Post – 2016-02-25

ये बौखलाहट भरे दिन हैं। उससे भी अधिक रहस्यमय गतिविधियों के दिन। फेसबुक पर विवेक मिश्र ने एक बहुत अच्छा विश्लेषण किया है जिसे दूसरों को भी पढ़ना चाहिए। उनके अनुसार पिछले लोकसभा चुनाव में जिन जिन श्रेणियों के मतदाओं का पहले की अपेक्षा अधिक समर्थन मोदी को मिला था उनको चिन्हित करके उनके बीच संवेदना भड़काने वाले मुद्दे तलाश कर लोगों को भड़काया जा रहा है।

यह सच है पर इसके साथ यह भी याद रखना होगा कि कांग्रेस के किसी नेता में इतनी चतुरता नहीं है जो इतना सुनियोजित और बहुआयामी और बहुरंगी उपद्रव आयोजित कर सके। यह सुपठित देशभक्तों की पार्टी रही है और इन्दिरा जी के समय तक राष्ट्रीय गरिमा के प्रश्न पर इसके शिखर बिन्दु पर भी कोई समझौता कभी सहन नहीं किया गया। इसके शिखर पर इटालियन इफेक्ट के बाद से सभी तरह के समझौते आरंभ हुए यहॉं तक कि भोपाल गैस त्रासदी के साथ समझौता तक जो आज इस चरम पर पहुँच गया है जिसे बदहवाही से अलग कोई नाम नहीं दिया जा सकता।

यह राष्ट्रीय बदहवासी नहीं है, कांग्रेस नेतृत्व की बदहवाही है जो सान्निपातिक लक्षणों से युक्त है, कथनी में भी करनी में भी, परन्तु इसे पीछे से नियन्त्रित करने वाली ताकत पूरे होस हवास में है – शीतयुद्ध के सीआइए और केजीबी की तरह। शीतयुद्ध सोवियतसंघ के बिखराव और उसके निराले समाजवाद की थकान से उत्पादन में गिरावट और आर्थिक कमजोरी के बाद से शीत-ताप-युद्ध में बदल कर नए रूप में जारी है और अब प्रतिरोधी शक्ति के अभाव में अधिक आक्रामक हो चला है। इसके निशाने पर वही शेष दुनिया है और वेस्ट के नाम पर केवल अमेरिका जो गोरे देशों को जब तक कोई बड़ी अड़चन न पैदा हो जाय, छेड़ने वाला नहीं है।
अभिव्यिक्ति की स्वतन्त्रता का पुराना राग आज भी उसके अफवाहों की सूची में है जिसका उपयोग उसने आपात काल में भी किया था और आज भी कर रहा है जब किसी को कुछ भी कहने की आजादी मिल चुकी है। मैंने ऐसी कविता पढ़ी है जिसमें देश के प्रधानमन्त्री तक को सूअर कहा गया है। संसद के लिए सूअरेर बाड़ा बहुत पहले भी पोस्टरों और पर्चों में देखा जा चुका है। आपातकाल के प्रति अपनी घोर असहमति के बाद भी और इन्द्रा जी के तानाशाही रवैये के विरुद्ध स्वयं छद्मनाम से लिखने के बाद भी मैं उनके इस अभियोग को, जिस पर तब विश्वाास नहीं करता था, आज पूरी तरह नकार नहीं पाता कि इसके पीछे अमेरिकी हाथ भी था भले इसका तत्कालीन संघ को और दूसरे आन्दोलनकारियों को स्वयं भी गुमान न रहा हो।

अमेरिकी ऐजेन्सियों के काम करने का तरीका इतना चतुराई भरा है कि सीधे उनके उकसावे तक का सामना न करना पड़े और आप को लगे आप स्वंयं अपने निर्णय से ऐसा कर रहे हैं। इसमें आज उसका सबसे कारगर हथियार ईसाई मिशनरी हैं जिनके एक भिन्न मजहब होने के कारण नहीं अपितु अमेरिका पोषित होने के कारण है एक खतरनाक उपस्थिति मानता हूँ। सोनिया जी के प्रभुत्‍व के अन्तर्गत उसे जितने रूपों में और जितना बढ़ावा मिला, संचार माध्यमों
में किस तरह उसके रास्ते बनाए गए, उसका शतांश भी सतह पर उजागर नहीं है यदि है तो केवल कतिपय सर्वविदित क्षेत्रों में उसका धमान्तरण का अभियान। गांधी परिवार आज नामत: जो भी हो धर्म: क्या है यह छिपा नहीं है इसलिए राहुल गांधी ही ऐसे व्य क्ति हो सकते थे जो अपनी नासमझी में यह कह कर कि भारत को टेररिज्मि से उतना खतरा नहीं है, जितना हिन्दुतइज्म से और वह भी विदेशी जमीन पर, उस सचाई को उजागर कर दें जिस पर परदा डाला गया था।

दलितो और मुसलमानों को जोड़ने, स्त्री- अधिकारों की ऐसी भूख कि आज तक उनको शनि की छाया से डर लगता था आज वह उनके मन्दिर में पुरुषों से समानता के आधार पर प्रवेश की मॉंग करने के लिए आन्दोलन के लिए भीड़ जुटाने में सफल हो गई और वह भी वे महिलाएँ जिनकी आधुनिक वेशभूषा से स्वत: प्रकट हो कि इनका मन्दिर या किसी देवता में विश्वास ही नहीं होगा। स्वा मीनारायण संप्रदाय में ब्रह्मचर्या पर इतना जोर है कि जब उनके मन्दिर में उसके साधु प्रवेश करते हैं, उसमें किसी स्त्री का प्रवेश नहीं हो सकता। मैं अपनी पत्नी के साथ मन्दिर देखने गया था और पाया महिलाऍं बाहर प्रतीक्षा कर रही हैं। पत्नी को भी प्रतीक्षा करनी पड़ी यद्यपि मैं यह देखने के लिए बढ़ गया कि उनका परिधान और उपासना की रीति क्या है। वे कुछ परिक्रमाऍं करते हैं परन्तु उनके उत्तरीय को लहराता हुआ छोर भी किसी स्त्री से छू जाए तो उन्हें कड़ाके की ठंड में भी दुबारा स्नान करना पड़ेगा। पर आन्दोलन इस बात का कि पुरुष यदि जा सकते हैं तो हम क्यों नहीं। विचित्र मॉंगें जो इससे पहले कभी उठाई नहीं गईं, एक झटके में इस उम्मीाद में उठाई गईं कि इसमें शासन हस्ततक्षेप करेगा क्योंकि दोनों राज्यों में भाजपा का शासन है जिसका रवैया परंपरावादी होगा और उन्हें शासन पर हमला करने का मौका मिल जाएगा और फिर भाजपा को मनुवादी अत: ब्राह्मणवादी ठहरा कर शेष जातियों को उससे अलग और वर्णवादी असमानता का शिकार दिखा कर उन्हें लामबन्दण करने, ईसाई-मुस्लिम-दलित एकता के नाम पर उनको हिन्दू् समाज से अलगाने में मदद मिलेगी। यदि आपने ‘लाखों भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतीक’ फारवर्ड प्रेस के अंक देखे हों तो इस योजना को समझने में आसानी होगी। इसके संपादक हैं डॉ. सिल्विया फर्नांडीस जिनकी संपादकीय योग्योता का मैं प्रशंसक हूँ और कार्ययोजना को सामाजिक सौमनस्य के विपरीत पाता हूँ। समझ की खोट हो सकती है। राजनीतिक पैंतरेबाजी की समझ मुझमें बिल्कुल नहीं है, उस नाले में कभी उतरा ही नहीं जो स्वच्छ हो तो पतित पावन बन कर आसमुद्र प्रवाहित होता है और मलिन हो तो परनाले में बदल कर पतित पावनियों से ले कर समुद्र तक को मैला कर देता है। औपनिवेशिक चंगुल से निकले सभी देशों की राजनीति परनालों की राजनीति क्यों बन गई यह नवमुक्त देशों को मिलकर सोचना चाहिए।

यदि मेरे ये विचार आपको मूर्खतापूर्ण लगें तो आपके समर्थन में हाथ उठाने वालाें में मैं पहला स्थान पाना चाहूँगा क्योंकि जब तब मुझे लगता है कि जो दूसरे सभी मानते हैं या लगभग सभी मानते हैं उसे मैं क्यों नहीं मान पाता । मूर्ख नहीं, सिरफिरा ही सही। कुछ तो गड़बड़ है। परन्तु मेरी चेतावनियॉं बाद में सच बनती रहीं और मेरी व्यााख्यायें जिस झूठ का पर्दाफाश कर सकीं और उनकी फसल उगाने वाले सर्वप्रभुता संपन्न विद्वानों को झुकने को बाध्य कर सकीं, वे पुन: मुझे दुस्साहसी बना देती हैं, इसलिए कहना पड़ता है कि जो मेरी गलतियों को साक्ष्य , प्रमाण, तर्क और औचित्य के साथ उजागर नहीं कर सकते, संचारमाध्यवमों के बल पर ऐसा करना चाहते हैं, उनका जवाब उन परिणामों से मिलता है जो आप के पास थे पर जिन्हें आप दबाते रहे, जैसे इशरत जहॉं के बारे में आप को अमेरिकी जॉंच एजेन्सी से पता था कि वह एक आत्मघाती हमलावर थी और आप उसे निर्दोष बताते रहे। आप आतंकवादियों के साथ तब से खड़े हैं जब से यह सूचना मिली और आपने आतंकवादियों का। इसलिए गलती करने की अधिकतम संभावना के बाद भी, समझदार कहे जाने वाले लोगों द्वारा गलत करार दिए जाने या उपेक्षा किए जाने के बाद भी मुझे यह भ्रम है कि मै बावरा नहीं हूँ, बौद्धिक परिवेश ही बावला हो गया है। मुझे उसकी जरूरत नहीं, उसे मेरी जरूरत है और बावलेपन का हाल यह कि वह इसे जानता तक नहीं इसलिए वह मेरे पास नहीं आएगा, मुझे ही उसके पास जाना होगा। उसकी गालियॉं सुनने के बाद भी, उसकी झिड़कियॉं खाने के बाद भी। उसका आघात सहने के बाद भी। जो होश में नहीं, उसे दोष कैसे दिया जा सकता है।

समसामयिक ‘राज-नीति’ में भागीदारी और समझदारी के अभाव में मैं इतिहास को देखता हूँ। सद्दाम के ईराक को किसने हरबा हथियार दिए थे जिसमें रासायनिक और परमाणु हथियार भी थे। उसे कुर्दों को उत्पीडि़त करने के लिए किसने उकसाया था। इराकी शिया समुदाय के प्रति घृणा यदि पहले उग्र थी तो हमारी जानकारी में नहीं आई थी। कुवैत र्ईराक के भूभाग के तेल भंडारों को भी दोहन कर ले रहा है इसलिए उसे उससे क्षतिपूर्ति मॉगने का अधिकार है और यदि वह न माने तो उसे बाध्य करने का अधिकार है। यह ईराक में अमेरिका की तत्कालीन महिला राजदूत के बयानों से प्रकट था परन्तुे उसे मास मीडिया से जल्द ही हटा लिया गया। कुवैत पर आक्रमण के दौरान अमेरिकी प्रसार माध्यमों से यह विज्ञापित किया जाना कि कल वह तेल के कुओं में आग लगा देगा, अगले दिन आग लग जाती थी, प्रचारित किया जाता वह तेल के टैंकरों को क्षति पहुँचाएगा। अगले दिन तेल के टैंकरों को नष्ट कर दिया जाता। तेल से प्रभावित समुद्र से साइबेरियन पक्षी निकाल कर उनकी सुध लेने वालों के चित्र दिखाए जाते, जिनकी करुण कथा में मनुष्यों का उत्पी ड़न छिप जाता। उसी समय दहशत में मैंने सोचा था आज इन पर बीत रही है कल हमारी बारी है। हंटिंगटन की पुस्तक पढ़ी न थी पर यह पता था यह पश्चिम और उसके नायक अमेरिका और शेष जगत – The West and the Rest का संग्राम है और यह नए रूपों में उभर रहा है जिसके दावपेच तक हमें नहीं मालूम। परमगति के आमुख की ये पंक्तियॉं ‘’सूचना, नव्य- न्‍याय-दर्शन और प्रहारशक्ति का यह सम्मिलित प्रदर्शन देख कर संसार मुग्‍ध था और मैं डर रहा था कि यह किसी दिन किसी के साथ भी हो सकता है। इसकी तैयारियॉं हमारे विरुद्ध भी कई ओर से चल रही हैं।‘

तब जो तैयारी थी वह अब कार्ययोजना बन कर सामने आ रही है इसलिए जरूरी है पड़ोसी की नाराजगी को भी समझें और हम सभी को जो अपना शिकार बना कर ठीक उन्हीं तरीकों से तीसरी दुनिया को अपने लिए खाली कराने के तरीके सोच रहा है उसे कुछ अधिक ध्या न से समझें। राहुल की अक्ल के बारे में लोगों को पता है, शक्ल ऐसी कि कुँवारियॉं क्या विवाहिताऍं तक फिदा हो जायँ, सेहत ऐसी कि लगे यह जिमनास्ट बनना चाहता था या राजनेता, पर इरादे ऐसे कि लगे इसको किसी शातिर ने शिकार बनाया है। राहुल और कांग्रेस पर गुस्साा उतारने की जरूरत नहीं, न मुसलमानों पर। ये अपने अपने कारणों से किसी बड़े बहेलिये के निशाने पर आ गए हैं।

अब अपने इतिहास में जाऍं। इस ऐक्शन प्लान के पहले प्रयोग जिसे अतिसमझदारों ने निर्भया कांड का नाम दे दिया, के उपलक्ष्य में पुलिस से पूर्व अनुमति के बिना आयोजित एक कार्यक्रम में एक विशाल रैली का आयोजन जिसमें पुलिस को वाटर कैनन तक का प्रयोग करना पड़ा, बुलेट प्रूफ का प्रयोग करना पड़ा। इसका संचालन जहॉं से और जैसे हो रहा था उसका पता किसी और को न था और उसका यह भोलापन ही मुझे संत्रस्त कर रहा था । मेरी नासमझी है, पर अन्ना के आन्दोलन की मैं सराहना नहीं कर सका और उनका इस्तेमाल करने वालों ने उन्हें जहॉं पहुँचा दिया वह उसी के काबिल थे। उन्हें किनारे डालने वालों ने विजय के बाद भी राजपथ से सटे, गणतन्त्र दिवस से ठीक पहले जो नाटक इस आशा में किया कि इसे दमन करने के लिए गोली चलेगी, राजपथ को देश हित से विचलन को कोई नया नाम देना होगा उसे तत्‍कालीन गृहमन्‍त्री की सूझ से विफल कर दिया गया और अनशन एक दिन एक रात में ही, खत्‍म हाे गया। भारत को असंतुलित बनाने के जितने संभव तरीके हें, वे सभी उठाए जा रहे हैं। गांधी परिवार का दुर्भाग्य है कि उसने साेच लिया कि वंश हमारा ही चलेगा। परन्तु इस महत्वाकांक्षा के कारण वे स्वयंं असमंजस में हो सकते हैं- भारत में ही कहीं हमको जगह मिल पाएगी क्या् या विदेश जाना होगा जहॉं सुनते हैं बहुत बड़ी कंपनी में इतना अधिक पैसा लगाया गया है कि उसकी शर्त पूरा करने के लिए वहॉं की नागरिकता लेनी पड़ी। मैं ईश्‍वर से प्राथर्ना करता हूँ कि इस चिट्ठठे का एक एक शब्‍द गलत हो और इसे मेरी नासमझी माना जाय।

Post – 2016-02-23

आमुख-विमुख
आज फरवरी की 22वीं तिथि है। जिस समय मैं ये पंक्तियॉं लिख रहा हूँ, उस समय टीवी पर जाट आरक्षण को ले कर हुई हिंसा और आगजनी से पूरा हरयाणा दहक चुका है। जले हुए पार्को, टोल बूथो, मालों, दूकानो, कारो, बसो, मालगाडि़यों के दृश्य चैनलों से दिखाए जा रहे हैं और यह आगजनी एक दाह बन कर मुझे और मुझ जैसे करोड़ों लोगों को शर्म, अपमान और ग्लानि से अभिभूत कर रही है। यह किसका प्रदेश’ है ? जाटों का ? इसे कौन तबाह कर रहा है? स्वयं जाट ? इसका अगुआ कौन है? कोई नहीं ? यह किसी मॉंग को लेकर किया जा रहा आन्दोलन है, या आरक्षण की आड़ में भड़काया गया दंगा? इसे किसने भड़काया है और भड़काता जा रहा है और मुँह दिखाने का साहस तक नहीं कर पाता ? क्या वह भी जाट ही है? अपने घर को ही बर्वाद करने के किस्से जिस विक्षिप्त मानसिकता को प्रकट करते हैं, वह जाटों के बारे में इतनी सच हो सकती है कि हजारों लाखों में कोई होश हवास में न मिले? क्या जाटों की असाधारण समझदारी के जो किस्‍से लोग विनोदवश सुनाया करते थे, उनको सच सिद्ध करने की ठान कर ऐसा किया जा रहा ? जब तक उन असाधारण प्रतिभा के मित्रों की याद बनी हुई है, पूरी जाति को ले कर इस तरह की याद आना भी शर्मनाक है, परन्तु वे मनस्वी, लोग किस कोने में छिप गए हैं जो जाट पहचान से जुड़े अनर्थ पर हस्तक्षेप तक नहीं कर पाते।
सच यह है कि एक जाति के रूप में जाटों की छवि को ही नष्ट करने का खेल खेलने वाला कोई और है जो उस परदे के पीछे लगे परदे में कहीं छिपा होगा। कारण यह अकेले एक कारण से एक राज्य में नहीं हो रहा है, अखिल भारतीय स्तर पर असंख्य झूठे और धूर्ततापूर्ण बहानों से किया गया और किया जा रहा है और जब से उसकी भ्रष्टता, कुनबापरस्ती और ढोंग के कारण भीतर से खोखली हो चुकी कांग्रेस को मतदाताओं ने अस्वीकार करने का मन बना लिया तभी से इसकी तैयारी और प्रयोग चल रहे थे कि यदि सत्ता हमारी मुट्ठी में न रही तो संसद, लोकतन्त्र यहॉं तक कि इस देश को नष्ट कर देगे, परन्तु झुकेंगे नहीं ।

पूरा देश विस्मय में था कि युवराज एकाएक संसद का सत्र छोड़ कर कहॉं गायब हुआ और इतने रहस्यमय ढंग से क्यों गायब हुआ कि लोग अटकलें लगा रहे हैं वह है कहॉं? कब लौटेगा? क्या कर रहा है? राजमहल के बहुमुख बहुत कुरेदने पर ताली बजाते हुए गाते थे, ‘लौटेगा भई लौटेगा’, राजा भैया लौटेगा, राजा बन कर लौटेगा’ केवल, यह नहीं बता रहे थे कि कहॉं है और कब लौटेगा और बाद में पता चला वह किसी रहस्य मय राजनीति की ट्रेनिंग पर गया था और क्या सीख समझ कर आया इसका कभी खुलासा नहीं हुआ। उसका आत्मविश्वास का स्तर अवश्य पहले से बढ़ा मिला और वह बाद की पराजयों से भी कम नहीं हुआ और आज तक बना हुआ है।

क्या वह उसी की ट्रेनिंग का असर है जो इतने व्यापक रूप में दिखाई दे रहा है? संसद नहीं चलने पाएगी, संसद जिस प्रयोजन से बनी है, उसकी जरूरत हमें नहीं, वह हमारी शर्तो पर चल सकती है और विपक्ष के दावेदारी के बाद भी संसद हम चलाऍंगे जनता के प्रतिनिधि नहीं। देश पर हमारा शासन नहीं तो हम इसे नष्ट कर देंगे। हम इस देश के जन्मजात शासक हैं और जो कुछ है हमसे ही है।

मुझे इस समय अपनी ही एक कृति की जिसे मैंने चम्पू (गद्य पद्य मिश्रित) शैली में लिखा था, कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं जो 1997 में लिखी गई थी पर इस चिन्ता में लिखी गई थी कि आगे होने वाला क्या है:-

खूँबहा किसने लिया खून बहाया किसका।
क़त्ल जिसने भी किया कत्ल कराया किसका।।
किससे मिल कर के किया किसके इशारे पर किया ।
किसको क्या सब्ज दिखा किसके सहारे पर किया ।।
फिर भी कहते रहे सब कुछ है हमीं से, हमसे ।
और कहते रहे घटकर है यह आलम हमसे ।।

लिक्खोे भूगोल नया, लिक्खो इतिहास नया।
लिक्खोे इस तरह कि लोगों को विश्वास नया ।।
जो भला है वह भला मेरे खानदान से है।
कुछ बुरा भी है हुआ, देखिए किस शान से है ।।

झूठ पर झूठ के अम्बारर लगा कर रख दो।
जो बदनुमा है उसे दूसरों के सर रख दो ।।
कहीं नहीं हैं कहीं भी नहीं लहू के निशान।
न दस्तो पा में ने टोपी में न अचकन में कहीं ।
न ही उस भूल में जो फूल बनी लिपटी रही ।
सोच में भी नहीं, देखो कहीं जहन में नहीं ।।

उचक उचक के यही तर्ज गुनगुनाते हुए ।
बदल के शब्द वही नीतियॉं चलाते हुए ।।
लगे कि देश यह आजाद है गुलाम भी है।
कि वही राज छुपा गो है सरेआम भी है ।।

बोली बानी में वही, चुश्त जबानी में वही ।
गौर से देखिए तो फिर कई मानी में वही ।। …

ताज किनको मिला और ताजिए किनके निकले।
पाई आजादी पर किस भाव पर और किनके भाव
सिर कलम किनके हुए किसकी शहादत ठहरी
लाभ किसका हुआ किन लोगों के नुकसान के बाद ।
फिर भी समझाया कि यह मेरी इनायत ठहरी ।

जाहिर है जब इसे लिख रहा था तब कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि नेहरू की चेतना में वंशवाद और आत्मराग और सत्ता के लिए देश और समाज का किसी तरह का सत्यानाश स्‍वीकार्य था। इसके खुलासे के लिए चौथी पीढ़ी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी जब कांग्रेस के अपने ही एक पत्र ने उसका इतिहास और अन्त:-सत्य उगल दिया। गनीमत है कि जिस समय मैं अपना यह आमुख लिखते हुए विमुख लोगों को भी संबोधित कर रहा हूँ मेरा मित्र यहॉं नहीं है, वर्ना पूछता, तुम स्वयं बुद्धिजीवियों को राजनीति से दूर रहने को और अपना काम करने को कहते हो और खुद भी राजनीति में घुस गए और जैसी कि मेरी आदत है मुझे कहना पड़ता, ‘तुम मूर्ख हो इसलिए राजनीति की समझ, उसके बौद्धिक विमर्श और नारेबाजी, मजमेबाजी और हथियाने वाली सक्रिय राजनीति में फर्क ही नहीं कर पाते तो दोष किसका है?

इतना भारी नुकसान हुआ है कि लोग बयान दे रहे हैं कि रोहतक नगर बनने से पहले यह जो कुछ था उसमें पहुँच गया है। सुनते हैं आइंस्टाहइन ने कभी कहा था कि यदि तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो उसके बाद के युद्ध पत्थर के हथियारों से होंगे। उसकी याद आ रही है। परन्तु आइंस्टाइन को भी पता नहीं था कि तीसरा विश्व युद्ध हथियारों से नहीं अफवाहों और सूचनातन्त्र के विनाश के माध्याम से लड़ा जाएगा जिसमें सूचना के स्रोत भी अफवाहों के प्रसार में सहायक की भूमिका ऐसे तेवर से देंगे कि लगे झूठ ही सच है और सच ही झूठ। फिर उसी पुस्त क की याद-

सच की महिमा बहुत है सच बिन मोल बिकाय।
लागे लंगी झूठ की मुँह के बल भहराय ।।
सच के बल हरिचन्द से सेवा डोम कराय।
उूपर से सुत का मरन, घरनी रही बिकाय ।।
अनृतमेव जयते रे बन्दे अनृत अमृत की खान।
अनृतानृत के जोर से यह चल रहा जहान ।। २३/०२/१६
अपू्र्ण

Post – 2016-02-20

मित्रो मैं आज तुलसीदास की लेखक के दायित्व पर सबसे सरगर्भित टिप्पणी की और आप का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा :
भाषा भणिति भूति भल सोई सुरसरि सम सबकर हित होई. इसमें सबकर हित की साधना ही लेखक को सबका सेवक बना देती है. पाठक मित्रों ने आदेश दिया, ड्यूटी पर हाज़िर रहना है. प्रूफ वूफ का बहाना नहीं चलेगा. सो हुक्म तो बजाना ही पड़ेगा.
परन्तु यह याद दिलाते हुए कि हाल के दिनों में आई सार्विक गिरावट के कारण सुरसरि भी कलुषित हुई और भाषा और भणिति भी. अपनी अक्लमंदी में लेखक यह तक भूल गया कि जब वह सब कर हित को समर्पित होता है तो तानाशाह भी उससे डरते हैं, अपने रस्ते से सबसे पहले हटाते भी उसी को हैं पर हटा नही पाते क्योंकि वह जन-मन तक पहुँच चुका होता है. भाषा और भणिति की पवित्रता और लेखक और विचारक का गौरव और साहित्य की गरिमा तभी तक बनी रहती है. जब लेखक, कलाकार,विचारक ताज और सिंहासन से जुड़ना चाहता है तो उसे सत्ता में बैठे लोगों के चरण चूमने पड़ते हैं और उनकी अपनी कलाबाज़ी के कारण वे कलाबत्तू लगे मसखरों में तब्दील हो जाते है और भाषा और भणिति की सुरसरि विशालकाय नाले में बदल जाती है. हमारे हंगामेबाज लेखको, अध्यापकों, पत्रकारों को आत्ममंथन करना चाहिए और सत्ता की चरणधूलि बनकर इतराने की जगह जन गण को समर्पित होकर कम से कम भाषा और भणिति की सुरसरि की पवित्रता पर ध्यान देना चाहिए.

इसके साथ ही एक चिंतित करने वाली संभावना. क्या आप कोल्ड वॉर या शीतयुद्ध का अर्थ जानते हैं.आपमें से बहुत से लोग जानते होंगे, पर मैं नहीं जानता था. आज समझ में आया कि इसका अर्थ है अफवाह और दुष्प्रचार से शत्रु देश को उसके ही भीतर विक्षोभ और अराजकता पैदा कर के उसे अंतर्ध्वस्त कर देना. इस युद्ध में अपने खुफिया तंत्रों के माध्यम से अमेरिका और रूस दोनों तृतीय विश्व युद्ध लड़ते रहे और दुनिया के दूसरे देशों में अपनी पैठ के अनुसार अपनी जंग लड़ते रहे और हमारे लोग भी उसमें शामिल हुए. अमेरिका ने सोवियत संघ को ध्वस्त कर दिया. भारत में कम्युनिस्ट विचार दर्शन ने उसे टक्कर दी पर आज के दिन सारे मार्क्सवादी अमेरिका की गोद में चले गए हैं और तेवर सेकुलरिज्म, साम्यवाद का रखे हुए हैं. प्रसंगवश यह याद दिलादें कि हमारे यहां शीतयुद्ध के लिए ‘छाया युद्ध’ का प्रयोग किया जाता था.
खैर शीतयुद्ध तत्वतः द्रव्य युद्ध था. जो अधिकतम पैठ बना सकता था वह विजेता. यह बोध मुझे अपनी प्रकाश्य पुस्तक इतिहास का वर्तमान का प्रूफ पढ़ते हुए हुआ. उसमें एक उद्धरण है जिसे आपने पढ़ा होगा पर जब जिसने लिखा या उद्धृत किया उसे ही याद नही तो आप को क्यों होगा:
Give me a hundred million dollars and a thousand dedicated people, and I will guarantee to generate such a wave of democratic unrest among the masses–yes, even among the soldiers–of Stalin’s own empire, that all his problems for a long period of time to come will be internal. I can find the people. — Sidney Hook, 1949
अमेरिका पैसे की दौड़ मेँ आगे होना ही था, वह लूट का माल बांटता था, सोवियत संघ अपने लोगों का पेट काट कर दुनिया को समझाना चाहता था कि पूंजीवाद हथियार के बल पर पलने वाली व्यवस्था है और जब तक यह है, मनुष्य शांति से नहीं रह सकता. इसे इंसान को बेहतर इंसान बनाने की जगह उसे अति-सूचना -सम्पन्न शैतान बनाने या किसी ऐसे ही अनुभव से हमारी चेतना में यह भरा गया था कि भौतिक शक्तियों पर विजय पाने वाला राक्षस मनुष्यता के लिए कितना बड़ा खतरा है. अमेरिका के पास एक ही उद्योग है, आयुध परिष्कार और आयुध उत्पादन, यह उसकी ज़रूरत है कि वह शांति की बातें करे और युद्ध भड़काए. सोविएत संघ टूट गया, पर वह अकेला है जो मानवता की रक्षा कर सकता है. अमेरिका आतंकवाद की निंदा करेगा और उसे बढ़ाने के लिए पाकिस्तान को इमदाद भी देगा कि पाकिस्तान से आगे जाने के लिये भारत उसका हथियार खरीदे. मैं मोदी की इस सूझ के लिए दाद तो देना चाहता हूँ कि वह अमेरिका से अच्छे सम्बन्ध भी चाहते हैं, आत्मनिर्भर होने तक सामरिक तैयारी भी करना चाहते हैं पर अमेरिकी जाल में नहीं आना चाहते. विश्वास नहीं होता कि इतनी कूटनीतिक चतुरता इस चाय बेचने वाले के पास हो सकती है! परन्तु तभी ध्यान आता है यह समझ किताबी आदमी में नहीं हो सकती है जो आकाशवेलिवत फैलता हो और अपने ही समाज को निःसत्व करने के बाद स्‍वयं सूखता हो ।.
पर ध्‍यान दें उस उद्धरण पर, क्या अनायास हो जा रहे है एक संस्था से दूसरी तक पलीते की तरह विष्फोट. इसकी जांच होनी चाहिए. इस तंत्र को उजागर करना जरूरी है ऐसे आयोजनों पर सक्रियता एक राष्ट्रीय चिंता का विषय है.पैसे की गणिति को समझना हुंकार भरने से अधिक जरूरी है. कहॉं से आ रहा है वह पैसा, कैसे वितरित हो रहा है और किनके मन क्यों तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका जिसका देास्त होगा उसे बर्वाद करके अपना हित साधेगा- हुआ वह दोस्त जिसका उसका दुश्मन आसमॉं क्यों हो। अमेरिका नही, सोवियत संघ अपनी क्षीणशक्ति के बावजूद हमारा मित्र है परन्तु भारतीय मार्क्सवादी आरंभ से ही स्‍वार्थी रहे हैं और वे नाम के मार्क्सिस्‍ट थे और काम के मामले में पूंजीवादी हितों के अनुकूल रहे हैं । जांँचिये आज के दिन सभी नंगे मिलेंगे और देशद्रोह की सीमा तक जा कर अपने को सर्वोपरि बताने को उद्वेलित भी।

Post – 2016-02-19

मैं इन दिनों अक्‍तूबर 2015 से 31 दिसम्‍बर 2015 तक के फेस बुक पर पेश किए गए विचारों के पुस्‍तकाकार प्रकाशन इतिहास का वर्तमान का प्रूफ देख रहा हूँ। एक दो दिन व्‍यवधान का सामना करना पड सकता है।
पु्स्‍तक का प्रकाशन किताब घर प्रकाशन कर रहे हैं और हमारी समझ से वह इसे मार्च अन्‍त तक पाठकों के लिए सुलभ बना देंगे। अब तो आए दिन मुझे आराम है।

Post – 2016-02-18

अधोगति का दर्शन
‘अब आज तो हमें राष्ट्राभाषा की समस्या को समझना ही पड़ेगा।‘ बैठते ही उसने दागा, ‘रोज कन्नी काट जाते हो।‘
‘राष्ट्रभाषा कोई समस्या है ही नहीं! वह तो लोकस्वीकृत है. राष्ट्रभाषा संविधान से नहीं बनती, न कोई राष्ट्रपिता बनता है, न देशरत्न, न देशबंधु, न लोकमान्य, न गुरुदेव, न महामना…’

’न भगवान, जोड़ दो यार, क्या लगता है, जिस रौ में हो उसमें चल जाएगा।‘

’मैं जानता हूँ तुम इतने गिर चुके हो कि तुम्हें इस बात तक का पता नहीं तुम किसका और कितना अपमान कर रहे हो, और क्यों ! हद यह कि तुम विटी माने जाने के चक्कर में यह तक नहीं जानते कि इनके कारण ही लोग तुम्हें गैरजिम्मेदार या मूर्ख समझ सकते हैं और उसके बाद तुम दिखाई दोगे पर कोई देखेगा नही, रहोगे पर शिफर बन कर। जिसे मिटाना चाहते हो वह तुम्हारी भर्त्सना के कारण ही आसमान में उठता जाएगा, और तुम रसातल में पहुँचने की अर्जी दोगे तो जवाब मिलेगा, जगह खाली नहीं है! त्रिशंकु बन कर टँगे रहो! जगह होगी तो भर्ती कर लेंगे। आज तुम्हारी पार्टी का यही हाल है न और फिर भी नहीं चेत रहे। रामचन्द्रिका की वह पंक्ति तुम्हें याद है, ‘चेतना ही न रही चढि़ चित्त सो चाहत मूढ़ चिताहू चढ्यो रे।‘
’यार, मैंने तो विनोदवश बातों में रस लाने के लिए तुम्हें छेड़ा था और तुम इतने नाराज हो गए कि जिसे पुराने मुहावरे में सात पुश्तोंं की खबर लेना कहते थे, उस पर उतर आए।‘

’तुमने फ्रायड की साइकोलोजी आफ एरर्स पढ़ी है?’

’नहीं पढ़ी है तो अब पढ़ लूँगा। तू इतना गुस्सा क्यों हो गया, यह तो समझूँ ।‘

’गुस्सा नहीं हुआ था। तुझे नंगा देख लिया था और घबरा गया था। जानते हो फ्रायड का हमारे विश्वुबोध में सबसे बड़ा योगदान क्या है?
‘तुम नहीं जान पाओगे, मैं बताता हूँ। उसका योगदान है यह तत्वदर्शन कि जिसे हम चूक, विनोद, दिवास्वन और स्वप्न आदि कहते हैं, इनमें से कोई अकारण या निराधार नहीं हैं। सचेत रहने पर हम अपनी कमजोरियों और विकृतियों पर परदा डाल लेते हैं, आवेग की प्रखरता में हम, उस परदे को उतार फेंकते हैं और हमारी सचाई हमारे न चाहते हुए भी सामने आ जाती है। तुम विनोद नहीं कर रहे थे। हमारे राष्ट्रवादी नेताओं के नाम से ही तुम्हें व्यतग्रता अनुभव होने लगी थी और फिर वह वाक्य‍ तुम्हारी समझ से विनोद के लिए निकला था पर निकला किसी अन्य कारण से था। यह थी आत्मघृणा जो एक उच्च जीवनमूल्य के रूप में तुम्हा्रे अन्त र्मन में एक विकृत पाठ के द्वारा उतार दी गई है। और माफ करना, यह पाठ ही मुझे मेरे सामने नंगा कर गया। मेरी समझ इतनी कम क्यों है कि मैं उस व्यक्ति तक को पूरी तरह नहीं जानता जो झगड़ता तो रोज है पर संबन्धं चुंबक के विरोधी ध्रुवों जैसा ही प्रगाढ़ है ! आज पता चला कि तुम सम्मोहन में मिले आदेशों का पालन कर रहे हो।‘
पता नहीं क्या हुआ, मेरे भीतर एकाएक ऐसा गहरा सन्ताप भर आया कि लगा मैं अपना सन्तुलन खो बैठूँगा। कुछ कहा तो वह भी अनर्थकारी ही होगा। एक दहशत सी भर गई, एक अतीन्द्रिय कुहाच्छन्नता जिसमें ऑंखों के आगे अँधेरा छा गया। अपने को सँभालने की कोशिश की तो ऑंखें गीली हो गईं। अपने दैन्य को छिपाने के लिए मैं उठ खड़ा हुआ।
मेरी स्थिति उससे छिपी न रही, ‘क्या हुआ, एकाएक तुम्हें हो क्या गया। वह भी उठ खड़ा हुआ। मैंने कुछ कहा नहीं, हाथ से बरज दिया, अभी नहीं, अभी कुछ मत पूछो’ और अपने में खोया हुआ ट्रैक पर चहल कदमी करने लगा। वह भी मेरे साथ चलता रहा, चुपचाप, सहमा हुआ सा। पन्द्रतह बीस मिनट के बाद ही थकान सी लगने लगी। किनारे पड़े एक बेंच पर बैठा तो वह वह भी साथ बैठ गया। इस बीच अपने को सँभाल लिया था, इसका आभास उसे भी हुआ होगा। सहमे हुए स्वर में ही बोला, ‘तुम्हें एकाएक हो क्या गया था?’
‘मैं खुद नहीं जानता क्या हो हो गया था। एक विजली की कौंध के साथ जैसे बादलों का दरकना और अन्तमर्दाह से चीत्का‍र करना। एक पर एक कौंध। एक क्रम जो इससे पहले कभी न सोचा था न देखा था। घबरा गया था।‘
‘समझ में नहीं आया क्या् कह रहे हो।‘
‘जानते हो हमारा अवचेतना उस समय भी किसी रहस्यरमय तरीके से काम करता और हमारे चेतन के लिए अग्राह्य सूचनाओं को घोल फेंट कर अपने तरीके से समाधान निकालता रहता है जब हम चेतन स्तर पर किसी दूसरी समस्या से टकरा रहे होते हैं । मैं जब तुम्हें झिड़क रहा था उसी समय मुझे जेएनयू का वह फुटेज सामने आ गया जिसमें अफजल गुरु के जिन्दांबाद और भारत को तोड़ने के नारे लग रहे थे। एक क्षण के लिए यह आशंका उभरी, अपने ही देश के इतने सारे लोग ऐसा कैसे कर सकते है? तभी वे नारे सुनाई पड़ने लगे जिनमें ब्राह्मणवाद को कोसा जा रहा था। सजा कांग्रेस के शासनकाल में हुई थी, फॉंसी उसी दौर में दी गई थी, भले दस पन्द्रह साल लटकाने के बाद, फिर इसमें ब्राह्मणवाद कहॉं से आ गया? फिर याद आया कि फॉंसी भले जज ने दी थी और सारी अपीलें खारिज हो गई थी, फिर भी कांग्रेस उसे बचाना चाहती थी और यह भाजपा थी जो लगातार देशद्रोही को सजा देने की मॉंग कर रही थी। भाजपा को ब्राह्मणवाद बता कर इसी न्याय से उसकी फांसी से जोड़ कर कोसा जा रहा था। घबराहट हुई यह सोच कर कि कांग्रेस उसे इसलिए बचाना चाहती थी कि जिस संसद पर हमला हुआ था, उसका सत्र चल रहा था और कांग्रेस में प्रभावशाली स्तर पर इस बात की पीड़ा थी वह हमला बेकार क्यों हो गया। सफल हुआ होता तो भाजपा के सारे नेताओं का जिन्होंने कांग्रेस से सत्ता छीनी थी, सफाया हो गया होता और उसके दिन लौट आये होते। की सत्ता के लिए कांग्रेस आतंकवादी हमले तक से सहानुभूति रख सकती है. और इस कारण ही अफजल गुरु से उसकी सहानुभूति थी और इसके कारण कोई न कोई बहाना बना कर इसे बार बार टाल दिया जाता था। तभी याद आया हैडली के अमेरिकी खुफिया एजेंसी के सामने यह स्वीकार करने की घटना जिसमें उसने इशरत जहॉं को आत्माघाती हमलावर होने की बात स्वीकार की थी और यह जानकारी मिलने के बाद भी उसे निर्दोष बता कर उन अफसरों को अपराधी सिद्ध करने का प्रयत्न किया जा रहा था और इसमें कोई प्रयत्न बाकी नहीं रखा गया कि उन्हें दंडित किया जाय। इसके साथ ही राहुल का अफजल के समर्थन में और पुलिस कार्रवाई की आलोचना करने पहुँच जाना, तुम्हारे नेता येचुरी की पैंतरेबाजी, दिल्लीे में क्या नाम है जामिया के पास का वह मकान, याद आया बाटला हाउस, जिसमें दिल्लीै में आतंकवादी कार्रवाई करने के अपराधी छिपे थे और जिस इनकाउंटर में पुलिस का अफसर, शर्मा मारा गया था, उसमें शर्मा को ही अपराधी बनाने की साजिश और इसके साथ ही बेशर्मी से कांग्रेस के दौर में हुई लूट जो पूरी तरह रुक गई है, फिर भी इतने कम समय में इतनी बाधाओं के बावजूद इतने नये आयोजनों के बाद किसी को अच्छे दिन दिखाई नहीं दे रहे है और तकनीकी दलीलें दे कर प्रेस से लेकर भीडिया तक संचार के सभी साधनों द्वारा केवल छिद्रान्वेकषण और पुराने दिनों की वापसी का इन्तजार । ये सारी घटनाऍं एक पर एक उस तड़तड़ाहट की तरह जो बिजली गिरने के साथ कुछ पलो के लिए जारी रहती है इस तरह चेतना पर छा गईं की उसे सम्भालना मुश्किल हो गया. लगा मैं भीतर से फट जाऊँगा । उस समय तो मैं स्वयं इनको समझ नहीं पा रहा था कि उसमें कितनी घटनाओं की कौंध एक साथ पुंजीभूत हो गयी थी । ’कांग्रेस का हाथ आतंकवादियों से किस तर्क से मिला हुआ है समझ में नहीं आता। यह तो उनका ही गृहमन्त्रीे था जिससे उसी पार्टी के बड़े घराने का बदजबान मुखौटा कहा जाता है, आतंकवादियों के पक्ष में खड़ा हो कर जंग लड़ रहा था।
’और देखो, उसी समय एक नंगा यथार्थ सामने आया कि अपने सैंतालीस साल के इतिहास में यह इतना ओवररेटेड विश्व विद्यालय किसी भी क्षेत्र में एक भी असाधारण विद्वान पैदा नहीं कर सका। इसकी पैदावारों में वे आत्मघाती नेता जिन्होंने अपने कैरियर के लिए पार्टी का सत्यानाश कर दिया। यह मेरे सोच में पहले से था पर उस क्षण कौंध गया कि करात और येचुरी दोनों जेएनयू की ही उपज हैं। देश को नेतृत्व देने के लिए ज्योति दा के नाम पर सभी दल एकमत थे, इन्होंने ही उसमें बाधा डाली थी। इनके नेतृत्व में ही सीपीएम हाशिए पर आना शुरू हुई और इतनी बेजान हो चुकी है कि अपनी भ्रष्टता के कीर्तिमान स्थापित करने वाली कांग्रेस के साथ गठजोड़ की स्थिति में आ गई है और येचुरी ने जो अभी बयानबाजी की उसको ध्या‍न में रख कर ही कह रहा था ‘चेतना ही न रही चढि़ चित्त सो चाहत मूढ़ चिताहू चढ़्यो रे।‘ पार्टी की अंत्येष्टि का काम जेएनयू का उत्पाद ही करेगा।
‘शायद चिता शब्द और उसका दृश्य ही था जिसने चेतना को इस तरह झकझोरा कि यह सब एक झटके से सामने आ गया।
‘यह बताओ, तुम्हें पता था का इस तरह के आयोजन तीन साल से चल रहा था और कांग्रेस प्रशासन इस पर चुप्पीे साध कर इसे चलने दे रहा था और सेक्युलरिज्म के नाम पर इसी तरह की देशद्रोही गतिविधियॉं भाजपा शासित राज्यों को छोड़ कर सभी राज्यों में चलने दी जा रही हैं कि कही इससे मुस्लिम वोट बैंक खिसक न जाय। ये घटनाएँ पहले दबा दी जाती थीं. पहली बार भाजपा के शासन सँभालने के बाद से सुर्खियों में आती जा रही है।‘
‘‘मैं तो कहूँगा भाजपा स्वंयं इन सबको उछाल रही है हिन्दू वोट बैंक तैयार करने के लिए।‘
‘उठो, फूलहि फलहिं न बेत जदपि सुधा बरसहिं जलद… आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं है।‘

Post – 2016-02-16

हमको मिलैगो कित्‍ता

”अरे भाई उधर कहां जा रहे हो ?”
उसने मुझे देखा था और देख कर भी मेरी उपेक्षा करते हुए आगे निकलाता जा रहा था। मैंने रोका।

वह बोला, ”तुम्हारे पास बैठने का कोई फायदा है ? बकवास करोगे और सुनना पड़ेगा।”

”तुमको कुछ नहीं सुनना है। आओ, बैठो, चुप रहूँगा, बातचीत बन्द हो जाय पर ऑक्सीजन तो साथ ले सकते हैं।”
”ऑक्सीजन लेने के लिए तुम्हारे साथ बैठना जरूरी है? तुम्हारे पास आकर तुम्हारी बकवास की ऑंच से ऑक्सीजन भी कार्वन में बदल जाती है। उसने तंज तो किया पर आकर पास बैठ गया।

बात उसी ने शुरू की, ‘’तुम जो ज्ञान बघारते हो उसमें मेरी कोई दिलचस्पी् नहीं हैं। किताबें मैंने भी पढ़ी हैं, तुमसे अधिक पढ़ी हैं, तुमसे बहुत बड़े बड़े लोगों के विचारों से पाला पड़ा है। उनके सामने तुम कुछ नहीं हो, बोलना शुरू करते हो तो सोचना पड़ता है, बैठे रहें या भाग खड़े हों। फिर भी तुमने कहा कि हिन्दी तब राष्ट्रभाषा न बन सकी परन्तु निकट भविष्य में बन सकती है तो पहले तो लगा हिन्दी शाविनिस्ट बोल रहा है, परन्तु जब तुमने तमिल के महत्व को और अपनी बोलियों के साथ उसके संबन्ध को रेखांकित किया तो लगा तुम्हारे पास सचमुच कोई नयी समझ और सोच है । उसे सुनने के लिए मैं तुम्हें लगातार कुरेद रहा हूँ और तुम कांग्रेस और गॉंधी, उन्नीसवीं शताब्दी और बीसवीं शताब्दी में पेंगें भर रहे हो। हद होती है सहनशक्ति की भी।”

” देखो मैं बात तो वही कर रहा था। उस जिजीविषा की, उस स्वधा या एलान वाइटल की जिससे कोई समाज आगे बढ़ता है, प्रक़ति विकास की अगली उूँचाइयॉं छूती है, प्राणी अपने दैन्य से उूपर उठता है, नयी उूँचाइयॉं ही नहीं छूता, उन उूॅचाइयों से उूपर की संभावनाओं को लक्ष्य करके नई मंजिलें तय करता है, और उसके ह्रास की जिसमें उूँचाइयों पर पहुँचे हुए समाज और देश और सभ्यताऍं ढलान को अपना आसान रास्ता मान कर अनायास लुढ़कती चली जाती है, और जिनका समाज पहले चरण से आगे परन्तु कुछ नीचे सरकता हुआ उस अधोगति को प्राप्त होता है जिसमें उसका अपना ही अतीत-गौरव हास्यास्पद लगता है, भुखमरी के कगार पर पहुँचे पर अपने नवाबी इतिहास का दावा करते हुए अपने धेले की पेंसन के लिए हजारों की तैयारी करने वाले लखनवी ताँगावालों की तरह। तॉंगे का ज़माना भी खत्म हो गया, अब पता नहीं क्या कर रहे होंगे वे, संभव है भिखारी हो चुके हों।

‘आलसी समाज गुरुत्वातकर्षण के अनुरूप ढलान का रास्ता चुनता है और ओजस्‍वी समाज गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर उठता है, जोखिम उठाता है, कुर्बानियां देता है, मिटने के लिए तैयार होकर अपने जिंदा होने को प्रमाणित करता और गरिमा के साथ जिन्दा रहने की कोशिश करता है। जड़ पदार्थ गुरुत्वाकर्षण के नियम का उल्लंघन नहीं कर पाता, वह हमेशा नीचे गिरता है, जीवन- मामूली अंकुर तक, गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध खड़ा होता है, ऊर्जा गुरुत्वा कर्षण का तिरस्कार करती है, उसका ह्रास या मुमूर्षा अपनी निर्जीविता या निष्क्रियता के कारण गुरुत्वा कार्षण के समक्ष समर्पण कर देता है। जिजीविषा में त्याागने का आवेश होता है, मिट कर भी अपने स्‍वत्‍व को बचाने का विवेक होता है। मुमूर्षा में जो भी मिले, उसके बल पर पाने की बेचैनी होती है।

‘मैं उन्नी सवीं शताब्दी और बीसवीं शताब्दी‍ के बीच झूले नहीं झूल रहा था, यह समझाने का प्रयत्न कर रहा था कि कहने को हम बीसवीं शताब्दी में उस लक्ष्य को पाने की ओर बढ़ रहे थे जो 1857 में नहीं पाया जा सका, परन्तु वास्तव में हम पाने की आकुलता में अपनी स्वधा को खोते जा रहे थे और इस गिरावट के बीच गॉंधी सुख, भोग, लाभ आदि के गुरुत्वा्कर्षणों के विरुद्ध अकेला खड़ा था और गुरुत्वाकर्षित पर्यावरण के दबाव में इतनी निजी उूर्जा के बाद भी पिस कर रह गया।

”” हिन्दी पर आओगे या उठूँ।”

” मैं तो चाहूँगा तुम बैठो और यह देखो कि हिन्दी कहने से कई तरह के संशय पैदा होते हैं, इसलिए आज हमें अपनी किसी भाषा की बात करनी चाहिए। हिन्दी बिना सरकारी प्रयास के अखिल भारतीय संपर्क की भाषा थी और अहिंदी भाषी क्षेत्रों में इसके लिए गहन अनुराग था, और इस कारण ही प्रकृत न्याय से सभी ने इसे भारत की संपर्क भाषा के रूप में उन्नीसवीं शताब्दी तक स्वीकार किया था। बीसवीं शताब्दी के कांग्रेस में जो प़व़ृत्तियॉं आरंभ में दबी रह गईं वे उस खास बिन्दु से जब लगा कि स्वानधीनता संभव है, इस जोड़तोड़ में लग गई कि हमें इससे क्यां मिलेगा। तुमको जगन्नाथ दास रत्नाकर की … यार किताबों का नाम तक भूलने लगा है अब तो। खैर किताब का नाम जो भी हो, उद्धव गोपियों को समझाने के लिए कृष्ण की पाती ले कर पहुँचते हैं तो वे उन्हें घेर लेती हैं, पूछने लगती है, ‘हमको लिखो है कहा हमको लिखो है कहा, हमको लिखो है कहा कहन सबै लगीं। और उनकी एक और पंक्ति भी याद आ रही है, ‘नेकु कही नैनन, अनेक कही बैनन सों, रही सही सोउू कहि दीनी हिचकीनि सों।

”गिरावट बहुमुखी थी, भाषा के सवाल को तो गॉंधी को छोड़ कर बहुत कम लोगों ने दूसरे कारणों से हिन्दीन को भारत की स्वाीभाविक संपर्क भाषा माना था जब कि उन्नीसवीं शताब्दीी में कोई दुविधा थी ही नहीं, जिन्होंने माना था उन्होंने गाँधी के निजी प्रभाव के कारण था। इसकी ओर तो पहले ध्यान दिया ही नहीं गया था परन्तु गॉधी के निजी प्रयास से बहुत कुछ संभव लगने लगा था, परन्तु 1930 के बाद जब यह लगने लगा कि ब्रितानी सत्ता इस देश में कुछ दिनों की मेहमान है, पहले के आन्दोलनकारी ”हमको मिलैगो कित्ता, हमको मिलैगो कित्ता , हमको मिलैगा कित्ता सोचन सभी लगे” और इसकी अभिव्यक्ति उन सभी व्याजों से होने लगी जिनका रत्नाकर जी ने गोपियों के सन्दर्भ में हवाला दिया है।

”मैं चाहता था तुम इतिहास की उस गति को समझो जिसमें जो हुआ उससे अलग कुछ हो ही नहीं सकता था फिर भी जो हुआ वह न तब सबको सही लग रहा था न इतिहास ने उसे सही साबित किया। इसी प्रवृत्ति के कारण उन्नीसवी शताब्दी में जबकि हिन्दी के विषय में सर्वानुमति सी बनी हुई थी, उसे बीसवीं शताब्दीज में कूड़दान में डाल दिया गया। गॉंधी ने उसे उस कूड़दान से बाहर निकाला, परन्तु न तो वह भाषाविज्ञानी थे, न उनके प्रस्तावों को हिन्दी समाज ने स्वीकार किया न ही दूसरे अंचलों के लोगों ने। फिर भी उनके आभामंडल के कारण प्रयत्न जारी रहा और अपनी कमियों के कारण सफल न हो पाया। कारण वही, हमको मिलैगो कित्ता’ का। हम इसके व्यौरे में न जाऍं तो ही अच्छा । इस व्यौलरे में भी न जाऍं कि जो लोग पहले अपने कारोबारी लाभ के लिए अंग्रेजों की सेवा में लगे थे, उन्हें जब लगा कि भारत को स्वतन्‍त्र होने से रोका नहीं जा सकता तो उन्होंने कांग्रेसी चोला पहनना आरंभ कर दिया।

उदाहरण के लिए 1935 में मारवाड़ी परिषद ने अपने अधिवेशन में यह प्रस्ताव पास किया कि अब भारत को स्वतन्त्र होंने से कोई रोक नहीं सकता इसलिए मारवाडि़यों को स्वतन्‍त्र्ाता संग्राम में भाग लेना चाहिए और इसके बाद कलकत्ता के अनेक तरुण मारवाड़ी स्वतन्त्रीता संग्राम में ‘कूद पड़े।‘

तुम जानते हो मेरा इन बातों का ज्ञान बहुत कम है, तुम दूसरों की अन्‍तर्कथा से स्वयं जान सकते हो और मुझे बता सकते हो। पन्द्रह अगस्त 1947 को मैं सोलह साल का था। तरुणाई का वह संवेदनशील चरण और उके ठीक बाद जो लूट मची, कालाबाजारी और रिश्वतखोरी का जो दौर सामने आया उसने इस तरह आहत किया कि उसके दाग मेरी चेतना में आज भी देख सकते हो। ऐसी स्थिति में जो केन्द्रीय सेवाओं में उच्च पदों पर विराजमान थे और जो मुख्यत: मद्रास और बंगाल से थे, क्योंकि अंग्रेजी शिक्षा के दो ही अग्रणी क्षेत्र थे, बंगाल और मद्रास और इसका उन्हें इतना लाभ मिला था कि वे ब्रितानी उपनिवेश के भीतर अपना एक उपनिवेश कायम कर चुके थे और शेष भारतीयों के प्रति उसी हेकड़ी से व्य वहार करते थे, जैसे अंग्रेज उनके समेत पूरे भारत से। रियासतों के स्वाार्थ अंग्रेजी राज से जुड़े थे, ज़मीदारों के स्वार्थ उसी से जुड़े थे, अमलों के स्वार्थ उससे ही जुड़े थे इसलिए स्वतन्त्र भारत में स्वहित के अनेक रूप थे जो खुल कर नहीं तो अन्दर खाने उसी सें जुड़े थे और इसी बीच हिन्दी समाज को लगा कि उसे आगे बढ़ने का मनचाहा मौका मिल गया। वे आज भी जश्न मनाने वाले अधिवेशन की अगुआई करते हैं और यह नहीं जानते कि इन आयोजनों का हिन्दीतर भाषाक्षेत्रों में कितना बिघातक प्रभाव पड़ता है।

ऐसी स्थिति में हिन्दीै का विरोध होना, और इसके राष्ट्र भाषा होते हुए भी राजभाषा बना दिया जाना एक सोचा समझा धोखा था जिसके परिणाम विघातक होने को ही थे, परन्तुु आज परिस्थितियाँ भिन्न हैं। सुनने का धैर्य हो तो बताउूँ।”

उसने कोई जवाब न दिया, उठ खड़ा हुआ।

Post – 2016-02-15

बैताल फिर उसी डाल पर

गॉंधी मेरी नजर में बीसवीं शताब्दी के अकेले ऐसे नेता थे जिनको सत्ता की भूख नहीं, एक नया भारत बनाने की उत्कट कामना थी जो आधुनिक भी हो, स्वावलंबी भी हो और अपनी जमीन पर दृढ़ता से खड़ा भी हो।
अकेले नेता नहीं, दूसरे । ये सपने सबसे पहले स्वामी दयानन्द‍ ने देखे थे। वह क्षेत्र जिसमें गॉंधी का प्रभाव सबसे गहन था और वे मसले जिनको गॉंधी ने अपने सरोकारों से जोड़ा, और वह जमीन जिसमें गॉंधी अपनी फसल उगा सके दयानन्द सरस्वसती ने तैयार की थी। उनके सामने भी पूरे समाज का विकास था, आधुनिकता और परंपरा की गहरी समझ, सामाजिक भेदभाव का निवारण, स्त्री शिक्षा का उपक्रम, कुरीतियों, जैसे बाल विवाह, का निषेध और सामाजिक वर्जनाओं, जैसे विधवा विवाह, का विरोध और उच्च जीवनादर्शों का पालन आदि के बहुमुखी और समावेशी कार्यक्रम थे और इनसे जुड़ी थी स्वतन्त्रता की कामना।

तुम इस बात से प्रसन्न होते हो कि मैं दयानन्द को गॉंधी से बड़ा और उनसे प्रगतिशील मानूँ तो मान लूँगा। स्वामी जी कई मामलों में गॉंधी से आगे थे, उदाहरण के लिए वह विधवा विवाह की बात कर सकते थे, गॉंधी सनातनी थे और वर्णविभाजन तक को मानते थे। कुछ दूसरे मामलों में गॉंधी अधिक समावेशी थे, जैसे वह अकेले सभी मतों के लोगों को साथ ले कर चलने की बात करते हैं जब कि दयानन्द जी हिन्दू समाज को भी ले कर नहीं चल सकते थे। उनके कुछ सूत्र कबीर से जुड़ सकते हैं। सबकी आलोचना करते हुए, उनके ढोंग और पाखंड का उपहास करते हुए एक नई राह पर चलने का आवाहन और वह नई राह स्वयं बनाने का प्रयत्न और अकेले दम पर एक आंदालन और संगठन खड़ा क सकते है । गॉंधी से कम चुंबकीय व्यक्तित्व नहीं था उनका। परन्तु तुम मेरी बात पूरी सुना तो करो। मैंने बीसवीं शताब्दी का अकेला नता कहा था, अकेला नेता नहीं। उन्नीसवीं शताब्दी के अधिकांश नेताओं में ओजस्विता और तेजस्विता थी। बीसवीं शताब्दी में सबका परिपाक अकेले गॉंधी में मिलेगा। तुमने कबीर की ठीक ही याद दिलाई, द्विवेदी जी कबीर के व्‍यक्तित्‍व का वर्णन करते हुए उन्हें अनके विरोधों की संधिभूमि पर खड़ा दिखाते हैं।

आज भी जय गांधी जय जय जय गांधी ही चलेगा। तुम उूबते भी नहीं हो।

मैं यह भी याद दिलाना चाह रहा था कि जिस नये मानव का और ऐसे मानवों से उूर्जस्वित भारत का सपना वह देख रहे थे, उसके नागरिक शिक्षित होंगे, स्वस्थ होंगे, एक दूसरे से प्रेम करने वाले होंगे और स्वतन्त्र होंगे। उनकी रूढ़वादिता में भी प्रगतिशील तत्व हैं और एक सोच भी है कि एक व्यवस्था को जो हजारों साल से चली आई हो तुम एक झटके में तोड़ तो सकते हो, सर्वव्यापी वैकल्पिक व्‍यवस्‍था बना नहीं सकते । इसलिए वह इसके साथ हड़बड़ी में कोई बदलाव न करके पहले उसके सबसे विकृत पक्ष को दूर करना चाहते थे । यदि मेरे कथन में कहीं यह लगे कि वह अखोट थे तो विराटता अखोट नहीं होती, लघुता में ही यह संभव है। तुम हिमालय की उूँचाई भी चाहो और यह भी चाहो कि उसमें खड्ड खाई न हो यह संभव नहीं, यह पिरामिड में अवश्य संभव है, ओबेलिस्म् या लाट में अवश्य संभव है।
मैं जिस विषय पर आना चाहता था वह यह कि गॉंधी अकेले हैं जिनमें उन्नीसवीं सदी की विद्रोही उूर्जा और बीसवीं सदी के निहत्थेपन के मेल से असहयोग और सत्याग्रह के हथियार गढ़ने की क्षमता थी। गॉंधी के इस हथियार के व्यापक प्रसार से मानसिक रूप में यह फैसला हो गया था कि अब स्वराज्‍य को रोका नहीं जा सकता। अब अंग्रेजी शासन भी मनोवैज्ञानिक पराजय स्वीकार कर चुका था और यह सौदेबाजी आरंभ कर चुका था कि कितना देना है, कैसे देना है, कितनी तैयारी के बाद देना है, और किनको किनको क्या देना है कि किसी के प्रति अन्याय न होने पाए और इस बहाने वह ऐसी परिस्थितियॉं पैदा करने की कोशिश में लगे थे जिसमें परिस्थितियॉं इतनी बेकाबू हो जायँ कि स्वनतन्त्रता की मॉंग करने वाले स्वयं हथियार डाल दें और कहें हुजूर आप ही इसे सॅभाल सकते हैं आप ही तब तक सँभालिये जब तक हम दोनों सौतेले भाइयों में मिल जुल कर रहने की समझ नहीं पैदा हो जाती और गॉंधी जानते थे कि जब तक अंग्रेजी हुकूमत है वह दोनों भाइयों के बीच प्रेम तो दूर समझदारी तक पैदा नहीं होने देगी। यहीं गॉंधी एक ऐसे असमंजस के शिकार हो गए थे कि वे भी जल्द से जल्‍द ब्रितानी दबोच से बाहर लाने के उस अभियान में शामिल हो गए थे और इस आशा में शामिल हो गए थे कि जिन कामों और तैयारियों को वह मानवाकार जन्तु ओं को मनुष्य बनाने के लिए जरूरी समझते हैं वे स्वतन्त्र भारत में ही पूरी हो सकती हैं।

‘’तुम्हा्रे मन में अंग्रेजों के प्रति इतना जहर भरा हुआ है कि तुम सोच ही नहीं सकते कि उनमें कोई सदाशयता भी थी। मुस्लिम लीग जिसे तुमने सौतेला भाई कहा वह उसके बाद आती है।‘’

’’देखों सैयद अहमद के बाद नीरद चन्द्र चौधुरी दूसरे आदमी थे जो अंग्रेजों को दुनिया का सबसे सभ्य समाज और उनके शासन को सबसे सभ्य शासन मानते थे। उस कतार में तुम मुझे तीसरी जगह पर खड़ा मान सकते हो और मैं तुम्हारे आकलन से सहमत भी हो जाउूँगा, क्यकि अंग्रेजों ने जो कुछ भी किया अपने निजी हित के लिए नहीं, अपने देश के हित के लिए किया। हमारे अपने राजनीतिज्ञों ने, नेहरू से ले कर आज तक के कांग्रेसियों ने, अपने और अपनों के हित को प्रधानता दी और देशोद्धार करने वाले सभी संगठनों ने, देश और समाज को बॉंटने और लूटने की जिस नीति को अपनाया उसे देखने के बाद वे भी श्रद्धेय बन गए, श्रेष्ठता के कारण नहीं, हमारे अपने ही नेतृत्व से कम जघन्य होने के कारण। जघन्यता को भी देश सेवा बताया जा सकता है, इसकी तो पहले कल्पंना भी नहीं की जा सकती थी, परन्तु हाल में अकारण या कुतर्कपोषित कारणों से जिस तरह के देशविघातक आयोजन होने लगे हैं उसे देखते मेरा अपना भी पतन हो रहा है, कुछ लोग मुझे बौद्धिक से अधिक ज्योतिषी मान सकते हैं क्योंकि मैंने पीछे कभी कहा था कि कांग्रेस और वामपंथी दलों के पास अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए कोई औचित्य बचा नहीं है, इसलिए ये उसी बॉंटो और बचे रहो की राजनीति कर सकते हैं और देश का अकूत अहित करते हुए अपने निजी हितों को आगे बढ़ा सकते हैं। मुझमें तो इतनी समझ नहीं न इतनी सावधानी है परन्तु फेस बुक पर मेरे एक मित्र को यह पता था कि अभी हाल के राष्ट्रद्रोही हुड़दंग में अपनी रोटी सेंकने वाले करात और येचुरी और राजा के मार्क्स वाद और उनकी गाडि़यों के माडेल और उनके अपने बच्चों के लिए चुने हुए देश और उसमें उनके भविष्यसपनों के बीच जो दूरी दिखाई दी उसमें उनका वह चरित्र भी सामने आया कि ये आज के टुच्चें नेता अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए अपनी पार्टियों को, अपने देश को और कहते हुए दुख होता है, पर सच का तकाजा है, अपनी मॉं को भी बेच सकते हैं।

गॉंधी यह जानते थे। अकेले वह थे जो कह रहे थे कि भले सत्ता मुस्लिम लीग को सौंप दी जाय, परन्तु देश का बँटवारा नहीं होना चाहिए। अकेले वह थे जो कह रहे थे कि कांग्रेस कुछ पाने के लिए बना एक संगठन था, अब वह प्राप्त हो गया इसलिए अब इसका नाम बदल दिया जाना चाहिए। पर जिनके पास अपना कुछ न था और जो स्वहतन्त्रता को अपनी खानदानी जागीर बनाना चाहते थे उन्होंने वैसा न माना, न होने दिया, न गॉंधी को जीने दिया। गॉधी महान नहीं थे, उनमें महिमा के अनेक शिखर थे और कुछ खाइयाँ भी परन्तु आधुनिक भारतीय मनीषा के शिखर वही हैं और आज के जगत में सबसे सार्थक और अनुकरणीय वही हैं और उस आदमी ने कहा था कि लोगों को बता दो गांधी को अंग्रेजी नहीं आती, क्योकि वही जानता था कि अंग्रेजी शासन ने भारतीयों को अशक्त कर दिया था पर उनकी आत्मा जीवित थी। जो अंग्रेजी नहीं जानते थे उनमे पूरी तरह और जो अंग्रेजी जानते हुए भी अपनी भाषा में सोचते और समझते थे उनमें उससे कुछ कम परन्तु जो अंग्रेजी पर गर्व करते थे उनकी आत्मा तक को अग्रेजी भाषा ने कुचल दिया था। वे परछाइयों को यथार्थ मान कर तितलियॉं पकड़ने को भागते बच्चों जैसे बालिश मूर्ख थे। यह बोध किसी अन्य में नहीं था। उन्नीसवीं शताब्दी के दौर में भी नहीं। गॉंधी का इतना महिमामंडन किया जा चुका है कि मैं उसमें एक तिनका तक नहीं जोड़ सकता, परन्तु गांधी को समझने की योग्यंता तक हमने पैदा नहीं की यह मुझे उनके भाषा विषयक विचारों से ही लगा। अब तुम चाहो तो हिन्दीी के भूत, वर्तमान और संभाव्य पर बात कर सकते हैं।

तुम समझते हो मैं तुम्हारी बकवास सुन रहा था। मैं सोच रहा था हे भगवान, बहरा होना भी एक वरदान है।

सुना ही नहीं तो वह वरदान तो बिना किसी के दिए ही तुम्हें मिल गया। उठो, तुमसे बात करना भी पत्थर से सिर टकराना है।

Post – 2016-02-14

मोहभंग

मैं तुम्हें इधर-उधर की थोड़ी झॉंकी इसलिए दिखा रहा था कि यह बता सकूँ कि उन्नीसवीं शताब्दी में हमारी समझ बीसवीं शताब्दी की तुलना में अधिक सही थी, आत्माभिमान अधिक था, सांप्रदायिक सद्भाव अधिक था, और विरल अपवादों को छोड़ दें तो अधिकांश नेताओं का दृष्टिकोण क्षेत्रीय न हो कर राष्ट्रीय था। हिन्दी क्षेत्र, यहॉं की बोलियों और संस्कृति के प्रति आत्मीय आदरभाव था। दूसरे भाषाक्षेत्रों के लोग शिक्षा के लिए, धर्म संकट की स्थिति में काशी के पंडितों का अभिमत जानने के लिए, और अपने नये विचारों के प्रसार के लिए, अपने पांडित्य की धाक जमाने के लिए काशी आते थे । राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर के जन्मस्थल होने और काशी, मथुरा, हरिद्वार आदि तीर्थस्थलों के हिन्दी क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहॉं के लोगों और बोलियों के लिए एक रागात्मक संबन्ध था। भारत बहुलता को वैभव समझता था, व्याधि नहीं। अठारवीं शताब्दी तक पश्चिमी विद्वानों की नजर सतही थी। विविधता को बिलगाव मानती थी और समझती थी कि इनमें एका पैदा ही नहीं हो सकता। उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक वे इसी भ्रम में भारतीय समाज को निरीह और लाचार मान कर धर्म, विश्वास, आर्थिक दोहन आदि सभी क्षेत्रों में उद्दंडता से व्यवहार करते रहे। 1857 की एक छोटी सी चूक और अपने ही देश के विघाती तत्वों के सहयोग और कुछ अन्य संयोगों ने पासा पलट दिया फिर भी वे भीतर से ‘जान बची लाखों पाए’ वाली चेतना से भीतर तक हिल गए थे। इससे पहले हिन्दू मुसलमान को पहले से ही बँटा मान कर वे निश्चिन्त थे कि ये कभी एक हो नहीं सकते। इसके बाद भारतीय समाज को भीतर से तोड़ने की नई युक्तियों का आविष्कार उनकी कूटनीति का प्रमुख मुद्दा बन गया और अन्य बातों के अलावा, उन्होंने यह पाया कि धार्मिक विभेद उतना विभेदक नहीं है जितना भाषा और संस्कृति का प्रश्न और इसके लिए हिन्दी क्षेत्र सबसे उर्वर है। इसमें उन्होंने भाषा और संस्कृति के अलगाव का वह खेल सैयद अहमद के कंधे पर बन्दूबक रख कर, और दो लिपियों के प्रचलन और एक ही भाषा में अनुपात भेद से दो स्रोतों से आयत्तं शब्दावली के आधार पर एक ही भाषा को दो भाषाओं में बँटा मान कर और उनके बीच टकराव पैदा कर, एक की रीतियों को दूसरे की रीतियों से टकराव का मुद्दा बना कर विषवेलि बोने की योजना बनाई। इसमें वे सफल रहे।

परन्तु उन्होंने दूसरी भाषाओं से हिन्दी क्षेत्र का टकराव दिखाते हुए उस पर्यावरण को विषाक्त करने का प्रयत्न किया। इसे बीम्स के कंपैरेटिव ग्रामर आफ आर्यन लैंग्वे्जेज के संगत विषयों के निरूपण को ध्यानन से पढ़ने वाला समझ सकता है, पदपाठ करने वाला नहीं।
काल्डवेल ने अपने द्रविड़ भाषाओं के तुलनात्मक व्याकरण के माध्यम से दक्षिण को उत्तर से, और दक्षिण के प्रभावशाली ब्राह्मणों को शेष समाज से और शेष समाज को भी तमिल, मलय, सिंहल आदि आन्तरिक फाँकों में बॉंटने का जाल तैयार किया, वह सरल पाठ में इतना तर्कसंगत था कि उसके कुचक्र को समझते और जानते हुए भी मेरे मन में काल्डवेल की प्रतिभा और अधिकार के प्रति गहरा सम्मान है। बीम्स ने उसकी नकल करते हुए तीन खंडों में अपना काम किया परन्तु वह प्रकटत: इतना घटिया है कि एक भाषाविज्ञानी के रूप में कोई बीम्स का नाम नहीं लेता, फिर भी कुछ दूर तक तो वह इस योजना में सफल हुए ही कि हिन्दी के प्रति अन्य, तथाकथित आर्य भाषाओं में स्पर्धा, और हिन्दी प्रदेश में ही हिन्दु्स्तानी के सही चरित्र की चिन्ता‍ के बहाने हिन्दी उर्दू में विरोध उत्पन्न‍ कर सके।

उन्नीसवीं शताब्दी के सांस्कृतिक पर्यावरण को देखते हुए यह स्वाभाविक था कि अखिल भारतीय भाषा के रूप में सभी हिन्दी को वरीयता देते। एक मजेदार बात, जिसका मैं पहले जिक्र कर चुका हूँ, यह है, कि हिन्दी का मतलब वही था जो उर्दू का या रेख्ता का। उर्दू का मतलब था छावनियों में अर्थात् जहॉं भी बाहरी लोगों और स्थानीय जनों के बीच संपर्क की संभावना पैदा हो, वहॉं इस संपर्क से पैदा ऐसी जबान जो सबकी समझ में आ सके, अर्थात् बोलचाल की जबान, दोनों की समझ में आने वाली जबान। रेख्ता का अर्थ ज्ञानमंडल के कोश में और महात्मा गांधी अन्तंर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय द्वारा तैयार कराए गए कोश में जो अर्थ दिया गया है वह गलत है। इसका ठीक वही अर्थ है जो अपभ्रंश का है। रेख्ता का अर्थ है गिरी हुई, पड़ी हुई, बिखरी हुई अर्थात् अपभ्रंश अर्थात् गिरे हुए, दबे हुए या आम जनों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली जबान। और हिन्दी का अर्थ था हिन्दुस्तान के लोग और उनकी बोलचाल की भाषा। इसका प्रयोग सबसे पहले तो उन लोगों ने आरंभ किया जो हिन्दी शब्द से ही डर कर उसे उर्दू कहने लगे और प्रयत्नपूर्वक फारसी बनाने लगे और उससे भी सन्तोष न हुआ तो अरबी भरने लगे। यह उनकी ही बहुधा विभाजित अन्तश्चे तना का प्रमाण है जिसे बीम्सु के भाषाविज्ञान ने पैदा किया था। हिन्दी के लिए तो पहले खड़ी बोली, जो रेख्ता के ठीक विपरीत थी, काम में आती थी। यदि रेख्ता या उर्दू अर्थात् हिन्दी आमफह्म या बाजार की भाषा थी, गिरी हुई, पड़ी हुई, तो यह जो दिल्ली के आसपास की भाषा एक तरह से अभिजात भाषा, तनी हुई भाषा के रूप में अपना दावा पेश कर रही थी और इसलिए रेख्ता या जनभाषा से कमजोर थी। यह दूसरी बात है कि हिन्दी पर अपना दावा छोड़ने और खड़ीबोली द्वारा इसे अपनाए जाने के बाद भी आरंभिक हिन्दी गद्य लेखकों ने लोकोक्तियों और मुहावरों को अपने लेखों में पिरोने का प्रयत्न किया, पर वह असर न पैदा हुआ जिसके कारण गालिब ने होश सँभालने के बाद गर्वोक्ति की थी कि
‘रेख्ता के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब
‘कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था।
पहले वह फारसी पर गर्व किया करते थे, अब आम जनों की मुहावरेदार भाषा पर गर्व कर रहे हैं, जिसके लिए मीर जाने जाते थे:
मुझको शायर न कहो, मीर कि साहब मैंने
दर्दोग़म कितने किए जमा तो दीवान किया।
या
मुँह तका ही करे है जिस तिस का।
हैरती है यह आइना किसका
शाम ही से बुझा सा रहता है,
दिल हुआ है चिराग मुफलिस का ।।
या
सिरहाने मीर के आहिस्ता बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है ।

”इस जबान से स्पर्धा पर उतर आए थे गालिब। यदि उनकी लोकप्रिय गजलों को देखें तो इस मामले में ग़ालिब मीर से भी अधिक सिद्धहस्त थे । यही ग़ालिब थे जो मोमिन के एक शेर पर अपना दीवान लुटाने को तैयार थे:
तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता ।
”गौर करो इस शेर में प्रयुक्त शब्दावली और अर्थवैभव पर । इसी का नाम हिन्दी था इसी का नाम हिन्दी है। जिन्हों ने इसकी आत्मा‍ में प्रवेश किया था उन्होंने हिन्दी और हिन्दू के साम्य और ब्रितानी कूटनीति द्वारा दोनों के बीच विभेद के चलते इसे छोड़ तो दिया, पर जन भाषा, या आमफहम की भाषा, या बाजार की भाषा अर्थात् उर्दू कहने लगे और जो खड़ी बोली हिन्दी कही जाने लगी उसमें ज़मीन की गन्ध तक नहीं। हिन्दी सचमुच उूपर से लादी हुई, नकली भाषा, असाहित्यिक पर प्रशासनिक दृष्टि से सबसे जरूरी भाषा लगती है। यह चाहे उूर्दू से अलगाव के कारण हो, या आभिजात्य के कारण, यह अपनी जड़ों से जुड़ नहीं पाई, जब कि उर्दू को हिन्दी से अलग करने के लिए उसे फारसी और अरबी से भरने का चलन आरंभ हो गया और इसको सचेत रूप में बढ़ाया गया।
हम आगे बढ़ते रहे और पीछे खिसकते रहे ।
“हमारी अग्रवर्ती पश्चगति में ब्रिटिश कूटनीति और हमारी अपरिपक्वता दोनों का हाथ है। हमे तोड़ने और उल्टी दिशा में मोड़ने के प्रयत्न उनकी ओर से हो रहे थे, जिसके लिए सैयद अहमद और भारतेन्दु दोनों का उपयोग कर लिया गया। इस मामले में बाबू शिवप्रसाद की समझ अधिक सही थी, परन्तु भारतेन्दु और सैयद अहमद में अन्तर यह है कि भारतेन्दु वंशपरंपरा से और स्वयं अपने आरंभिक सोच में, ‘जुग जीवें सदा विकटोरिया रानी’ वाली राजभक्ति रखते थे और अपने विवेक से अंग्रेजी राज्य से उनका मोहभंग होता गया और वह उस आर्थिक शोषण को समझ सके जिसे उन्होंनने ‘पर धन बिदेस चलि जात यहै अति ख्वारी की पीड़ा से व्यक्त किया था और अमेरिका में हुए स्वतंन्त्रता संग्राम के अनुरूप एक भारतीय तैयारी का सपना देखने लगे थे, कहें, विद्रोही होते चले गए थे जब कि सैयद अहमद ब्रितानी जाल में फँसते चले गए थे और जैसा कि हमने कहा, उस राजनीति का एक मुहरा बन कर रह गए थे।
“फिर भी उस दौर में भाषा की तुलना में लिपि का प्रश्न अधिक कॉंटे का था, क्योंकि सैयद अहमद से ले कर दूसरे सभी जानते थे कि एक बार नागरी लिपि को शिक्षा और अदालतों में प्रवेश का अवसर मिला तो अरबी लिपि जो भारतीय नामों, शब्दों के लिये नितान्त अनुपयुक्त थी, किनारे लग जाएगी, इसलिए उन्होंंने इसे सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्न के रूप में बहुत अडि़यलपन से अपनाए रखा। इस मामले में लगभग सभी मुसलमानों को अन्ततक अरबी लिपि का आग्रह बना रहा, जिसमें तत्ववादी और प्रगतिशील सभी आ जाते है। इस मनोविज्ञान को समझना भारतीय यथार्थ को समझने के लिए जरूरी है परन्तु इस पर हम यहॉं इसकी चर्चा नहीं करेंगे।
“जहॉं तक भाषा का प्रश्नं था, अदालतों और थाने की भाषा फारसी-बहुत भाषा थी जिसे केवल वकील, मुख्तार समझते थे और जिसे जानबूझ कर मुश्किल बना रखा गया था जिससे कोई व्यक्ति यदि यह जानना चाहे कि लिखा क्या गया है तो उसे किसी वकील, मुख्तार या मुंशी की मदद लेनी पड़े। इसे और भी दुरूह बनाने के लिए शिकश्ता में लिखने का चलन था जिसमें सन्दर्भ के बिना अर्थ समझा ही नहीं जा सकता था – उसी लिखित वाक्य को दादा अजमेर गए और दादा आज मर गए, किसी भी रूप में पढ़ा जा सकता था। यह भी उसे गूढ़ या कूट भाषा बनाने का एक तरीका था। इस खास अर्थ में यह भाषा और लिपि सचेत रूप में जनता से दूर ही नहीं जनविरोधी भी थी।
“मुझे हैरानी सिर्फ इस बात पर होती है कि आजादी से पहले जो लोग हिन्दी की वकालत कर रहे थे उन्हें हिन्दी वालों ने इतना नाराज क्यों कर दिया कि वे भी हिन्दी के विरोधी हो गए। सारा कसूर तो हिन्दीवालों का है।
“पर दुबारा सोचने पर लगता है, यह आधी सचाई है। पूरी सचाई तो यह है कि आजादी की लड़ाई भारतीय भाषाओं में नहीं लड़ी गई। भारतीय भाषाओं में तो अधिक से अधिक उनके व्याख्यान होते रहे, लड़ाई जिनसे लड़ी जा रही था उनकी भाषा हिन्दी नहीं थी, अंग्रेजी थी, इसलिए स्वतन्त्रता संग्राम की भी भाषा अंग्रेजी थी।

“तुम जँभाइयॉं ले रहे हो जिसका मतलब है तुम उूब रहे हो । गलत कह रहा हूँ?”

“गलत तुम कहो भी तो यह पता न चलेगा कि कहीं कुछ गलत है। इसके लिए अक्ल की जरूरत पड़ती है, पर उूब रहा हूँ यह तो सच है ही।”

Post – 2016-02-13

गांधीनामा

तुम्हारी कुछ बातें मुझे भी सही लगती हैं।

सही गलत के चक्कर में मत पड़ा करो, जो सही है वह भी गलत हो सकता है, और जो गलत है वह कुछ लोगों केा गलत लग सकता है, दूसरों को सही क्योंकि उसी से कुछ लोगों को नुकसान हो सकता है और दूसरों का फायदा।

वह हँसने लगा। कुछ बोला नहीं।

’’देखो अभी कल एक सज्जन कह रहे थे, गांधी जन-आन्दोलन खड़ा करने के लिए खिलाफत का भी समर्थन कर सकते थे। मैंने कहा, नहीं, यह तथ्य तो है, पर सच नहीं है। गॉंधी से पहले मुसलिम चेतना पर सैयद अहमद का प्रभाव था जो मुसलमानों को कांग्रेस से अलग रहने और अंग्रेजी सरकार का विश्वासपात्र बने रहने की नसीहत देते थे, क्योंकि यह उनके लिए फायदेमन्द था और इसलिए सही था। पर गलत इसलिए था कि मुसलिम हित को सर्वोपरि मानने के कारण वह बौद्धिक रूप में अंग्रेजी कूटनीति के सम्मु‍ख आत्मसमर्पण कर चुके थे, एक असाधारण प्रतिभा, अपनी संकीर्ण सोच के कारण मुहरा बन कर रह गई थी और इससे मुस्लिम समुदाय मुख्य धारा से कट कर दरबाबन्द चेतना का शिकार हो गया था। गॉधी की सोच यह थी कि यदि हमें भारतीय समाज को एकजुट करना है तो हमें उसके किसी हिस्से‍ के ऐसे सरोकार का जो अंग्रेजी सत्ता के लिए असुविधाजनक है, समर्थन करना चाहिए। भीड़ जुटाने का वहॉं प्रश्न नहीं था। परन्तु जल्‍द ही इसके नतीजों ने ही समझा दिया कि यह बहुत बड़ी भूल हो गई और उन्हों ने पूरी कांग्रेस पार्टी को हैरानी में डालते हुए अपना आन्दोतलन ही स्थगित कर दिया और एक लंबे विराम में बाद उसे नये सिरे से खड़ा किया।

” गॉघी भारतीय राजनीति में प्रवेश करने से पहले ही एक चमत्कारी पुरुष के रूप में विख्य हो चुके थे और एक साल के भारत दर्शन के बाद तो वह घूरे पर भी खड़े हो जाऍं तो वह तन कर एक टीला बन जाता था और भीड़ स्वत: उनके चुबकीय व्यक्तित्व के कारण एकत्र हो जाती थी और जिधर मुड़ते हवा तक अपना रुख बदल लेती।

आइंस्टाइन और गांधी बीसवीं शताब्दी की दो आश्चर्यजनक विभूतियां हैं, परंतु एक का सरोकार भूत-जगत से था तो दूसरे का प्राणि-जगत से । भूत जगत में हम इच्छानुसार विच्छेेदन, विलगाव, नियन्त्रण कर सकते हैं प्रकृति के रहस्यों को समझ सकते हैं, एक बार विफल होने पर दुबारा अपनी चूक से बच और भूल को सुधार सकते है और इससे श्रम और धन की मामूली सी क्षति को छोड़ कर दूसरी कोई क्षति नहीं होती, परंतु प्राणि-जगत में और खास तौर से मानव जगत में इनमें से कोई सुविधा नहीं होती इसलिए उसमें अपना विवेक और अन्त:प्रज्ञा को छोड़ किसी चीज का सहारा नहीं होता। जाहिर है, उसमें यदि कोई बड़ा प्रयोग किया गया तो उसके परिणाम भयानक हो सकते हैं और इसके अपवाद तो आइंस्टा़इन भी नहीं जिन्होंने यह जान कर कि जर्मनों ने परमाणु बम तैयार कर लिया है, रूजवेल्टी को बम बनाने की सलाह दी थी और उसके सूत्र भी सुझाए थे। रूजवेल्ट बड़े नेता थे, गहन मानवीय संवेदना से युक्त। उनका पोलियो भी उनकी इस संवेदना का ही पुरस्कार था। आइंस्टाइन को क्‍या पता था कि उन्हें नाम से सच्चा मनुष्य या कहो मानववादी पर मिजाज से जल्लाद उत्तराधिकारी मिलेगा जो स्वयं उस भयानक त्रासदी का सूत्रपात करेगा जिसे टालने के लिए उन्होंने यह सुझाव रखा था। उन्होंने प्रतिरक्षा की चिन्ता से कातर हो कर इसमें योगदान दिया था, आक्रामक आयुध के रूप में नहीं।

‘छोटे लोग छोटी गलतियॉं करते हैं जिससे सिर्फ उनका नुसकान होता है, पर महान लोग इतनी महान भूलें करते हैं जिनके लिए गॉंधी ने हिमालयी भूल या हिमालयन ब्लंडर का पद गढ़ा था। यदि ब्लंडर के आकार को मानदंड बनाया जाय तो आइंस्टाइन मानव इतिहास के सबसे बड़े आश्चर्य हैं, जो उनके चकित करने वाले कामों से भी सिद्ध हो सकता है। परन्तु आइंस्टाइन ही ऐसी प्रतिभा थे जो समझते थे कि भौतिकी के क्षेत्र में काम करने से अधिक महत्वपूर्ण है मानविकी के क्षेत्र में काम करना है, क्योंकि सभी मानव प्रयास मानव जीवन को उन्नत बनाने के लिए ही तो, इसलिए अन्तिम दिनों में वह इस ओर भी मुड़े थे। वही कह सकते थे कि आने वाले समयों में किसी को यह विश्वास न होगा कि गॉंधी जैसा कोई व्यक्ति इस धरती पर पैदा हुआ था।

यह विचित्र है कि खिलाफत आंदोलन के परिणाम स्वरुप जो बोरा विद्रोह अंग्रेजों के विरुद्ध आरंभ हुआ था उसे ब्रितानी खुफिया तन्त्र ने यह प्रचारित करके कि अब ब्रिटिश राज खत्म हो चुका है, खलीफा का राज्य स्थापित हो चुका है, सच्चे इस्लामी राज्य में मुसलमानों से अलग किसी को जिंदा रहने का अधिकार नहीं है उसकी दिशा पलट दी थी और इसके बाद वही आक्रोश जो पहले अंग्रेजों के प्रति था, हिन्दुओं के विरुद्ध हो गया और अंग्रेजी प्रशासन ने इसे फैलते जाने की पूरी छूट दे दी। इस उपद्रव की कहानियॉं इतनी हृदयविदारक थीं कि जब इसकी खबर गांधी को लगी तो उन्हों ने कहा था, उन्हें मारना चाहिए था। यह पढ़ कर मैं स्तहम्भित रह गया था। गॉधी की अहिंसा क्या राजनीतिक अवसरवाद है।

यह समझने में कई वर्ष लगे थे कि गॉंधी की अहिंसा, बिना परंपरा का गहन अध्ययन किए ही (या कौन जाने गॉंधी क्या् क्या पढ़ और जान चुके थे), उस सोच से जुड़ी थी जिसमें हिंसा को अक्षम्य पाप तो कहा गया है, परन्तु यह विधान भी है कि आततायी का वध करने पर कोई पाप नहीं लगता। आज की भाषा में कहें तो यह अपरिहार्य और न्यायोचित है। न आततायि बधे दोषो हन्तुःभवति कश्चन ।

कहते हैं आइंस्टााइन के सापेक्षता सिद्धांत के बारे में एक व्यक्ति ने कहा था दुनिया में इसके तीन जानकार है। जिससे उसने ऐसा कहा था उस वैज्ञानिक ने कहा था दो को तो मैं जानता हूं, एक मैं दूसरे आइंस्टांइन, पर यह तीसरा कौन है?

हो सकता है फिकरा हो, पर कई बार फिकरे भी यथार्थ की उससे अधिक गहरी व्याख्या कर जाते हैं जिससे दार्शनिक करना चाहते हैं और कर नहीं पाते।

”सापेक्षता के सिद्धांत पर बात करोगे जिसे तुम जानते नहीं या उस विषय पर बात करोगे जिस के बारे में जैसी भी सही, कुछ जानकारी रखते हो।”

अरे भाई मैं सापेक्षता के सिद्धांत की बात नहीं कर रहा हूं । मैं तो यह कह रहा हूं कि महान से महान वैज्ञानिक भी उसके कुछ पहलुओं को नहीं समझ पाए थे। उन्हें ज्ञेय मानते थे पर ज्ञात नहीं। वे मानते थे कि सच्चाई तो कहीं है, परन्तु प्रमाणित नहीं हो रही है उनके अपने सिद्धांतों के अनुसार मैं केवल इस मोटी खबर को जानता हूं कि उसका जितना अंश ज्ञात और मान्य हो सका, उसकी ओर आइंस्टाइन का ध्यान नहीं था। वह बहुत कुछ ऐसा जानते थे जिस तक किसी अन्य की पहुँच असंभव थी। उनका उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि यह बता सकूं कि गांधी के अहिंसा सिद्धांत को भी उसी तरह से हमारे समाज में नहीं समझा, जैसे सापेक्षता के विशेष सिद्धान्त को। उसको समझने वाला शायद दुनिया में कोई दूसरा नहीं था । पर जितना समझ में आता था उसी पर लोग उन्हें सिर पर उठाए फिरते थे। ठीक यही हाल गांधी का था।

अरे भाई मैं चाहता था तुम यह बताओ हिन्दीं का भविष्‍य क्या है और तुम गांधीनामा ले कर बैठ गए।
उस पर कल बात करेंगे।

Post – 2016-02-12

अधूरे के अधूरे का अधूरा

जब मैं कहता हूं कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेता अपने और अपनों के लिए रियायतें मॉंग रहे थे तो यह एक सामान्य कथन है। यह कुछ लोगों को खटका भी होगा और एक मित्र ने लाल, बाल और पाल का नाम लेते हुए मुझे अपनी स्थिति स्पष्ट करने को भी कहा। मेरा इरादा इन महापुरुषों और इन जैसे महापुरुषों के त्याग और बलिदान और साहस को कम करके ऑंकना नहीं है। यदि हम कांग्रेस के भीतर के प्रथम विभाजन, जिसे नरम दल और गरम दल का नाम दिया गया, पर ध्यान दें तो मुझे नरम दल के नेता अधिक दूरदर्शी दिखाई देते हैं और यह दूरदर्शिता कांग्रेस का विरोध करने वाले सैयद अहमद में भी इस रूप में देखी जा सकती है कि इन्होंने सत्तावन के संग्राम से जो दुर्भाग्यवश विद्रोह बन कर रह गया, शिक्षा ली थी और जानते थे कि इस बीच सीधे इंगलैंड के तख्त के अधीन प्रशासन के आ जाने के कारण ब्रितानी चौकसी और ताकत बढ़ी है, जब कि भारत की सशस्त्र संग्राम छेड़ने की क्षमता को लगभग कुचल दिया गया है। मेरा अध्ययन इस विषय में मेरे अनेक मित्रों से भी कम है और अनुभव का तो सवाल ही नहीं उठता…’’

’’जब न ज्ञान है न अनुभव तो चुप तो रह सकते हो, बीच में टॉंग क्यों अड़ाते हो।‘’

’’इसलिए कि अनुभव किसी के पास नहीं है, और किताबों से अलग अलग सूचनाऍ मिलती हैं, पर वह दृष्टि नहीं जो तथा‍कथित नरम दलीय नेताओं के पास थी। यह नरम दल का ही बोध था जो गॉधी को हस्तान्तरित हुआ या उलट कर कहें कि यह नरम दल का नेतृत्व ही था जिसने गॉंधी की संघर्ष क्षमता को पहचाना और कांग्रेस का नेतृत्व उन्हें सौंपने का फैसला किया। गरम दल के ये तीनों नेता बहुत पढ़े-लिखे थे, साहसी थे, असाधारण वक्ता थे, परन्तु आवेश के कारण उनकी दृष्टि उतनी स्वच्छ- नहीं थी जितनी गॉंधी की। सुभाषचन्द्र बोस भी गरम दलीय सोच के ही थे और गॉंधी उनके मिजाज को समझ लेने के बाद उनसे भी कांग्रेस के नेतृत्व को मुक्त रखना चाहते थे। जोशीले लोग आकर्षक लगते हैं, परन्तु वस्तु्स्थिति का आकलन करने में चूक कर जाते हैं और इसलिए उनके कामों के परिणाम उतने श्रेयस्कर नहीं होते जितने उनके उत्सर्ग भाव से आशा बॅधती है।

” हमारी शक्ति उस खास चरण पर और उससे आगे भी सत्तावन की तुलना में बहुत कम हो गई थी। उससे पहले तलवार बन्दूक, बर्छा फरसा जैसे हथियार जनता के पास थे। अब एक साख लम्बासई से बड़े चाकू छुरे तक हथियार मान कर प्रतिबन्धित थे। बन्दूक सरकारी जॉंच के बाद सरकार के स्वामिभक्तों को दिए जाते थे जो ब्रिटिश सत्ता के पायों-थूनियों का काम करते थे। 1818 के बाद धार्मिक संवेदना की उपेक्षा करते हुए जिस तरह की मनमानी की जाने लगी थी उससे सीख लेते हुए शासन ने संवेदनशीलता दिखाना आरंभ कर दिया था। अत: धार्मिक प्रश्नों पर उस तरह का सामाजिक विक्षोभ जो ज्वालामुखी की तरह फट पड़े, नहीं पैदा किया जा सकता था। उल्टे इसकी ऑंच हिन्दुओं-मुसलमानों की ओर मोड़ कर और पारस्‍‍परिक अविश्वा‍स को बढ़ाने के लिए अपनाये गये तरीकों से उस निकटता को तोड़ा जा चुका था, जो सत्तावन में पैदा हो सकी थी। अत: छिट फुट बम दागने से क्षणिक उत्तेजना तो पैदा की जा सकती थी, बदले की कार्रवाई भी की जा सकती थी, परन्तु सत्ता नहीं खत्म की जा सकती थी। यह ऐतिहासिक विवशता थी जिसका ध्यान रखते हुए ही कोई प्रभावकारी तरीका अपनाया जा सकता था।

”इस मोड़ पर केवल दो चीजें नई थीं और जिनका उपयोग किया जा सकता था। पहला था प्रेस और दूसरा था यह आश्वासन कि भारत का प्रशासन न्याायपूर्वक और भारतीयों के हितों की चिन्ता करते हुए किया जाएगा। गरम दल के नेता पहले का आलोचनात्मक तेवर के साथ पाठ कर रहे थे और नरम दल के नेता उस हितकारी शासन के आश्वासन की व्याख्या करते हुए अपनी मॉंगें रख रहे थे । परन्तु प्रेस पर सरकारी नियन्त्रण था और सत्ता‍ को चुनौती देने वाली या आलोचना करने वाली सामग्री को जब्त कर लिया जाता था, संपादकों, लेखकों को दंडित किया जाता था, और एक अल्पशिक्षित समाज में केवल शिक्षितों तक अपने विचार पहुँचाये तो जा सकते थे परन्तु उन्हें किसी कारगर कार्यक्रम का हिस्र्सा नहीं बनाया जा सकता था।

“ऐसा मुझे लगता है, हो सकता है कुछ अन्य तथ्यों की ओर ध्यान जाने पर इसमें सुधार की अपेक्षा हो। विपिन चन्द्र पाल और अरबिन्दो उस बंगभंग के विरुद्ध विप्लवी गतिविधियों में शामिल हुए थे और यह मान कर शामिल हुए थे कि यह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दरार डालने के लिए किया गया प्रयास है, परन्तु् इस प्रयास को उन्होंने अपने आन्दोलन से सफल हो जाने दिया। यदि सभी मुसलमान, यहॉं तक कि कांग्रेस में शामिल मुसलमान भी इसका समर्थन कर रहे थे तो विभाजन पर चुप रहना अधिक समझदारी रही होती, क्योंकि विरोध से ब्रिटिश कूटनीति सफल हुई। बंगाल नहीं बँटा पर दिल बॅट गए। बंगाल को प्रशासनिक दृष्टि से अपनी विशालता के कारण बँटना ही था। मैं नही जानता नजरुल इस्लाम की कविता में फारसी शब्दों की वृद्धि का भी यह एक कारण था या नहीं, परन्तु जिसे सुनीति बाबू ने मुसलमानी बांग्ला का नाम दिया उसकी पैदाइश इससे जुड़ी हो सकती है। मैंने इसका विस्तार से अध्यंयन नहीं किया। मुस्लिम लीग की स्थापना का तो इससे सीधा संबन्ध है ही। हम प्रत्येक मामले के विस्ताार में जाऍंगे तो दिशा बदल जाएगी। एक बात का श्रेय अवश्य इन महापुरुषों को जाता है कि इन्हों ने अंग्रेजी में लिखने के साथ हिन्दी, मराठी और बांग्ला में भी लेखन किया और इस दृष्टि से हमारी समस्या के सन्दर्भ में इनका महत्व अवश्य है।

“कांग्रेस के अन्य‍ नेताओं में आवेश था विजन या क्रान्‍‍तदर्शिता नहीं थी जो गांधी के पास थी। गांधी जी के साहित्य का भी मुझे आधिकारिक ज्ञान नहीं है, परन्तु जितना उलट पलट कर देख सका हूँ कहीं यह संकेत नहीं मिलता कि अपने सत्याग्रह को उस ब्राह्मणी शस्त्राागार से लिया था जिसमें प्राण देने की ठान कर अडिग भाव से जिसे गलत मानते हैं उसे मानने से इन्का्र करते रहे और आश्चर्य यह कि यह क्रान्तिकारिता रूढि़वादी ब्राह्मणों में ही थी नवाचारी ब्राह्मण तो सुविधाओं के हाथ बिक जाते थे। रूढि़वादी ईसाइयों, रूढि़वादी ब्राह्मणों की प्रगतिशील और विद्रोही भूमिका का जिक्र हम पहले भी कर आए हैं उसे दुहराने की जरूरत नहीं।

”यह सब तुम सुना क्यों रहे हो।”

” यह बताने के लिए कि गॉधी में एक रहस्यमय तरीके से परंपरा के जीवन्त तत्वों का नये सिरे से आविष्कार था और आधुनिकता के साथ उसका अद्भुत सामंजस्य था। ऐसा ही सामंजस्य पूर्व और पश्चिम के तत्वों का था और ऐसा ही सामंजस्य गरम दल और नरम दल के जीवन्त तत्वों का। गांधी हिंसा का रास्ता चुनने के पक्ष में नहीं थे, परन्तु ‘’हिंसा और कायरतापूर्ण पलायन में से मैं हिंसा को ही तरजीह दूँगा।” अहिंसक मरने के डर से हिंसा से पलायन नहीं करता, मरने और पलायन करने में मरने का वरण करता है, यह रूढि़वादी ब्राह्मणों के फीरोज शाह तुगलक और औरंगजेब दोनों के जजिया के विरोध में सविनय निवेदन के साथ अपनी मॉंग रखने, मॉंग न मानी जाने पर राजादेश की अवज्ञा करने, और हाथी से कुचले जाने पर भी मरने के लिए खड़े होने वालों का एक विशाल क्षेत्र में विस्ताार हो जाना…?

‘गॉंधी का सविनय अवज्ञा और असहयोग नरम दल के वश की बात न थी। बिना हिंसा का सहारा लिए, ‘मैं तुम्हारे गलत कानून और गलत शासन को नहीं मानता, मैं आजाद हूँ और आजाद रहूँगा और आजाद मरूँगा’ छाती तान कर नहीं कह सकता था। ऐसा व्रत लेने वालेों को भी इनके वचाव के साथ ही छुप कर रहना पड़ता और छिप कर प्रतिघात करना पड़ता था, अपनी पहचान जताने के लिए मैं झुकने को तैयार नहीं हूँ।’

” गांधी के सत्याग्रहियों को छुपने, बचते हुए जीने और मात्र यह जताने के लिए जीने की जरूरत नहीं थी। उनके पास एक ऐसा हथियार था जिसे ले कर वे सीधे गलत कानून को चुनौती और अपनी आजादी की घोषणा ही नहीं कर सकते थे, अपने विरोधियों को नंगा भी कर सकते थे। उनमें एक अतीन्द्रिय बोध था जिसमें आधुनिकता और परंपरा, हिंसालभ्य और अहिंसालम्य लक्ष्यों का समावेश था। गॉंधी को उनके समय में भी नहीं समझा गया और उनकी गाथा गाने वालों द्वारा भी अधूरे रूप में ही समझा गया। तुम्हें क्या लगता है।”

”मुझे लगता है कि यदि मेरे हाथ में हथौड़ा होता और तुम्हें अपना मित्र समझ कर उसका तुम पर प्रयोग न करने की ठान कर बैठा होता तो भी अपने को काबू न कर पाता और तुम्हारा सिर फटा मिलता । बात कर रहे थे कि हिंदी का आना अब इतिहास की जरूरत है और गॉंधी माहात्म्य में जुट गए। तुम पिछले जन्म मे चारण रहे होगे।

“चलो, पुनर्जन्म में तुम्हें विश्वास तो पैदा हुआ। लेकिन तुम ठीक कहते हो, मुझे न बोलना आता है, न लिखना। मैं अक्सर अपने विषय को ही भूल जाता हूँ, बोलते समय भी और लिखते समय भी। लेकिन इसका एक फायदा भी है यार। जब पता चलता है कि अरे मुझे इस विषय पर बात करनी थी और उसका तो जिक्र ही नहीं आया तो प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब इसे सलीके से कहूँगा। नतीजा वही होता है। फिर भी लाभ यह कि अपनी ही कमी को पूरा करने के लिए दूसरा लेख, दूसरी किताब आती जाती है, बाजार गरम रहता है और बात पूरी होती लगती नहीं। मरते समय कहूँगा, इसे अगले जनम में समझाउूँगा, पर वैज्ञानिक अगले जनम का रास्ता रोके खड़े हैं। अधूरा कहा और अधूरा लिखा है, इसे मेरे पाठक ही पूरा करेंगे। फिर भी कल मिलते हैं.