Post – 2018-07-08

#विषयान्तर

सच बोलने वाला अपने चारों ओर दुश्मनों की भीड़ खड़ी करता है। उसके सगे भी उसके साथ नहीं होते।

Post – 2018-07-07

#आओ_शब्दों_से_खेलें (१५)

मूंछ और दाढ़ी के विषय में रबीन्द्र की एक उक्ति बहुत रोचक है। संभवत: डॉ. भगवान दीन से बात करते हुए जब सवाल किया गया कि क्या वे हिन्दी जानते है। उन्होंने कहा, ‘ऐसी भाषा को कोई कैसे सीख सकता है जिसमें मूछ और दाढ़ी को स्त्रीलिंग और स्तन को पुलिंग माना जाता हो?’

हिन्दी का व्याकरणिक लिंग बांग्ला भाषियों के लिए एक समस्या है। यदि बचपन बंगाल में बीता और बाद की पूरी जिन्दगी हिन्दी क्षेत्र में तब भी गलतियां करते हैं। यह कई बार हिन्दी वालों के लिए भी समस्या बन जाती है। परन्तु जिस तरह यह बंगालियों के लिए समस्या बनती है, उस तरह भारत के किसी अन्य क्षेत्र के लिए नहीं। यहां तक कि उनके पड़ोसी ओडिया या असमिया भाषियों के लिए भी नहीं। हिन्दी के साथ जो समस्या पैदा होती है वह भोजपुरी के साथ नहीं पैदा होती, जिसमे व्याकरणिक लिंग तो है, पर स्त्रीलिंग और पुल्लिग के भेद स्पष्ट हैं। मूंछ और दाढ़ी की चर्चा में हम इन समस्याओं को भी शामिल कर लेते हैं। परन्तु इन सभी का समाधान हम उल्टे सिरे से या इस समस्या की जड़ों से आरंभ करेंगे।

हम पहले कह आए हैं कि देववाणी में लिंग भेद नहीं था। भोजपुरी में आज भी लड़की लोग जा एगा, लड़का लोग जाएगा प्रयोग चलता है। हमारा यह कथन आंशिक रूप में ही सही है। पहली बात यह कि संस्कृत में भी कर्ता और कर्म का लिंग क्रिया को प्रभावित नहीं करता है: बालक: गच्छति/ बालिका गच्छति। हिन्दी ने लिंग व्यवस्था तो संस्कृत से ली पर इसे क्रिया पर भी आरोपित कर दिया, जिससे जिन भाषाओं में लिंग क्रिया को परिवर्तित नहीं करता, उन्हें हिन्दी सीखने में परेशानी होती है।

देववाणी में लिंग भेद था, जो क्रिया को भले परिवर्तित नहीं करता, पर संज्ञा में होता है। लड़का/लड़की, गठरी/गट्ठर।

यह जैव जगत में नर/ मादा पर आधारित होता है, और इससे बाहर, इससे आगे, जिसमें हमारे शरीर के योनअंग भी आते हैं, महत और अमहत पर टिका है जैसा हमने गट्ठर और गठरी में पाया। महत और अमहत का अन्तर दिखाने वाला कोई प्रत्यय या अन्त्यसर्ग होना चाहिए। देवभाषा में यह नियमित था, भोजपुरी मे यह नियमित है। संस्कृत में कई भाषाई समुदायों की पैठ के कारण इसका ध्यान नहीं रखा गया, इसलिए यह समस्या पैदा हो गई। उसी के प्रभाव में विकसित खड़ीबोली या पश्चिमी हिन्दी में यह दोष कुछ अधिक उग्र हो गया।

देववाणी से महत अमहत का भेद भोजपुरी ने पाया जिसमें इसके प्रत्यय स्पष्ट हैं, इसलिए शरीर के अंगों तक में इसके नियमित निर्वाह के कारण कोई उलझन नहीं पैदा होती। हिं. में मूंछ है पर भोजपुरी में मोछि। हिं. आंख है, भो. आंखि। हिन्दी में दही, मोती, हाथी संस्कृत के प्रभाव के कारण पुलिंग हैं पर भो. में स्त्रीलिंग अर्थात इकारान्त होने के कारण अमहत। अत: भो. में लड़के की नूनी, लड़की का भग किसी तरह की समस्या नहीं पैदा करता। पूर्व की हिन्दी से इतर आर्य भाषाओं को हिन्दी से जो परेशानी होती है वह भोजपुरी से नहीं। इसके बाद भी ओड़िया और असमीया (असमिया) भाषियों को जो बांग्ला की तुलना में हिन्दी से कम जुड़े रहे हैं उतनी परेशानी नहीं होती जितनी बांग्लाभाषियों को। इसका कारण यह है बांग्ला भाषियों को अंग्रेजों और अंग्रेजी के संपर्क का सबसे पहले और अधिक दीर्घ संपर्क के फल स्वरूप आधुनिकता के स्पर्श का साहित्य, कला, विज्ञान और दर्शन को मिलने वाला लाभ और उससे उत्पन्न अहंम्मन्यता जिसके मनोरचना का अंग बन जाने के कारण भारत की दूसरी भाषाओं के प्रति अवज्ञा भाव।

किसी चीज को सीखने के लिए अकड़ की नहीं विनम्रता की आवश्यकता होती है। इसके अभाव में अपनी गलतियों को सुधारने की जगह उनका महिमामंडन करते हुए सचेत रूप में उन्हें बनाए रखा जाता है। इसके कारण अंग्रेजी को अंग्रेजों की सी शुद्धता या रवानगी से सीखने वाले भारतीय छात्रों द्वारा अंग्रेजों द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी की लाचारी में होने वाली गलतियों को गर्व से अपनाने का प्रयत्न किया जाता है। अत: जितना दोष हिन्दी का था उससे अधिक दोष बांगाली श्रेष्ठताबोध का है, जो संस्कृत में जहां से हिन्दी की लिंग व्यवस्था की खामियां आई है जिन कमियों को क्षम्य मान लेते हैं, उन्हें हिन्दी के सन्दर्भ में बढ़ा चढ़ा कर देखते और इसलिए अपने लिए इन्हें दूर कर पाने को अशक्य मान लेते हैं।

अन्य भारतीय भाषाओं की पृष्ठभूमि से आने वालों को ध्वनिमाला की भिन्नता से कुछ असुविधाएं भले हों, उनकी अपनी भाषाओं में भी महत और अमहत का भेद होने के कारण हिन्दी सीखने और बोलने में लिंग की समस्या पेश नहीं आती।

अब हम अपने विषय पर अर्थात् मूंछ के औचित्य पर लौटें। मूंछ का आशय हुआ मुंह पर उगे रोम, जैसे दाढ़ी का दाढ पर उगे रोम। इस तर्क से तो साहब इसे पुल्लिंग ही होना चाहिए था क्योंकि बाल के सभी पर्याय- रोम/लोम, केश, वार/बाल, चूल पुलिंग हैं, मुंह, दाढ़ भी पुलिंग और इसके बाद भी मूँछ हिन्दी में अकारान्त होते हुए स्त्रीलिंग! जो भी हो, अं. मस्टैचेज का अर्थ भी ऊपरी होंठ पर उगे बाल और बीयर्ड का ठुड्डी पर उगे बाल ही है।

समस्या सामूहिकता के कारण पैदा हुई लगती है, परिवार जुटाना और बढ़ाना स्त्री का काम है। पुरुष अकेला ही भला। जहां एक से बहु हुआ माया के चक्कर में पड़ गया। कक्ष पुलिंग है और उसमें दस बीस की बैठक जमी तो कक्षा बन जाता है। अकेला हो तो सैनिक पुल्लिंग, दल हो गया तो सेना, स्त्रीलिंग । बाल/वार अपने तईं पुल्लिंग जब उसका समूह बना तो चोटी, शिखा, चुरुकी, लट, जटा, मूँछ, दाढ़ी, जूड़ा, चूड़ा सब को स्त्रीलिंग बना दिया।

दाढ़ी और मूँछ जैसे आसानी से बोले और समझे जा सकने वाले शब्द संस्कृत के लिए अछूत हैं, इनको उसमें जगह नहीं मिल सकती थी, न मिली। इन शब्दों का इतिहास कितना पुराना है, यह हम नहीं जानते। देव समाज इनके लिए किन शब्दों का प्रयोग करता था यह हम नहीं जानते। ऋग्वेद में दाढ़ी-मूँछ दोनों के लिए श्मश्रू का केवल एक बार इन्द्र के सन्दर्भ में उल्लेख आया है ः
सो चिन्नु वृष्टिर्यूथ्या स्वा सचाँ इन्द्रः श्मश्रूणि हरिताभि प्रुष्णुते ।
अव वेति सुक्षयं सुते मधूदित धूनोति वातो यथा वनम् ।।10.23.4

और संभवत: यही एक मात्र शब्द संस्कृत में प्रचलित रहा। परन्तु इसका जातक क्या है?

मस
इसके लिए हमें कुछ पीछे लौटना होगा। तरुणाई में जब मूँछ के बाल निकलने लगते हैं तो उसकी पतली रोमावली के लिए भोजपुरी में रेख उभरना, अर्थात् रोम की रेखा उभरना कहते हैं।

इसके लिए एक अन्य मुहावरे का प्रयोग होता है, ‘मसें भींगना’| इसमें ‘मस’ का अर्थ चांद है, वही जो मास में मिलता है, जो फारसी मे ‘मह’/’माह’ बन जाता है। यही मस ‘मसि’ में दिखाई देता है। मैंने अपने एक लेख में दिखाया है कि काले के लिए, रात के लिए, अंधेरे के लिए जिन शब्दों का प्रयोग होता है उनका अर्थ प्रकाश, चमकने वाला है। रंग काला और नाम रोशनाई।

श्मश्रु
ऐसी स्थिति में हमें लगता है कि मस / समसु का प्रयोग मूछ और दाढ़ी के लिए देववाणी में होता था जो सारस्वत प्रभाव में श्मश्रु बन गया। शमश्रु इस तर्क से आपने देववाणी के तत्सम का तद्भव हुआ।

Post – 2018-07-06

#आइए_शब्दों_से_खेलें(१४)

दांत
दांत के लिए यदि भोजपुरी से लेकर यूरोप तक समान शब्द मिलते हैं, तो तय है कि यह शब्द देववाणी का है । ऋग्वेद में दांत के तीन चार ही हवाले हैं, परन्तु हैं बहुत मार्मिक। अग्नि प्रज्वलित किए जाने के व्याज से भोर होते ही लातौन से दांत रगड़ने का एक चित्र हैः
उषर्बुधमथर्यो न दन्तं शुक्रं स्वासं परशुं न तिग्मम् (प्रत्यूष वेला मे जगे /प्रज्वलित किए गए/अग्निदेव अपने शुभ्र दातों को साफ करने के लिए रगड़ कर उसी तरह तेज कर रहे हैं जैसे फरसे को पँहट कर तेज किया जाता है)।

दांत के सभी हवाले मानवेतर सन्दर्भों में ही आते हैंः
हिरण्यदन्तं शुचिवर्णं आरात् क्षेत्रात् अपश्यं आयुधा मिमानन् (मैने उस सुनहले दांतों और चमचमाते रंग वाले (अग्नि ) को निकट से अपने आयुध भाँजते हुए देखा।)

सुपर्ण वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभि सन्नद्धा पतति प्रसूता (यहां पंख लगे, सींग के अग्रभागग (दांत) वाले, तांत की प्रत्यंचा पर तने हुए और छूटने के साथ उड़ते हुए लक्ष्य पर गिरनेवाले बाले बाण का वर्णन है)।

परन्तु सारस्वत की ध्वनि सीमा और रुचि के अनुरूप दन्त को दंष्ट्र बनाया गया और इसका लिखित साहित्य में अधिक प्रयोग होने लगा। ऋग्वेद तक दंत का दंष्ट्रीकरण आरंभ हो चुका था। ऐसा प्रयोग यद्यपि एक बार ही आया है।
अयोदंष्ट्रो अर्चिषा यातुधानान् उप स्पृश जातवेदः समिद्धः ।. ( फौलादी दाँतों वाले अग्निदेव, प्रज्ज्वलित होकर अपनी लपटों से राक्षसों को भस्म कर दो।

रद
सं. में दांत के लिए एक अन्य शब्द प्रयोग में आता है। यह है रद। रदन का वैदिक प्रयोग एक झटके में काटने, रहगते या दरेरते हुए गिराने, नष्ट करने के आशय में किया गया है
१. पथो रदन्तीरनु जोषमस्मै दिवेदिवे धुनयो यन्त्यर्थम् (नदियां दिन प्रति दिन इन्द्र प्रेरित बाढ़ के आवेश में कठाव से अपना मार्ग बनाती अपने गन्तव्य की ओर प्रवाहित होती हैं।)
२. इन्द्रो अस्माँ अरदद् वज्रबाहुरपाहन् वृत्रं परिधिं नदीनाम् ,(इन्द्र ने नदियों के मार्ग को बाधित करने वाले वृत्र को ध्वस्त करके काट कर मार्ग का निर्माण किया)।
३. पथो रदन्ती सुविताय देवी पुरुष्टुता विश्ववारा वि भाति ।

कहें काटने के क्रिया रूप में तो रद के कई सन्दर्भ हैं, परन्तु संज्ञा के रूप में, यहां तक कि दांत से काटने के आशय में कही कोई उल्लेख नहीं है।

बढई के,लकड़ी को छील कर अलग कर देने वाले रन्दे का नामकरण इसी आधार पर पड़ा है। संभवतः रन्ध्र और अं. रेंड (rend>render> surrender) का मूल भी संभवतः इसे ही होना चाहिए। भोजपुरी में रद, रद्दी को तो इससे समझा जा सकता है परन्तु रद्दा – मिट्टी की दीवार की एक तह को नहीं। संभव है इस मामले में अर्थविपर्यय हुआ हो।

रद का प्रयोग संभवत: आगे के चीरने या कतरने वाले दांतों (tearing teeth) के लिए किया जाता था और फिर दांतों के लिए सामान्य हो गया। दन्त में कुचलने, दबाने का आशय है।

जम्भ
सबसे पीछे के चौड़े दांतों के लिए भोजपुरी में चउभरि (चाभने या चबाने के दांत) कहा जाता है। चौभरि के लिए ऋग्वेद में जम्भ का प्रयोग मिलता है। परन्तु कभी कभी जम्भ के लिए ‘तिग्म’ विशेषण का प्रयोग देखने में आता है ( स तिग्मजंभ रक्षसो दह प्रति ।। 1.79.6) ऋग्वेद में जम्भ का हवाला दंत और दंष्ट्र की तुलना में कुछ अधिक बार हुआ है, परन्तु क्रिया रूप में विनाश या सर्वनाश के लिए ही।
सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम् जम्भया ता अनप्नसः /
जम्भयन्तोऽहिं वृकं रक्षांसि/ सर्वं परिक्रोश जहि जम्भया कृकदाश्वम्।

अग्नि को मजबूत जबड़ों वाला (वीळुजम्भम्) कह कर याद किया गया है।
(प्र तां अग्नि: बभसत् तिग्मजंभ: तपिष्ठेन शोचिषा य: सुराधा/ तिग्म जम्भस्य मील्हुष:)।

एक प्रसंग में सोम या गन्ने को चूसने या कहें जंभ से निकाले गए रस का उल्लेख (इमं जम्भसुतं पिब 8.91.2) आया है। यह उन कारणों में से एक है जिससे हम सोम को गन्ना मानने को बाध्य होते है, क्योंकि इक्षुलता को छोड़ कर दूसरी किसी लता को चूसने की चर्चा तक कभी सुनने को न मिली।

जैसे रद से रन्दे का संबंध जुड़ता है उसी तरह जंभ से जंबूर – धंसी हुई कील को बाहर निकालने की संड़सी, जिसका प्रयोग बढ़ई और मोची करते हैं, से जुड़ता दिखाई देता है। इसका तकनीकी पहलू अवश्य समस्या बना रहता है।

आनन
मुख की चर्चा हम पीछे कर आए है, परन्तु इसके दूसरे पर्यायों की ओर और उनसे जुड़ी संकल्पना की ओर हमारा ध्यान न जा सका। उदाहरण के लिए आनन जो गढ़ा हुआ शब्द प्रतीत होता है और जिसका आशय है ‘वह अंग जिससे हम बाहर की चीजों को अपने भीतर करते या ग्रसते हैं।’
जैसे शिर का लाक्षणिक अर्थ ‘सबसे ऊपर’ है, उसी तरह मुख से आगे, प्रमुख सबसे आगे का भाव प्रकट होता है जिसमें सबसे ऊपर का भाव स्वत: आ जाता है। परन्तु आनन में केवल मुखमंडल या चेहरा ही सिमट पाता है।

ओक
मुख के लिए प्रयुक्त एक अन्य शब्द ओक है। यह नैसर्गिक है और देववाणी में प्रयोग मे आता था पर बाद में प्रयोगबाह्य हो गया। संभव है यह बदल कर ‘ओप’ -मुख की आभा के लिए प्रयोग में आने लगा, फिर भी ओक, ओक्काई – उद्गीरण, के लिए आज भी प्रयोग में आता है।
ओक की संकल्पना एक कक्ष के रूप में की गई इस आशय में इसका प्रयोग भी हुआ है:
स इत् क्षेति सुधित ओकसि स्वे ।
ततक्षे सूर्याय चिद् ओकसि स्वे वृषा समत्सु दासस्य नाम चित् ।
मुंह के आशय में इसका प्रयोग एक बार ही दिखाई देता है:
कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः ।। 8.33.2
गालिब की ‘पिला ले ओक से’ में इसका अर्थान्तरण चुल्लू में हो गया लगता है।

Post – 2018-07-06

#तुकबन्दियाँ

अजनवी तो यहां कोई नहीं है
किसे पहचान पाए यह बताओ।

Post – 2018-07-05

#आइए_शब्दों_से_खेलें (13)
असंपादित

हृदय

आज हृदय के बहाने फिर सिर की बात करने जा रहे है, क्योंकि यह पहलू विचार करने से रह गया था।

हमारी मीमांसा में किसी वस्तु, विचार या क्रिया को जो संज्ञा मिली है, उससे अधिक महत्व उस अवधारणा का है, जिसके आधार पर यह संज्ञा मिसी है। अन्यथा लगभग सभी का स्रोत जल होने के बाद और कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती।

उदाहरण के लिए हम जानते हैं कि ह्रद जलाशय को कहते हैं, हृदय का जल से संबंध होना अवश्यंभावी है, परन्तु ह्रदय शीतल होने (भोजपुरी ‘हिया जुड़ाने’) का भाव है। यह भाव अन्य बातों के अतिरिक्त यह भी प्रकट करता है कि जहां यह मुहावरे प्रचलित हैं वह ऊष्णकटिबन्धीय है। वहीं मन को शीतल रखना और अपने व्यवहार से दूसरों के मन को शीतल करने का सुझाव दिया जा सकता है। यहीं जी भर कर पीने का (हृत्सु पीतासो), पीकर अघाने के (तुभ्यं सुतो मघवन् तुभ्यमाभृतस्त्वमस्य ब्राह्मणादा तृपत् पिब ) मुहावरे भी चलते है, जब कि ठंढे देशों मे हदय की गरमी हार्ट वॉर्मिंग और गर्मजोशी के मुहावरे चलते हैं।

हेड
अं. के हेड और हार्ट दोनों हृद् से संबंधित हैं। हेड को सामान्यतः हम शरीर के सबसे ऊपरी अंग के आशय में ग्रहण करते हैं, और इसी तर्क से इसका अर्थविस्तार किसी भी चीज या संस्था के सबसे ऊपरी सिरे या उस पर आसीन व्यक्ति के लिए करते हैं, परन्तु इसकी मूल संकल्पना का ऊंचाई से कोई संबंध नहीं। यह सोचने वाला अंग है, माइंड का पर्याय है, इसे to pay heed से समझ सकते हैं जहां हीड हेड का रूपभेद है।

हार्ट
हार्ट स्वयं भी हृत् से ही संबंधित है, इसलिए यह सोचने पर परेशानी होती है कि जब हार्ट के लिए इसका प्रयोग हो रहा था तो हेड के लिए क्यों हुआ। दोनों के बीच संबंध क्या है। इसका कारण यह है कि आरंभ में ही नहीं बाद तक भी हृदय और मस्तिष्क के काम को लेकर काफी अनिश्चय रहा है। यदि to learn by heart पर ध्यान दें तो स्पष्ट हो जाएगा कि लर्न बाइ हार्ट हो या हिं. का दिल लगाकर पढ़ना या मन लगाकर पढ़ना, आदि में ध्यान, मन, हेड, और हार्ट में कोई फर्क नहीं किया गया है। यह स्थिति ऋग्वेद के समय से बनी हुई है । वहां भी हृदय की विशिष्ट चेतना (हृदयस्य प्रकेतैः) की, हृदय से किसी चीज को गढ़ने (हृदा अतष्ट) की बात की जाती है। वरुण ने हृदय में प्रज्ञा, जल में अग्नि, आकाश में सूर्य और पर्वत पर सोम काे स्थापित किया, (हृत्सु क्रतुं वरुणो अप्स्वग्निं दिवि सूर्यमदधात् सोममद्रौ ।। 5.85.2)। देव मनुष्यों को हृदय से जानते हैं (देवा हृत्सु जानीथ मर्त्यम् )। न मैं तुम्हारे मन को समझ पाती हूं, न हृदय को (नैव ते मनो हृदयं चाविदाम )। यह उलझन भी शब्द के साथ साथ ही यूरोप तक पहुंची थी।

हमारे सामने समस्या यह है कि हृदय तो देववाणी का शब्द हो नहीं सकता था। भोजपुरी में आज भी हृदय के लिए ‘हिआव’. ‘ही’, ‘हिआ’ का और यहां तक कि ‘जी’/ ‘जिउ’ का प्रयोग होता है। ऋकार होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इन सभी में ‘द’कार और ‘र’कार भी नहीं पाया जाता। ये सभी ‘हृदय’ के अपभ्रंश के नियमों के अनुसार गढ़े गए शब्द हैं जो देववाणी का प्रतिनिधित्व नहीं करते। तमिल में ‘इदयं’ मिलता है, जो यदि देववाणी का माना जाय तो इससे सारस्वत प्रभाव में ‘हृदय’ में रूपान्तरित सिद्ध किया जा सकता था, परन्तु यह भी ‘हृदय’ का तमिल की ध्वनिमाला के अनुसार ग्रहण है।

ऐसी स्थिति में हम यह मानने को बाघ्य हैं कि शब्दावली की दृष्टि से देवसमाज हृदयहीन था। वह इसके लिए मन का प्रयोग करता था।

Post – 2018-07-05

#आइए_शब्दों_से_खेलेू

हमारी मीमांसा में किसी वस्तु, विचार या क्रिया को जो संज्ञा मिली है, उससे अधिक महत्व उस औचित्य का है, जिसके आधार पर यह संज्ञा मिसी है। अन्यथा लगभग सभी का स्रोत जल होने के बाद और कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती। उदाहरण के लिए हम जानते हैं कि ह्रद जलाशय को कहते हैं, हृदय का जल से संबंध होना अवश्यंभावी है, परन्तु ह्रदय शीतल होने (भोजपुरी ‘हिया जुड़ाने’) का भाव है। यह भाव अन्य बातों के अतिरिक्त यह भी प्रकट करता है कि जहां यह मुहावरे प्रचलित हैं वह ऊष्णकटिबन्धीय है। वहीं मन को शीतल रखना और अपने व्यवहार से दूसरों के मन को शीतल करने का सुझाव दिया जा सकता है। यहीं जी भर कर पीने का (हृत्सु पीतासो), पीकर अघाने के (तुभ्यं सुतो मघवन् तुभ्यमाभृतस्त्वमस्य ब्राह्मणादा तृपत् पिब ) मुहावरे भी चलते है, जब कि ठंढे देशों मे हदय की गरमी हार्ट वॉर्मिंग और गर्मजोशी के मुहावरे चलते हैं।

हेड
हम हृदय की चर्चा को यहीं विराम दे कर माथे की चर्चा दुबारा करना चाहेंगे। अं. के हेड और हार्ट दोनों हृद् से संबंधित हैं। हेड को सामान्यतः हम शरीर के सबसे ऊपरी अंग के आशय में ग्रहण करते हैं, और इसी तर्क से इसका अर्थविस्तार किसी भी चीज या संस्था के सबसे ऊपरी सिरे या उस पर आसीन व्यक्ति के लिए करते हैं, परन्तु इसकी मूल संकल्पना का ऊंचाई से कोई संबंध नहीं। यह सोचने वाला अंग है, इसे हम माइंड का पर्याय है इसे to pay heed जहां हीड हेड का रूपभेद है।

हार्ट
हार्ट स्वयं भी हृत् से ही संबंधित है, इसलिए यह सोचने पर परेशानी होती है कि जब हार्ट के लिए इसका प्रयोग हो रहा था तो हेड के लिए क्यों हुआ। दोनों के बीच संबंध क्या है। इसका कारण यह है कि आरंभ में ही नहीं बाद तक भी हृदय और मस्तिष्क के काम को लेकर काफी अनिश्चय रहा है। यदि to learn by heart पर ध्यान दें तो स्पष्ट हो जाएगा कि लर्न बाइ हार्ट हो या हिं. का दिल लगाकर पढ़ना या मन लगाकर पढ़ना, आदि में ध्यान, मन, हेड, और हार्ट में कोई फर्क नहीं किया गया है। यह स्थिति ऋग्वेद के समय से बनी हुई है । वहां भी हृदय की विशिष्ट चेतना (हृदयस्य प्रकेतैः) की, हृदय से किसी चीज को गढ़ने (हृदा अतष्ट) की बात की जाती है। वरुण ने हृदय में प्रज्ञा, जल में अग्नि, आकाश में सूर्य और पर्वत पर सोम काे स्थापित किया, (हृत्सु क्रतुं वरुणो अप्स्वग्निं दिवि सूर्यमदधात् सोममद्रौ ।। 5.85.2)। देव मनुष्यों को हृदय से जानते हैं (देवा हृत्सु जानीथ मर्त्यम् )। न मैं तुम्हारे मन को समझ पाती हूं, न हृदय को (
नैव ते मनो हृदयं चाविदाम )। यह उलझन भी शब्द के साथ साथ ही पहुंची थी।

हमारे सामने समस्या यह है कि हृदय तो देववाणी का शब्द हो नहीं सकता था। भोजपुरी में आज भी हृदय के लिए ‘हिआव’. ‘ही’, ‘हिआ’ का और यहां तक कि ‘जी’/ ‘जिउ’ का प्रयोग होता है। ऋकार होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता सभी में ‘द’कार और ‘र’कार भी नहीं पाया जाता। ये सभी ‘हृदय’ के अपभ्रंश के नियमों के अनुसार

प्रयोग होता है। इन
उत हृदोत मनसा जुषाण

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Post – 2018-07-03

#आइए_शब्दों_से_खेलें (१२)

जबड़ा
संस्कृत में जबड़े के लिए दो शब्द हैं – ‘वक्त्र’ और ‘हनु’।
जबड़े की संकल्पना का आधार हमें स्पष्ट नहीं है, पर यह भी देववाणी का शब्द है, और उसमें यह किसी अन्य (संभवतः तालव्य प्रधान) बोली से आया लगता है। इसका प्रसार यूरोप तक हुआ इससे यह पता चलता है कि बाद की बोलचाल की भाषा में इसका प्रयोग जारी था।

हनु
‘हनु’ के लिए भोजपुरी और हिंदी में दो शब्दों का प्रयोग होता है,’जबड़ा’ और ‘ठुड्डी’ (भो.ठोढ़ी)। इस तरह का भेद अंग्रेजी में भी देखने में आता है, जिसमें जबड़े के लिए )’jaw और ठुड्डी के लि/chin का प्रयोग होता है। ‘हनु’ के विषय में अर्थभ्रम के कारण सं. में और उसके प्रभाव से हिं. में भी इसका अर्थह्रास ठुड्डी हो गया है। इसका मूल रूप ‘घनु’ था। सस्कृतीकरण के चलते यह ‘हनु’ हो गया। ।देववाणी में इसका प्रयोग मुंह की उस निचली हड्डी के लिए होता था जो कनपटी के नीचे से ठुड्डी तक आती है जिसमें मसूड़े और दंतावली कसी होती है। ऋ. में घनु का रूप हनु होगया है। हनु के अर्थभ्रम के कारण हनुमान की ठुड्डी को कुछ आगे की ओर निकला दिखाया जाने लगा। कहें अर्थ की गड़बड़ी कला में भी गड़बड़ी पैदा करती है। देवदाणी में हनुमानका अर्थ था ‘असाधारण मजबूत जबड़ों वाला। ऋ. हनुमान का प्रयोग इन्द्र के अतिरिक्त अन्य देवों के लिए भी हुआ है । एक स्थल पर फौलादी हनु का प्रयोग सविता के लिए भी हुआहैः
अयोहनुर्यजतो मन्द्रजिह्व आ दाषुषे सुवति भूरि वामम् ।। 6.71.4

एक स्थल पर इन्द्र के अद्भुत हनु को आकाश तक उठा हुआ दिखाया गया है, जिससे लगता है कि इसमें ऊपरी अस्थि और दन्तावली भी शामिल थीः
अरुतहनुरद्भुतं न रजः ।। 10.105.7

इसकी पुष्टि हनु के द्विवचन प्रयोगों से भी होता है। प्रचंड अग्नि की दहकती लपटों के कारण उसे नाना भाँति के जबड़ों से जंगल को चबाते दिखाया गया हैः
नाना हनू विभृते सं भरेते असिन्वती बप्सती भूर्यत्तः ।। 10.79.1

शत्रुओं का मुँह (जबड़ा) तोड़ने का काम वैदिक काल से जारी हैः
वि रक्षः वि मृधः जहि वि वृत्रस्य हनू रुज ।…10.152.3

हनुमान के चरित्र के निर्माण में इन्द्र और मरुद्गण की कितनी निर्णायक भूमिका है इस पर रामकथा के अधिकारी विद्वानों ने भी कभी ध्यान नहीं दिया। यदि वह इन दोनों के पुत्र (पवनसुत और वृषाकपि) हैं तो इसका कारण यह है कि उनकी उद्भावना, व्यक्तित्व के निर्माण और चरित्र चित्रण में इनकी ही विशेषताओं का संयोजन है। हम प्रस्तुत संदर्भ में मरुतों की चर्चा नही कर सकते पर इन्द्र के लक्षणों की बात तो कर ही सकते हैंः
आ ते हनू हरिवः शूर शिप्रे रुहत्सोमो न पर्वतस्य पृष्ठे ।… 5.36.2

वक्त्र
वक्त्र को देववाणी में बक या बोक कहते थे जिसका अर्थ मुंह होता था, इसकी एक लोरी – ओक्का बोक्का तीन तलोक्का ..- के सन्दर्भ में कुछ विस्तार से चर्चा (आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता, 1973) में की है, परन्तु आज से पहले मेरा ध्यान इस ओर नहीं गया था कि बोक का संबन्ध वक्त्र से, वाक्य से, बां. के बोका और हिं. के बकवास, भो. के बउक, बउकड़, से भी हो सकता है। भोजपुरी का एक बोक्का या बोक्का भर – मुंह में एक बार में जितना भरा जा सके’ है। इसी से इसका क्रियारूप ‘भकोसल’ बना है, जबकि ‘भकुआइल’ – निर्वाक हो जाना का आशय खाने से हटकर बोलने की ओर है।

‘बोक’ या ‘बक’ देववाणी में उस बोली से लिया गया था जिसका सबसे गहरा प्रभाव तेलुगू पर पड़ा है। संभवतः यही ‘वाय्’ – मुंह के रूप में तमिल में सुरक्षित है, पर इसका अर्थ केवल यह कि तमिल भाषा की निर्माण-प्रक्रिया में उस बोली की भी भूमिका थी जिसका यह शब्द था। ‘बक’ का सारस्वत प्रदेश में पहले ‘वक्’ हुआ और फिर इसे ‘वक्त्र’ के रूप में अपनाया गया । परन्तु ‘वाक्’, ‘वचन’, ऋ.’वोचे’ (मा शपन्तं प्रति वोचे देवयन्तम्) आदि में पुराना रूप झलकता रहा।

ठुड्डी/ठोढ़ी
ठोढी’, पक्षी के ठोर का उपमा में मनुष्य की ठुड्डी के लिए प्रयोग का परिणाम है, जिसे संस्कृत में त्रोट बना लिया गया। इसका मूल नामकरण कुतरने की क्रिया पर आधारितहै। इसी के सं. का ‘त्रुटि’ निकला है। चूहे बिल्ली की कहानी में ठौर का प्रयोग लाक्षणिक है। भो. में ठोर को ठोढ़ कहते हैं। इसका वैकल्पिक रूप ठोठ है, जिसका विवाद होने पर ठोठा (ठोठवा पकड़िके घुमा देब) हो जाता है।
हिन्दी में ठोढ़ का वैकल्पिक रूप टोड बना, जिसे त्रोट का अपभ्रंश कहा जा सकता है। अकबर के दरबारीऔर तुलसीदास से लगाव रखने वाले दो चरित्रों का नाम टोडर था, टोडर का लाक्षणिक अर्थ सुमुख या सुन्दर मुख वाला है।

Post – 2018-07-03

#आइए_शब्दों_से_खेलें (11)

जबड़ा
संस्कृत में जबड़े के लिए दो शब्द हैं – ‘वक्त्र’ और ‘हनु’।
जबड़े की संकल्पना का आधार हमें स्पष्ट नहीं है, पर यह भी देववाणी का शब्द लगता है, और उसमें यह किसी अन्य (संभवतः तालव्य प्रधान) बोली से आया लगता है। इसका प्रसार यूरोप तक हुआ इससे यह पता चलता है कि बाद की बोलचाल की भाषा में इसका प्रयोग जारी था।

हनु
‘हनु’ के लिए भोजपुरी और हिंदी में दो शब्दों का प्रयोग होता है,’जबड़ा’ और ‘ठुड्डी’ (भो.ठोढ़ी)। इस तरह का भेद अंग्रेजी में भी देखने में आता है, जिसमें जबड़े के लिए jaw और chin का प्रयोग होता है। ‘हनु’ के विषय में अर्थभ्रम के कारण सं. में और उसके प्रभाव से हिं. में भी इसका अर्थह्रास ठुड्डी हो गया है। इसका मूल रूप ‘घनु’ था। सं.करण के चलते यह ‘हनु’ हो गया। देववाणी में इसका प्रयोग मुंह की उस निचली हड्डी के लिए होता था जो कनपटी के नीचे से ठुड्डी तक आती है जिसमें मसूड़े और दंतावली कसी होती है। ऋ. में घनु का रूप हनु होगया है। हनु के अर्थभ्रम के कारण हनुमान की ठुड्डी को कुछ आगे की ओर निकला दिखाया जाने लगा। कहें अर्थ की गड़बड़ी कला में भी गड़बड़ी पैदा करती है। देवदाणी में इसका अर्थ था ‘असाधारण मजबूत जबड़ों वाला। ऋ. हनुमान का प्रयोग इन्द्र के लिए हुआ है परन्तु एक स्थल पर फौलादी हनु का प्रयोग सविता के लिए भी हुआ हैः
अयोहनुर्यजतो मन्द्रजिह्व आ दाषुषे सुवति भूरि वामम् ।। 6.71.4

एक स्थल पर इन्द्र के अद्भुत हनु को आकाश तक उठा हुआ दिखाया गया है, जिससे लगता है कि इसमें ऊपरी अस्थि और दन्तावली भी शामिल थीः
अरुतहनुरद्भुतं न रजः ।। 10.105.7

इसकी पुष्टि हनु के द्विवचन प्रयोगों से भी होता है। प्रचंड अग्नि की दहकती लपटों के कारण उसे नाना भाँति के जबड़ों से जंगल को चबाते दिखाया गया हैः
नाना हनू विभृते सं भरेते असिन्वती बप्सती भूर्यत्तः ।। 10.79.1

शत्रुओं का मुँह (जबड़ा) तोड़ने का काम वैदिक काल से जारी हैः
वि रक्षः वि मृधः जहि वि वृत्रस्य हनू रुज ।…10.152.3

हनुमान के चरित्र के निर्माण में इन्द्र और मरुद्गण की कितनी निर्णायक भूमिका है इस पर रामकथा के अधिकारी विद्वानों ने भी कभी नहीं दिया। यदि वह इन दोनों के पुत्र (पवनसुत और वृषाकपि) तो इसका कारण यह है कि उनकी उद्भावना, व्यक्तित्व के निर्माण और चरित्र निर्माण में इनकी हुी विशेषताओं का संयोजन है। हम प्रस्तुत संदर्भ में मरुतों की चर्चा नही कर सकते पर इन्द्र के लक्षणों की बात तो कर ही सकते हैंः
आ ते हनू हरिवः शूर शिप्रे रुहत्सोमो न पर्वतस्य पृष्ठे ।… 5.36.2

वक्त्र
वक्त्र को देववाणी में बक या बोक कहते थे जिसका अर्थ मुंह होता था, इसकी एक लोरी के – ओक्का बोक्का तीन तलोक्का ..- के सन्दर्भ में कुछ विस्तार से चर्चा (आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता, 1973) में की है, परन्तु आज से पहले मेरा ध्यान इस ओर नहीं गया था कि बोक का संबन्ध वक्त्र से़, वाक्य से, बां. के बोका और हिं. के बकवास, भो. के बउक, बउकड़, से भी हो सकता है। भोजपुरी का एक बोक्का या बोक्का भर – मुंह में एक बार में जितना भरा जा सके। इसी से इसका क्रियारूप ‘भकोसल’ बना है, जम कि ‘भकुआइल’ – निर्वाक हो जाना का आशय खाने से हटकर बोलने की ओर है। यदि आपको मेरे कुछ कथन विस्मयकारी और हत्प्रभ करने वाले लगते हैं तो इस अनुभूति से सबसे पहले मुझे गुजरना होता है। लिखना आरंभ करने से पहले मुझे स्वयं उनका ज्ञान तो दूर आभास तक नहीं होता।

बोक या बक देववाणी में उस बोली से लिया गया था जिसका सबसे गहरा प्रभाव तेलुगू पर पड़ा है। संभवतः यही ‘वाय्’ – मुंह के रूप में तमिल में सुरक्षित है, पर इसका अर्थ केवल यह कि तमिल भाषा की निर्माण-प्रक्रिया में उस बोली की भी भूमिका थी जिसका यह शब्द था। ‘बक’ का सारस्वत प्रदेश में पहले ‘वक्’ हुआ और फिर इसे ‘वक्त्र’ के रूप मेो अपनाया गया लगता है। परन्तु ‘वाक्’, ‘वचन’ ऋ.’वोचे’ (मा शपन्तं प्रति वोचे देवयन्तम्) आदि में पुराना रूप झलकता रहा।

ठुड्डी/ठोढ़ी
ठोढ़ी पक्षी के ठोर का उपमा में मनुष्य की ठुड्डी के लिए प्रयोग का परिणाम है, जिसे संस्कृत में त्रोट बना लिया गया। इसका मूल नामकरण कुतरने से है। इसी के सं. का ‘त्रुटि’ निकला है। चूहे बिल्ली की कहानी में

Post – 2018-07-02

मुस्कुराते आईने और जगमगाती रोशनी
आप की परछाइयां हैं गौर से फिर देखिए।

Post – 2018-07-02

#विषयान्तर

इतिहास में यह कहीं दर्ज न होगा कि जिस व्यक्ति को शिक्षा संस्थानों और पुस्तकालयों से दूर रखा गया वह पूरी जिन्दगी सभ्यता, संस्कृति, भाषा और इतिहास की समस्याओं से जूझ रहा था, जब कि उसी समय, वे, जिन्होंने आजीवन उनमें घुस कर कुर्सियों पर कुर्सियां रख कर ऊपर चढ़ने और तनखाह बढ़ाने की क्रान्तियां की थी वे सरकार बनाने और सरकार गिराने के नए क्रान्तकारी काम से इतनी फुर्सत भी नहीं निकाल पा रहे थे कि उसे पढ़ सकें, कभी पढ़ने की गलती की भी तो यह देखकर घबरा जाते थे कि यह उनकी समझ से बाहर है, कि इस घबराहट के चलते वे मानते थे कि किसी विषय का आधिकारिक ज्ञान आदमी को कूप मंडूक बनाता है, पर यह नहीं जानते थे कि आधिकारिक ज्ञान का अभाव आदमी को कुंए की जहरीली गैस बनाता है और ऐसे लोगों की बढ़ती संख्या ने भारतीय बौद्धिक पर्यावरण को जहरीली गैस से भर दिया है। इतिहास में यह भी दर्ज न होगा कि कूपमंडूक होने से डरने वाले विदेशों से कूपमंडूक आमंत्रित करते थे, उन्हें शिर माथे बैठते थे जब कि दूसरे कुएं का मंडूक छपकोरियां मारता करतब जितना भी दिखाए, उसे आप के कुंओं की गहराई का ज्ञान हो ही नहीं सकता क्योंकि उसे इन पातालभेदी कुओं से डर लगता है।