Post – 2017-03-11

प्राच्यविमुखता का इतिहास – 50

हम पिछली चर्चा में किसी अंग्रेज मिशनरियों की नजर से हिन्दू समाज को देख रहे थे, साथ ही यह भी बता रहे थे कि जो कुछ वे देख रहे थे वह मिथ्याप्रतीति या हैल्युसीनेशन नहीं था, जिसके लिए उनको दोष दिया जा सके या उन्हें सिरफिरा कहा जा सके। वे उसे देख रहे थे जिन्हें हम अपनी चेतना में घट्ठे पड़ जाने के कारण देख कर भी देख नहीं पाते थे। वे हमे उस रूप में नहीं देख पाते जैसे हम अपने को देखने की आदत डाल लेते हैं. कोई भी अजनबी हमे पहली बार आश्चर्य की तरह देखता है और आहत अनुभव करता है।

आहत हमें होना चाहिए, क्योंकि ये हमारे समाज की विकृतियां हैं, जिनको किसी दूसरे को नहीं, हमें सहना पड़ता है। जिन्हें हमारे अपनों को भोगना पड़ता है। जो दूसरा इस पर आहत अनुभव करता है और इसके लिए हमारी भर्त्सना करता है, वह सच कहें तो उस घट्ठे की निष्प्राण कोशिकाओं और संवेदी तन्त्र को पुनर्जीवित करके हमारी मदद करता है। हमारी चेतना को झकझोर कर उसमें सक्रियता पैदा करता है, परन्तु यह इतना कठिन काम है कि कुछ संवेदनशील और असाधारण चेतना संपन्न व्यक्तियों की ही चेतना इन घट्ठों से मुक्त हो पाती है, दूसरे इसका विरोध करते है। संस्कृति के भीतर भी अपसंस्कृति के इतने कोने और इतने रूप होते हैं कि उनकी पहचान करना तक एक चुनौती है।

यदि स्वीकार बाद भी यह भय हो कि अपने दोषों को जानने के साथ ही हम लुगदी में बदल जाएंगे तो हम उस सोच को भी समझना चाहेंगे। यह सोच इसलिए पेदा होती है कि दबंग तबको, देशों और संस्कृतियों ने भौतिक रूप में पराजित जनों के मनोबल को तोड़ने के लिए, उनकी कमियों को बार बार दुहरा कर, उनको जलील किया है। ऐसी स्थिति में अपनी कमियों पर पर्दा डालना एक रक्षाकवच है।

ऐसे लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए यह निवेदन करना जरूरी है कि आत्मग्लानि और आत्मालोचन में अंतर है। यदि कोई आत्मग्लानि से बचना चाहता है, तो उसे एक ओर तो मैं गांधी जी की स्वतन्त्रता की परिभाषा की याद दिलाना चाहूंगा कि स्वतन्त्रता में गलती करने की छूट भी शामिल है, क्योंकि मालिक स्वयं हजार गलतियां करता रहे, उसकी ओर कोई उंगली नहीं उठा सकता, परन्तु यदि उसके सेवक से उसकी सेवा के क्रम में एक प्याला भी टूट जाए तो वह उसे अपमानित कर सकता है।

गलती मनुष्य से होती है, इससे कोई बच नहीं पाता, परन्तु गलती कभी प्रभुओं की नहीं मानी जाती, और सेवक की चूक को ले कर भी आसमान सिर पर उठा लिया जाता है। इसलिए यदि स्वामी को गलती करने का अधिकार है, उसकी चूक को क्षम्य माना जाता है तो जो गलतियां स्वभावतः हो जाती हैं तो उनका सभी को अधिकार होना चाहिए।

जो गांधी को दार्शनिक नहीं मानते उन्हें पता लगाना चाहिए कि स्वतन्त्रता की ऐसी परिभाषा उनसे पहले के किसी दार्शनिक ने की है क्या?

परन्तु हमें क्या इस स्वतन्त्रता के चलते यह मान लेना चाहिए कि गलती गलती है ही नहीं? हम गललियां करते रहेंगे और इनसे बचने का उपाय भी न करेंगे।

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं, हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं। दाग का यह शेर मुझे बहुत प्रिय है परन्तु दूसरी पंक्ति को मैं कभी कभी इस रूप में भी पढ़ना चाहता हूॅं कि ‘मैं खुद को भी उनकी नजर से देख रहा हूं । जिस व्यक्ति और समाज में आत्मनिरीक्षण की यह शक्ति नहीं है उसमें आत्मबल पैदा नहीं हो सकता। परन्तु जिस तत्व का आधुनिक जगत में अभाव है वह आत्मबल ही है।

आज तक यह समाज मानवता के नियम से चलता ही नहीं रहा; प्रभुत्व के नियम से और प्रभुओं की जरूरतों के अनुसार चलता रहा है। इसमें सबसे दुर्लभ वस्तु स्वतन्त्रता ही है।

पूंजीवाद हो या समाजवाद इन्होंने गुलाम संस्कृतियां पैदा की है। पूंजीवाद में तो पूंजीवादी देशों का शीर्ष पुरुष भी पूंजीवादियों का गुलाम होता है और अपनी जगह पर तभी तक रह पाता है जब तक वह इस गुलामी की शर्तें पूरी करता है। वह आजादी का अर्थ तक नहीं समझ सकता।

समाजवादी देशों में इतनी भी आजादी नहीं होती कि कोई यह पूछ सके कि समाज की तुम्हारी परिभाषा क्या है, और इस डर से प्रश्न पूछने तक की आजादी से वंचित कर दिया जाता है। आजाद व्यक्ति की कल्पना साम्यवाद का सपना था, जो उस तन्त्र के कारण ही सफल नहीं हो सकता था। यह सपना गांधीवाद का भी था जो सफल हो सकता था, परन्तु छद्म पूंजीवाद ने उसे सफल न होने दिया.
उसके बिना पूरी दुनिया गुलामी के वेश परिवर्तन के साथ गुलाम बने रहने को बाध्य है।

विचित्र बात है कि विषमता की उत्पत्ति के कारणों का जैसा सुथरा विवरण पुराण में मिलता है वैसा मार्क्स में भी नहीं मिलता। अधिक विचित्र बात यह कि जिसे गांधी समझ पाते हैं उसे मार्क्स तो समझ ही नहीं सकते थे, पश्चिमी शिक्षा में सने नेहरू को भी न दीखा। इसकी व्याख्या करने भी चलूं तो कई पाठकों को बगुला चले हंस की चाल

ऐसी हालत में क्या बात आगे बढ़ाई जा सकती है?

कल तय करेंगे, परन्तु यह समझ पैदा होने के बाद कि अपनी व्याधियों और विकृतियों की मौजूदगी और उनकी प्रकृति को जानना उनसे मुक्ति की पहली शर्त है।

परन्तु जो आत्मग्लानि से उबर न पा रहे हों, उनके लिए यह बताना जरूरी है कि ऐसी विकृतियां और संवेदनहीनताएं और व्याधियां सभी समाजों में होती हैं। हम केवल दूसरे की कमियों को लक्ष्य कर पाते हैं, उन पर आहत होते हैं, परन्तु अपनी कमियों को लक्ष्य नहीं कर पाते। यदि ऐसा हो पाता तो विश्वमानवता के मानदंड अपना पाते। जिनको अब तक मानसिक ग्लानि के कारण मेरा कथन समझ में नही आ रहा हो, वे यह समझ कर प्रसन्न हो सकते हैं कि वे मानदंड भारतीय आदर्श के अनुरूप ही हो सकते हैं।

भौतिक प्रगति सभ्यता का मानदंड नहीं है। यह शक्तिसंपन्नता का प्रमाण है। विज्ञान संपन्न रावण, जिसने सभी देवों या प्राकृतिक शक्तियों पर अधिकार कर रखा है वह अत्याचारी राक्षस है, और उसके विरुद्ध, उसके अन्याय के विरुद्ध संग्राम करने वाला राम सभ्यता का रक्षक। सभ्यता की रक्षा के लिए अवतार लेने वाला, लोकहितकारी व्यक्ति जो बाद में गांधी का आदर्श भले न बना हो, उसकी राज्यव्यवस्था गांधी का सपना थी।

इसके साथ आप की पीड़ा को दूर करने के लिए यह भी बताएं कि भारत जैसा विशाल देश अपराध के मामले में, इंग्लैंड से इतना पीछे था कि भारत से कालापानी की सजा पाने वाले अंडमान का छोटा सा द्वीप भी पूरा न बसा सके, इंग्लैंड जैसे छोटे से द्वीप के कालापानी की सजा पाने वालों ने आस्टेलिया का महाद्वीप आबाद कर दिया।

हमें दूसरों की नजर में उठने के लिए न तो अपनी व्याधियों को छिपाने की जरूरत है, न अपनी विशेषताओं का कीर्तन करने की। पर यह सोचने की जरूरत तो है ही कि यदि बालिकाबध अपराध मान लिया गया तो भी क्या आज बेटी बचाओ की चीत्कार क्यों लगानी पड़ रही है? आज भी भ्रूण के लिंग परीक्षण का कारोबार कैसे चल रहा है? आज भी नाबालिग बच्चियों के सेक्स का अंतर्राष्ट्रीय अपराध कैसे चल रहा है जिसमें अपने को सभ्य कहने वाले देशों के टूरिस्ट इसी प्रयोजन से अनेक एशियाई देशों की यात्रा करते हैं जिस सेक्स टूरिज्म में भारत भी शामिल हो चुका है? आज भी अनाथ बच्चों का अपहरण करके मेडिकल रैकेट कैसे चल रहा है जहां अंग प्रत्यारोपण के लिए विदेषियों के लिए भारत चिकित्सा की धुरी बन गया है और असंख्य बच्चे हर साल गायब होते हैं जिसका केवल एक नमूना निठारी कांड में सामने आया था और हमने मान लिया कि पुलिस ने एक अपराधी को पकड़ लिया तो अपराध समाप्त हो गया। अपने को बचाने के लिए अपने को जानना जरूरी है और अपने को जानने का एक रास्ता रोगवैज्ञानिक परीक्षणों का सामना करना है।
हम अपने विषय पर तो आ ही न सके। आगे कुछ सुनने समझने का धीरज आप में भी न बचा होगा। अस्तु!

Post – 2017-03-11

जो लोग भारत की बर्वादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी का नारा लगा रहे थे और जो लोग और दल उनके साथ तालियां बजा रहे थे क्या उन्हें पता है कि वे बहुत पहले से मोदी के इलेक्शन कैम्पेन में शामिल थे. अपने मक़सद में कामयाब होने कि ख़ुशी में लड्डू उन्हें बाटना चाहिए और नारा लगाना चाहिए: जब तक अपना काज चलेगा मोदी तेरा राज चलेगा !

Post – 2017-03-10

कहें न कुछ तो कहोगे कि कुछ नहीं कहता
कहें अगर तो कहोगे जबान लंबी है !
छोड़ो औरों को उन्हें कहने दो जो कहते हैं
खरी कटी भी हो लगती जबान लंबी है ।

Post – 2017-03-10

उत्तरकांड

मैंने पहले यह कई बहानों से कहा है कि मैं न तो सही सोच पाता हूं, न सही लिख पाता हूं, पर इसमें यह जोड़ना जरूरी है कि सही जैसी कोई चीज होती ही नहीं। जिसे हम सही मानते हैं, वह सापेक्ष्य रूप में सही या गलत होती है, और जो सबसे गलत होता है वह गलत कभी हो ही नहीं सकता, जैसे तानाशाह; जैसे मनोविक्षिप्त; जैसे भावाविष्ट । सही, गलत, सामान्यता, शुद्धता आदि संकल्पनाएं हैं जिनकी पूर्णता ही इनका निषेध करती हैं। जैसे सामान्य या नार्मल होने की चेष्टा में व्यक्ति यंत्रमानव बन कर रह जाय, अर्थात् सबसे अधिक असामान्य। हम अपनी ओर से इन आदर्शों की दिशा में बढ़ने का प्रयत्न करते हैं और तभी तक सुरक्षित हैं जब तक इनकी पूर्णता पर नहीं पहुंच जाते। मेरा प्रत्येक लेखन, पिछले लेखन के अधूरेपन को भरने की पूरी कोशिश भर होता है जिसका अन्त अधूरेपन में ही होता है। यह कथन कल की दो प्रतिक्रियाओं के सन्दर्भ में जरूरी लगा।

मैं एक दूसरे शब्द की ओर आपका ध्यान दिलाऊं। ऊहापोह । इसमें ऊहा का अर्थ आपमें से अधिसंख्य को पता होगा, अर्थात् हवाई खयाल या ऐसी कल्पना जिसका पुष्ट आधार न हो। पोह का अर्थ कम को पता होगा। इसका अर्थ है पिरोना, क्रमबद्ध करना। इस क्रम में ही विचार का जन्म होता है, तर्क वितर्क और निष्कर्ष का थीसिस-एन्टीथीसिस-सिन्थिसिस का द्वन्द्वात्मक अग्रसरण । इसलिए आपकी आपत्तियां भी सार्थकता रखती है, सहमतियां भी।

हम प्राच्यविमुखता पर विचार कर रहे हैं न कि अंग्रेजों या ऐग्लिकन चर्च की महिमा पर। परन्तु यदि किसी को इस बात में सन्देह हो कि जिस चरण पर हमारा उनसे संपर्क हुआ उस पर वे हमसे सभी दृष्टियों से आगे थे, तो उसे कुछ तटस्थ हो कर सोचना चाहिए। उनके प्रचारकों में भी अपने धर्म प्रचार के लिए जैसी निष्ठा थी, उन्होंने जिन चुनौती भरी स्थितियों में उन जनों का अध्ययन किया जिनमें प्रचार कार्य करना था, वह दो-ढाई हजार साल पहले बौद्धों में और उससे भी पहले आर्या व्रता विसृजन्तः अधिक्षमि के संकल्प वाले वैदिक जनों में तो था, जिसके प्रमाण है एशिया में, बौद्ध मत का प्रसार और उससे पहले आर्य या तथाकथित भारोपीय भाषा का विस्तार, परन्तु उसके बाद से यह गायब है।

इसके बाद भी यह आत्मतोष बना रहे कि हम किसी से कम नहीं हैं, और अपने ही इतिहास के सुदूर चरणों को इन मामलों में अपने आज की तुलना में आगे और जीवट और कर्मठता में आज तक के अग्रणी से अग्रणी समाजों के समकक्ष या यत्किंचित आगे, पा कर घबराहट अनुभव करें कि इससे तो हममें पिछड़ापन आ जाएगा तो इसका कोई इलाज नहीं है। हम आज अपने अतीत से भी पीछे है और आज के अग्रणी समाजों से भी पीछे है, इस आत्मबोध के बाद ही वह विश्वास पैदा हो सकता है कि हममें वह निसर्गजात शक्ति है कि ठान लें तो आज भी अनन्य बन सकते हैं, परन्तु वह कार्यनिष्ठा, समर्पणभाव, और महत्वाकांक्षा कहने से पैदा न होगी, अपने को बदलने से ही पैदा होगी।

Post – 2017-03-09

प्राच्यविमुखता का इतिहास -49

कुछ लोग सोचते हैं कि भारत में अंग्रेजी राज एक जरूरी हस्तक्षेप था। उन्हें गलत नहीं माना जा सकता। यदि अठारह सौ सत्तावन का विद्रोह सफल हो गया होता तो मध्यकालीन मूल्यों की गहरी जड़ों के कारण देश की राजनीतिक दशा आज से भी बुरी होती, इसके प्रमाण हम अपने आचरण से पेश करते जा रहे हैं। इतिहास इतिहास है, उसमें जो घटित हुआ उससे भिन्न कुछ भी कल्पित करें, वह मात्र मनोविलास है।

ठीक इसी तरह कुछ लोग मानते हैं ईसाइयत से टकराव इस देश के लिए हितकर रहा। कहा जा सकता है कि टकराव तो हितकर रहा पर फैलाव अनिष्टकर है।

हम सभी अपने आप से, अपने समाज से, अपने धर्म और मूल्यव्यवस्था से इतने आसक्त होते हैं कि इनकी कमियों या विकृतियों को देखने और दिखाने वाला सिरफिरा या दुष्ट प्रतीत होता है। आलोचना के लिए जिस तीसरी आंख की जरूरत होती है वह हमारे पास नहीं होती । यह उस आईने से पैदा होती है जो हमारे निंदकों द्वारा हमारे छिद्रान्वेषण के क्रम तैयार होता है। दूसरों को हम जिस रूप में दिखाई देते हैं उसको भी चेतना में स्थान देने से पैदा होती है।

इस्लाम के पास विश्वास था, विचार नहीं था, इसलिए न तो उसको औजार बना कर इसने दूसरों की आलोचना की न ही आत्मालोचन किया। आत्मालोचन की क्षमता पोपतान्त्रिक ईसाइयत में भी नहीं है। यह विशेषता ऐग्लिकनचर्च में पैदा हुई और इसलिए सबसे पहले इसने पोपतन्त्र से मुक्ति पाई। यही कारण है कि दूसरे ईसाइयों की तुलना में बर्तानवी ईसाइयों में विश्वास के समनुपात में विचार भी बना रहा।

यदि यूरोप के दूसरे उपनिवेशवादियों की तुलना में अंग्रेजों का व्यवहार अधिक तर्कसंगत था तो इंगलैंड के चर्च में भी दूसरों की अपेक्षा अधिक तार्किकता थी और इसका प्रयोग इसने अपने प्रचार कार्यों में भी किया। सच कहें तो बंगाल के प्रबोधन में जितनी भूमिका कंपनी के विधिवाद से मिले प्रतिरोध के अवसर का है उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका ऐंग्किलन चर्च की प्रखर आलोचना का भी है जो हिकारत से अधिक समाज को सुधारने और इसमें राज्य के हस्तक्षेप की मांग के रूप में सामने आया और इसके दबाव से बाहर आने के लिए आधुनिक चेतनासंपन्न सभी अग्रदूत- राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, विवेकानन्द, गांधी, सभी = ईसाइयत से टकराते हुए अपने को वर्णवादी सोच और उस मानसिकता से पैदा हुई विकृतियों से समाज को बाहर लाने का आन्दोलन चलाते हैं।

ईसाइयों को भारतीय समाज का उद्धार करने के लिए इसकी बुराइयों पर ही ध्यान केन्द्रित करना था। इन बुराइयों में से कुछ को आप सभी जानते हैं, कुछ को बहुत कम लोग ही जानते होंगे क्योंकि उनको लेकर अधिक चर्चा नहीं हुई । जिन बुराइयों को जानते हैं, वे कहां से पैदा हुई या कब उन्होंने भारतीय समाज में प्रवेष किया इससे भी कम लोगों का ही परिचय होगा। हमने ईसाइयत का सामना होने से पहले कभी इन बुराइयों की ओर ध्यान नहीं दिया। ऐसे आन्दोलनकारी भी जो जाति और वर्णभेद को ले कर आन्दोलन करते रहे, उनकी दृष्टि भी इनसे मुक्ति की ओर नहीं गई। अतः हम मान सकेते हैं कि मिशनरियों, और विशेषतः ब्रिटिश मिशनरियों की कटु आलोचना के अभाव में हमारे उन चिन्तकों का ध्यान भी आत्मालोचन और आत्मशुद्धि की ओर न गया होता और वे आज भी जारी रह सकती थी।

इनमें कुछ का परिचय इस प्रकार हैः

1. सती प्रथा – इसके बारे में इतना अधिक लिखा गया है कि लगता है इसके विषय में कुछ जानने को बचा नहीं है। फिर भी यह निवेदन किया जा सकता है कि राजतरंगिणी के अनुसार यह कुप्रथा मध्येशिया से आई थी। पहले इसके विरल नमूने ही देखने में आते थे। मध्यकाल में अपमान से बचने के लिए यदि राजपूतों ने प्राणान्त तक युद्धभूमि से पीछे न हटने का व्रत लेकर केसरिया बाना पहना तो स्त्रियों ने जौहर का व्रत लिया और इसके बड़े पैमाने पर कई बार आयोजन हुए परन्तु स्वेच्छा से सामान्य स्थितियों में इसका वरण करने वाली महिलाएं लाखों करोड़ों में एक हुआ करती थीं, इसलिए इनको देवी मान कर पूजा करते थे। नव विवाहिताएं उनके स्थान पर सिर झुकाने जाती थी। बंगाल में इसके पीछे आथिैक कारण प्रधान थे और इसमें असाधारण बढ़ोत्तरी कंपनी प्रशासन के बाद ही हुई । यदि आप किसी के जिन्दा जलने या जलाए जाने की प्रथा किसी भिन्न समाज में लक्ष्य करें तो वह पूरा समाज कितना क्रूर, संवेदनशून्य प्रतीत होगा इसकी कल्पना कर सकते हैं।

2. काशी- मथुरा- वृन्दावन-वास – राजा राममोहन राय के प्रयत्न से सती प्रथा पर प्रतिबन्ध तो लग गया, परन्तु समाज की चेतना में ओर सोच में परिवर्तन नहीं आया। जीवित जलाने की जगह आखों से ओझल करके उनकेा निपटाने का सिलसिला बहुत बाद तक चलता रहा। कारण वह अनमेल विवाह, आर्थिक बोझ को कम करने और इज्जत बचाने की ग्रंथि। राममोहन राय ने इसके साथ ही विधवाविवाह का भी आन्दोलन चलाया था, वह सफल नहीं हुआ। अकेले विद्यासागर थे जिन्होंने विधवा से विवाह किया।

3. आत्महत्या – चाल्र्सग्रांट ने जगन्नाथपुरी की रथयात्रा देखने के लिए अपनी यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों भारी भीड़ को असह्य दुर्गति सहते हुए पुरी की यात्रा करने का और महारथ के सामने कूद कर प्राण देने का वर्णन किया है वह विचलित करने वाला है। पर साथ ही तीर्थ यात्रा पर टिकट लगा कर कमाई करने के लिए कंपनी के प्रबध का उसने उल्लेख तो किया है पर कोई आलोचना नहीं की है। आत्महत्या का एक रूप गंगा में कूद कर प्राण देना भी था।

4. कासी करवट – संभवतः यह किसी एक ही पंडे की पैशाचिक योजना थी परन्तु थी बहुत पहले से चली आ रही क्योंकि इसका उल्लेख कबीर ने भी किया है। यह था क्या इसका पता कबीर को भी न रहा होगा। सदेह स्वर्ग जाने कि इच्छुक धनी जजमान को उस कमरे में ले जाकर पूजापाठ कराया जाता और उससे भारी दान दक्षिणा वसूल की जाती । उसके परिजन उस कक्ष में नहीं जा सकते थे क्योंकि उसमें जाने के बाद वे भी स्वर्ग चले जाते। अंग्रेजों ने जब इसका रहस्य पता किया तो पता चला कि उस कमरे में जजमान को जिस पटरे पर बैठाया जाता वह ढेकीनुमा था। उसके नीचे गंगा से आई एक नहर थी जिसमें घड़ियालों का वास था। दान दक्षिणा वसूल करने के बाद अपने आसन से पंडा हटता कि इधर पटरा दूसरी ओर उलट जाता। वह नीचे नहर में जा गिरता और उसकी मनोकामना घड़ियाल पूरी कर देते। इसके बाद पटरा वापस और कमरे से वह स्वर्ग यात्री गायब। उसके परिजन यह देख कर संतुष्ट हो कर चले जाते कि वह सदेह स्वर्ग चला गया।

5. बालिका वध – यह मध्यकालीन क्रूरता आत्मसम्मान की रक्षा से जुड़ी थी जिसका उल्लेख हम पहले कर आए हैं।

6. बालविवाह – इसकी क्रूरता को हम समझ नहीं सकते, विषेषतः अनमेल विवाह के मामलों में। इसे हरबिलास शारदा जी की नजर से देखें तो “where a social custom or a religious rite outrages our sense of humanity or inflicts injustice on a helpless class of people, the Legislature has a right to step in. Marrying a girl of three or four years and allowing sexual intercourse with a girl of nine or ten years outrages the sense of humanity anywhere.”

7. देवदासी प्रथा जिसके बारे में हम सभी को कुछ पता तो है ही पर इसे मेयो के शब्दों में रखें तो The little creature, accordingly, is delivered to the temple women, her predecessors along the route, for teaching in dancing and singing. Often by the age of five, when she is considered most desirable, she becomes the priests’ own prostitute.
If she survives to later years she serves as a dancer and singer before the shrine in the daily temple worship; and in the houses around the temple she is held always ready, at a price, for the use of men pilgrims during their devotional sojourns in the temple precincts. She now goes beautifully attired, often loaded with the jewels of the gods, and leads an active life until her charms fade. Then, stamped with the mark of the god under whose aegis she has lived, she is turned out upon the public, with a small allowance and with the acknowledged right to a beggar’s livelihood. Her parents, who may be well-to-do persons of good rank and caste, have lost no face at all by the manner of their disposal of her

8. मरिया प्रथा – यह हिन्दू समाज में प्रचलित न था पर सबरों में मनौती पूरी करने और इसक द्वारा धरती को उपजाऊ बनाने के लिए किसी दूसरी जनजाति या सभ्य समाज के बच्चे को चुरा ले जाते और उसे अपने बच्चे की तरह ही पालते पोसते थे। उस बच्चे को अपनी होनी का पता नहीं रहता। पर खेल कूद में यदि दूसरे किसी बच्चे से उसके मरिया होने का पता चल जाता या इसका सन्देह उसे पाल कर रखने वाले को हो जाता उसके बाद उसे बांध कर रखते। उसे शराब पिलाने की आदत डालते और पक्का शराबी बना देते । बलि के दिन उसे भरपूर शराब पिलाते और गाते बजाते बलि स्थल पर ले जाते। वहां एक गड्ढा होता जिसमें सूअर काट कर उसका खून भरा जाता और मरिया हो उसी में सर के बल तब तक दबाए रहते जब तक दम घुट कर वह मर नहीं जाता। फिर उसकी बलि दी जाती और उसके मांस का एक एक टुकड़ा प्रसाद के रूप में सभी ला कर पकाते खाते थे।

9. नरबलि के विषय में विस्तार से कुछ बताने की आवश्यकता नहीं, परन्तु बलिपशु की अवधारणा बहुत पुरानी है जिसका एक उदाहरण तो शुनःशेप की कथा में ही आता है जो ऋग्वेद में कई सूक्तों में वर्णित है। मध्यकाल में ठगों, डकैतों के द्वारा शक्ति की उपासना और बलि की कहानियां डरावनी हैं। कर्नल स्लीमैन के ठग्स: ए मिलियन मर्डर्स में इनकी धोखाधड़ी, विश्वासघात और क्ररता की जो कहानियां मिलती हैं वे रोंगटे खड़े करने वाली हैं, पर मजे की बात यह कि अपने गांव जवार में इनकी बड़ी इज्जत थी।

अब आप अपने को हिन्दू से इतर किसी भी भावभूमि पर रख कर इतनी गर्हित रीतियों और विश्वासों में जकड़े हुए समाज और उसके धर्म के बारे में कोई धारणा बनाएं तो वह कैसी होगी? क्या उसके प्रति आपके मन में कोई सम्मान पैदा होगा? यह ध्यान रहे कि प्राच्यवादी भी इन रीतियों को गर्हित मानते थे, कोई भी विवेकवान व्यक्ति गर्हित मानने को बाध्य होगा, हमारे नेतृवर्ग ने भी इन्हें असह़्य माना और इनके निवारण के लिए तत्पर हुए।

Post – 2017-03-08

प्राच्यविमुखता का इतिहास -४८

हम बहुत कम मौकों पर किसी वस्तुव्यापार के लिए सही शब्द का प्रयोग कर पाते हैं। कई बार लगता है कि हमसे गलती हो रही है, पर क्या, यह तक समझ में नहीं आता। हम कर रहे हैं वह ठीक नहीं है, इसका बोध होता है, पर यह समझ में नहीं आता कि यदि यह ठीक नहीं है तो ठीक क्या है। इसका एक उदाहरण अपने अनुभव से दूं।

मैंने अपने सबसे पहले और मेरे आज तक के कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण और बाद के कार्यों की जननी कृति को काफी उधेड़ बुन के बाद नाम दिया आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता । पुस्तक छप गई, सारी प्रतियां बिक गईं, कुछ अशोभन भी घटा, कुछ अकल्पनीय भी मिला, पर मैं इसको पुनर्मुद्रित कराने से बचता रहा। कारण यह कि मुझे लगता रहा कि इस पुस्तक के लिए यह शीर्षक ही गलत है। मैं सही हूं, परन्तु यह हमारे पाठक या श्रोता तक एक भिन्न आशय के साथ ग्रहण किया जा सकता है। इससे उस सिद्धांत को बल मिलता है जिसका पुस्तक में खंडन किया गया है। संदेश यह जाता है कि मूलतः कोई एक भाषा थी जिससे आर्य और द्रविड़ परिवारों में गिनी जाने वाली भाषाएं निकली हैं।

पुस्तक में यह प्रतिपादित था कि भारत में असंख्य बोलियां थी, जिनमें लंबें संपर्क के कारण कतिपय ध्वनिगत साझेदारियां और स्वीकार्यतायें थी और इनके समन्वय से एक उन्नत भाषा पैदा हुई, जो मेरा आशय न था।

मैं मानता था, क्षमा करें, मैं समझता था कि भारत में असंख्य बोलियां चलन में थी। मानता यह था कि लंबे सामाजिक संपर्क के कारण उनकी भिन्नताएं कम हो गई थीं। उनकी साझी ध्वनिमाला बन गई थी। इस सीमा में ही याजिकीय प्रयोजन से एक बोली के बर्चस्व के कारण उसे व्यापक मान्यता मिली और उसमें कर्मकांड के कारण उन्हीं घोष ध्वनियों का अधिक जोर से, या महाप्राणित, उच्चारण करने के कारण सघोष महाप्राण ध्वनियां पैदा हुईं।

मेरे इस भ्रम का निवारण करने वाला कोई नहीं था कि नई ध्वनियां, या किसी भिन्न भाषा की ध्वनियां जब हम ग्रहण करते है तो उनके अनुरूप बनने के लिए हमारी अपनी ध्वनिमाला में क्या परिवर्तन होते हैं जिसमे कुछ नई ध्वनियों को हम सुन और समझ सकते है, पर बोलें तो अनर्थ हो जाता है। यह बात रामविलास जी को पढ़ने के बाद समझ पाया कि ध्वनियों का परिवर्तन सम्भव तो था परंतु इतना आसान नहीं था।

खैर, सही शब्द या अभिव्यक्ति क्या हो सकती है इसे समझने में बीस साल लग गए और उसी पुस्तक को जब कुछ अदल बदल के साथ प्रकाशित कराया तो जो शीर्षक रखा उससे भी सन्तुष्ट नहीं हूं, पर यह मानता हूं कि यह पहले से अच्छा है।

जो हम सोचते है या कहना चाहते हैं पर सोच भी नहीं पाते, क्योंकि सोचना भी भाषा के माध्यम से ही होता है, कह पाना, दूसरों तक इस तरह पहुंचा पाना कितना कठिन है, इसे वाचाल लोग जानते नहीं, चुप्पे अपनी वाणी तलाशते ही हार मान जाते हैं।

ठीक यही स्थिति हमारी इस लेखमाला के साथ भी रही। मैंने इसे नाम दिया, ‘हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास’, परन्तु आप ने भी पाया होगा कि हमारे विवेचन में सभी स्तरों और रूपों में यह घृणा नहीं रहती, प्रेम तो हो ही नहीं सकती, विरक्ति इसके मूल में है ।इसमें घृणा के भी दौर हैं, विरक्ति उसे संभाल नहीं सकती; हिन्दुत्व भारतीयता को संभालना चाहे भी तो संभाल नहीं सकता; एक भौगोलिक सत्ता के रूप में भारत की पहचान पूरे भारत देश के लिए कभी थी भी नहीं, आज भी नहीं है, प्राच्य अधिक समावेषी है, पर इसमें अतिव्याप्ति भी है जब कि इतिहास में जब से भारत से पश्चिम का परिचय हुआ, प्राच्य का प्रयोग भारत के लिए, उससे पहले ईरान के लिए और उससे भी पहले अनातोलिया या आधुनिक तुर्की पर अपना दबदबा जमाए भारतीयों के लिए होता था।

साड़ी के रंग और डिजाइन का चुनाव करती महिलाओं के यह-या-वह या-वह या यदि गांठ साथ दे तो सभी के चुनाव जैसा ही है एक जटिल ऐतिहासिक विकास के लिए सटीक शब्द चुन पाना। फिर भी मुझे लगा यदि इसे प्राच्यविमुखता का इतिहास कहें तो दूसरे सभी नामों से यह अधिक सटीक होगा।

अतः आज इस शीर्षक को अपने अब तक के लेखों के लिए भी व्यवहार्य मानते हुए आगे इसी का प्रयोग उचित समझता हूं। पहले के लेखों को इसमे समाहित करते हुए इसे आज के शीर्षक के क्रमांक में शामिल करते हुए इसकी संख्या लिखी है।

परन्तु इस प्राच्य में सन्दर्भभेद और कालभेद से एशियाटिक, प्राच्य, हिन्दुत्व, सनातनता, भारतीयता सभी समाहित हैं। अर्थात् अतिव्याप्ति और अव्याप्ति के सभी संकट जिससे प्रकट हो कि नाम ग्राह्य होते हुए भी सटीक नहीं है, एक समझौता है।

अपने आए दिन के व्यवहार में हम अपनी बात सटीक रूप में नहीं कह पाते, कामचलाऊ रूप में ही कह पाते हैं। मेरा सारा लेखन कामचलाऊ ही है। कुछ भी पूर्ण नहीं, अन्यथा उन्हीं सवालों पर बार बार विचार क्यों होता रहता। समझ की पूर्णता समझ की मौत है। आगे कुछ नहीं बचता, सिवाय अनुपालन के, और ठीक यही तब होता है जब हम किसी विचार या विचारधारा को पूर्ण या अनालोच्य मान कर उस पर सन्देह करने वालों को मिटाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

साम्यवाद ने विचार का अन्त कर दिया, विचार ने साम्यवाद का अन्त कर दिया। जरूरी दोनों हैं और इसलिए अपूर्णता से अपूर्णता के उच्चतर शिखरों की ओर बढ़ना ही उन्नति और प्रगति है और शिथिलता अवगति या खाई में पतन।

अब हम अपनी बात उस बिन्दु से आरंभ कर सकते हैं जहां हमने इसे छोड़ा था।

मैकाले राममोहन राय से मिल तो नहीं सके थे परन्तु लगता है उन पर राय द्वारा उठाए गए सुझावों का गहरा प्रभाव पड़ा था। पार्लमेंट में दिए गए उनके व्याख्यान और उनके द्वारा उच्च शिक्षा के लिए अपनाए जाने वाले माध्यम के बारे में सुझाए गए प्रस्तावों के विषय में हम पहले बात कर आए है, परन्तु उसकी भाषानीति के पीछे ईसाइयत के प्रचार का भी लक्ष्य था, यह कुछ बाद में नजर आया।

यह प्रस्ताव बहुतों को बहुत कुटिलतापूर्ण लग सकता है, मुझे इससे झटका तो लगा पर इसके पीछे कोई कुटिलता नजर नहीं आई। सचाई यह है कि हिन्दू समाज में कतिपय ऐसी कुरीतियां प्रचलित थी जिनकी कल्पना करके भी सिहरन पैदा होती है और इनके प्रचलन के कारण हिन्दू समाज अपनी संवेदन शक्ति तक खो चुका था।

मैं कुछ बातें विभिन्न सन्दर्भो में कई तरह से दुहराता आया हूं। दुहराने के बाद भी मेरे ऐसे पाठक भी उन्हें समझ पाये हैं, उनकी चेतना में परिवर्तन हो पाया है ऐसा लगता नहीं। कारण, मेरे ऐसे पाठक भी, जो मुझे नियमित पढ़ते हैं, उनकी प्रतिक्रियाएं कुछ सवालों पर मेरी अपेक्षा से भिन्न होतीं। मुझे इससे निराशा नहीं होती। जानता हूं कितना कठिन है चेतना के रूप को बदलना। जानता हूं कि त्वचा में लगातार रगड़ खाने से ही घट्ठे नहीं पड़ते, किन्हीं कुरीतियों के लगातार चलते रहने से उनके विषय में जो निर्वेदता या संवेदनहीनता पैदा होती है उसके चलते दिमाग में भी घट्ठे पड़ जाते हैं। हो सकता है आप में से कुछ को घट्ठा का अर्थ भी पता न हो। यह भोजपुरी का शब्द है और अनुमानत इसका अर्थ है लगातार घिसते रहने, या घर्षण होते रहने से पड़ी गांठ है, जिसमें हमारी जीवन्त कोशिकाओं तक पहुंचने वाला रक्तसंचार क्षीण होते होते बन्द, संवेदी तन्तु मन्द होते होते बन्द हो जाते हैं और अब उनसे बनी गांठ हमें घर्षण की वेदना से बचाती है, पर उसका दबाब उससे ठीक नीचे के ऊतकों को अनुभव तो होता है परन्तु धीरे धीरे वे भी मरने लगते हैं और गांठ का हिस्सा बन जाते हैं और गाँठ बढ़ जाने पर स्वयं पीड़ा देने लगती है ।

ठीक ऐसा ही मानसिक संचार प्रणाली के साथ होता है। न्यूजपेपर का अर्थ तो जानते होंगे। न्यूज का अर्थ है जैसा पहले न सुना था न जाना था और वह पहली बार दिखाई दिया तो दुनिया को बताना था। कल मैं आपको यह समझाने का प्रयत्न करूंगा कि ईसाइयत से टकराव से हमारा कितना लाभ हुआ और फिर यह कि ईसाइयत के जाल से हम किनके शिकार हो रहे है। इसी में यह भी प्रकट होगा कि हिन्दुत्व क्या है, प्राच्य मनीषा क्या है और क्यों वे जो इसे नष्ट करके कहीं से कुछ पाना चाहते हैं वे नादान हैं, और क्यों जो इसे बचाने की चिन्ता में, जो नवजीवन के लिए ग्राह्य है, उसे ग्रहण करने से कतराने और जो हैं वहीं बने रहने के लिए आग्रही जन जड़प्राय है।

परन्तु याद यह भी दिला दें कि यहां से प्राच्यविमुखता भारतविमुखता बनती हुई हिन्दुत्वविमुखता या हिन्दुत्व के प्रति घृणा का रूप कैसे लेती है कि जिन अवधारणाओ, क्रियाओं, कालों, परिघटनाओं के साथ हिन्दूशब्द के जुड़ने की संभावना तक हो उनसे हम विरक्त ही नहीं हो जाते, उन्हें मिटाने तक को कटिबद्ध हो जाते हैं।

Post – 2017-03-06

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 47
(स्वतन्त्रता संग्राम की आधारशिला )

उन्नीसवीं शताब्दी सही अर्थ में भारतीय इतिहास का संक्रान्तिकाल है। आत्ममंथन के जितने रूप और स्तर इस शताब्दी में दिखाई देते हैं, जिस तरह का प्रबोधन इस शताब्दी में देखने में आता है, वह हलचलभरी बीसवीं शताब्दी में नहीं मिलता और इक्कीसवीं शताब्दी में तो लगता है हम अपने ह्रास काल से गुजर रहे हैं। संभवतः एक कारण यह हो कि उपनिवेशवादी दौर अधिक डरावना प्रतीत होते हुए भी नवउपनिवेशवादी दौर से कम खतरनाक और अधिक उत्तरदायी था। यदि कोई इसका उपहास करे तो हंसी में मैं भी शमिल हो जाऊंगा।

यह मजेदार बात है कि प्रबोधन के सभी रूपों का समारंभ अंग्रेजों ने किया। दूसरों की जहां उपस्थिति थी वहां भी उनकी प्रगतिशील भूमिका दिखाई नहीं देती। दूसरों से मेरा तात्यपर्य यूरोप की दूसरी प्रतिस्पर्धी ताकतों से है. विचारों की अभिव्यक्ति, राज की आलोचना और पत्रकारिता की भूमिका, जैसा हम देख आए है, कैलकटा गैजेटियर से आरंभ हुआ और प्रेस पर प्रतिबन्ध भी इसलिए लगाया गया कि इसमें सरकार की ऐसी आलोचना होती थी जिसका लाभ फ्रांसीसियों को मिल सकता था। जैसे यह तथ्य, जिसे उपनिवेशवादी अंग्रेज भी स्वीकार करते थे कि उस दौर में भारतीय जनता से उनका संबन्ध अंग्रेजों की तुलना में अधिक आत्मीय था। इसका प्रचार उनकी तुलना में कंपनी के अधिकारियों की क्रूरता और अहंकार दोनों को उजागर करता था और इसलिए प्रेस ऐक्ट का प्रावधान भी पहली बार उनके समाचारपत्रों पर ही लगा था।

भारतीयों में सबसे पहले राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता आरंभ की। उनका उद्देश्य हिन्दू मुसलिम दोनों समुदायों में जागृति पैदा करना था और इसलिए उन्होंने फारसी में भी एक पत्र निकाला। प्रेस ऐक्ट का विरोध करने वालों में भी वह पहले थे। मैं उनकी ज्ञानपिपासा, क्रान्तदर्शिता और वैचारिक दृढ़ता पर चकित रह जाता हूं। इतनी भाषाओं का इतना आधिकारिक ज्ञान जिनमें वह लिख सकते थे और अपनी आकांक्षा और उसकी परिणति को देख कर अवाक् रह जाता हूं। परन्तु सबसे विस्मित करने वाली बात है वैचारिक मतभेद के कारण अपने पिता से भी संबन्ध तोड़ लेना।

एक दूसरा अभियान जो चार्ल्स ग्रांट ने चलाया था जिनका व्यक्तित्व हमारे लिए इतना जटिल और पाश्चात्य अध्येताओं के लिए इतना सुथरा है कि न हम उनका सही मूल्यांकन कर सकते हैं, न वे।

उन्हें हिन्दुओं की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक अवस्था बहुत दयनीय लगती थी, पर इसके लिए कंपनी स्वयं किसी से अधिक जिम्मेदार थी यह उनकी समझ में नहीं आ सकता था। उनका आग्रह था कि सरकार को सभी दृष्टियों से उनके उत्थान का प्रयास करना चाहिए। पाश्चात्य अध्येता इसे पढ़ते हुए अभिभूत हो जाएगा और उन्हें लोकापकारी या फिलोन्थ्राफिस्ट म्रान बैठेगा, उसे इसके पीछे की चाल दिखाई न देगी। उन्हीं वाक्यों को पढ़ते हुए मैं सोचता हूं, वह हर मामले में हिन्दुओं का जिक्र क्यों करते हैं?, क्या उन्हें सभी मुसलमानों की स्थिति सभी मामलों में संतोषजनक लग रही थी? या यह कि भूराजस्व के पूराने तरीके को बदल कर जिसमें जमीन पर भूस्वामी का अधिकार था, जिसे लगान के रूप् में एक निश्चित भाग देना पड़ता था यह क्यों मानते थे कि जमीन की मालिक कंपनी है और वह अपनी मर्जी के अनुसार किसान या जमीदार जो भी अधिक लगान देने को तैयार हो उसे देती रह सकती है। उनका मूल्यांकन निम्न रूप में करना गलत न होगाः

1. वह साम्राज्यवादी थे और कंपनी के अपने अपदोहन को कम करने या दूर करने का कोई ठोस कार्यक्रम उसके पास नहीं था।
2. वह मानते थे कि सामाजिक विभेद सबसे शिलीभूत रूप में हिन्दू समाज की वर्णव्यवस्था में है पर यह भी मानते कि वर्णविभाजन की प्रकृति और क्रियाशीलता समाज या धर्म से नहीं, अपितु मनोबाधाओं से जुड़ी है क्योंकि धर्मान्तरित ईसाइयों में भी यह बनी रह गयी है।
3. ग्रांट मानते थे कि यदि हिन्दू ईसाई हो जायं तो वे ब्रिटिश सत्ता के प्रति भक्तिभाव रखेंगे, और इससे इसकी जड़ें मजबूत होंगी जब कि दूसरे यह अंदेशा जगाते थे कि यदि ईसाई हो गए तो यूरोप का ज्ञान भी प्राप्त करेंगे और कभी अमरीकियों की तरह विद्रोह भी कर बैठेंगे।
4. वह जरठ नस्लवादी थे इसलिए मानते थे कि अमरीकियों में स्वतन्त्रता की चेतना आई इसलिए कि वे यूरोपीय है, जब कि हिन्दुओं की प्रकृति उनसे भिन्न है।
5. परन्तु उनका साहसिक प्रस्ताव था कि मान लें यह अन्देशा सही हो तो भी शासन को खतरा उठाना चाहिए क्योंकि यह उसके लिए श्लाघ्य नहीं है कि वह अपनी प्रजा को अधोगति में रहने दे और और उससे उदासीन बनी रहे।
6. उसे यह अन्देशा था कि जो वर्तमान राजस्व व्यवस्था है उसमें जमींदार इतने प्रभावशाली हो सकते हैं किवे पश्चिमी ज्ञान और संस्थाओं से परिचित होने के बाद कुहराम मचाना आरंभ कर दें जिसका सीधा तरीका यह है कि उन्हें कुछ और अधिकार दे दो, इससे वे ईसाई बन जाएंगे जिसका अर्थ है स्वामिभक्त और आज्ञाकारी बन जाएंगे।

जिन सवालों पर इतिहास अपना फैसला दे चुका हो उनके औचित्य पर विचार करने का कोई लाभ नहीं, परन्तु यह याद रखना जरूरी है कि उसी वस्तुस्थिति में कितने तरह के उधेड़बुन चल रहे थे और कौन सही सिद्ध हुआ।

राजा राममोहन राय और चाल्र्स ग्रांट दोनों अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे जब कि कंपनी इस विषय में आशंकित थी। राममोहन राय इसलिए संस्कृत और अंग्रेजी के बीच अंग्रेजी से समर्थक थे कि इससे आधुनिक ज्ञान विज्ञान तक पहुंच हो सकती है, शिक्षा का प्रसार व्यापक हो सकता है, और इससे सरकार के कील कांटों की अच्छी समझ हो सकती है! जब कि संस्कृत से रूढ़िवादिता और अंधविश्वास को बल मिलेगा और समाज दो हजार साल पीछे चला जाएगा और शिक्षा केवल ब्राह्मणों तक सिमटी रहेगी।

ग्रांट का विश्वास था कि अंग्रेजी सीखने के बाद लोग पश्चिमी मूल्यों और मानों को अपनाने के बाद ईसाई धर्म भी अपना लेंगे। यदि संस्कृत में शिक्षा जारी रही तो ब्राह्मणों और उनके प्रभाव के कारण शेष हिन्दुओं में सद्धर्ध का प्रसार नहीं हो सकेगा। अंग्रेजी से ईसाइयत का प्रसार होगा यह विश्वास मैकाले की चेतना में भी था। वास्तव में अंग्रेजी को उच्च शिक्षा की भाषा के रूप में स्वीकार किए जाने और अंग्रेजी शिक्षा के लिए स्कूल खोलने के अभियान के और उसके तात्कालिक और संभावित परिणाम के विषय में उसने अपने एक पत्र मे लिखा थाः
O ur English schools are flourishing wonderfully. We find it difficult, – indeed, in some places impossible, – to provide instruction for all who want it. At the single town of Hoogly fourteen hundred boys are learning English. The effect t of this education on the Hindoos is prodigious. No Hindoo, who has received an English education, ever remains sincerely attached to his religion. Some continue to profess it as matter of policy; but many profess themselves pure Deists, and some embrace Christianity. It is my firm belief that, if our plans of education are followed up , there will be no idolater among the respectable classes in Bengal thirty years hence.

यदि ईसाइयत का प्रचार शालीन तरीके से वैचारिक आधार पर होता तो राममोहन राय को इसके विषय में कोई आपत्ति न होती। यदि इसके कारण कुछ लोग धर्मपरिवर्तन करते तो वह भी उनको क्षोभकर नहीं लगता। 1913 के चार्टर में चाल्र्स ग्रांट के उस पत्र पर लंबी बहस चली थी जिसे उन्होंने 1793 में लिखा और 1797 में बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स को सौंपा था पर जिसकी ओर उस विरोध के कारण ध्यान नहीं दिया गया था परन्तु इस अवधि में वह स्वयं पार्लमेंट के सदस्य बन चुके थे, बोर्ड आॅफ डाइरेक्टर्स के सदस्य बन चुके थे, 1797 तक जो आशंकाएं थीं क्षीण पड़ चुकी थीं इसलिए भारत में धर्म प्रचार की खुली छूट दे दी गई और जैसा कि एक मत था कि परमात्मा ने इतने बड़े साम्राज्य पर कंपनी का अधिकार दिया ही इसलिए है कि वह शक्ति का प्रयोग करके भी लोगों का धर्मान्तरण कर सके।

अब ईसाइयत के प्रचार में जिस तरह की उदंडता के नमूने मिलने लगे – हिन्दू देवों के लिए अपशब्द, मूर्तिपूजकों की भर्त्सना करते हुए गर्हित भाषा का प्रयोग, वह भी रास्ता रोक कर जो अपमानजनक भी था, मूर्खतापूर्ण भी, और खतरनाक भी ।

राममोहन राय ने इसके कारण अपने पत्रों में ईसाइयत की जड़ों पर प्रहार करना आरंभ किया, परन्तु जहां तक हिन्दू समाज की विकृतियों को दूर करने का प्रश्न था, उसमें सरकार के हस्तक्षेप करने के अधिकार का प्रयोग करते हुए सती प्रथा को बन्द तो कराया ही, उससे उत्पन्न दूसरी समस्या विधवा विवाह का भी समर्थन किया।

सांस्कृतिक आक्रमण क्षेत्रीय आक्रामण से अधिक उद्विग्नकारी होता है । हिन्दू मूल्यों की रक्षा की चिन्ता से उस सभा का संचालन 1728 में अपने जीवन के अन्तिम दिनों में आरंभ किया जिसका आगे चल कर ब्रह्मसमाज नाम पड़ा। हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि उनका प्रयत्न कोई नया आन्दोलन करने या मतवाद चलाने का नहीं था, उनकी चिन्ता के केन्द्र में था उस मोर्चे पर खड़ा हो कर अपने आदर्शों और मूल्यों की रक्षा करना जिन पर ईसाइयत की ओर से गुंडागर्दी के स्तर के खुराफात हो रहे थे; इसकी जागरूकता पैदा करना और ऐसे जागरूक लोगों की संख्या का विस्तार और अपने रक्षणीय मूल्यों की पहचान अरक्षणीय रीतियों और कर्मकांडों और बाह्याचार से मुक्ति जो सचमुच हिन्दू समाज को अरक्षणीय बनाते थे।

राममोहन राय गए तो दिल्ली के नामचीन बादशाह का वजीफा बढ़ाने की फरियाद ले कर परन्तु पार्लमेंट के सामने उन्होंने जो याचिका प्रस्तुत की उसमें यह बात जोड़ दी कि भारत में किसानों की दशा बहुत खराब है, कर बहुत उत्पीड़नकारी है। इसे कम किया जाना चाहिए। कहें उनकी चिन्ताएं चाल्र्स ग्रांट के करीब दिखाई देंगी, पर वह राजस्व सुधार में कंपनी की आय बढ़ाने के लिए चिन्तित था, राममोहन राय किसानों के अपशोषण से मुक्ति दिलाने को चिन्तित थे।

राममोहन राय यह जानते थे कि अपनी कमाई कम करते हुए कंपनी कोई रियायत नहीं दे सकती, इसलिए उन्होंने प्रस्ताव रखा कि इससे जो घाटा होगा उसे अंग्रेज कलेक्टरों के स्थान पर कम वेतन के हिन्दुस्तानी कलेक्टर रख कर पूरा किया जा सकता है। इस प्रस्ताव पर दुबारा गौर करें, यह प्रशासन में भारतीय भागीदारी का एक तर्कसंगत दावा था। यदि लगे कि अंग्रेज कलेक्टरों का वेतन क्या इतना था कि उसमें कमी लाने से राजस्व का घाटा पूरा हो सकता था, तो यह सोचें कि मैकाले जो शिक्षा विधेयक और प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी के समर्थक के रूप में जाना जाता है, उसका वेतन दस हजार मासिक था जो सालाना एक लाख बीस हजार हुआ और कंपनी का शिक्षा का बजट मात्र एक लाख था। दूसरे इसमे राममोहन राय की कूटनीतिक क्षमता का भी परिचय मिलता है। कोई हिसाब लगा कर कहता, घाटा इतना है और इस नए प्रबंध से केवल इतनी बचत होगी, तो भी यह दलील तो अपनी जगह थी कि जितनी बचा सकते हो बचाओ और उतनी रियायत तो दो।

कांग्रेस की स्थापना हुई थी प्रशासन में अधिकार की मांग को ले कर । यह मांग सबसे पहले राममोहन राय ने उठाई थी। आप कह सकते हैं कांग्रेस का गठन करने वाले सदस्य नहीं, उसकी नींव के पत्थर राममोहन राय हैं। कोई कह सकता है, इससे पहले किसी ने कहा नहीं, कि इसका प्रस्ताव तो चाल्र्स ग्रान्ट ने ही रखा था कि जो जमींदार अपने साधनों के बल पर यूरोपियों के संपर्क में आ कर अंगेजी सीख लेंगे और अधिक अधिकारों के लिए उपद्रव करने लगेंगे, उनको तुष्ट करने का आसान तरीका यह है कि उनको कुछ और अधिकार दे देा, इसकी लालच में वे ईसाई हो जाएंगे और तुम्हारे आज्ञाकारी और शुभचिन्तक बने रहेंगे।

शैक्सपियर का वह वाक्य आपने सुना होगा, दुनिया में कुछ भी नया नहीं है, और इसका भाष्य यह है कि दुनिया में कुछ भी जैसा था वैसा नहीं रहता और इस परिवर्तन के पीछे मनस्वी लोग होते हैं जो घाराओं का प्रवाह बदल देते हैं। जो संकेत, चाल्र्सग्रांट ने ईसाइयत के विस्तार के लिए दिया था, उसे कांग्रेस ने लिया अर्थात् अभिजनों के लिए सुविधाओं की मांग।

राममोहन राय उनसे बहुत आगे थे, पर हो सकता है उनके मन में भी संभ्रान्त जनों का ध्यान रहा हो। परन्तु हम इतना दावे के साथ कह सकते हैं कि चाल्र्सग्रांट के प्रस्ताव में आर्थिक अभिजात था और राममोहन राय के प्रस्ताव में शैक्षिक संभ्रान्त वर्ग ।

Post – 2017-03-05

चूहा प्लेग फैला सकता है यह पता था, वह बेजान होकर लिखे लिखाए पर पानी फेर सकता है यह आज पता चला। लोग चूहे से डरते थे हमें एक चूहा बाजार से लाना होगा।

Post – 2017-03-04

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 46

जो कंपनी राजाओं, नवाबों और दिल्लीश्वरों (जो अपने नाम से भी जगतीश्वर हुआ करते थे – शाहजहां, आलमगीर ) की नकेल अपने हाथ में लेती जा रही थी (ध्यान रहे कि दिल्ली का बादशाह कंपनी के वजीफे पर पल रहा था और उसने 1833 में राजा राममोहन राय को अपना प्रतिनिधि बना कर इंग्लैंड में अपना वजीफा बढ़वाने के लिए भेजा था); कम्पनी ने अपने अधिकारक्षेत्र से बाहर के राजाओं और नवाबों के साथ दूत संबंध के बहाने अपने प्रतिनिधि उनके दरबार में भेज रखे थे, जो अवसर के अनुसार उनको समझाते, धमकाते ओर उनके बलाबल की खुफियागीरी भी करते थे। उनके सुझावों को न मानने वाले दरबारों को निशाना बनाया जाता था.

कंपनी इतनी उद्दंड थी कि वह भारत के कल-कारखाने बन्द करके अपना कारोबार आगे बढ़ाना चाहती थी। भारत के अपने अधिकृत क्षेत्र को उसने कंपनी का स्टाक मान लिया था और उससे अधिक से अधिक उगाहना उसकी सफलता का लक्ष्य बन गया था। जो ज्यादा पहुंचाएगा वह ऊंचा उठता जाएगा के सिद्धान्त से जो अपनी जमीदारी कामय रखने के लिए दूसरों से अधिक बोली बोली बोलता था उसे राजस्व वसूलने का अधिकार मिल जाता था और इसलिए वह किसानों से इतनी निर्ममता से दोहन करता था कि किसान बेहाल थे।

अंग्रेजों को, या उसकी नीति निर्धारण के लिएं प्रभावी भूमिका निभाने वालों में सबसे ऊंचा स्थाने उनका था जो यह मान बैठे कि प्रतियोगिता में हम हार गए, अब प्रतिबन्ध लगा कर हमें अपने उत्पादों का बाजार तैया करना है और वहां भी हारने के बाद उन्होंने उन्हें बन्द ही कर दिया।

परन्तु प्रश्न यह है कि जो कंपनी मनमाना आचरण कर रही थी उसे हम किसी से भी डरा हुआ समझ लें तो यह दिमाग की सादगी को ही प्रकट करेगा। और फिर भी यह एक सचाई थी जिसे एक प्रबल आशंका कहना अधिक ठीक होगा । ‘

अंग्रेजों से पहले जिन यूरोपीय ताकतों ने भारत के किसी भूभाग पर कब्जा उनका किन्हीं कारणों से अन्त हो गया या वे एक सीमा में सिमट कर रह गए। यदि उनका अंत हो गया तो पता किया जाना चाहिए कि अन्त हुआ क्यों और अपने को चिरकालिक बनाए रखने के लिए किन सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। ग्रांट के शब्दों में ‘पुर्तगालियों ने चामत्कारिक ढंग से भारत विजय की थी, पर वे अत्याचारी थे और इस अत्याचार ने उनका बेड़ा गर्क कर दिया। फ्रांसीसी तो जैसे आसमान के उल्का की तरह आ गिरे थे, उनका जो हस्र हुआ, होना ही था, डचों ने अधिक लालच से काम लिया और अंग्रेज । मौत का एक दिन मुकर्रर है के अटल सिद्धान्त और उसे यथासंभव टालने का ही नाम ब्रिटिश कूटनीति है ।
We are the fourth of those who have possessed an Indian Empire. That of Portuguese, though acquired by romantic bravery, was unsystematic and rapacious; the short one of the French was the meteor of a vain ambition; the Dutch acted upon the principle of a selfish commercial policy; and these apparently as they flourished for a time, have been cause of their decline and fall.

इसलिए यह तय था की जाना र्क्स पड़ेगा ही, दिन काटने के तरीके अपनाने या उनका आविष्कार करने की समस्या थी।

दूसरों के अनुभवों से जो कुछ सीखा जा सकता था वह क्या कंपनी ने सीखा। चाल्र्स ग्रांट एक जटिल चरित्र है। एक ओर ब्रितानी हितों की रक्षा, दूसरी ओर ईसाइयत का विस्तार, उनकी अपनी समझ से ईसाइयत मानवतावाद का नमूना है, इसलिए वह सोचता था कि हिन्दुओं को ईसाई बना कर कंपनी के हितो की रक्षा ही नहीं मानवीय कर्तव्य का निर्वाह भी किया जा सकता था। परन्तु भारतीयों को ईसाई बनाने का मतलब उन्हें अपने समकक्ष स्थान देना नहीं, अपितु उनको अधिक अच्छा सेवक बनाना थाः
Need we ask whether it would make them better servants and agents, make them more useful and valuable in all the relations of life? Would not such a person be a real accession to European masters; and must it not be supposed, that men professing Christianity, whose interests would be promoted by employing such converts, would not reject them, upon a principle which even Paganism could not justify, that is, because they had honestly followed their convictions?

आज हमारा डंका बज रहा है जो चाहें कर सकते हैं, और इसलिए हम इसमें अपना मजहब, अपनी मूल्यप्रणाली और नैतिक मानदंड आरोपित करके हिन्दुओं को अपने जैसा बना सकते है और इस तरह वे हमारे लिए अधिक उपयोगी रहेंगे।
the time present is ours, By planting our language, our knowledge, our opinions, our religion in our Asiatic territories, we shall put a great work beyond the reach of contingencies, we shall probably have wedded the inhabitants of those territories to this countries.

एक सम्भावना यह कि उन शक्तियों में से किसी की वापसी हो सकती है क्योंकि वे अधिक दुरावहीन ढंग से भारतीयों से मिलते जुलते हैं और स्थानीय षासकों के साथ मिल कर वे संकट खड़ा कर सकते हैं। यह न हमारे हित में होगा न भारतीयों के हित में क्योंकि हमारा सफाया करने के बाद वे स्वयं भारत पर अधिकार करना चाहेंगे और उनका षासन हमसे भी बुरा होगाः
It is to be feared that the number of lower Europeans will go on to increase in our territories; they mix most with the natives, and by them the worst part of our manners will be exhibited.
आशंका का एक कारण यह था कि लगान वसूली के लिए अंग्रेजों ने जो व्यवस्था की थी उसी के कारण जो कल तक किसी गिनती के नहीं थे वे मालामाल हो जायं, फिर दौलत तो अच्छे भलों का दिमाग बदल देती है, उससे उनमें विद्रोह की भावना भी आ सकती है, वे शिक्षा पा सकते हैं, यूरोपियनों के संपर्क में आ कर यूरोपीय मूल्यों और मानदंडों और अधिकार चेतना से भी संपन्न हो सकते हैं।
Secondly, – by the security which we have with great wisdom given to the land tenure of Bengal, the value of the property there …will naturally be enhanced, so that in the process of time, the owner of large states hither to little productive to them, may become of consequence by their wealth and possessions. We know also, that increasing prosperity tends to strengthen pride and disorderly propensities. Here again, therefore, we find motives for introduction of our principles; for if some of the higher and lower orders may be led by European manners, to adopt new ideas of relaxation, at the same time that new powers are put in the hands of the former… our religion and moral principles might obtain a fair establishment there…

यह स्थिति ब्रिटेन के हितो के लिए अवांछनीय तो है परन्तु इसका भी सही उपयोग किया जा सकता है। यदि उन्हें ईसाई बनाया जा सके तो वे स्वयं कंपनी की सत्ता के समर्थक हो जाएंगे। कहें चाल्र्स ग्रान्ट को भारत का उद्धार पाश्चात्य सत्ता का विश्वसनीय सेवक बनाने में दिखाई देता था जिसके लिए हम उसे दोष नहीं दे सकतेः
In success would lie our safety, not our danger. Our danger must lie in pursuing, from ungenerous ends, a course contracted and liberal; but in following an opposite course, in communicating light, knowledge, and improvement, we shall obey the dictates of duty, of philanthropy, and of policy; we shall take the most rational means to remove inherent great disorders, to attach the Hindoo people to ourselves, to ensure the safety of our possessions, to enhance continually their value to us.
सबसे बड़ी आशंका यह कि पश्चिमी रीतिनीति सीखने के बाद कहीं वे उसी तरह का विद्रोह न कर दें
The conduct of the British American colonies has raised, in some minds, confused surmisings and apprehensions of the possibility of similar proceedings on the part of our Indian provinces. These alarms are easily caught by such persons, … conceiving,… that the more entirely they continue with their present ignorance, superstition, and degradation, the more secure is our dominion over them.
यहां पर ग्रांट को यूरोप की नस्लों की श्रेष्ठता और भारत में जीवट की कमी तथा भारत की जलवायु के प्रभाव का भरोसा दिखाई देता है.
Indolence, pusillanimity, insensibility, as they procees not wholly from physical sources, would be at least partially corrected by moral improvement; but the influences of a tropical sun would still be oppressive. The slight structure of human body, with its ordinary concomitants, still forming the taste of vegetable diet, would ill second ardent designs, even if they were vigorous enough to conceive them. .. The nature of the country adds to the effect of the climate. It is unfavourable for long journeys; and the Hindoos, in general a remotely inland people, have a strong aversion to the sea; even the air of it is offensive to them….
Where then is the rational ground for apprehending, that such a race will ever become turbulent for English liberty? A spirit of libery is not to be caught from a written description of it, by distant and feeble Asiatics especially.
जो भी हो , यह ऐसे असमंजस की स्थिति थी जिसमें अमेरिकी क्रांति के बाद अपनी कठोरता के बाद भी जो सत्ता राजाओं को कुछ नहीं समझती थी वह जनता के संभावित विद्रोह से आशंकित थी.

Post – 2017-03-03

मैं यह नहीं चाहता कि मुझे इज्जत देने के लिए मेरे मित्र मेरी बात भी मान लें, मेरी इज्जत इस बात में है कि आप मुझे पढ़कर सोचना आरम्भ कर दें, मैं क्यों और कहा गलत हूँ, इसे जानने का अवसर मुझे भी दें.

दुनिया का कोई आदमी इतना सही हो जाय कि सभी उसके मानदंड पर खरे सिद्ध होकर ही सही सिद्ध हों तो विचार का अंत हो गया.

दुनिया का बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति यह सोचे कि अनपढ़ों, तथाकथित मूर्खों, विक्षिप्तों और जानवरों से भी कुछ सीखा जा सकता है तो मानें दुनिया आगे बढ़ रही है.

मैं उसी भविष्य के लिए पसीना भी बहाता हूँ और मोमबत्ती भी गलाता हूँ, पर यदि लगे कि मैंने ऐसे श्रोता समुदाय को जन्म दिया है जो इतना आलसी है कि स्वयं सोचने की जगह कोई प्रयत्न किए बगैर मुझसे ही उत्तर चाहता है, तो लगता है जो लिखा वह व्यर्थ गया.

मैं आगे जो कुछ लिखने वाला हूँ उसका मसाला चार्ल्स ग्रांट की रपट पर आधारित है. यह गूगल पर सुलभ है. इसे यदि कोई पढ़ कर मुझे यह बता सकता है कि मैंने क्या छोड़ा किस को तोड़मरोड़ कर पेश किया तो मुझे अपने लिखने का पुरस्कार मिल गया.