Post – 2020-07-13

हम राजनीतिक रूप में चालबाजी की कमी के कारण, चाणक्य के सुझावों को अपनी जीवनचर्या में न उतार पाने के कारण, पराधीन हुए, शौर्य की कमी के कारण नहीं। सांस्कृतिक रूप में हम दुनिया के किसी अन्य देश से आगे थे। पश्चिम का आधुनिक अठारहवीं सदी के बाद से -भारत का कितना ऋणी है, इसका हम सही अनुमान नहीं कर सकते क्योंकि उन्होंने जो कुछ लिया उसे आत्मसात करके अपना बना लिया और अपना बताते रहे। य़हाँ तक कि हमारी भाषा तक को अपनी भाषा सिद्ध करने के प्रयत्न में लगे रहे। उनके संपर्क में आने के बाद वही काम हमने नहीं किया।

हमारी एक लंबी- दुनिया में सबसे लंबी, दस हजार साल की – सांस्कृतिक परंपरा रही है जिसमें अपनी संचार प्रणाली में अद्भुत प्रयोग किए – 1. जन्तुकथाओं के माध्यम से गहन विचारों को जन जन तक पहुँचाने का तरीका जिसकी परंपरा बहुत पीछे जाती है, पर प्रमाण ऋग्वेद से और हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों से मिलने लगते हैं; 2. देव कथाएँ जिनके शिक्षा शास्त्रीय और सौंदर्य शास्त्रीय महत्व को समझा ही न गया (जिनकी समझ के भरोसे बैठे रहे उनकी रुचि खिल्ली उड़ाने में अधिक समझने में कम थी); 3. दो पंक्तियों में किसी विचार को व्यक्त करके अविकल रूप में स्मरणीय बनाने का प्रयत्न जिसका परिणाम था कई हजार साल के लेखन पूर्व के इतिहास का सुरक्षित रह जाना, जो अपनी ‘सटीकता’ में विस्मयकारी लगता है।

लेखन के बाद का साहित्य भी प्राचीनता से ले कर गुणवत्ता की दृष्टि से हेय न था और प्रथम परिचय में ही किसी को चकित करने के लिए काफी था। हमारा समाज इसी में पगा था। उस तक पहुँचने के नए प्रयोग इसकी प्रकृति की रक्षा करते ही संभव था। पश्चिम से सीखने को एक ही चीज थी जिसके सम्यक विकास न हो पाया था। यह था गद्य। हमारा गद्य काव्यात्मक या सूत्रपरक रह गया था।

पर हम अपना आपा भूल कर आत्मसात्करण के स्थान पर सांस्कृतिक परकायप्रवेश में जुट गए और अपने घर से इतने दूर बढ़ आए हैं कि गलती का अहसास हो भी तो लौटने का रास्ता न मिल सके।

Post – 2020-07-13

रोना भी मुसीबत में किसी काम न आया

मैं अक्सर अपनी बात ठीक-ठीक समझा नहीं पाता। गलतियाँ तो इतनी छूट जाती हैं कि उसके बाद भी लेख में से कुछ निकाल लेने वालों को सदाशयी मानता हूँ। मैंने जब अपने समानधर्मियों के औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर न निकल पाने पर लेखन में रोने की, बार एक ही शिकायत के बने रहने की, बात की तो कुछ मित्रों को लगा मैं निजी विफलता की बात कर रहा हूँ।

मेरी लड़ाई मेरी नहीं, हमारी रही है। यही कारण रहा कि मैं लगभग प्रत्येक शोधकार्य के विषय में विषय से सीधे जुड़े लोगों से आग्रह करता रहा कि इसे वे लिखते तो अधिक अच्छा होता। मेरी चिंता इसीलिए स्वतंत्र होने के साथ सास्कृतिक परजीविता के आरंभ हो जाने से जुड़ती है। खिन्नता बुद्धिजीवी के रूप में हमारी सामूहिक विफलता से उत्पन्न है। हमारी आवाज जिन माध्यमों – पत्र, पत्रिका, साहित्य, कला विधाएँ – नाटक, सिनेना, चित्रकला- से समाज तक पहुँचती रही है उन पर वह समाज विश्वास खो चुका है, क्योंकि उनमें वह अपने को नहीं पाता। अपने तक पहुँचने की चिंता तक नहीं। य़ह एक बड़ी त्रासदी है जिसे मैं ठीक से समझा नहीं पाया। मेरा रोना निजी विफलता पर रोना नहीं है, बुद्धिजीवी वर्ग के अपने ही समाज के लिए व्यर्थ हो जाने की और इस व्यर्थता के बोध तक के अभाव पर रोना है। जिस लड़ाई को मैंने जारी रखा उसे आगे बढ़ाने वाला, मेरी अपनी कमियों को सुधारने वाला कोई नजर न आने पर रोना है।

Post – 2020-07-11

सामान्य बोध यह है कि यदि दो सभ्यताओं में बहुमुखी समानताएँ दिखाई देती हैं, तो इसका अर्थ है समानता रखने वाले मामले मे दोनों में से कोई एक दूसरे का ऋणी है। सभ्यता के मामले में ऋणी होना दोष नहीं, गुण है। दोष यह तभी बनता है जब हम अपने दुर्बल या निष्क्रिय उपापचय तंत्र के कारण उसे पचा कर अपनी शक्ति में नहीं बदल पाते। कायिक अजीर्णता की तरह सांस्कृतिक अजीर्णता भी हमारी निजी शक्ति का क्षय करती है और कभी कभी मृत्यु तक का कारण बन जाती है।

भारत, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का भारत, जिसे अंग्रेजी शिक्षा के कारण ‘विश्व’ मानता था, उसके समकक्ष आने की स्पर्धा में, पहले अपने को राजनीतिक अधीनता मे रखने वालों की समकक्षता में आने के प्रयत्न में, अपने सांस्कृतिक उपापचय तंत्र का ध्यान न रखते हुए, उनका अपाच्य और दु्ष्पाच्य भी अधातुर की तरह निगलता रहा और आज सांस्कृतिक अकाल मृत्यु का शिकार है।

हम जिस पश्चिम के समक्ष आना चाहते हैं, वह मुक्तिबोध के स्वर में कहता है, कोशिश करो़! कोशिश करो!! जमीन मेे गड़ कर भी, हम तक पहुँचने की कोशिश करो!!! और हम लगातार कोशिश कर रहे हैं।

1970 से बाद का मेरा समूचा लेखन, वह किसी भी विधा में हो, औपनिवेशिक मानसिकता, असमानता और अन्याय के सभी रूपों के विरुद्ध रहा है। मैं कभी कभी कह और लिख बैठता था, “लिखना मेरे लिए (वेचिरिक) युद्ध है। I write to fight. और अब 90 के साल मे प्रवेश के साथ कहता किसी से नहीं, बचपन से छिप कर रोने का अभ्यास जो किया है, रोना किसी को दिखाई नहीं देता। लिखने से अपने को रोक नहीं पाता पर मन में सोचता हूँ, मैं सूखी आँखों से रोने के लिए लिखता हूँ – I write to weep without tears!

हम अपने समाज से कट चुके है। हमारी आवाज हमारे समाज तक नहीं पहुँच पाती, समाज की आवाज हम सुन नहीं पाते। दुनिया का कोई समाज अपने विरुद्ध खड़ा नहीं होता। इसका दूसरा नाम आत्महत्या है। हम आत्महत्या के लिए कृतसंकल्प समाज के वाचाल प्रवक्ता हैं जिनकी लिखावट आत्महत्या के बाद खोली और पढ़ी जाएगी।

Post – 2020-07-11

सामान्य बोध यह है कि यदि दो सभ्यताओं में बहुमुखी समानताएँ दिखाई देती हैं, तो इसका अर्थ है समानता रखने वाले मामले मे दोनों में से कोई एक दूसरे का ऋणी है। सभ्यता के मामले में ऋणी होना दोष नहीं, गुण है। दोष यह तभी बनता है जब उसको अपने दुर्बल या निष्क्रिय उपापचय तंत्र के कारण उसे पचा कर अपनी शक्ति में नहीं बदल पाते। कायिक अजीर्णता की तरह सांस्कृतिक अजीर्णता भी हमारी निजी शक्ति का क्षय करती है और कभी कभी मृत्यु तक का कारण बन जाती है। भारत, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का भारत, जिसे अंग्रेजी शिक्षा के कारण ‘विश्व’ मानता था, उसके समकक्ष आने की स्पर्धा में, पहले अपने को राजनीतिक अधीनता मे रखने वालों की समकक्षता में आने प्रयत्न मे अपने सांस्कृतिक उपापचय तंत्र की उपेक्षा करते हुए वमन करने के लिए उनका अपाच्य और दु्ष्पाच्य भी अधातुर की तरह निगलते रहे और आज सांस्कृतिक अकाल मृत्यु के शिकार हैं। हम जिस पश्चिम के समक्ष आना चाहते हैं, वह मुक्तिबोध के स्वर में कहता है, कोशिश करो़! कोशिश करो!! जमीन मेे गड़ कर भी, हम तक पहुँचने की कोशिश करो!!! और हम लगातार कोशिश कर रहे हैं।

1970 से बाद का मेरा समूचा लेखन, वह किसी भी विधा में हो, औपनिवेशिक मानसिकता, असमानता और अन्याय के सभी रूपों के विरुद्ध रहा है। मैं कभी कभी कह और लिख बैठता था, “लिखना मेरे लिए (वेचिरिक) युद्ध है। I write to fight. और अब 90 के साल मे प्रवेश के साथ कहता किसी से नहीं, बचपन से छिप कर रोने का अभ्यास जो किया है, पर जिंदगी भर की है, पर रोना किसी को दिखाई नहीं देता। लिखने से अपने को रोक नहीं पाता पर मन में सोचता हूँ, मैं सूखी आँखों से रोने के लिए लिखता हूँ – I write to weep without tears!
हम अपने समाज से कट चुके है। हमारी आवाज हमारे समाज तक नहीं पहुँच पाती, समाज की आवाज हम सुन नहीं पाते। दुनिया का कोई समाज अपने विरुद्ध खड़ा नहीं होता। इसका दूसरा नाम आत्महत्या है। हम आत्महत्या के लिए कृतसंकल्प समाज के वाचाल प्रवक्ता हैं जिनकी लिखावट आत्महत्या के बाद खोली र पढ़ी जाएगी।

Post – 2020-07-10

#शब्दवेध(81)
समस्या वस्तुपरकता की

पश्चिमी शिक्षा नस्लवादी, उपनिवेशवादी, प्राधिकारवादी होने के कारण और हमारी परंपरागत शिक्षा रटन्त तथा शास्त्रीय ज्ञान और साहित्य वर्णवादी होने के कारण, न तो मान्य हो सकते हैं, न ही अधिक भरोसे के। समस्या यह है कि उनको हटा दें तो हमारे पास कुछ बचता ही नहीं है। इसलिए सत्य की तलाश भी इन्हीं के माध्यम से संभव है। ये हमारे लिए कच्चा माल हैं। इनमें व्यक्त विचार स्वीकार्य नहीं हो सकते पर विचारणीय तो हैं ही। इनके अंतर्विरोधों, पारस्परिक असंगतियों, अतिरंजनाओं और पूर्वाग्रहों का निराकरण करते हुए, अतीत और वर्तमान दोनों के यथार्थ तक अवश्य पहुंचा जा सकता है। इसका सबसे सीधा उपाय है (1) मूल स्रोतों की समझ और उन तक पहुँच; (2) पूरक स्रोतों की खोज और उपयोग; (3) कल्पना या अनुमान का नगण्य उपयोग; (4) तथ्यों और साक्ष्यों में चुनाव और परिहार से बचना और (5) जहाँ दो स्रोतों की सूचनाओं में सतही विरोध हो वहीं बारीकी से छानबीन करते लचर स्रोत का खंडन। आलस्य वश हो, या आत्मविश्वास की कमी के कारण हो, हमारी आदत बने बनाए निष्कर्षों को बिना जाँचे स्वीकार करते रहने की रही है। यह आदत इतनी बद्धमूल है कि लंबे समय से हमने अपने दिमाग से काम लिया ही नहीं।

हमने आरंभ इस बात से किया था कि किसी दूसरे देश का व्यक्ति हमारी जरूरत का न तो सही सामान तैयार करके हमें दे सकता है न सही ज्ञान दे सकता है। दोनों का उत्पादन हमें स्वयं करना होता है। जिन विदेशी विद्वानों को हम भारत- प्रेमी समझकर उनके जाल में फँस जाते हैं वे उनसे भी खतरनाक हैं जिनके भारतद्वेषी होने के प्रमाण पहली नजर में ही दिखाई देने लगते हैं। इसी को उदाहृत करने के लिए हमने मैक्समूलर की जानबूझकर की गई शरारतों के कुछ नमूने पेश किए थे, यद्यपि उनकी संख्या बहुत अधिक है। हमने उनके यांत्रिक और दुर्भावना से प्रेरित काल निर्धारण को स्वीकार कर लिया और उसी के अनुसार अपने इतिहास को समझने की कोशिश करते रहे, जबकि यूरोप के दूसरे सभी विद्वानों ने, एक समय में उनके गुरु और संरक्षक रह चुके गोल्डष्टकर ने भी, उनकी ऐसी स्थापनाओं को मूर्खतापूर्ण सिद्ध किया था। मैक्समूलर ही हैं जो कह सकते थे कि पाणिनि अक्षर ज्ञान से परिचित नहीं थे। वही कह सकते थे कि वेदों का एक नाम श्रुति है इसलिए इनको कभी लिपिबद्ध नहीं किया गया था, जबकि स्वयं यह भी स्वीकार करते हैं की ईसा से 1000 साल पहले ऋग्वेद के एक-एक अक्षर की गणना की जा चुकी थी और तब से अब तक उसके पाठ में किसी भी तरह की विकृति नहीं आने पाई है। विचित्र बात यह है कि भारतीयों का विश्वास जीतने के लिए भारत के विषय में उन्होंने जो सही ( प्रशंसापूर्ण!) बातें कीं, उनको हमने नहीं माना, जबकि निषेधात्मक या अवमूल्र्यन परक कथनों को इतिहास के अकाट्य सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया। जरूरत दोनों को परखने और सही अनुपात में रखने की थी। हमें इस सूत्र को ध्यान में रखना होगा कि आधुनिक सफलताओं से उत्पन्न अहंकार में अन्य सभी सभ्यताओं को चिरंतन पिछड़ा और यूरोप की चिरंतन अग्रता सिद्ध करने की व्याधि से बहुत पहले से भारतीय भाषा, मूल्यों, विश्वासों, विचारों को अपनाने के समानांतर इसके वर्चस्व को नकारने की प्रबल ग्रंथि रही है। इसलिए सही मूल्यांकन के लिए पाश्चात्य अतिरंजनाओं और अवमू्ल्यनों और विकृत पाठों से मुक्त रहने का यथासंभव प्रयास करते हुए अपने निष्कर्ष निकालना होगा। अपने दिमाग से इस भ्रम को भी निकाल देना होगा कि पश्चिमी विद्वान अधिक मेधावी, अधिक वस्तुपरक और अधिक तार्किक होते हैं। प्रविधिगत दक्षता के बावजूद पूर्वोक्त कारणों से वे अधिक भोंड़े, यद्यपि अपने निर्देशन में अनुगत भाव से काम करने वाले भारतीय पंडितों से कम भोंड़े, सिद्ध होते हैं। सीधी बात यह कि ये दोनों बेई्मान सिद्ध होते हैं जिसे पकड़ना बहुत मुश्किल नहीं होता।

हम भाषा पर बात कर रहे थे जहां से इसे समझने में हुई ढील और बेईमानी को उजागर करने के लिए हमें एक लंबी बहस में उतरना पड़ा। बहुतों को वह बिंदु ही भूल गया होगा जहां से इसकी पृष्ठभि का परिचय देते हुए हम कुछ दूर चले आए। फिर उसी विषय पर लौटना होगा।

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व्याकरण और भाषाविज्ञान

हमारी पहली आपत्ति उस विभाजन से है जिसमें भारतीय भाषा चिंतकों को वैयाकरण कह कर इन्होंने अपने को और दूसरे पाश्चात्य अध्येताओं द्वारा किए जाने वाले काम को विज्ञान सिद्ध करने का प्रयास किया। सचाई यह है कि पाणिनि, पतंजलि, भर्तृहरि आदि विश्व के सबसे प्राचीन भाषावैज्ञानिक हैं न कि पाश्चात्य अर्थ में ग्रेमेरियन । ग्रामर का अर्थ है क्रम-व्यवस्था. उनके अपने कोश के अनुसार
Origin: late Middle English: from Old French gramaire, via Latin from Greek grammatikē (tekhnē) ‘(art) of letters’, from gramma, grammat- ‘letter of the alphabet, thing written’.

एक दूसरी व्याख्या के अनुसार:
late 14c., “Latin grammar, rules of Latin,” from Old French gramaire “grammar; learning,” especially Latin and philology, also “(magic) incantation, spells, mumbo-jumbo” (12c., Modern French grammaire), an “irregular semi-popular adoption” [OED] of Latin grammatica “grammar, philology,” perhaps via an unrecorded Medieval Latin form *grammaria. The classical Latin word is from Greek grammatike (tekhnē) “(art) of letters,” referring both to philology and to literature in the broadest sense, fem. of grammatikos (adj.) “pertaining to or versed in letters or learning,” from gramma “letter” . An Old English gloss of it was stæfcræft )
इसे अधिक से अधिक वर्ण विन्यास और शब्द विन्यास और वाक्य विन्यास की समझ कह सकते हैं।

आरंभ से आज तक भारत में व्याकरण का अर्थ रहा है, विश्लेषण। विवेचन। ये पुराने शब्द है जिनका प्रयोग उस आशय के लिए किया जाता रहा है, जिसके लिए आज विज्ञान का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि विज्ञान का जो अर्थ पहले किया जाता था, वह आज की परिभाषा में विज्ञान की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा।

तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषा विज्ञान के सभी तत्व पाणिनि के व्याकरण में उपलब्ध हैं। ध्वनि नियम और अर्थ-विकास, व्युत्पत्ति, सार्थक न्यूनतम मूल ध्वनियों (धातुओं) की खोज और ऐतिहासिक क्रम में भाषा में होने वाले परिवर्तन, क्षेत्रीय प्रयोग भेद, सभी का सटीक विवेचन के पाणिनि की अष्टाध्यायी में मिलता है। तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषा विज्ञान इस घेरे को कहीं भी तोड़ पाया हो तो उसका मुझे ज्ञान नहीं। यहां मैं अपना एक व्यक्तिगत अनुभव दर्ज करना चाहूंगा। नवीं में मैंने ऐच्छिक विषय के रूप में संस्कृत को अपनाया था। उसके ग्रीष्मावकाश में मुझे यह भूत सवार हुआ कि क्यों न परंपरागत पद्धति से संस्कृत का ज्ञान अर्जित करूं। मैं आधी अष्टाध्यायी कंठस्थ करके दो मील की दूरी पर एक पाठशाला में पहुंचा और वहां के प्रधानाचार्य से निवेदन किया मुझे परंपरागत पद्धति से संस्कृत का ज्ञान कराएँ। मुझे विश्वास था कि आधे सूत्र कंठस्थ हो चुके हैं तो व्याख्या उन्हीं की होगी शेष इस बीच रट जाऊँगा और मैं दो-तीन महीने के भीतर संस्कृत पर अधिकार करके निकलूंगा। याद नहीं कितने समय बाद संधि विचार आरंभ हुआ – सुधी उपास्य – सुध्युपास्य। बात समझ में आ गई, पर तभी पता चला कि दूर का एक सूत्र लगना जरूरी था जिससे साधनिका के अगले चरण पर वह सुध्ध्युपास्य हो गया। फिर एक और सूत्र जिससे अतिरिक्त ध् कट गया और रूप दुबारा वही बना जो पहले बन चुका था। मैं घबरा गया। आगे ने सूत्रों का भी मोह त्याग दिया कि इससे अच्छा तो रूपावली रटना ही है। बीस पचीस साल पहले जब राजमल बोरा की कृपा से राजवाडे का ‘संस्कृत भाषेचा उलगडा पढ़ा तो पाया ये भाषा के इतिहास में घटित परिवर्तनों का इतिहास है। इसे समझने में किसी पश्चिमी विद्वान को निश्चय ही समस्या पेश आएगी। ऐतिहासिक अध्ययन एक तो यह दूसरा वेदिक प्रयोगों और उसके ग्राह्य या ग्रहीत रूपों का है। तुलना केवल भारतीय प्रयोगों के विषय में संभव थी जिसे यत्र तत्र प्रयोगभेदों के रूप में दर्शाया गया है- शवतिर्गतिकर्मा गांधारेषु। यह सच है कि आधुनिक भाषाविदों को अखाड़े की जगह भारोपीय को पूरा मैदान ही मिल गया और उन्होंने वही काम बहुत बड़े फलक पर किया, पर नया क्या किया इसका पता लगाने के लिए नए अनुसंधान की आवश्यकता होगी।

भारतीय भाषाविज्ञान से परिचित होने पर ग्रामर की उनकी परिभाषा में अवश्य बदलाव आया, “ the whole system and structure of a language or of languages in general, usually taken as consisting of syntax and morphology (including inflections) and sometimes also phonology and semantics.”

Post – 2020-07-09

#शब्दवेध(80)
भारत और महाभारत

भारत और ग्रीस के बीच ही नहीं लघु एशिया और भारत के बीच संपर्क लगभग 1000 साल तक कटा रहा। यही स्थिति ईरान और भारत के बीच के बीच भी थी। कई सौ साल तक चलने वाले लंबे प्राकृतिक प्रकोप के दौरान मध्य एशिया में बसे या अपने उपनिवेश कायम करने वाले भारतीयों में से कुछ आपदा से बचने के लिए भारत की ओर लौटे होंगे इसकी कल्पना की जा सकती है। परंतु उन्हें जिन अनुभवों से गुजरना पड़ा उसकी कहानियां सुन कर ही इतना भय व्याप्त हुआ कि भारतीयों ने विदेश गमन- स्थल मार्ग से हो या जल मार्ग से – वर्जित कर दिया। इतिहास का यह बहुत बड़ा मोड़ है। इस लंबे दुर्दिन के दौर में शिक्षा संस्थान नष्ट हो गए , नागर और ग्रामीण बस्तियाँ उजड़ती-बसती रहीं, पुराने रीति रिवाज और मूल्य सभी बहुत गहराई से प्रभावित हुए। पुराना सारा साहित्य लगभग लुप्त हो गया। उसके उद्धार का नए सिरे से प्रयत्न करना पड़ा। परंतु जुटाने और सँजोने के बाद भी, परंपरा छिन्न-भिन्न होने के कारण, उस साहित्य को समझना भी एक चुनौती भरा काम बन गयाऔर इसके लिए अनेक तरीके अपनाए गए, जिसमें विविध दृष्टियों से विचार करते हुए वेदों की अंतर्वस्तु को समझने का प्रयास किया गया। इसी का परिणाम वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त) और संहिताएँ और ब्राह्मण आदि हैं। साम और यजुर्वेद का विभाग या पृथक वेदों के रूप में स्वीकृति भी इसी प्रयत्न का हिस्सा है। हमारा ध्यान मुख्य रूप से शिक्षा और व्याकरण की ओर ही जाता है जोकि वेदांग में परिगणित हैं।

इसका दूसरा पक्ष यह है कि तटीय क्षेत्र और हिमानी क्षेत्र इससे कम प्रभावित हुए और दलदल वाले भूभागों पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ा। मध्येशिया के भारतीय उपनिवेशों के लोगों ने प्राणरक्षा के लिए दक्षिण (लघु एशिया), पश्चिम (यूगोस्लाविया, लिथुआनिया, फिनलैंड, हंगरी आदि की ओर पलायन किया। भारत में कुरुपांचाल के लोगों ने पूर्व, उत्तर और तटीय भाग की ओर पलायन किया।

हम इस समय अपना ध्यान पश्चिम पर ही केन्द्रित करें। लंबे समय तक भारत से संपर्क भंग हो जाने या क्षीण हो जाने के बाद ईरान, मध्येशिया, उत्तरी यूरोप, भू्मध्य सागर तटीय यूरोप, पश्चिम एशिया में पहुँचे वैदिककालीन भाषाएँ बोलने वाले जत्थे वहीं रह गए। उन्होंने स्थानीय जनों से रोटी पानी का संबंध बना लिया पर अपनी पुरानी पहचान पर गर्व करते रहे।

कोसंबी सदानीरा से परे के पहले दलदल रह चुके क्षेत्र को आग से जलाकर रहने योग्य बनाने की सूझ (वह मुख्यतः वैज्ञानिक थे!) के समर्थन में एक प्रश्न करते हैं कि वैदिक कुरुओं का बाद के इतिहास में पता नहीं चलता। वे कहाँ गए? उसका उत्तर उन्होंने यह निकाला कि वे पूरब चले गए। अर्थात् मिथिलांचल में बसने वाले विदेघ माथव कुरु थे जब कि वे कहीं अपने कौरव होने का दावा नहीं करते। इसके विपरीत कुर्द, ईरान में हख्मनि (सुअक्षि?) के वंशधरों में अनेक Xerxes the Great, श्रवस्व, उसके पिता प्रख्यात दारयावहु (धृतवसु) और उनके वंश में कुरुश्रवण (कै खुसरो) नामों के विकृत उच्चारण से ही हम परिचित हैं। ये सभी अपनी पुराण कथाएँ, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, विश्वास, यहाँ तक कि देवी देवता भी लिए स्थानीय समाज का अंग बन गए।
सामी मजहबों के कतिपय विचार जो उन समाजों के अनुरूप नहीं थे फिर भी उनमें प्रवेश कर गए, इसका कारण इसी पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है। इस प्रभाव को सीधे आदान प्रदान की जगह सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के रूप में समझा जाना चाहिए और साथ ही क्षेत्रीय अस्मिता के अंग के रूप में देखा जाना चाहिए। तभी पता चलेगा कि वह स्वर्ग कहाँ था जहाँ से आदम निकले। उनकी मान्यता के अनुसार भी वह स्वर्गोपम देश पूर्व में क्यों था, नोआ के महापोत (आर्क) या गिलगमेश की कथा के सूत्र कहाँ से किस रूप में जुड़ते हैं और सटे मिस्र के होते हुए अपने ज्ञान-दर्शन, देव कथाओं के मामले में ग्रीस भारतीय स्रोत के इतने निकट क्यों पड़ता है, रोम के प्राचीन स्तरों से लिंग के भारतीय प्रतिरूप क्यों मिलते हैं?

इसमें ध्यान देने की बात यह भी है कि जिसे भारोपीय क्षेत्र कहा जाता है उसमें केवल संस्कृत का नहीं भारत की इतर भाषाओं के तत्वों का भी प्रसार हुआ था। स्वामिवर्ग के साथ भृत्य वर्ग भी था और जहाँ जमीनी स्तर पर काम होता था, उनकी बोलियों का भी उसके समानान्तर प्रसार हुआ, उनके देवी-देवता भी लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रह सके।

Post – 2020-07-09

हमारा बुद्धजीवी वर्ग कैसा है? जैसा है वैसा क्यों है? संकट की हर घड़ी में वह किसके साथ और किसके विरुद्ध खड़ा होता है? वर्तमान अधोगति की जिम्मेदारी किस पर आती है? आज हमारे देश में क्या कोई ऐसा वर्ग है जिसे बुद्धिजीवी कहा जा सके? इन प्रश्नों का उत्तर हमें बाबा साहब के निम्न कथन के संदर्भ में तलाशना होगा।

“बुद्धिजीवी वर्ग वह है जो दूरदर्शी होता है, सलाह दे सकता है और नेतृत्व प्रदान कर सकता है। किसी भी देश की अधिकांश जनता विचारशील और क्रियाशील जीवन व्यतीत नहीं करती। ऐसे लोग प्राय: बुद्धिजीवी वर्ग का अनुकरण करते हैं। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि किसी देश का संपूर्ण भविष्य उसके बुद्धिजीवी वर्ग पर निर्भर होता है। यदि बुद्धिजीवी वर्ग ईमानदार, स्वतंत्र और निष्पक्ष है तो उस पर भरोसा किया जा सकता है कि संकट की घड़ी में वह पहल करेगा और उचित नेतृत्व प्रदान करेगा। यह ठीक है कि प्रज्ञा अपने आप में कोई गुण नहीं है। यह केवल साधन है और साधन का प्रयोग उस लक्ष्य पर निर्भर करता है। बुद्धिमान व्यक्ति भला हो सकता, लेकिन वह दुष्ट भी हो सकता है। उसी प्रकार बुद्धिजीवी वर्ग उच्च विचारों वाले व्यक्तियों का एक दल हो सकता है और सहायता के लिए तैयार रहता है, प्रथभ्रष्ट लोगों को सही रास्ते पर लाने को तैयार रहता है।”
भीमराव अंबेडकर
जाति प्रथा का उन्मूलन

Post – 2020-07-08

#शब्दवेध(79)
ऐसी दीनता या मन की
हम अपना लेखन बीते दिनों का रोना रोने के लिए नहीं करते, अपनी वर्तमान अवस्था को समझने और इससे आगे अपनी गलतियों को सुधारने के लिए हम क्या कर सकते हैं, यही हमारे लेखन का उद्देश्य है और इसकी पहली शर्त है अपने वर्तमान और इतिहास दोनों को तथ्यपरक ढंग से समझना।
लंबे समय से अपने आलस्य और आरामतलबी के कारण हम कोई सार्थक काम नहीं कर सकते। दूसरा हमसे प्रलोभन के बल पर या दबाव के बल पर काम अवश्य ले सकता है।
स्वतंत्रता के बाद हमारा आत्मविश्वास बढ़ना चाहिए था, उससे पहले हमारे पास सत्ता नहीं थी,परंतु कुछ दूरदर्शी लोगों के मन में, पश्चिमी आदर्शों से हटकर, अपनी जमीन पर खड़े हो कर, एक ऐसे भविष्य के निर्माण का स्वप्न था जो हमारे लिए ही नहीं, भौतिकवादी तनाव से ग्रस्त पश्चिम के लिए भी अनुकरणीय हो सके। इसमें अपनी सामाजिक आर्थिक विकृतियों से मुक्ति और पश्चिमी अनुकरणीय गुणों को आत्मसात करने का संकल्प भी था।
हुआ उल्टा ही। हमने पश्चिम की विकृतियों को भी जुटा लिया अपनी प्राचीन विकृतियों को नए दरवाजे से प्रवेश करने की छूट दे दी, और यह बोध तक खो दिया कि हम इससे अलग कुछ हो या दूसरों से आगे जा सकते हैं।
हिंदू समाज लगभग 1000 साल की गुलामी के बाद अपनी निजता को भूल कर दूसरों की छाया बनने की कोशिश में लगा रहा। मध्यकाल की धार्मिक यातना, कंपनी काल राजनीतिक और आर्थिक अधोगति के मिले-जुले प्रभाव से हिंदुओं का मनोबल कितना गिरा हुआ था, और उसमें संस्कृत के महत्व पर स्वीकार से इतनी राहत अनुभव की गई इसका अनुमान हम आज नहीं लगा सकते। इसे “Indian Mirror,” Calcutta, 20 September, 1874 में प्रकाशित एक लेख की कुछ पंक्तियों से समझा जा सकता है:
“When the dominion passed from the Mogul to the hands of Englishmen, the latter regarded the natives as little better than niggers, having a civilization perhaps a shade better than that of the barbarians. . . .
The gulf was wide between the conquerors and the conquered. . . . There was no affection to lessen the distance between the two races. . . . The discovery of Sanskrit entirely revolutionized the course of thought and speculations. It served as the ‘open sesame’ to many hidden treasures. It was then that the position of India in the scale of civilization was distinctly apprehended. It was then that our relations with the advanced nations of the world were fully realized. We were niggers at one time. We now become brethren.
इस हीनता ग्रंथि के चलते यदि किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया उनके अपने इरादे क्या हैं, क्यों इ शिक्षा अनुसंधान और सर्वेक्षण को अपने नियंत्रण में रखते हुए हमारी चेतना को भी नियंत्रित करना चाहते हैं इसकी समझ तो तब हो ही नहीं सकती थी क्योंकि वह आज तक पैदा नहीं हुई। आज भी हमारे लिए गौरांग वचन प्रमाणम्, पाश्चात्य मेधा वरीया, पाश्चात्य स्वीकृतिः परमोपलब्धिः के अलिखित सूत्र हमारी अंतश्चेतना में विराजमान हैं, यद्यपि। जिस तरह की धूर्तता के उदाहरण हमने विलियम जोंस और मैक्स मूलर के हवाले से दिए हैं, उससे भी अधिक धृष्टता से वही काम आज भी किया जा रहा है। इस काम के विषय में उस समय आज्ञा का जो भाव था वह ऊपर के लेख में इन शब्दों में प्रकट हुआ था “We say again that India has no reason to forget the services of scholars. “ आज भी हम उसी वाक्य में उनकी श्लाघा करते हैं, परंतु स्वयं उन कामों को पूरी निष्ठा से करने के लिए तत्पर नहीं होते जिनको विषाक्त बनाकर पेश करने के लिए उनकी श्लाघा करते हैं।
मुझे यह सोच कर ग्लानि होती है, ग्रंथों को अधिकार में रखने वाले ब्राह्मण इतने निकम्मे और निठल्ले थे कि उन्हें यह तक नहीं पता था उनके ग्रंथों में जिन्हें वह अपनी थाती मानते आए थे उनमें लिखा क्या है और विदेशी विद्वान उसके साथ किस तरह का व्यवहार कर रहे हैं, उतने ही निकम्मे और निठल्ले हमारे आज के बुद्धिजीवी हैं जिसके सबसे अलबेले कारखाने की सबसे अलबेली और प्रतिभा को संस्कृत का ज्ञान इसलिए जरूरी नहीं कि संस्कृत में जो कुछ जानने योग्य है उसका अनुवाद किया जा चुका है।
प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं है युगप्रवृत्ति का है । उसी कारखाने की उतनी ही महान एक दूसरी प्रतिभा ने कामायनी पर मुक्तिबोध की पुस्तकाकार समीक्षा पर एक संगोष्ठी आयोजित की थी।
हमारा विचार था कि मुक्तिबोध ने जिन इतिहासकारों पर भरोसा करते हुए वैदिक काल को समझा वह इसे एक ऐसे अजीबोगरीब समाज के रूप में जानते थे जिसके सदस्य पशुओं को लूटते, लूट कर चुराते, चुरा कर गँवाते थे और लूटने से पहले ब्रह्म विचार करने बैठ जाते थे। वैदिक काल और समाज के विषय में प्रसाद जी की समझ और इसके स्रोत भिन्न थे।
आक्रामक आर्यों के मिथक को जीवित रखने के लिए मार्शल ने बड़े जोरदार ढंग से यह दिखाना चाहा कि मोहनजोदड़ो की सभ्यता अनार्य सभ्यता है….और लोग इसे ही मानते चले आए हैं।
मुक्तिबोध केअनुसार कामायनी में वर्णित प्रलय ब्रिटिश साम्राज्यवादी पूंजीवाद के आघात से ध्वस्त रही सामंती व्यवस्था की प्रलय है। यह वाजिद अली शाह से होड़ लेने वाली सामंती अय्याशी के ध्वस्त होने की पीड़ा है ….
यह गलत है। अंग्रेजों ने भारत में पूंजीवाद को पूर्ण विकसित ही नहीं होने दिया, उन्होंने अपने कल कारखानों कल कारखाने भी भारत में नहीं लगाए, क्योंकि इससे भारतीय व्यापारिक पूँजी के औद्योगिक पूँजी में बदलने का डर था। … अंग्रेजों ने भारतीय सामंतवाद को कमजोर बनाने के स्थान पर इसे हर तरह से मजबूत बनाया यही कारण था कि सामंत और जमीदार और रियासतदार अपनी रक्षा के लिए अंग्रेजी शासन का समर्थन और स्वतंत्रता आंदोलन विरोध करते थे । आदि।
इस पर उस विभूति को ही कहना उचित था पर एक युवक ने भावोद्गारपूर्ण स्वर में यह बताना आरंभ किया कि पाश्चात्य विद्वानों ने इतने परिश्रम से हमारे साहित्य और इतिहास को व्यवस्थित किया जिसके लिए हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए, और कृतघ्नता यह कि उनकी आलोचना की जा रही है।

क्या हम आज भी ठीक उसी चरण पर ठहरे हुए कविता-कहानी गढ़ कर आह-वाह करने वाले, अपने बौद्धिक दायित्व के प्रति उदासीन, गहन अध्ययन और अनुसंधान का काम अपने मानस को नियंत्रित और निर्देशित करने वालों के ऊपर छोड़ कर निश्चिंत, पाँव पुजाने के लिए आकुल विकल, दुर्बुद्धिजीवियों की जमात नहीं बने रह गए हैं, जिन्हें यह तक पता नहीं कि उनके साथ क्या किया जा रहा है। इसे ही आपके मन मे उतारने के लिए हमें अपने उद्धारकों में अग्रणी मैक्समुलर की जाँच करनी पड़ी। कल यह देखेंगे कि ग्रीक और भारत का तुलनात्मक बौद्धिक स्तर क्या था और इसका एकपक्षीय चित्रण करते हुए किस रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।

Post – 2020-07-07

#शब्दवेध(78)
विश्वसनीयता का संकट

मैं चाहता हूं आप मेरी कल की पोस्ट में मैक्स मूलर के इस कथन पर दुबारा ध्यान दें. वह कहता है
(1) वेद हमारी अपेक्षाओं के बहुत विपरीत है ( so different from what it was expected to be); अर्थात्, हमने सोचा था यह भी संस्कृत में लिखा होगा, पर इसकी तो भाषा ही अलग निकली। इसका सीधा अर्थ था कि यह तो वह भाषा थी जिससे संस्कृत निकली थी, अतः उसकी सहोदरा भाषाओं की भी यही जननी थी। यह इतिहास का सच भी था, क्योंकि (क) यह संस्कृत के जन्म से बहुत पहले उस चरण की भाषा थी जब भारोपीय भूभाग में जननी भाषा का प्रसार हुआ था, जो (ख) जिसका काल उस काल रेखा से मिलता था जिस पर जोंस ने पूर्वी भूमध्य सागर क्षेत्र और इरित्रिया (इथियोपिया) से यह प्राचीन भाषा बोलने वालों के रोम और विश्व ग्रीस में प्रवेश की बात स्वीकार की थी; (ग) उस काल रेखा से मिलता था जिसे परिपक्व हड़प्पा का ह्रास काल कहा जा सकता है, और साथ ही (घ) यह वह काल था जिसमें भाषा और देव समाज को मानने वाले हत्ती, कश (कस्साइट), और मैत्रेय (मितन्नी) जनों की उसी भूभाग में प्रभावशाली उपस्थिति का पुरातात्विक प्रमाण मिला। इन सभी से मैक्समूलर अवगत नहीं हो सकता था, फिर भी भाषा की प्राचीनता और संबद्धता के विषय में वह पूरी तरह सावधान था यह इसी व्याख्यान के अन्य हवालों से प्रकट है; इसके बाद भी, या इसके कारण ही, इसे नकारने के लिए वह अगले ही वाक्य खंड में वैदिक भाषा को दूसरी सभी भाषाओं से असंबंध सिद्ध कर देता है।

(2) यह बिल्कुल अलग और दूसरों से असंबद्ध है (it stands alone by itself); अर्थात् भाषाओं की पैतृकता का सवाल इसके उद्घाटन के बाद भी एक पृथक् सवाल है। क्योंकि,

(3) इससे एक ऐसी भाषा हमारे सामने प्रस्तुत होती है जो अब तक ज्ञात किसी भी भाषा से अधिक आदिम है (it places before us a language, more primitive than any we knew before);

अब रही सांस्कृतिक स्तर की बात तो:
(4) इसकी कविता को वहशियाना, अजीब, भोंडी और बकवास कहा जा सकता है (poetry is what you may call savage, uncouth, rude, horrible),

(5) लेकिन इसी कारण तब तक जब तक इसकी तह में छिपी सचाई का उद्घाटन नहीं हो जाता, जब तक यह पता नहीं चल जाता कि इंसान पहले डेविड, होमर, जरदुस्त्र के स्तर तक पहुँचने से पहले क्या था यह दिखाई नहीं देने लगता इसकी परतें खोदते रहना एक सार्थक प्रयास है ( it is for that very reason that it was worthwhile to dig and dig till the old buried city was recovered, showing us what man was, what we were, before we had reached the level of David, the level of Homer, the level of Zoroaster, showing us the very cradle of our thoughts, our words, and our deeds.)

इसलिए जहाँ तक मजहब का सवाल है:

(6) यह मजहब के नितांत आदिम विचारों के भी मात्र बीजांकुरो को उद्घाटित करता है (reveals to us the earliest germs of religious thought, such as they really were)।

कहाँ ईसाइयत का महावृक्ष और इसके सामने कहाँ यह फूटता हुआ अँखुआ।
उसी वेद की जिसका नाम लेते ही भारतीयों का मनोबल सत्ता के दमनचक्र को तोड़ कर इतना ऊपर उठ जाता था कि आदर्श वैदिक मूल्यों के अनुरूप न पाकर अपने शासकों तक को वे अपने से तुच्छ समझते थे उसे मैक्समुलर ने अपने कुतर्कों से इतना गर्हित सिद्ध कर दिया कि वह ईसाइयत के सामने आँख उठा कर नहीं देख सकता था।

इस बात को इस रूप में किसी ने नहीं लिखा है परंतु जो तथ्य है उसे कोई झुठला भी नहीं सकता। बोडन चेयर की स्थापना ईसाइयत के प्रचार के लिए संस्कृत साहित्य के अनुवाद सुलभ कराने के लिए की गई थी जिससे प्रचारकों को भारत के विषय में जानकारी प्राप्त करने के बाद भारतीयों से शास्त्रार्थ मेंं पछाड़ने का अवसर मिल सके। इस चेयर के पहले अधिकारी विल्सन थे जिन्होंने ऋग्वेद का सायण के अनुसार अनुवाद किया था। उनके बाद इस पद के दो दावेदार थे, एक मोनियर विल्सन दूसरे मैक्समूलर। मैक्समूलर जर्मन थे इसलिए इसके लिए नहीं चुने जा सके। उन्हें बंसेन की मदद से कंपनी से ऋग्वेद के अनुवाद का काम मिला। मुलर की अंतश्चेतना में यह ग्रंथि लगातार बनी रही कि बोडेन पीठ के लिए वह मोनियर विलियम्स से अधिक उपयुक्त व्यक्ति था और इसके प्रदर्शन के लिए उसने जो घटियापन दिखाया उससे उसको एक व्यक्ति और विद्वान दोनों रूपों मे क्षति पहुँची। पर इस नंगी नाच को देखने के बाद भी भारतीय परंपरावादियों के लिए वह समादृत और उच्छेदवादियों के लिए उपयोगी बना रहा, पर दोनों में से किसी का ध्यान इस बात पर नहीं गया कि वह ईसाई मिशनरियों से भी अधिक ईसाइयत परस्त कैसे हो गया।
On August 25th 1866, Muller wrote to Chevalier Bunsen:
India is much riper for Christianity than Rome or Greece were at te time of St. Paul. The rotten tree has for some time had artificial supports, because its fall would have been inconvenient for the government. But if the Englishman comes to see that the tree must fall, sooner or later, then the thing is done… I should like to lay down my life, or at least to lend my hand to bring about this struggle… I do not at all like to go to India as a missionary, that makes one dependent on the parsons… I should like to live for ten years quite quietly and learn the language, try to make friends, and see whether I was fit to take part in a work, by means of which the old mischief of Indian priestcraft could be overthrown and the way opened for the entrance of simple Christian teaching…
— The Life And Letters Of The Right Honourable Friedrich Max Muller Vol.i, Chapter X[21]

प्रसंगवश यह याद दिला दें कि विल्सन ने अपने अनुवाद में या मोनियर विलियम्स ने अपने कोश-संपादन में उस तरह के ओछेपन का परिचय न दिया जो मैक्समुलर ने अपने सभी कामों में अपनी अकादमिक विश्वसनीयता को दाँव पर लगा कर किया। इसे निम्न प्रश्नों में देखा जा सकता है:

1. वेद के अनुवाद के पीछे तुम्हारा उद्देश्य क्या था, पाठकों को उसकी अनतर्वस्तु से परिचित कराना या ईसाइयत का प्रचार :The translation of the Veda will hereafter tell to a great extent on the fate of India, and on the growth of millions of souls in that country. It is the root of their religion, and to show them what the root is, I feel sure, is the only way of uprooting all that has sprung from it during the last 3,000 years… one ought to be up and doing what may be God’s work.

2. यदि तुम्हारे ही कथनानुसार यह भाषा इतनी दुष्कर है कि यह तुम्हारी समझ में ही नहीं आती, अभी रसातल मे दबे हुए पुरासत्य को तलहटी तक उतर कर ही जाना जा सकता है फिर अपने अज्ञान के बाद भी तुम्हें उसके सत्य, सौंदर्य, सांस्कृतिक स्तर पर बात करने का अधिकार कैसे मिल गया?

3. तुमने संस्कृत साहित्य का इतिहास लिखा पर उसका लक्ष्य संस्कृत साहित्य से परिचित कराना था या हिंदुत्व का गर्हित पक्ष प्रस्तुत करना । शीर्षक स्वतः बयान है : Friedrich Max Müller (1859). A History of Ancient Sanskrit Literature So Far as it Illustrates the Primitive Religion of the Brahmans. Williams and Norgate.

4. यदि ऋग्वेद इतना प्राचीन है कि इसमे मानव विकास का आदिम चरण दिखाई देता है फिर यह केवल 1200 या 1500 ईसापूर्व का साहित्य कैसे हो गया। बाद की कृतियों के लिए सही या गलत 200 साल का स्तर उस पर कैसे लागू हो गया जो सबसे अनमेल, अलग और चरम पुरातन था?

5. यदि ऐसे ही विद्वानों ने भारतीय साहित्य का उद्धार किया, उन्होंने ही अनुवाद, व्याख्यायें और अनुसंधान किया तो उन्होंने मध्यकालीन पुस्तकद्रोही आततायियों की पहुंच से दूर छिपा कर रखे गए ग्रंथों का उद्धार किया या जिस धर्मांधता से मध्यकालीन आततायी शिक्षाकेन्द्रों और पुस्तकालयों को ध्वस्त करते और आग लगाते रहे उसी धर्मांधता, विजिगीषा, और अहम्मन्यता के दबाव में उन छिपे कोनों से उस साहित्य को बाहर निकाल कर तुम जैसे लोग अपव्याख्या से उन्हें नष्ट करते रहे।

6. वे अधिकारी विद्वानों को शैतानी ज्ञान का प्रचारक बता कर कत्ल करते रहे और तुम लोग पद, प्रलोभन, उपाधियाँ देकर बौद्धिक नपुंसकता का शिकार बनाते रहे।

7. इसी इरादे से नियोजित भारतीय मानविकी का उन्हीं के निर्देशन और प्रोत्साहन में अपनी शिक्षा और अनुसंधान करने वाले अध्यापक और उनके शिष्य क्या करते रहे? उन्होंने इतिहास, मानविकी, भाषाविज्ञान और समाजशास्त्र को समझा या अपनी और शिक्षित समाज की बुद्धि भ्रष्ट की।

जाहिर है मेरी जानकारी कम है, सभी विषयों की तो हो ही नहीं सकती, पर जिज्ञासा अपार है। इन प्रश्नों का उत्तर तलाशते हुए उन्हीं के अन्तरिविरोधों से हमें एक अन्तर्विरोध मुक्त ज्ञानशास्त्र तैयार करना पड़ा है।