Post – 2016-08-09

गुल को हम खार न कहते थे मगर कहते हैं
तुमको हम यार न कहते थे ‍मगर कहते है।
ऐ सियासत तेरी मजबूरियां मालूम न थीं
घर को बाजार न कहते थे मगर कहते हैं।
ठोकरें कितनी थीं खाई तो होश आया था
हम छिपाते हैं हाल दिल का मगर कहते है।
तुम ही सोचो कि मुझे कहते थे पहले क्याे लोग
कहता था मत कहो भगवान मगर कहते हैं।
9 अगस्त. २०१६

Post – 2016-08-09

”शास्त्री जी यह बताइए आप लोगों का हाफपैंट कब उतरने वाला है।”
शास्त्री जी का चेहरा लाल। सर मेरा आपसे विचारों का मतभेद है, पर आपका इतने वरिष्ठ हैं आपके साथ दिल्लगी नहीं कर सकता। आप की डाक्साब से चलती है तो सुनने में मजा आता है, पर …”

मैंने बीच में हस्तक्षेप किया, “पैंट उतरने पर तुझे दीखेगा क्या यार! कभी तो सोचकर बोला कर.”

“नादानों से बात करने के यही तो खतरे हैं. पूरी बात समझने से पहले ही कूद पड़ते हैं. मैंने सुन रखा है की कुछ दिन के बाद शाखा में हाफ पैंट की जगह फुल पैंट चलेगी. जानना चाहता था इसमें कितना समय लगेगा और बनवानी पड़े तो फुल बनवायी जाये या हाफ.”

असंभव तो कुछ नहीं है तुमलोगों के लिए. जहां से टुकड़ा मिलता है उधर ही मुड जाते हो. देर मत करो, एक साथ ही दोनों बनवा लो. एक के ऊपर दूसरे को पहन कर शाखा में पहुँच जाना. ऊपर वाले को उतार कर तब तक अलग रखते जाना जब तक इसका चलन है पर दूसरों को धौंस में ले लेना किक तुम उनसे दूने शाखा चर हो. यही तो किया है, बाने और गाने के बल पर जब जो जी में आया बन गए.”

”मुझे अपने लिए कुछ नही करना. चिंता तुम्हारी थी. तुम्हारे लिए इतनी कुर्बानी तो दे ही सकता हूँ. सुना पांचजन्य के स्वाधीनता विशेषांक में तुम्हारे लिए कसीदे पढ़े गए हैं. जो रही सही कमी है वह भी पूरी हो जाय. यह पर्दा तो एक दिन उठना ही था. उठ गया. पहचान तो लें अब लोग अपने को मार्क्सवादी कह कर भारतीय कम्यूनिष्टों को कोसने वाले की असलियत क्या है. तुलसी दास की वह चौपाई क्या है यार भूल सी रही है ‘उघरे अंत न होंहि निबाहू. काल नेमि जिमि रावण रहू.’ यही है न इसका सही पाठ। ”

मैं सुनता रहा, मुस्‍कराता रहा, ” कीचड़ की गुणवत्‍ता पर बहस नहीं की जाती। उसका कीचड़ होना ही काफी है।” जब वह चुप हुआ तो इतना ही कहा । लेकिन वह सांस लेने के लिए रुका था। उसकी बात अभी पूरी नहीं हुई थी, हडि़या में कुछ और माल पड़ा रह गया था।

‘जानते हो मैं क्‍या करूंगा। तुम्‍हारी पैंट और हाफ पैंट दोनों सिलवाऊँगा, कपड़े की पसन्‍द तुम्‍हारी, खर्च मेरा, दर्जी की पसन्‍द मेरी और खर्च भी मेरा क्‍योंकि सिलवाऊँगा कुछ ढीला, कुछ वैसा जैसा खेत में धोखे को आदमी का भरम पैदा करने के लिए पहना दिया जाता है। और जब तुम पहन कर निकलोगे तो जो पैसा लगा है उसके बदले में सिर्फ एक फोटो लूँगा, और उस फोटो के नीचे लिखी होगी एक पैरोडी:
क्या छबि बरनूं आप की भले बने हो यार
दाढ़ी अपनी पोंछ ले टपक रही है लार ।”

अब उसकी बात पूरी हो गई थी। वह स्‍वयं तालियॉं बजाते हुए खड़ा हो गया था और चारों दिशाओं में घूम कर तालियां बजा रहा था। हँस तो उसकी पैरोडी और पैरोडी की भूमिका पर मैं भी रहा था, परन्‍तु इस खास मौके पर मैं गंभीर हो गया।

”तुम कुछ भी करो, उससे मैं रोक तो नहीं सकता, पर मित्र होने के नाते यह सलाह अवश्‍य दूंगा कि यह काम मत करना। इससे हमारी और तुम्‍हारी पहचान लुप्‍त हो जाएगी। लालाललित व्‍यक्तित्‍व ही तो तुम्‍हारी पहचान है। बहते रहे हो लाला लिप्‍त होकर और महिमा की पहचान यही रही है किसने कहां कहां से क्‍या क्‍या चखा। चिखनेश्‍वर इतनी महिमा पा लेते रहे हैं कि वे शरणागतों के विघ्‍नेश्‍वर तक बन जाते रहे हैं, परन्‍तु अादमी हो पाने की संभावनाओं से भी दूर खिसकते चले जाते रहे हैं। रसेतरे, रसा तले। यदि लालाला‍लित विचारकों, साहित्‍यकारों, पत्रकारो की तालिका बनाई जाए तो पुस्तिका का रूप ले लेगी।”

मुझे अपने भ्‍ाीतर से ही कशाघात लगा। ‘सच को कहने के लिए इतनी इबारतों की जरूरत नहीं होती। सोचो, चूक तुमसे क्‍या हुई थी या हो रही है।’

मैंने अन्‍तर्यामी को समझाया, ‘चूक तो हुई है। ऊपर से अप्रभावित दिखने का प्रयास करते हुए भी उसकी बत्‍तमीजी से खिन्‍न हो रहा था इसलिए उसको समझाने के लिए उसको उसकी औकात दिखाने की जरूरत अनुभव हुई।”

”क्षमा किया, पर यह मत भूला करो कि तुम हिन्‍दू हो और यह दर्प से अधिक एक उत्‍तरदायित्‍व है। मानवमात्र को मानवता का पाठ पढ़ाने का।”

मित्र बदले के लिए तड़प रहा था, बोला, मैं कुछ कहूं तो बुरा तो नहीं मानोगे।

मैंने कहा, अच्‍छा होता कुछ देर बाद कहते, मैं अभी किसी अन्‍य से संवाद कर रहा था। पर यदि तुमने छेड़ ही दिया तो तुम अपनी ही बात कहो।

देखो मैं तो अपनी बात कह रहा था, परन्‍तु तुमको क्‍या ऐसा नहीं लगता, तुम हिन्‍दुत्‍व के प्रवक्‍ता बनते जा रहे हो।

जानने की जरूरत नहीं अनुभव हुई क्‍योंकि मैं हिन्‍दू हूँ, हिन्‍दू होने पर न तो गर्व अनुभव करता हूँ न शर्म। यह मेरा चुनाव नहीं था, इस पर मेरा वश नहीं था। मैंने एक बार पहले भी कहा था कि जिस तरह दुनिया भौगोलिक और प्रशासनिक द़‍ृष्टियों से बँटी है उसी तरह भाव जगत धर्म, विश्‍वास और मूल्‍यप्रणालियों में विभाजित है। हम जिसमें पैदा होते हैं उसकी सभी चीजों को अच्‍छा मान लेते हैं। अच्छा मान लेने के बाद अपनी कमियों और‍ विकृतियों की भी हम यदि पूजा नहीं करते तो उनका समर्थन करने लगते हैं, समर्थन करने में खतरा होता है तो उन सवालों पर चुप रह जाते है जब कि जरूरत बोलने, अपनी भूल स्‍वीकार करने, उस भूल से बचने के संकल्‍प में होना चाहिए। यदि वह नहीं है तो तुम जो होने का दावा करते हो वह नहीं हो।”

”यही तो मैं भी कहता हूँ । हिन्‍दुत्‍ववादियों, पहले अपना घर इस हद तक सुधारो कि इसमें किसी तरह की विकृति न रह जाय और फिर मुझसे बात करो।”

”बिके हुए लोगों के पास आवाज नहीं होती, चिग्‍घाड़ होती है, और चिग्‍घाड़ से लोगों को डराया जा सकता है, समझाया नहीं जा सकता, अन्‍यथा तुम उन्‍हें और विश्‍व समाज को ऊपर उठाने के लिए हिन्‍दू मूल्‍यों और मानों की बात करते, मुझे हिन्‍दू न कह कर मानवतावादी मूल्‍यों का पहरेदार समझते और घर की विकृतियों को दूर करने का रास्‍ता भी उस गौरवशिखर तक पहुंचने की नई चुनौती के रूप में पेश करते।”

”क्‍या है वह चुनौती बताओगे। हिन्‍दू संकीर्णतावादियों को अपनी हद में रखने का कोई रास्‍ता सुझाओगे।”

”तुम नहीं जानते हिन्‍दू होना विश्‍वमानव होने का पर्याय है। यह अकेली मूल्‍यप्रणाली है जो विश्‍वविजय का लक्ष्‍य नहीं रखती, आत्‍मविजय से परिचालित है। उन मनोभावों और प्रवृत्तियों पर विजय जिसके बिना मनुष्‍य पशु बना रह जाता है और पशुता के असंख्‍य रूपों का विस्‍तार आज की सबसे गंभीर समस्‍या है।”

”यार तुम कोई बात तो सलीके से रखा करो। इस लफ्फाजी से बाहर निकलने का कोई रास्‍ता निकालो, या चुप रहा करो। मैं यह पहले भी कहता रहा हूँ।”

”आज तुम कल के मेरे आघात से कराहते हुए, बदले में जान देने की कीमत पर भी कुछ कमाल करने के इरादे से निकले थे, इसलिए दिमाग का कहने वाला कोना सक्रिय था ग्रहण करने और सोचने समझने वाले कोने सोये रह गये थे। आज कुछ कहँ तो तुम्‍हें मेरा कथन आत्‍मप्रशंसा लगेगा, इससे बचने के लिए इसे कल के लिए रखते हैं।”

वह सहमत हो गया।

Post – 2016-08-09

”शास्त्री जी यह बताइए आप लोगों का हाफपैंट कब उतरने वाला है।”
शास्त्री जी का चेहरा लाल। सर मेरा आपसे विचारों का मतभेद है, पर आपका इतने वरिष्टी हैं आपके साथ दिल्लिगी नहीं कर सकता। आप की डाक्सारब से चलती है तो सुनने में मजा आता है, पर
मैंने बीच में हस्तक्षेप किया, “पैंट उतरने पर तुझे दीखेगा क्या यार! कभी तो सोचकर बोला कर.”
“नादानों से बात करने के यही तो खतरे हैं. पूरी बात समझने से पहले ही कूद पड़ते हैं. मैंने सुन रखा है की कुछ दिन के बाद शाखा में हाफ पैंट की जगह फुल पैंट चलेगी. जानना चाहता था इसमें कितना समय लगेगा और बनवानी पड़े तो फूल बनवायी जाये या हाफ.”

असंभव तो कुछ नहीं है तुमलोगों के लिए. जहां से टुकड़ा मिलता है उधर ही मुड जाते हो. देर मत करो एकसाथ ही दोनों बनवा लो. एक के ऊपर दूरे को पहन कर शाखा में पहुँच जाना. ऊपर वाले को उतार कर तब तक अलग रखते जाना जब तक इसका चलन है पर दूसरों को धौंस में ले लेना की तुम उनसे दूने शाखा चर हो. यही तो किया है, बाने और गाने के बल पर जब जो जी में आया बन गए.”

मुझे अपने लिए कुछ नही करना. चिंता तुम्हारी थी. तुम्हारे लिए इतनी कुर्बानी तो दे ही सकता हूँ. सुना पांचजन्य के स्वाधीनता विशेषांक में तुम्हारे लिए कसीदे पढ़े गए हैं. जो रही सही कमी है वह भी पूरी हो जाय. यह पर्दा तो एक दिन उठना ही था. उठ गया. पहचान तो लें अब लोग अपने को मार्क्सवादी कह दर भारतीय कम्यूनिष्टों को कोसने वाले की असलियत क्या है. तुलसी दास की वह चौपाई क्या है उघारे अंत न होंहि निबाहू. काल नेमि जिमि रावण रहू. यही है न इसका सही पाठ।

मैं सुनता रहा, मुस्‍कराता रहा, ” कीचड़ की गुणवत्‍ता पर बहस नहीं की जाती। उसका कीचड़ होना ही काफी है।” जब वह चुप हुआ तो इतना ही कहा ।
लेकिन वह सांस लेने के लिए रुका था। उसकी बात अभी पूरी नहीं हुई थी, हडि़या में कुछ और माल पड़ा रह गया था।

‘जानते हो मैं क्‍या करूंगा। तुम्‍हारी पैंट और हाफ पैंट दोनों सिलवाऊँगा, कपड़े की पसन्‍द तुम्‍हारी, खर्च मेरा, दर्जी की पसन्‍द मेरी और खर्च भी मेरा क्‍योंकि सिलवाऊँगा कुछ ढीला, कुछ वैसा जैसा खेत में धोखे को आदमी का भरम पैदा करने के लिए पहना दिया जाता है। और जब तुम पहन कर निकलोगे तो जो पैसा लगा है उसके बदले में सिर्फ एक फोटो लूँगा, और उस फोटो के नीचे लिखी होगी एक पैरोडी:
क्या छबि बरनूं आप की भले बने हो यार
दाढ़ी अपनी पोंछ ले टपक रही है लार ।”

अब उसकी बात पूरी हो गई थी। वह स्‍वयं तालियॉं बजाते हुए खड़ा हो गया था और चारों दिशाओं में घूम कर तालियां बजा रहा था। हँस तो उसकी पैरोडी और पैरोडी की भूमिका पर मैं भी रहा था परन्‍तु इस खास मौके पर मैं गंभीर हो गया।
”तुम कुछ भी करो, उससे मैं रोक तो नहीं सकता, पर मित्र होने के नाते यह सलाह अवश्‍य दूंगा कि यह काम मत करना। इससे हमारी और तुम्‍हारी पहचान लुप्‍त हो जाएगी। लालाललित व्‍यक्तित्‍व ही तो तुम्‍हारी पहचान है। बहते रहे हो लाला लिप्‍त होकर और महिमा की पहचान यही रही है किसने कहां कहां से क्‍या क्‍या चखा। चिखनेश्‍वर इतनी महिमा पा लेते रहे हैं कि वे शरणागतों के विघ्‍नेश्‍वर तक बन जाते रहे हैं, परन्‍तु अादमी हो पाने की संभावनाओं से भी दूर खिसकते चले जाते रहे हैं। रसेतरे, रसा तले। यदि लाला ला‍लित विचारकों, साहित्‍यकारों, पत्रकारो की तालिका बनाई जाए तो पुस्तिका का रूप ले लेगी।”

मुझे अपने भ्‍ाीतर से ही कशाघात लगा। सच को कहने के लिए इतनी इबारतों की जरूरत नहीं होती। सोचो, चूक तुमसे क्‍या हुई थी या हो रही है।

मैंने अन्‍तर्यामी को समझाया, ‘चूक तो हुई है। ऊपर से अप्रभावित दिखने का प्रयास करते हुए भी उसकी बत्‍तमीजी से खिन्‍न हो रहा था इसलिए उसको समझाने के लिए उसको अपनी औकात दिखाने की जरूरत अनुभव हुई।”

”क्षमा किया, पर यह मत भूला करो कि तुम हिन्‍दू हो और यह दर्प से अधिक एक उत्‍तरदायित्‍व है। मानवमात्र को मानवता का पाठ पढ़ाने का।”

मित्र बदले के लिए तड़प रहा था, बोला, मैं कुछ कहूं तो बुरा तो नहीं मानोगे।

मैंने कहा, अच्‍छा होता कुछ देर बाद कहते, मैं अभी किसी अन्‍य से संवाद कर रहा था। पर यदि तुमने छेड़ ही दिया तो तुम अपनी ही बात कहो।

देखो मैं तो अपनी बात कह रहा था, परन्‍तु तुमको क्‍या ऐसा नहीं लगता, तुम हिन्‍दुत्‍व के प्रवक्‍ता बनते जा रहे हो।

जानने की जरूरत नहीं अनुभव हुई क्‍योंकि मैं हिन्‍दू हूँ, हिन्‍दू होने पर न तो गर्व अनुभव करता हूँ न शर्म। यह मेरा चुनाव नहीं था, इस पर मेरा वश नहीं था। मैंने एक बार पहले भी कहा था कि जिस तरह दुनिया भौगोलिक और प्रशासनिक द़‍ृष्टियों से बँटी है उसी तरह भाव जगत धर्म, विश्‍वास और मूल्‍यप्रणालियों में विभाजित है। हम जिसमें पैदा होते हैं उसकी सभी चीजों को अच्‍छा मान लेते हैं। अच्छा मान लेने के बाद अपनी कमियों और‍ विकृतियों की भी हम यदि पूजा नहीं करते तो उनका समर्थन करने लगते हैं, समर्थन करने में खतरा होता है तो उन सवालों पर चुप रह जाते है जब कि जरूरत बोलने, अपनी भूल स्‍वीकार करने, उस भूल से बचने के संकल्‍प में होना चाहिए। यदि वह नहीं है तो तुम जो होने का दावा करते हो वह नहीं हो।”

”यही तो मैं भी कहता हूँ । हिन्‍दुत्‍ववादियों, पहले अपना घर इस हद तक सुधारो कि इसमें किसी तरह की विकृति न रह जाय और फिर मुझसे बात करो।”

”बिके हुए लोगों के पास आवाज नहीं होती, चिग्‍घाड़ होती है, और चिग्‍घाड़ से लोगों को डराया जा सकता है, समझाया नहीं जा सकता, अन्‍यथा तुम उन्‍हें और विश्‍व समाज को ऊपर उठाने के लिए हिन्‍दू मूल्‍यों और मानों की बात करते, मुझे हिन्‍दू न कह कर मानवतावादी मूल्‍यों का पहरेदार समझते और घर की विकृतियों को दूर करने का रास्‍ता भी उस गौरवशिखर तक पहुंचने की नई चुनौती के रूप में पेश करते।”

”क्‍या है वह चुनौती बताओगे। हिन्‍दू संकीर्णतावादियों को अपनी हद में रखने का कोई रास्‍ता सुझाओगे।”

”तुम नहीं जानते हिन्‍दू होना विश्‍वमानव होने का पर्याय है। यह अकेली मूल्‍यप्रणाली है जो विश्‍वविजय का लक्ष्‍य नहीं रखती, आत्‍मविजय से परिचालित है। उन मनोभावों और प्रवृत्तियों पर विजय जिसके बिना मनुष्‍य पशु बना रह जाता है और पशुता के असंख्‍य रूपों का विस्‍तार आज की सबसे गंभीर समस्‍या है।”

”यार तुम कोई बात तो सलीके से रखा करो। इस लफ्फाजी से बाहर निकलने का कोई रास्‍ता निकालो, या चुप रहा करो। मैं यह पहले भी कहता रहा हूँ।”

”आज तुम कल के मेरे आघात से कराहते हुए, बदले में जान देने की कीमत पर भी कुछ कमाल करने के इरादे से निकले थे, इसलिए दिमाग का कहने वाला कोना सक्रिय था सोचने समझने वाला सोया रह गया था। आज कुछ कहँ तो तुम्‍हें मेरा कथन आत्‍मप्रशंसा लगेगा, इससे बचने के लिए इसे कल के लिए रखते

Post – 2016-08-09

कल जो पोस्‍ट किसी के हस्‍तक्षेप के कारण, उधर मुड़ने पर उड़ गई थी और जिसे मैंने जैसे तैसे पूरा किया, उसको समाहार के रूप में आज उसमें खंड 2 बना कर कल की पोस्‍ट में जोड़ दिया है। जिन मित्रों ने उसे पहले देख लिया है वे चाहें तो इतने अंश को देखने के लिए मेरी पोस्‍ट पर जा सकते हैं।

Post – 2016-08-08

निदान – 15

(मैंने जो लिखा था वह बीच में मित्रों की पोस्‍ट पर ध्‍यान देने के कारण लुप्‍त हो गया। कृपया यह न बताएं कि अापके मन्‍तव्‍य क्‍या हैं। मैं लाइक करने वाले प्रत्‍येक व्‍यक्ति को देखता हूं यह जानने के लिए कि किस रुचि, प्रकृति अौर पूर्वराग के लोग इसे पसन्‍द कर रहे हैं। मैं आप सबका आभारी हूं पर आज की पोस्‍ट वह तो नहीं जो लिखी गई थी।)

”तुम लाख बचाओ मुझको सनम हम अपना कबाड़ा कर लेंगे। यह शेर तुमने पहले कभी सुना है।
मैं नहीं कहने जा रहा था, पर मेरे मुंह से ‘न’ निकला ही था कि वह दाखिल हो गया, ”मैं भी जानता था, न सुना होगा क्योकि यह मेरा है और मैंने अभी अभी इसे गढ़ा है तुम्हारी और मोदी की मरम्मरत के लिए।”
मैं हक्क बक्का उसे देखने लगा क्योंकि कोई सिरा पकड़ में नहीं आ रहा था।
”तुम तीन तेरह करके उस आदमी को बचाना चाहते हो, वह आदमी फन्दा हाथ मे लिए घूम रहा है कि आओ और मुझे लटका दो। एकदम बौखला गया है, तुम बचाना चाहो तो भी बचा नहीं पाओगे। सुना आज क्या कहा, कहा, अगर गोली मारनी है तो मेरे दलित भाइयों को गोली मारने की जगह मुझे गोली मार दो। बोलो, बचा सकोगे।”
”इतना पुराना साथ है, तब से जब मोदी स्कूल में पढ़ रहे होंगे, मैं तो तुमको सड़ने से नहीं बचा सका, तो उस आदमी को छाती तानने के कैसे रोक सकता हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि नफरत की फसल उगाने का जो काम तुम लोगों ने जिनके लिए सेक्यु लरिस्ट , शब्द को प्रयोग होता है, ब्रिटेन से विरासत में पाई है, उसको निर्विष करने का कोई रसायन मोदी के पास नहीं है, सिवाय उस सीने को चीर कर दिखाने के जिसे केवल पुराणकथा में ही हनुमान कर सके थे। सीता की आँखें तुम्हारी ही तरह फूटी होतीं तो उन्हें उस फटे हुए वक्ष के भीतर राम न दिखाई दिए होते, जैसे तुमको मोदी की दलित वेदना न दिखाई देती होगी, और दिखाई दे रही है तो बौखलाहट बन कर ।”
वह हँसने लगा, ”यार लफ्फाजी तेरी लाजवाब है, पर यह बता, सच्चे दिल से बताना, तुम्हेंँ मोदी ने क्या खिला दिया है कि उसका नाम आते ही तू ”जान हथेली पर ले आया।” गाने लगते हो। जानते हो इससे तुमने साहित्य जगत में अपनी साख कितनी गँवाई है।”
”तुम सवाल भी करते हो और जवाब भी दे देते हो। तुम्हीं कह रहे हो मैंने गँवाया है, पाया या खाया नहीं है । मैं गँवाने वालों की जमात का एक अदना सदस्य हूँ जो चाहते हैं, मैं मर जाऊँ पर मेरे देश और समाज को खरोंच न आए। मोदी मेरा नेता नहीं, उस जमात में शामिल एक अदना सदस्य है पर जीवट और अध्यवसाय उसमें मुझसे बहुत अधिक है और जितने दबावों के बीच वह जीवट बना रहता है उसे देखता हूँ तो मुझे वह मुझसे ही नहीं, रामविलास शर्मा से भी बड़ा लगता है जिनका कहना था मुझे मत याद रखो परन्तु मेरे विचारों को समझो, इनको आगे ले जाओ। मैं तो रामविलास जी से उम्र में भी छोटा हूँ और यश में भी, परन्तु यह आदमी हम दोनों से हर तरह से छोटा होते हुए भी इतना अलग और उन आग में तप कर भी जिसमें कच्चेे कलेजे और कच्ची समझ और कच्चे इरादे के लोग भस्म, हो जाते है अग्निशुद्ध निकला है। इस आँच के निकट हम गए भी नहीं, उससे हमे गुजरना भी नहीं पड़ा। ”
वह ताली बजा कर हँसने लगा, ”चापलूसी सी चापलूसी है फिर भी भगवान की जबाँ से है।”
”देखो, तुम को अपना इतिहास याद रखना चाहिए, क्यों कि तुम अपने दर्शन को ऐतिहासिक और द्वन्द्वात्म क भौतिकवाद कहते हो। इतिहास तुम्हा रा यह है कि जो सत्ता में रहा उसकी इस हद तक चापलूसी की कि उसका दिमाग अपनी महिमा के बोझ के नीचे दब कर पिचक गया और वह उन लोगों को भी तलाश कर मारने, सताने और निर्मूल करने लगे जिन्होने आन्दोलन में उसका साथ दिया था। उसके सत्ता से अलग होते ही तुम उनका मानमर्दन और अगले की विरुद गाथा में जुट गए। अब जब कोई नहीं है जिससे कुछ मिल सके तो मैं यह पहले भी कह आया हूँ, अमरीका केवल अमरीका, कटा रूस से साथ सभी का। गाते हुए जगह बना रहे हो और कभी जैसे रूस की खाकर रूस की गाते थे उसी तरह आज अमरीका की खाकर उसकी गाते और उसके प्रोग्राम का हिस्सा बन कर अपने ही देश के विरुद्ध कार्यक्रमों में हिस्सा बँटाते हो, अपनी उपस्थिति संचार माध्यमो से दर्ज कराते हो, और जो ध्यावे फल पावे कष्ट मिटे तन का लाभ उठाते हो। गलत कहा मैंने।
हम दोनों की एक समस्‍या है, दूसरी पार्टियों और संगठनों की भी यही विवशता है। गलत वे होते नहीं, सही वे हो नहीं सकते। वे अपनी नजर में सही होते हुए भी नतीजों से अपने सही गलत होने को परखने का प्रयत्‍न नहीं करते। मैं नहीं कहता, पूरा देश कह रहा था तुम गलत हो और उसने एक ऐसे व्‍यक्ति को चुना जिसे तुम काम करने नहीं देते और सवाल करते हो, परिणाम तो दिखाओ। परिणाम देश के लिए अहितकर हों तो उस पर जश्‍न मनाते हो। देश का बुरा हुआ, यह तुम्‍हें अच्‍छा लगता है, क्‍योंकि इस तरह की चूक से तुमको विश्‍वास पैदा होता है कि सड़े तो हैं यह जाहिर है मगर हम मर नहीं सकते। मेरा हित देश का हित इससे आगे बढ़ नहीं सकते।”
जिसकी तुम बात कर रहे हो उसे सियासत कहते हैं। हमारी मूल्‍यपरंपरा का शब्‍द नहीं है इसलिए इसका अर्थ होता है गर्हित से गहर्ति साधन का उपयोग करते हुए सत्‍ता पर अधिकार और उसे बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक गिरने की तैयारी। तुम जिस मोदी से नफरत करते हो वह राजनीति करता है, देश और समाज को आगे ले जाने की चिन्‍ता से ग्रस्‍त है। तुम लोग, तुम सभी, तानाशाही के समर्थक हो। मोदी लोकतन्‍त्रवादी है। तुम लोकतन्‍त्र को प्रचार साधनों से जिनकी गर्हणा की कहानिया उनके पवित्र प्रोग्रामों के बाद के प्रोग्राम कहते हैं, उनके माध्‍यम से लोकतान्त्रिक विकल्‍प को मिटाना चाहते हो, मोदी उसे जीवित रखना चाहता है। जिस कश्‍मीर में लोकतांत्रिक विकल्‍प का उसने सम्‍मान किया उसकी समस्‍याओं के लिए लगातार सभी संचारमाध्‍यम और विचार माध्‍यम कटाक्ष करते रहे कि पीडीपी से मिल कर सरकार चलाने की कीमत चुकाओ और उकसाते रहे कि सरकार को खत्‍म करके राष्‍ट्रपति शासन लगाओ उसमें जहर के घूंट पीते हुए भी वह लोकतन्‍त्र की रक्षा करता रहा और हताशाओं के बवंडरों के बीच न हारा, न झुका और न पीछे हटा। मुझे उसके कहे और किए पर विश्‍वास है क्‍योंकि दोनों में फांक नहीं है। राजनीति आजकल सबसे लाभकर उद्योग बना दिया गया है। बिना पूँजी के, फेफड़ के जाेर और दिमाग और उच्‍च सरोकारों को तिलांजलि दे कर मालामाल होने और इस तिजारत को खानदानी बनाने की कला, उसमें वह बिना बाेले एक निवेदन बन जाता है, इस अंधेरे में अकेले मैं दिया हूँ / मत बुझाओ/ जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी।”
और जानते हो हम इस पंक्ति को किस तरह पढ़ते हैं : रोशनी में धुंध बन कर मैं खड़ा हूँ/ मत हटाओं । जब मिलेगी चांदनी मुझसे मिलेगी।”
”अपनी अपनी किस्‍मत अपना अपना प्राप्‍य । क्‍या कहा जा सकता है।”

2
वह चलने को हुआ तो मैंने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया। मेरा मन बहुत खिन्‍न था। पीडि़त स्‍वर में ही मैंने कहा, ”देखो हमने बहुत लंबे संघर्ष के बाद यह स्‍वतन्‍त्रता पाई और इसमें लोकतन्‍त्र बचा रहे इसके इतने सारे जुगाड़ इसलिए कर
रखे हैं कि तानाशाही के खतरे सामने थे। मुस्लिम लीग में तो बहुत पहले से लोकतन्‍त्र के प्रति नफरत थी, अत: यदि पाकिस्‍तान तानाशाही का शिकार हआ तो हैरानी की बात नहीं। जिसे तुम मोदी मोदी समझते हो वह मेरे भीतर का लोकतन्‍त्र लोकतन्‍त्र का चीत्‍कार है। तुम्‍हारे यहां तो लोकतन्‍त्र को पूंजीवादी तन्‍त्र माना जाता है, गुलामी के आदी हो चुके देश और समाज भी मैसोकिस्‍ट होते हैं। उनको हंटर लगाने वाले एक तानाशाह की जरूरत होती है, जरूरत भी तड़प की हद तक। पहले दिन से, इस व्‍यक्ति के चुनाव प्रचार से पहले जनभावना ने उसे अपना भावी प्रधान मन्‍त्री चुन लिया था। उसी समय से लगातार हाहाकार मचाते रहे तुम लोग। उसी दिन से कांग्रेस में सन्निपात ग्रस्‍तता आ गई थी और अंड बंड ऐसे फैसले लिए जा रहे थे कि जो जुए की बाजी जैसे थे और जिनसे अर्थव्‍यवस्‍था इतनी जर्जर हो जाय कि संभाले न संभले। पर यह पहला आदमी है जो तुमसे लगातार भाजपा के शासन को कायम रखने के लिए नहीं, लोकतन्‍त्र की आत्‍मा को बचाए रखने की जंग लड़ रहा है। देश और समाज की तो तुम्‍हें चिन्‍ता रही नहीं परन्‍तु गुंडागर्दी के हथकंडों से लोकतन्‍त्र को नष्‍ट करने के उपक्रम जो तुम लोग कर रहे हो, उससे बचाओ। इसे हासिल करने के लिए खून तो बहा नहीं सके, बचाए रखने के लिए पसीना तक नहीं बहाया, कुर्सीक्रान्ति करते रहे, पर हम इसे बचाए रख सकें, इसके लिए अपनी लार को तो रोक कर रखो। तुम लोगों को देख कर मुझे बार बार पाव्‍लोव का रिफ्लेक्‍स ऐक्‍शन याद आता है।
यह आदमी जितना जनता का विश्‍वास उसमें बना हुआ है और लगातार बढ़ रहा है क्‍योंकि अपनी ऊलउजूल हरकतों से तुम लोक स्‍वत: निस्‍तेज होते जा रहे हो।
पहला व्‍यक्ति है जो तपस्‍वीकी तरह आज तक समाज सेवा की अपनी समझ के अनुसार लड़ा है। तुम्‍हें पता है नेहरू का खाना राष्‍ट्रपति के रसोई घर से जाता था, यह अपनी रोटी स्‍वयं पकाता है अपने आटा चावल से। प्रलोभन भी यदि है तो देश हित के लिए जीवन उत्‍सर्ग करने का। निन्‍दक और चुगलखोर किसी भी सद्गुण को दुर्गुण बता सकते हैं, सिद्ध कर सकते है, यह दो हजार साल पहले भर्तृहरि बता आए हैं। तुम काम को देखो, उन्‍हें परिभाषित मत करो। जहां चूक हो उसकी और केवल उसकी आलोचना करो। यह पहला प्रधानमंन्‍त्री है जो कुलीन नहीं है, जिसका कोई न कुल है न बिरादरी जिसकी राजनीति कर सके। यह पहला प्रधान मंत्री है जो कैरियर की तलाश के घर छोड़ कर नहीं, सत्‍य और सार्थकता की तलाश में निकला था और वहां उसे ऐसे गुरु उसके सौभाग्‍य से मिले जिन्‍होंने उसे मन्‍त्र दिया कि इसकी तलाश जीवन और समाज के हित में करो। सियासत करने के आदी लोगों के बीच वह अकेला राजनीति करता है। उसे काम करने दो। उपद्रवकारी बन कर व्‍यवधान मत डालो। लोकतन्‍त्र में मेरी निष्‍ठा इस व्‍यक्ति के प्रति आत्‍मीयता जगाती है, इसे रालतन्‍त्र पर पलने वाले नहीं समझ सकते।

Post – 2016-08-08

निदान – 15

विल्‍वामंगल के देश का समाजशास्‍त्र

”यह आदमी तो सचमुच बौखला गया है यार । कहता है, दलितों की हत्‍या करने की जगह मेरी हत्‍या कर दो।”

और तुम्‍हारी योजना में क्‍या है, दलितो का इस्‍तेमाल करने के लिए उनको पागल बना दो और किनारे खड़े तमाशा देखा। क्‍योंकि तुम्‍हारे पास ले द

Post – 2016-08-07

”कल तो मजा आ गया । मोदी ने राजनीतिक आत्‍महत्‍या कर ही ली।”

”पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट साथ लाये हो।”

”उसकी जरूरत क्‍या है। पट्ठे ने खुले आम रिवाल्‍वर निकाली, कनपटी पर लगा कर गोली दाग दी। देखने वाले सन्‍न रह गए।”

मुझे पता था, उसका इशारा किस तरफ था, ”गोली देश हित में मारी हो तब तो इसे आत्‍म बलिदान कहा जाएगा। उन्‍हें हुतात्‍मा। राष्‍ट्रीय शोक का विषय है, तुमको इसमें मजा आ रहा है। यदि देश और समाज को क्षति पहुंचाने के लिए तो तुमको उस कृत्‍य का समर्थन करना चाहिए जिसकी वह निन्‍दा या विरोध कर रहे थे।

इस खेल में मैं क्‍यों उलझने जाता। हम तो मजा लेने वालों में है। दुश्‍मन का घर जले तो अपना न भी बने पर हमारी स्थिति उससे बेहतर तो रहेगी।”

”कितने लंबे अरसे से प्रतीक्षा कर रहे थे इस घड़ी की? कितने लंबे समय से आयोजन चल रहा था ऐसी स्थिति पैदा करने की ? कितना खर्च उठाना पड़ा तुम्‍हें या इसके आयोजकों को ? आखिर यह खेल तो गुंडों और उचक्‍कों का ही था जिनको पैसा दे कर उनसे कुछ भी कराया जा सकता है। सुना यही मोदी जी ने भी अपने भाषण में कहा था।”

”इससे अधिक बड़ा आत्‍मघात क्‍या हो सकता है कि वह भला आदमी अपने ही लोगों के साथ विश्‍वासघात कर बैठा। वह अपने ही काडर को गुंडा और चोर बता रहा था।”

”तुमको तो आज पार्क में नाचते गाते हुए आना चाहिए था। पर तुम यह समझो कि यह आदमी न आत्‍महत्‍या कर सकता है न आत्‍महत्‍या के लिए उकसा सकता है। इसने आत्‍महत्‍या के लिए सीना तान कर आ रही पीढि़यों को पहली बार यह समझाया है कि इस पर पुनर्विचार करो। यह तरीका ठीक नहीं। अपना भला करने की सोचो और उसमें हमसे जो संभव होगा तुम्‍हारी सहायता करूंगा। पर इसका व्‍यक्तित्‍व ही ऐसा है कि इस अन्‍देशे से ही कि वह आ रहा है दल के दल आत्‍महत्‍या कर लेते हैं और उन्‍हीं में तुम्हारा दल भी है।”

”तुम जानते ही नहीं कि गाय को ले कर उसकी पार्टी और संगठन की संवेदनाएं इतनी प्रखर हैं कि गो रक्षकों पर इस तरह की टिप्‍पणी के बाद उसके ही लाेग उसका साथ छोड़ जाएंगे।”

”मैंने एक बार कहा था न कि वह अब तक का सबसे अनुभवी, सबसे सुपात्र प्रधानमन्‍त्री है, प्रशिक्षण की उस दीर्घ और तपाने वाली प्रक्रिया से निकला हुआ, जिसमें अन्‍तर्दृष्टि पैदा होती है, सपने पैदा होते हैं और उस सपनों काे साकार करने का हौसला पैदा होता है। वह छोटी चीज से सन्‍तुष्‍ट नहीं रह सकता। वह हिन्‍दू राष्‍ट्र से आगे, भारतीय राष्‍ट्र की बात सोचता है, भारतीय मंच पर उपस्थिति से सन्‍तुष्‍ट न रह कर विश्‍वमंच पर अपनी उपस्थिति मोटे अक्षरों में अंकित कराना चाहता है । उसके ये इरादे देश के भाग्‍य से जुड़े हैं, उसकी शक्ति और स्‍वाभिमान से जुड़े हैं और इसीलिए अपने देश और समाज का भला चाहने वालों को उसका साथ देना चाहिए।”

”साथ का क्‍या मतलब ? हम अपने दुश्‍मन का साथ क्‍यों देंगे ?”

”तुमको उसका नहीं, अपने देशहित का साथ देना है। वह किसी के हाथों हो रहा हो। जिसके हाथों हो रहा है उसका तब तक साथ देना चाहिए जब तक उससे देश का भला हो रहा हो। इसलिए उसकी गुणदाेषपरक आलोचना करनी चाहिए। जो काम ठीक है उन्‍हें ठीक कहना चाहिए। उनका इरादा खुद ही कल्पित करके उसे खारिज कर दोगे तो हो सकता है तुम्‍हारा यह निर्णय सही हो, परन्‍तु इसे अपने पक्ष में करने के लिए ऐसा विश्‍लेषण करना होगा जिससे वे लोग जो तुम्‍हारे जैसे विलक्षण प्रतिभा वाले हैं, वे भी समझ सकें। यह तुम अपने पाठकों की विश्‍वसनीयता अर्जित करने के बाद ही कर सकते हाे। साथ देने में ये दोनों बातें शामिल हैं। साथ देकर ही तुम समाज के साथ भी रह सकते हो और अपने साथ भी। यदि नहीं हुए तो लोग तुम्‍हारा साथ छोड़ जाएंगे और तुम्‍हें आत्‍महत्‍या का गौरव भी नहीं प्राप्‍त होगा। तुम्‍हारी सड़ती हुई लाश की दुर्गन्‍ध जब असह्य हा जाएगी तब लोगों को पता चलेगा तुम्‍हारी मृत्‍यु बहुत पहले हो चुकी है। सही समय पर तुम्‍हारी मौत की नोटिस तक नहीं ली जा सकी।”

”क्‍या बत्‍तमीजी करते हो। तुम जानते हो कह क्‍या रहे हो। तुम दुनिया से ऊपर हो। सारे बुद्धिजीवी जिसे गलत कह रहे हैं उसे तुम सही बता रहे हो और खीझ का हमारे संगठनों को श्राप दे रहे हो।” वह बौख्‍ाला उठा । मैं यही तो चाहता था।

”मैं तुम्हारे भले की सोच रहा था और य‍ह याद दिला रहा था कि पिछले पचीस सालों से मैंने तुम्‍हारे संगठन और उससे जुडे लोगों के विषय में जो तब मेरे अपने संगठन और मित्र भी हुआ करते थे, आगाह किया था कि इन हरकतों का यह परिणाम होगा। मैं जानता था इतना बड़ा संगठन होते हुए मुझ जैसे उपेक्षित व्‍यक्ति की बात नहीं सुनोगे। पर यह प्रकाशित है और इसे पेश किया जा सकता है कि मेरी, अकेले की, भविष्‍यवाणी जो भविष्‍यवाणी नहीं अपितु तार्किक परिणति का संकेत था, सही निकला। अपनी अदना हैसियत के कारण आज भी तुम मेरी बात न मान कर संख्‍या गिनाओगे। विचारों में लोकतन्‍त्र नहीं चलता, तार्किक संगति चलती है। मैं तुम्‍हें एक बड़े आदमी का उदाहरण दे कर अपनी बात रखूं तो संभव है तुम मेरी बात सकझ सको, गो यकीन फिर भी नहीं हैं।”

”अपनी बात तो कह यार। सिर खा जाता है।”

”तुम जानते हो, आइंस्‍टाइन आज भी एक आश्‍चर्यजनक मेधा हैं, परन्‍तु उनके जीवन काल में उनको लगातार शंकालुओं और विरोधियों का सामना करना पड़ा। जब वह सर्वमान्‍य से हो चले थे उस समय भी उनको सन्‍देहवादियों का सामना करना पड़ा। इसे स्टिफेन हाकिंंग के शब्दों को बिना एक भी अक्षर बदले रखूं तो वह निम्‍न प्रकार है:
Once more unpopularity did not stop from speaking his mind. His theories came under attack An anti-Einsten organization was even set up. One man was convicted of inciting others to murder Einstein (and fined a mere six dollars). But Eienstein was phlegmatic: when a book was published entitled Hundred Authors against Einstein , he retorted, “If i were wrong then one would have been enough.

”सांप्रदायिकता और बांटो और राज करो की नीति पर आरंभ से आज तक चलती आई राजनीति को एक नई दिशा में मोड़ने और ले जाने के लिए जिस विजन और साहस की जरूरत होती है वह उस अकेले आदमी में है और सबसे बड़ा दोष मुझे यही लगता है कि वह अपने ढंग का अकेला आदमी है और दूसरे उसकी तुलना में जिस हैसियत के थे उससे उनकी हैसियत घटी है। ऐसे ही लोग कभी कई बार अतिविश्‍वास के शिकार हो कर तानाशाह हो जाते हैं और इसकी संभावना अवश्‍य उस व्‍यक्ति में दिखाई देती है।”

”इसे तो हम पहले दिन से समझते हैं, तुमको आगाह भी करते आए हैं, और यह मामूली सी बात समझने में तुमने इतना समय लगा दिया।”

”तुम न तब कुछ समझते थे न अब कुछ समझते हो। पहले तुम्‍हारे भीतर भरी गई घृणा के जहर का झाग बाहर आ रहा था, तिलमिला रहे थे तुम, तड़प और छटपटा रहे थे तुम, अपने ही जहर के सेवन से। तिलमिलाता और छटपटाता हुआ आदमी सोच कैसे सकता है और तुम्‍हारी भविष्‍यवाणी लगातार झूठी साबित होती रही, वह अपने कौल और करार पर प्रत्‍यके परीक्षा में सफल सिद्ध होता गया और उसी अनुपात में तुम्‍हारी छटपटाहट बढ़ती गई, आज भी छटपटाहट बनी हुई है।”

तुम्‍हारे ऊपर कैसे विश्‍वास कर सकता हूं। तुम्‍हारे इस हंगामे की वजह से लोगों को उस व्‍यक्ति को समझने में बाधा पड़ी है। वह जो करना चाहता है उसमें बाधा पड़ी है, परन्‍तु इस आदमी में अपनी मनोबधाओं को भी समझने और उन्‍हें पार करने का साहस है और बाहरी बाधाओं से निबटने की भी दक्षता हासिल है। वह अपने लाेगों को भी अपनी कमियों को दूर करने का समय देता है और दूसरों के लिए भी ऐसा वातावरण तैयार करने का प्रयत्‍न करता है कि वे अपनी पुरानी गलतियों को समझें और नई महत्‍वाकांक्षा से लैस हो कर आगे बढ़ें, पुराने झगड़ों की दलदल में फंस कर अधोगति की ओर न जांय। उसके इस सन्‍देश को भी पहुंचाने का माध्‍यम बनने की जगह तुम उसे उलट कर दहशत फैलाने में अपनी शक्ति का अपव्‍यय करते हो और थक कर अपनी ही नजर में क्रमश: व्‍यर्थ और अप्रासंगिक सिद्ध होते हुए शिफर बनने की ओर की यात्रा करते हो।

”बात बात पर तुम्‍हारे भीतर का सोया हुआ चारण क्‍यों जाग जाता है भाई। तुम यह क्‍यों नहीं देखते कि जिस भावुकता को उभार कर संघ और इससे जुड़े संगठन हिन्‍दू समाज को अपने से जोड़ते रहे हैं उसे ही उसने दलितों और मुसलमानों को अपने साथ लाने के लिए इतनी बड़ी चूक कर दी। वे इसके साथ आने वाले नहीं और जो अपने थे वे भी हाथ से गए । अब इसकी छुट्टी तय है।”

मैं जानता हूं हिन्‍दू समाज में एक शहरी और पुजारी वर्ग है, वह वर्ग जिसने गाय का दूध पिया है पर गाय पाला नहीं या पाला भी तो उसका गोबर तक उठाया नहीं होगा। इनका ह़दय मोम का है, थोड़ी सी आंच में पिघल जाता है और उतनी ही आसानी से ठंड में पत्‍थर बन जाता है, यह परजीवी वर्ग ही गाय को लेकर अतिसंवेदी रहा है। किसान या गोपालक अपने जानवरों को प्‍यार करता है संवेदनशील भी होता है पर उसमें वह बौखलाहट नहीं होती है क्‍योंकि वह गोपालन और किसानी अर्थतन्‍त्र के कई ऐसे कड़वे पक्षों से परिचित होता है जिसमें चारे के अभाव में, मौसम की मार में, यह तय नहीं कर पाता कि वह अपने ही जानवरों में से किसको बचाये, किसको मरने को छोड़ दे। अघा सु हन्‍यते गाव:, यह अघा हमारा परिचित मा
घ का मघा नक्षत्र है जिसमें कमजोर, बीमार और चारे की कमी के कारण गोरू बड़े पैमाने पर मरते थे। इन अनुभवों के कारण उसकी प्रतिक्रिया उन्‍हीं सवालों को लेकर अधिक परिपक्‍व होती है। उसकी भी जो अपने बूढ़े, बेकार डंगरों को किसी कीमत पर किसी को बेचने या देने को तैयार नहीं होता, क्‍योंकि वह यह जानता है कि इसके लिए उसे कितनी भारी कीमत चुकानी और कैसी असुविधाओं का सामना करना पड़ता है और यदि किसी दूसरे से इसका निर्वाह नहीं हो पाता तो उसके बारे में वह ओछी राय तो बना लेता है, भर्त्‍सना भी कर बैठता है, परन्‍तु हंगामा नहीं मचाता। यदि इसी प्रश्‍न को तुम जीवन मरण का प्रश्‍न बनाना चाहो तो पाओगे उसके समर्थकों में अधिक वृद्धि हुई है। परन्‍तु वह आदमी जो मोम के पुतलाें को भी संभालने का प्रयत्‍न करता है कि उन्‍हें कोई खरोंच न आए, वह फौलादी स्‍वभाव का है और बड़े फैसले कर सकता है और उन फैसलों के साथ लोगों को जोड़ सकता है।”

”जोड़ता रहे, परन्‍तु हमें तो इस बात पर प्रसन्‍नता है कि भाई का जनाधार गया और इनका पत्‍ता साफ हुआ ।”

”और भ्रष्‍टता और कदाचार के उन सुनहले दिनों की वापसी हुई जिसमें तुम अधिक सुकून से रह लेते थे। कितनी ओछी समझ है और कैसे ओछे लोग है जो सांप्रदायिक आग को इस लिए जिलाए रखना चाहते हैं क्‍योंकि उनमें विजन का ऐसा अभाव हो गया है कि अपने को जिन्‍दा रखने के लिए भी कोई कारगर मुद्दा नहीं तलाश सकते। सांप्रदायिकता को अपनी ओर से उकसाते रहते हैं कि उसके विरोध के नाम पर उनको कुछ दिन और सांस लेने का मौका मिल सकता है। यदि तुम्‍हें पता है कि इस आदमी ने देश हित में इतना बड़ा फैसला लिया है जो उसके लिए ही खतरा बन सकता है तो कम से कम एेसे फैसलों पर तो तुम्‍हें उसके साथ एकजुटता दिखानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं कर पाते तो तुम गर्हित उसे सिद्ध करना चाहते हो, गर्हित स्‍वयं सिद्ध होते जा रहे हो, और इसका पता तक नहीं। आनन्‍द ही आनन्‍द है। सड़ने से पहले का क्षणिक आनन्‍द।

Post – 2016-08-07

सभी रहते हैं अपनी ही जमीं पर आसमानों मे
मैं अपने आसमां को सबसे ऊंचा और बड़ा समझा ।
जमाने को समझता क्‍या जमीं को जब नहीं समझा
तुम्‍हीं देखो कि तुम क्‍या थे और मैंने तुमकाे क्‍या समझा ।
बड़ी मुश्किल में जां थी जान के दुश्‍मन हजारों थे
मगर हर दुश्‍मने जां को मैं अपना और सगा समझा।
मिले धोखों पर धोखे फिर भी इत्‍मीनान कायम था
पिया जहराब उससे आबे जमजम का मजा समझा ।
कहाँ की बात करते किस समय की बात करते हो
अरे भगवान तूने आदमी को ही कहां समझा।
*** *** ***
हम न समझेंगे तुम्‍हारी बात फिर भी देखना
तुमको समझाएंगे तुमको क्‍यों समझ पाया नहीं।

Post – 2016-08-07

”कल तो मजा आ गया । मोदी ने राजनीतिक आत्‍महत्‍या कर ही ली।”

”पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट साथ लाये हो।”

”उसकी जरूरत क्‍या है। पट्ठे ने खुले आम रिवाल्‍वर निकाली, कनपटी पर लगा कर गोली दाग दी। देखने वाले सन्‍न रह गए।”

मुझे पता था, उसका इशारा किस तरफ था, ”गोली देश हित में मारी हो तब तो इसे आत्‍म बलिदान कहा जाएगा। उन्‍हें हुतात्‍मा। राष्‍ट्रीय शोक का विषय है, तुमको इसमें मजा आ रहा है। यदि देश और समाज को क्षति पहुंचाने के लिए तो तुमको उस कृत्‍य का समर्थन करना चाहिए जिसकी वह निन्‍दा या विरोध कर रहे थे।

इस खेल में मैं क्‍यों उलझने जाता। हम तो मजा लेने वालों में है। दुश्‍मन का घर जले तो अपना न भी बने पर हमारी स्थिति उससे बेहतर तो रहेगी।”

”कितने लंबे अरसे से प्रतीक्षा कर रहे थे इस घड़ी की? कितने लंबे समय से आयोजन चल रहा था ऐसी स्थिति पैदा करने की ? कितना खर्च उठाना पड़ा तुम्‍हें या इसके आयोजकों को ? आखिर यह खेल तो गुंडों और उचक्‍कों का ही था जिनको पैसा दे कर उनसे कुछ भी कराया जा सकता है। सुना यही मोदी जी ने भी अपने भाषण में कहा था।”

”इससे अधिक बड़ा आत्‍मघात क्‍या हो सकता है कि वह भला आदमी अपने ही लोगों के साथ विश्‍वासघात कर बैठा। वह अपने ही काडर को गुंडा और चोर बता रहा था।”

”तुमको तो आज पार्क में नाचते गाते हुए आना चाहिए था। पर तुम यह समझो कि यह आदमी न आत्‍महत्‍या कर सकता है न आत्‍महत्‍या के लिए उकसा सकता है। इसने आत्‍महत्‍या के लिए सीना तान कर आ रही पीढि़यों को पहली बार यह समझाया है कि इस पर पुनर्विचार करो। यह तरीका ठीक नहीं। अपना भला करने की सोचो और उसमें हमसे जो संभव होगा तुम्‍हारी सहायता करूंगा। पर इसका व्‍यक्तित्‍व ही ऐसा है कि इस अन्‍देशे से ही कि वह आ रहा है दल के दल आत्‍महत्‍या कर लेते हैं और उन्‍हीं में तुम्हारा दल भी है।”

”तुम जानते ही नहीं कि गाय को ले कर उसकी पार्टी और संगठन की संवेदनाएं इतनी प्रखर हैं कि गो रक्षकों पर इस तरह की टिप्‍पणी के बाद उसके ही लाेग उसका साथ छोड़ जाएंगे।”

”मैंने एक बार कहा था न कि वह अब तक का सबसे अनुभवी, सबसे सुपात्र प्रधानमन्‍त्री है, प्रशिक्षण की उस दीर्घ और तपाने वाली प्रक्रिया से निकला हुआ, जिसमें अन्‍तर्दृष्टि पैदा होती है, सपने पैदा होते हैं और उस सपनों काे साकार करने का हौसला पैदा होता है। वह छोटी चीज से सन्‍तुष्‍ट नहीं रह सकता। वह हिन्‍दू राष्‍ट्र से आगे, भारतीय राष्‍ट्र की बात सोचता है, भारतीय मंच पर उपस्थिति से सन्‍तुष्‍ट न रह कर विश्‍वमंच पर अपनी उपस्थिति मोटे अक्षरों में अंकित कराना चाहता है । उसके ये इरादे देश के भाग्‍य से जुड़े हैं, उसकी शक्ति और स्‍वाभिमान से जुड़े हैं और इसीलिए अपने देश और समाज का भला चाहने वालों को उसका साथ देना चाहिए।”

”साथ का क्‍या मतलब ? हम अपने दुश्‍मन का साथ क्‍यों देंगे ?”

”तुमको उसका नहीं, अपने देशहित का साथ देना है। वह किसी के हाथों हो रहा हो। जिसके हाथों हो रहा है उसका तब तक साथ देना चाहिए जब तक उससे देश का भला हो रहा हो। इसलिए उसकी गुणदाेषपरक आलोचना करनी चाहिए। जो काम ठीक है उन्‍हें ठीक कहना चाहिए। उनका इरादा खुद ही कल्पित करके उसे खारिज कर दोगे तो हो सकता है तुम्‍हारा यह निर्णय सही हो, परन्‍तु इसे अपने पक्ष में करने के लिए ऐसा विश्‍लेषण करना होगा जिससे वे लोग जो तुम्‍हारे जैसे विलक्षण प्रतिभा वाले हैं, वे भी समझ सकें। यह तुम अपने पाठकों की विश्‍वसनीयता अर्जित करने के बाद ही कर सकते हाे। साथ देने में ये दोनों बातें शामिल हैं। साथ देकर ही तुम समाज के साथ भी रह सकते हो और अपने साथ भी। यदि नहीं हुए तो लोग तुम्‍हारा साथ छोड़ जाएंगे और तुम्‍हें आत्‍महत्‍या का गौरव भी नहीं प्राप्‍त होगा। तुम्‍हारी सड़ती हुई लाश की दुर्गन्‍ध जब असह्य हा जाएगी तब लोगों को पता चलेगा तुम्‍हारी मृत्‍यु बहुत पहले हो चुकी है। सही समय पर तुम्‍हारी मौत की नोटिस तक नहीं ली जा सकी।”

”क्‍या बत्‍तमीजी करते हो। तुम जानते हो कह क्‍या रहे हो। तुम दुनिया से ऊपर हो। सारे बुद्धिजीवी जिसे गलत कह रहे हैं उसे तुम सही बता रहे हो और खीझ का हमारे संगठनों को श्राप दे रहे हो।” वह बौख्‍ाला उठा । मैं यही तो चाहता था।

”मैं तुम्हारे भले की सोच रहा था और य‍ह याद दिला रहा था कि पिछले पचीस सालों से मैंने तुम्‍हारे संगठन और उससे जुडे लोगों के विषय में जो तब मेरे अपने संगठन और मित्र भी हुआ करते थे, आगाह किया था कि इन हरकतों का यह परिणाम होगा। मैं जानता था इतना बड़ा संगठन होते हुए मुझ जैसे उपेक्षित व्‍यक्ति की बात नहीं सुनोगे। पर यह प्रकाशित है और इसे पेश किया जा सकता है कि मेरी, अकेले की, भविष्‍यवाणी जो भविष्‍यवाणी नहीं अपितु तार्किक परिणति का संकेत था, सही निकला। अपनी अदना हैसियत के कारण आज भी तुम मेरी बात न मान कर संख्‍या गिनाओगे। विचारों में लोकतन्‍त्र नहीं चलता, तार्किक संगति चलती है। मैं तुम्‍हें एक बड़े आदमी का उदाहरण दे कर अपनी बात रखूं तो संभव है तुम मेरी बात सकझ सको, गो यकीन फिर भी नहीं हैं।”

”अपनी बात तो कह यार। सिर खा जाता है।”

”तुम जानते हो, आइंस्‍टाइन आज भी एक आश्‍चर्यजनक मेधा हैं, परन्‍तु उनके जीवन काल में उनको लगातार शंकालुओं और विरोधियों का सामना करना पड़ा। जब वह सर्वमान्‍य से हो चले थे उस समय भी उनको सन्‍देहवादियों का सामना करना पड़ा। इसे स्टिफेन हाकिंंग के शब्दों को बिना एक भी अक्षर बदले रखूं तो वह निम्‍न प्रकार है:
Once more unpopularity did not stop from speaking his mind. His theories came under attack An anti-Einsten organization was even set up. One man was convicted of inciting others to murder Einstein (and fined a mere six dollars). But Eienstein was phlegmatic: when a book was published entitled Hundred Authors against Einstein , he retorted, “If i were wrong then one would have been enough.

”सांप्रदायिकता और बांटो और राज करो की नीति पर आरंभ से आज तक चलती आई राजनीति को एक नई दिशा में मोड़ने और ले जाने के लिए जिस विजन और साहस की जरूरत होती है वह उस अकेले आदमी में है और सबसे बड़ा दोष मुझे यही लगता है कि वह अपने ढंग का अकेला आदमी है और दूसरे उसकी तुलना में जिस हैसियत के थे उससे उनकी हैसियत घटी है। ऐसे ही लोग कभी कई बार अतिविश्‍वास के शिकार हो कर तानाशाह हो जाते हैं और इसकी संभावना अवश्‍य उस व्‍यक्ति में दिखाई देती है।”

”इसे तो हम पहले दिन से समझते हैं, तुमको आगाह भी करते आए हैं, और यह मामूली सी बात समझने में तुमने इतना समय लगा दिया।”

”तुम न तब कुछ समझते थे न अब कुछ समझते हो। पहले तुम्‍हारे भीतर भरी गई घृणा के जहर का झाग बाहर आ रहा था, तिलमिला रहे थे तुम, तड़प और छटपटा रहे थे तुम, अपने ही जहर के सेवन से। तिलमिलाता और छटपटाता हुआ आदमी सोच कैसे सकता है और तुम्‍हारी भविष्‍यवाणी लगातार झूठी साबित होती रही, वह अपने कौल और करार पर प्रत्‍यके परीक्षा में सफल सिद्ध होता गया और उसी अनुपात में तुम्‍हारी छटपटाहट बढ़ती गई, आज भी छटपटाहट बनी हुई है।”

तुम्‍हारे ऊपर कैसे विश्‍वास कर सकता हूं। तुम्‍हारे इस हंगामे की वजह से लोगों को उस व्‍यक्ति को समझने में बाधा पड़ी है। वह जो करना चाहता है उसमें बाधा पड़ी है, परन्‍तु इस आदमी में अपनी मनोबधाओं को भी समझने और उन्‍हें पार करने का साहस है और बाहरी बाधाओं से निबटने की भी दक्षता हासिल है। वह अपने लाेगों को भी अपनी कमियों को दूर करने का समय देता है और दूसरों के लिए भी ऐसा वातावरण तैयार करने का प्रयत्‍न करता है कि वे अपनी पुरानी गलतियों को समझें और नई महत्‍वाकांक्षा से लैस हो कर आगे बढ़ें, पुराने झगड़ों की दलदल में फंस कर अधोगति की ओर न जांय। उसके इस सन्‍देश को भी पहुंचाने का माध्‍यम बनने की जगह तुम उसे उलट कर दहशत फैलाने में अपनी शक्ति का अपव्‍यय करते हो और थक कर अपनी ही नजर में क्रमश: व्‍यर्थ और अप्रासंगिक सिद्ध होते हुए शिफर बनने की ओर की यात्रा करते हो।

”बात बात पर तुम्‍हारे भीतर का सोया हुआ चारण क्‍यों जाग जाता है भाई। तुम यह क्‍यों नहीं देखते कि जिस भावुकता को उभार कर संघ और इससे जुड़े संगठन हिन्‍दू समाज को अपने से जोड़ते रहे हैं उसे ही उसने दलितों और मुसलमानों को अपने साथ लाने के लिए इतनी बड़ी चूक कर दी। वे इसके साथ आने वाले नहीं और जो अपने थे वे भी हाथ से गए । अब इसकी छुट्टी तय है।”

मैं जानता हूं हिन्‍दू समाज में एक शहरी और पुजारी वर्ग है, वह वर्ग जिसने गाय का दूध पिया है पर गाय पाला नहीं या पाला भी तो उसका गोबर तक उठाया नहीं होगा। इनका ह़दय मोम का है, थोड़ी सी आंच में पिघल जाता है और उतनी ही आसानी से ठंड में पत्‍थर बन जाता है, यह परजीवी वर्ग ही गाय को लेकर अतिसंवेदी रहा है। किसान या गोपालक अपने जानवरों को प्‍यार करता है संवेदनशील भी होता है पर उसमें वह बौखलाहट नहीं होती है क्‍योंकि वह गोपालन और किसानी अर्थतन्‍त्र के कई ऐसे कड़वे पक्षों से परिचित होता है जिसमें चारे के अभाव में, मौसम की मार में, यह तय नहीं कर पाता कि वह अपने ही जानवरों में से किसको बचाये, किसको मरने को छोड़ दे। अघा सु हन्‍यते गाव:, यह अघा हमारा परिचित माघ का मघा नक्षत्र है जिसमें कमजोर, बीमार और चारे की कमी के कारण गोरू बड़े पैमाने पर मरते थे। इन अनुभवों के कारण उसकी प्रतिक्रिया उन्‍हीं सवालों को लेकर अधिक परिपक्‍व होती है। उसकी भी जो अपने बूढ़े, बेकार डंगरों को किसी कीमत पर किसी को बेचने या देने को तैयार नहीं होता, क्‍योंकि वह यह जानता है कि इसके लिए उसे कितनी भारी कीमत चुकानी और कैसी असुविधाओं का सामना करना पड़ता है और यदि किसी दूसरे से इसका निर्वाह नहीं हो पाता तो उसके बारे में वह ओछी राय तो बना लेता है, भर्त्‍सना भी कर बैठता है, परन्‍तु हंगामा नहीं मचाता। यदि इसी प्रश्‍न को तुम जीवन मरण का प्रश्‍न बनाना चाहो तो पाओगे उसके समर्थकों में अधिक वृद्धि हुई है। परन्‍तु वह आदमी जो मोम के पुतलाें को भी संभालने का प्रयत्‍न करता है कि उन्‍हें कोई खरोंच न आए, वह फौलादी स्‍वभाव का है और बड़े फैसले कर सकता है और उन फैसलों के साथ लोगों को जोड़ सकता है।”

”जोड़ता रहे, परन्‍तु हमें तो इस बात पर प्रसन्‍नता है कि भाई का जनाधार गया और इनका पत्‍ता साफ हुआ ।”

”और भ्रष्‍टता और कदाचार के उन सुनहले दिनों की वापसी हुई जिसमें तुम अधिक सुकून से रह लेते थे। कितनी ओछी समझ है और कैसे ओछे लोग है जो सांप्रदायिक आग को इस लिए जिलाए रखना चाहते हैं क्‍योंकि उनमें विजन का ऐसा अभाव हो गया है कि अपने को जिन्‍दा रखने के लिए भी कोई कारगर मुद्दा नहीं तलाश सकते। सांप्रदायिकता को अपनी ओर से उकसाते रहते हैं कि उसके विरोध के नाम पर उनको कुछ दिन और सांस लेने का मौका मिल सकता है। यदि तुम्‍हें पता है कि इस आदमी ने देश हित में इतना बड़ा फैसला लिया है जो उसके लिए ही खतरा बन सकता है तो कम से कम एेसे फैसलों पर तो तुम्‍हें उसके साथ एकजुटता दिखानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं कर पाते तो तुम गर्हित उसे सिद्ध करना चाहते हो, गर्हित स्‍वयं सिद्ध होते जा रहे हो, और इसका पता तक नहीं। आनन्‍द ही आनन्‍द है। सड़ने से पहले का क्षणिक आनन्‍द।

Post – 2016-08-06

न मैं तुमको समझ पाया न तुम मुझको समझते हो
मुझे भी हो पता अपने को तुम क्‍यों क्‍या समझते हो
मुखातिब है उसे भी जान पाने की नहीं चाहत
बताते हो कि तुम सारे जमाने काे समझते हो।
समझने की जरा सी शर्त है नफरत से बाहर आ
नही मुश्किल समझना इसकाे, फिर भी क्‍या समझते हो।
अकड़ता था बहुत भगवान वह बन्‍दों से ऊपर है
गुजारिश उससे तुम क्‍या अपने बन्‍दों को समझते हो ।
वह जिस भी आसमां पर था जमीं पर आ गया देखो
कहा क्‍यों आप मुझको खाक से ऊपर समझते हो।x