवन्ते ।
कृणोम्याजिं मघवाहमिन्द्र इयर्मि रेणुमभिभूत्योजाः ।। ऋ. 4.42.5

ये श्रीवृद्धि के अध्यवसायों और उपक्रमों से और यथार्थ से गहरे सरोकारों जुड़े पर्व हैं और ब्राह्मणों के ढकोसले नहीं हैं फिर भी ब्राह्मणों ने इनकी ऐतिहासिकता को समझे बिना अपनी ओर से जो जोड़ा बदला है, वह अनर्गल और बचकाना है।

गोधन गोवर्धन नहीं है। चरवाहों का पर्व नही है। किसानी से जुड़ा है। भैयादूज बनियों का पर्व है और क्षत्रियों का पर्व जीवित्त् पुत्रिका या जिउतिया है जो कुछ पहले सम्पन्न हो जाता है क्योंकि दीपावली के बाद तो राजा प्रयाण कर देगा उसकी सेना में जगह पाने वाले घर से पहले ही विदा हो चुके होंगे।

पर जिस चित्रलेखन का गोधन से सम्बन्ध है उसकी रचना और प्राचीनता पर तो बात हो नहीं पाई। इस पर कल चर्चा करेंगे। मैं चाहूँगा कि हमारे तर्कवादी मित्र भी इस पर नज़र डालं और गुण दोष पर चर्चा करें।

Post – 2017-10-22

इस्सर पइठे दलिद्दर निकले

आज भी यह नहीं बता सकता कि उन दिनों स्त्रियाँ सामान्य मनुष्य होती थीं या सिद्धि के गौरव से वंचित साधिकाएं। उनको भूख पर नियंत्रण था, प्यास पर नियंत्रण था, थकान पर नियंत्रण था, नींद पर नियंत्रण था, सपनों पर नियंत्रण था। तालिका लंबी है, परन्तु यदि वंचित किये जाने को अकुंठ भाव से स्वीकार करके उससे समायोजित हो जाने को साधना कहें तो अधिकार से वंचित और कर्त्तव्य के लिए बाध्य और शेष जन साधक ही रहे है। इनमें राजरानियों से लेकर नौकरानियां, अपने ही अनुशासित बच्चे तक अाते थे।

यहां मैं सामाजिक न्याय पर विचार नहीं कर रहा हूँ और करता होता तो केवल भारतीय समाज को कोसना तो कत्तई नहीं चाहता क्योंकि दुनिया में यह सर्वत्र रहा है और भारत की तुलना में अधिक असहय रहा है।

मैं आपका ध्यान इस विचित्र और शाश्वत सचाई की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि पुरुषों ने इतिहास को नष्ट किया है, और स्त्रियों उसे बचाया है। सत्ता और महत्त्व के भूखे लोगों ने इतिहास को नष्ट और विकृत किया है और वंचितों ने रक्षणीय को संभालने और बचाने का काम किया है, उसके लिए त्याग और बलिदान किया है। वर्चश्व के किए आतुर बुद्धिजीवियों उसे नष्ट और दूषित किया है और किसी अन्य युग की तुलना में आज अधिक उत्साह से यही कर रहे हैं, और वाचिक परंपरा के संरक्षकों ने संजोना और बचाने का काम किया है। मैं अपने शैशव के अनुभवों का अनुस्मरण करते हुए बाद की या अतीत की घटनाओं के हस्ताक्षेप से बचना चाहता हूँ परन्तु भौतिक जगत में चीजें जितनी अलग और एक दूसरे से दूर. यहाँ तर्क कि विरोधी होती हैं, स्मृति और स्वप्न, यहाँ तक कि दिवास्वप्न में भी पृथकता और दूरियां समाप्त हो जाती है और एक नया आलोक पैदा होता है जिसे तत्वज्ञान कहा जा सकता है. यदि ऐसा न होता तो ब्राह्मणों ने वेद को नष्ट करके उसे पुरुष सूक्त तक सीमित न कर दिया होता, और चारणों ने वेद की ख़ोज, पुराणेों की खोज, पुराने नीतिविधानो की खोज न की होती जिन्हें ब्राहमणों ने कभी अपनी बराबरी का दर्जा नही दिया. सोचिये क्या उन्होंने भार्गवों को, भांटो को अपनी बराबरी का दर्जा दिया?

यह समझ मुझमें इससे पहले न थी। दीपावली अमावस्या को होती है। इसके दीप वाले जगमग पक्ष पर ही हमारा ध्यान जाता है, दूसरे पक्ष ओझल रह जाते हैं। मैं नहीं जानता दूसरे अंचलों में क्या चलन था पर हमारे यहां दीपावली की धूमधाम के होते हुए भी भोजन सादा होता और सब्जी के नाम पर ओल (जिमीकंद / सूरन) का चोखा (भर्ता)। संभवतः यह उस आदिम आहारसंग्रही चरण के अभाव के उन दिनों की याद से जुड़ा था जब फल फूल और बेरियों का अभाव हो जाता था और जीवन यापन का एकमात्र सहारा कंद रह जाता था। अतः दीपावली के दो पक्ष हैं, प्रकाश अर्थात् अंधकार से मुक्ति, समृद्धि का प्रवेश अर्थात् अभाव और दारिद्र्य से मुक्ति। यदि एक का दैवीकरण लक्ष्मी में तो दूसरे का दानवीकरण भी होना ही था। लक्ष्मी के प्रवेश के बाद भी दारिद्र्य किसी कोने अँतरे में दुबका रह सकता है। उसे घर से भगाने का काम गृहलक्ष्मी को ही करना था।

पांच साल की उम्र तक मैं माई के साथ ही सोता था इसलिए इस का पहला अनुभव हैरान करने वाला था। पूजा आरती, प्रसाद, दिया जलाने खाना बनाने, खिलाने पिलाने के बाद देर रात गए सोने के बाद रात ढलते ही अंधरे में तड़ातड बजते सूप की आवाज से चौंक कर उठा जो एक कमरे से दूसरे कमरे मे एक एक कोने से ‘इस्सर पइठें दलिद्दर निकले’ बोलते दरिद्रता को हर कोने अंतरे से भगाते घर के बाहर तक उसका पीछा करने की आवाज अब पूरे वातावरण में गूंज रही थी, क्योंकि दलिद्दर के पिशाच को सभी घरों से भगाया जा रहा था। इसे दलिद्दर भगाना कहते थे।

लगता है इस ख़ास मामले में सूप ही दरिद्रता का प्रतीक माना जाता है क्योंकि वह अपने में रखे अनाज को फटक कर, डगरा कर या हिलोर कर बाहर कर दिया करता है। अपने पास कुछ जोड बटोर कर रखता नहीं।

पिटाई हंसिये से, गला काटना न हुआ पीटना ही हुआ। घर में औरतों के निकास का दरवाजा पीछे की ओर था और उसी ओर कुछ दूरी पर घूरा भी था। काफी दूर तक चहेंटने के बाद जर्जर दरिद्र राम अर्थात् सूप को घूरे पर या बस्ती के बाहर फेंक दिया जाता लिए वापस लौटने और उस हंसिया को जनाना निकास की ड्योढ़ी में डाल दिया गया था कुछ ऐसी धुंधली याद है और यदि यह सही है तो इसका कारण संभवतः यह रहा हो कि खून सने हथियार को शुद्ध करने के बाद ही घर में लाया जा सकता था।

ये सारे लटके तो खेती के आरंभ होने के बाद की हैं फिर भी संभव है दीपमालिका से अधिक पुराना हो।

ऋग्वेद में दीपक और दीपावली या लक्ष्मी पूजा के विषय में एक भी ऋचा नहीं है। दीपक का भी हवाला नहीं। अभाव और सूखे से लड़ने और उसका वध करने की कहानियों से पूरा ऋग्वेद भरा है।
केवल एक स्थल पर सोम की कृपा से धनिकों जैसा सुख पाने की कामना के सन्दर्भ में संदीपन का प्रयोग हुआ है ः

अग्निं न मा मथितं सं दिदीपः प्र चक्षय कृणुहि वस्यसो नः ।
अथा हि ते मद आ सोम मन्ये रेवाँइव प्र चरा पुष्टिमच्छ ।। 8.48.6

पर दीपक जलाने से इसे खींच तान कर भी नही जोड़ा जा सकता। परन्तु शिरिंबिष्ट भरद्वाज के एक सूक्त का विषय (देवता) ही अलक्ष्मीनाशनम् अर्थात दरिद्रता का विनाश है जिसमें इसे दूर किसी दूसरे देश – समुद्र या पर्वत के पार – भगाने का उल्लेख है

अरायि काणे विकटे गिरिं गच्छ सदान्वे।
शिरिंबिष्टस्य सत्वभि: ते चातयामसि ।।
चत्तो इतश्चत्तामुत: सर्वा भ्रूणानि आरुषी ।
अराय्यं ब्रह्मणस्पते तीक्ष्णशृंगो दृशन्निहि । २
अदो यद्दारु प्लवते सिन्धो: पारे अपूरुषम् ।
तदारभस्व दुर्हणो तेन गच्छ परस्तरम् ।१०.१५५.१-३

रोचक बात यह कि इसमें इसे एक कुरूप, कंजूस दानवी के रूप में कल्पित किया गया है जो ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के विलोम के रूप में कल्पित माना जा सकता है।

Post – 2017-10-20

इस्सर पइठें दरिद्दर निकले
(ऐश्वर्य अर्थात् समृद्धि का प्रवेश हो, दारिद्र्य इस्सर पइठें दरिद्दर निकले
(ऐश्वर्य अर्थात् समृद्धि का प्रवेश हो, दारिद्र्य दूर हो)

भूमिका
लक्ष्मी के प्रवेश के अगले ही दिन नई फसल की तैयारी और वह भी बैलों के भरपूर सम्मान और तुष्टि के साथ। इसकी स्मृतियों को टांकने से पहले, एक व्यतिक्रम दीपावली पर।

इसे राम की लंका विजय से वापसी से जोड़ करर देखने वाले पुरोहित और उनको प्रमाण मान कर आज की राजनीति करने वाले, इस बात को नहीं समझ सकते कि दीपावली में राम की कथा की एक खरोंच तक नहीं है। पर वैदिक विद्वान होने का दावा करने वाले और हमारे गौरंगप्रेमी और हीनाताग्रंथि से ग्रस्त भाजपाई साक्षरों के बीच समादृत अमेरिकी विद्वान ने दीवाली को वैदिक काल से जोड़ते हुए एक शेखचिल्लीपन दिखाया कि इसका सम्बन्ध चिताग्नि से है। समझदार माने जाने वालों की बौद्धिक दरिद्रता पर रोना आता है। इनमें अपने को आधुनिक और क्रान्तिकारी विचारों से लैस और इसी के कारण अकड़ी गर्दन के स्वामी मेरे मित्र जन तो आतो ही हैं, इतिहास और संस्कृति रक्षा के लिए आतुर और रीतियों और विश्वासों का फूहड़ आधुनिकीकरण करने वाले दक्षिणपंथी सोच की जमात दोनों से जुड़े लोग आते हैं। पहले वाले मिटाना या हटाना चाहते है। उनके अनमोल बोल के नमूनेः
1. छोड़ो इन बातों में क्या रखा है।
2. ये ब्राह्मणों के चोंचले ढकोसले हैं।
3. इनसे दिमागी पिछड़ापन पैदा होता है। वैज्ञानिक सोच में बाधा पैदा होती है।
4. सीधी बात रीति रिवाजों का इतना बोझ लेकर कोई समाज आधुनिक युग में आगे बढ़ा नहीं जा सकता।

ये दिमागी खोखलेपन के प्रमाण हैं और यदि ऐसे लोगों से कोई पूछे, इनसे मुक्त होकर आप ने कितनी प्रगति की है? जन दौरों में आत्मनिषेध और सांस्कृतिक निषेध की प्रवृत्ति नहीं थी, हमारे अपेक्षाकृत महान वैज्ञानिक, चिंतक, साहित्यकाऱ, फिल्मकार, समाजसुधारक, राजनेता, शिक्षाविद, यहां तक कि सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के लिए आंदोलनकारी उसी दौर में क्यों पैदा हुए और जब से तुम्हारा आत्मनिषेधवादी गरम दिमाग हावी हुआ सभी क्षेत्रों में विश्वविजय को आतुर जोगाड़ी छुटभैये ही क्यों पैदा हुए? तुम्हारे तर्कवादी तक क्यों तर्क करना नहीं जानते, कटूक्तियों, दुरुक्तियों, गालियों या सीधी कार्रवाई (डाइरेक्ट ऐक्शन) को तर्क मान लेते हैं और जब अति कर देते हैं तो सीधी कार्रवाई के शिकार उस समाज में हो जाते हैं जिसकी पिछड़ी अवस्थाओं में किसी भी जाति के अकेले सुधारकों ने अपनी खरी आलोचना के बल पर आंदोलन खड़े किए हैं और अपने अनुयायियों ही नहीं विरोधियों के बीच भी समादृत होते रहे हैं? तो राजनीति चमकाना तो चाहेंगे, पर जवाब देते न बनेगा।

जवाब यह है कि वे पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी थीं, उनमें आत्मबल था, इसलिए अपनी व्याधियों और विकृतियों की पहचान भी थी और उनसे लड़ने की क्षमता भी थी। तुम छिन्नमूल हो और मंत्रकीलित हो कर दंश मार रहे हो, जिनको मूलोच्चिन्न करने के प्रयत्न में लगे हो उनमे समझ नहीं पैदा कर पाते पर आक्रोश जानबूझ कर पैदा करते हो और परिणाम उल्टे आने पर कारणों की पहचान तक नहीं कर पाते फिर भी तर्कवादी हो।

जो भी हो इनकी लाख कोशिशों के बाद भी परिणाम उतने घातक नहीं रहे, क्योंकि वे हटाना, मिटाना या तोड़ना चाहते थे, विकृत करना नहीं।

इतिहास और संस्कृति के प्रति अंध अनुराग और अधकचरी समझ के कारण जिस तरह का महिमामंडन हो रहा है वह वामपंथियों द्वारा पहुंचाई गई क्षति से अधिक भयावह है।

यदि दक्षिणपंथियों से कोई पूछे कि तुम्हारी उक्तियों और कारगुजारियों से सांस्कृतिक उत्थान की जगह सांकृतिक हुडदंग क्यों पैदा हो रहा है और नित नए अनमोल बोल सुनाने को क्यों मिल रहे हैं जिन पर हनसने चलो तो भी रोना आता है और रोना चाहो तो हसी आती है (हँसी आती है अपने रोने पर और रोना है जग हँसाई का) तो जवाब इनसे भी देचते न बनेगा।

इतिहास की जितनी खोखली समझ हिंदुत्व के प्रति मूर्खतापूर्ण अनुराग में देखने को मिल रहा है वह वामपंथी नासमझी के सभी कीर्तिमानों को तोड़ गया है।

वामपंथी नासमझी का एक नमूना यह था कि शूद्र आपका इतिहास क्यों पढ़ें? यह तो सवर्णों का इतिहास है।
भले मानसों में से किसी ने नहीं समझाया कि सवर्णों का इतिहास यदि कागद पर कलम से लिखा गया है तो तुम्हारा इतिहास पत्थर की लकीरों से लिखा गया है। यदि मान भी लें कि सारी पोथियां सवर्णों का कीर्तिगान है तो समूची प्रौद्योगिकी तुम्हारी उंगलियों की देन और तुम्हारा प्रशास्तिलेख है। सारा पुरातत्व तुम्हारी महिमा की खोज ह। ऐसे तो थे हमारे आंख के अंधे पर मार्गदर्शक बनचने को आतुर वाममार्गी बुद्धिजीवी.।

परन्तु जब कोई कहे हुमायूं का मकबरा, अकबर का मकबरा, ताजमहल, लालकिला तो आक्रमणकारी और हिंदूद्रोही मुसलमानों के स्मारक है, हम इन पर गर्व नहीं कर सकते, तो उसे यह तो समझना चाहिए कि कलाकारों को धन और सरक्षण तो सदा ऐसे लोगों ने दिया है जिन्होंने अन्याय और अत्याचार से धन कमाया था पर कलाकृतियाँ तो उनकी नहीं है। धनदाता मुसलमान थे तो शिल्पकार हिन्दू, वे सभी हमारी कृतियाँ है। हिन्दू मुस्लिम में बांटने के बाद भी ये वास्तुकृतियाँ हमारी साझी विरासत है। ब्रिटिश मूर्तियों की बात अलग थी. शिल्प भी उनका था और शिल्पकार भी वे थे और उनका होना उनकी धाक और धौंस का सूचक था, जिन्हें हटा देना ही सही उपाय था।

भूमिका कुछ लंबी हो गई पर यह इस बात को समझने के लिए जरूरी थी कि पुरातत्व की ओर हमारी दृष्टि हाल में में अंग्रेजों की उस पड़ताल के कारण गई जिसमें वे यहां की प्राकृतिक जैव व वानस्पतिक संपदा, भूगर्भीय संपदा और खनिज भंडारों के साथ गड़े हुए खजानों का पता लगाना और उसे लूटना चाहते थे, पर जल्दी ही ये सभी वैज्ञानिक शाखाओं का रूप लेते चले गए। इसी तरह अपने शासन को अचल बनाने और प्रशासन को अधिक प्रभावकारी बनाने के लिए हमारी भाषाओं, सामािजक बुनावट, सांस्कृतिक भिन्नताओं, नृतात्विक संरचना को समझने और इन सभी के माध्यम से हीनताग्रन्थि, अलगाव और विद्वेष फैलाने तथा हमारे पुराणों पर आधारित परंपराबोध को इतिहास के नाम पर सर्जित अपने पुराणों को लादने के द्वारा किया। उनकी चाल को समझने वालों ने भी अपने आलस्य, कल्पनाहीनता और प्रलोभनों के कारण उन्हीं के मतों और मान्यताओं पर भरोसा करके अपनी मुश्किल आसान की। सांस्कृतिक मामले में वामपंथी दूसरों द्वारा उगलदान की तरह इस्तेमाल किए जाते रहे, इसलिए वे इतिहास, पुरातत्व और नृतत्व की अपनी साख तक बचाने की दिशा में सक्रिय नहीं हुए।
परन्तु जो लोग उनकी इस कमी को अपने उत्साह, अतिपाठ, अतिरंजना से नया पाठ तैयार कर रहे या करना चाहते हैं वे भी अपनी संस्कृति और इतिहास को नष्ट ही कर रहे हैं। दो तरह की विनाशकारी गतिविधियों में किसी एक को इसलिए सही नहीं माना जा सकता कि वह एक गलत चीज के विरोध में कही या लिखी गई है।

Post – 2017-10-19

कभी वहां था जहां आसमान खुलता था
अब वहां हैं जहां हर सिम्त बंद होती है.

Post – 2017-10-19

बुरे भी हैं आखिर तुम्हारे भरोसे
किसी दिन तो खोटी खरी बात कर लो.

Post – 2017-10-19

“All happy families are alike; each unhappy family is unhappy in its own way.”
― Leo Tolstoy, Anna Karenina

सभी सज्जन मानने को जानना कहते हैं और सभी दुर्जन सत्य का साक्षात्कार करते और उस पर विजय पाने के तरीकों का अनुसन्धान और आविष्कार करते हैं.
दीपावली का यह पर्व सबका है. सज्जनों का भी दुर्जनों का भी,
अकेला यह पर्व मेरा भी है “नाम्ना हि यो दुर्जनानां शिरोमणिः .”

Post – 2017-10-19

आलोकपर्व

एक चार साल का बच्चा क्या, किस तरह के और कितना काम कर सकता है? मुझे क्या करना पड़ता था, यह बिल्कुल याद नहीं, पर यह याद है कि माई अक्सर कहती, ईहै खैकवा केहू दुसरे के दे के कमवा करा ले आ तुहें माहुर दे के मारि डारै त अच्छा, अर्थात् जो खाना तुम्हें काम करने के लिए खिलाती हूँ वही खाना किसी दूसरे को दे कर काम करा लिया जाय और तुम्हें ज़हर देकर मार डाला जाय तो ही अच्छा (ऐसे प्रसंग पीड़क है परन्तु मैं इस उम्र में आपकी करुणा का भूखा तो नहीं हो सकता। प्रथम दृष्टि में नितांत तुच्छ और उपेक्षणीय प्रतीत होने वाले इन अनुभवों का अनुस्मरण मै अपने चेतन और अवचेतन की निर्माण-प्रक्रिया को, मानवीय, सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों पर अपने निजी दृष्टिकोण को स्वयं समझने के लिए कर रहा हूँ जो यदि पूरा जमाना एक ओर हो जाय पर मुझे गलत लगे तो भी, मुख्यधारा और तुच्छधारा की चिन्ता किए बिना अपने मत पर दूब जैसी विनम्रता के साथ अडिग रहता हूं। संभवतः इसका कारण यह है कि जो दूसरों के लिए पुस्तकीय ज्ञान या बौद्धिक विमर्श होता है जिसमें अपनी प्रतिभा और स्मृति के बल पर वे प्रत्येक अवसर के अनुरूप सही घटकों का चुनाव करते हैं वहां मेरे लिए एक खोज जो कभी पुरी नही होती पर अपने अधूरेपन में भी पुस्तकीय ज्ञान से अधिक समृद्ध होती है )।

माई के ऐसे वचन एकांत में सुनने को मिलते, दूसरों की श्रव्यसीमा भगवानजी कह कर पुकारती और स्वर में शहद की मिठास होती। अपमानित अनुभव करता था। दो कारणों थे। एक तो यह कि अपने ही घर में माई की नजर में मेरी हैसियत एक नौकर से अधिक न थी और मेरे जीवन की कोई कीमत न थी। दूसरे मैं अपनी पीड़ा किसी से बांट नहीं सकता था। उदारता या क्षमाशीलता के कारण नहीं, इस कटु सत्य के कारण कि दीदी और भैया को वह मारने चलती तो वे भागकर बच सकते थे, और ऊपर से बाबा से फटकार भी लगवा सकते थे जब कि मैं पकड़ में आ जाता था और मेरे कान उमेठते समय वह स्वयं भी भूल जाती थी कि कितने के बाद उमेठन कान के पर्दों पर बन आती है और जिस कान को स्पर्श तक नहीं किया गया पीड़ा की तरंगें उसे भी झंकृत करने लगती हैं।

जो लोग बचपन में दुलार भरे हाथों से कान उमेठ कर गालों पर पड़ी हल्की चपत से आगे के मरोड और दबाव से परिचित नहीं हैं उनके उपकार के लिए पांच साल बाद दीदी के विवाह के अवसर का एक दृश्यचित्र।

विवाह हमारी हैसियत को देखते अधिक समृद्ध परिवार में हआ था, ससुर जी रींवा रियासत में किसी प्रभावशाली पद पर थे इसलिए हाथियों घोड़ों की संख्या मेरे गांव के लिए अदृष्टपूर्व थी पर उनमें एक मदमस्त हाथी था। मद बहता हुआ और उस पर मक्खियां भिनभिनाती हुई, उसके चारों पावों को लोहे के कंटीले पट्टों से घेर कर चार जंजीरों के सहारे चार खूंटों से बांधकर रखा गया था फिर भी वह झूम रहा था। चलते समय उसे काबू में करने के लिए दो ऊंट थे। बताया गया कि यदि वह कोई उल्टी सीधी हरकत करे तो ऊंट उसके कान पकड़ सकते थे इसलिए वह उनकी उपस्थिति से ही सीधा बना रहता था। यदि बिगड़े हाथी को कान पकड़ने की दहशत में रख काबू मे रखा जा सकता है तो उससे आगे की उमेठने की पीड़ा के आतंक को आसानी से समझा जा सकता है। मैं माई के पीठपीछे भी उसकी शिकायत नहीं कर सकता था।

मुझे मरने का भय नहीं था। मुझमें मरने का साहस भी नही था। मरने के साथ एक क्षीण, असंभव और संभव के बीच की झिलमिलाहट थी कि तब मैं मां के पास पहुंच सकता हूं। मेरे लिए वह अनश्वर थी, जहां कहीं भी थी सदेह थी. मेरी यातना के क्षणों में अश्रु विगलित होकर मुझे निहारती, मेरे पास पहुंचने को छटपटाती फिर भी एक अलंघ्य दूरी और अभेद्य दीवार के कारण वहां से हिलने में असमर्थ। परलोक को मैं इसी रूप में कल्पित कर पाता। इससे मृत्यु के प्रति कोई आकर्षण तो पैदा नहीं होता, पर मृत्यु का भय कम हो जाता । तड़पती मां की कल्पना से मेरी तड़प बढ़ जाती परंतु इससे एक ऐसी आत्मिक तुष्टि मिलती थी जिसे सही नाम दे पाने की योग्यता मुझमें आज भी नहीं है। इसने कष्ट को एक ऐसी रंगत दे दी कि मेरी जिंदगी का लंबा हिस्सा, जवानी तक का, कष्ट में बीता पर मै दुखी कभी न रहा, अभाव ने दैन्य का रूप कभी न लिया – न अंतर्मन में न बाह्य आचरण मे।

मरने का भय इसलिए भी न था कि युह जानता था कि यह झुंझलाहट है। तब इतना ज्ञानी तो न था कि यह सोच सकूं कि इसमें क्रोध से अधिक अपनी आंतरिक व्यग्रता भी मिली हुई थी, कि वह मुझे कोसती हुई अपनी भौतिक स्थिति से भी ल़ड़ रही थी और महाप्रकृति से भी पर आज उसके चरित्र को अधिक तटस्थता से समझ सकता हूँ.।

एक नई बहू जिसे ऊंची आवाज में बोलने, खुलकर हंसने, यहां तक कि दुनिया को यह अटल सत्य भी सर्वविदित करने की भी छूट न थी कि उसे भी भूख और प्यास लगती है, थकान लगती है, नींद आती है। यहाँ तक कि उसे दर्द होता है या उसका जी अच्छा नहीं है यह कहने तक का अधिकार तक नहीं था। हाउस अरेस्ट को सजा कहा जाता है। अक्सर यह दंड किसी विद्रोही को दिया जाता है। हमारी अपनी ही लड़कियां जो विवाह से पहले हंसती, खेलती, गाती, चहकती, लड़ती, जिद करती थीं विवाह के साथ ही बिना किसी अपराध के गृहबन्दिनी ही नहीं, सश्रम गृहबन्दिनी बना दी जातीं, जिनके हंसने, बोलने, सोने तक के अधिकार सीमित ही नहीं कर दिए जाते, अपितु इस यातना को कुलगौरव के रूप में स्वीकृति देकर मूल्यपरंपरा का हिस्सा बनाकर इसपर गर्व करना भी सिखा दिया जाता या इसकी मांग की जाती।

बाहरी दुनिया से, अर्थात् अपने ही घर के बाहरी ओसारे-गोसवारे तक से सूचना-संचार तक के लिए उसे बच्चों पर ही निर्भर रहना था। दीदी और भैया ने विद्रोही तेवर अपना लिया था। काकी हमारे अलंग में सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी पर भैया और दीदी को फुसला-भड़का कर उसके लिए समस्यायें खड़ी करती रहतीं। काम में हाथ बंटाने वाला कोई नही। ले देकर मैं जो होकर भी किसी काम का नहीं। कोई ऐसा नहीं जिससे अपना दुख बता सके, अपनी घुटन बयान कर सके। उत्पीड़ित तो वह भी थी। एक ही अनुभव प्रक्रिया के कितने भिन्न और विरोधी आसंग होते हैं – दृश्य के भीतर कितने रंगों की कितनी अदृश्य परतें । कितना सतही होता है हमारा ज्ञान।

किसी भी स्रोत से लब्ध ज्ञान अनुभव के स्पर्श से आलोक में बदलता है, अन्यथा सूचना बहुल फुलझड़ी बन कर चमत्कार पैदा करके रह जाता है और किसी समस्या को समझने या उनके समाधान मे सहायक नहीं होता, उल्टे नई समस्याएं पैदा करता और पुरानी समस्याओं को असाध्य बनाता है।