Post – 2017-01-16

हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास – 13 (असंपादित )

‘‘तुमसे शगल के लिए तो बात की जा सकती है, समझ के लिए नहीं। तुम इतने दुराग्रही हो कि तुमको यह भी समझाया नहीं जा सकता कि हिन्दुत्व के प्रति घृणा का प्रधान कारण वर्णवाद रहा है जिसके प्रतीक तुम्हारे तुलसी बाबा हैं जिनको तुम क्रान्तिकारी सिद्ध करने की जिद पर अड़े हो। सिद्ध, नाथपंथी, कबीर और दूसरे सन्त, रैदास, ये सभी वर्णवाद पर प्रहार करते हैं, समाज को इसकी अतार्किकता का कायल बना कर उसकी चेतना को बदलते हुए उसका नया संस्कार करना चाहते हैं, और तुलसी इनसे ही पंगा लेते हुए समाज को पीछे ले जाने की कोषिष करते हैं। तुम कहते हो वह इस्लाम के प्रसार को रोकने के लिए हिन्दुत्व की रक्षा के लिए इनका विरोध करते हैं, मैं कहूंगा हिन्दुत्व की सही समझ उनके पास थी और इस्लाम के प्रसार को रोकने के लिए आत्मालोचन और बचाव की चिन्ता उन्हें थी। वे जानते थे हिन्दुत्व वर्णवाद नहीं है, एक मूल्य व्यवस्था की रक्षा करते हुए हिन्दुत्व को इस्लाम के दबाव से बचाना चाहते थे। तुम्हारे क्रान्तिकारी तुलसीदास उस दुर्बलता को बचाने के लिए प्रयत्नषील हैं जिसके कारण हिन्दू समाज अरक्षणीय बना हुआ था और इस तरह हिन्दुत्व के लिए स्वयं संकट पैदा कर रहे थे।’’
इस हमले के लिए तो मैं तैयार ही नहीं था, तुरत कोई जवाब सूझ नहीं रहा था, हकलाते हुए कहा, ‘‘वर्णव्यवस्था सच कहो तो अर्थतन्त्र की उपज है, धर्म से इसका कोई संबंध नहीं।’’ वह कुछ विचलित लगा तो मेरा आत्मविष्वास लौट आया, ‘‘तुम जानते हो, सभ्यता की पष्चिम की समझ कि जहां से नगर बसने आरंभ हुए वहां से सभ्यता आरंभ हुई और जहां से लेखन आरंभ हुआ वहां से इतिहास गलत है। सभ्यता उस समय आरंभ हुई जब कार्यविभाजन आरंभ हुआ, वर्णविभाजन कार्यविभाजन का ही रूप है! बर्बर समाजों में सभी काम सभी कर लेते थे और एक औसत दक्षता सभी के पास थी जिससे जीवन यापन हो जाता था, कार्यविभाजन के दास दक्षता का स्तर और प्रतिस्पर्धा का वह पर्यावरण तैयार हुआ जिसे सभ्यता की नींव का पत्थर कहा जा सकता है। और यह कार्यविभाजन स्थायी कृषि के साथ आरंभ हुआ। यदि तुम इसे धर्म से जोड़ना चाहो तो कहना होगा कार्यविभाजन या वर्णविभाजन के बिना समाज का उन्नयन नहीं हो सकता था, यह उसकी अपरिहार्य आवष्यकता थी इसलिए वर्णविभाजन धर्म का हिस्सा बना। तुम्हारे अधकचरे दिमाग के माक्र्सवादी वर्ण को वर्ग बताते रहे। पढ़ा है न, ‘भारतीय समाज में वर्ण ही वर्ग है और इस समझ से पिछड़ और दलित जनों को एक वर्ग में रखते रहे, और वह उनके लिए सर्वहारा बन जाता रहा है और ऊंची जातियों को दूसरे में , एक संपन्न या हैव्स का वर्ग दूसरा सर्वहारा या हैवनाट्स का और दोनों के बीच केवल टकराव का ही संबंध हो सकता है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक ऊंची जातियों को मिटा नहीं दिया जाता और वर्णहीन समाज जो तुम्हारी समझ से क्लासलेस साम्यवादी समाज है, वह स्थापित नहीं हो जाता। यह मूर्खतापूर्ण समझ है और भारतीय समाज, भाषा संस्कृति की उपेक्षा से पैदा समझ है और इसे ही तुम इतिहास में लौटा कर वर्णभेद को चुनौती देने वालों को क्रान्तिकारी और उसकी रक्षा करने वाले को प्रतिक्रान्तिकारी या पुनरुत्थानवादी मान लेते हो और तुलसी पर हमला बोल देते हो।’’
‘‘इसमें गलत क्या है, यह तो बताओ।’’
‘‘मूर्खतापूर्ण कहने के बाद भी कुछ बताने को रह जाता है ? पहली बात कि यदि वर्ण वर्ग है तो भारत में चार वर्ग होने चाहिए जब कि इसमें षिक्षा थी पर षिक्षित मध्यमवर्ग तक नहीं था। इसका उदय अंग्रेजी राज के साथ हुआ। दूसरे यदि सवर्ण हैव्स की कोटि में आते हैं और षूद्र हैवनाट्स के, तो वर्णव्यवस्था में सबसे ऊपर गिना जाने वाला ब्राह्मण तो निपट सर्वहारा था – रहने को कुटिया और जीविका के लिए भीख, वह पुरोहिती से आए या दान और भोज से या सीधे मधूकरी से । तुम आथर््िाक श्रेणियों में रख कर भारतीय समाज को समझ ही नहीं सकते और कम्युनिस्टों के देसी होते हुए भी अपने नजरिये के कारण अपने ही देष और समाज के लिए विदेषी और अजनबी बन जाने का प्रधान कारण यह टकावादी सोच है। जिनके पास टका था वे वर्णविभाजन में शूद्रों के ठीक ऊपर हुआ करता था और कई मानों में उसकी तुलना शूद्रों से की जाती थी, क्योंकि समाज के निर्वाह का सारा भार, सारी अर्थव्यवस्था इनके ही उद्योग पर टिकी हुई थी। ब्राह्मण और क्षत्रिय तो परजीवी वर्ण थे, स्वयं कोई काम ही नहीं करते थे। क्षत्रियों ने बहुत बाद में भूसंपदा पर अधिकार करके अपनी आय का एक स्रोत सुनिष्चित कर लिया था, ब्राह्मण के पास पुस्तकीय ज्ञान था और शूद्र के पास परंपरागत कौषल, इस माने में दोनों एक दूसरे के सबसे निकट पड़ते थे। संपदा से वंचित और योग्यता के बल पर जो कुछ मिल सकता था उसे पाने को चिन्तित इसलिए दोनों मे तनाव भी अधिक था। आय की दृष्टि से षूद्र की स्थिति ब्राह्मणों से अधिक अच्छी थी। हमारे समाज के आन्तरिक तनाव को भुनाने की कोषिष की गई पर समझने का प्रयत्न नहीं किया गया। मध्यकाल तक, कंपनी के प्रवेष से पहले तक शूद्रों के पास ही वे रोजगार धन्धे थे जिनसे भारतीयों को वंचित कर दिया गया, यहां तक कि नमक बनाने के अधिकार तक से, और उसके बाद वे जो किसानी में किसी न किसी तरह सहायक हो सकते थे, अर्धबेकारी भोगते हुए उस दषा को पहुंच गए जिसके लिए तुम ब्राह्मणों को दोष देते नहीं थकते और षिक्षा का लाभ उठाने के कारण जो नौकरियों से ले कर संभ्रान्त पेषों तक, यहां तक आन्दोलनों और संगठनों तक में इतने महत्वपूर्ण हो गए कि लगता है उनकी आर्थिक स्थिति सदा से ऐसी ही रही है ।’’
मैं सांस लेने के लिए रुका तो वह लगभग चीखते हुए टूट पड़ा, ‘‘तुम पूरी बात न तो सुनते हो न समझते।’’
मैं चकित हो कर उसे देखने लगा, मेरे इतने प्रभावषाली विवेचन का उस पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा था
‘‘तुममें बोलने का इतना नषा है कि तुम दूसरे किसी की बात सुनने या समझने की जरूरत ही नहीं समझते। मैं वर्णव्यवस्था की बात नहीं कर रहा था, वर्णवाद की निन्दा कर रहा था। वर्णव्यवस्था यदि कार्यविभाजन है तो किसी कार्य में सबसे दक्ष व्यक्ति को उस कार्य या उन कार्यों पर लगाया जाय जिनमें उसकी दक्षता है। आरंभ इसी रूप में हुआ था। यही सभ्यता की पहली पहचान है और प्रगति और विकास की अनिवार्य शर्त। वर्णवाद का मतलब है वर्ण का योग्यता पर आधारित न हो कर जन्म पर आधारित हो जाना, योग्यता के अभाव में भी उसका उन कामों पर नियुक्त किया जाना और उसी काम के लिए उससे योग्य व्यक्तियों की इसलिए उपेक्षा कि यह उनके आनुवंषिक कार्यभार में नहीं आता था। वर्ण के जाति में बदलने की कीमियागीरी को मैं नहीं समझता, पर इतना समझता हूं कि यह प्रगति में बाधक है, समाज को पीछे ले जाने वाला है और इससे मुक्ति पाए बिना समाज अपनी चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता। जिस समय के नाथों, सन्तों और समतावादी चिन्तकों की बात कर रहा हूं उस समय तक वर्ण जाति में बदल चुका था और वे इसी को समाप्त करने की बात कर रहे थे, इसलिए उन्हें क्रान्तिकारी कहा जाएगा। तुलसी उनका विरोध कर रहे थे, कर ही नहीं रहे थे, उन्होंने उस धारा को उलट दिया और इसलिए मैं उन्हें प्रतिक्रियावादी मानता हूं और यह मोटी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती इसलिए कभी इतिहास में इतना पीछे चले जाते हो जिसके विषय में हमें पक्की जानकारियां नहीं है इसलिए कुछ भी कयास भिड़ाया जा सकता है, नही ंतो उस चरण को छोड़ कर सीधे आज के समय पर छलांग लगा लेते हो। गोरखनाथ और गोरखपंथी योगी, कबीर और कबीरपन्थी, रैदास और रविदास के अनुयायी हिन्दुत्व को बचाने के लिए उस बुराई को दूर करना चाहते थे जिसके कारण हिन्दू समाज समतावादी इस्लाम के सामने अरक्षणीय सिद्ध होता था। इतनी सी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती ।’’
इस बार मैं पूरी तरह तैयार था, ‘‘देखो, किसी समाज का सबसे परिरक्षणवादी तबका वह होता है जिसको हम सबसे पिछड़ा समझते हैं। सबसे ढुलमुल और सुविधाभोगी वह होता है जिसे हम षिक्षित वर्ग समझते हैं। नये विचार और तर्क की पहुंच इसी तक होती है और किसी बात का कायल हो जाने के बाद पाला बदलने वालों में सबसे आगे यही होता है। सन्तों और योगियों का औजार तर्क और औचित्य था, जिसका असर समाज के ‘समझदार’ समझे जाने वाले तबके पर होता है, और एक बार यह डगमगाया तो पीछे का सारा समाज उसी के अनुसार ढल जाता है। यहां मैं तुमको एक अन्य संदर्भ में चर्चित अपनी एक पोस्ट की याद दिलाऊं, जिसमें ट्वयन्बी के हवाले से मैंने दो सभ्यताओं के टकराव की परिणति बताई थी। इसे संक्षेप में दुहराऊं तो जब दो सभ्यताओं का टकराव होता है तो दबंग सभ्यता दबाव झेल रही सभ्यता पर हावी होना चाहती है । दूसरी अपनी रक्षा के लिए अधिक रूढ़िवादी हो जाती है । पर फिर यह सोच कर कि इसके अमुक तत्व को स्वीकार करने से तो कुछ फर्क पड़ता नहीं, निरापद और मामूली प्रतीत होने वाले तत्व को ग्रहण कर लेती है, परन्तु चूंकि सभ्यता की अपनी आवयविकता होती है इसलिए उसमें प्रवेष करने वाला वह तत्व विजातीय तत्व के प्रवेष की तरह उसे भीतर से तोड़ना आरंभ कर देता है और फिर वह पूरी तरह असहाय और अरक्षणीय हो जाती है इसलिए तुलसी की समझ वही थी जिसे हम ट्वायन्बी में चार सौ साल बाद पाते हैं। उनका अन्देषा गलत नहीं था। हिन्दुत्व की रक्षा के लिए वर्णवाद को तोड़ कर अपनी धुरी से विचलित होने वाले आन्दोलनों का परिणाम तुम देख कर समझ सकते हो।
‘‘तुलसी तर्कवाद के आघात से बचने के लिए आस्थावाद का सहारा लेते हैं और उनका आन्दोलन अधिक सफल रहा यह तुम परिणामों से समझ सकते हो । और वह जो तुम्हारा खयाली पुलाव था कि वर्णवाद हिन्दू समाज का सबसे अरक्षणीय पक्ष था और इसके सताए हुए लोग इस्लाम की शरण जा सकते थे यह हवाई है, इसे हम उदाहरणों से देख चुके हैं कि सबसे दलित और दुर्गति में जीने वाली जातियों में से किसी ने धर्म परिवर्तन नहीं किया। यदि यह बात तुम्हारे भेजे में आ गई तो बाकी बातें कल समझ पाओगे ।’’ बात मैंने ही खत्म कर दी ।

Post – 2017-01-15

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास- 12

”देखो इतिहास के भी कई रूप होते हैं और पुराणों के भी कई रूप होते हैं। हम जिस आधुनिक पुराण को इतिहास के नाम पर पढ़ते हैं उसमें सद्भावनावश तथ्‍यों को तोड़ मरोड़ और छोड़ कर यह विश्‍वास दिलाने का प्रयास किया जाता रहा है कि भारत में धर्मान्‍तरित होने वाले जनों में अधिकांश वे थे जिन्‍होंने वर्ण व्यवस्था के अपमान से तंग आकर इस्‍लाम कबूल कर लिया था।

”वर्णव्‍यवस्‍था की अपनी कमियां हैं जिनका समर्थन नहींं किया जा सकता। हाल के दिनों में इसकी इतनी भर्त्‍सना की गई है, और योजनाबद्ध रूप में ईसाइयत के प्रचार और प्रसार के उद्देश्‍य से की गई है, कि हम इसका उल्‍लेख आते ही शर्म से डूब मरने के लिए पानी की तलाश करने लगते हैं – चुल्‍लू भर ही सही, मिले तो कहीं। परन्‍तु उससे मुक्ति की चेतना और यह मूल्‍यांकन कि दूसरा मत समानता प्रदान करेगा चेतना और ज्ञान के जिस स्‍तर की अपेक्षा रखता है, वह दलित समाजों में था, यह सोचने में अच्‍छा लगता है, पड़ताल में निराशा हाथ लगती है।

”सामाजिति न्‍याय के उत्‍साह में इसका ध्‍यान नहीं रखा गया और मैं स्‍वयं भी इसी सोच का कायल था कि ऐसा हुआ हो सकता है।

”परन्‍तु दो बातों ने मुझे इस पर पुनर्विचार के लिए बाध्‍य किया । पहली यह कि जो सचमुच दलित जातियां थीं, जैसे डोम, चमार, पासी, निषाद, धोबी, धरिकार आदि उनमें कोई धर्मान्‍तरित नहीं हुआ। दूसरी यह कि मेरे परिचित क्षेेत्र में हीन कर्म से जुड़ा कोई मुसलमान मिला तो वह था हेल्‍ला जिसका नाम ही इसकाे यूनानियों से ईरानियों में प्रचलित और उनसे भारत में आया हुआ हो सकता है, बाकी चुडि़हार, मनिहार, जुलाहे या बुनकर और दरजी थे अन्‍यथा कुछ दूरी पर नटों की जमात जो अपनी मातृसत्‍ताक कबीलाई जीवनशैली में रहता, पहलवानी और बाजीगरी करता और आल्‍हा गायन करता और उनकी पत्नियां गोदना गोदने का काम करतीं। इनसे अलग थे पीलवान या हस्तिप। भिखारियों में जोगी थे जो अपना लंबा गुदडे का कंधे से पांव तक लटकता धोकरा ले कर आते और सारंगी बजाते भरथरी का गीत गाते हुए भीख मांगते। उनके गेरुआ वस्‍त्र से उनकी पहचान अलग हो जाती। उनके विषय में दबी अफवाह यह थी कि वे एकांत में किसी छोटे बच्‍चे को पा लें तो उसे जड़ी सुंघाकर धोकरे में डाल लेते हैं और ले जा कर जोगी बना देते हैं। बच्‍चों को डराने के लिए माताएं धोकरहा पकड़ लेगा कह कर डरातीं । पास का गांव था जिसका आधा क्षत्रिय आधा खान, सभी भूस्‍वामी अत: उन‍का वर्ण व्यवस्था से सताए हुओं से कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता !

”मुसलमानों के नाम पर मैं इन्हें जानता था और वयस्क होने पर गोरखपुर में अवध से आकर बसे भोजपुरी क्षेत्र के बीच अवधी बोलने वाले परिवारों को जान सका जो अवध के नवाब के गोरखपुर में इमामबाड़े की स्थापना, अवध के साथ आए इमाम, और उनके परिवार से सीधा नाता रखने का दावा करने वाले मध्यवित परिवार थे जिनमें से इमाम अपनी अभारतीय पैतृकता का दावा कर सकते थे। इन मुसलमानों में कुछ छोटी हैसियत के रिक्‍शा चलाने वाले या हेल्ला कहे जाने वाले मुसलमान हिन्दू डोमों और मुसलमान भंगियों को जो युद्धबन्‍दी राजपूतों को अमानवीय यातना और अभाव में रख्‍ा कर और गम गलत करने के लिए सस्‍ते नशे का आदी बना कर जघन्‍य कार्यो के लिए विवश किए गए थे ।

”उस समय की गोरखपुर कमिश्‍नरी में अकेले आजमगढ़ था जहां कुछ मुसलमान जमींदार थे अन्यथा बलिया, देवरिया, पुराने गोरखपुर के बंटने से बने चार जिलों में से किसी में जमींदार मुसलमान न थे । आजमगढ़ में मऊ जो अब अलग जिला है, और बस्ती में खलीलाबाद जुलाहों की बस्तियां थी जिनमें कुछ सूत और बुने कपड़े के व्यापार में लगे होने के कारण काफी समृद्ध थे। यह था वह परिदृश्‍य और इनसे प्राप्त थी वह आधार सामग्री या आंकड़ा जिसमें मुझे हिन्दुओं के इस्लामीकरण की प्रक्रिया को नए सिर से समझना पड़ा।”

वह सुनता रहा हुआ मुस्कराता रहा, जैसे इससे उसका मनोविनोद हो रहा हो !
‘‘इसकी बहुत सारी स्थापनाएं मैं पहले भी एक पोस्ट में दे आया हूं फिर भी यहां इसे दुहराना जरूरी समझता हूं! इस प्रक्रिया को समझने में हमे सबसे अधिक मदद मध्यकाल के विद्रोही कवि तुलसीदास से मिलती है जो दो अन्य विद्रोही स्वरों के तीखे विरोध में खड़े दिखाई देते हैं।’’

मैं आगे कुछ कहता कि उसने ठहाका लगाया, ‘‘तुलसीदास और विद्रोही ! जपमाला छापा तिलक, तीर्थ, व्रत, सबका समर्थन करने वाला, वर्णव्यवस्था का समर्थन करने वाला पुरातनपन्थी तुम्हें विद्रोही दिखाई देता है तो आंख के किसी डाक्टर की सलाह क्यों नहीं लेते?’’

मैं विचलित नहीं हुआ, ‘‘तुम्हारे रहते उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं यह भी नहीं कहूंगा कि तुम अपने दिमाग को सही रखने के लिए सुबह शाम शीर्षासन किया करो । मैं तुम्हें अपनी ही एक पुरानी पोस्ट की याद दिलाऊं जिसमें ईसाइयत पर विचार करते हुए दकियानूसी ईसाइयों की भूमिका को प्रगतिशील और पोपतन्त्र के कारिंदा कैथोलिकों को प्रतिक्रियावादी बताया था और यह याद दिलाया था कि दास प्रथा का विरोध हो या लातिन अमेरिका में सैनिक तानाशाही का विरोध इन दकियानूस ईसाइयों की भूमिका प्रगतिशील और किंचित क्रान्तिकारी रही है। उस समय मुझे यह ध्‍यान भी नहीं था कि कभी इस तर्क का उपयोग मुझे तुलसी के लिए भी करना पड़ेगा।’’

‘‘बात किसी तन्त्र से जुड़े प्रचारकों की नहीं एक नई सोच से जुड़े और खतरा उठाने वाले आन्दोलनकारियों की है। ‘तुमने जाग मछन्दर गोरख आया’ यह पद कभी सुना है?’’

क्या जवाब देता ऐसे सवाल का? हंसने लगा, और हंसते हुए ही कहा, ‘‘सुना है भाई, सुना है !’’

‘‘इसका अर्थ भी जानते हो ? नहीं जानते होगे, यह मैं कहता हूं! तुम्हारी सोच के दायरे में यह बात आ ही नहीं सकती। मैं बताता हूं इसका अर्थ! बौद्ध मत तंत्र का हिस्सा बन कर पंचमकार तक सिमट गया था। मत्येन्द्रनाथ, उसी के प्रतीक हैं। यह गोरखनाथ है जो उसे वर्णव्यवस्था और कर्मकांड के विरुद्ध नये सिद्ध आन्दोलन में बदलते हैं। जाग मछन्दर गोरख आया इसी का सूत्र रूप है! और कबीर के बारे में तो कुछ कहना नहीं। तुलसी गोरखपन्थ का भी विरोध करते हैं, कबीर पन्थ का भी विरोध करते हैं, और सच कहो तो रैदास की वर्ण व्‍यवस्‍था की आलोचना का भी विरोध करते हैं। नितान्त प्रतिक्रियावादी है यह कवि, प्रतिभा का जवाब नहीं, पर बाभन का बाभन रहा, दूजा भया न कुच्छ ! यह मोटी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती। लोग यह जान कर कि तुमसे मेरी दोस्ती है, लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे यह सोचता हूं तो शर्म से डूब मरने का जी होता है !’’

‘‘तुम्हारे मन में जिन्दगी में पहली बार एक सही विचार पैदा हुआ । डूब मरने का। देर नहीं हुई है, मुहावरे में डूबने के लिए चुल्लूभर पानी ही जरूरी होता है, उसका प्रबन्ध मैं कर सकता हूं, पर मेरे भी तो मित्र हैं, वे मेरे बारे में इसी तर्क से क्या सोचते होंगे, यह भी तो सोचा होता ।

”तुलसी सामाजिक क्षरण और गिरावट के उस दौर का वह क्रान्तदर्शी कवि है जो पूरे मध्ययुग में अपने समय के प्रमुख द्वन्द्व को देखता, उसे समझता और उसका ऐसा निदान निकालता है जिसे अपने को क्रान्तिवीर समझने वाले कबीरपन्थी, नाथपंथी तो समझ ही नहीं सकते थे, इतनी शताब्दियों के बाद तुम लोग भी नहीं समझ सके।’’

उसने कोई उत्तर नहीं दिया, ऐसी मुस्कराहट बिखेरता रहा जिसमें व्यंग्य भी था और परेशानी भी थी, कुछ घबराहट भी ! यह मेरे स्वर की दृढ़ता के कारण रहा होगा, तर्क तो मैंने दिया ही नहीं था।

‘‘मैं तुम्हें मार्क्‍सवादी मीमांसा के सहारे समझाता हूं। प्रत्येक युग का एक प्रधान अन्तर्विरोध होता है, मेन कांट्रैडिक्‍शन, उसे जो समझ पाता है वह युगद्रष्टा होता है, बाकी तो छोटे मोटे उत्तेजक सवाल होते हैं। जो इनमें उलझ गया वह अपने युग की समस्याओं का सामना नहीं कर सकता।’’

‘‘तुम समझते हो वर्णभेद, धर्मभेद से उत्पन्न सामाजिक विभेद मध्यकाल की मुख्य समस्या नहीं थी और जपमालाछापातिलक संकट मे पड़ गया है, इसकी रक्षा करना सबसे जरूरी कार्यभार है, यह सही समझ थी ?’’

‘‘तुम ठीक समझते हो। तुलसी अकेले ऐसे क्रान्तदर्शी चिन्तक थे जो समझते थे कि असंख्य समस्याओं के बीच सबसे विकट समस्या क्या है और उससे निपटने का क्या उपाय है। वर्णव्यवस्था एक बहुत पेचीदा समस्या थी, लंबी लड़ाई पहले से चल रही थी। तुलसी समझते थे कि आज की प्रधान समस्या हिन्दुत्व की सीमारेखाओं की सुरक्षा की है अन्‍यथा पूरे देश का इस्‍लामीकरण हो जाएगा और उसी तरह की अमानवीयता और स्‍वच्‍छन्‍दता और इकहरी समझ विवेक पर हावी हाे जाएगी जो इस्‍लाम की पहचान बन चुकी है।”

”समझा नहीं तुम्‍हारी पहेली को ।”

”गौण समस्याओं को केन्द्रीय समस्या बना देने का परिणाम होगा पूरे देश का हिन्दुत्व से उच्चाटन, विचलन और देर या सवेर या तो इस्लामीकरण अथवा इस्लामी मूल्यों को अपनाते हुए सबका भिन्न नामों से इस्लाम का अनुसरण। उनका अनुमान गलत नहीं था, योगियों के साथ तो यही हुआ, कबीरपन्थियों में भी अधिकांश इस्लाम में दाखिल हो गए और उन्हें पता भी नहीं चला।’’

‘‘हो गई बात पूरी या कुछ और कहना है ?’’

‘‘पूरी कैसे होगी यार, मैं बताने तो यह चला था कि इस्‍लाम कबूल करने वाले विभिन्न समुदायों के इस्लामीकरण की प्रक्रिया क्या है और बहक गया एक ऐसे टेढ़े सवाल की ओर जिसके निहितार्थ को ग्रहण करने के लिए बुद्धि की जो परिपक्वता होनी चाहिए वह तुममे है ही नहीं।’’

उसने महफिल बर्खाश्‍त वाले स्वर में कहा, ‘‘जब तक ऐसी समझ नहीं पैदा हुई है तभी तक बचा हूं, नहीं तो तुम मुझे भी ले कर डूब मरोगे!

Post – 2017-01-14

हिन्दुत्व के प्रति घृणा – 11

‘‘अजीब बात करते हो यार । पहले यह तो बताते कि यदि घृणा का यह कारोबार चार पांच हजार साल से या जैसा तुम कहते हो, उससे भी पहले से चला आ रहा है तो इस्लाम को अलग निशाना क्‍यों बनाया । हिन्‍दू हैं ही इसके काबिल । तुम तो
हिन्दुओं के प्रति मुसलमानों की घृणा को या मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं की घृणा का राजनीतिक उपयोग करना चाहते हो।’ सोचा संक्रान्ति की शुभकामना देने आया होगा और घर में घुसते और आसन ग्रहण करने से पहले ही उसने हमला कर दिया। जब तक बात दूसरे जनों तक थी वह पढ़ कर चुप रहा पर अब तो बात इस्लाम पर आ गई ! हद है, उसे यह दिन भी देखना था!

मैं हंसने लगा, ‘‘पहले आराम से बैठो तो सही । ठंढ इतनी अधिक है कि यह भी नहीं कह सकता कि ठंढा पानी पीकर अपना दिमाग ठंढा कर लो, चाय का पानी गर्म होने तक अपना दिमाग सन्तुलित करो फिर गर्मजोशी से बातें होगी! तब तक रेवड़ियां खाओ!’’

‘‘अपनी बात मनवाने के लिए रिश्‍वत दे रहे हो’’, उसने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं तो पहले ही इसके लिए तैयार हो कर आया था!’’

और कुछ देर बाद चाय की चुस्की के साथ पहल मैंने ही की, ‘‘यदि हम समझना चाहे कि हिन्दुओं के प्रति विदेशियों में पांच हजार साल पहले से चली आ रही घृणा और इस्लामी जुनून में हिन्दुओं के प्रति घृणा में क्या अन्तर है, तो कहना होगा, पहले घृणा करने वाले अपने पिछड़ेपन के बोध से क्षुब्ध थे। उनके पास सांस्कृतिक स्तर पर देने को कुछ नहीं था, भौतिक स्तर पर उनके संसाधनों का दोहन हो रहा था और उसमें उनकी सहायता या सेवा के बदले में कुछ लाभ हो रहा था, परन्तु देने को वह भी नहीं था। अपनी विवशता का यह बोध भी उन्हें क्षुब्ध करता था।

”वैदिक या भारतीय मूल्यों को अपनाना चाहने के बाद भी उनकी समकक्षता में न आ पाने की ग्लानि के कारण हीनता से बचने के लिए अपने दुर्गुणों को भी एक गुण बना कर उनमें उसके अभाव को रेखांकित करते हुए अपने को उनसे ऊंचा सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहे। अरस्तू ने ज्ञान और कौशल के क्षेत्र में एशियाइयों की श्रेष्ठता स्वीकार करते हुए जिस स्पिरिट की कमी को रेखांकित किया था और उसे यूरोप के लोगों की विशेषता बताया उसके लिए सही शब्द दबंगई या हेकड़ी है जो अनपढ़ों, गंवारों के भीतर शि‍क्षितों और संभ्रान्त जनों के प्रति पाई जाती है और जिसके लिए उत्तर भारत में जाट, अहीर, ठाकुर और भूमिहार बदनाम रहे है। शिक्षा, ज्ञान और संस्कारों के साथ इसमें कमी आ जाती है परन्तु जातीय दुर्गुणों पर गर्व करने वालों को इस पर काबू पाने में लंबा समय लगता है! कई बार तो इसमें शताब्दियां और सहस्राब्दियां लग जाती हैं फिर भी यह दूर नहीं होता क्योंकि यह अपनी विशिष्ट पहचान का हिस्सा बन चुका होता है।यह अपने आत्मबल को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है।

सच कहें तो पश्चिम की वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक अग्रता के समक्ष अपने दैन्य से क्षुब्ध हो कर अपनी अस्मिता को बचाने के लिए अध्यात्म की महिमा और आध्यात्मिकता को भारत की विषिष्ट उपलब्धि और भौतिकता से त्रस्त मानवता के उद्धार के एक मात्र विकल्प के रूप में इसे ही प्रस्तुत करते हुए हम स्वयं भी यही करते आए है। एक ओर पिछड़े रह जाने की पीड़ा से उत्पन्न हीनता, दूसरी ओर उनकी समकक्षता में आने की बेतहाशा कोशिश और तीसरी ओर किसी भी शर्त पर अपने अस्तित्व की रक्षा करने का प्रयत्न।

तात्विक दृष्टि से गलत होते हुए भी यह एक अनुशंसनीय काम है । इसमें अपने रक्षणीय को बचाने और इसके साथ ही पूरी छानबीन से दूसरों के अनुकरणीय और ग्राह्य तत्वों के ग्रहण से हम विकास के नाम पर वैविध्य को समाप्त करते हुए अपने को अधिकाधिक अरक्षणीय बनाने से बचे रहते हैं।’’

विस्तार से उसे डर लगता है। वह हां या ना में जवाब सुनने और देने का आदी है। समझने से भी डर इसलिए लगता है कि इसमें फंसने पर अपनी मान्यताओं या प्रतिश्रुतियों से विचलित होने की संभावना बनी रहती है। उसे हस्तक्षेप करना ही था, ‘‘अजीब गावदी हो, अनुकरणीय और ग्राह्य तत्वों का निषेध करते हुए जहालत में पड़े रहने को तुम एक दुर्लभ गुण और अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी शर्त मानते हो? तुम्हारी इसी तरह की बेवकूफियों की तलब ने तो मुझे खींच कर यहां पहुंचा दिया वर्ना यहां आना और नरक में पहुंचना दोनो बराबर।’’

‘‘नरक का रास्ता आसान होता है! उसके लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता ! पतन के लिए आयास नहीं करना होता, नरक के लिए साधना नहीं करनी होती सारे काम गुरुत्वाकर्षण कर देता है। केवल स्वर्ग में पहुंचना कठिन होता है, जैसे मेरे पास तक! पहुंचने के दोनों रास्तों में भीड़ इतनी कि कुछ रास्ते में ही दम तोड़ बैठते है और बाकी को यहां के दरवान घुसने नहीं देते ! असमायी वै स्वर्गो लोकः ! स्वर्ग में प्रवेश आसान नहीं ! तुम्हारा भाग्य है कि मेरे नाम के स्मरण से इसमें पहुंच गए!’’

कुछ बोलने की जगह वह ताली बजाने लगा!

मैं कुछ गंभीर हो गया, क्योंकि इस परिहास में विषय ही लुप्त हुआ जा रहा था, ‘‘देखो, यदि तुम समझते हो कि सर्वश्रेष्ठ जैसा कुछ होता है और उसे पाने के लिए हमें अपनी निजी विशेषताओं को छोड़ कर उसे ही ग्रहण कर लेना चाहिए और अपने को भूल जाना चाहिए, तो यह एक भ्रम है! सामान्यता की कसौटी पर सही उतरने वाला आदमी सबसे दयनीय मिलेगा, सबसे अधिक तनाव में। चलने के लिए रास्ते होते हैं, सर्वोपरि को तलवार की धार पर चलना होता है! इसलिए सर्वश्रेष्ठ का अनुकरण भी सांस्कृतिक आत्महत्या है! इससे जो इकहरापन पैदा होता है, वह लुढ़कता है तो फिर उठ नहीं पाता।

‘‘इसी तरह अपनी निजता की रक्षा के तकाजे से अपने दुर्गुणों तक को बचाने का समर्थन नहीं किया जा सकता । परन्तु एक बात तो यह कि गुण और दुर्गुण भी सापेक्ष्य होते हैं। एक परिस्थिति में जो दुर्गुण है वही दूसरे में गुण बन जाता है। वैविघ्य का बना रहना अधिक महत्वपूर्ण है।’’

उसे लगा मैं इस बहाने समग्रतवाद का विरोध कर रहा हूं, ‘‘हम इसी को बुद्धिजीवियों का ढुलमुलपन कहते हैं। वे मानवता के सबसे बड़े दुश्‍मनन है ! अपनी अपनी ढफली, अपना अपना राग! सर्वश्रेष्ठ खतरनाक है इसलिए निकृष्टता को जारी रखो। विविधता को बचाना कि कहीं एकरूपता न आ जाए। सभी समान न बन जाएं। यू पीपुल!’’ गुस्‍स्‍ेा में वह अंग्रेजी बोलने लगता है ।

मैं आवेष मे नहीं आया, ‘‘विविधता के दोष भी हैं गुण भी हैं। गुण अधिक हैं! हमने सर्वश्रेष्ठ की चिन्ता और सबको वैसा बनाने के उन्माद में उससे अधिक सत्यानाश किया जितना विविधता में संभव था। अपने से भिन्न को मिटा कर, या मिटाने के प्रयत्न में हम यह तक नहीं समझ पाते कि हम हैं क्या और हैं कहां। विविधता हमारे स्वभाव में ही है, प्रकृति में है, एकरूपता तो आद्य रूपों में पाया जाता है, परम तत्व में, एककोशीय जीवों में, अमीबा में, तुम्हारे जैसे मूर्खों में। विकास के साथ एकोऽहं बहुस्याम की प्रक्रिया काम करती है! बहु स्याम बहुधा स्याम की प्रक्रिया काम करती है। इसे एकरूपतावादी या एकपिंडीय सोच के लोग समझ नहीं पाते। एक आदर्श व्यवस्था में विविधता का लोप नहीं हो सकता, विविधता का समायोजन ऐसा होना चाहिए कि सभी अपनी उच्चतम संभावना तक पहुंच सकें।

‘‘एकान्विति मे, चाहे वह सर्वोत्तम के रूप में पेश की जाय, समग्र ऊर्जा एकदिश हो जाती है इसलिए वह बहुत शक्तिशा ली प्रतीत होता है, पर होता सबसे कमजोर है। एकचक्रा न वर्तते। एक पहिया चल नहीं पाता, संतुलन के लिए दूसरा पहिया तो होना ही चाहिए।

”सर्वोत्तम की तलाश ने ही तानाशाही, समग्रतावाद, फासिज्म, स्वच्छन्दता, निरंकुशता का रूप लिया और इसी कारण कुछ समय के लिए सबसे शक्तिशाली व्यवस्थाएं प्रतीत होती हैं, परन्तु ये अपने पहले नायक को लिए दिए उसके साथ ही अनगिन तबाहियां पैदा करके समाप्त हो जाती है। निर्णय के वैविध्य और शक्ति के इसी विकेन्द्रण के कारण लोकतन्त्र अपनी असंख्य कमियों के बाद भी बहुत सारे सदमे झेल लेता है!’’

‘‘सहस्रपाद गोजर की तरह !’’ उसने कटाक्ष किया !

मैंने उसकी ओर ध्या नही न दिया, ‘‘कुछ मतो और विश्‍वासों में अपने को सर्वश्रेष्ठ मान कर शेष को या तो अपने जैसा बनाने या उनको मिटाने का जुनून है । जब यह ईसाइयत में दिखाई देता है तो हम देख नहीं पाते। कहते हैं, अच्छा बनने में बुराई क्या है। यही जब इस्लाम में बुराई को भी अच्छाई बताने के क्रम मे सामने आता है तो यह दलील सुनने मे आती है कि इतने सामाजिक स्तरों को देखते हुए इसे अपनाने में क्या बुराई है। परन्तु इसी को जब हिटलर व्यावहारिक रूप देता है तो हम उसकी भर्त्‍सना तो करते हैं परन्तु इस श्रेष्ठतावाद की पूजा के परिणामों को नहीं समझ पाते!

‘‘हम, तुम्हारी मूर्खता से उस सवाल से ही हट गए जिसे तुमने इतने विश्‍वास से उठाया था। यह कि पुरातन, विदेशी जनों के भारत के प्रति आकर्षण और हिन्दुओं से घृणा और इस्लाम के बाद उन हिन्दुओं से मुसलमानों की घृणा का अन्तर क्या है।

”मैंने कहा पहला हिन्दुओं जैसा बनने, फिर भी न बन पाने के कारण उपजी हीनभावना की क्षतिपूर्ति वाली घृणा थी। वह केवल हिन्दुओं से थी।

” इस्लाम की घृणा के दो चरण हैं, पहले चरण में यह हिन्दुओं के विरुद्ध नहीं, सभी गैरमुसलमानों के प्रति है ! इसमें उन जैसा बनने की लालसा और उसमें विफलताजन्य हीनतबोध नहीं है, अपितु दूसरों को, और इसलिए हिन्दुओं को भी अपने से गिरा हुआ समझ कर उनको मिटाने या अपने जैसा बनाने की जिद है। इसके लिए वे क्रूरतम कृत्य करते हुए न ग्लानि अनुभव कर सकते थे, न क्षोभ क्योंकि जो मुसलमान नहीं है वह इंसान है ही नहीं । दूसरे इसमें जानने की लालसा नहीं, जो जानने को है वह जाना जा चुका है! भक्त के लिए भगवान को जान लिया फिर जानने को कुछ बचता ही नहीं। बाकी सारा ज्ञान तो माया या भ्रम है जिसे मिटा दें तो भगवद् भजन अबाध हो! इस्लाम भक्ति संप्रदाय का जघन्यतम रूप है क्योंकि भक्ति में जो अभक्त है उसका परिहार करने से ही काम चल जाता है, इस्लाम इसे संहार का रूप दे देता है। फिर भी हीनताजनिक घृणा इसके मूल में नहीं है।

‘‘इसकी घृणा उस हीनता से पैदा होती है जो अपने अमानवीय अत्याचारों के बाद भी उस अभिमान को तोड़ने में विफल रहता है जिसके कारण अत्याचार सहने वाले उसे अत्याचार के कारण उससे अधिक घृणा करते मिलते हैं जितना उसने इनके प्रति अपने मन में पाल रखा है।

”दूसरे किसी देश में पूरे देश को मुसलमान बनाने में सौ दो सौ साल से अधिक का समय नहीं लगा था पर एक हजार साल तक के प्रयत्न के बाद भी इसे दस बारह प्रतिशत से अधिक हिन्दुओं को मुसलमान बनाने में सफलता नहीं मिली । इस विरोध के पीछे उन्हें ब्राह्मणों के प्रभाव और उनकी शैतानी शिक्षा का हाथ दिखाई देता था। यह घृणा ब्राह़मणों और पारसियों के प्रति थी जो मरने को तैयार थे, परन्तु धर्म बदलने को तैयार नहीं!

इतने बल प्रयोग के बाद भी इस्लाम स्वीकार कराने में विफलता ने एक खीझ या दबे हुए हीनता भाव को जन्म दिया हो सकता है जिसने गैरमुस्लिमों के प्रति क्रोध को हिन्दुओं के प्रति घृणा में बदला हो सकता है, परन्तु यह मिटाने और बदलने की दिशा में अधिक प्रवृत्त था, हिन्दुओं के लिए गालियां जिस हीन भावना से हिन्दुओं की समकक्षता में आने में विफल विदेशी देते रहे वह इस्लाम में न मिलेगा। यहां तक कि काफिर जैसा तिरस्कारपूर्ण शब्द भी अपनी विषाक्तता खो बैठा !’’

‘‘सरदर्द की गोली होगी कोई ?’’

मैं जानता था वह क्या कह रहा था ! चुप लगा गया!

Post – 2017-01-14

उस सैनिक कीशिकायत में कुछ अतिरंजना हो सकती है, कुछ स्‍थानीय समस्‍या भी हो सकती है, परन्‍तु सेना में अनुशासन हो यह जरूरी है अौर सैनिकों का आत्‍मसम्‍मान बना रहे यह भी जरूरी है। सेना में बहुत कुछ है, जिसको अनुशासन के नाम पर होने दिया जाता है जो दूर होनी चाहिए। मोदी को इस बात का श्रेय है विविध प्रकार की पीड़ाएं भोग रहे लोगों की अपेक्षाएं पहली बार जाग रही हैं और उनकी ओर पहली बार ध्‍यान दिया जा रहा है । उस सिपाही के साहस को जिसने अपने खाने को लेकर शिकायत सामाजिक माध्‍यम से की दुस्‍साहस कहना होगा। यदि सामाजिक माध्‍यम से उसे प्रधानमंत्री तक ही अपनी शिकायत पहुंचानी थी तो उसे पहले प्रधानमंत्री को लिखना चाहिए था जिनको असाध्‍य बीमारी से ग्रस्‍त साधनहीन, शिक्षा, विवाह, विदेश में फंंसे स्‍वजनों, विदेश यात्रा में बाधक तत्‍वो
जैसे अनगिनत कष्‍ट झेलने वाले लोगों ने यहां तक कि अपने गांव के भोड़े नाम को बदलनवाने जैसे विचित्र समस्‍याओं से पीडि़तों ने अपना दुख पहुंचाया है और उनकी पीड़ा का निवारण करने का बिना किसी भेदभाव के प्रयत्‍न हुए हैं जिसके प्रमाण हैं। फिर भी इस दुस्‍साहस के परिणाम स्‍वरूप सैनिकों की अपनी शिकायतों और सुझावों के लिए पहली बार प्रबंध और इसकी उच्‍चतम स्‍तर तक पहुंच का कुछ श्रेय उसे भी जाता है।
आकांक्षाओं का इतना सैलाब, जिनका समाधान जिस साधन संपन्‍नता की अपेक्षा रखता है वह तो जादू से नहीं हो सकता परन्‍तु उनको पूरा करने की कोशिश से ही ये जागती भी हैं। आज से पहले इसका नमूना नही देखा गया। दलित घरों में खाना खा कर फोटो खिचवाने वाले और उन्‍हें उनके भाग्‍य पर छोड़ आने वाले अवश्‍य दिखाई दिये । मोदी की असाधारण लोकप्रियता, और उनसे पहली बार न्‍याय पाने के विश्‍वास को तराजू मान कर ही यह समझा जा सकता है कि मुद्रा संकट को जतना ने तमाम उकसावों के बाद, नकारात्‍मक टिप्‍पणियों के बाद लगातार बिना किसी उकसावे के कैसे झेला। उकसावे में आए अन्‍त में तो रिजर्वबैंक के वे लोग जिनकी मिली भगत से नयी मुद्रा चुपचाल करोड़ों करोड़ गलत हाथों में पहुंच गयी थी और मुद्रा संकट को अधिक गहरा बनाने का प्रयास किया गया था। कल को दूसरे बैंकों की यूनियनें भी आ सकती है और पर वे जनता के दुख से नहीं अपनी संलिप्‍तता के कारण आएंगी ऐसा मेरा अनुमान है । मोदी सरकार ही इतना साहसिक कदम उठा सकती थी और वही जनसमर्थन के बल पर इसे उस किनारे की ओर लगा सकती थी कि कष्‍ट आज भी समाप्‍त नहीं, पर लोगों को राहत अनुभव होने लगी है। लोगों के दुख देखने वालों ने अपनी खेती की, दुख से उबरने का नुस्‍खा नहीं दिया। इससे भी चिंन्तित और विकल मोदी ही थे यह समझने के लिए उनकी इसी साल के अक्‍तूबर और नवंवर के पहले पखवार के चित्र की तुलना उनके आज के चेहरे मे आए बदलाव से की और समझी जा सकती है।

Post – 2017-01-13

मैं ऐसे सभी लोगों के साथ हूं जो खादी ग्राामोद्योग के कैंलंंडर पर गांधी जी के चित्र के स्‍थान पर चर्खा चलाते नरेन्‍द्र मोदी के चित्र की भर्त्‍सना करते हैं। परसनैलिटी कल्‍ट का रोग मोदी में है यह उनके वेश वेशान्‍तर में लक्ष्‍य किया जा सकता था और जिसका उपहास भी किया गया पर जिसे मैं अभाव में पले व्‍यक्ति की इच्‍छापूर्ति मानता रहा हूं । अब वहीं दमित लालसा उन्‍हें गांधी का अनुगामी नहीं, मायावती और मुलायम का अनुगामी सिद्ध करने जा रही है। मैं आज भी उनका वकील हूं और इस नाते समय रहते इस भंवर से उबरने की सलाह देता हूं । उन्‍हें स्‍वयं जिस किसी ने ऐसा किया हो उसकी निन्‍दाकरनी चाहिए, एेेसी दुर्लालसाएं जगाने वाले चापलूसों से सावधान रहना चाहिए अन्‍यथा यह वह जमकातर है जिसमें लोग हाथी सहित डूब जाते हैं और जीते जी बुत बन जाते हैं ।

Post – 2017-01-12

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 10

हिन्दुओं के मन में यदि इतर समाजों और देशों के लोगों से परहेज सा था तो इसका एक कारण शुचिता, आचार, खानपान आदि के विषय में उनका इनके मानकों पर खरा न उतरना और जीवनमूल्यों में उनका भिन्न होना। हिंसा, अस्तेय, दंभ और छलछद्म को गर्व का विषय मानने वाले समाजों को वे ओछी नजर से देखते थे । इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। इसके ब्‍यौरे में हम न जाएंगे।

उनके आदर्श को मानवीय गरिमा की पराकाष्ठा माना जा सकता है परन्तु इन मूल्यों का निर्वाह प्रकृति की कृपणता के कारण सभी क्षेत्रों के लोग नहीं कर सकते थे! इनके संपर्क में आने वाले अपनी जीवनशैली भले इतर कारणों से न बदल सकें, परन्तु वे अपने तई इसके कायल भी होते थे और इनका अनुकरण भी करते थे। ऐसा जिस सीमा तक कर पाते थे समाज में वे स्वयं अनुकरणीय बन जाते थे और इसी प्रक्रिया से वैदिक भाषा, संस्कृति, दर्शन, कौश्‍ाल , कुछ दूर तक रीति-रिवाज, वेषभूषा, सज्जा का भी अनुकरण और प्रसार हुआ था!

मैकाय ने फर्दर एक्सकेवेशन्स के दूसरे खंड में एक लम्बी तालिका, ठीक याद नहीं पर संभवतः तीस चालीस पन्नों का, उन गोचर हड़प्पन तत्वों का यूनान से ले कर मध्येशिया तक, ठीक उस क्षेत्र में हड़प्‍पा सभ्‍यता के घटकों का प्रसार दिखाया है जिसमें भारतीय आर्यभषा का प्रसार हुआ था। यदि किसी बात का ध्यान उन्हें नहीं रहा तो वह है इसे भारतीय आर्य भाषा के क्षेत्र तक विस्तृत और उसी तक सीमित कहने का जो उनके बाद किसी भारतीय पुरातत्वविद ने भी नहीं कहा!

यह दुस्साहस मुझे करना पड़ा और इसी के आधार पर दि वेदिक हड़प्पन्स में यह दावा करने का साहस हुआ कि The Vedic Culture was co-extensive and co-terminus with the Harappan civilization । इस तथ्य का उल्लेख इसलिए जरूरी है कि एक ओर वैदिक सभ्यता के अग्रदूतों से दूसरे लोग कुछ दबते हुए, यह भी अनुभव करते थे कि वे हमसे आगे बढ़े हुए हैं, हमें उनसे सीखना, उनके अनुसार बनना और वैसा होने क प्रयत्न करना चाहिए, वहीं अपने प्रति उनके वर्चस्वी रवैये के कारण उनसे दबी चिढ़ और घृणा भी अनुभव करते थेा यह हिन्दुओं के लिए उनकी भाषा में गालियों, भर्त्‍सनाओं के रूप में प्रकट हुई जो ईमान से ले कर चरित्र और कभी कदा अक्ल तक पर आक्षेप का रूप लेती है! ये गालियां भी उनकी अपनी संस्कृति की ही उपज थीं और जैसा कि हम पहले कहते रहे हैं गालियां जिसे दी जा रही है उनके चरित्र को नहीं, गालीदेने वाले के चरित्र को ही उजागर करती हैं, ये भी उनके समाज में व्‍याप्‍त विकृतियों को ही व्‍यक्‍त करती थ्‍ाीं ।

इसलिए निंदा नहीं, अनुकरण ही किसी के मूल्यांकन का आधार हो सकता है। सफल होने वाले अपने परिवार तक में दूसरों को अपनी तुलना में जो लोग हेय बना देते हैं, उनसे उस परिवार के असफल व्यक्ति अपना संबन्ध जोड़ कर अपनी छवि भी सुधारते हैं, हीनता भी अनुभव करते हैं, और उस घृणा को भी दबाने के प्रयत्न में रहते हैं जो उनकी तुलना में अपनी हीनता से उनके मन में पैदा होती है।

यह एक नैसर्गिक प्रक्रिया है ! महत्वपूर्ण बात यह कि उन्होंने इसके बाद भी उनके जैसा बनने का प्रयत्न किया और जितना बन पाए उसी को अपना सर्वोत्कृष्ट मान कर उस पर गर्व करते रहे । ईरानी हों, स्लाव और लिथुआनी हों, या लघु एशियाई हों या उससे आगे ग्रीक, रोमन, जर्मन, केल्ट हों, उन्हें तुलना के लिए भी वैदिक भाषा और संस्कृति ही मिले थे, गर्व भी उनसे प्राप्त तत्वों पर ही था जो उनकी ग्रहण क्षमता के अनुसार यूरोप में अलग अलग थे, परन्तु सभी का जुड़ाव संस्कृत और वैदिक समाज से ही था, जाहिर है ईर्ष्‍या और घृणा के लिए भी ये ही मिले थे!

पश्चिमोत्तर से होने वाले आक्रमण भारतीय सभ्यता के लिए हड़प्पा काल से ही या सच कहें तो उससे बहुत पहले से चिन्ता का विषय रहे हैं और उनकी क्रूरता की कहानियां सदा से लोगों के मन में दहशत पैदा करती रही हैं! इसके जिस इतिहास को मैं उजागर करना चाहता हूं उसको समझाना चाहूं भी तो नहीं समझा सकता क्योंकि ग्रहणशीलता का भी एक अपेक्षित ज्ञान-स्तर होता है। उस काल पर पहुंचने पर आक्रमण घर वापसी के आन्तरिक दबाव का रूप ले लेते हैं और फिर वे अपनी संपदा का दोहन करके मालामाल होने वालों से अपनी ही अपहृत संपदा को हासिल करने का अभियान बन जाते हैं और यह समझ इतिहास की व्याख्या को एक ऐसा रूप देती है जिसके लिए केवल भारत के इतिहासकार ही नहीं पूरी दुनिया के इतिहासवेत्ताओं में कोई तैयार न होगा, क्योंकि विश्‍व इतिहास की जो समझ पैदा की गई है वह खासी उथली है, सभ्यता की परिभाषा तक लंगड़ी है और इसे मैं समय मिला तो बाद में समझाने का प्रयत्न करूंगा।

इस समय तो छोटे मुंह बड़ी बात प्रतीत होने वाली इस कथा को विराम देते हुए इतना ही निवेदन करें कि वैदिक कालीन त्रसदस्यु से ले कर शकारि (कहना चाहें तो शक्रारि कह लें), विक्रमादित्य ने जिसे इतिहासकारों ने मिथक करार दे दिया था और जिसकी स्वर्णमुद्रा की खोज के बाद वह मिथक से इतिहास में प्रवेश कर गया, उसके समय तक जिस किसी ने ऐसे आक्रमणों को निरस्त किया, वही उसकी गौरवगाथा का कारण बन गया!

इसके बाद भी जिसने भारत पर विजय पा ली वह सांस्कृतिक स्तर पर हार गया यह कहना अविवेकपूर्ण होगा, क्योंकि सांस्कृतिक ग्रहणशीलता पराजय नहीं, एक भिन्न प्रकार की विजय होती है जिसमें भौतिक विजय के बाद आत्मोत्थान का अवसर मिलता है! भले इसके प्रेरक वे हों जिन पर तुमने असंख्य अत्याचार करते हुए विजय पाई। यह उनके आत्मविस्तार और आक्रान्ताओं के आत्मोत्थान की एक ऐसी जटिल गाथा है कि इसकी कड़ियां सुलझाने चलें तो हो सकता है हमें अपने अभी प्रकट किए गए विचारों में भी संशोधन करना पड़े, क्योंकि विजय के बाद उन्‍हें शिष्यता और आत्मशुद्धि के चरणों से भी उन्हें गुजरना ही पड़ा था।

परन्तु उन्हीं उपद्रवी या आक्रमणकारी समुदायों के इस्लाम में दीक्षित हो जाने के बाद जो आक्रमण हुए उनमें विजय पाने के बाद भी उनके एकाक्षरी पांडित्य के कारण न कुछ जानने को बचा था, न सीखने को, न अपनी जीवन शैली में बदलाव का विवेक बचा था।

यह एक विचित्र तरह की मुठभेड़ थी । और इसका आरंभ उन्होंने किया जिन्हें असंख्य और कल्पनातीत अत्याचारों का बार बार सामना करने के बाद धर्मान्तरित होना पड़ा था और धर्मान्तरित होने की कुछ पुश्‍तों के बाद ही अपने को सच्चा मुसलमान साबित करने के जोम में दहशत और वहशत को सभ्यता और श्रेष्ठता का मानदंड मान कर यह जिद पालनी पड़ी थी कि जानने लायक जो कुछ है वह हमारे एकाक्षरी ग्रन्थ में है जिसका उनमें से निन्यानबे दशमलव निन्यानबे प्रतिशत ने दर्शन भी न किया होगा, जैसे वेद पुराण का नाम लेने वाले हिन्दुओं में उसी अनुपात में लोग दर्शन तक नहीं कर पाते थे, न कर पाए थे!

परीक्षा से गुजरते हुए अपने को मुस्लिम समुदाय में स्वीकार्य बनाने के लिए इस देश में भी लोगों को हिन्‍दू द्रोह के प्रमाण देने पड़े हैं और इनके कारण जितने गलत काम हुए हैं उतने गलत काम अरब भी भारत में आ कर नहीं कर सकते थे।

इकबाल हों या जिन्ना या कश्‍मीर के धर्मान्तरित हिन्दू, जिनमें से कुछ के नामों के साथ्‍ा आज भी, कुछ बदले रूप में, हिन्दू उपनाम दिखाई देते हैं, सब हिन्दू ही थे। यह मैं किसी की महिमा को कम करने के लिए नहीं कह रहा हूं अपितु सामाजिक मनोविज्ञान की एक समस्या के रूप मे इसे अध्ययन का एक क्षेत्र मान कर चिन्हित कर रहा हूं!

यदि आप राहुल जी की मध्येशिया का इतिहास ही देखें तो पता चल जाएगा कि ईरानियों को इस्लाम का विरोध करने, उससे बचे रहने के लिए कितना लंबा संघर्ष करना पड़ा था, कितना अपमानित होना पड़ा था, परन्तु लाचार कर दिए जाने के बाद उनमें अपने को असली मुसलमान साबित करने की होड़ लग गई! यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी मेरी जानकारी पर भरोसा करने वाला धोखा खाएगा, इसलिए इसे कल तक सोचने के लिए स्थगित रखते हैं।

Post – 2017-01-12

जोगी, सन्‍यासी, साधु, साध्वियां जो संसार को त्‍याग चुके हैं, भले ‘नारि मुई घर संपति नासी, मुड़़ मुड़ाइ भये सन्‍यासी’ वाले तर्क से या वह सांसारिक लोगों से अलग कोना है वहां किसी तरह की रोक टोक नहीं है इस कारण, या गद्दी या मठ के उत्‍तराधिकारी होने के कारण, इन्‍हें दुनिया का ज्ञान नहीं, ये एकान्‍तवासी सभा संसद के योग्‍य भी नहीं, कहें न सभ्‍य कहे जा सकते हैं, न इनसे संयत भाषा और संयत व्‍यवहार की आशा की जानी चाहिए । ये अ’सामाजिक प्रकृृति के एकान्‍तवासी राजनीति में दखल दें यह समाज और देश के हित में नहीं है । जो घर नहीं संभाल सके वे देश काेे क्‍या संभालेंगे । इसलिए मुल्‍लो मौलवियों सहित इन सभी पर राजनीति में भाग लेने से चुनाव आयोग को प्रतिबन्धित कर देना चाहिए ।

Post – 2017-01-11

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास- 9

हमें इस बात का सही अनुमान नहीं है कि देशान्तर में अपने स्वर्ग बसा कर रहने वाले लोगों के सहायक, सेवक, रक्षक कहां और कैसे रहते थे? उनके बीच के संबंध कैसे थे? यदि भिन्न भाषाभाषी भारतीय उनके बीच थे तो उनकी गतिविधियां क्या थीं। उनका स्थानीय जनों से संपर्क का रूप क्या था? एक बात कुछ साफ लगती है कि पांटिक क्षेत्र या अश्‍वक्षेत्र को छोड़ कर अन्यत्र उनकी भाषा का ऐसा प्रभाव नहीं पड़ा जिसे याद किया जाता परन्तु आर्य भाषा का भी ऐसा प्रभाव न पड़ा कि स्थानीय स्तर पर वहां भी भारत के अन्य परिवारों में रखी जाने वाली भाषाओं के स्पष्ट प्रभाव की बात की जाती। इसका एक कारण यह हो सकता है कि दूसरे क्षेत्रों में कोई ऐसी गतिविधि नहीं थी जिसके कारण वैदिक अभिजात वर्ग या श्रेष्ठिवर्ग की सेवा में लगे लोग स्थानीय जनों से सीधे संपर्क में आ पाते, जैसे खनन और खनिज द्रव्यों का प्रसाधन, जब कि अश्‍वक्षेत्र में सैंधव और अन्ध्र जनों को तारपान या जंगली घोड़े को पकड़ने, साधने आदि के क्रम में स्थानीय जनों से सीधा संपर्कं जरूरी था और संभव है इनका स्थानीय आबादी में विलय भी हो गया हो, जिसके कारण उनकी भाषाओं का प्रभाव साफ लक्ष्य किया गया। यह अलग बात है कि मुंडा का प्रभाव जिनता साफ दिखाई देता है उतना द्रविड़ का नहीं जिसके इक्के दुक्के शब्द खींच तान कर उन भाषाओं में आज से पांच हजार साल पहले से तलाशे गए है।

सच कहें तो सिन्ताश्‍ता और आन्द्रोनोवो के या उन अनेक संस्कृतियों के जो अश्‍वक्षेत्र में पाई जाती हैं, भाषाई उपस्तर का अध्ययन नहीं किया गया है और सभी में केवल संस्कृत से साम्य रखने वाले शब्दों पर ध्यान दिया गया। जिस पहलू पर ध्यान दिया गया वह था आर्यों के आगमन के लिए पूर्वकल्पित काल से मेल खाने वाले दौर में कुछ लोगों के उस क्षेत्र से पूर्व की ओर बढ़ने के पुरातात्विक प्रमाण क्योंकि उस काल की भाषा के साक्ष्य थे नहीं, आज उस अंचल की भाषा का इस दृष्टि से अध्ययन और विवेचन करने की जरूरत नहीं अनुभव की गई । यदि ध्यान गया तो दूसरे पहलुओं पर जिनमें एक था अन्त्येष्ठि का तरीका । इसके दो तत्व रोचक हैं, एक यह कि मरने के बाद भी आदमी को वैभव की जरूरत पड़ती है इसलिए अभिजात मृतकों की समाधियों से विपुल संपदा का उद्धार और दूसरा था सहमरण या पति के साथ पत्नी के भी मृत्युबान्धवी होने और दफन किए जाने की प्रथा।

सच पूछें तो जो बता रहा हूं उसका मुझे भी कुछ अधभूला बिसरा ही स्मरण है। हम यह मान सकते हैं कि सुरक्षा की सारी सावधानियों के बाद भी स्थानीय जनों से इन प्रवासियों का संबन्ध उतना तनाव भरा नहीं रहा होगा। इससे आगे स्लाव और बाल्टिक क्षेत्र में आधी पुरानी याद और आधी बाद की जानकारी के आधार पर यह याद बनी रह गई थी कि गंगा के तट से वेदज्ञ लोग आए थे और उन्होंने पहली बार वहां ज्ञान का प्रसार किया था। वहां का समाज मातृप्रधान था इसलिए पौरोहित्य का काम वहां की महिलाओं ने संभाला था।

किन विषेष परिस्थितियों में संस्कृत भाषा से प्रभावित एक समुदाय किन अन्तरालों या पड़ावों से गुजरता हुआ अश्‍वक्षेत्र से ब्रिटेन पहुंचा था जिसकी पहचान अंग्रेजी में केल्टिक तत्वों के रूप में की गई है और जिसके कारण अंग्रेजी के बहुत से शब्द सीधे संस्कृत से जुड़ते हैं, यह पता लगाने का प्रयत्न नहीं किया गया। परन्तु यदि यह प्रस्थान किसी दबाव में हुआ हो तो हम स्थानीय जनों से संबंध और उनकी भारतीयों के प्रति प्रतिक्रिया को इस आधार पर समझ नहीं सकते। अतः इनको हम तब तक के लिए स्थगित रख सकते हैं जब तक स्थिति अधिक स्पष्ट न हो जाय।

हमने इसका उल्लेख इसलिए किया कि इतिहासकारों के बीच मान्य दो भ्रान्तियों का निराकरण कर सकें। पहला यह कि घोड़े के पालन का आरंभ आर्यों ने किया और दूसरा यह कि अरायुक्त पहिये का आविष्कार आर्यों ने किया, ये दोनों मान्यताएं गलत हैं। अश्‍वपालन और प्रशिक्षण के क्षेत्र में पहल आर्यों की नहीं सैन्धव जनों की थी जो बहुत पहले से यह काम करते आए थे और ऋग्वेद में पहिए और रथनिर्माण में दक्ष भृगुगण थे – एतं वां स्तोमं अश्विनौ अकर्म अतक्षाम भृगवो न रथम्। भृगुगण यज्ञ और इन्द्र की श्रेष्‍ठता को नहीं मानते थे, वरुण को सर्वोपरि मानते थे- हता मखं न भृगवः! वैदिक अभिजातवर्ग, जो खेती में नहीं वाणिज्य में आगे बढ़ा हुआ था सबका अपनी योजना के अनुसार उपयोग में ला रहा था और बहु स्तरीय और बहुभाषी तत्वों की अपनी साझेदारी से आगे बढ़े इस समाज में भाषा, विचार, संस्कार सभी पर उसकी छाप थी और सामान्य व्यवहार में उसी क सहारा लिया जाता था।

वैदिक समाज अपने समय को देखते हुए सबसे शक्तिाशाली था, सबसे सभ्य था, सबके लिए अनुकरणीय था, यह विभिन्न भौगोलिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों में देखा जा सकता परन्तु इसने अपनी शक्ति, ज्ञान और कौशल को संयत और अनुशासित और संवेदनशील बना कर रखा था और उसकी यह अग्रता तक, दमन और उत्पीड़न से परहेज तक, बर्बर अवस्थाओं में जीने वालों को आश्‍चर्यजनक लगता था। इस अनुशासन के कारण ही वे पूर्व, जिसका अर्थ उस समय ईरान और भारत था, यद्यपि यह उनके लिए लघु एशिया था जिस पर और जिसके आसपास की आबादी पर इन्होंने अपने आभिजात्य का ऐसा प्रभाव कायम किया था कि वहां की सोच, साहित्य, विचार, धर्म और दर्शन सभी को इन्होंने प्रभावित किया ।
यह आरंभ हुआ उसी अश्‍व व्यापार से जिस पर इनका एकाधिकार था और इस नई पण्यवस्तु के कारण इन्होंने असीरियनो से व्यापार का एकाधिकार छीन लिया था और उनके केन्द्र कानेस (kanes) पर 2000 ईपू में हावी हो गए थे और हजार डेढ़ हजार साल तक अपना वर्चस्व बनाए रहे। कहें यह सांस्‍कृतिक प्रसार भारत से मध्‍येशिया और वहां से अश्‍वव्‍यपार के चलते लघु एशिया और आस पास के क्षेत्र में हुआ लगता है।

इनके वर्चस्व का आधार सैन्यबल नहीं था, न्याय बल था। वहां के दमन और उत्पीड़न के जवाब मे, सहृदयता और सहानुभूति पूर्वक प्रजावत्सलता दिखाते हुए शासन। इस व्यवहार में उन्हे लोकप्रियता दी उसके कारण वे पश्चिम एशिया के सबसे प्रभावशाली अभिजात बने रहे और कुछ क्षेत्रों में राजकाज भी संभाला जिनकी वंशावलियां इतनी बार दुहराई गई हैं कि यह जानते हुए भी कि हमारे मित्रों में कुछ ऐसे भी होंगे जिन्हें उनका पता न होगा, हम उसे छोड़ना उचित समझते हैं।

परन्तु इस प्रजावत्सलता का प्रतिलाभ जनता के सम्मान और उन पर लगाए गए देय भाग को बिना छल कपट के चुकाते रहने को भी निरंकुशता का प्रमाण बनाया जा सकता था और बनाया गया। जिस ओरिएंटल डिस्पाटिज्म की बात हाल में मिल ने उठाई, जिसे उसे पढ़ कर मार्क्‍स ने बिना छान बीन किए मान लिया और जिसे आज भी पश्चिमी विद्वान दुहराते मिल जाएंगे वह उस हीन भावना की उपज थी जिसके समझ वे बर्बर सिद्ध होते थे और अपनी नजर में और दूसरों की नजर में गिरने से बचने के लिए यह आरोप वे पूरब के लोगों, या एशियावासियों पर डाल कर मुक्त होना चाहते थे। ग्रीक दार्शनिकों में से कुछ ने अपनी इसी जुगुप्सा को यह स्वीकार करते हुए व्यक्त किया था कि पूर्व के लोग अधिक ज्ञानी और सूझबूझ वाले हैं, परन्तु उनमें वह ओजस्विता या स्पिरिट नहीं पाई जाती जो यूरोप के लोगों में मिलती थी। ध्यान रहे कि यह टिप्पणी अरस्तू की हैः

Aristotle asserted that oriental despotism was not based on force, but on consent. Hence, fear could not be said to be its motivating force, but rather the servile nature of those enslaved, which would feed upon the power of the despot master. Within ancient Greek society, every Greek man was free and capable of holding office; both able to rule and be ruled. In contrast, among the barbarians, all were slaves by nature. Another difference Aristotle espoused was based on climates. He observed that the peoples of cold countries, especially those of Europe, were full of spirit but deficient in skill and intelligence, and that the peoples of Asia, although endowed with skill and intelligence, were deficient in spirit and hence were subjected to slavery. Possessing both spirit and intelligence, the Greeks were free to govern all other peoples (Politics 7.1327b)

भारतीय सन्दर्भ में राजा के विषय में दो स्पष्ट धारणाएं मिलती हैं ! एक तो यह कि वह राज्य का संचालन प्रजा से वसूले गए कर के बल पर करता है इसलिए वह जनभक्ष है – जनभक्षो न राजा । दूसरे यह कि प्रतापी राजा प्रजा के लिए उसी तरह उत्पीड़क होता है जैसे निदाघ का सूर्य धरती को तप्त कर देता है – तपन्ति शत्रुं स्वर्ण भूमा महासेनासः अमेभिः ऐषाम् । दूसरा यह कि आदर्श राजा प्रजा का वैसा ही हितैषी होता है जैसा कोई मित्र- हितमित्रो न राजा। राजा निरंकुशता के कारण नहीं, सत्य, न्याय और सदाशयता के कारण आदरणीय होता था – ऋतेन य ऋतजातो विवावृधे राजा देव ऋतं बृहत्। बर्बरता की स्थिति से उभरे पश्चिमी जगत में बात बात पर झगड़ा, फसाद उनकी ओजस्विता का प्रमाण प्रतीत हो सकती थी, परन्तु यह एक क्षतिपूर्ति थी जिसकी जड़े हजार साल गहरी थीं जिसमें वे अपनी भाषा, संस्कृति और दर्शन सब कुछ उसी पूर्व से ग्रहण करने को प्रेरित हुए थे जिसके तन्त्र पर यदि काम हुआ भी हो तो वह हमारी जानकारी में नहीं है परन्तु अन्‍यथ उपलब्‍ध प्रमाणों को झुठलाया नहीं जा सकता था! यह याद रहे कि जिस त्राय के राजा प्रियम पर ग्रीकों ने आक्रमण किया था और उस नगर को तबाह किया था उसके पीछे एशियाइयों, कहें पूरबियों के प्रति आक्रोश का स्वर पहचानना कठिन नहीं है। यह भी ध्यान देने की बात है कि महाकवि होमर ग्रीक नहींं एशियाई था और ग्रीक का प्रसार एशिया माइनर में था, उसका विकास भी यहीं हुआ हो सकता है और आगे चल कर उसका विस्तार ग्रीस के कबीलों के बीच हुआ जो बहुत बाद तक कबीलाई संस्करों से मुक्त नहीं हो पाए थे!

Post – 2017-01-11

ज्ञान की सिद्धावस्‍था

(यह आज की पोस्‍ट नहीं है। अक्‍तूबर के एक पोस्‍ट का अंश है। कर्णसिंह चौहान की वाल पर कल विचारधारा के उपयोग और उसे फेंक कर किनारे करने का एक विवाद पढ़ा था और आज अपनी पुस्‍तक के पांचवां खंड की प्रेस कापी बनाने समय इन पंक्तियों से गुजरा तो लगा इस प्रसंग में इसकी याद दिलाना उचित हो सकता है। )

”कम्युनिस्ट होने के साथ ही व्यक्ति उसी सिद्धावस्था में पहुंच जाता है जिसमें अति अनुशासित संगठन पहुंच जातें हैं। जिसमें मजहबी लोग होते और जिसमें उस मजहब को अपनाने वाले, उसे अपनाने के साथ पहुंच जाते हैं।

”एक मजेदार घटना याद आ गई । आज से पचीस साल पहले की बात है। शायर का नाम याद नहीं, शायरी भी कुछ खास नहीं, लेकिन उसकी एक नज्म की टेक थी, ‘बदलेगा जमाना लाख मगर, कुरआन न बदला जाएगा।’ और इस पर श्रोता लहालोट हुए जा रहे थे। लोग जोश में थे और मुझे हंसी आ रही थी। कारण तीन थे। पहले तो उस महाशय को यह पता नहीं था कि कुरआन के भी कई संस्करण मिलते हैं जिनमें कुछ अंतर है इसलिए सभी प्राचीन कृतियों की तरह कुरान में भी कुछ फेेर बदल हुआ है। दूसरे उसे यह नहीं मालूम कि कुरआन ही नहीं, दूसरे ग्रन्थ भी यथातथ्य ही रखे जाते हैं और रहते हैं। उसमें कोई दूसरा बदलाव नहीं करता। इस मानी में कुरआन को जानबूझ कर बदलने वाला या उसके पाठ से छेड़छाड करने वाला या तो मूर्ख होगा या पागल और नहीं तो उसका अन्तःपाठ करते हुए उसका आलोचनात्मक संस्करण तैयार करने वाला कोई बुद्धिमान।

”प्रत्येक लिखित या मुद्रित पाठ की अपनी पवित्रता होती है। उसका धर्मग्रन्थ होना जरूरी नहीं। हंसी इस बात पर खास तौर से आ रही थी वह कुरानषरीफ के प्रति लोकश्रद्धा का इस्तेमाल करते हुए कह रहा था कि हम अपने समाज में कोई प्रगति, कोई परिवर्तन आने नहीं देंगे। जो ऐसा करेगा उससे निबट लेंगे। समय गुजरता जाय, कुरआन जिस काल और परिस्थितियों में लिखा गया था, वे बदल जाएं, परन्तु हम उसी काल में पड़े रहेगे, आगे बढ़ेंगे नहीं, न अपने को बदलेंगे, न किसी दूसरे को बदलने देंगे। इबारत कुछ कह रही थी, इशारत कुछ, अदा कुछ । इसका पाठ बनता था, ‘बदलेगा जमाना लाख मगर मुसलमान न खुद को बदलेगा।’

”डार्विन के अनुसार जो बदले हुए समय, चुनौतियों या परिस्थितियों के अनुसार अपने को बदल नहीं पाता वह अनफिट हो जाता है, बचा नहीं रह पाता। हंसी इस बात पर आ रही थी कि इतनी नासमझी की बात पर इतने सारे लोग झूम रहे है। कविता का अर्थ शब्दों में नहीं, उनके विपर्यय में भी होता है और युगसन्दर्भ में भी। यह बहुवर्तिता ही कविता को अगाध बनाती है। इनके संदर्भ में उन्हीं उक्तियों के नये अर्थ खुलते जाते हैं और नई व्याख्यायें होती जाती हैं।

”अब यदि कोई पूछें कि भई, तुम्हें इस कविता पर तीन कारणों से हंसी आ रही थी तो क्या, तीनों के लिए तुमने तीन बार हंस कर दिखाया? तो कहूंगा कि हंसी की कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि हंसने चलो तो रोना आता है। पर मैं हंसना तो दूर रो भी न सका था, क्योंकि रोता भी तो किसी पर असर तो होने वाला न था।

”यह प्रसंग इसलिए याद आ गया कि तुम उसी सिद्धावस्था को पहुंच चुके हो जिसमें न कुछ ऐसा नया जानना रह जाता है जो तुम्हारे माने से अनमेल पड़े, न सोचना रह जाता है, इस डर से कि सोचना फंडामेंटल से अलग जाना है, रिविजनिज्म है और ऐसों को अपमानित करके निकाल दिया जाता है कि वे किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहते। यह व्यक्ति, विचारधारा और संस्था के एक जीवन्त सत्ता से फॉसिल, जीवाश्‍म में बदलने का सूचक है।

”इसके फलस्वरूप पचास साल से ऐसे लोग जो कुछ दुहराते जा रहे हैं और यह तक नहीं देख पाते कि इस बीच बहुत कुछ बदला है, कि देश काल भेद से कोई भी परिघटना, उसकी नकल करो तो भी वही नहीं रह जाती, वह उतनी ही दृढ़ता से ऐसे संगठनों, संस्थाओं और विचारधाराओं के षिखर पर बने हुए हैं।

”मैं सिद्धावस्था से डरता हूं इसलिए यह बोध मुझमें बचा रह गया है कि सचाई तो स्थान, काल के साथ, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक परिवर्तनों के अनुसार बदलती रहती है, इसलिए एक ही काल में कोई एक मूल्यांककन सभी पर घटित नहीं होगाा। चिन्ता केवल यह कि, पचास साल तक सर्वसन्दर्भ निरपेक्ष भाव से एक ही मुहावरा दुहराने वाले अश्‍मीभूत विचारों के लोगों से संवाद कैसे स्थापित हो?

एक ही रास्ता है, तर्क, प्रमाण, और औचित्य का। उसका वे ध्यान नहीं रखते। गालियों को तर्क बना लेते हैं।

अभी कल की पोस्ट पर किसी ने कहा, ‘मोदी पुराण।‘ कुछ कह सकते हैं, ‘मोदी भक्त।’ तुम कहना चाहो तो कह सकते हो मैं मोदी का वकील हूं। मैं मान लूंगा । मैं तो उस आदमी को जिसे तुम गालियां देते रहे हो इतिहास पुरुष मानता हूं, जरूरत पड़ेे तो अतिरंजना भी कर सकता हूं। उनके खिलाफ जहर उगलने वालों सेे मोदी के वकील की जिरह का जवाब क्यों नहीं देते बनता। चोर चोर चिल्ला कर, लोगों की भीड जुटा कर, खुद ही उसे फांसी देने का प्रयास करने वालों को, बचाव पक्ष का जवाब तो देना चाहिए। यह संगसार कब तक चलेगा और संगसार करते हुए भी अपने को तर्कवादी कहने की निर्लज्जता कब तक जारी रहेगा। यह बताने का साहस आज तक कोई जुटा नहीं पाया और किसी कोने से किसी के बयान को मोदी का बयान सिद्ध करकेे उसे फांसी पर चढ़ाने का फन्दा लिए ऐसे कमअक्ल भी घूम रहे हैं कि कोई पूछे कि ये है तो बता भी न सकें।