Post – 2018-12-08

अल्लामा इकबाल -2

जब हम कहते हैं कि कवियों के विवेक पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो इसलिए कि वे अपने ज्ञान का भीअपनी भावना के लिए उपयोग करते हैं और उसके साथ छेड़छाड़ करते हैं। उदाहरण के लिए इकबाल की उस रचना का दृष्टांत दे सकते हैं जिसे भारत में राष्ट्रगान के बाद कौमी सदभाव के लिए सबसे प्रमुखता से गाया जाता है। इसमें वह कहते हैं मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, परंतु वह जानते हैं कि सामी मजहबों में दीगर मजहबों के लिए घृणा और बैर का भाव दूसरे मजहबों से अधिक प्रधान है।

धर्म के दो पक्ष हैं। एक का संबंध संगठन से है और दूसरे का धर्मदृष्टि से । पहला सत्ता का हिस्सा है इसलिए इसमें राजनीति प्रधान होती है।दूसरे का संबंध विश्वास से ज्ञान से है। जिसमें बैर भाव की जरूरत नहीं होती फिर भी पहले के प्रभाव से इसे भी कलह का क्षेत्र बना लिया जाता है। सामी मजहबों की बात अलग रखें। उनमें व्याप्त घृणा और धर्मयुद्धों का इतिहास सर्वविदित है। अपने देश में ही आस्था और विश्वास के इतिहास को देखें तो यहां भी वह वैर भाव अ्सहिष्णु रूप में मिल जाएगा।

इसका एक तर्क है। पहले के धर्मो और विश्वासों के रहते हुए या तो नए धर्म की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए, या यदि है तो इसलिए कि पहले कि धर्म और विश्वास अपर्याप्त है, इसलिए उनका सैद्धांतिक विरोध और यदि संभव तो बल प्रयोग से उनका दमन जरूरी हो जाता है।

असुर और देव, देवयाजी और अदेवयााजी, इंद्र में विश्वास करने वाले और अनींद्र के द्वंद्व से इसे समझा जा सकता है। भगवत गीता में श्री कृष्ण भी कहते हैं कि दूसरे सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ और मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिलाऊंगा – ‘सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि मा शुच।’ इसलिए यह कहना कि मजहब बैर रखना नहीं सिखाता है, सदाशयता का प्रकाशन तो हो सकता है परंतु सत्य नहीं।

इसीलिए, यूं तो सभी मजहब मानवतावाद की दुहाई देते हैं, परंतु मानवतावाद के लिए सबसे बड़ा संकट धर्मों के कारण ही पैदा होता है। धर्म इसके साथ ही सचाई पर पर्दा डालने का काम भी करता है और अत्याचार का कारण भी बनता है, फिर भी हम इसके भुलावे में आ जाया करते हैं, और अपने ही असली दुश्मन के औजार बनकर अपने ही मित्रों या सुख दुख के साथियों का अहित करते हैं, क्योंकि वे दूसरे धर्म से जुड़े होते हैं।

इकबाल इस बात का प्रभाव तो पैदा करते हैं कि उन्होंने धर्म का बहुत गहराई से अध्ययन किया है ( I lead no party; I follow no leader. I have given the best part of my life to a careful study of Islam, its law and polity, its culture, its history and its literature. ) परंतु हमारा विश्वास है कि यह अध्ययन धर्म विशेष की खूबियों को तलाशने और उसको उचित सिद्ध करने के लिए था, न कि धर्म की प्रकृति उसकी भूमिका, उसकी सामाजिक अतिजीविता की समस्याओं को समझने के लिए।
उनके अनुसार Every word of the Quran is brimful of light and joy of existence. इसे यदि धर्मांधता न कहें तो और क्या कह सकते हैं।

अंधापन जिस भी कारण से आए परिणाम एक ही होता है। हम यथार्थ को कम देख पाते हैं, कम समझ पाते हैं और इसकी क्षतिपूर्ति करते हुए अपने मनोगत को यथार्थ पर आरोपित कर देते हैं। कवि के साथ हम भाव मग्न हो सकते हैं, डूब सकते हैं, परंतु दुनिया को समझ नहीं सकते। संभव है मैं कवियों के साथ अन्याय कर रहा हूं, कुछ वैसा ही जैसा अफलातून ने किया था और कहा था कि कवियों को नगर राज्य से बहिष्कृत कर दिया जाना चाहिए ।

काव्य का सत्य हमारे दृष्टिगत यथार्थ से अधिक गहन होता है। हम सबको अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए कवियों के उद्गारों की सहायता लेनी पड़ती है, इसलिए उनके साथ कुछ रियायत तो करनी होती है परंतु अपनी बात को कहने के लिए वे जिन युक्तियों का सहारा लेते हैं वे इतने अतिरंजित, अन्योक्ति परक , या विचित्रतापरक होते हैं, कि एक ही कथन का अलग अलग व्यक्तियों और एक ही व्यक्ति के जीवन में अलग अलग संदर्भों में अलग अलग अर्थ हो जाया करते हैं। कवियों के कथन को अक्षरशः मानकर हम अनर्थ कर सकते हैं।

हमें उनका इरादा देखना होता है, उनसे संदेश ग्रहण करना होता है, परंतु उनके माध्यम से सत्य को देखना और समझना नहीं होता। वे स्वयं निःसंकोच सच्चाई को छिपाते भी हैं, बदलते भी हैं. और इसकी उपेक्षा भी करते हैं। इसलिए इकबाल की उसी कविता की एक दूसरी पंक्ति को याद करना उपयोगी होगा। ऐ आबरूदे गंगा वह दिन है याद तुझको, उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा। इसमें दो तरह से सचाई से अलग बात की गई है। हम जानते हैं कि भारत में आने वाले मुसलमान लुटेरों और हमलावरों के रूप में आते रहे थे, न कि व्यापारियों के रूप में। क्रूर यथार्थ पर पर्दा डाल कर बच्चों को बहलाया जा सकता है, परंतु यथार्थ से परिचित लोगों के बीच सद्भावना नहीं पैदा की जा सकती। आक्रमणकारी जिस नदी के पास सबसे पहले पहुंचते थे,वह गंगा नहीं, सिंध नद हुआ करता था। ऐसा नहीं है कि इकबाल इससे परिचित न हों। यह कवि की जरूरत है, पर हमारी जरूरत नहीं।

सचाई पर पर्दा डालने के कारण उनके सद्भावना पूर्ण लेखन में भी आडंबर दिखाई देता है, कवि की सच्ची भावना नहीं। राम, कृष्ण, बुद्ध आदि पर भी लिखी गई उनकी कविताओं में वह सिंसियरिटी नहीं है, वह प्रवाह और आवेग भी नहीं है, जिसके कारण उनका महत्त्व है। हमारा तात्पर्य यह है कि इकबाल को कवि के रूप में ही पढ़ा जाए विचारक या राजनीतिक आंदोलनकारी के रूप में नहीं।

Post – 2018-12-07

अल्लामा इकबाल और इस्लाम (1)
‘तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन’ (इकबाल)

इकबाल कवि थे। उनका अध्ययन विशद था। कवि जब गद्य लिखता है तो वह गद्य नहीं होता, वह कवि का गद्य होता है। उसमें सौष्ठव होता है, संवेद्यता होती है, आवेग होता है। गद्य का खुरदरापन और विचार की आप्तता नहीं होती। गद्य की किसी विधा में लिखता है तो उस विधा में लिखने वालों की तरह नहीं लिखता। वह उसकी उस विधा में कविरचित रचना होती है। इसकी ओर पहली बार मेरा ध्यान सर्वेश्वर और मुक्तिबोध की कहानियां पढ़ते हुए गया था और उसके बाद दूसरे कवियों के गद्यलेखन और वक्तव्यों की ओर गया। व्याख्यान, संवाद, यहां तक कि दैनंदिन का उसका व्यवहार, सब में कवित्व होता है, भले हम इस विषय में सचेत हों या नहीं। यह उनका चुनाव नहीं होता। अपनी ओर से वह दूसरों जैसा ही रहना चाहता है। प्रायः वह सचेत भी नहीं होता कि वह दूसरों जैसा करना चाहते हुए भी वैसा कर नहीं पा रहा है।

कवि होना प्रयास से जुड़ा मामला नहीं है मिजाज से जुड़ा सवाल है, जिसे हम प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा कहा करते हैं। हम अपनी चमड़ी को जरूरत के अनुसार पोशाक की तरह नहीं बदल सकते।

कवि भावुक होता है। उसके पास आग होती है जो पिघल कर बह सकती है पर रोशनी नहीं दे सकती। कवियों को पढ़ते या सुनते हुए हम उनकी मनो भूमि में पहुंच सकते हैं परंतु उन क्षणों में, न वह अपने दिमाग से काम लेता है न हम अपने दिमाग से काम लेते हैं। भाव जगत का एकात्म्य हमें तन्मय कर देता है, हम खो जाते हैं। एक ऐसे आनंद लोक में पहुंच जाते हैं जिसकी तुलना उस आनंद से की गई है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि वह विचारातीत होता है। परंतु इसी सीमा के कारण हम विचार के मामले में उस पर भरोसा नहीं कर सकते। वह लक्ष्य हीन बहा तो सकता हो सकता है, परंतु किसी सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचा नहीं सकता।

उदय प्रकाश मेरे कवियों में प्रिय लोगों की तालिका में आते हैं उनकी कहानियां कविता हैं और पाठक को अभिभूत कर देती हैं। वह मानते हैं उनकी मूल प्रकृति कवि की है। आज से लगभग15 वर्ष पहले एक आत्मीय बातचीत में मैंने विचार के मामले में कवियों की अविश्वसनीयता का जिक्र करते हुए, संयोगवश अल्लामा इकबाल का नाम लिया था। आज उसे दोहराना पड़ रहा है।

इकबाल के साथ एक और सीमा थी। उसके विषय में भी मैं फेसबुक पर यह लिख चुका हूं कि धर्मांतरित हिंदुओं को अपने को हर कदम पर सच्चा मुसलमान साबित करना होता है जिसकी जरूरत विदेशी मूल के मुसलमानों को नहीं पड़ती, या कम पड़ती है।

संजय ने अपने पिता से एक संवाद में कहा था कि पापा मेरी रगों मे मुसलमान का खून भी है और तमाम मुसलमानों के होते हुए अपने को किसी से कम मुसलमान न सिद्ध करने की ललक में ऐसे हथियार उसी को रखने पड़े जिनके लिए उसे दंड भी भोगना पड़ा और पैसे के प्रवाह से रियायतें भी मिली।

इस दूसरे कारण से भी न तो मैं सही विचारदृष्टि के मामले में मोहम्मद अली जिन्ना पर विश्वास करता हूं न ही अल्लामा इकबाल पर। परंतु इनकी ऐतिहासिक भूमिका की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती।

यह एक सच्चाई है कि मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस से निराश होने के बाद राजनीति से विमुख होकर इंग्लैंड में जा बसे थे। उन्हें मना कर मुस्लिम लीग का नेतृत्व संभालने के लिए जिस व्यक्ति ने राजी किया था उसका नाम अल्लामा इकबाल है और इस बात को जिन्ना आभार पूर्वक स्वीकार करते थे।

अपने 1938 के एक व्याख्यान में अल्लामा इकबाल ने उनके बारे में जो कुछ कहा था वह निम्न प्रकार हैः
“केवल एक ही रास्ता है। मुसलमानों को जिन्ना के हाथों को मजबूत करना चाहिए। उन्हें मुस्लिम लीग में शामिल होना चाहिए। भारत की आज़ादी का प्रश्न, जैसा कि अब हल किया जा रहा है, हिंदुओं और अंग्रेजी दोनों के खिलाफ हमारे संयुक्त मोर्चे द्वारा काउंटर किया जा सकता है। इसके बिना, हमारी मांगों को स्वीकार नहीं किया जाएगा । लोग कहते हैं कि हमारी मांग सांप्रदायिक है। यह मिथ्या प्रचार है। ये मांगें हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व की रक्षा से संबंधित हैं …. संयुक्त मोर्चा मुस्लिम लीग के नेतृत्व में गठित किया जा सकता है। और मुस्लिम लीग केवल जिन्ना के कारण सफल हो सकता है। अब जिन्ना ही मुसलमानों की अगुआई करने में सक्षम है।- मुहम्मद इकबाल, १९३८

Post – 2018-12-06

मेरे होने से सारी कुदरत है
न रहा मैं तो कुछ नहीं होगा।
बात यह सच है, मुझसे पहले भी
किसी शायर ने यह कहा होगा।।

Post – 2018-12-05

मैने आगे जोड़ा, “एक अन्य मित्र हैं, जिन्होंने 19वीं शताब्दी में हिंदी को लेकर हुई खींचतान का विवेचन करते हुए यह नतीजा निकाला कि नागरी लिपि की वकालत करने वाले भारतेंदु और दूसरे लोग सांप्रदायिक थे और अरबी लिपि और फारसी अरबी बोझिल उर्दू (शरीफों की जबान) के प्रचलन की वकालत करने वाले सर सैयद अहमद खान सेक्युलर।”

“अरे यार, तुम यह क्यों नहीं देखते कि भारतीय बुद्धिजीवियों – अध्यापकों, पत्रकारों, लेखकों में से भी अधिकांश की राय इसी से मिलती जुलती है। उनके बीच समझदार माने जाने की अनिवार्य शर्त है कि आप उनके निष्कर्ष से सहमत हैं। वे सोचते हैं, जिस आदमी की समझ में इतनी मोटी बात न आती हो कि हमारी दशा दूसरे समाजों से अधिक बुरी है, और इस समाज का बहुसंख्यक हिंदू है, इसलिए उसके बुरा हुए बिना यह संभव नहीं, उससे अधिक नासमझ कौन हो सकता है। यदि वह नासमझ नहीं है, तो पाखंडी है। ऐसे लोगों से संपर्क रखना, उनकी बातें सुनना, या संवाद करना तक गुनाह है। बौद्धिक अस्पृश्यता का यह नया संस्करण भारतीय सेकुलरिज्म की एकमात्र उपलब्धि है।”

मैं सहमत हो गया, “तुम ठीक कहते हो। बौद्धिक जगत में स्वयंसिद्धि का रूप ले चुके इन विचारों से मेल खाती कोई जानकारी है तो ही वह प्रामाणिक हो सकती है। अनमेल है तो वह विद्वान, ज्ञान की वह शाखा, सूचना का वह माध्यम, वह अनुसंधान, वे प्रमाण सभी संदिग्ध हैं। उदाहरण के लिए पुरातत्व हिन्दुत्ववादी है, जनगणना के वे आंकड़े जिनसे यह सिद्ध होता है कि आबादी में मुसलमानों की जन्म दर में होने वाली वृद्धि दूसरे समुदायों की तुलना में अधिक है वह हिंदू संप्रदायवादियों का दुष्प्रचार है। हिंदू संप्रदायवाद कितनी तेजी से बढ़ता हुआ संस्थाओं में भी प्रवेश करता जा रहा है इसका यह प्रमाण है। कोई दूसरा चारा न होने पर यदि मान लें कि वह सही है, तो भी उसे सही मानना हिंदुत्ववादियों के हाथ में खेलने जैसा है, इसलिए जो अकाट्य है, वह भी, सच होकर भी, मान्य नहीं है। सजदावादी बौद्धिकता का ऐसा नमूना विश्व इतिहास में ढूंढ़े न मिलेगा।

“हमारे शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसकी पैतृकता हिंदू है, परंतु वह अपने को हिंदू कहने में लज्जित अनुभव करता है। इसकी प्रतिक्रिया यह है कि हिंदुत्व की रक्षा के लिए चिंतित नेता हिंदुओं से अपने को गर्व से हिन्दू कहने को कहता है, और उपहास का पात्र बनता है। बनना भी चाहिए। वह यह तक नहीं जानता कि अपने को गर्व से हिंदू या मुसलमान कहने का मुहावरा किसका है? वे यह भी नहीं जानते कि इसका इस्तेमाल जिन्ना ने अपने मुसलमान होने के सन्दर्भ में किया था। वह सच्चा मुसलमान होने की कसौटी खरे नहीं उतरते थे, पोर्क से उन्हें परहेज न था। इसलिए अपने को गर्व से मुसलमान कहना उनकी जरूरत हो सकती थी । गांधी को चुनौती देते हैं कि जैसे वह गर्व से अपने को मुसलमान कहते थे, उसी तरह गर्व से वह अपने को हिंदू क्यों नहीं कहते। गांधी ने कभी अपने हिंदू होने की बात को छिपाया नहीं । राम राज्य की बात तो वह पहले से ही करते आए थे। जिन्ना का उद्देश्य कांग्रेस को हिंदू संगठन सिद्ध करने का था, न कि हिंदू या मुसलमान होने पर गर्व करने का।

“स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से आज तक हमारी मुख्य समस्या शैक्षिक और आर्थिक विकास की न रह कर सामाजिक मेलजोल की बनी रही है। आज इसकी मांग इतनी बढ़ गई है कि कुछ लोगों को लगता है कि जब तक इसका समाधान नहीं हो जाता दूसरी समस्याएं रुकी रहें। वे छोटी से छोटी घटना को एक सुर से इतना विस्फोटक बना देते हैं कि अधिक जरूरी समस्याओं की ओर ध्यान ही नहीं जाता। केवल भाव तेजी से बढ़ने पर महंगाई, अराजकता बढ़ने पर शांति और व्यवस्था, चुनाव आने पर रोजी-रोजगार को समस्या बनाया जाता है। इकहत्तर वर्षों के इस वर्णांध अभियान में समस्या का समाधान निकालने की कोशिशों के साथ हम गलत दीवारों से टकराते हुए समाधान के नाम पर भी अपना सर ही फोड़ते रहे हैं।

“हम भी यही कर रहे हैं इस पर सोचना होगा। इस पर बहस की जरूरत नहीं है। बहस का कोई मतलब तक नहीं रह गया है। सभी के पास समझाने को बहुत कुछ है, समझने को कुछ नहीं। विचार इतने ठोस हो चुके हैं, कि उन्हे पत्थर की तरह चला कर विरोधी का सिर फोड़ा जा सकता है, पर समझाया नहीं जा सकता। कुछ भी लिखो, न कोई ध्यान देने वाला है, न कोई अंतर आने वाला है । हां, तुम्हारे नाम से एक और किताब अवश्य तैयार हो जाएगी। और कुछ नहीं होने वाला।”

“मेरी समझ इससे ठीक उल्टी है । हमने लंबे समय तक आंदोलन करते हुए बौद्धिक निर्वात पैदा कर लिया है जिसमें प्रतिबद्धताओं के खूंटे दिखाई देते हैं, विचारों की प्राणवायु नहीं। हमने संप्रदायों की राजनीति की है, उनको समझने या उनका विश्लेषण करने का प्रयत्न नहीं किया। हमारे आंदोलन में ही एक तरह का कामचलाऊपन था। इसके कारण ही विकृतियां पहले से अधिक उग्र हुई हैं। गांधी जी ने सिर्फ एक अवसर पर छात्रों की राजनीतिक भागीदारी की अपेक्षा की थी आज छात्रों के लिए पढ़ने की जगह राजनीति करना अधिक जरूरी हो गया है। समझदार कहे जाने वाले अध्यापकों का भी मानना है कि छात्रों को कूप मंडूक बनने से बचाने के लिए उनको राजनीति में झोंकना जरूरी है ।”

वह मुझसे सहमत न था, “लोकतंत्र में सबको मताधिकार मिला है इसलिए इसकी जिम्मेदारी को समझने के लिए राजनीतिक चेतना और शिक्षा जरूरी है। सच कहो तो राजनीति की समझ, उसकी जिम्मेदारी का बोध राजनीतिज्ञों तक में नहीं है, क्योंकि उन्हें इसकी शिक्षा मिली ही नहीं।”

“छात्रों को शिक्षित नहीं किया जा रहा है, उनका राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसी राजनीति ऊंची शैक्षिक योग्यता के अभाव में अधिक सफलता से की जा सकती है। सबसे बड़ी राजनीति है अपने को समर्थ बनाना, और यह अपने विषय के आधिकारिक ज्ञान से ही संभव है। राजनीति का दूसरा काम है यदि स्वतंत्र नहीं हैं तो स्वतंत्रता प्राप्त करना, यदि स्वतंत्र हो चुके हैं तो उसकी रक्षा करना। हम पांवों की बेड़ियां तोड़ चुके हैं, पर दिमाग की बेड़ियां पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई हैं। बौद्धिक परजीविता के चलते हम बौद्धिक विकलांगता के शिकार हो चुके हैं जिसमें हमारे संवेदी तंतु तक इतने कुंद हो चुके हैं कि विकलांगता को विकलांगता नहीं मानते, अपनी उपलब्धि मानते हैं। हमें गहराई में उतर कर इस बात की पड़ताल करनी होगी कि शिक्षा का हुड़दंगीकरण किसी साजिश के तहत तो नहीं किया जा रहा है? इस गिरावट का वास्तविक आधार क्या है?”

”तुम इतनी सारी समस्याओं का निपटारा करने जा रहे हो तो नाम भी उसी जैसा धाकड़ होना चाहिए था। खैर, यह भी भारतीय परंपरा में खप जाएगा। यहां तो गजानन की सवारी चूहा है, यह विद्रूप तक किसी को हैरान नहीं करता।”

मैंने उसकी फिकरेबाजी पर ध्यान नहीं दिया, “सबसे पहले हम उस निष्कर्ष को सही मानकर उसका परिणाम देखें जिसका कई रूपों में प्रचार किया जाता रहा कि सारा दोष हिंदुओं का है। यदि यह हिंदू के कारण है तो इसका एक आसान उपाय यह है कि भारत को हिंदू या हिंदूबहुलता से मुक्त कर दिया जाए। परिणाम क्या होगा ? हमारी दशा बांग्लादेश या पाकिस्तान जैसी हो जाएगी। परंतु तब वे भी कहेंगे कि हिंदुओं के न होने या अल्पसंख्यक होने के कारण भारत की दशा पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसी होती जा रही है।”

वह चुप रहा।

“अर्थात् वे भी मानते हैं कि इन देशों की दशा भारत की तुलना में बहुत बुरी है और अपने काल्पनिक प्रयोग में हमने पाया हिंदू को हटाते ही या उसके अल्पसंख्यक होते ही ही हमारी दशा उन देशों जैसी हो जाएगी जिनसे देश को बचाने की चिंता उनको भी है। वे भी मानते हैं यदि भारत की दशा वैसी नहीं है तो इसका एकमात्र कारण यह है कि यहां हिंदू बहुमत में है।

“हमारा ध्यान इस तथ्य की ओर गए बिना भी नहीं रह सकता कि इस श्रेणी में आने वाले वाचाल लोगों में अधिकांश प्रसादग्राही रहे हैं, अथवा इसकी जुगत में रहे हैं। उन पर अधिकस्य अधिकं फलं का नियम भी लागू होता है, जो उनके उत्साह को कायम और आवाज़ को बुलंद रखने में सहायक रहा है। हम उनके निर्णय को मानने पर भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हमारी समस्याएं उल्टी सोच के कारण हैं। इसके ही कारण मुस्लिम समाज में असंख्य विकृतियों के होते हुए भी यह मानसिकता पैदा हुई है कि वे विकृतियां नहीं धर्माचार हैं और मुस्लिम कट्टरपंथी को यह प्रमाणपत्र मिल जाता है कि हिंदू बुद्धिजीवी भी उन्हें विकृति नहीं मानते और स्वीकार करते हैं कि सारी विकृतियां हिंदू समाज में हैं।

भारत पर तलवार से आक्रमण करके मुसलमानों को उतनी बड़ी विजय कभी न मिली जितना बड़ी विजय स्वतंत्र भारत में प्रसादग्राहियों के कारण मिली है। हिन्दू यशप्रार्थियों को सेक्युलर का प्रमाणपत्र वह बांटता या वापस लेता है जो हिंदू नहीं है। सेक्युलर छवि को बचाने को चिन्तित मित्र कुछ भी कहने या लिखने से पहले यह सोचते हैं कि उसके परिचित मुस्लिम मित्रों की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। अर्थात् वह उनका conscience keeper बन चुका है।

कुछ मुसलमान भारत में बाहर से आए, शासन किया यह इतिहास का सच है परन्तु यह भारतीय मुसलमान स्वतंत्र भारत के प्रसादग्राहियों, सहमकर सोचने वालों और समवेत आतंक के आगे घुटने टेकने वालों की रचना है जो कट्टर इस्लामी देशों मे आए सुधारों का भी विरोध करता है।

Post – 2018-12-04

डरते हुए (अगली कड़ी)
उसने मुझे हताश करने का एक नया तर्क ढूंढ़ लिया, “तुम कह रहे हो कि तुम पिष्टपेषण करने जा रहे हो। इस विषय पर पुस्तक पहले ही सुलभ थी, इसके बाद भी… ” उसने वाक्य को अधूरा छोड़ दिया। कुछ लोग समझते हैं कि अधूरे वाक्य प्रायः पूरे वाक्यों से अधिक असरदार सिद्ध होते हैं और चुप्पी जबान से काम लेने वालों पर भारी पड़ती है।
“कोई कथन या लेखन अदालती फैसला नहीं होता, मात्र एक विचार होता है। वह पेशे से पत्रकार थे और तुम जानते हो, पत्रकार पत्रकारों को दुनिया का सबसे प्रबुद्ध प्राणी मानते हैं, क्योंकि किसी भी घटना की जानकारी दूसरों से पहले उन्हें मिलती है। उन्होंने उर्दू तथा दूसरी भाषाओं में मुस्लिम लेखकों-पत्रकारों ने जो कुछ लिखा था उसी के आधार पर उनकी मानसिकता को समझ कर उन्होंने अपनी पुस्तिकाएं लिखीं।”
“इसमें गलत क्या है?”
“यह किसी समस्या को समझने का सबसे आसान और उतना ही सतही तरीका है। विशेषतः सामाजिक प्रश्नों पर और वह भी भारत में, जहां सामाजिक सवालों पर निजी सोच और सार्वजनिक कथन में काफी अंतर होता है। फिर किसी एक पक्ष के असंतोष या आरोप के आधार पर बनाई गई राय अपने इकहरेपन के कारण ही भरोसे की नहीं होती। फिर दूसरे पक्ष के विषय में यह मान लेना कि हम उस समुदाय के हैं इसलिए उसके बारे में सब कुछ जानते हैं, भ्रामक भी है, और उस समुदाय का अपमान भी, क्योंकि इसके साथ ही आप उसे समाज नहीं, यंत्र मानवों का कारखाना मान बैठते हैं।”
“मुसलमानों के साथ बनाकर रहने का सबसे सही तरीका यही है कि वे अपने बारे में जो कुछ मानते हों उसे ही उनका सच मान लो। वह किस नतीजे पर पहुंचे थे, यह बता सको तो बता सकता हूं कि वह ठीक थे या गलत।”
“उनका निष्कर्ष था, मुस्लिम अच्छे होते हैं. बुराई हिंदू समाज में है।”
उसने उसने मेरी पीठ पर धौल जमाते हुए कहा, “ठीक, बिल्कुल ठीक। मुसलमान कभी गलत नहीं होता। यदि विज्ञान किसी ऐसी बात को गलत सिद्ध करता है जिससे मुसलमान का भावनात्मक लगाव है तो भी मुसलमान गलत नहीं होगा, विज्ञान गलत हो जाएगा। और देखो, हिंदू तभी तक सही होता है जब तक वह मानता है, वही सारी बुराइयों की खान है। यही हमारी परंपरा है – मो सम कौन कुटिल खल कामी। मो सम बुरो न कोय। वह बाहर तलाशता है तो भी कोई बुरा आदमी दिखाई नहीं देता। यदि दीख गया पतितों में सर्वोपरि होने का उसका अभिमान चूर चूर हो जाएगा। जिस लेखक से तुम्हें शिकायत है कि हिंदू कुल का जनमिया हिंदू से अनजान, वह हिंदुत्व को तुमसे अच्छी तरह समझता था, जब कि तुम इसमें घुसपैठिए जैसे लगते हो।”

मैंने कहा, “ऐसा सोचने वाले वह अकेले नहीं हैं। मेरे दो अन्य मित्र जो पुलिस विभाग में उच्चतम पदों पर रहे हैं, वे भी अपने अनुभव से उसी नतीजे पर पहुंचे थे।”
“सचाई की परख ऊंचाई से नहीं होती। समाज की मानसिकता को समझने के लिए पद की ऊंचाई का कोई महत्त्व नहीं, या यदि है तो उल्टे क्रम में। एक गश्ती अफसर का लोगों के बीच अधिक घुलना मिलना होता है, अफसरों तक कम लोगों की पहुंच हो पाती है। जो पहुंचते हैं, वे रिश्तों, नातों, पहुंच और बटुए के साथ पहुंचते हैं और वे स्वयं कुछ नहीं कहते, बोलता वह है जिसके साथ पहुंचते हैं। उसमें सच्चाई को उजागर करने का भ्रम और सच्चाई पर पर्दा डालने का प्रयत्न अधिक होता है।”
उससे सहमत होने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचा था, “ठीक कहते हो । पर क्या किसी गश्ती सिपाही को रिपोर्ट लिखते देखा है?”
“तुम भले हो, पर गधे हो, यह न मानता तो हमारी दोस्ती कैसे निभती। कहते हैं, समझदार दुश्मन भी मूर्ख दोस्त से अच्छा होता है। इसीलिए हमारी किसी मसले पर पटती नहीं। मैं सच तक पहुंचने की चिंता में हूं, तुम सच के नाम पर कुछ पेश करने वालों के बहकावे में रहना चाहते हो।”
वह एक पल के लिए रुका। संभवतः मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए। मैं चुप रहा।
“फिर भी बड़े पदों पर बैठे लोगों को यह विश्वास होता है कि उनकी सोच बड़ी है।, रपट और पुस्तक लिखने की योग्यता उनमें से ही कुछ के पास होती है। बड़ों की बात बड़ों ने किस्सों से लेकर मुहावरों तक में मानी है, इसलिए उनका निष्कर्ष लोग सिर माथे रखते हैं। पर देखना पेश करने से अधिक जरूरी काम है। किताब लिखने वाला, लिखी सामग्री पर भरोसा करेगा, भले ही उसे उसकी सत्यता पर संदेह हो, क्योंकि उसे अपने कथन के समर्थन में प्रमाण चाहिए। सच्चाई तक पहुंचने वाला देखने का प्रयत्न करेगा या देखने वाले के पास पहुंचेगा। उसके लिए पद नहीं, प्रत्यक्षदर्शी अधिक भरोसे का होता है।”
तभी मुझे याद आया, उन अफसरों की यह राय समाज को लेकर नहीं थी। वे पुलिस बल के संप्रदायीकरण की बात करते हैं। मैंने अपनी भूल स्वीकार की तो वह ठहाका मारकर हंसने लगा, “हवा में बात करते हो और लिखते भी हवा का रुख देख कर हो । तुम्हारा जवाब नहीं। लेकिन यह समझ लो कि वे दोनों अफसर अपने विभाग का इतिहास तक नहीं जानते। सशस्त्र बलों को सांप्रदायिक बनाने की कोशिशें औपनिवेशिक युग की देन हैं। उनको समाज को बांट कर रखना था, पुलिस और फौज के बल पर ही शासन करना था, इसलिए इसका गठन भी नस्ली और सांप्रदायिक आधार पर करते रहे। इससे एक से खतरा लगे तो दूसरे का इस्तेमाल करते रहते थे । इसे बदलने की कोई कोशिश स्वतंत्र भारत में भी नहीं हुई। वे समझते हैं कि यह प्रवृत्ति अभी हाल में पैदा हुई है। रपट लिखने वाले समस्या से अधिक अपनी जरूरत की समझ रखते हैं। तुमने पता लगाया, उन्हें इसकी प्रेरणा कहां से मिली थी? जैसे दादी की कहानियों के दानव के प्राण दूर देश के किसी सुग्गे में बसते थे, उसी तरह कुछ लेखकों के प्राण दूर देश या पराए समाज की आकांक्षाओं में बसते हैं जिसे वे प्रेरणा कहते हैं। देव और दानव का एक मामूली सा अंतर है। एक के प्राण उसकी छाती में होते हैं जिसका दूसरा नाम अपना समाज है और दूसरे के दूर या अपरिचित देश के ऐसे कमजोर प्राणी में जिस तक पहुंच सको तो वह न अपना टेंटुआ बचा सके न दानव की जान।” मुझे कोई जवाब न सूझा और इसका लाभ उठा कर वह फिर चालू हो गया, “टेंटुआ का मतलब जानते हो न । वह कंठ जिससे टें टू की आवाज ही निकलती हो, बाकी सब मालिकों का पढ़ाया हुआ जुमला हो।”
मैं फिर भी चुप रहा। या यदि कुछ कहा तो वह भी चुप्पी का ही एक रूप था, “मुझे इसकी जानकारी नहीं।”
“जानकारी तुम्हें नहीं, उस विषय पर लिखने से पहले, इसकी जानकारी उन्हें होनी चाहिए थी। और अब जब तुम उन्हें प्रमाण मानकर कुछ लिखने चले हो तो इसकी जानकारी तुम्हें भी होनी चाहिए। इतिहास पूर्ण वर्तमान है, प्रेजेंट परफेक्ट। चालू वर्तमान अपूर्ण वर्तमान है, परिणाम क्या होगा, भविष्य की दिशा और दशा क्या होगी निश्चित नहीं। हमारा भविष्य भी अपूर्ण वर्तमान के परिणाम का अनुमान ही है।”

Post – 2018-12-03

डरते हुए
मैंने बताया, मैं भारतीय मुसलमान की मानसिकता पर लिखना चाहता हूं तो मेरे मित्र के मुंह से निकला, “कोई और विषय नहीं है, लिखने को?”
“मैंने उत्तर देने की जगह प्रश्न किया, “यदि किसी अन्य विषय पर लिखता, तो भी, क्या तुम यही प्रश्न नहीं कर सकते थे? कुछ न करने वालों को कोई भी काम शांति में खलल मालूम होता है।”
“तुम जानते हो, यह विषय बहुत संवेदनशील है।”
“जानता हूं। यह भी जानता हूं कि तुम्हारी इसी सोच ने इसकी संवेदनशीलता को संवेदनहीनता तक पहुंचाया है।”
मेरी बात उसकी समझ में न आई।
“किसी समाज को पूरा का पूरा, किसी सांचे में ढाल कर देखना, सबको एक मिजाज का मानना और उनकी निजता को नकारना एक तरह की क्रूरता है। तुम उसे आदमी नहीं, हिंस्र प्राणी के रूप में देखते हो। तुम उससे बच कर रहना चाहते हो, चेतना के स्तर पर उसे मिटा देते हो। इस तरह तुम्हारे सटे पास हो कर भी ज्ञान और संवेदन के स्तर पर उसका अस्तित्व तक नहीं होता। तुम उसे अपनी आंखों से नहीं देखते, अपने डर से देखते हो । इस नासमझी के कारण तुम्हें उसके जिस व्यवहार का सामना करना पड़ता है, उसके आगे पीछे के तर्क को नहीं समझ पाते। किसी को अतिसंवेदनशील मान कर उससे बचना, उससे परहेज करना, उसके चरित्र से अधिक तुम्हारे चरित्र को सामने लाता है। यह अपने से भिन्न लोगों को समझने मे तुम्हारी असमर्थता को प्रकट करता है और उसे भी वैसा बनने में या बने रहने में योगदान भी करता है।“
उसने सुना। एक एक शब्द का अर्थ उसे पता था। उसका ध्यान भी मेरी बात पर था, इसके बाद भी, वह मेरी बात नहीं समझ पाया। कहा कुछ नहीं, सूनी आंखों से मुझे देखता रहा। उस सूनेपन में कई प्रश्न थे। कई हताशाएं। हताशा और प्रश्न एक दूसरे के पर्याय बन गए थे। मुझे अपने विषय को लेकर कोई चिंता नहीं थी, परंतु उसकी पस्ती ने मुझे चिंतित कर दिया।
मेरा मानना है कि हम जिनके साथ रहने को बाध्य हैं उनकी गतिविधियों की ओर से असावधान नहीं रह सकते, वे अपने परिवार के सदस्य ही क्यों न हों। इस तरह की उदासीनता उनके अस्तित्व का निषेध है। कुछ स्थितियों में यह उन्हें अपमानजनक लग सकती है। इससे अपने सगे भी विद्रोही हो सकते हैं। यदि उन्होंने कोई ऐसी छूट ली है जिसके विषय में उन्हें विश्वास है कि वह तुम्हारी नजर में अक्षम्य है, और यह भी पता है कि इसका पता आपको चल चुका है, तो तुम्हारे आपत्ति न करने को अपनी उपेक्षा मान कर केवल स्वाभिमान के तकाजे उसे दुहराते हुए तुम्हारे धैर्य की परीक्षा लेते हुए इतने बिगड़ सकते हैं कि जब तक तुम कुछ करने की सोचो तब तक स्थिति संभाल से बाहर हो जाए। जिन लोगों ने वर्ड्सवर्थ के प्रकृतिवाद का कायल हो कर अपने बच्चों को बिना किसी हस्तक्षेप के स्वतंत्र विकास के प्रयोग किये हैं, उन्होंने उनको बददिमाग, स्वार्थी, पितृद्रोही और परजीवी बनाने में स्वयं उनकी मदद की है। उनका जीवन बर्वाद करने के लिए वे स्वयं उत्तरदायी हैं। यह प्रकृतिवाद भी नहीं है। सभी प्राणी अपने शिशुओं को सिखाते और चूक होने पर दंडित करते हैं, भले वह दंड चेतावनी के लिए हो, पीड़ित करने के लिए नहीं। किसी से मित्रता के लिए उसको खुश रखने की कोशिश में अपनी ओर से वह सब करते जाना जो आपके खयाल से उसे पसंद है, उसकी आदत बिगाड़ना भी है, उसे अपने अपमान के लिए उकसाना भी है, मित्र से हट कर दास की भूमिका में आना भी है, और जाहिर हैं, मैत्री को खोना भी है। यह आपकी मनोरुग्णता – आत्मपीड़न – का प्रमाण भी है। मित्रता की अनिवार्य शर्त है, समकक्षता। रियायत देने वाला विजेता को जीत के आह्लाद से ही वंचित नहीं करता, आरंभ से ही प्रतिभट को कनिष्ठ मान कर उसका तिरस्कार भी करता है। इसकी क्षतिपूर्ति वह उसका अपमान करके ही कर सकता है।
“जब हम भारतीय मुसलमान की बात कर रहे हैं तो हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि इसके निर्माण में हमारी क्या भूमिका रही है। हम इस पर अपनी राय पेश करने की जगह सभी से आत्म-निरीक्षण का अनुरोध ही कर सकते हैं।
“पर कुछ ऐसे भी संबंध होते हैं, या उनके कुछ ऐसे पहलू होते हैं, जिनके विषय में हम अधिक जानने से बचते हैं, कुछ जान भी गए तो उसे स्वीकार करने से बचते हैं। हाल यह है कि लोग अपने स्वास्थ्य की पूरी जांच कराने से भी डरते हैं कि कहीं किसी ऐसी बीमारी का पता न चल जाए जो जानलेवा हो। हम सभी के भीतर एक शुतुरमुर्ग छिपा होता है जो आपदा का सामना आंख बंद करके करना चाहता है। अर्जित और विवशतालभ्य अज्ञान के परस्पर काटने वाले दायरों के बीच जो थोड़ी सी जगह बचती है, वही हमारी जानकारी का अपना दायरा होता है जिसमें ज्ञातव्य के भी अधिकांश से हम अनजान या असावधान होते हैं।
“इसी का परिणाम है कि लगभग एक हजार साल से एक दूसरे से रगड़ खाते हुए जीने के बाद भी हिंदू मुस्लिम समाज से कई तरह के लगावों के बाद भी, कुछ पहलुओं के बारे में, उतना भी नहीं जानते जितना पश्चिमी समाज के बारे में। कारण, हम मानसिक और भावात्मक परदों के साथ मिलते है, विश्वास के क्षणों में भी आशंकाओं को छिपाते हुए मिलते हैं। पश्चिमी समाजों में तर्कवादी दौर के बाद जो खुलापन आया वह हमारे भीतर नहीं आ पाया। अज्ञान और असावधानी से हम उन दुष्परिणामों से नहीं बच पाते जिनके डर से उनको और उनके कारण को जानने से डरते हैं। इस अज्ञता के चलते वे अपेक्षा से पहले और अधिक उग्र रूप धारण करके आते हैं, जब बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। जानना मुक्त होना है, यह मुहावरा पुराना है। आदमी मुक्त होने से भी डरता है, यह एक सचाई है।”
मुझे अध्यापन का अवसर नहीं मिला इसलिए अवचेतन में बसी मेरी इस अतृप्ति के शिकार अक्सर मेरे मित्रों को होना पड़ता है, “मुसलमानों के साथ हमारा व्यवहार कुछ कुछ ऐसा ही रहा है। इस अपरिचय को दूर करने के लिए एक मित्र ने भारतीय मुसलमान नाम से पुस्तिकाएं लिखी थी । उसका कितना स्वागत हुआ यह जानने का अवसर तो हिंदी के प्रकाशक देते ही नहीं, पर यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि किसी ने उसका बुरा नहीं माना। हमें संवाद बनाए रखने के लिए, सबसे पहले, लंबे समय से चली आ रही, चुप्पी को तोड़ना होगा।”