चूहा प्लेग फैला सकता है यह पता था, वह बेजान होकर लिखे लिखाए पर पानी फेर सकता है यह आज पता चला। लोग चूहे से डरते थे हमें एक चूहा बाजार से लाना होगा।
Post – 2017-03-04
हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 46
जो कंपनी राजाओं, नवाबों और दिल्लीश्वरों (जो अपने नाम से भी जगतीश्वर हुआ करते थे – शाहजहां, आलमगीर ) की नकेल अपने हाथ में लेती जा रही थी (ध्यान रहे कि दिल्ली का बादशाह कंपनी के वजीफे पर पल रहा था और उसने 1833 में राजा राममोहन राय को अपना प्रतिनिधि बना कर इंग्लैंड में अपना वजीफा बढ़वाने के लिए भेजा था); कम्पनी ने अपने अधिकारक्षेत्र से बाहर के राजाओं और नवाबों के साथ दूत संबंध के बहाने अपने प्रतिनिधि उनके दरबार में भेज रखे थे, जो अवसर के अनुसार उनको समझाते, धमकाते ओर उनके बलाबल की खुफियागीरी भी करते थे। उनके सुझावों को न मानने वाले दरबारों को निशाना बनाया जाता था.
कंपनी इतनी उद्दंड थी कि वह भारत के कल-कारखाने बन्द करके अपना कारोबार आगे बढ़ाना चाहती थी। भारत के अपने अधिकृत क्षेत्र को उसने कंपनी का स्टाक मान लिया था और उससे अधिक से अधिक उगाहना उसकी सफलता का लक्ष्य बन गया था। जो ज्यादा पहुंचाएगा वह ऊंचा उठता जाएगा के सिद्धान्त से जो अपनी जमीदारी कामय रखने के लिए दूसरों से अधिक बोली बोली बोलता था उसे राजस्व वसूलने का अधिकार मिल जाता था और इसलिए वह किसानों से इतनी निर्ममता से दोहन करता था कि किसान बेहाल थे।
अंग्रेजों को, या उसकी नीति निर्धारण के लिएं प्रभावी भूमिका निभाने वालों में सबसे ऊंचा स्थाने उनका था जो यह मान बैठे कि प्रतियोगिता में हम हार गए, अब प्रतिबन्ध लगा कर हमें अपने उत्पादों का बाजार तैया करना है और वहां भी हारने के बाद उन्होंने उन्हें बन्द ही कर दिया।
परन्तु प्रश्न यह है कि जो कंपनी मनमाना आचरण कर रही थी उसे हम किसी से भी डरा हुआ समझ लें तो यह दिमाग की सादगी को ही प्रकट करेगा। और फिर भी यह एक सचाई थी जिसे एक प्रबल आशंका कहना अधिक ठीक होगा । ‘
अंग्रेजों से पहले जिन यूरोपीय ताकतों ने भारत के किसी भूभाग पर कब्जा उनका किन्हीं कारणों से अन्त हो गया या वे एक सीमा में सिमट कर रह गए। यदि उनका अंत हो गया तो पता किया जाना चाहिए कि अन्त हुआ क्यों और अपने को चिरकालिक बनाए रखने के लिए किन सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। ग्रांट के शब्दों में ‘पुर्तगालियों ने चामत्कारिक ढंग से भारत विजय की थी, पर वे अत्याचारी थे और इस अत्याचार ने उनका बेड़ा गर्क कर दिया। फ्रांसीसी तो जैसे आसमान के उल्का की तरह आ गिरे थे, उनका जो हस्र हुआ, होना ही था, डचों ने अधिक लालच से काम लिया और अंग्रेज । मौत का एक दिन मुकर्रर है के अटल सिद्धान्त और उसे यथासंभव टालने का ही नाम ब्रिटिश कूटनीति है ।
We are the fourth of those who have possessed an Indian Empire. That of Portuguese, though acquired by romantic bravery, was unsystematic and rapacious; the short one of the French was the meteor of a vain ambition; the Dutch acted upon the principle of a selfish commercial policy; and these apparently as they flourished for a time, have been cause of their decline and fall.
इसलिए यह तय था की जाना र्क्स पड़ेगा ही, दिन काटने के तरीके अपनाने या उनका आविष्कार करने की समस्या थी।
दूसरों के अनुभवों से जो कुछ सीखा जा सकता था वह क्या कंपनी ने सीखा। चाल्र्स ग्रांट एक जटिल चरित्र है। एक ओर ब्रितानी हितों की रक्षा, दूसरी ओर ईसाइयत का विस्तार, उनकी अपनी समझ से ईसाइयत मानवतावाद का नमूना है, इसलिए वह सोचता था कि हिन्दुओं को ईसाई बना कर कंपनी के हितो की रक्षा ही नहीं मानवीय कर्तव्य का निर्वाह भी किया जा सकता था। परन्तु भारतीयों को ईसाई बनाने का मतलब उन्हें अपने समकक्ष स्थान देना नहीं, अपितु उनको अधिक अच्छा सेवक बनाना थाः
Need we ask whether it would make them better servants and agents, make them more useful and valuable in all the relations of life? Would not such a person be a real accession to European masters; and must it not be supposed, that men professing Christianity, whose interests would be promoted by employing such converts, would not reject them, upon a principle which even Paganism could not justify, that is, because they had honestly followed their convictions?
आज हमारा डंका बज रहा है जो चाहें कर सकते हैं, और इसलिए हम इसमें अपना मजहब, अपनी मूल्यप्रणाली और नैतिक मानदंड आरोपित करके हिन्दुओं को अपने जैसा बना सकते है और इस तरह वे हमारे लिए अधिक उपयोगी रहेंगे।
the time present is ours, By planting our language, our knowledge, our opinions, our religion in our Asiatic territories, we shall put a great work beyond the reach of contingencies, we shall probably have wedded the inhabitants of those territories to this countries.
एक सम्भावना यह कि उन शक्तियों में से किसी की वापसी हो सकती है क्योंकि वे अधिक दुरावहीन ढंग से भारतीयों से मिलते जुलते हैं और स्थानीय षासकों के साथ मिल कर वे संकट खड़ा कर सकते हैं। यह न हमारे हित में होगा न भारतीयों के हित में क्योंकि हमारा सफाया करने के बाद वे स्वयं भारत पर अधिकार करना चाहेंगे और उनका षासन हमसे भी बुरा होगाः
It is to be feared that the number of lower Europeans will go on to increase in our territories; they mix most with the natives, and by them the worst part of our manners will be exhibited.
आशंका का एक कारण यह था कि लगान वसूली के लिए अंग्रेजों ने जो व्यवस्था की थी उसी के कारण जो कल तक किसी गिनती के नहीं थे वे मालामाल हो जायं, फिर दौलत तो अच्छे भलों का दिमाग बदल देती है, उससे उनमें विद्रोह की भावना भी आ सकती है, वे शिक्षा पा सकते हैं, यूरोपियनों के संपर्क में आ कर यूरोपीय मूल्यों और मानदंडों और अधिकार चेतना से भी संपन्न हो सकते हैं।
Secondly, – by the security which we have with great wisdom given to the land tenure of Bengal, the value of the property there …will naturally be enhanced, so that in the process of time, the owner of large states hither to little productive to them, may become of consequence by their wealth and possessions. We know also, that increasing prosperity tends to strengthen pride and disorderly propensities. Here again, therefore, we find motives for introduction of our principles; for if some of the higher and lower orders may be led by European manners, to adopt new ideas of relaxation, at the same time that new powers are put in the hands of the former… our religion and moral principles might obtain a fair establishment there…
यह स्थिति ब्रिटेन के हितो के लिए अवांछनीय तो है परन्तु इसका भी सही उपयोग किया जा सकता है। यदि उन्हें ईसाई बनाया जा सके तो वे स्वयं कंपनी की सत्ता के समर्थक हो जाएंगे। कहें चाल्र्स ग्रान्ट को भारत का उद्धार पाश्चात्य सत्ता का विश्वसनीय सेवक बनाने में दिखाई देता था जिसके लिए हम उसे दोष नहीं दे सकतेः
In success would lie our safety, not our danger. Our danger must lie in pursuing, from ungenerous ends, a course contracted and liberal; but in following an opposite course, in communicating light, knowledge, and improvement, we shall obey the dictates of duty, of philanthropy, and of policy; we shall take the most rational means to remove inherent great disorders, to attach the Hindoo people to ourselves, to ensure the safety of our possessions, to enhance continually their value to us.
सबसे बड़ी आशंका यह कि पश्चिमी रीतिनीति सीखने के बाद कहीं वे उसी तरह का विद्रोह न कर दें
The conduct of the British American colonies has raised, in some minds, confused surmisings and apprehensions of the possibility of similar proceedings on the part of our Indian provinces. These alarms are easily caught by such persons, … conceiving,… that the more entirely they continue with their present ignorance, superstition, and degradation, the more secure is our dominion over them.
यहां पर ग्रांट को यूरोप की नस्लों की श्रेष्ठता और भारत में जीवट की कमी तथा भारत की जलवायु के प्रभाव का भरोसा दिखाई देता है.
Indolence, pusillanimity, insensibility, as they procees not wholly from physical sources, would be at least partially corrected by moral improvement; but the influences of a tropical sun would still be oppressive. The slight structure of human body, with its ordinary concomitants, still forming the taste of vegetable diet, would ill second ardent designs, even if they were vigorous enough to conceive them. .. The nature of the country adds to the effect of the climate. It is unfavourable for long journeys; and the Hindoos, in general a remotely inland people, have a strong aversion to the sea; even the air of it is offensive to them….
Where then is the rational ground for apprehending, that such a race will ever become turbulent for English liberty? A spirit of libery is not to be caught from a written description of it, by distant and feeble Asiatics especially.
जो भी हो , यह ऐसे असमंजस की स्थिति थी जिसमें अमेरिकी क्रांति के बाद अपनी कठोरता के बाद भी जो सत्ता राजाओं को कुछ नहीं समझती थी वह जनता के संभावित विद्रोह से आशंकित थी.
Post – 2017-03-03
मैं यह नहीं चाहता कि मुझे इज्जत देने के लिए मेरे मित्र मेरी बात भी मान लें, मेरी इज्जत इस बात में है कि आप मुझे पढ़कर सोचना आरम्भ कर दें, मैं क्यों और कहा गलत हूँ, इसे जानने का अवसर मुझे भी दें.
दुनिया का कोई आदमी इतना सही हो जाय कि सभी उसके मानदंड पर खरे सिद्ध होकर ही सही सिद्ध हों तो विचार का अंत हो गया.
दुनिया का बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति यह सोचे कि अनपढ़ों, तथाकथित मूर्खों, विक्षिप्तों और जानवरों से भी कुछ सीखा जा सकता है तो मानें दुनिया आगे बढ़ रही है.
मैं उसी भविष्य के लिए पसीना भी बहाता हूँ और मोमबत्ती भी गलाता हूँ, पर यदि लगे कि मैंने ऐसे श्रोता समुदाय को जन्म दिया है जो इतना आलसी है कि स्वयं सोचने की जगह कोई प्रयत्न किए बगैर मुझसे ही उत्तर चाहता है, तो लगता है जो लिखा वह व्यर्थ गया.
मैं आगे जो कुछ लिखने वाला हूँ उसका मसाला चार्ल्स ग्रांट की रपट पर आधारित है. यह गूगल पर सुलभ है. इसे यदि कोई पढ़ कर मुझे यह बता सकता है कि मैंने क्या छोड़ा किस को तोड़मरोड़ कर पेश किया तो मुझे अपने लिखने का पुरस्कार मिल गया.
Post – 2017-03-03
कुछ लोग चुनाव परिणामों की प्रतीक्षा में हैं. उनके लिए जो जीत गया वह सही है. मेरे लिए इसका इतना ही अर्थ है की जो जीत गया उसे अनावश्यक हस्तक्षेप के बिना शासन करने दो. अधिक महत्वपूर्ण है समाज किस दिशा में जा रहा है. उसे गलत दिशा में कौन ले जा रहा है. यदि ग़लत दिशा में ले जाने वाला चुनाव में जीत जाता है तो देश की हार है. इसका फैसला चुनाव प्रचार के दौरान ही हो जाता है. परिणाम के दिन की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती. इस बार सभी दल घटिया तरीके अपना रहे हैं. ऐसे में यदि भाजपा जीत भी जाती है तो मेरे लिए एक ग़लत पार्टी की जीत होगी क्योंकि विकास के मुद्दे पर सबको साथ लेकर चलने के रस्ते से वह हट गई. मोदी को जितनी अंग्रेजी आती है उससे अधिक अंग्रेजी बोलने लगे हैं. कई तरह की हीनभावनाएं सामने आरही हैं. साम्प्रदायिक खेल मुस्लिम वोटबैंक वाले खेलते है. मोदी को उस खेल से बचना चाहिए था. बच न सके, यह उनकी और विकास के नारे की हार है. हारे हुए सभी है, परिणाम के दिन हारेहूओं में से एक की जीत होगी.
Post – 2017-03-02
हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – ४५
जब हम यह कहते हैं कि मध्यकाल में हिन्दुत्व के प्रति घृणा का सहारा नहीं लिया गया तो इसलिए कि खानपान के भेद बराव को छोड़ कर मुसलमानों मे हिन्दू मूल्यों के प्रति सम्मान भाव था। यहां तक कि जातिभेद और सती प्रथा जैसी बुराइयों को भी वे आदर की दृष्टि से देखते थे। यह उनका धार्मिक जुनून था जिसके लिए उन्होंने सभी समाजों में बलप्रयोग और उत्पीड़न का सहारा लिया। तरीके दूसरे भी थे, पर उनके विस्तार में हम नहीं जाएंगे .
पुर्तगालियों ने अपने प्रचार में मुसलमानों को भी मात देने वाले बलप्रयोग, उत्पीड़न का सहारा लिया। जिस प्रतिरोध का सामना उन्हें करना पड़ा, उस बर्बरता के कारण ही जिस तरह वे हिंदुओं की नज़र में गिर गए, उन्हें हिन्दू मनोबल को यातना के बीच भी अडिग रहने के जैसे नमूनों का सामना करना पड़ा उससे उन्हें अपने तरीके पर पुनर्विचार करना पड़ा। जिस जेवियर्स को संत की उपाधि दी गई और जिसके नाम पर अनेक शिक्षण संस्थाएं भी देखने में आती हैं, उसको क्रूरता के जघन्यतम तरीके अपनाने के लिए जाना जाता है, परन्तु उसे हिन्दुओं के प्रतिरोध के सामने झुकना पड़ा और भारत से बाहर एक बदला हुआ सेंटजेवियर्स दक्षिणपूर्व एशिया की ओर रवाना हुआ।
पुर्तगालियों की समझ में पहली बार आया कि भारत में विचार की ताकत तलवार से अधिक है। वैचारिक ,हथियार तैयार करने के लिए पुराणों का अध्ययन सबसे पहले उन्होंने शुरू किया। सवर्ण पुर्तगालियों को कुजात समझते रहे । भारत में धर्मान्तरण के लिए बल प्रयोग व्यर्थ है, विचारों से ही उन्हें कायल करना अधिक प्रभावकारी है, यह बात उन्हें कुछ देर से समझ आई।
इतालवी धर्म प्रचारक अलबर्तो दि नोबिली मदुरै जाने से पहलेे गोवा में ठहरा था और वहीं उसे यह सीख मिली थी भारत को वैचारिक औजारों का प्रयोग करके अधिक आसानी से धर्मान्तरित किया जा सकता है। फिर तो वह मदुरै में बारह साल के एकान्तवास में हिन्दू जीवनशैली अपनाते हुए – मांस मदिरा से परहेज, जनेऊ, खडाऊं, कमंडल, तिलक, पगड़ी, लकुटी, अधोवस्त्र, उत्तरीय धारण करके ईसाइयों से उसी तरह का छूतछात का भाव रखता जैसे ब्राह्मण करते थे, और इस बीच धन के लोभ में गुपचुप ढंग से धर्मान्तरित ब्राह्मणों से जो समाज में ब्राह्मण के रूप् में मान्य थे, संस्कृत, तेलुगू, तमिल का आधिकारिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद बाइबिल के नैतिक उपदेशों का संस्कृत में अनुवाद करके यह दावा करते हुए सार्वजनिक मंच पर आया कि वह ब्राह्मण है । वेदों का लोप हो गया तो विष्णु ने मीनावतार धारण कर उनका उद्धार तो किया था। चार वेदों का उद्धार तो उन्होंने कर लिया था पर पांचवा वेद समुद्र पार ही रह गया था, उसे लेकर मैं आया हूं।
पांचवे वेद का यही पाठ था जिसका पता किसी सूरत से वाल्तेयर को चला तो वह यह सोच कर बहुत प्रभावित हुआ था कि भारतीय वेदों में तो बहुत कुछ वे ही बाते हैं जो हमारे बाइबिल में है। मैक्डनल ने अपने संस्कृत इतिहास में इसे ब्राह्मणों द्वारा जालसाजी बताया था जो या तो सोच समझ कर फरेब है या जानकारी की कमी के कारण। जो भी हो, अब हथियार के स्थान पर फरेब को हथियार बनाया गया और यह फरेब किसी न किसी रूप् में भारत में ईसाइयत के प्रचार में आज अधिक गर्हित रूप् में विद्यमान है।
भारत में बल प्रयोग बेकार है यह शिक्षा उसके बाद सभी ने ग्रहण की। एंग्लिकन चर्च के ईसाई भी यह पाठ तो सीखने पर विवश थे ही। परन्तु कंपनी के द्वारा उनके धर्मान्तरण की गतिविधियों पर रोक लगाने के कारण हो, या अफीम का असर प्रचार के आवेश में घुस आने के कारण, इन ईसाइयों ने हिन्दुत्व के प्रति उस तरह घृणा को हथियार नहीं बनाया था जैसा चाल्र्स ग्रांट के बाद के ईसाइयों ने जो आज तक करुणा और घृणा का ऐसा घोल तैयार करते हैं कि हिन्दुत्व के प्रति घृणा प्रबुद्ध कहाने को लालायित हिन्दुओं के लिए भी एक श्लाघ्य आकांक्षा बन चुकी है।
इसकी उचित विस्तार से चर्चा हम सबसे बाद में करेंगे, यहां यह उल्लेख इसलिए करना पड़ा कि हमारे एक मित्र ने यह मत प्रकट किया था कि ईसाइयत इस्लाम से अधिक सदाशय थी और है, और वह उन बर्बर तरीकों को अपना नहीं सकी। मैं केवल यह निवेदन करने के लिए इस इतर दिशा में मुड़ गया कि इस्लाम ने क्रूरता का पाठ ईसाइयत से सीखा था और किसी भी चरण पर उसने उतनी जघन्य हिंसा और विनाश का सहारा नहीं लिया जितना पोपतन्त्र ने लिया था जिसे मैं ईसाइयत के उस सन्देश से भटका हुआ मानता हूं जो ईसा के उपदेशों में है। बाकी सारा ईसाई पुराण है और पोपतन्त्र का अंग है, बहुत बाद में रचा गया है और इसका कुछ अंश छठी शताब्दी तक आता है जो इस्लाम के जन्म का समवर्ती हो जाता है। यहां इतना ही कि ईसाइयत का चरित्र इस्लाम से भी अधिक गर्हित है, पोपतन्त्र इस्लाम से अधिक पिछड़ा है और इसके बावजूद वह अपनी कूटनीतिक चातुरी से अपनी घृणित योजनाओं के लिए इस्लाम को सह अपराधी और फिर मुख्य अपराधी और अन्ततः एकमात्र अपराधी सिद्ध करने में सफल हो रहा है।
मैं चाहता हूं कि हम स्वयं सूचनाएं जुटाएं, स्वयं व्याख्या करें, पश्चिमी प्रचारतन्त्र से बचे और अपने स्तर पर सावधान रहें । कारण कोई कल्पनाजीवी ही उन प्रवृत्तियों से गुदगुदी अनुभव कर सकता है जिसके कारण भारत में स्वयं मुसलमानों के अनुसार जनसंख्या का अनुपात बदला है, जहां संतुलन हिन्दुओं के विपरीत हो गया है वहां हिन्दुओं का सम्मान से जीना असंभव बना दिया गया है और जिन मुद्दों पर कायदे का चुटकुला तक नहीं बन सकता उनको राष्ट्रीय संकट बना कर पेश किया जाता रहा है जबकि उनको सामाजिक न्याय और औचित्य के आधार पर भी सही नहीं ठहराया जा सकता।
आज की पोस्ट में मैं उस संकट के गहराने का चित्रण करना चाहता था जिनमें अंग्रेजो की दहशत ने मुसलमानों के नेता का इस्तेमाल करके अपना संकट मुसलमानों के सर डाल दिया और वह भी तब जब उसे जल्ल तू जलाल तू आई बला को टाल तू तक कहने नहीं आया था।
मैं तीन गलतफहमियों को दूर करना चाहता हूं जो आधुनिक प्रचारतन्त्र द्वारा पैदा की गई हैं और प्रचारतन्त्र हमारे हाथ में नहीं है इसलिए उस पर प्रकट या परोक्ष उन लोगों का अधिकार है जो उसे अपने ढंग से विकसित कर सकते हैं और अपने सूचनातंत्र के दबाव में दूसरे समाचार माध्यमों और विचार माध्यमों को ले सकते हैं, और दूसरे उनके नियंत्रण में हैं जो पैसे के लिए अपनी अन्तरात्मा और अपनी मां को भी बेच सकते हैं।
यह न समझें कि ये आज पैदा हुए हैं, ये पहले से थे, और किसी ने ठीक ही कहा था कि भारत के योद्धा भी भाड़े के योद्धा थे, उनमें अपने देश, जाति और धर्म का सम्मान न था जिसके लिए किसी दूसरे देश का आदमी अपने प्राण दे देता है पर समझौता नहीं करता । यदि ऐसा न होता तो हिन्दू राजा मुसलमानों का सिपहसालार बन कर हिन्दुओं को लूटता, अपमानित करता और लूट का माल मेरा, जीता हुआ इलाका बादशाह का दहाड़ता हुआ अपना उपयोग करने वालों की नजर में सवाई राजा न बन जाता।
हमारी सबसे बड़ी समस्या सांप्रदायिकता की नहीं, राष्ट्रीय निष्ठा के अभाव की है जिसको जाग्रत करने के सही प्रयास नहीं किए गए, इसलिए हमे आंख के सामने अपना दुशमन दिखाई देता है जो अपना भाई है, पर उसे रोबोट की तरह इस्तेमाल करने वाला दिखाई नहीं देता। अक्ल इतनी कम है कि मैं अपने मित्रों के बीच भी यह सोच पैदा नहीं कर सकता, प्रयत्न जारी रहेगा और वही हमारे वश में है। परन्तु आज में अंग्रेजों में बढ़ती जिस आशका का जो दहशत का रूप लेने लगी थी, चर्चा करना चाहते था वह तो रह ही गया।
Post – 2017-03-01
हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 44
हमने जब कहा था कि अंग्रेजों को जिस व्यक्ति की तलाश थी वह सर सैयद अहमद के रूप में मिल गया और उन्होंने उनका इतनी सूझबूझ से इस्तेमाल किया कि वह इस भरम में जीते रहे कि वह स्वयं अंग्रेजों का इस्तमाल अपने ‘कौमी’ हितों के लिए कर रहे हैं। हम इस पर बाद में कुछ विस्तार से चर्चा करेंगे। यहां इतना ही कि वे चाहते थे कि भारतीयों को उनकी उसी शिक्षा तक ठहरा रहने दिया जाय जो अब तक उन्हें दी जा रही थी। इसके अलावा वे मामूली शिक्षा अंग्रेजी की देना चाहते थे जिसमें भाषा का ज्ञान तो हो पर आधुनिक विषयों की जानकारी न हो या विज्ञान और प्रौद्योगिकी से दूर रखा जा सके। वे प्रयत्नपूर्वक पुरातनपंथी सोच के दफ्तरी उपयोग की जमात पेदा करना चाहते थे इसलिए संस्कृत कालेज और मुहम्मडन कालेज की स्थापना की। न तो सस्कृत कालेज में अरबी और कुरान और हदीस की शिक्षा मिल सकती थी न ही हिन्दू छात्र मुहम्मदन कालेज में पढ़ने जा सकते थे। पर इस अलगाव का शरारत पूर्ण और विद्वेष फैलाने वाली व्याख्या अवश्य कर सकते थे। और यही स्थिति कानून के मामले में भी थी।
हम पीछे कह आए हैं कि प्राच्यज्ञान की गुणगाथा के पीछे भी सोची समझी चाल थी। मैकनाटन के जिस कठोर वाक्य का हम हवाला दे आए हैं उसके पीछे भी यह सोच थी कि यदि कंपनी के अधिकार क्षेत्र में ईसाइयत के प्रचार की छूट मिली तो धीरे धीरे भारतीय यूरोपीय संस्थाओं से, लोकतन्त्र से परिचित होंगे, प्रशासन में अपना प्रतिनिधित्व मांगेंगे और ऐसा भी दिन आ सकता है कि वे स्वतन्त्रता की भी मांग करने लगें। इस दहशत से भी धर्मप्रचार को हतोत्साहित किया जा रहा है, यह मैं चार्ल्स ग्रांट के उस प्रस्ताव में पाते हैं जिसका उसने कंपनी के बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स को भारत में ईसाई धर्मप्रचार के पक्ष मे अपना तर्क देते हुए उल्लेख किया थाः
The grand danger with which objection alarms us is, that the communication of the Gospel and of European light, may probably be introductive of a popular form of government and the assertion of Independence.
इसका जो समाधान ग्रांट को सूझ रहा था वह उस धारणा के अनुरूप था जो उसने हिन्दुओं के बारे में बना रखी थीः
Upon what grounds is it inferred, that these effects must follow in any case, especially in the most unlikely case of the Hindoos? The establishment of Christianity in a country, does not necessarily bring after it a free political constitution. The early Christians made no attempts to change the forms of government; the spirit of the Gospel does not encourage even any disposition which might lead to such attempts. Christianity has been long the religion of many parts of Europe, and of various protestant states, where the forms of government is not popular. … it may subsist under different forms of government, and in all render men happy, and even in societies flourishing, where the Mahomedan and Hindoo systems are built upon the foundations of political despotism, and adapted in various instances, only to the climates that gave them the birth.
परन्तु सबसे रोचक था उसका यह दावा कि बंगाल की जलवायु और इसके प्रभाव से भारतीयों में आजादी के लिए संघर्ष का आवेष पैदा ही नहीं हो सकताःNor are we to expect, that Christianity is entirely to supersede the effects of physical causes. The debilitating nature of the climate of our eastern territories, and its unfavourable influence upon the human constitution, have been already mentioned, and by others represented in strong colours.
ग्रांट ने ब्रिटिश ट्रांजैक्शन्स इन हिन्दुस्तान के लेखक का हवाला देते हुए उनकी कमजोरी, मेहनत से बचने की प्रवृत्ति और खतरे उठाने से बचने की आदत आदि का हवाला दिया है जब कि वह मानता है कि दूसरे प्रान्तों के लोगों का स्वभाव इससे अलग है। 1797 तक कंपनी की बादशाहत मुख्यतः बंगाल तक सीमित थी और तब इससे बाहर तक के विस्तार और उससे उत्पन्न होने वाले खतरों और समस्याओं का अनुमान तक नहीं किया था। बंगालियों के स्वभाव और दूसरे प्रान्तों के लोगों से उनकी स्वभावगत भिन्नता से असहमत भी नहीं हुआ जा सकता। 1857 का विद्रोह बंगाल से आरंभ हुआ था परन्तु बंगालियों की उसमें कोई भागीदारी नहीं थी, यह दूसरे प्रान्तों के लोगों का, विशेषतः हिन्दी प्रदेश का विद्रोह बन कर रह गया था जिसके कारण हिन्दी प्रदेश को असुविधाओं और उपेक्षा का सामना भी करना पड़ा।
परन्तु यहां हम उस आशंका का आकलन कर रहे हैं जिसके कारण अपने शासित क्षेत्र में कंपनी ऐसी किसी भी गतिविधि से, वह धर्मप्रचार ही क्यों न हो, बचना चाहती थी जिससे जनजागृति पैदा हो और वह बढ़ती हुई स्वत्रता की मांग तक पहुंचे। इसी कारण वह भारतीय समाज को मध्यकालीन विवादों में उलझाए ही नहीं, उन्हें इतना उग्र बना कर रखना चाहती थी कि वे उससे बाहर निकल ही न सकें और उसका राज्य स्थायी बना रहे ।
ग्रांट का आकलन गलत नहीं था। ईसाइयत कहीं भी न तो समाज की समानता का उन्नायक बनी न इसने लोकतन्त्र या राष्ट्रभक्ति की भावना पैदा की। जैसा कि तब से आज तक का अनुभव रहा है, ऐंग्लोइंडियनों पारसियों ने कांग्रेस में तभी तक सक्रिय भूमिका निभाई जब तक यह सुविधाओं और अवसरों की मांग तक सीमित थी। बाद में ऐंग्लो इंडियन और ईसाई, जमींदार, रियासतदार, नवाब और रजवाडे़ सभी अंग्रेजी सत्ता के साथ और स्वतन्त्रता आन्दोलन के विरोधी रहे और ब्रितानी सत्ता के हाथों में खेलते रहे जिसके कारण या जिसे सोच कर कांग्रेस को हिन्दू संगठन सिद्ध करने और उसके अभियान में बाधा डालने के तरीके आविष्कार करते रहे और इस बिन्दु पर मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा, संघ सभी की भूमिका एक जैसी थी।
जो भी हो, इसी बिन्दु पर हमें राजा राममोहन राय और विद्यासागर की दूरदर्शिता का परिचय मिलता है जिन्होंने आधुनिक चेतना के लिए अंगे्रजी भाषा के ज्ञान और इस भाषा में उपलब्ध ज्ञान के महत्व को समझा और अंग्रेजी के हिमायती बने। राम मोहन राय का अंग्रेजी के समर्थन में खड़ा होना और संस्कृत के माध्यम से शिक्षा देने का विरोध करते हुए यह कथन कि संस्कृत में शिक्षा का अर्थ है समाज को आज से दो हजार पीछे ले जाना इसी चिन्ता को प्रकट करता है।
उनकी चिन्ता भाषा से जुड़ी नहीं थी, लोकचेतना से जुड़ी थी जिसके सन्दर्भ में ही भाषा का औचित्य है। ध्यान रहे कि राजा राममोहन राय निज भाषा का विरोध नही कर रहे थे, संस्कृत के माध्यम से शिक्षा का विरोध कर रहे थे जो निज भाषा नहीं थी। प्रयत्नसाध्य और कष्टसाध्य भाषा थी। वह दो प्रयत्नसाध्य भाषाओं के बीच उसके पक्ष में थे जिसमें उपलब्ध ज्ञान के बल पर एक दूसरा समाज अपनी चतुराई के बल पर इतने बड़े भूभाग का स्वामी बन गया है, जिसके एक टुकड़े के बराबर उसका पूरा देश है।
त्याग, बलिदान, सात्विक जीवन, निस्पृहता आदि कसौटियों पर कसने पर दूसरे बहुत से नेता राय से बड़े सिद्ध होंगे, हमारे किसान नेता बाबा रामचरण दास या राघवदास भी । रोचक बात यह है कि राघवदास ने किसानों को शिक्षित करने का इतना जोरदार अभियान चलाया कि पूर्वोत्तर किसान हाई स्कूलों और कालेजों से भर गया, परन्तु वह भी इनके माध्यम से अंग्रेजी पर भी अधिकार कराना चाहते थे। उनसे पहले मेरे गांव मे मन्नन द्विवेदी गजपुरी जो हिन्दी के लिए समर्पित व्यक्ति थे अंग्रेजी माध्यम का स्कूल खोला था जो चल नहीं पाया। उनके छोटे भाई राम अवध द्विवेदी अंग्रेजी के प्रोफेसर थे।
राजा राममोहन राय को केवल उनके ज्ञान, प्रतिभा और दूरदृष्टि के आधार पर परखा जाना चाहिए। अरबी उन्होंने अपने पिता की महत्वाकांक्षा से मकतब में बैठ कर पढ़ी थी, फारसी का ज्ञान भी उसी क्रम में अर्जित किया होगा। इन भाषाओं का ज्ञान तत्कालीन प्रशासन में उच्च पद पाने के लिए जरूरी था। संस्कृत उन्होंने बनारस जा कर सीखी थी। इसके अतिरिक्त तुर्की और हिब्रू का ज्ञान उन्होंने कैसे प्राप्त किया था इसका मुझे पता नहीं। यही बात उनके अंग्रेजी ज्ञान के विषय में कही जा सकती है। वह अपने स्वभाव में असाधारण मानवतावादी थे और एक ऐसे मत के लिए चिन्तित थे, जिससे भारतीय समाज में धार्मिक कलह को दूर किया जा सके, ईसाइयत के सद्विचारों को ग्रहण किया जा सके और हिन्दू ज्ञान और मूल्य परंपरा की रक्षा की जा सके। यह मेरा आकलन है। जब तक आपको इससे असहमति है, अपनी जगह पर आप ठीक है। हम केवल इतना ही कर सकते हैं कि जिन विभूतियों के चरण स्पर्श तक ही योग्यता हममे नहीं है उनकी आलोचना करते हुए संयत और सभ्य भाषा से काम लें।
मेरा ज्ञान अपूर्ण है, और उसमें अब तक की जानकारी मे लगता है, राजा राममोहन ने दो मोर्चे संभाले, एक था शिक्षा और ज्ञान का आधुनिकीकरण और धर्म-वर्ण-निरपेक्ष प्रसार, दूसरा था ईसाइयत के आक्रमण से बचाव का तरीका जिसके दो पक्ष थे। एक था उन सामाजिक विकृतियों से मुक्ति जिनके प्रचलन से हिन्दुत्व के साथ उन्हें जोड़ लिया जाता है और दूसरा था उस लंगर की तलाश जिस पर भरोसा करके झटकों को झेलते हुए भी अपनी जमीन पर खड़ा रहा जा सके। इस अर्थ में राममोहन राय गांधी से एक शताब्दी पीछे होते हुए भी अपनी चेतना के स्तर पर उनके समकक्ष ही नहीं उनसे आगे भी थे ! उनसे अधिक समावेशी, और इसलिए उनके ईसाइयत की धज्जियां उड़ाने वाले लेखों और टिप्पणियों का असाधारण महत्व है। हम इसके ब्यौरे में नहीं जा सकते, परन्तु जैसा कि सीताराम गोयल का विचार था उनके ईसा प्रेम का ही परिणाम था कि केशवचन्द्र सेन भटक कर उसी संस्था में रहते हुए भी राजा राममोहन राय से उल्टी दिशा में चले गए। इतिहास को हम समझ सकते हैं, इसकी गति को अपने अनुसार चला नहीं सकते। आने वाली पीढ़ियों की सोच और आकांक्षा इसे इतना बदल सकती है कि इसकी पुरानी पहचान ही मिट जाए!
Post – 2017-02-27
हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – ४३
विजेता और व्यापारी के पीछे पीछे पुरोधा भी जाता है, यह सनातन नियम है। ईस्ट इंडिया कंपनी के नौकर चाकर आए तो उनको धर्मोपदेश देने वाले पादरी भी आने ही थे। आ ही गए तो सद्धर्म के प्रचार की आकांक्षा भी पैदा होनी ही थी। परन्तु आरंभिक दौर में जहां दूसरे मिशनरियों की सक्रियता अधिक देखने में आती है,
अंग्रेजी चर्च सक्रिय नहीं दिखाई देता। इसकी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाएं 1757 के बाद हुई लगती हैं, ऐसा मेरा अनुमान है। उनकी गतिविधियों की मुझे अच्छी जानकारी नहीं है. फिर भी यह तो सच है ही कि कंपनी ने अपने व्यापारिक हित को ध्यान में रख कर पर अंकुष लगा रखा था और इसके विपरीत अपने अध्येताओं का दल भारत को समझने – इसके साहित्य, संस्कृति, मूल्यव्यवस्था, इतिहास के अध्ययन पर लगा रखा था।
इसके पीछे एक सोची समझी चाल थी जिसका संकेत करना इसलिए जरूरी लगता है कि इसको समझने का प्रयत्न नहीं किया गया और हम इससे मुदित पुलकित होते रहे, कि उन्होंने हमारे लिए क्या कुछ नहीं किया और इस तरंग में जब तक अपने को कोसते रहे कि हम ही इतने कृतघ्न ठहरे कि उनके उन अध्ययनों और सर्वेक्षणों के लिए उनका आभार तक नहीं मानते जो उनसे पहले कभी हुए ही नहीं थे और मान लेते हैं कि वे न आए होते तो वे अध्ययन हुए ही न होते, जिसका प्रतिवाद अपनी वर्तमान मौजवादी प्रवृत्ति को देखते हुए और पहले के इतिहास पर गौर करते हुए, मैं भी नहीं कर सकता परन्तु यह मानता हूं कि भूराजस्व के दोहन से उत्साहित वे यह पता लगाने का प्रयत्न कर रहे थे कि इस विषाल देश की अन्य संपदाएं क्या हैं, उनका कैसे दोहन किया जा सकता है, इसके समाज को उसकी शक्तियों और दुर्बलताओं को कितना अधिक समझा जा सकता है कि उसे शतरंज की गोटों की तरह चलाया और उनके आक्रोश को अपनी ओर आने की जगह एक दूसरे की ओर मा़ेड़ कर उनको नियन्त्रित किया जा सके।
हम यहां इतना ही कह सकते हैं कि धर्मप्रचार को नियन्त्रित करते हुए भारतविद्या पर ध्यान देना किसी तरह की सदाषयता नहीं, एक चतुराई थी और इसको न समझ पाने के लिए या सही ढंग से रेखांकित न कर पाने के लिए अपने अध्येताओं को जितना भी दोष दें, अपना बहुत कुछ गंवाने के बाद भी उनकी समझदारी की प्रषंसा करनी पड़ती है।
अभिमुखता में अंतर आने मात्र से परिणाम कितने भिन्न हो सकते हैं इसका एक उदाहरण यह है कि प्राच्यवाद को बढ़ावा तो सोची समझी नीति के कारण दिया गया था, परन्तु हम कोई काम जिस इरादे से करते हैं, परिणाम उसके अनुरूप ही नहीं आते हैं, और जहां परिणाम अनुकूल होते भी हैं, वहां भी उससे ठीक उल्टे परिणाम उसी क्रिया से निकलते हैं। भारतविद्या या प्राच्यवाद से एक नई समस्या पैदा हो गई। एक बार प्राचीन कृतियों से परिचित होने के बाद प्राच्यवादी ईसाई मूल्यों की तुलना में हिन्दू मूल्यों और आदर्शों से इतने प्रभावित हो गए थे कि धर्म प्रचार के लिए आतुर मिशनरियों की भर्त्सना गाली की चुटीली भाषा में कहें तो ‘ये उल्लू के पट्ठे और कूड़मग्ज’ हैं कहते हुए (these bigotted and ignorant missionries) करने लगे थे! ऐसे कथन नीतिगत नहीं हो सकते, ये मैकनाटन के शब्द हैं जो फौजी अफसर थे और लगता है वी.के. सिंह की तरह गोली की भाषा में बात करते थे और अफगान युद्ध में गोली के ही शिकार भी हुए थे।
मिषनरियों के लिए यह अकल्पनीय था और वे इन प्रतिबन्धों से बहुत क्षुब्ध थे। जैसा कि एक डेनिश मूल के पादरी Swartz ने Dr . Gaskin, Secretary of the Society for promoting Christian Knowledge, Tanjore को लिखे अपने एक पत्र में शिकायत की थी कि जब उसने आदिवासियों के बीच अपने धर्मान्तरण कार्य का ब्यौरा देते हुए हिन्दुओं के धर्मान्तरण के समर्थन का प्रस्ताव रखा तोः
Mr. Montgomerie Campbell gave his decided vote against the clause, and reprobated the idea of converting the Gentoos.
उन्होंने अपने लोकोपकारी कार्यो मिसाल देते हुए यह बताया कि धर्मप्रचार कितना जरूरी है, इसके बावजूद:
It is asserted that a missionary is a disgrace to any country….
But Mr. Montgomerie Campbell says, that the Christians are profligate to a proverb…
It is asserted, that the inhabitants of the country would suffer by missionaries…
मिशनरियों में इस बात से खासी बेचैनी थी. उनका कहना था कि यदि यही हाल रहा तो कम्पनी के गोरे कर्मचारी हिन्दू हो जायेंगे. समस्या हिन्दुओं को दीक्षित करने की जगह यूरोपियनों को सुधारकर ईसाइयत में आस्थावान बनाए रखने की होती जा रही थीः
… Should a reformation take place amongst the Europeans, it would be the greatest blessing to the country.
कुछ के बारे में, जैसे H.H. Wilson के बारे में बहुत बाद तक यह मिथ्या आरोप लगता रहा कि वह जनेऊ भी पहनता है. उनको शिकायत थी कि कम्पनी धर्म बेचकर पैसा कमाने पर लगी हुई है. इसी चिन्ता से कातर होकर चाल्स ग्रांट ने जिसने माल्दा में रेशम के कारोबार से खासी दौलत कमाई थी और जिसे गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस ने कंपनी के प्रबन्धन में भी स्थान दिलाया था।
चाल्र्सग्रांट के सिल्क कारोबार पर ध्यान दें तो यह मुख्य रूप से अफीम के बदले सिल्क का कारोबार सिद्ध होगा और यदि यह लार्ड कार्नवालिस के संपर्क में आया था और ईस्ट इंडिया कंपनी में भी डाइरेक्टर के पद तक उठा था तो इसलिए कि कूटनीतिक बाध्यताओं के कारण कंपनी कुछ समय तक सीधे अफीम का व्यापार न करके बिचैलियों के माध्यम से यह काम करती रही थी।
एक सज्जन ने अफीम के इस कारोबार से किसी डाॅक्युमेंटरी के आधार पर राममोहन राय को भी अफीम के कारोबार से जोड़ दिया था परन्तु मेरी जानकारी के अनुसार भूराजस्व विभाग में क्लर्क थे, न कि किसी और उन्होंने महाजनी या कहें सूद पर पैसा चलाने से पैसा कमाया था, न कि अफीम के कारोबार में। अफीम का कारोबार कंपनी या उसके विष्वस्त अंग्रेजों के हाथ में, हिसी हिन्दुस्तानी को यह सुयोग या दुर्योग प्राप्त न था। यही हाल नील और चाय के उत्पादन और विपणन का था। उत्पादक, मजदूर, नौकर भारतीय, मालिक अंग्रेज।
चाल्र्स ग्रांट धार्मिक प्रकृति का था या कहें नषे और अपराध के कारोबार का नैतिक आवरण उग्र धार्मिकता होती है, इसलिए धर्म को लेकर उसकी सक्रियता समझ में आती है। सुदूर दक्षिण में स्वात्र्ज से उसका मैत्री संबंध भी अफीम के कारोबार से जुड़े थे या नहीं इसका कोई साक्ष्य हमारे पास नहीं है परन्तु हमारी जानकारी खासी सतही है और बहुत सी सूचनाएं इधर उधर से जुटाई होती हैं, इसलिए मेरे ज्ञान पर भरोसा करना धोखा खाना है, मेरी दृष्टि अवष्य अलग है और उसके विषय में मुझे कोई भ्रम नहीं। भरोसा भी उसी पर है।
चाल्र्स ग्रांट ने धर्म की ग्लानि से दुखी हो कर कंपनी के अधिकार क्षेत्र में आने वाले भारत का दौरा करते हुए इसका अध्ययन किया था और वाद में जब वह कंपनी के डाइरेक्टर पद तक पहुंचा तो और ब्रिटिश संसद का सदस्य बना तो नीतिगत परिवर्तन तो होना ही था!
इंग्लॅण्ड को भेजी जानेवाली पादरियों की रपटों से इंग्लैंड में भी कम्पनी की नीति को लेकर खासी बेचैनी थी और लगता है कम्पनी के डाइरेक्टरों में भी कुछ चिंता पैदा हुई थी, ग्रांट के डाइरेक्टर बनने के बाद यह चिन्ता जोर पकड़नी ही थी। फिर भी प्राच्यवादी अपने रुख पर अड़े हुए थे और मिशनरियों के साथ तो लोकतंत्र को प्रभावित करने वाला ईसाई जनमत भी था। लगभग दस साल का लंबा विवाद चला। दोनों अपना पक्ष पुस्तिकाओं और परचों के माध्यम से पेष करते रहे! इसे पैम्फलेट वॉर के रूप में जाना जाता है, मगर आप इस नाम से इन्टरनेट छानने चलें तो हाथ कुछ न आएगा। कम से कम मेरे हाथ न लगा। मिशनरियों में, जैसे बकनान, जिसको ग्रांट ने ही बुलाया था, का मानना था कि परमात्मा ने कम्पनी के साम्राज्य के बहाने ईसाइयत के प्रचार का अवसर प्रदान किया है(God had given the Company dominion over India for the specific purpose of India’s Christianisation) और इसे धर्मान्तरण का अभियान न चला कर इस अवसर को व्यर्थ किया जा रहा है और विल्बरफोर्से की समझ से Our religion is sublime, pure and beneficent. Theirs is mean, licentious and cruel. और मेरी तुच्छ समझ से दोनों में से कोई गलत नहीं था. दोनों एक ही संकुल या वस्तुस्थिति को दो भिन्न कोणों और ऊध्र्वताओं से देख रहे थे. इसको लेकर ब्रिटिश संसद में भी बहस चली और इसका परिणाम था १८१३ का चार्टर ऐक्ट, जिससे मिशनरियों को धर्म प्रचार और धर्मान्तरण की ऐसी खुली छूट जिसमे वे रास्ता रोक कर हिन्दू देवियों, देवताओं को खुल कर गालियां देते हुए हिंदुओं को अपमानित करने लगे, इसका परिणाम था राममोहन रॉय का, जो इससे पहले पहले सर्वधर्म समन्वयवादी थे, आत्मनिरीक्षण, ईसाइयत की अतक्र्यताओं की खुलकर आलोचना और हिन्दू आस्था की जड़ों की तलाश और ब्रह्मसमाज की स्थापना, और समाज को आधुनिक बनाने के लिए संस्कृत की जगह इंग्लिश शिक्षा का समर्थन।
Post – 2017-02-27
हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – ४३
विजेता और व्यापारी के पीछे पीछे पुरोधा भी जाता है, यह सनातन नियम है। अतः ईस्ट इंडिया कंपनी के नौकर चाकर आए तो उनको धर्मोपदेश देने वाले पादरी भी आने ही थे। आ ही गए तो सद्धर्म के प्रचार की आकांक्षा भी पैदा होनी ही थी, परन्तु आरंभिक दौर में जहां दूसरे मिशनरियों की सक्रियता अधिक देखने में आती है, अंग्रेजी चर्च सक्रिय नहीं दिखाई देता। इसकी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाएं 1757 के बाद हुई लगती हैं, ऐसा मेरा अनुमान है। उनकी गतिविधियों की मुझे अच्ची जानकारी नहीं है। फिर भी यह तो सच है ही कि कंपनी ने अपने व्यापारिक हित को ध्यान में रख कर इनको दबा रखा था।
अभिमुखता में अंतर आने मात्र से परिणाम कितने भिन्न हो सकते हैं इसका एक उदाहरण यह है कि प्राच्यवाद को बढ़ावा तो परितोषवादी नीति के कारण दिया गया था, परन्तु इससे एक नई समस्या पैदा हो गई थी। एक बार प्राचीन कृतियों से परिचित होने के बाद प्राच्यवादी ईसाई मूल्यों की तुलना में हिन्दू मूल्यों और आदर्शों से इतने प्रभावित हो गए थे कि धर्म प्रचार के लिए आतुर मिशनरियों की भर्त्सना गाली की चुटीली भाषा में कहें तो ‘ये उल्लू के पट्ठे और कूड़मग्ज’ हैं कहते हुए (these bigotted and ignorant missionries) करने लगे थे! ऐसे कथन नीतिगत नहीं हो सकते, ये Macknotten के शब्द हैं जो फौजी अफसर थे और लगता है गोली की भाषा में बात करते थे और अफ़ग़ान युद्ध में गोली के ही शिकार हुए थे।
फिर भी कंपनी की नीति बहुत स्पष्ट थी. भारतीय समाज में धर्म प्रचार के विपरीत थी। जैसा कि एक डेनिश पादरी ने अपने एक पत्र में शिकायत भरे स्वर में निवेदन किया थाः
Mr. Montgomerie Campbell gave his decided vote against the clause, and reprobated the idea of converting the Gentoos.
अपने लोकोपकारी कार्यो की वकालत करते हुए खेद प्रकट किया था कि इसके बावजूद:
It is asserted that a missionary is a disgrace to any country.
But Mr. Montgomerie Campbell says, that the Christians are profligate to a proverb.
It is asserted, that the inhabitants of the country would suffer by missionaries.
मिशनरियों में इस बात से खासी बेचैनी थी. उनका कहना था कि यदि यही हाल रहा तो कम्पनी के गोरे कर्मचारी हिन्दू हो जायेंगे. समस्या हिन्दुओं को दीक्षित करने की जगह यूरोपियों को सुधारकर ईसाइयत में आस्थावान बनाए रखने की होती जा रही थी
… Should a reformation take place amongst the Europeans, it would be the greatest blessing to the country.
कुछ के बारे में, जैसे H.H. Wilson के बारे में बहुत बाद तक यह मिथ्या आरोप लगता रहा कि वह जनेऊ भी पहनता है. उनको शिकायत थी कि कम्पनी धर्म बेचकर पैसा कमाने पर लगी हुई है. इसी चिन्ता से कातर होकर चाल्स ग्रांट ने जिसने माल्दा में रेशम के कारोबार से खासी दौदत कमाई थी और जिसे लार्ड हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – ४३
चाल्र्सग्रांट के सिल्क कारोबार पर ध्यान दें यह मुख्य रूप से अफीम के बदले सिल्क का कारोबार सिद्ध होगा और यदि यह लार्ड कार्नवालिस के संपर्क में आया था और ईस्टइंडिया कंपनी में भी डाइरेक्टर के पद तक उठा था तो इसलि कि कूटनीतिक बाध्यताओं के कारण कंपनी कुछ समय तक सीधे अफीम का व्यापार न करके बिचैनियों के माध्यम से यह काम करती रही थी पर मेरी जानकारी के अनुसार राममोहन राय भूराजस्व विभाग में क्लर्क के और उन्होंने महाजनी या कहें सूद पर पैसा चलाने से पैसा कमाया था, न कि अफीम के कारोबार में किसी शामिल हो कर।
इंग्लॅण्ड को भेजी जानेवाली पादरियों की रपटों से इंग्लैंड में भी कम्पनी की नीति को लेकर खासी बेचैनी थी और लगता है कम्पनी के डाइरेक्टरों में भी कुछ चिंता पैदा हुई थी फिर भी प्राच्यवादी अपने रुख पर अड़े हुए थे और मिशनरियों के साथ तो अवाम था. लंबी बहसबाजी चलती रही, पक्ष विपक्ष में तर्क और सफाई पुस्तिकाओं और परचो के माध्यम से दी जाती रही ! इसे पैम्फलेट वॉर के रूप में जाना जाता है मगर आप इस नाम से इन्टरनेट छानने चलें तो हाथ कुछ न आएगा। कम से कम मेरे हाथ न लगा।
मिशनरियों में, जैसे बकनान का मानना था कि परमात्मा ने कम्पनी के साम्राज्य के बहाने ईसाइयत के प्रचार का अवसर प्रदान किया है और इसे व्यर्थ किया जा रहा है (God had given the Company dominion over India for the specific purpose of India’s Christianisation) और विल्बरफोर्से की समझ से Our religion is sublime, pure and beneficent. Theirs is mean, licentious and cruel.। मेरी तुच्छ समझ से दोनों में से कोई ग़लत नहीं था। दोनों एक ही संकुल या वस्तुस्थिति को दो भिन्न कोणों और उर्ध्वताओं से देख रहे थे. इसको लेकर ब्रिटिश संसद में भी बहस चली और इसका परिणाम था १८१३ का चार्टर ऐक्ट जिससे मिशनरियों को धर्म प्रचार और धर्मान्तरण की ऎसी छूट जिसमे वे रास्ता रोक कर हिन्दू देवियों, देवताओं को खुल कर गालियां देते हुए हिंदुओं को अपमानित करने लगे, इसका परिणाम था राममोहन रॉय का, जो इससे पहले पहले सर्वधर्म समन्वयवादी थे आत्मनिर्रीक्षण, ईसाइयत की अतर्क्यताओं की खुलकर आलोचना और हिन्दू आस्था की जड़ों की तलाश और ब्रह्मसमाज की स्थापना, और समाज को आधुनिक बनाने के लिए संस्कृत की जगह इंग्लिश शिक्षा का समर्थन।
Post – 2017-02-26
क्या निहलानी का विरोध करने वालों में से किसी को यह पता है कि भोजपुरी में स्त्री के गुप्तांग को क्या कहते हैं? क्या पता है कि अंडर को अन्दर पढ़ा जा सकता है ? क्या पता है लैबिया मेजोरा का अर्थ क्या है? अर्थात् लैबिया का अर्थ लिप या ओठ होता है? लिपस्टिक का आकार अर्थ और उस पूरे शीर्षक का अर्थ बदल जाएगा । आप जूता निकाल कर निहलानी का विरोध करने वालों पीटना शुरू कर देंगे। निदेशक को तो अवश्य।
अधिक से अधिक लोग साझा करें. यह बदतमीजी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कह कर शोर मचाने वालों के खिलाफ मोर्चा है.
Post – 2017-02-26
मैं इन दिनों अपनी पुस्तक के तीसरे खंड का प्रूफ देख रहा हूं । सामने ३१.५.१६ की पोस्ट का एक अंश हैः
“अभी कल ही खबर आ रही थी कि किसी प्रतिष्ठित माने जाने वाले अस्पताल में आक्सीजन की जगह नाइट्रोजन की नली लगा दी गई और इसमें दो बच्चों की जान चली गई । यह शिक्षा प्रणालीको बताना है कि वह कौन सी नली लगा रही है कि ज्ञानका स्तरघटता गया है और विस्फोट का स्तर बढ़ता गया है और सारे डिग्रीधारी नौजवान िवस्फोटक गैस के इतने आदीहो गए हैं कि उसे अधिकाधिक मात्रा में पाने के लिए आन्दोलन कर रहे है ।”
मेरा विश्वास है कि िदल्ली विश्वविद्यालय या जनेवि के छात्रसंघ या िशसं के पास इसका जवाब देगा।