प्रयोग – 13
नजारा और नाजिजरीन
एक समय था हमें इस बात की शिकायत थी कि पार्क में बेंचें कम हैं, और हमे इस बात का पछतावा था कि उनकी संख्या अधिक हो गई थी फिर भी इसे घेर कर बसी सोसायटी के लोगों के लिए ही बैठने का ठौर नहीं मिल रहा था, जिनके लिए यह सांस लेने की जगह थी। लड़कियों-लड़कों की जोड़ी आगे-पीछे या साथ जैसे भी आए सहमती हुई बरगद के छांव के चार बेंचो पर पहुंचने की कोशिश में रहती, कुछ सकपकाई हुई कि कोई टोक न दे, फिर उनकी संख्या बढ़ने के साथ पहले की वह झिझक खत्म हो गई और धीरे धीरे वे खुले में लगी उन बेंचों पर भी जगह बनाने लगे और हालत यह हो गई कि बुजुर्ग लोग टहलने घूमने के बाद इधर उधर झांक रहे हैं कि कहीं सुस्ताने को जगह मिले और ये अपनी मंडली लिए पड़े हैं। इन सभी सोसायटियों के पार्क में खुलने वाले दरवाजे एक नियत समय पर एक नियत अवधि के लिए खुलते जो प्रात: और सायं दा दो घंटों का होता, जिसका मैं पूरा उपयोग करता था और इससे पहले या बाद में सुरक्षा कारणों से बन्द कर दिए जाते। जब तक खुले रहते तब तक एक पहरेदार वहां मौजूद रहता। अब हालत यह कि लोग पार्क में पहुंचते उससे पहले ही मौज मस्ती वाले वहां आ जमे रहते । और इनमें एक नया तत्व जुड़ गया था, नजारा देखने वालों का जिसकी दल्लूपुरा के गूजरों और उसमें बसे किरायेदारों के किशाेरों और युवकों में कमी नहीं थी। खुली जगहों की बेंचे जिन पर सोसायटियों के पुरुष और महिलाएं बैठतीं थी, दूसरा उन पर बैठने से बचता था उस पर ये लड़के ही कहीं और खाली जगह न पाकर आ बैठते।
कुछ लड़के अब इस दृश्य पर एक नजर डालने के लिए सायकिलों पर भी आ जाते, और एक नया तत्व मोटरबाइक पर सवार लड़कों का भी होता ।
पार्क के एक हिस्से में एक बड़ा चबूतरा बना था जिस पर आयाताकार छह बेंचें लगी थी। इस पर बैठक जमती और पन्द्रह बीस आदमी स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय राजनीति पर बहस करते और बहस कभी कभी गरम हो जाती तो आवाजें दूर तक सुनाई देतीं । यह चबूतरा बरगद के उन पेड़ों से निकट था जिनके नीचे की बेंचों पर जोडि़यों ने जुड़ना आरंभ किया था । इससे आगे की ओर ट्रैक के पार एक बेंच पर भी दो तीन नाजि़रीन आ बैठते । इस नये बदले पर्यावरण में हमारी कल्पना के अनुसार सबसे अधिक असुविधा महिलाओं को होती रही होगी, यद्यपि प्रकाश व्यवस्था होने के कारण उनकी संख्या में कमी नहीं आई थी, न ही केवल एक महिला को छोड़ कर दूसरा इस पर आपत्ति जताता था। वह बूढ़ी थी और जब तब खड़ा हो कर फटकार लगाने लगती थी पर उसका उन पर कोई असर होता दिखाई नहीं दिया। सोसायटियों की महिलाओं के प्रति इन नाजरीनों का व्यवहार अभद्रता का नहीं होता, या कभी वे इसकी शिकायत करती न देखी गईं। वे उधर का पूर्वानुमान करके उधर से मुंह फेरे सीधे अपनी राह पर चली जाती। सुरक्षा को ले कर इस विषय में भी आश्वस्त होतीं कि आगे पीछे दूसरे स्त्री पुरुष हैं ही। संभव है अकेली पड़ जाने वाली लड़कियों के साथ वे फब्तियां भी कसते रहे हों पर केवल एक बार अबुल फजल की एक लड़की मेरे पास आई, ‘अंकल, उस कोने में बैठे लड़के फिकरे कस रहे थे।’ मैंने वहां जा कर पूछा, ‘यहां क्यों बैठे हो। उठो, भागो यहां से। फिर दिखाई नहीं देना।’ वे उठे चले गए। परन्तु इस बात पर मुझे कुछ हंसी भी आ रही थी कि यह जिम्मा भी अब तुम्हें ही संभालना होगा।
एक अजीब विरोधाभास है कि हमारे समाज में खाते पीते लोगों में शराफत बढ़ी है और आत्मसम्मान कम हुआ है। धूर्तता, कमीनापन और अकर्मण्यता बढ़ी है और समझ कम हुई है । (अपूर्ण, जो लुप्त हो गया उसे कल देखे, ‘अवशिष्ट’ के रूप में और यदि संभव हो तो इसे उससे जोड़ कर पढ़ें।)
Post – 2016-09-24
ढूंढ़ कर लाओ कहीं से वह शख्स
जो तुम्हें देख कर उदास न हो ।
Post – 2016-09-24
प्रयोग – 13
नजारा और नाजिरीन
एक समय था हमें इस बात की शिकायत थी कि पार्क में बेंचें कम हैं, और हमे इस बात का पछतावा था कि उनकी संख्या अधिक हो गई थी फिर भी इसे घेर कर बसी सोसायटी के लोगों के लिए ही बैठने का ठौर नहीं मिल रहा था, जिनके लिए यह सांस लेने की जगह थी। लड़कियों-लड़कों की जोड़ी आगे-पीछे या साथ जैसे भी आए सहमती हुई बरगद के छांव के चार बेंचो पर पहुंचने की कोशिश में रहती, कुछ सकपकाई हुई कि कोई टोक न दे, फिर उनकी संख्या बढ़ने के साथ पहले की वह झिझक खत्म हो गई और धीरे धीरे वे खुले में लगी उन बेंचों पर भी जगह बनाने लगे और हालत यह हो गई कि बुजुर्ग लोग टहलने घूमने के बाद इधर उधर झांक रहे हैं कि कहीं सुस्ताने को जगह मिले और ये अपनी मंडली लिए पड़े हैं। इन सभी सोसायटियों के पार्क में खुलने वाले दरवाजे एक नियत समय पर एक नियत अवधि के लिए खुलते जो प्रात: और सायं दा दो घंटों का होता, जिसका मैं पूरा उपयोग करता था और इससे पहले या बाद में सुरक्षा कारणों से बन्द कर दिए जाते। जब तक खुले रहते तब तक एक पहरेदार वहां मौजूद रहता। अब हालत यह कि लोग पार्क में पहुंचते उससे पहले ही मौज मस्ती वाले वहां आ जमे रहते । और इनमें एक नया तत्व जुड़ गया था, नजारा देखने वालों का जिसकी दल्लूपुरा के गूजरों और उसमें बसे किरायेदारों के किशाेरों और युवकों में कमी नहीं थी। खुली जगहों की बेंचे जिन पर सोसायटियों के पुरुष और महिलाएं बैठतीं थी, दूसरा उन पर बैठने से बचता था उस पर ये लड़के ही कहीं और खाली जगह न पाकर आ बैठते।
कुछ लड़के अब इस दृश्य पर एक नजर डालने के लिए सायकिलों पर भी आ जाते, और एक नया तत्व मोटरबाइक पर सवार लड़कों का भी होता ।
पार्क के एक हिस्से में एक बड़ा चबूतरा बना था जिस पर आयाताकार छह बेंचें लगी थी। इस पर बैठक जमती और पन्द्रह बीस आदमी स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय राजनीति पर बहस करते और बहस कभी कभी गरम हो जाती तो आवाजें दूर तक सुनाई देतीं । यह चबूतरा बरगद के उन पेड़ों से निकट था जिनके नीचे की बेंचों पर जोडि़यों ने जुड़ना आरंभ किया था । इससे आगे की ओर ट्रैक के पार एक बेंच पर भी दो तीन नाजि़रीन आ बैठते । इस नये बदले पर्यावरण में हमारी कल्पना के अनुसार सबसे अधिक असुविधा महिलाओं को होती रही होगी, यद्यपि प्रकाश व्यवस्था होने के कारण उनकी संख्या में कमी नहीं आई थी, न ही केवल एक महिला को छोड़ कर दूसरा इस पर आपत्ति जताता था। वह बूढ़ी थी और जब तब खड़ा हो कर फटकार लगाने लगती थी पर उसका उन पर कोई असर होता दिखाई नहीं दिया। सोसायटियों की महिलाओं के प्रति इन नाजरीनों का व्यवहार अभद्रता का नहीं होता, या कभी वे इसकी शिकायत करती न देखी गईं। वे उधर का पूर्वानुमान करके उधर से मुंह फेरे सीधे अपनी राह पर चली जाती। सुरक्षा को ले कर इस विषय में भी आश्वस्त होतीं कि आगे पीछे दूसरे स्त्री पुरुष हैं ही। संभव है अकेली पड़ जाने वाली लड़कियों के साथ वे फब्तियां भी कसते रहे हों पर केवल एक बार अबुल फजल की एक लड़की मेरे पास आई, ‘अंकल, उस कोने में बैठे लड़के फिकरे कस रहे थे।’ मैंने वहां जा कर पूछा, ‘यहां क्यों बैठे हो। उठो, भागो यहां से। फिर दिखाई नहीं देना।’ वे उठे चले गए। परन्तु इस बात पर मुझे कुछ हंसी भी आ रही थी कि यह जिम्मा भी अब तुम्हें ही संभालना होगा।
एक अजीब विरोधाभास है कि हमारे समाज में खाते पीते लोगों में शराफत बढ़ी है और आत्मसम्मान कम हुआ है। धूर्तता, कमीनापन और अकर्मण्यता बढ़ी है और समझ कम हुई है ।
Post – 2016-09-24
कल मेरी चूक से प्रयाेग – 12 अधूरा ही सार्वजनिक हो गया। पूरा पोस्ट नीचे है। जिन्होंने पढ़लिया हो वे 2 से आगे पढ़ सकते हैं।
Post – 2016-09-23
प्रयोग – 12
अंधेरे के बीच राेशनी
पार्क है तो प्रकाश की व्यवस्था भी होनी चाहिए। प्रकाश व्यवस्था के साथ अंधेर न हो तो चिराग के नीचे अंधेरा का मुहावरा गलत हो जाएगा। डीडीए को भी इसका ध्यान था, इसका पता तीन तरह के खाली पड़े खंभों से चलता था जिनकी रख रखाव की जगह एक दूसरा ठेका दे दिया जाता था। पहले के खंभे उस ऊंचाई के थे जिस के वे गैस के लैंपपोस्ट पुराने समय में हुआ करते थे जिन्हें सीढ़ी कंधे पर लादे एक आदमी शाम को आता और जलाता था और सुबह को बुझाता था। पार्क में रोशनी के लिए यह सबसे उपयोगी था क्योंकि पेड़ों की छाया के नीचे भी इसकी रोशनी पहुंच सकती थी। इसके हंडे अंधकार प्रेमियों ने तोड़ दिए थे, नीचे के तार खींच का काट डाले थे । इसके बाद सड़कों को रौशन करने के लिए जिस तरह के ट्यू्बलाइट उसी उँचाई पर लगवाए गए थे। उनकी भी वही गति हुई थी। अब हार कर पार्क के लगभग बीचोबीच तीसेक फुट की ऊंचाई पर एक खंभा लगा जिसके विषय में यह विश्वास था कि ढेला पत्थर का निशाना उस ऊंचाई पर न पहुंचेगा। इसके पांच बाजू पांच दिशाओं में बढ़े हुए थे जिनमेंं नियोन बल्ब लगे रहे होंगे यह कल्पना की जा सकती थी। जिस समय मैंने इस पार्क से रिश्ता जोड़ा, यह खंभा भी खड़ा था, पर कहीं न कोई बल्ब था न रोशनी की कल्पना। आरंभ में पार्क उजाड़ था। इसपर हमारे सतमंजिले कालम के ऊपर सुरक्षा के खयाल से पीछे की ओर जो तेज रोशनी की व्यवस्था थी उससे जो रोशनी फैलती थी उतनी ही थी। लोग अधिक समय तक बैठना घूमना पसन्द नहीं करते थे इसलिए राेशनी की ओर विशेष ध्यान गया ही नहीं। हाल यह था कि आरंभ में मोटरपंप ही चालू नहीं था, उस तक बिजती अश्वय पहुंची हुई थी पर वह एक कमरे में थी। हरियाली के साथ रौनक लौटी तो चहल-पहल शुरू हुई और खास तौर से उस ओर जिधर बरगद के पेड़ों की कतार सी थी इसलिए दिन ढलते ही अंधेरा हो जाता, लोगों को गुजरते हुए कुछ दिक्कत होती। यह इसलिए भी कि बरगद की छाया में पड़ी चार बेंचों में से पता नहीं किस पर कौन बैठा हो और जाने क्या कर बैठे।
(2)
मैं लोगों को समझाने की कोशिश कर सकता था, पर जहां से तन्त्र या वाद आरंभ होता है, मैं जानता हूँ वहां समझाने का असर नहीं होता, छोटा से छोटा अधिकारी आप से अधिक समझदार होता है और आपकी समझ पर वहीं भरोसा करता है जब आप उसके सामने रिरियाकर उसके अहं की तुष्टि कर सकें या उसको सक्रिय करने के लिए मोबील आयल डाल सकते हैं। ये दोनों काम मेरे वश में नहीं, फटकारना और कोसना जरूर अपने वश का है:
न तंत्रं नो यंत्र न च मोबिल न विलपनं
महामंत्रो जाने भर्त्सनं कुत्सनं वा ।
इसलिए पहले दूसरी सोसायटियों के पदाधिकारियों को इस बात के लिए सहमत किया कि जब तक कोई अन्य व्यवस्था न हो, वे मेरी अपनी सोसायटी की तरह पार्क के निकट पड़ने वाले हिस्से में उसी तरह की प्रकाश व्यवस्था तो कर ही सकते हैं। कुछ ने इसे मान लिया और इस पर अमल भी किया, कुछ के साथ तकनीकी कठिनाइयां थीं।
अब देखिए, अपनी अल्पावधि याददाश्त में कितना इधर उधर हो जाता है। खैर इसी बीच मुझे सौभाग्य से लक्ष्मीनारायण शर्मा हाथ लग गए थे जो स्थानीय स्तर के नेता बनने वालों की स्पर्धा में एक थे और विनी के आस पास पहुंचते थे। अब मुझे ऐसा लग रहा है कि नियोन लाइट का प्रबंध डीडीए के काल में नहीं हुआ था, अपितु इसके एमसीडी के हस्तान्तरित होने के बाद हुआ था और ऊपर बताए गए तरीकों को अपनाने के बाद हुआ था। इसमें विनी की जनतोषी और शर्मा जी की सक्रिय रुचि थी। और अब पिछले बयान को सुधरते हुए मुझे कहना पड़ेगा कि यह नियोन लाइटें बेकार नहीं हुई थी, ठीक काम कर रही थी और इन्हें चालू करने और सुबह बन्द करने का दायित्व शर्मा ने अपने ऊपर ले रखा था। इनके किसी बल्ब में खराबी आने पर शर्मा जी स्वयं सक्रिय होते और बताते कि उन्होंने यह कर दिया। वह मेरे हाथ कैसे लगे थे वह एक अलग दास्तान है और अपने समाज को समझने के लिए जरूरी भी है।
यह प्रकाश व्यवस्था ठीक चल रही थी, परन्तु बिना हमारे अनुरोध या प्रयत्न के पता चला कि अब इसकी जगह ऐ उससे काफी ऊंचे खंभे जिनका मैं नाम भी नहीं जानता, इसलिए लगाए जा रहे हैं कि एशियाई खेल योजना में इतने अधिक खंभे खरीद लिए गए जिनकी जरूरत नहीं थी, इसलिए इन्हें कहीं न कहीं लगाना तो है ही। जरूरत हो या न हो। इनमें प्रत्येक खंभे की कीमत कई लाख थी।
यह पहले से कुछ अधिक उज्ज्वल प्रकाश व्यवस्था तो थी ही जो खेलगांव के साथ पैदा हुई और चलती रही। कहीं कोई असुविधा नहीं। परन्तु इसी बीच पिछले पार्क के चार मंजिली ऊंचाई का एक स्तंभ लगा जिसमें एलईडी की प्रकाश व्यवस्था थी और इसे लगवाने की पहल तत्समय आगामी और अब संपन्न एमसीडी के काउंसलर के प्रत्याशी ने स्थानीय एमपी या भूतपूर्व एमपी के सहयोग से मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए की थी।
वह कांग्रेस का प्रत्याशी था। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के प्रति मेरी अरुचि जुगुप्सा के निकट इसलिए पहुंच जाती है कि उसका न तो देश की मिट्टी से लगाव है, न समाज से लगाव है, न भारतीय मतों और विश्वासों से लगाव है, न देशनिष्ठा है कि इसके हित के लिए हम कोई भी बलिदान दे सकते हैं, न जिनमें राजनीतिक दक्षता या कूटनीतिक परिपक्वता है, न शैक्षिक योग्यता है, न नैतिक मनोबल है, न अपनी वंशपरंपरा का श्लाघ्य गुण, फिर भी मैंने यह पाकर कि आप धूर्तों की जमात है, बीजेपी या तो अयोग्य है या भ्रष्ट जो उन गतिविधियों को अपने शासन काल में चलने दे रही थी, मैं पहली बार स्थानीय कांग्रेस नेता आनंद को आशीर्वाद देने को तैयार था। यह वह समय था जब पार्क का पंप कई महीने से बंद पड़ा था, उसे ठीक करने के लिए लिखत पढ़त हो रही थी, नाजुक पौधे सूखने के कगार पर थे, घास सूख चुकी थी, वह अपने प्रचार अभियान में मेरे पास आया तो मैंने कहा, यदि तुम हमारे पार्क को सूखने से बचा सकते हो तो इसको घेरने वाली सोसायटियाें का वोट तुम्हें जाएगा। पंप को ठीक करने के लिए उसे बाहर निकालना था या ऐसी ही कोई कठिनाई थी जिसके लिए उसने प्रयत्न किया पर सफल न हो पाया। फिर उसने अपने प्रयत्न और साधनों से टैंकर मंगा कर उनकी सिंचाई करता रहा और फिर जब उसके बन्दे आए तो मैंने कहा, तुम तो जीत चुके हो। अपना वादा पूरा करने वाला हारता नहीं है।
मुझे दुख था कि विनी ने एमएलए का चुनाव जीतने के बाद आप की आन्तरिक राजनीति के कारण इस्तीफा दिया और आज तक विनी ही अपने आरोपों में सही सिद्ध हुआ है, पर उसने उससे छोटे पद के लिए अपने को प्रत्याशी घोषित करने के साथ ही अपनी हार का भी ऐलान कर दिया। मुझे लंबे समय तक विश्वास ही न हुआ कि उस जैसा परिपक्व क्यक्ति ऐसी भूल कर सकता है।
परन्तु मैं इस पोस्ट के माध्यम से आपको यह बताना चाहता था कि कितने तरह के अंधेरों से और अन्धेरगर्दियों से घिरे हम रोशनी की तलाश कर रहे हैं और इन कुचालों के कारण हमारी रोशनी की कीमत कितने गुना बढ़ जाती है। रोशनी के नीचे इतनी तरह के अंधेरे हैं जो चिराग के नीचे हो ही नहीं सकते। हम ऐसे युग में जी रहे हैं जिसमे प्रकाश ग्लेयर बन कर हमारी आंखों को चौंधिया देता है और हम एक प्रकाशमूर्छित अंधेरे का सामना कर रहे होते हैं जिसमें रोशनी की नहीं पलकों को बंद करने की विवशता पैदा होती है।
लगातार दुखड़ा रोया जाता है कि एमसीडी के पास फंड की कमी है, जब कि सचाई यह है कि फंड इतना है कि सभी पूरा फंड स्वयं खा जाना चाहते हैं और खाने पर ध्यान अधिक देने के कारण उन्हें करना क्या है यह तक भूल जाता है ।
Post – 2016-09-23
प्रयोग – 12
अंधेरे के बीच राेशनी
पार्क है तो प्रकाश की व्यवस्था भी होनी चाहिए। प्रकाश व्यवस्था के साथ अंधेर न हो तो चिराग के नीचे अंधेरा का मुहावरा गलत हो जाएगा। डीडीए को भी इसका ध्यान था, इसका पता तीन तरह के खाली पड़े खंभों से चलता था जिनकी रख रखाव की जगह एक दूसरा ठेका दे दिया जाता था। पहले के खंभे उस ऊंचाई के थे जिस के वे गैस के लैंपपोस्ट पुराने समय में हुआ करते थे जिन्हें सीढ़ी कंधे पर लादे एक आदमी शाम को आता और जलाता था और सुबह को बुझाता था। पार्क में रोशनी के लिए यह सबसे उपयोगी था क्योंकि पेड़ों की छाया के नीचे भी इसकी रोशनी पहुंच सकती थी। इसके हंडे अंधकार प्रेमियों ने तोड़ दिए थे, नीचे के तार खींच का काट डाले थे । इसके बाद सड़कों को रौशन करने के लिए जिस तरह के ट्यू्बलाइट उसी उँचाई पर लगवाए गए थे। उनकी भी वही गति हुई थी। अब हार कर पार्क के लगभग बीचोबीच तीसेक फुट की ऊंचाई पर एक खंभा लगा जिसके विषय में यह विश्वास था कि ढेला पत्थर का निशाना उस ऊंचाई पर न पहुंचेगा। इसके पांच बाजू पांच दिशाओं में बढ़े हुए थे जिनमेंं नियोन बल्ब लगे रहे होंगे यह कल्पना की जा सकती थी। जिस समय मैंने इस पार्क से रिश्ता जोड़ा, यह खंभा भी खड़ा था, पर कहीं न कोई बल्ब था न रोशनी की कल्पना। आरंभ में पार्क उजाड़ था। इसपर हमारे सतमंजिले कालम के ऊपर सुरक्षा के खयाल से पीछे की ओर जो तेज रोशनी की व्यवस्था थी उससे जो रोशनी फैलती थी उतनी ही थी। लोग अधिक समय तक बैठना घूमना पसन्द नहीं करते थे इसलिए राेशनी की ओर विशेष ध्यान गया ही नहीं। हाल यह था कि आरंभ में मोटरपंप ही चालू नहीं था, उस तक बिजती अश्वय पहुंची हुई थी पर वह एक कमरे में थी। हरियाली के साथ रौनक लौटी तो चहल-पहल शुरू हुई और खास तौर से उस ओर जिधर बरगद के पेड़ों की कतार सी थी इसलिए दिन ढलते ही अंधेरा हो जाता, लोगों को गुजरते हुए कुछ दिक्कत होती। यह इसलिए भी कि बरगद की छाया में पड़ी चार बेंचों में से पता नहीं किस पर कौन बैठा हो और जाने क्या कर बैठे।
Post – 2016-09-22
प्रयोग – 11
किं कर्मं किमकर्मेति कवयोप्यत्र मोहिता:
पार्क में बच्चों के लिए पैरलल बार, ढेकी राड, मंकी बार, सरक पट्टे, झूले थे। इनका सही नाम क्या है यह मैंने जानने की कभी कोशिश नहीं की। इन्हें पांच से दस बारह साल के बच्चों के लिए बनाया गया था, जो टहलने घूमने आने वाले मां बाप के साथ आते थे। मजदूरों के शैशव से स्वावलंबी बना दिए गए बच्चे इधर उधर भटकते पार्क में कदम पड़ते ही जिस उल्लास से हाथ फैलाए इनकी ओर दौड़ते उसे देख कर फर्राटे भरते पक्षियों की याद आ जाती। कुछ देर तक एक पर, फिर स्वाद बदलने के लिए दूसरे पर और जाहिर है आनन्द को पूरा आनन्द बनाने के लिए किलकारियां। उनकी इस क्रीड़ा को खड़ा हो कर देखना भी प्राकृतिक लीला के अवलोकन जैसा लगता।
परन्तु मुस्तंडाें का एक दूसरा वर्ग था। जिनके आयुवर्ग के लिए पैरलल बार, मंकीबार लगे जिससे वे व्यायाम कर सकते थे। परन्तु इनमें से अधिकांश काे छोटे बच्चों के लिए बने उपकरण अधिक पसन्द आते, इनको तोड़ने में उन्हें जितना आनन्द आता था, उतना खेलने में नहीं। इसके साथ कई तरह की मानसिकताएं काम करतीं।
यह पार्क इन अपेक्षाकृत ‘खुशहाल लोगों का’ है अत: इसे नुकसान पहुंचाना उनसे बदला लेने जैसा है। सामाजिक-आर्थिक भेद अपने से ठीक ऊपर वालों के प्रति आक्रोश पैदा करता है जिसे कई बन्धनों के कारण लोग सीधे व्यक्त नहीं कर या बड़े भोलेपन से अमल में लाते हैं। किसी कम्युनिस्ट से पूछें तो कहेगा ये क्रान्तिकारी शक्तियां है, जिन्हें एक बार संगठित होने का अवसर मिल जाय तो ‘आकाआें की हड्डियां तक चबा सकते हैं।’ उन्हें भी हड्डियॉं चबाने की क्रिया क्रान्ति से अधिक जरूरी लगती है, पर यह भूल जाते हैं कि उनके सभी नेता उसी जमात में शामिल हैं जिनकी हड्डियां सबसे पहले चबाई जाएंगी क्योंकि निकट पड़ोस में अल्पतम सुरक्षित वे ही मिलेंगे।
शिशुओं और बालकों के सरकने के लिए बने स्लाइड बोर्ड पर ये बड़े बच्चे कुछ दूर से दौड़ते हुए आते और उल्टे सिरे से जूता पहने ऊपर तक पहुंचने का प्रयत्न करते। कुछ ही समय बाद उसमें गढ्ढे पड़ जाते, फिर वह फटने लगता और सरकने के काम का न रह जाता । एक एक कर उन्होंने तीन की यही गति की थी। इसमें एक दबी चुनौती भी थी।
झूलों पर एक साथ दो दो, तीन तीन मुस्तंड खड़े हो कर झूलने लगते, सी-सा पर एक साथ कई उसके राड तक पर बैठ जाते। इसमें कालेज के लड़के लड़कियां किसी से पीछे नहीं रहते जो शगल के लिए विचित्र लगने वाली कई दूसरे तरह के कारनामे भी करते रहते थे। नतीजा क्या होगा इसकी चिन्ता नहीं।
जिन बच्चों के लिए झूले बने थे उनको धक्का दे कर खुद एक साथ दो तीन चढ़ जाते और ऊंची पेंगे भरते । कई बार बच्चे दौड़े मेरे पास आते। मैं अखबार पढ़ रहा हूं या किताब, उनकी बात सुनूंगा ही, यह विश्वास लिए, ”अंकल वहां वो लड़के हम लोगों को झूलने नहीं दे रहे हैं।” उनकी नजर में मैं यहां का छोटा मोटा सुपरवाइजर बन चुका था। किताब संभाले छड़ी टेकता, पहुंचता। उनको आवाज दे कर पास बुलाता, समझाता, अगर आना कानी करते तो फटकारता, ”यह इन बच्चों के लिए है। तुम्हारे लिए पैरलल बार और मंकीबार है। उतरो, भागो यहां से।” एक बार को छोड़ कर यह आदेश कभी विफल नहीं हुआ और उस बार मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इसे समझाऊं तो कैसे, ”तुम्हारे पास अक्ल नहीं है।” ”नहीं है।” ”मैं तो नहीं उतरता, आप चाहे पुलिस बुला लो।” ”पुलिस बुलाऊंगा तो मैं ही हार जाऊंगा, अभी तुम उतर जाओ तो तुम भी जीत जाओगे, मैं भी ये बच्चे भी।” मैं किसी से उलझा हूं यह देख कर लोग इकट्ठा हुए तो बड़े अनमने पन से हटा । यह धमकी देते हुए कि कल फिर आएगा, देखें कौन भगाता है।” अगले दिन क्रिकेट की टीम बना कर आया। मैंने उसकी उपेक्षा कर दी, यह भी नहीं समझाया कि यह खेलने की जगह नहीं है। उसका अहं तुष्ठ हो गया, शायद । उसके बाद न वह दीखा न उसका दल ।
पर झूलने का प्रलोभन तो छोटे बच्चों जैसा ही चौकाबर्तन करने वाली महिलाओं से कुछ उपर की हैसियत रखने वाली अधेड़ औरतों में होती। वे घूमने आतीं, मौका पा कर उस पर लद जातीं। बचपन से अतृप्त आकांक्षाएं। झूले के गीत तो उन्होंने जितने भी गाए हों, झूलने का अवसर शायद ही मिला हो। पेंग बढ़ा कर नभ को छू लें वाली पेंग भरने लगती। क्या कर सकते हैं आप। जो होना हो सो हो। और पहले उसका पटरा टूटता और जंजीर रह जाती फिर जंजीर बांध कर उस पर खड़े हो कर झूलते और उसे तोड़ कर ही दम लेते।
अगर विफलता का लेखा रखना हो तो इसमें तीन बार उसी अनुभव से गुजरना पड़ा। पहले डीडीए ने लगवाए थे जिनकी गुणवत्ता भी अच्छी थी। फिर शिकायत करने पर एमसीडी ने लगवाए जो घटिया थे और इनके टूटने के बाद एक बार अनुरोध करने पर एमसीडी ने फाइबर की सीट वाले झूले और फाइवर के ही घुमावदार स्लिपबोर्ड लगवाए, परन्तु जब उसको भी तोड़ डाला गया तो मैंने तय कर लिया था कि अपनी ओर से छोटे बच्चों के मनोरंजन के लिए कोई उपकरण लगाने पर जोर नहीं डालूंगा। पर लीजिए इस संकल्प के साथ ही, ‘हम छोड़ आए वो गलियॉं’ और गार्डन के पड़ोस से हटकर गार्डेनिया में पहुंच गए जहां गमले दिखाई देते हैं, पेड़ नहीं ।
2
समस्यायें पहले से होती हैं। जब तक उनसे अधिक गंभीर समस्यायें हमारा ध्यान खींचती रहती हैं, तब तक हम उनको देख नहीं पाते। हम कभी समग्र को नहीं देख पाते, उदग्र को ही देखते हैं और मान लेते हैं हम समग्र को जानते हैं। इस इलाके की संस्कृति और वस्तुव्यापार जैसा था, उसमें जब यह पार्क उजाड़ सा था उस समय भी स्कूल जाने वाली बालिकाएं इससे हो कर ही गुजरती थीं। उस दौर में वे यहां किसी न किसी बहाने ठहरती थीं या नहीं इस पर कभी ध्यान नहीं दिया जब कि आदतन आते तो चक्कर लगाने उस समय भी थे।
जब लक्ष्य किया तब वे या उनमें से बहुतेरी इस प्रतीक्षा में टहलती रहतीं कि उनका कोई दोस्त आएगा और उसके साथ घूमेंगी। कुछ अपने मित्र के साथ आतीे। इनको उतनी छोटी आयु में भी किसी लड़के के साथ की अपेक्षा करना मुझे विस्मित नहीं करता क्योंकि मनोविज्ञान में अपनी कुछ गति होने के कारण जानता था कि काम भावना और स्पर्शानुभूति बहुत कम उम्र में ही पैदा हो जाती है जिसे माताएं अपनी सन्तान के माध्यम से जानती है, पुरुष अपने बारे में भी मूर्ख रह जाता है। परन्तु यहॉं उनकी आयु का अन्तर कभी कभी विचलित करता। आप देखते हुए भी, बहुत कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं कर सकते। जीवन में सर्वत्र यह हाेता है। देवालयों और न्यायालयों में भी। मकतबों और मद्रसों में भी। शायद वहां सबसे अधिक जहां हम इसकी अपेक्षा नहीं करते इसलिए उसकी पड़ताल नहीं करते। मैं अपने हस्तक्षेप को हस्तक्षेप न मान कर एक प्रयोग मानता था इसलिए यह जानना चाहता था कि यदि इसमें ऐसा किया जाय तो परिणाम क्या होगा। बीच में कूद पड़ता, स्कूल जाओ तुम लोग। यहां क्यों चक्कर लगा कर अपना समय बर्वाद कर रहे हो। वे खिसक लेते और उनमें एकाध जो कहतीं, स्कूल एक घंटे बाद लगेगा तो फटकारता, ‘तो यहां समय क्यों बर्वाद कर रहे हो जाओ अपने घर।’
इसका असर पड़ता। वे भाग खड़े होते। जो रुके रह जाते उनका फोटो लेने का अभिनय करता, क्योंकि दिन की रोशनी में मुझे मोबाइल के संकेत तक दिखाई न देते, पर इसका असर होता और वे भाग खड़ी होतीं।
जब कालेजों के लड़के लड़कियां मौज मस्ती के लिए आने लगे उनके पारस्पर्य के प्रचार के बाद इन लड़कियों में भी यह अधिकार बोध जागा कि हम अपने फ्रेंड के साथ क्यों नहीं घूम सकते और मेरा पुराना प्रभाव कम हुआ । खाप पंचायतों के प्रभाव की तरह।
पर इसका एक सबसे चिन्ताजनक रूप यह उभरा कि शाम से ही आवारा लड़कों और लड़कियों का जमावड़ा आरंभ हो गया जो पहले नहीं था। वे आ कर उन बेंचों पर बैठ जाते जिन पर हम टहलने के बाद आराम के लिए बैठते थे। उन्हें मैं उठा देता, ‘यह आप लोगों के लिए नहीं है।’ वे चुप उठते और मुझे यह जानने की जरूरत न होती कि वे कहां गए, क्योंकि वे वहां बैठे ही इसलिए थे कि सघन वृक्ष की छांव में उन्हें जगह न मिल पाती थी।’
हाल इससे बुरा था गुलशन का । पता चला कि इसे प्रेमीजन जोड़ापार्क कहने लगे हैं। और इसे समझने के क्रम में पता चला कि यहां कुछ लड़कियां धन्धा करने के लिए बैठने लगी हैं और तकलीफदेह यह कि उनमें कुछ अल्पवय बालिकाएं भी थी जो सज संवर कर आतीं और ग्राहक की प्रतीक्षा में बैठी रहती।
ऐसी विक्षोभकारी स्थितियों के समर्थन में नारी संगठन या नारी मुक्ति या नारी स्वातन्त्र्य के समर्थक क्या कहेंगे यह मैं जानता हूँ क्योंकि मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलें विरंचि सम । वे मुहावरे बोलते हैं और मुहावरों के माध्यम से यथार्थ का निर्माण करते है, परन्तु यदि उन्हें भी इसका सामना करना पड़े तो उनमें कोई इतना जाहिल नहीं है कि वह उन्हीं नतीजों और चिन्ताओं के आसपास न पहुंचे जिस पर मैं पहुंचा था।
समस्या एक और थी जो पहले लक्ष्य नही की गई थी, और जिसके लक्षण पहले देखने में न आए थे। रात के अंधेरे में यहां जो कारोबार चलता था उसका पता फटी हुई चोलिया, टूटी हुई जूतियां, और छोड़ी हुई चद्दरों, शराब की खाली बोतलों, सोडा की बोतलों और खान पान के कुछ के जूठनों से मिलता जिनको गन्दगी का हिस्सा मान कर अपने को सम पर रखा जाता, क्योंकि इस सचाई का साक्षात्कार करने का साहस किसी में न था। मैं नहीं जानता कि पेशेवर लड़कियों का जमा होना इससे कितना प्रेरित था, पर बैठने वालों की ऐसी गतिविधियां बढ़ गई थीं और संचार माध्यमों की चीख के बीच किं कर्मं किं अकर्मेति कवयोप्यत्र मोहिता वाली स्थिति में थे ।
Post – 2016-09-22
अपने को जो बहुत समझते हैं ।
हम भी कुछ कुछ उन्हें समझते हैं ।
जरा सा फर्क है मगर सोचें
उनको क्या हम भी कुछ समझते हैं ?
Post – 2016-09-21
जिन्हें अपना समझते हैं उन्हें भी देखिए साहब
बुलाते हैं करीब आओ मगर अपना नहीं सकते ।
पले नफरत के साये में बढ़े अपनों को ठुकराते
उसी से मुक्ति पानी है मगर हम पा नहीं सकते ।
Post – 2016-09-21
भगवान तुझे क्या हुआ तू खुद ही रो पड़ा
मैंने तो जमाने की शिकायत भी न की थी।
21.9.16 : 15:47