Post – 2018-02-22

क्रान्तियां सत्ता का परिवर्तन नहीं है जिन्हें एक झटके में पूरा किया जा सके। ये व्यवस्था परिवर्तन हैं, जिनके लिए सत्ता का समर्थन या सहयोग जरूरी नहीं होता। न ही सत्ता बदलने से क्रान्ति की जा सकती है। बलप्रयोग से समाज का दिमाग नहीं बदला जा सकता। इनकी एकमात्र शक्ति अपरिहार्यता है। इन्हें रोका नहीं जा सकता। ये कभी पूरी नहीं हो पातीं, पर इनके प्रभाव से वे भी बचे नहीँ रह पाते जो किसी कारण यह ठान लेते हैं कि वे इनका विरोध करेंगे।एेसा न होता तो कृषिक्रान्ति के हजारों साल बाद दुनिया के बहुत सारे समाज आहारसंग्रह की अवस्था में न रह जाते। क्रान्तियों के भीतर कई तरह की उपक्रान्तियां अपरिहार्य बन कर आती है और उसे सुदृढ़ करती हैं। आज की औद्योगिक क्रान्ति का पहला चरण यान्त्रिक था, दूसरा इल्क्ट्रिकल और तीसरा इल्क्ट्रॉनिक चौथा रोबोटिक होने के कगार पर है। इन चरणों के पूरा होने में बहुत कम समय लगा है क्योंकि गति तेज होती चली गई है। यन्त्रयुग से पहले उपकरण या औजारयुग था जिसमें उत्पादन में व्यक्ति की अपनी प्रतिभा, कौशल, अध्यवसाय और लगन की सक्रिय भूमिका थी इसलिए काम के साथ सर्जनात्मक आनन्द जुड़ा हुआ था जिसे यन्त्र ने नष्ट कर दिया। अब यह खोज, आविष्कार और यन्त्रनिर्माण (टूलमेकिंग) तक सीमित रह गया है ।

पुरुष सूक्त कृषिक्रान्ति (जिसे नवपाषाण क्रान्ति भी कह लिया जाता है पर उसमें अव्याप्ति दोष है जो इसकी उपक्रान्तियों को नहीं समेट पाता) पूर्णता के चरण की रचना है। हम प्रयत्न करेंगे कि इसकी प्रत्येक ऋचा के उस भाव तक पहुंचें जिसको बहुगम्य बनाने के लिए मिथकीय रूपविधान का सहारा लिया गया है और फिर अन्त में समाहार करते हुए उन आन्तरिक क्रान्तियों का संकेत करें जिन्हें इसकी देन कहा जा सकता है।

इसकी पहली ऋचा है
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्॥१
इसमें सहस्र का अर्थ असंख्य है। असंख्य लोग, असंख्य हाथ, असंख्य पांव इस यज्ञ में जुटे हुए है, इसका प्रसार पूरी धरती पर हो चुका, इतना सब होने के बाद भी यह दश अंगुल में सिमटा हुआ है।
इसमें दशांगुलता को समझने के लिए तीन समीकरणों पर ध्यान देना होगा:
१. विष्णु का वामन रूप
२. यज्ञो वै विष्णु:
३. अग्नि: वै विष्णु: ।
त्वमग्न इन्द्रो वृषभ: सतां असि त्वं विष्णु: उरुगायो नमस्य:।
त्वं ब्रहमा रयिविद ब्रहमणस्पते त्वं विधर्त: सचसे पुरन्ध्या ।। २.१.३
यदि मैं कहूं वह अग्नि ही जिससे झाड़ झंखाड़ को जला कर कृषि के लिए जमीन की सफाई की जाती था विष्णु है, वही यज्ञ भी है। आग से आग लगाने का आयोजन (यज्ञेन यज्ञं अयजन्त देवा: तानि धर्माणि प्रथमानि आसन) एक बार लग जाने के बाद इसका तेजी से फैलना विष्णु का लंबे डग भरना है, और आग लगाकर आगे चलकर अग्नि के ही धरती पर उसके अाग के रूप में, तेजस्वी/प्रतिभाशाली व्यक्ति में, प्रतापी व्यक्ति में, ओषाधियों मे, काठ में, पत्थर में अव्यक्त रूप (ऋं.२.१.१), और अन्तरिक्ष में इन्द्र के रूप में और आकाश में सूर्य के रूप में विद्यमान होने के कारण, इसे विष्णु के तीन कदमों में तीनों लोकों को नापने के रूपक में ढाला गया।

उरुगाय का अर्थ है लंबे डग भरने वाला। वह विष्णु जिसके विषय में कहा गया है समूल्हं अस्य पांसुरे, सारा जगत उस विष्णु के पांवों की धूल पर निर्भर है, वह आग बुझन् के बाद की वह राख है जो अग्निदेव या विष्णु के धरती पर बढ़े चरणों से बैदा हुई है। आरंभ में इसी में बीज बोए जाते थे जो झूम खेती में हाल के दिनों तक चलता रहा ।

इस दशांगुलता में विष्णु के वामन रूप की आवृत्ति है मानें या सूर्य के धरती से दृश्य आकार को यह निर्णय आप स्वयं करें । सूर्य ही है जो धरती की परिक्रमा करता है और फिर भी इससे दूर अलग, छोटा सा दिखाई देता है – व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः ।। 7.99.3
अन्न ही सबका पालन करता है, वही समस्त (जीव) जगत को संभाले हुए है इसलिए जो पहले था आगे होगा सब इसी में समाए हुए है, यही अन्न पर पलने वाले सभी प्राणयों की दीर्घजीविता का कारण है:
पुरुष एव इदम् सर्यवं यत् भूतं यत च भव्यम्। उत अमृतत्वस्य ईशानो यत अन्नेन अतिरोहति॥। २
इसकी महिमा अपार है, और यह यज्ञ पुरुष या अग्नि उससे भी बड़ा है। इसके एक पाव में संसार के समस्त जीव हैं, और इसका तीन चौथाई ऊर्ध्व आकाश में है। इस ऋचा में और अगली ऋचा में विष्णु के विषय में अन्यत्र जो कुछ कहा गया है उसकी छाया है, (त्रीणिपदा वि चक्रमे विष्णु: गोपा अदाभ्य: । अतो धर्माणि धारयन्।

Post – 2018-02-20

ऋत्विज

इससे पहले कि हम पुरुष सूक्त की व्याख्या करें, कुछ संकल्पनाओं के विषय में स्पष्ट हो लेना इसलिए जरूरी है कि मैं लाख समझाऊं कि यज्ञ कृषिकर्म है, कर्मकांडी यज्ञ का हौवा चेतना में इस तरह घुसाया गया है कि तर्क से जो लोग इसके कायल हो जाएंगे उनके भी गले यह बात नहीं उतरेगी। कर्म, तप, व्रत, क्रतु, श्रम, यत्न सभी का अर्थ बदल दिया गया।
आप जानना चाहेंगे ऐसा क्यों किया गया? किया इसलिए गया कि भूसंपदा पर अधिकार हो जाने के बाद खेती का सारा काम तो शूद्र करने लगे थे। कर्म यदि श्रम कार्य हो, तो श्रमकार्य से विरत और सामाजिक प्रतिष्ठा में ऊपर माने जाने वाले दोनों वर्णों की हैसियत घट कर सबसे नीचे आ जाएगी, क्योंकि देवयुग (कृषि के आरंभिक चरण) में असुरों को अकर्मा, अव्रत, आदि कह कर उनकी निन्दा की जाती थी – अकर्मा दस्युः अभि नो अमन्तुः अन्यव्रतः अमानुषः । यदि यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है और यज्ञ उत्पादन है, तो उत्पादन के सारे काम तो शूद्र कर रहे हैं, अन्न उत्पादन से ले कर अन्य सभी वस्तुओं का उत्पादन। जरूरी नहीं है, पर यह संभव है कि आधुनिक अवस्था के वास्तविक यजमान या यज्ञ करने वाले इस परिभाषा से शूद्र हो गए, और यह एक कारण रहा हो शूद्रों के प्रति नि ष्ठुर वयवस्था का। ध्यान रहे कि यह स्थिति ऋग्वेद के समय तक आ चुकी थी। पर ऋग्वेद के ही अन्तःपाठ से वे सचाइयां भी सामने आती हैं जो आरंभिक अवस्था में थीं। इन्हीं में से एक है ऋतु का ध्यानः
इन्द्र सोमं पिब ऋतुना
ऋतुना यज्ञमाशाथे
अश्विना … ऋतुना यज्ञवाहसा
विश्वे देवा ऋतावृध ऋतुभिर् हवनश्रुतः
अग्ने यज्ञं नय ऋतुथा
नि षीद होत्रं ऋतुथा यजस्व
यज्ञ निष्पादकों में एक है ऋत्विज – ऋतु में यज्ञ करने वाला । कई बार अग्नि को ही ऋत्विज मन्द्रं होतारं ऋत्विजं चित्रभानुं विभावसुम् – कहा गया है।

ऋतु पर इतना बल इसलिए कि कृषि के आरंभिक कटु अनुभवों की कहानियां प्राचीन ग्रन्थों में दर्ज हैं। इन्हीं में से एक है, देवों से ऋतुएं रूठ गईं। अब नतीजा यह हुआ कि प्राकृतिक उत्पाद पर निर्भर करने वाले मजे में वन्य अनाज बटोर रहे थे और देवों की फसल ही बर्वाद हो गई। बहुत से देव विचलित हो कर असुर जीवनशैली की ओर लौट गए। देव ऋतुओं के पास गए। नाराजी का कारण पूछा। ऋतुओं ने कहा, यज्ञ में हमारा भी हिस्सा होना चाहिए। देव मानते नहीं तो क्या करते। पर क्या आप मानेंगे कि ऋतु और मुहूर्त की हमारी चिन्ता के मूल में भी कृषि का हाथ है और यज्ञ कृषिकर्म ही है। ठीक समय से बोआई न हुई तो सारी मेहनत अकारथ। पर यही कालगणन का भी कारण बना जिसका विकास ज्योतिर्विज्ञान में हुआ।

Post – 2018-02-20

ऋत्विज

इससे पहले कि हम पुरुष सूक्त की व्याख्या करें, कुछ संकल्पनाओं के विषय में स्पष्ट हो लेना इसलिए जरूरी है कि मैं लाख समझाऊं कि यज्ञ कृषिकर्म है, कर्मकांडी यज्ञ का हौवा चेतना में इस तरह घुसाया गया है कि तर्क से जो लोग इसके कायल हो जाएंगे उनके भी गले यह बात नहीं उतरेगी। कर्म, तप, व्रत, क्रतु, श्रम, यत्न सभी का अर्थ बदल दिया गया।
आप जानना चाहेंगे ऐसा क्यों किया गया? किया इसलिए गया कि भूसंपदा पर अधिकार हो जाने के बाद खेती का सारा काम तो शूद्र करने लगे थे। कर्म यदि श्रम कार्य हो, तो श्रमकार्य से विरत और सामाजिक प्रतिष्ठा में ऊपर माने जाने वाले दोनों वर्णों की हैसियत घट कर सबसे नीचे आ जाएगी, क्योंकि देवयुग (कृषि के आरंभिक चरण) में असुरों को अकर्मा, अव्रत, आदि कह कर उनकी निन्दा की जाती थी – अकर्मा दस्युः अभि नो अमन्तुः अन्यव्रतः अमानुषः । यदि यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है और यज्ञ उत्पादन है, तो उत्पादन के सारे काम तो शूद्र कर रहे हैं, अन्न उत्पादन से ले कर अन्य सभी वस्तुओं का उत्पादन। जरूरी नहीं है, पर यह संभव है कि आधुनिक अवस्था के वास्तविक यजमान या यज्ञ करने वाले इस परिभाषा से शूद्र हो गए, और यह एक कारण रहा हो शूद्रों के प्रति नि ष्ठुर वयवस्था का। ध्यान रहे कि यह स्थिति ऋग्वेद के समय तक आ चुकी थी। पर ऋग्वेद के ही अन्तःपाठ से वे सचाइयां भी सामने आती हैं जो आरंभिक अवस्था में थीं। इन्हीं में से एक है ऋतु का ध्यानः
इन्द्र सोमं पिब ऋतुना
ऋतुना यज्ञमाशाथे
अश्विना … ऋतुना यज्ञवाहसा
विश्वे देवा ऋतावृध ऋतुभिर् हवनश्रुतः
अग्ने यज्ञं नय ऋतुथा
नि षीद होत्रं ऋतुथा यजस्व
यज्ञ निष्पादकों में एक है ऋत्विज – ऋतु में यज्ञ करने वाला । कई बार अग्नि को ही ऋत्विज मन्द्रं होतारं ऋत्विजं चित्रभानुं विभावसुम् – कहा गया है।

ऋतु पर इतना बल इसलिए कि कृषि के आरंभिक कटु अनुभवों की कहानियां प्राचीन ग्रन्थों में दर्ज हैं। इन्हीं में से एक है, देवों से ऋतुएं रूठ गईं। अब नतीजा यह हुआ कि प्राकृतिक उत्पाद पर निर्भर करने वाले मजे में वन्य अनाज बटोर रहे थे और देवों की फसल ही बर्वाद हो गई। बहुत से देव विचलित हो कर असुर जीवनशैली की ओर लौट गए। देव ऋतुओं के पास गए। नाराजी का कारण पूछा। ऋतुओं ने कहा, यज्ञ में हमारा भी हिस्सा होना चाहिए। देव मानते नहीं तो क्या करते। पर क्या आप मानेंगे कि ऋतु और मुहूर्त की हमारी चिन्ता के मूल में भी कृषि का हाथ है और यज्ञ कृषिकर्म ही है। ठीक समय से बोआई न हुई तो सारी मेहनत अकारथ। पर यही कालगणन का भी कारण बना जिसका विकास ज्योतिर्विज्ञान में हुआ।

Post – 2018-02-20

ऋत्विज

इससे पहले कि हम पुरुष सूक्त की व्याख्या करें, कुछ संकल्पनाओं के विषय में स्पष्ट हो लेना इसलिए जरूरी है कि मैं लाख समझाऊं कि यज्ञ कृषिकर्म है, कर्मकांडी यज्ञ का हौवा चेतना में इस तरह घुसाया गया है कि तर्क से जो लोग इसके कायल हो जाएंगे उनके भी गले यह बात नहीं उतरेगी। कर्म, तप, व्रत, क्रतु, श्रम, यत्न सभी का अर्थ बदल दिया गया।
आप जानना चाहेंगे ऐसा क्यों किया गया? किया इसलिए गया कि भूसंपदा पर अधिकार हो जाने के बाद खेती का सारा काम तो शूद्र करने लगे थे। कर्म यदि श्रम कार्य हो, तो श्रमकार्य से विरत और सामाजिक प्रतिष्ठा में ऊपर माने जाने वाले दोनों वर्णों की हैसियत घट कर सबसे नीचे आ जाएगी, क्योंकि देवयुग (कृषि के आरंभिक चरण) में असुरों को अकर्मा, अव्रत, आदि कह कर उनकी निन्दा की जाती थी – अकर्मा दस्युः अभि नो अमन्तुः अन्यव्रतः अमानुषः । यदि यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है और यज्ञ उत्पादन है, तो उत्पादन के सारे काम तो शूद्र कर रहे हैं, अन्न उत्पादन से ले कर अन्य सभी वस्तुओं का उत्पादन। जरूरी नहीं है, पर यह संभव है कि आधुनिक अवस्था के वास्तविक यजमान या यज्ञ करने वाले इस परिभाषा से शूद्र हो गए, और यह एक कारण रहा हो शूद्रों के प्रति नि ष्ठुर वयवस्था का। ध्यान रहे कि यह स्थिति ऋग्वेद के समय तक आ चुकी थी। पर ऋग्वेद के ही अन्तःपाठ से वे सचाइयां भी सामने आती हैं जो आरंभिक अवस्था में थीं। इन्हीं में से एक है ऋतु का ध्यानः
इन्द्र सोमं पिब ऋतुना
ऋतुना यज्ञमाशाथे
अश्विना … ऋतुना यज्ञवाहसा
विश्वे देवा ऋतावृध ऋतुभिर् हवनश्रुतः
अग्ने यज्ञं नय ऋतुथा
नि षीद होत्रं ऋतुथा यजस्व
यज्ञ निष्पादकों में एक है ऋत्विज – ऋतु में यज्ञ करने वाला । कई बार अग्नि को ही ऋत्विज मन्द्रं होतारं ऋत्विजं चित्रभानुं विभावसुम् – कहा गया है।

ऋतु पर इतना बल इसलिए कि कृषि के आरंभिक कटु अनुभवों की कहानियां प्राचीन ग्रन्थों में दर्ज हैं। इन्हीं में से एक है, देवों से ऋतुएं रूठ गईं। अब नतीजा यह हुआ कि प्राकृतिक उत्पाद पर निर्भर करने वाले मजे में वन्य अनाज बटोर रहे थे और देवों की फसल ही बर्वाद हो गई। बहुत से देव विचलित हो कर असुर जीवनशैली की ओर लौट गए। देव ऋतुओं के पास गए। नाराजी का कारण पूछा। ऋतुओं ने कहा, यज्ञ में हमारा भी हिस्सा होना चाहिए। देव मानते नहीं तो क्या करते। पर क्या आप मानेंगे कि ऋतु और मुहूर्त की हमारी चिन्ता के मूल में भी कृषि का हाथ है और यज्ञ कृषिकर्म ही है। ठीक समय से बोआई न हुई तो सारी मेहनत अकारथ। पर यही कालगणन का भी कारण बना जिसका विकास ज्योतिर्विज्ञान में हुआ।

Post – 2018-02-19

वेद की समझ

पुरुष सूक्त पर बात करने के लिए वेद की जानकारी जरूरी नहीं। करोड़ों को वेद का नाम ही इसलिए पता होगा कि इसमें ब्राह्मण को परम पुरुष के मुख से उत्पन्न और शूद्र को उसके पांव से उत्पन्न बताया गया है। इन करोड़ों में मुख्यत: ब्राह्मण और शूद्र आते हैं और गौणत: दूसरे आते हैं। ऐसे ब्राह्मणों के लिए यह सूक्त ऐसा तोष देता है कि यदि उनका वश चले तो पूरे वेद को नष्ट भी होने दिया जाय, केवल यह सूक्त बचा रहे तो कोई फर्क न पड़ेगा। शूद्रों के लिए यह इतने रोष का विषय है कि यदि उनका वश चले तो वे इसके कारण पूरे वेद को उसी तरह आग के हवाले कर दें जैसे मनुस्मृति काे एक आयोजन में किया था, और ऐसा करने पर कोई क्षति न होगी। वास्तव में यदि पुरोहिती की जरूरतें न होतीं तो पढ़े लिखे ब्राह्मण तक यामायन सूक्तों और सूर्या सूक्त तक से परिचित न होते। ब्राहमणों की रुचि संस्कृति, धर्म और शास्त्र में केवल व्यावसायिक रही और राजनीतिक हो चली है, और इसलिए इनकी मुक्ति का एक ही उपाय है, इन्हें ब्राह्मणों के चंगुल से मुक्त करना। यह कहते हुए मुझे इसलिए भी पीड़ा हो रही है कि मेरे अघिकांश मित्र ब्राह्मण ही हैं (फेस बुक पर तो उनका अनुपात और भी अधिक है), जिन्हें इस टिप्पणी से ठेस पहुंच सकती है, परन्तु यदि चुनाव सभ्यता, संस्कृति और मित्रों की भावना के बीच करना पड़े तो वरीयता पहले को ही दूंगा।

मैंने क्यों यह प्रश्न उठा दिया इस प्रसंग में? इसलिए कि जैसे भाषा को अपने अधिकार में रखने के लिए उन्होंने सचेत रूप में दुरूह बनाया उसी तरह वेद आदि में रहस्यमयता और कर्मकांडीय पक्ष पर उनका ध्यान अधिक रहता है क्योंकि इसमें किसी बोध या निष्कर्ष पर पहुंचने की भले संभावना न हो, ‘इसमें कुछ है’ जपते हुए डूबते उतराते रहने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए ऋग्वेद का भौतिक पक्ष उनको वेदों का अवमूल्यन लगे तो मुझे हैरानी न होगी। रोचक बात यह कि यही अपेक्षा उन पाश्चात्य अध्येताओं की भी रही है जो कुतर्क का सहारा ले कर इसकी अंतर्वस्तु को नष्ट करके इसे एक पिछड़े, भावुक, कुहाच्छन्न और अन्तर्मुखी समाज की रचना सिद्ध करने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं।

मार्क्स के प्रति गहन आदरभाव के बाद भी मै यह कहने का दु:साहस करता हूं कि जब वह क्रान्ति की बात कर रहे थे तब उनका ध्यान सत्ता के चरित्र और इसके परिवर्तन पर अधिक था, क्रान्ति की अन्त:शक्ति और गतिकी पर नहीं था। यह बात पुरुषसूक्त को समझने से पहले नहीं कह सकता था। चाइल्ड, जिनका हम जिक्र कर आए हैं, के सामने तो लगता है कृषिक्रान्ति का कोई स्पष्ट खाका भी नहीं था। इसका जैसा मार्मिक चित्रण ऋग्वेद में हुआ है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं।

मेरा यह कथन कुछ लोगों को खींच तान लग सकता है, परन्तु मैं एेसे लोगों को यह नहीं समझा सकता कि जैसे औद्योगिक क्रान्ति ने तकनीक, विज्ञान, सूचना, कला, संवेदना और समग्र जीवनशैली को किसी न किसी पैमाने पर उन सुदूर अंधेरे कोनों मे दुनिया से कट कर रहने वाले लोगों तक को प्रभावित किया जो पहली नजर में इससे किसी संपर्क तक में नहीं दिखाई देते, ठीक वैसी ही सर्वव्यापी हलचल और परिवर्तन, बौद्धिक और आत्मिक ऊर्जा का वैसा ही उन्मोचन कृषि क्रान्ति ने की और ऋग्वेद उस क्रान्ति को मूर्त करने वाला सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख है। ऋग्वेद को कभी किसी ने इस दृष्टि से देखा ही नहीं, स्वयं मैंने भी नहीं क्योंकि मेरा ध्यान पहले इसके व्यापारिक महाजाल पर अधिक केन्द्रित था जो कृषिक्रान्ति का वैसा ही प्रतिफलन था जैसे औद्योगिक क्रान्ति का पूंजीवाद।

ऋगवेद का भी एक अन्य सूक्त जो कृषि क्रान्ति का, जिसे क्रान्ति न कह कर यज्ञ कहा गया है, जितना आह्लादकारी रूपकीय आख्यान है वैसा दूसरा कोई नहीं। हां, जिस सर्वव्यापी प्रभाव की बात हमने औद्योगिक क्रान्ति के विषय में कही है वैसे ही बहुसूत्री और सर्वव्यापी प्रभाव का अंकन उसमें(१०.१३०)में अवश्य हुआ है:
यो यज्ञो विश्वत: तन्तुभि: तत एकशतं देवकर्मेभि: आयत:।
इमे वयन्ति पितर: य आययु: प्र वय अप वय इति आसते तते।।
पुमान् एनं तनुत उत् कृणत्ति पुमान् वि तत्ने अधि नाके अस्मिन्।
इमे मयूखा उप सेदु: ऊँ सद सामानि चक्रु: तसराणि योतवे।।

परन्तु उसमें समस्त विश्व प्रसार को समेट लिया गया।

हमारे सामने इस समय दो समस्यायें हैं, एक यह कि मैं यह विश्वास दिला सकूं कि मैं किसी आवेश में, कोई बात सूझ जाने के कारण खींच तान कर इसे कृषि क्रान्ति नहीं बना रहा हूं, अपितु कृषियज्ञ ही पूरे ऋग्वेद में अन्तर्ध्वनित है और उसे कोई भी लक्ष्य कर सकता है। दूसरा उस सर्वव्यापी प्रभाव और परिवर्तन का ब्यौरा दूं जिसके कारण इसे क्रान्ति की संज्ञा देने का लोभ संवरण न कर सका।

पहले के विषय में निम्न तथ्यों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा:
१. इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि यज्ञ ऋग्वेद का केन्द्रीय विषय है और जैसा हम कह आए है यज्ञ का अर्थ है उत्पादन।
२. यज्ञ की वेदी ही समस्त जगत की नाभि है। वही धरती का (जिसका अर्थ खेती योग्य भूमि है) अन्त है। वेदी उर्वरा भूमि है। कहें यज्ञ की वेदी समस्त कृष्य भूमि का प्रतीक है। आगे जाकर कर्मकंडीय यज्ञ का भी संबंध कृषि से जोड़ा गया – यज्ञ से बादल बनते है, बादलों से हुई वृष्टि से खेती होती और अन्न पैदा होता है, और उससे समस्त जगत का पालन होता है – अन्नात भवति भूतानि पर्यजन्यात अन्न संभवः। यज्ञात भवति पर्जन्य: यज्ञः कर्म समुद्बव:। कहें यज्ञ कृषि उत्पादन है, और अपने व्यापक अर्थ में सभी तरह के उत्पादन काे समाहित कर लेता है।

३. वैदिक समाज का सबसे बड़ा शत्रु सूखा, मौसम का विपर्यय, और इसी को रूपकीय जामा देते हुए इन्द्र और वृत्र संघर्ष चलता है। जल चुरा कर भागने वाले बादलों से इन्द्र के युद्ध करने और जल बरसाने को विवश करने का विवरण ऋग्वेद के सूक्तों का विषय बन कर आता है।

(जारी)

Post – 2018-02-19

वेद की समझ

पुरुष सूक्त पर बात करने के लिए वेद की जानकारी जरूरी नहीं। करोड़ों को वेद का नाम ही इसलिए पता होगा कि इसमें ब्राह्मण को परम पुरुष के मुख से उत्पन्न और शूद्र को उसके पांव से उत्पन्न बताया गया है। इन करोड़ों में मुख्यत: ब्राह्मण और शूद्र आते हैं और गौणत: दूसरे आते हैं। ऐसे ब्राह्मणों के लिए यह सूक्त ऐसा तोष देता है कि यदि उनका वश चले तो पूरे वेद को नष्ट भी होने दिया जाय, केवल यह सूक्त बचा रहे तो कोई फर्क न पड़ेगा। शूद्रों के लिए यह इतने रोष का विषय है कि यदि उनका वश चले तो वे इसके कारण पूरे वेद को उसी तरह आग के हवाले कर दें जैसे मनुस्मृति काे एक आयोजन में किया था, और ऐसा करने पर कोई क्षति न होगी। वास्तव में यदि पुरोहिती की जरूरतें न होतीं तो पढ़े लिखे ब्राह्मण तक यामायन सूक्तों और सूर्या सूक्त तक से परिचित न होते। ब्राहमणों की रुचि संस्कृति, धर्म और शास्त्र में केवल व्यावसायिक रही और राजनीतिक हो चली है, और इसलिए इनकी मुक्ति का एक ही उपाय है, इन्हें ब्राह्मणों के चंगुल से मुक्त करना। यह कहते हुए मुझे इसलिए भी पीड़ा हो रही है कि मेरे अघिकांश मित्र ब्राह्मण ही हैं (फेस बुक पर तो उनका अनुपात और भी अधिक है), जिन्हें इस टिप्पणी से ठेस पहुंच सकती है, परन्तु यदि चुनाव सभ्यता, संस्कृति और मित्रों की भावना के बीच करना पड़े तो वरीयता पहले को ही दूंगा।

मैंने क्यों यह प्रश्न उठा दिया इस प्रसंग में? इसलिए कि जैसे भाषा को अपने अधिकार में रखने के लिए उन्होंने सचेत रूप में दुरूह बनाया उसी तरह वेद आदि में रहस्यमयता और कर्मकांडीय पक्ष पर उनका ध्यान अधिक रहता है क्योंकि इसमें किसी बोध या निष्कर्ष पर पहुंचने की भले संभावना न हो, ‘इसमें कुछ है’ जपते हुए डूबते उतराते रहने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए ऋग्वेद का भौतिक पक्ष उनको वेदों का अवमूल्यन लगे तो मुझे हैरानी न होगी। रोचक बात यह कि यही अपेक्षा उन पाश्चात्य अध्येताओं की भी रही है जो कुतर्क का सहारा ले कर इसकी अंतर्वस्तु को नष्ट करके इसे एक पिछड़े, भावुक, कुहाच्छन्न और अन्तर्मुखी समाज की रचना सिद्ध करने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं।

मार्क्स के प्रति गहन आदरभाव के बाद भी मै यह कहने का दु:साहस करता हूं कि जब वह क्रान्ति की बात कर रहे थे तब उनका ध्यान सत्ता के चरित्र और इसके परिवर्तन पर अधिक था, क्रान्ति की अन्त:शक्ति और गतिकी पर नहीं था। यह बात पुरुषसूक्त को समझने से पहले नहीं कह सकता था। चाइल्ड, जिनका हम जिक्र कर आए हैं, के सामने तो लगता है कृषिक्रान्ति का कोई स्पष्ट खाका भी नहीं था। इसका जैसा मार्मिक चित्रण ऋग्वेद में हुआ है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं।

मेरा यह कथन कुछ लोगों को खींच तान लग सकता है, परन्तु मैं एेसे लोगों को यह नहीं समझा सकता कि जैसे औद्योगिक क्रान्ति ने तकनीक, विज्ञान, सूचना, कला, संवेदना और समग्र जीवनशैली को किसी न किसी पैमाने पर उन सुदूर अंधेरे कोनों मे दुनिया से कट कर रहने वाले लोगों तक को प्रभावित किया जो पहली नजर में इससे किसी संपर्क तक में नहीं दिखाई देते, ठीक वैसी ही सर्वव्यापी हलचल और परिवर्तन, बौद्धिक और आत्मिक ऊर्जा का वैसा ही उन्मोचन कृषि क्रान्ति ने की और ऋग्वेद उस क्रान्ति को मूर्त करने वाला सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख है। ऋग्वेद को कभी किसी ने इस दृष्टि से देखा ही नहीं, स्वयं मैंने भी नहीं क्योंकि मेरा ध्यान पहले इसके व्यापारिक महाजाल पर अधिक केन्द्रित था जो कृषिक्रान्ति का वैसा ही प्रतिफलन था जैसे औद्योगिक क्रान्ति का पूंजीवाद।

ऋगवेद का भी एक अन्य सूक्त जो कृषि क्रान्ति का, जिसे क्रान्ति न कह कर यज्ञ कहा गया है, जितना आह्लादकारी रूपकीय आख्यान है वैसा दूसरा कोई नहीं। हां, जिस सर्वव्यापी प्रभाव की बात हमने औद्योगिक क्रान्ति के विषय में कही है वैसे ही बहुसूत्री और सर्वव्यापी प्रभाव का अंकन उसमें(१०.१३०)में अवश्य हुआ है:
यो यज्ञो विश्वत: तन्तुभि: तत एकशतं देवकर्मेभि: आयत:।
इमे वयन्ति पितर: य आययु: प्र वय अप वय इति आसते तते।।
पुमान् एनं तनुत उत् कृणत्ति पुमान् वि तत्ने अधि नाके अस्मिन्।
इमे मयूखा उप सेदु: ऊँ सद सामानि चक्रु: तसराणि योतवे।।

परन्तु उसमें समस्त विश्व प्रसार को समेट लिया गया।

हमारे सामने इस समय दो समस्यायें हैं, एक यह कि मैं यह विश्वास दिला सकूं कि मैं किसी आवेश में, कोई बात सूझ जाने के कारण खींच तान कर इसे कृषि क्रान्ति नहीं बना रहा हूं, अपितु कृषियज्ञ ही पूरे ऋग्वेद में अन्तर्ध्वनित है और उसे कोई भी लक्ष्य कर सकता है। दूसरा उस सर्वव्यापी प्रभाव और परिवर्तन का ब्यौरा दूं जिसके कारण इसे क्रान्ति की संज्ञा देने का लोभ संवरण न कर सका।

पहले के विषय में निम्न तथ्यों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा:
१. इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि यज्ञ ऋग्वेद का केन्द्रीय विषय है और जैसा हम कह आए है यज्ञ का अर्थ है उत्पादन।
२. यज्ञ की वेदी ही समस्त जगत की नाभि है। वही धरती का (जिसका अर्थ खेती योग्य भूमि है) अन्त है। वेदी उर्वरा भूमि है। कहें यज्ञ की वेदी समस्त कृष्य भूमि का प्रतीक है। आगे जाकर कर्मकंडीय यज्ञ का भी संबंध कृषि से जोड़ा गया – यज्ञ से बादल बनते है, बादलों से हुई वृष्टि से खेती होती और अन्न पैदा होता है, और उससे समस्त जगत का पालन होता है – अन्नात भवति भूतानि पर्यजन्यात अन्न संभवः। यज्ञात भवति पर्जन्य: यज्ञः कर्म समुद्बव:। कहें यज्ञ कृषि उत्पादन है, और अपने व्यापक अर्थ में सभी तरह के उत्पादन काे समाहित कर लेता है।

३. वैदिक समाज का सबसे बड़ा शत्रु सूखा, मौसम का विपर्यय, और इसी को रूपकीय जामा देते हुए इन्द्र और वृत्र संघर्ष चलता है। जल चुरा कर भागने वाले बादलों से इन्द्र के युद्ध करने और जल बरसाने को विवश करने का विवरण ऋग्वेद के सूक्तों का विषय बन कर आता है।

(जारी)

Post – 2018-02-19

वेद की समझ

पुरुष सूक्त पर बात करने के लिए वेद की जानकारी जरूरी नहीं। करोड़ों को वेद का नाम ही इसलिए पता होगा कि इसमें ब्राह्मण को परम पुरुष के मुख से उत्पन्न और शूद्र को उसके पांव से उत्पन्न बताया गया है। इन करोड़ों में मुख्यत: ब्राह्मण और शूद्र आते हैं और गौणत: दूसरे आते हैं। ऐसे ब्राह्मणों के लिए यह सूक्त ऐसा तोष देता है कि यदि उनका वश चले तो पूरे वेद को नष्ट भी होने दिया जाय, केवल यह सूक्त बचा रहे तो कोई फर्क न पड़ेगा। शूद्रों के लिए यह इतने रोष का विषय है कि यदि उनका वश चले तो वे इसके कारण पूरे वेद को उसी तरह आग के हवाले कर दें जैसे मनुस्मृति काे एक आयोजन में किया था, और ऐसा करने पर कोई क्षति न होगी। वास्तव में यदि पुरोहिती की जरूरतें न होतीं तो पढ़े लिखे ब्राह्मण तक यामायन सूक्तों और सूर्या सूक्त तक से परिचित न होते। ब्राहमणों की रुचि संस्कृति, धर्म और शास्त्र में केवल व्यावसायिक रही और राजनीतिक हो चली है, और इसलिए इनकी मुक्ति का एक ही उपाय है, इन्हें ब्राह्मणों के चंगुल से मुक्त करना। यह कहते हुए मुझे इसलिए भी पीड़ा हो रही है कि मेरे अघिकांश मित्र ब्राह्मण ही हैं (फेस बुक पर तो उनका अनुपात और भी अधिक है), जिन्हें इस टिप्पणी से ठेस पहुंच सकती है, परन्तु यदि चुनाव सभ्यता, संस्कृति और मित्रों की भावना के बीच करना पड़े तो वरीयता पहले को ही दूंगा।

मैंने क्यों यह प्रश्न उठा दिया इस प्रसंग में? इसलिए कि जैसे भाषा को अपने अधिकार में रखने के लिए उन्होंने सचेत रूप में दुरूह बनाया उसी तरह वेद आदि में रहस्यमयता और कर्मकांडीय पक्ष पर उनका ध्यान अधिक रहता है क्योंकि इसमें किसी बोध या निष्कर्ष पर पहुंचने की भले संभावना न हो, ‘इसमें कुछ है’ जपते हुए डूबते उतराते रहने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए ऋग्वेद का भौतिक पक्ष उनको वेदों का अवमूल्यन लगे तो मुझे हैरानी न होगी। रोचक बात यह कि यही अपेक्षा उन पाश्चात्य अध्येताओं की भी रही है जो कुतर्क का सहारा ले कर इसकी अंतर्वस्तु को नष्ट करके इसे एक पिछड़े, भावुक, कुहाच्छन्न और अन्तर्मुखी समाज की रचना सिद्ध करने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं।

मार्क्स के प्रति गहन आदरभाव के बाद भी मै यह कहने का दु:साहस करता हूं कि जब वह क्रान्ति की बात कर रहे थे तब उनका ध्यान सत्ता के चरित्र और इसके परिवर्तन पर अधिक था, क्रान्ति की अन्त:शक्ति और गतिकी पर नहीं था। यह बात पुरुषसूक्त को समझने से पहले नहीं कह सकता था। चाइल्ड, जिनका हम जिक्र कर आए हैं, के सामने तो लगता है कृषिक्रान्ति का कोई स्पष्ट खाका भी नहीं था। इसका जैसा मार्मिक चित्रण ऋग्वेद में हुआ है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं।

मेरा यह कथन कुछ लोगों को खींच तान लग सकता है, परन्तु मैं एेसे लोगों को यह नहीं समझा सकता कि जैसे औद्योगिक क्रान्ति ने तकनीक, विज्ञान, सूचना, कला, संवेदना और समग्र जीवनशैली को किसी न किसी पैमाने पर उन सुदूर अंधेरे कोनों मे दुनिया से कट कर रहने वाले लोगों तक को प्रभावित किया जो पहली नजर में इससे किसी संपर्क तक में नहीं दिखाई देते, ठीक वैसी ही सर्वव्यापी हलचल और परिवर्तन, बौद्धिक और आत्मिक ऊर्जा का वैसा ही उन्मोचन कृषि क्रान्ति ने की और ऋग्वेद उस क्रान्ति को मूर्त करने वाला सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख है। ऋग्वेद को कभी किसी ने इस दृष्टि से देखा ही नहीं, स्वयं मैंने भी नहीं क्योंकि मेरा ध्यान पहले इसके व्यापारिक महाजाल पर अधिक केन्द्रित था जो कृषिक्रान्ति का वैसा ही प्रतिफलन था जैसे औद्योगिक क्रान्ति का पूंजीवाद।

ऋगवेद का भी एक अन्य सूक्त जो कृषि क्रान्ति का, जिसे क्रान्ति न कह कर यज्ञ कहा गया है, जितना आह्लादकारी रूपकीय आख्यान है वैसा दूसरा कोई नहीं। हां, जिस सर्वव्यापी प्रभाव की बात हमने औद्योगिक क्रान्ति के विषय में कही है वैसे ही बहुसूत्री और सर्वव्यापी प्रभाव का अंकन उसमें(१०.१३०)में अवश्य हुआ है:
यो यज्ञो विश्वत: तन्तुभि: तत एकशतं देवकर्मेभि: आयत:।
इमे वयन्ति पितर: य आययु: प्र वय अप वय इति आसते तते।।
पुमान् एनं तनुत उत् कृणत्ति पुमान् वि तत्ने अधि नाके अस्मिन्।
इमे मयूखा उप सेदु: ऊँ सद सामानि चक्रु: तसराणि योतवे।।

परन्तु उसमें समस्त विश्व प्रसार को समेट लिया गया।

हमारे सामने इस समय दो समस्यायें हैं, एक यह कि मैं यह विश्वास दिला सकूं कि मैं किसी आवेश में, कोई बात सूझ जाने के कारण खींच तान कर इसे कृषि क्रान्ति नहीं बना रहा हूं, अपितु कृषियज्ञ ही पूरे ऋग्वेद में अन्तर्ध्वनित है और उसे कोई भी लक्ष्य कर सकता है। दूसरा उस सर्वव्यापी प्रभाव और परिवर्तन का ब्यौरा दूं जिसके कारण इसे क्रान्ति की संज्ञा देने का लोभ संवरण न कर सका।

पहले के विषय में निम्न तथ्यों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा:
१. इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि यज्ञ ऋग्वेद का केन्द्रीय विषय है और जैसा हम कह आए है यज्ञ का अर्थ है उत्पादन।
२. यज्ञ की वेदी ही समस्त जगत की नाभि है। वही धरती का (जिसका अर्थ खेती योग्य भूमि है) अन्त है। वेदी उर्वरा भूमि है। कहें यज्ञ की वेदी समस्त कृष्य भूमि का प्रतीक है। आगे जाकर कर्मकंडीय यज्ञ का भी संबंध कृषि से जोड़ा गया – यज्ञ से बादल बनते है, बादलों से हुई वृष्टि से खेती होती और अन्न पैदा होता है, और उससे समस्त जगत का पालन होता है – अन्नात भवति भूतानि पर्यजन्यात अन्न संभवः। यज्ञात भवति पर्जन्य: यज्ञः कर्म समुद्बव:। कहें यज्ञ कृषि उत्पादन है, और अपने व्यापक अर्थ में सभी तरह के उत्पादन काे समाहित कर लेता है।

३. वैदिक समाज का सबसे बड़ा शत्रु सूखा, मौसम का विपर्यय, और इसी को रूपकीय जामा देते हुए इन्द्र और वृत्र संघर्ष चलता है। जल चुरा कर भागने वाले बादलों से इन्द्र के युद्ध करने और जल बरसाने को विवश करने का विवरण ऋग्वेद के सूक्तों का विषय बन कर आता है।

(जारी)

Post – 2018-02-18

तिमिर के उस पार

कल की पोस्ट पर दो मित्रों ने कुछ ऐसी जिज्ञासाएं की हैं जिनके लिए मैं प्राय: अनुरोध करता रहता हूं, क्योंकि अपनी बात को स्पष्ट करने के प्रयत्न लंबाई काफी बढ जाती है और अनेक मित्रों की शिकायत सुनने को मिलती है। मेरी पीड़ा यह है कि फिर भी बात पूरी नहीं हो पाती। उसी विषय को बार बार स्वयं उठा नहीं सकता, इसलिए अपेक्षा करता हूं कि कोई सटीक प्रश्न करे तो उस पक्ष को भी स्पष्ट करूँ। प्रसन्नता है कि यह काम पहली बार सनातन कालयात्री और आनन्द प्रकाश ने किया है।

सनातनकाल यात्री के प्रश्न निम्न हैं:
आदिम वर्जनाओं, उनके अनुपालन या तोड़ने से सम्बंधित लिखित या अन्य प्रमाण उपलब्ध हैं या तार्किक निष्पत्तियों से ही माना जाता है?
धरती चीरने से सम्बन्धित कोई मान्यता?
लेख से लगता है कि पशु पालन कृषि के पश्चात आरम्भ हुआ। पुरातात्विक प्रमाण या विस्तृत विवेचन कहीं उपलब्ध हैं?
एक बात ध्यान में आई है _ बचपन में भूमि पर लिखने से हमें मना किया जाता था। कहते थे कि उससे ऋण बढ़ता है। लेख में वर्णित बातों से इसका सम्बन्ध हो सकता है क्या?

आनन्दप्रकाश की मांग निम्न प्रकार है:
असुरों-देवों के व्यवहार की विविधता और उसके कारणों की व्याख्या करिए ताकि कथित आर्यों-अनार्यों के सही भेद सामने आ सकें। इससे इधर उभरे दलित विमर्श को बहुत लाभ होगा। आप उन बिरलों मेंं हैं जो यह कर सकते हैं।

1. वायु पुराण में यह उल्लेख है कि प्राचीन काल में मनुष्य निर्बन्ध था, जो जी में आता था करता था और उसके आचरण पर कोई नैतिक प्रतिबंध न था। महाभारत के स्त्रीपर्व में कुंती प्राचीन अवस्था मे मुक्ताचार के प्रचलन की बात करती हैं – पुरा किल स्वतंत्रा स्त्रियः आसन वरानने, कामारण्य विहारिण्यः स्वतंत्राः कलहासिनी। एक उपनिषद कथा में गालव की पत्नी को कोई दूसरा ऋषि कामतुष्टि के लिए मांग कर ले जाता है । उनके पुत्र श्वेतकेतु को यह बुरा लगता है। वह इस पर आपत्ति करता है। उत्तर में गालव कहते हैं स्त्रियां गाय की तरह होती हैं, उनके साथ कोई भी संबंध बना सकता है। इससे खिन्न श्वेतकेतु विवाह संस्था की स्थापना करते हैं।

गालव श्वेतकेतु की कथा को इतिहास मानना उचित नहीं है। शंकराचार्य ने अपने भाष्य में उपनिषद की कथाओं को आख्यायिका कहा है। ये अति प्राचीन अवस्थाओं की जातीय स्मृतियां हैं। हाल तक अनेक देशों के आदिम समाजों में यह रिवाज रहा है।

अतः हम पाते हैं, पहला चरण मुक्ताचार, दूसरा सहजीवन और तीसरा एकनिष्ठ आजीवन सहसंबंध, जिसके लिए सामाजिक मर्यादाएं और वैधताएं नियत की गईं।

इसे यदि हम समाज की आर्थिक-विकास की यात्रा को सामने रखते हुए समझना चाहे तो बहुत सुविधा होगी। निजी संपदा की ओर बढ़ते मनुष्य का संपत्ति पर अधिकार के समानान्तर साहचर्य पर भी अधिकार बढ़ता गया है जो अटूट निष्ठा की माग और अधीनस्थ की यौन शुचिता की मांग बनती चली गई। भारत आज पाषाण युग से परमाणु युग तक एक साथ जीने वाला नुमायशी देश है और इसमें आठ विवाह-रीतियां तो समाज स्वीकृत रही हैं। आदिम अवस्था के मुक्ताचार से लेकर सभी तरह के साहचर्य इसके किसी न किसी अचल में आज भी मिल जाते हैं।

२. जोताई को धरती माता को चीरने के समकक्ष माना जाता था, असुरों के कृषि से परहेज का यह एक प्रधान कारण था। देव समाज भी असुर समाज से निकला था इसलिए ग्रन्थि उसके मन में भी थी। धरती इसका बदला न ले इसलिए वह माफी मांग लेता था। जैसे रुद्र जो नरभक्षी अवस्था के देव थे, पूरुषघ्न थे, उनसे प्रार्थना करता था, अपने बाण का रुख दूसरी ओर रखना, मेरी हमारे लोगों और जानवरों पर दया करना – शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे – उसी तरह धरती मां से भी याचना करता था, ‘पृथिवी मात: मा मा हिंसी:।

दीवार आदि पर लकीर खींचने का संदर्भ अलग है। यह बहुत बाद में गणना आरंभ होने की प्राथमिक अवस्था का चिन्ह है। किसी का कर्ज आदि भूले नहीं इसलिए दीवार आदि पर उसका लकीर खींचना। यह कर्ज चढ़ने की आशंका के कारण वर्जित था।

३. पहले मैं भी समझता था कि पशुपालन खेती से पुराना है। कालिन रेनफ्रू (Renfrew) ने इस पर पर्याप्त पुरातात्विक साक्ष्य देकर यह प्रमाणित किया कि पशुपालन खेती के बाद आरंभ हुआ और इसके बिना संभव न था। उससे पहले पशुओं का शिकार और रेवड़बन्दी प्रचलित थी जिसमे पालन प्रधान न होकर भक्षण प्रधान था।

आनन्द प्रकाश जी का प्रश्न बड़ा है क्योंकि छोटा काम, यहां तक कि छोटा सवाल तक उन्हें पसंद नहीं। बड़े सवाल का बड़ा जवाब, गरज कि पोथे से नीचे बात न बनेगी। वादा करके फंस गया इसलिए इसका जवाब एक इतिवृत्त के रूप में देना उचित लगता है। देव परंपरा, जिससे ही सवर्ण समाज पैदा हुआ, यह मानता है कि वह स्वयं भी उसी समाज या अवस्था से निकला है जिसमें असुर हैं। वह उनका सौतेला भाई है। पिता एक माताएं दो। दिति और अदिति।माताएं जीविका की भिन्न रीतियों से संबंध रखती हैं। बड़े भाई, असुर, छोटे देवता। असुर संख्या में अधिक, और अधिक शक्तिशाली (बलीयांस: भूयांसश्च असुराः) स्वभाव से गर्वीले (मन्यमान), जाहिर है देव संख्या में कम (अल्पीयांस), रिश्ते में छोटे (कनीयस्विन्) और असुरों से डरे हुए (ते वै देवा: असुर-रक्षसेभ्य: बिभयांश्चक्रु:)।

दोनों में विरोध यज्ञ या कृषि-उत्पादन के कारण आरंभ होता है। देव आमने सामने की लड़ाई में असुरों के सामने टिक नहीं सकते। जहां असुरों को पता चलता है कि वे यज्ञ का आयोजन कर रहे है, उन्हें वे मार कर भगा देते हैं। उनके इधर से उधर भगाए जाने का एक प्रमाण यह है कि देव उपनाम या तो बस्तर आदि में बचा है या नेपाल में। उनके अपने कथन के अनुसार वे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सभी दिशाओं में भागने को विवश होते है। यह वह सूत्र है जिससे हम समझ सकते हैं कि अपेक्षाकृत बहुत छेटी कालावधि में कृषि विद्या का प्रसार एक बहुत बड़े भाग में कैसे हो गया।

खैर, इस भागाभाग में उनका कोई जत्था पूर्वोत्तर दिशा में पहुंचता है। यहां पर उन्हें विरोध का सामना नहीं करना पड़ता। यहां वे लंबे समय तक स्थायी निवास करते और कृषि करते हैं। यहां देवों ने उन्हें पराजित नहीं किया इसलिए इसे अपराजिता दिशा कहते हैं, यहां पहली बार वे अपना प्रभुत्व कायम कर सके इसलिए इस कोण को ईशान कोण कहा जाता है। दिशा तय है पर न तो यह पता कहां से, न ही यह कि कितनी दूर। हम इसे कुरु पांचाल से पूर्वोत्तर हिमालय के निचले पहाड़ी क्षेत्र के गंडक के निकट कल्पित करते हैं।

देवों असुरों का यह अभेद और खेती में देवों की पहल की चर्चा ऋग्वेद से ले कर बाद तक के साहित्य में बार बार निरपवाद रूप में आती है और असुर राक्षस सभी कहानियों भी अरण्य क्षेत्र से संबंधित हैं।

जो पुराण से चिढ़ते हैं पौराणिक वृत्तों की ऐतिहासिकता को समझने का प्रयास तक नहीं कर सकते उसका उपद्रव के लिए मनमाना और पहली ही नजर में गैरजिम्मेदाराना और मूर्खतापूर्ण उपयोग अवश्य कर सकते हैं। यही कर रहे हैं।

यह कथा बहुत लंबी है। यह ध्यान अवश्य रहे कि असुर देव, रुद्र, से एक ओर देव डरते और बचते तो हैं, पर उनका सबसे अधिक सम्मान करते हैं। विष्णु उपेन्द्र हैं, इन्द्र अन्य देवों से बड़े हैं, रुद्र महेन्द्र हैं, ज्येष्ठ हैं, श्रेष्ठ हैं। वरुण के सामने इन्द्र हेय पड़ते हैं, साम्राज्य वरुण का है। देवों ने खेती (वन्य और पकने से पहले नोचना खाना वर्जित) वरुण प्रघास से आरंभ किया था और इससे संतुलित आहार के कारण उनका स्वास्थ्य सुधरा, निर्दयता कम हुई। वरुण प्रघास से ही देवों ने असुरों पर विजय पाई, शाकमेध से विजय पाई। वरुण प्रघास का अर्थ व्रीहि और यव है – वरुणप्राघासात् वै देवा अनमीवा, अकिल्विषा प्रजा प्राजायन्त, शाकमेधेन वै देवा वृत्रं अघ्नन्।

अनगिनत स्रोतों से अनेक रूपों में दुहराई जाने वाली इस कथाओं में पूर्ण अन्त: संगति है जब कि जिसे इतिहास बता कर पढाया जाता रहा उसमें हर कड़ी असंभव और इसलिए गलत है। चरवाहे नगरों पर हमला कर देते है और लुटेरे शान्तिपाठ करते हैं और इसे इतिहास बताने वाले राजनीति करते हैं और निर्लज्जतापूर्ण आत्मविक्रय।

पता नहीं जवाब संतोषप्रद लगेगा या नहीं क्योंकि ज्ञान का भी सांप्रदायीकरण और राजनीतीकरण किया जा चुका है और सही जानकारी राजनीतिज्ञों के काम की नहीं होती, दलितों के भी काम की न होगी।

Post – 2018-02-18

तिमिर के उस पार

कल की पोस्ट पर दो मित्रों ने कुछ ऐसी जिज्ञासाएं की हैं जिनके लिए मैं प्राय: अनुरोध करता रहता हूं, क्योंकि अपनी बात को स्पष्ट करने के प्रयत्न लंबाई काफी बढ जाती है और अनेक मित्रों की शिकायत सुनने को मिलती है। मेरी पीड़ा यह है कि फिर भी बात पूरी नहीं हो पाती। उसी विषय को बार बार स्वयं उठा नहीं सकता, इसलिए अपेक्षा करता हूं कि कोई सटीक प्रश्न करे तो उस पक्ष को भी स्पष्ट करूँ। प्रसन्नता है कि यह काम पहली बार सनातन कालयात्री और आनन्द प्रकाश ने किया है।

सनातनकाल यात्री के प्रश्न निम्न हैं:
आदिम वर्जनाओं, उनके अनुपालन या तोड़ने से सम्बंधित लिखित या अन्य प्रमाण उपलब्ध हैं या तार्किक निष्पत्तियों से ही माना जाता है?
धरती चीरने से सम्बन्धित कोई मान्यता?
लेख से लगता है कि पशु पालन कृषि के पश्चात आरम्भ हुआ। पुरातात्विक प्रमाण या विस्तृत विवेचन कहीं उपलब्ध हैं?
एक बात ध्यान में आई है _ बचपन में भूमि पर लिखने से हमें मना किया जाता था। कहते थे कि उससे ऋण बढ़ता है। लेख में वर्णित बातों से इसका सम्बन्ध हो सकता है क्या?

आनन्दप्रकाश की मांग निम्न प्रकार है:
असुरों-देवों के व्यवहार की विविधता और उसके कारणों की व्याख्या करिए ताकि कथित आर्यों-अनार्यों के सही भेद सामने आ सकें। इससे इधर उभरे दलित विमर्श को बहुत लाभ होगा। आप उन बिरलों मेंं हैं जो यह कर सकते हैं।

1. वायु पुराण में यह उल्लेख है कि प्राचीन काल में मनुष्य निर्बन्ध था, जो जी में आता था करता था और उसके आचरण पर कोई नैतिक प्रतिबंध न था। महाभारत के स्त्रीपर्व में कुंती प्राचीन अवस्था मे मुक्ताचार के प्रचलन की बात करती हैं – पुरा किल स्वतंत्रा स्त्रियः आसन वरानने, कामारण्य विहारिण्यः स्वतंत्राः कलहासिनी। एक उपनिषद कथा में गालव की पत्नी को कोई दूसरा ऋषि कामतुष्टि के लिए मांग कर ले जाता है । उनके पुत्र श्वेतकेतु को यह बुरा लगता है। वह इस पर आपत्ति करता है। उत्तर में गालव कहते हैं स्त्रियां गाय की तरह होती हैं, उनके साथ कोई भी संबंध बना सकता है। इससे खिन्न श्वेतकेतु विवाह संस्था की स्थापना करते हैं।

गालव श्वेतकेतु की कथा को इतिहास मानना उचित नहीं है। शंकराचार्य ने अपने भाष्य में उपनिषद की कथाओं को आख्यायिका कहा है। ये अति प्राचीन अवस्थाओं की जातीय स्मृतियां हैं। हाल तक अनेक देशों के आदिम समाजों में यह रिवाज रहा है।

अतः हम पाते हैं, पहला चरण मुक्ताचार, दूसरा सहजीवन और तीसरा एकनिष्ठ आजीवन सहसंबंध, जिसके लिए सामाजिक मर्यादाएं और वैधताएं नियत की गईं।

इसे यदि हम समाज की आर्थिक-विकास की यात्रा को सामने रखते हुए समझना चाहे तो बहुत सुविधा होगी। निजी संपदा की ओर बढ़ते मनुष्य का संपत्ति पर अधिकार के समानान्तर साहचर्य पर भी अधिकार बढ़ता गया है जो अटूट निष्ठा की माग और अधीनस्थ की यौन शुचिता की मांग बनती चली गई। भारत आज पाषाण युग से परमाणु युग तक एक साथ जीने वाला नुमायशी देश है और इसमें आठ विवाह-रीतियां तो समाज स्वीकृत रही हैं। आदिम अवस्था के मुक्ताचार से लेकर सभी तरह के साहचर्य इसके किसी न किसी अचल में आज भी मिल जाते हैं।

२. जोताई को धरती माता को चीरने के समकक्ष माना जाता था, असुरों के कृषि से परहेज का यह एक प्रधान कारण था। देव समाज भी असुर समाज से निकला था इसलिए ग्रन्थि उसके मन में भी थी। धरती इसका बदला न ले इसलिए वह माफी मांग लेता था। जैसे रुद्र जो नरभक्षी अवस्था के देव थे, पूरुषघ्न थे, उनसे प्रार्थना करता था, अपने बाण का रुख दूसरी ओर रखना, मेरी हमारे लोगों और जानवरों पर दया करना – शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे – उसी तरह धरती मां से भी याचना करता था, ‘पृथिवी मात: मा मा हिंसी:।

दीवार आदि पर लकीर खींचने का संदर्भ अलग है। यह बहुत बाद में गणना आरंभ होने की प्राथमिक अवस्था का चिन्ह है। किसी का कर्ज आदि भूले नहीं इसलिए दीवार आदि पर उसका लकीर खींचना। यह कर्ज चढ़ने की आशंका के कारण वर्जित था।

३. पहले मैं भी समझता था कि पशुपालन खेती से पुराना है। कालिन रेनफ्रू (Renfrew) ने इस पर पर्याप्त पुरातात्विक साक्ष्य देकर यह प्रमाणित किया कि पशुपालन खेती के बाद आरंभ हुआ और इसके बिना संभव न था। उससे पहले पशुओं का शिकार और रेवड़बन्दी प्रचलित थी जिसमे पालन प्रधान न होकर भक्षण प्रधान था।

आनन्द प्रकाश जी का प्रश्न बड़ा है क्योंकि छोटा काम, यहां तक कि छोटा सवाल तक उन्हें पसंद नहीं। बड़े सवाल का बड़ा जवाब, गरज कि पोथे से नीचे बात न बनेगी। वादा करके फंस गया इसलिए इसका जवाब एक इतिवृत्त के रूप में देना उचित लगता है। देव परंपरा, जिससे ही सवर्ण समाज पैदा हुआ, यह मानता है कि वह स्वयं भी उसी समाज या अवस्था से निकला है जिसमें असुर हैं। वह उनका सौतेला भाई है। पिता एक माताएं दो। दिति और अदिति।माताएं जीविका की भिन्न रीतियों से संबंध रखती हैं। बड़े भाई, असुर, छोटे देवता। असुर संख्या में अधिक, और अधिक शक्तिशाली (बलीयांस: भूयांसश्च असुराः) स्वभाव से गर्वीले (मन्यमान), जाहिर है देव संख्या में कम (अल्पीयांस), रिश्ते में छोटे (कनीयस्विन्) और असुरों से डरे हुए (ते वै देवा: असुर-रक्षसेभ्य: बिभयांश्चक्रु:)।

दोनों में विरोध यज्ञ या कृषि-उत्पादन के कारण आरंभ होता है। देव आमने सामने की लड़ाई में असुरों के सामने टिक नहीं सकते। जहां असुरों को पता चलता है कि वे यज्ञ का आयोजन कर रहे है, उन्हें वे मार कर भगा देते हैं। उनके इधर से उधर भगाए जाने का एक प्रमाण यह है कि देव उपनाम या तो बस्तर आदि में बचा है या नेपाल में। उनके अपने कथन के अनुसार वे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सभी दिशाओं में भागने को विवश होते है। यह वह सूत्र है जिससे हम समझ सकते हैं कि अपेक्षाकृत बहुत छेटी कालावधि में कृषि विद्या का प्रसार एक बहुत बड़े भाग में कैसे हो गया।

खैर, इस भागाभाग में उनका कोई जत्था पूर्वोत्तर दिशा में पहुंचता है। यहां पर उन्हें विरोध का सामना नहीं करना पड़ता। यहां वे लंबे समय तक स्थायी निवास करते और कृषि करते हैं। यहां देवों ने उन्हें पराजित नहीं किया इसलिए इसे अपराजिता दिशा कहते हैं, यहां पहली बार वे अपना प्रभुत्व कायम कर सके इसलिए इस कोण को ईशान कोण कहा जाता है। दिशा तय है पर न तो यह पता कहां से, न ही यह कि कितनी दूर। हम इसे कुरु पांचाल से पूर्वोत्तर हिमालय के निचले पहाड़ी क्षेत्र के गंडक के निकट कल्पित करते हैं।

देवों असुरों का यह अभेद और खेती में देवों की पहल की चर्चा ऋग्वेद से ले कर बाद तक के साहित्य में बार बार निरपवाद रूप में आती है और असुर राक्षस सभी कहानियों भी अरण्य क्षेत्र से संबंधित हैं।

जो पुराण से चिढ़ते हैं पौराणिक वृत्तों की ऐतिहासिकता को समझने का प्रयास तक नहीं कर सकते उसका उपद्रव के लिए मनमाना और पहली ही नजर में गैरजिम्मेदाराना और मूर्खतापूर्ण उपयोग अवश्य कर सकते हैं। यही कर रहे हैं।

यह कथा बहुत लंबी है। यह ध्यान अवश्य रहे कि असुर देव, रुद्र, से एक ओर देव डरते और बचते तो हैं, पर उनका सबसे अधिक सम्मान करते हैं। विष्णु उपेन्द्र हैं, इन्द्र अन्य देवों से बड़े हैं, रुद्र महेन्द्र हैं, ज्येष्ठ हैं, श्रेष्ठ हैं। वरुण के सामने इन्द्र हेय पड़ते हैं, साम्राज्य वरुण का है। देवों ने खेती (वन्य और पकने से पहले नोचना खाना वर्जित) वरुण प्रघास से आरंभ किया था और इससे संतुलित आहार के कारण उनका स्वास्थ्य सुधरा, निर्दयता कम हुई। वरुण प्रघास से ही देवों ने असुरों पर विजय पाई, शाकमेध से विजय पाई। वरुण प्रघास का अर्थ व्रीहि और यव है – वरुणप्राघासात् वै देवा अनमीवा, अकिल्विषा प्रजा प्राजायन्त, शाकमेधेन वै देवा वृत्रं अघ्नन्।

अनगिनत स्रोतों से अनेक रूपों में दुहराई जाने वाली इस कथाओं में पूर्ण अन्त: संगति है जब कि जिसे इतिहास बता कर पढाया जाता रहा उसमें हर कड़ी असंभव और इसलिए गलत है। चरवाहे नगरों पर हमला कर देते है और लुटेरे शान्तिपाठ करते हैं और इसे इतिहास बताने वाले राजनीति करते हैं और निर्लज्जतापूर्ण आत्मविक्रय।

पता नहीं जवाब संतोषप्रद लगेगा या नहीं क्योंकि ज्ञान का भी सांप्रदायीकरण और राजनीतीकरण किया जा चुका है और सही जानकारी राजनीतिज्ञों के काम की नहीं होती, दलितों के भी काम की न होगी।

Post – 2018-02-18

तिमिर के उस पार

कल की पोस्ट पर दो मित्रों ने कुछ ऐसी जिज्ञासाएं की हैं जिनके लिए मैं प्राय: अनुरोध करता रहता हूं, क्योंकि अपनी बात को स्पष्ट करने के प्रयत्न लंबाई काफी बढ जाती है और अनेक मित्रों की शिकायत सुनने को मिलती है। मेरी पीड़ा यह है कि फिर भी बात पूरी नहीं हो पाती। उसी विषय को बार बार स्वयं उठा नहीं सकता, इसलिए अपेक्षा करता हूं कि कोई सटीक प्रश्न करे तो उस पक्ष को भी स्पष्ट करूँ। प्रसन्नता है कि यह काम पहली बार सनातन कालयात्री और आनन्द प्रकाश ने किया है।

सनातनकाल यात्री के प्रश्न निम्न हैं:
आदिम वर्जनाओं, उनके अनुपालन या तोड़ने से सम्बंधित लिखित या अन्य प्रमाण उपलब्ध हैं या तार्किक निष्पत्तियों से ही माना जाता है?
धरती चीरने से सम्बन्धित कोई मान्यता?
लेख से लगता है कि पशु पालन कृषि के पश्चात आरम्भ हुआ। पुरातात्विक प्रमाण या विस्तृत विवेचन कहीं उपलब्ध हैं?
एक बात ध्यान में आई है _ बचपन में भूमि पर लिखने से हमें मना किया जाता था। कहते थे कि उससे ऋण बढ़ता है। लेख में वर्णित बातों से इसका सम्बन्ध हो सकता है क्या?

आनन्दप्रकाश की मांग निम्न प्रकार है:
असुरों-देवों के व्यवहार की विविधता और उसके कारणों की व्याख्या करिए ताकि कथित आर्यों-अनार्यों के सही भेद सामने आ सकें। इससे इधर उभरे दलित विमर्श को बहुत लाभ होगा। आप उन बिरलों मेंं हैं जो यह कर सकते हैं।

1. वायु पुराण में यह उल्लेख है कि प्राचीन काल में मनुष्य निर्बन्ध था, जो जी में आता था करता था और उसके आचरण पर कोई नैतिक प्रतिबंध न था। महाभारत के स्त्रीपर्व में कुंती प्राचीन अवस्था मे मुक्ताचार के प्रचलन की बात करती हैं – पुरा किल स्वतंत्रा स्त्रियः आसन वरानने, कामारण्य विहारिण्यः स्वतंत्राः कलहासिनी। एक उपनिषद कथा में गालव की पत्नी को कोई दूसरा ऋषि कामतुष्टि के लिए मांग कर ले जाता है । उनके पुत्र श्वेतकेतु को यह बुरा लगता है। वह इस पर आपत्ति करता है। उत्तर में गालव कहते हैं स्त्रियां गाय की तरह होती हैं, उनके साथ कोई भी संबंध बना सकता है। इससे खिन्न श्वेतकेतु विवाह संस्था की स्थापना करते हैं।

गालव श्वेतकेतु की कथा को इतिहास मानना उचित नहीं है। शंकराचार्य ने अपने भाष्य में उपनिषद की कथाओं को आख्यायिका कहा है। ये अति प्राचीन अवस्थाओं की जातीय स्मृतियां हैं। हाल तक अनेक देशों के आदिम समाजों में यह रिवाज रहा है।

अतः हम पाते हैं, पहला चरण मुक्ताचार, दूसरा सहजीवन और तीसरा एकनिष्ठ आजीवन सहसंबंध, जिसके लिए सामाजिक मर्यादाएं और वैधताएं नियत की गईं।

इसे यदि हम समाज की आर्थिक-विकास की यात्रा को सामने रखते हुए समझना चाहे तो बहुत सुविधा होगी। निजी संपदा की ओर बढ़ते मनुष्य का संपत्ति पर अधिकार के समानान्तर साहचर्य पर भी अधिकार बढ़ता गया है जो अटूट निष्ठा की माग और अधीनस्थ की यौन शुचिता की मांग बनती चली गई। भारत आज पाषाण युग से परमाणु युग तक एक साथ जीने वाला नुमायशी देश है और इसमें आठ विवाह-रीतियां तो समाज स्वीकृत रही हैं। आदिम अवस्था के मुक्ताचार से लेकर सभी तरह के साहचर्य इसके किसी न किसी अचल में आज भी मिल जाते हैं।

२. जोताई को धरती माता को चीरने के समकक्ष माना जाता था, असुरों के कृषि से परहेज का यह एक प्रधान कारण था। देव समाज भी असुर समाज से निकला था इसलिए ग्रन्थि उसके मन में भी थी। धरती इसका बदला न ले इसलिए वह माफी मांग लेता था। जैसे रुद्र जो नरभक्षी अवस्था के देव थे, पूरुषघ्न थे, उनसे प्रार्थना करता था, अपने बाण का रुख दूसरी ओर रखना, मेरी हमारे लोगों और जानवरों पर दया करना – शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे – उसी तरह धरती मां से भी याचना करता था, ‘पृथिवी मात: मा मा हिंसी:।

दीवार आदि पर लकीर खींचने का संदर्भ अलग है। यह बहुत बाद में गणना आरंभ होने की प्राथमिक अवस्था का चिन्ह है। किसी का कर्ज आदि भूले नहीं इसलिए दीवार आदि पर उसका लकीर खींचना। यह कर्ज चढ़ने की आशंका के कारण वर्जित था।

३. पहले मैं भी समझता था कि पशुपालन खेती से पुराना है। कालिन रेनफ्रू (Renfrew) ने इस पर पर्याप्त पुरातात्विक साक्ष्य देकर यह प्रमाणित किया कि पशुपालन खेती के बाद आरंभ हुआ और इसके बिना संभव न था। उससे पहले पशुओं का शिकार और रेवड़बन्दी प्रचलित थी जिसमे पालन प्रधान न होकर भक्षण प्रधान था।

आनन्द प्रकाश जी का प्रश्न बड़ा है क्योंकि छोटा काम, यहां तक कि छोटा सवाल तक उन्हें पसंद नहीं। बड़े सवाल का बड़ा जवाब, गरज कि पोथे से नीचे बात न बनेगी। वादा करके फंस गया इसलिए इसका जवाब एक इतिवृत्त के रूप में देना उचित लगता है। देव परंपरा, जिससे ही सवर्ण समाज पैदा हुआ, यह मानता है कि वह स्वयं भी उसी समाज या अवस्था से निकला है जिसमें असुर हैं। वह उनका सौतेला भाई है। पिता एक माताएं दो। दिति और अदिति।माताएं जीविका की भिन्न रीतियों से संबंध रखती हैं। बड़े भाई, असुर, छोटे देवता। असुर संख्या में अधिक, और अधिक शक्तिशाली (बलीयांस: भूयांसश्च असुराः) स्वभाव से गर्वीले (मन्यमान), जाहिर है देव संख्या में कम (अल्पीयांस), रिश्ते में छोटे (कनीयस्विन्) और असुरों से डरे हुए (ते वै देवा: असुर-रक्षसेभ्य: बिभयांश्चक्रु:)।

दोनों में विरोध यज्ञ या कृषि-उत्पादन के कारण आरंभ होता है। देव आमने सामने की लड़ाई में असुरों के सामने टिक नहीं सकते। जहां असुरों को पता चलता है कि वे यज्ञ का आयोजन कर रहे है, उन्हें वे मार कर भगा देते हैं। उनके इधर से उधर भगाए जाने का एक प्रमाण यह है कि देव उपनाम या तो बस्तर आदि में बचा है या नेपाल में। उनके अपने कथन के अनुसार वे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सभी दिशाओं में भागने को विवश होते है। यह वह सूत्र है जिससे हम समझ सकते हैं कि अपेक्षाकृत बहुत छेटी कालावधि में कृषि विद्या का प्रसार एक बहुत बड़े भाग में कैसे हो गया।

खैर, इस भागाभाग में उनका कोई जत्था पूर्वोत्तर दिशा में पहुंचता है। यहां पर उन्हें विरोध का सामना नहीं करना पड़ता। यहां वे लंबे समय तक स्थायी निवास करते और कृषि करते हैं। यहां देवों ने उन्हें पराजित नहीं किया इसलिए इसे अपराजिता दिशा कहते हैं, यहां पहली बार वे अपना प्रभुत्व कायम कर सके इसलिए इस कोण को ईशान कोण कहा जाता है। दिशा तय है पर न तो यह पता कहां से, न ही यह कि कितनी दूर। हम इसे कुरु पांचाल से पूर्वोत्तर हिमालय के निचले पहाड़ी क्षेत्र के गंडक के निकट कल्पित करते हैं।

देवों असुरों का यह अभेद और खेती में देवों की पहल की चर्चा ऋग्वेद से ले कर बाद तक के साहित्य में बार बार निरपवाद रूप में आती है और असुर राक्षस सभी कहानियों भी अरण्य क्षेत्र से संबंधित हैं।

जो पुराण से चिढ़ते हैं पौराणिक वृत्तों की ऐतिहासिकता को समझने का प्रयास तक नहीं कर सकते उसका उपद्रव के लिए मनमाना और पहली ही नजर में गैरजिम्मेदाराना और मूर्खतापूर्ण उपयोग अवश्य कर सकते हैं। यही कर रहे हैं।

यह कथा बहुत लंबी है। यह ध्यान अवश्य रहे कि असुर देव, रुद्र, से एक ओर देव डरते और बचते तो हैं, पर उनका सबसे अधिक सम्मान करते हैं। विष्णु उपेन्द्र हैं, इन्द्र अन्य देवों से बड़े हैं, रुद्र महेन्द्र हैं, ज्येष्ठ हैं, श्रेष्ठ हैं। वरुण के सामने इन्द्र हेय पड़ते हैं, साम्राज्य वरुण का है। देवों ने खेती (वन्य और पकने से पहले नोचना खाना वर्जित) वरुण प्रघास से आरंभ किया था और इससे संतुलित आहार के कारण उनका स्वास्थ्य सुधरा, निर्दयता कम हुई। वरुण प्रघास से ही देवों ने असुरों पर विजय पाई, शाकमेध से विजय पाई। वरुण प्रघास का अर्थ व्रीहि और यव है – वरुणप्राघासात् वै देवा अनमीवा, अकिल्विषा प्रजा प्राजायन्त, शाकमेधेन वै देवा वृत्रं अघ्नन्।

अनगिनत स्रोतों से अनेक रूपों में दुहराई जाने वाली इस कथाओं में पूर्ण अन्त: संगति है जब कि जिसे इतिहास बता कर पढाया जाता रहा उसमें हर कड़ी असंभव और इसलिए गलत है। चरवाहे नगरों पर हमला कर देते है और लुटेरे शान्तिपाठ करते हैं और इसे इतिहास बताने वाले राजनीति करते हैं और निर्लज्जतापूर्ण आत्मविक्रय।

पता नहीं जवाब संतोषप्रद लगेगा या नहीं क्योंकि ज्ञान का भी सांप्रदायीकरण और राजनीतीकरण किया जा चुका है और सही जानकारी राजनीतिज्ञों के काम की नहीं होती, दलितों के भी काम की न होगी।