Post – 2019-06-09

पैगंबरी की पृष्ठभूमि

महान विभूतियों के साथ एक दुर्भाग्य जुड़ा होता है। किसी भी कारण से मातृ-स्नेह से वंचित रह जाना। यह अभाव किसी दूसरे की उदारता से पूरा नहीं हो पाता। इसकी दो विरोधी परिणतियां होती हैं। या तो ऐसा व्यक्ति अति संवेदनशून्य और निष्ठुर, (पत्थर दिल) हो जाता है , या इतना संवेदनशील कि पूरी दुनिया का दुख उसका अपना दुख बन जाता है।

एक दूसरी प्रवृत्ति यह पैदा होती है – अपने संपर्क में आने वाले लोगों के मनोभाव को बारीकी से देखने और समझने की, अपनत्व दिखाने वाला व्यक्ति सचमुच स्नेह करता है या दिखावा, इसे परखने की प्रवृत्ति। मोहम्मद साहब के पिता तो उनके जन्म से पहले ही चल बसे थे, जन्म से लेकर 5 साल की उम्र तक उन्हें अपनी मां के स्नेह से ही नहीं, नजर से भी दूर रहना पड़ा था। फिर मां के पास आए तो एक साल के भीतर उनका साया भी न रहा। दादा ने 2 साल तक पारिवारिक बांदी के माध्यम से पाला और फिर वह भी गुजर गए। चाचा ने उसके बाद देखभाल का भार संभाला और ऐसा लगता है कि उन्होंने उन्हें बहुत स्नेह से पाला-पोसा। मोहम्मद के कठोर परिस्थितियों में भी हार न मानने की प्रवृत्ति और जो कुछ सही लगता है उसे किसी भी कीमत पर करने को तैयार रहने की प्रवृत्ति को इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए समझा जाना चाहिए।

मोहम्मद साहब के पैगंबर बनने में जिस व्यक्ति की भूमिका सबसे प्रधान थी, वह थी वह महिला जिसे केवल बहुत धनी के रूप में याद किया जाता है, पर उसके अनुभव और कौशल की दाद नहीं दी जाती, जिससे वह महिला होते हुए इतना बड़ा कारोबार चलाती थीं ।

अपने चाचा अबू तालिब के कहने पर काम धंधे के सिलसिले में वह मिले उससे पहले उन्हें उनके बारे में सभी जरूरी जानकारियां प्राप्त थीं। कंकड़, पत्थर और हीरे में फर्क करने वाली इस जौहरी को पहली मुलाकात में पता चल गया था कि उसके हाथ क्या आया है और उसे तराश कर क्या बनाना है।

सामान्यतः यह माना जाता है कि मुहम्मद साहब ने एक धनाढ्य विधवा से विवाह किया। यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि उस महिला ने अपने शौहर के रूप में मोहम्मद साहब को चुना और उन्हें उन भूमिकाओं के लिए तैयार करना शुरू कर दिया जो मात्र संपदा से संभव नहीं थीं। अरब को अपने आत्मसम्मान और राष्ट्रीय एकजुटता के लिए एक नए नेतृत्व की जरूरत है, यह उसकी सूझ थी। अनुभव, ज्ञान, बुद्धिजीवियों से संपर्क और संवाद के मामले में वह मोहम्मद साहब से बहुत आगे थी। उनके माध्यम से ही वह भारतीय चितन से परिचित रही हो सकती हैं। मोहम्मद साहब उनकी तुलना में कम उम्र के ही नहीं थे, इन सभी दृष्टियों से उनके सामने किसी गिनती में नहीं आते थे। उनकी दौलत ने बाकी कमियों को पूरा कर दिया था। अपने सपने के अनुसार मुहम्मद साहब को तराशने का काम उनको करना था। यह दायित्व उन्होंने पूरी कुशलता से पूरा किया।

धार्मिक आस्था के लोग समझ से परहेज करते हैं, इसलिए वे मान सकते हैं मोहम्मद साहब को अल्लाह ने पैगंबर बनने के लिए भेजा था, परंतु एक इतिहासकार को कारकों, कार्यों और परिणतियों से बाहर जाने की छूट नहीं है, इसलिए उसकी विवशता के कारण वह सच्चाई सामने आ पाती है जो श्रद्धा के अतिरेक से हमारी नजर से ओझल रह जाती है। खादिजा के प्रति धर्मांध मुसलमान भी श्रद्धा रखते होंगे, परंतु उनकी वास्तविक भूमिका को समझने को वे कभी तैयार नहीं हो सकते क्योंकि इससे मोहम्मद साहब की महिमा पर आँच आती है। इतिहासकार के रूप में इस्लाम के विकास को समझने वाले यदि खादिजा की भूमिका को रेखांकित नहीं कर पाते हैं तो वे इतिहासकार नहीं है।

यह ध्यान रखना होगा क कि मोहम्मद साहब में पैगंबरी की संभावनाएं हैं, ऐसी कहानियां उस सौदागरी के साथ आरंभ होती हैं जिस पर मोहम्मद साहब को दूने माल-असबाब के साथ भेजा गया था। उस बीच ही एक सन्यासी या बौद्ध भिक्षु खादिजा को बताता है कि मुहम्मद पैगंबर बनने वाले हैं। हिरा पर्वत की गुफा में साधना के समय खादिजा मोहम्मद साहब के साथ मौजूद रहती हैं। वे विचित्र अनुभव जो उनको पहले इल्हाम के साथ हुए, और उनसे जुड़ी कहानियों के केन्द्र में खादिजा रहती हैं, मोहम्मद साहब निमित्त बने रहते हैं। यह खादिजा ही थीं, जिनका संपर्क हनीफों और ऐसे विद्वानों से था, जिनके सीधे संपर्क में मोहम्मद साहब न आ पाते। यह ध्यान रखना होगा कि उनके चाचा अबू तालिब जो मोहम्मद साहब को हर तरह के संकट से बचाते रहे, मरते दम तक, मोहम्मद साहब के इसरार के बावजूद, इस्लाम कबूल नहीं कर सके। खादिजा के संपर्क में मोहम्मद साहब न आए होते उनकी रुझान इस ओर होती, यह सोचना मुश्किल है।

खादिजा की एक अन्य भूमिका यह थी कि जब जब उनको यह घबराहट होती थी कि कहीं उन पर कोई जिन तो सवार नहीं हो गया है, या वह पागल तो नहीं हो गए हैं, वह उन्हें समझा-बुझाकर एक नई भूमिका के लिए तैयार करने का काम लगातार करती हैं।

एक अन्य पहलू की ओर भी ध्यान देना होगा कि खादिजा के जीवन काल में मोहम्मद साहब के व्यवहार या विचार में उग्रता, मनमौजीपन या हिंसात्मक उपायों का प्रयोग देखने में नहीं आता। उनका सारा प्रयत्न आत्मरक्षात्मक बना रहता है। इसके बाद तरीका बदल जाता है। इसके कुछ और भी कारण हैं, और निश्चय ही उनकी भी एक भूमिका रहती है, फिर भी आरंभ में बहुदेववाद और मूर्ति पूजाके विरुद्ध उन्होंने जो तरीका अपनाया था उसे सत्याग्रह कहा जा सकता है। इस्लाम के इतिहास को समझने के लिए इस पृष्ठभूमि को समझना बहुत जरूरी है।

Post – 2019-06-08

इस्लाम: मजहब या राजनीति

इस बात का निर्णय करना आसान नहीं है कि मुहम्मद साहब एक राजनीतिक नेता थे जिन्होंने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मजहब को हथियार बनाया या धार्मिक रुझान के नेता जिन्होंने राजनीतिक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिया।

उनके व्यक्तित्व के दोनों पक्ष स्पष्ट हैं, परंतु यह आसानी से तय नहीं किया जा सकता कि दोनों पक्षों में किसकी प्रधानता थी।

हमारे सामने एक बात बहुत स्पष्ट है। समाज को किसी विशेष दिशा में ले जाने वाला कोई भी कार्यक्रम आध्यात्मिक नहीं होता, सामाजिक होता है। संगठित धर्मों का एक निश्चित राजनीतिक और सामाजिक लक्ष्य होता है । प्राचीन काल में धर्मनिरपेक्ष चिंतन लगभग असंभव था, इसलिए आंदोलन कोई भी हो, उसको ईश्वर या तत्वज्ञान का सहारा लेना पड़ता था और यह विश्वास पालना पड़ता था कि ईश्वर उसके महान लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होगा। इसलिए आंदोलनकारी का भक्तिभाव भी पाखंड नहीं हुआ करता था। अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठ कर, अपने समाज, देश या मानवता के हित की चिंता करना भी एक उपासना है, और इसलिए अपने आप में एक आध्यात्मिक कार्य है।

मुहम्मद साहब के इलहाम के समय होने वाले अनुभवों को अनेक यूरोपीय विद्वानों ने बीमारी सिद्ध करने का प्रयत्न किया, पर वे भी मानते हैं कि बीमारी के दूसरे लक्षण उनमें न थे। वे उन पर, उस युग में, विचार कर रहे थे, जिसमें जड़वादी भौतिकवाद की तानाशाही थी। मार्क्स का चिंतन और दर्शन भी उसी की उपज था। तब तक परमाणु की आंतरिक संरचना का पता न चला था, जिसका एक घटक इलेक्ट्रान या चालक घटक भी है। योग, दूरानुभूति, सम्मोहन, परानुभूति आदि की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी।

जड़ विज्ञान के प्रकाश से वंचित पूर्वी देशों में इनके प्रति इतना व्यापक विश्वास था कि कोई इन पर संदेह नहीं कर सकता था। सच्चाई दोनों अतियों के बीच थी। यदि मुहम्मद साहब ने अपनी एकांत साधना में बिना किसी गुरु के निर्देशन के योग, या हठयोग की साधना आरंभ की हो तो, सुनते हैं, उसके परिणाम वही होते हैं जो मुहम्मद साहब के मामले में देखने आते हैं।

[[हम अरब संस्कृति को समझने के अपने प्रयत्न में बार-बार भारतीय सादृश्यों का सहारा लेते हैं, जिससे कुछ लोगों को हमारे दृष्टिकोण में भारत-केंद्रिता की सीमा दिखाई देती होगी। ऐसा विशेष रूप से उन लोगों के साथ होगा, जो आज तक इसी तरह के साम्य उल्टी दिशा से दिखाते रहे हैं। हम कोई नई बात नहीं कर रहे है। मात्र दिशा बदल दे रहे हैं या कहें वे सर के बल खडे़ थे; हम उन्हें सीधा खड़ा कर रहे हैं ।

हम ट्रेडविंड और व्यापारिक मार्गों का अनुसरण करते हुए के केवल यह समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं कि व्यापार के साथ एक देश का माल ही दूसरे देश में नहीं जाता, भाषा और संस्कृति भी जाती है, विचार और संस्कार भी फैलते हैं। जब मुहम्मद साहब कहते हैं पूरब से मीठी हवाएं आती हैं , या जब अरब भारत को जन्नतनिशां ( स्वर्गोपम) कह कर याद करते हैं तो यह आने वाले माल से पैदा होने वाली समृद्धि का प्रतीकात्मक आख्यान है। भारतवासियों का अपना विश्वास, ‘धन्यास्तु ते भारत भूमिभागे’ पश्चिम के नव-अर्जित आत्मविश्वास से कुछ ऊँचा ही पड़ेगा और यह आत्मविश्वास कई हजार साल तक बना रहा है जबकि पश्चिम को यह अवसर 4 दिन पहले मिला है। जैसा कि हमने अन्यत्र दिखाया है गीता के भक्ति योग के सूत्र वाक्यों का लगभग जैसे का तैसा कुरान में उल्लेख मात्र संयोग नहीं है। सजदा में अल्लाह के सामने दंडवत बिछ जाना, जानुपात, नमाज की मुद्राएं जिस परंपरा से जुड़ी हैं, वह सामी मजहबों की नहीं है।]]

व्यापारिक यात्राओं पर किशोरावस्था से ही आते-जाते, दूसरे समाजों और मत-मतांतरों के अनुभव और ज्ञान का मुहम्मद के मन पर गहरा असर पड़ा था और वह अपने देश और समाज को उन विकृतियों से मुक्त कराना चाहते थे। यह संकल्प निरंतर इतना दृढ़ होता चला गया था कि इसके लिए कठिन से कठिन संघर्ष करने और कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे। इस सचाई को मजहबी रुझान के लोगों ने मसीहाई अंदाज में पेश करने का प्रयत्न किया है।

धार्मिक विश्वास को औजार बनाने का एक कारण यह लगता है कि अरबों की कबीलाई सीमाओं को देखते हुए वैचारिक आग्रह काम का नहीं हो सकता था, उनको धार्मिक विश्वास और अंंधविश्वास के बल पर ही समझाया जा सकता था। हो सकता है आरंभ में उनकी कोई राजनीतिक आकांक्षा न रही हो; यह धार्मिक सुधार के क्रम मैं जागृत हुई हो, पर इस विषय में मैं बहुत आश्वस्त नहीं हूं क्योंकि उनके सामने अरबों की राजनीतिक अस्थिरता और विदेशियों (रोम, अबीसीनिया और फारस) का बढ़ता हुआ दबाव, और धार्मिक मोर्चे पर सामी – यहूदी और ईसाई – और मज्दावादी अग्निपूजकों – का दबाव था जिसमेे अरबों के कुछ कबीले ईसाई, यहूदी या मज्दावादी हो चुके थे, यद्यपि अपने देववादी स्वभाव के अनुसार उन्होंने इन धर्मों को जिस रूप में अपनाया था, उनमें उनका मूल चरित्र बदल गया था (“Their Christianity was weak and gave place to Judaism.” Cannon Sell, p.2)। बात यहीं तक सीमित नहीं है। वे कुछ आस्था प्रतीकों को देवी या देवता मान कर पूजने और उनकी प्रतिमा मनाने लगे थे, और इनको देववादियों ने भी देवी या देवता मान लिया था, जिसका एक उदाहरण मरियम हैं। [[1]]

[[1]] A national movement required in central authority, a commanding personage, and a religious basis. The tribal sections, the lack of leadership, and the idolatry of Kaaba precluded the realization of these conditions.
The position of the affairs then was such that, If the political existence of Arabia to be saved, a change had to take place. The hour was right for it. A leader was needed who could unite the Arab tribes on religious basis and still preserve their conservative superstitious reverence for the Kaaba and the Hajj or the annual pilgrimages to Mecca. such was the position, when Muhammad was of an age to understand it, and it is no discredit to him that he was a patriotic Arab, desirous see his native land free from the enemies, and thus made united and strong. ib, 5]]

यदि हमारा अनुमान सही है तो यह प्रश्न विचारणीय रह जाता है कि इस आंदोलन की योजना किसकी थी और नेतृत्व का काम किसके हाथ में था और कौन इसमें निमित्त बना?

एक दूसरा प्रश्न, कि यदि राष्ट्रीय सरोकार मोहम्मद साहब के प्रेरक थे तो उनसे भारतीय मुसलमान क्या सीख सकते हैं। देश के प्रति उदासीनता या राष्ट्रनिष्ठा ?

Post – 2019-06-06

इलहाम की इस्लामी अवधारणा

श्रद्धालु और धर्मांध व्यक्तियों के लिए असंभव कुछ नहीं है। जिस बात पर पहले से विश्वास किया जाता है, जो कुछ उनके शास्त्रों, पुराणों और धर्म ग्रंथों में लिखा है वह सत्य है। यदि वह किसी को गलत लगता है, तो गड़बड़ी उसके दिमाग में है।

इस इकहरी सोच के लिए किसी और को दोष देने से पहले अपने इतिहास को ही देंखें तो किसी से शिकायत करने का मौका न रहेगा। आदमी के तीन (त्रिशिरा), चार (चतुरानन), पांच (पंचानन), छह (षडानन). दश (दशानन) मुख हो सकते हैं, चार भुजाएं (चतुर्भुजा, आठ भुजाएं (अष्टभुजा), दश भुजाएं (दशभुजा), हजार भुजाएं (सहस्रबाहु), हो सकती है। यह तो है महज बानगी है।

दूसरों पर हंसने से पहले आईना जरूर देखना चाहिए। यह दूसरी बात है कि इन विचित्रताओं का भारत में एक तार्किक आधार है और इसलिए एक ओर इन पर आंख मूंदकर विश्वास करने वाले लोग हैं, इन प्रतीकों का साहित्य में, कला में उपयोग करने की छूट है, दूसरी ओर इन पर अविश्वास करने की, इनकी आलोचना करने की छूट है, इस आधार पर बीज सत्य तक पहुंचने की छू़ट है, इसलिए ये अनर्गलताएं हमारी जिज्ञासा को खूराक देती हैं। हमें बंद दिमाग का समुदाय होने से बचा लेती है। सामी मजहबों में यह रास्ता बिल्कुल बंद कर दिया गया। बंद दिमाग जिज्ञासा का दरवाजा बंद करने से पैदा होता है ।

कोश ग्रन्थों में इलहाम का अर्थ 1. ईश्वर का शब्द या वाणी 2. देववाणी; आकाशवाणी 3. आत्मा की आवाज़ 4. ईश्वरीय ज्ञान या प्रेरणा 5. आत्मिक दृष्टि मिलता है। इनमें से पहले दो इस्लाम के बाद जोड़े गए नए अर्थ हैं जिनका बाद के उन अर्थों से मेल नहीं बैठता, जो इस शब्द के साथ बाद में जुड़े। हम कह सकते हैं कि इलहाम शब्द इस्लाम के साथ पैदा नहीं हुआ। इसका पुराना अर्थ, इस्लाम के बाद बदल दिया गया। कोशों में हम दोनों को एक साथ पाते हैं जबकि दोनों में कोई समानता नहीं। पुराना अर्थ लगभग वही है जिसे मैं समझता था, लेकिन एक मजहबपरस्त मुसलमान के लिए इसका अर्थ यही नहीं है।

मुझे कई बार पूर्वाभास होता है, जिसमे किसी कार्य का परिणाम पहले ही पता चल जाता है। इसके बाद भी मैं मानता हूं कि जिस दिन इस पर विश्वास करके अपना प्रयत्न छोड़ दूंगा, उस दिन मैं जड़ हो जाऊंगा, इसलिए उस काम को करता अवश्य हूं। कोई कहना चाहे तो मेरे हठ को ही जड़ता कह सकता है, ‘जब बार बार के अनुभव (प्रयोग) से जानते हो कि ये पूर्वाभास गलत नहीं होते तो अपने श्रम और धन की तो बचत कर सकते थे!’

इसमें कारण और कार्य का संबंध न जुड़ पाने के कारण इस पर विश्वास होते हुए भी, इसे मान नहीं पाता। यदि कोई साथ हुआ तो उसे यह बताने का लोभ संवरण नहीं कर पाता कि होना क्या है। साथ जो भी हो, उसे अपने अनुभव का गवाह बनाना चाहता हूं।

मैं अपने एक मुस्लिम मित्र के साथ किसी अधिकारी से, पहले से समय ले कर, मिलने जा रहा था। गाडी़ वह चला रहे थे। बीच रास्ते में मुझे पूर्वाभास हुआ। मैंने परिणाम बताने से पहले भूमिका बांधते हुए कहा, “कभी कभी मुझे इलहाम होता है… इतना सुनते ही उनका चेहरा इस तरह तमतमाया और ह्वील पर हाथ कस गया कि लगा वह गाडी पर अपना नियंत्रण खो देंगे। बहुत मुश्किल से उन्होंने अपने को संभाला। बोले कुछ नही। कुछ देर तक हम दोनों खामोश रहे। यह समझने में उन्हें कुछ समय लगा कि मेरा इरादा क्या था। सुस्थिर होने पर मैंने बताया कि क्या होने वाला है और ठीक वही हुआ भी, पर हममें से किसी ने इस पर बाद में बात न की।

यह पहला अवसर था जब मुझे पता चला कि इलहाम का जो अर्थ मैं जानता था वह गलत है। कोश ग्रंथों में जो अर्थ मिलता है वह सही नहीं है या अंतर्विरोधी है।

इलहाम अंतरानुभूति नहीं है, यह बाहर से आता है। यह पहली बार मुहम्मद साहब को आया था और उसके बाद न तो किसी दूसरे को आया न आ सकता है। यदि कोई व्यक्ति उसका दावा करता है तो कुफ्र करता है। इसका अंतरात्मा से कोई संबंध नहीं। इसे प्राप्त करना मुहम्मद साहब के वश की बात नहीं थी। एक दौर ऐसा था जब वह इससे डरते थे। लगभग तीन साल का ऐसा दौर भी आया जब वह इसके लिए बेचेन रहते थे कि आता क्यों नहीं. फिर भी न आया।

यह एक जटिल अवधारणा है। भूतों प्रेतों की कहानियां अरब जगत में पड़ोसी देशों की तरह प्रचलित थीं। मुहम्मद को जिहाद की अनुभूति प्रेतावेश के रूप में हुई। जिब्रील फरिश्ता इंसानी वेश में हाजिर हुआ था। मोहम्मद को लगा यह कोई प्रेत है। उसने उनसे वह आयत पढ़ने को कहा जो कुरान की पहली आयत बनी। वह नहीं पढ़ पाए तो उसने उन्हें इस तरह दबोचा कि लगा वह पूरी तरह से खाली हो गए हैं और फिर वही पाठ दुहराने के कहा और तीन बार यही दोहराया गया। इसे हम एक इतिहासकार के शब्दों में रखना चाहेंगे और स्थानाभाव के कारण इसका अनुवाद करने का भार पाठकों पर छोड़ना चाहेंगे:
the first revelation came in the Mount of Hira. When Gabriel came and said, ‘Recite, His Lordship answered, ‘I am not a reciter’. Gabriel squeezed him so hard that he thought, his death was near, And again said, ‘Recite.’ On receiving the same answer, The the Angel again pressed the body of his holy and prophetic Lordship. thrice this was done and thrice the command was given. …

When Muhammad awoke from his trance, he was much alarmed. Then Khadija, Knowing what had happened, And hearing him say that he feared, that he was mad, …
Professional Mcdonald (Religious attitude life in Islam, p.33 cited by Sell p.30 ) says that he was subject to fits of some kind, And be open to no doubt. that he was possessed by a jinn ….. was his first thought, and gradually Did he come to the conviction that this was divine inspiration, and not diabolical obsession. … Muir Speak speaking of Muhammad’s ecstatic period, says: ‘Whether they were simple reveries of profound meditation, or swoons connected with a morbid excitability of the mental or physical conditions – or in fine were connected with any measure of supernatural influence – would be difficult to determine.’

यहां तीन बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली यह कि इलहाम को प्रेतावेश, ज्ञानावेश, मनोरुग्णता, या सोचे समझे फरेब के बीच कहीं रखा जा सकता है। मोहम्मद साहब को स्वयं यह पता नहीं था कि उनके साथ शैतान मनुष्य का वेश बनाकर, अपना खेल खेल रहा है, या उन्हें अल्लाह की ओर से संदेश मिल रहा है। विक्षिप्तता, भ्रामक प्रतीति और आत्मनिर्देशन के बीच सीमा रेखा नहीं खींची जा सकती। इलहाम हैल्युसिनेशन (भ्रांति) है, या प्रत्यक्षीकरण यह तय करने में इस्लामी पुराण साहित्य हमारी सहायता नहीं करता।

यदि बहुत पहले से मुहम्मद साहब को पैगंबर बनाने का आयोजन चल रहा था, तो इस अनुभव को उस योजना का हिस्सा माना जाए, या वास्तविकता इस पर विचार किया जाना चाहिए था। परंतु इसकी गुंजाइश सामी मजहबों में ही नहीं, पूरे भक्ति साहित्य में नहीं है।

प्रसंग वश याद दिला दें कि इलहाम के समय वह उत्तेजित हो जाते थे, उनके चेहरे पर मानो खून सवार हो जाता था, जिसे एक श्रद्धालु ने उषा की लालिमा के रूप में कल्पित किया है और जिसके कारण उनके चेहरे से नूर झरने की बात की जाती है। मुहम्मद साहब का चित्र तो बनाया नहीं जा सकता, परंतु दूसरे देवप्रतिम पुरुषों के सिर के पीछे दिखाया जाने वाला आभामंडल उसी की देन है। यह राम, कृष्ण या बुद्ध के साथ नहीं मिलेगा, परंतु नानक जी, कबीर दास और सांई के अंकन के पीछे मिल सकता है।

Post – 2019-06-06

भारत की भाषा नीति और हिंदी

मैं बहुत संक्षेप में अपना मत रखना चाहूंगा:
1. मुझे विश्वास नहीं था की वर्तमान सरकार सांस्कृतिक मोर्चे पर कोई सार्थक कदम उठा पाएगी। इसलिए यह जानकर आश्चर्य हुआ पिछले 3 साल से वह शिक्षा नीति पर गंभीरता से विचार कर रही थी।

2. त्रिभाषा सूत्र दुबारा चर्चा के केंद्र में है। त्रिभाषा सूत्र पर गंभीरता से काम नहीं किया गया। यह आसान काम नहीं है। इसके लिए जिस बड़े पैमाने पर दक्षिण भारत की भाषाएं जानने वाले उत्तर भारतीय विशेषकर हिंदी प्रदेश के लोग तथा उत्तर भारत की भाषाएं जानने वाले दक्षिण भारतीयों की आवश्यकता थी वह कभी तैयार नहीं की गई। उसके सुचारु प्रबंधन के लिए इस योजना पर , चुनौती के अनुरूप, बजट प्रावधान की अपेक्षा थी। वह नहीं किया गया।

3. आज जब रोजगार के नए अवसरों की कमी है इस पर बजट प्रावधान करके दसियों लाख लोगों को काम दिलाया जा सकता है और इस समस्या का सामना करने की इच्छाशक्ति दिखाई जा सकती थी। अभी तक यह सूत्र किसी भारतीय भाषा को राष्ट्रभाषा बनने से वंचित रखने, और अंग्रेजी को अनंत काल तक सरकारी भाषा बनाए रखने के लिए एक भ्रम जाल सा था। कभी किसी ने नहीं चाहा इस पर अमल किया जाए।

4. मोदी के कारण कुछ ऐसी चीजें सचमुच मुमकिन हुई हैं जिनके वादे किए जाते थे पर पूरा नहीं किया जाता था। इनमें एक रैंक एक पेंशन का प्रस्ताव भी था, जो इतने भारी धन की अपेक्षा रखता था कि कभी किसी ने पूरा नहीं किया। मोदी ने अल्पतम समय में इसे कर दिखाया। मैं यहां पहले असंभव मानी जाने वाली और मोदी के द्वारा कार्य रूप में परिणत की जाने वाली योजनाओं की तालिका देना नहीं चाहता, परंतु मोदी है तो मुमकिन है के नारे को देश ने चुनावी लफ्फाजी नहीं माना। विश्वास के स्तर पर यह जीत राजनैतिक सत्ता की जीत से कहीं बड़ी है। इसलिए मैं मांगता हूं मोदी हैं तो त्रिभाषा फार्मूले पर अमल भी मुमकिन है।

5. इसमें एक नया पहलू जुड़ गया है कि दक्षिण के लोगों के लिए हिंदी को अनिवार्य भाषा न रख कर वैकल्पिक भाषा बनाया जाना चाहिए। इस पर कुछ लोगों ने अपनी चिंता और यह आशंका प्रकट की है कि इस तरह हिंदी कभी राजभाषा नहीं बन पाएगी।

6. तमिलनाडु की राजनीति हिंदी विरोध पर पलती रही है। वहां के दोनों दल त्रिभाषा फार्मूले के पुराने रूप का विरोध करने के मामले में एक दूसरे से आगे बढ़ने के प्रयत्न में इसे पहले से भी अधिक उग्र बनाएंगे, इसमें कोई संदेश नहीं। किसी चीज को अनिवार्य बना कर उसे लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता। इसलिए अनिवार्यता ऊपर से थोपने का पर्याय है। तमिलनाडु की राजनीति इसी का लाभ उठा सकती है। अनिवार्यता समाप्त करके उनको उत्तर दिया जा सकता है।

7. प्रकाश जावडेकर का यह कथन कोई चीज थोपी नहीं जाएगी, दूरदर्शिता पूर्ण है। इसी दशा में विभाषा सूत्र पर काम किया जा सकता है। त्रिभाषा अनिवार्य, सभी को तीसरी भाषा के रूप में किसी भी भारतीय भाषा को सीखने की पूरी छूट हो, परंतु त्रिभाषा के सिद्धांत से हटने की छूट नहीं । अनिवार्यता हट जाने के बाद, परिणाम हिंदी को अनिवार्य बनाने से अधिक सुखद होंगे, यह मेरा विश्वास है। यदि कोई एक भारतीय भाषा सीखनी ही है तो वह कौन सी हो तो अधिक लाभ होगा, यह निर्णय बहुत आसान है। इसके बहुत कम अपवाद सामने आएंगे और वे भी बहुत इष्टकर होंगे।

8. सबसे पहले इसकी तैयारी अर्थात् इसके लिए अपेक्षित संख्या में शिक्षक उपलब्ध हो सकें इस दिशा में काम करना होगा । यह भी कौशल विकास जैसा ही चुनौती भरा कार्य है।

भारत सरकार ने इस बीच लोगों के मत जानने के लिए अपना दरवाजा खोल रखा है। यदि आप इससे सहमत हों तो स्वयं ऐसा सुझाव सरकार को भेजें या इसे अपनी पोस्ट बनाकर दूसरों को फारवर्ड करें। मोदी है तो मुमकिन है, क्योंकि उसे कम से कम 29 तक रहना है। समय भी है। संकल्प भी है।

Post – 2019-06-04

#इल्हाम_और_जिहाद

मुझे संदेह है कोई हिंदू इलहाम और जिहाद का सही मतलब जानता होगा। इसे आप मेरे अज्ञान का विस्तार मान सकते हैं। मैं इलहाम का अर्थ अंतःप्रज्ञा या अंतरानुभूति या पूर्वानुभूति मानने की गलती करता रहा हूं।

जिहाद के नाम पर जो कुछ हुआ और जो किया जाता है उससे जो धारणा बनती है उसे ही हम इसका अर्थ समझ लेते हैं। जिहाद इस्लाम-पूर्व की अवधारणा है, जैसे रमजान के महीने की तपश्चर्या और प्रायश्चित्त/ आत्मशुद्धि की प्रथा पुरानी है। तब जिहाद का अर्थ था, आत्मशुद्धि को अमल में लाते हुए अपने मनोविकारों पर विजय प्राप्त करना। इंसानियत के लिए नेक काम (दान-पुण्य) करना। यह भारतीय आत्मविजय, इंद्रिय विजय का अरबी संस्करण था।

इस्लाम के बाद इसका अर्थ बदल कर जहालत में पड़े हुए लोगों को अल्लाह के रास्ते पर लाने के लिए जो कुछ भी करना पड़े करते हुए एक भला काम करना। इस आवेश में जितने नरसंहार, जिसने युद्ध, जितने बलात्कार, जितने फरेब, जितने विश्वासघात, किए गए सभी पवित्र काम थे और जिहाद को अपने अनुभव से हम इसी रूप में जानते हैं।

नेक दिल समझे जाने वाले भारतीय मुसलमान समझाते हैं, नहीं साहब, जिहाद बुरी चीज नहीं है, ये लड़के इसका मतलब नहीं समझ पाते। वे तफसील में जाकर बताते हैं जिहादे-अकबर और जिहादे-असगर का भेद , परंतु यह भुला देते हैं कि आत्मविजय और पुण्य का काम जाहिलिया के दौर का आचरण था जिसे मुहम्मद साहब ने उलट दिया, और जिस रूप में अमल में लाए, उसी रूप में वे अमल में लाते हैं जिन्हें वे सार्वजनिक रूप से सिरफिरा बता कर इस्लाम के प्रति सहानुभूति पैदा करते हैं, और आंतरिक संवाद में मानते हैं कि वे ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं जो मुहम्मद साहब के आचरण के विरुद्ध हो, और इस तरह सार्वजनिक रूप में जिसकी निंदा करते हैं, आपसी संवाद में यह जानते हुए कि तरीका गलत है, इससे परहेज किया जाना चाहिए, उसे गलत नहीं ठहरा पाते, और यदि उनकी संतानों में कोई इस राह पर निकल जाए तो उसे समझा नहीं पाते कि वह गलत रास्ते पर जा रहा है। वे यह भी नहीं समझ पाते कि जिसे वे आदर्श जिहाद कहते हैं, वह उस आदर्श अवस्था में अमल में लाया जाता था जिसे वे जाहिलिया कहते हैं, और उसे यह प्रेरणा भारतीय तपश्चर्या/ आत्म शुद्धि/ प्रायश्चित और आत्मविजय और दान-पुण्य से मिली हो सकती है।

जिस तरह का घालमेल जिहाद के मामले में हुआ, उसी तरह का घालमेल इलहाम के मामले में हुआ, क्योंकि, आत्मा, अंतः चेतना, अंतः प्रज्ञा की अवधारणा सामी जगत में नहीं थी। (जारी)

Post – 2019-06-03

#मुहम्मद_का_पैगंबर बनना

मुहम्मद साहब के चाचा अबू तालिब पहले भी धनी नहीं थे, उनके बाल बच्चों की तादाद बढ़ने के साथ भतीजे का बोझ भारी लगने लगा। उन्होंने मुहम्मद से कोई काम धंधा शुरू करने की सलाह दी। इस समय तक मुहम्मद साहब की उम्र 25 साल हो चुकी थी। उन्होंने एक मालदार विधवा खादिजा से संपर्क करने की सलाह दी जिसके काफिले दूरदराज तक जाते रहते थे। मोहम्मद साहब ने जब उनसे मुलाकात की तब तक वह उनकी ईमानदारी के चर्चे सुन चुकी थीं। उन्होंने दूसरों के मुकाबले दूने बड़े काफिले का भार उन्हें सौंपा जो सीरिया जाने वाला था।

मक्का से सीरिया की दूरी 2000 किलोमीटर से अधिक है। इतनी लंबी यात्राओं के दौरान मनुष्य को कितने तरह के लोगों, परेशानियों, मत मतांतरों और विचारों से पाला पड़ता है, यह अनुभव से ही जाना जा सकता है।

इसी यात्रा के दौरान वह व्यक्तिगत रूप से यहूदियों और ईसाइयों के सीधे संपर्क में आए। उन्होंने मुहम्मद साहब के साथ बहुत दोस्ताना सलूक किया था। मुहम्मद साहब की ईमानदारी के कारण इस बार खादिजा को बहुत मुनाफ़ा हुआ। उन्हें शादी के प्रस्ताव मिलते रहे थे जिन्हें वह ठुकराती आई थीं। परंतु मोहम्मद को उन्होंने स्वयं शादी का प्रस्ताव भेजा जिसे उन्होंने कबूल कर लिया। इसके बाद से दौलत, शोहरत और सूझ के संयोग से उनके जीवन में ऐसे बदलाव आने आरंभ हुए जिन्होंने उन्हें पैगंबर बना दिया।

यूं तो चमत्कार की कहानियां बचपन से ही उनके जीवन से जुड़ी मिलती हैं परंतु मुहम्मद को पहली बार यह सूचना खादिजा ने अपनी बहन वरक़ा के माध्यम से पहुँचाई थी कि जब वह सौदागरी पर निकले थे तो एक भिक्षु ने उनसे कहा था, मोहम्मद पैगंबर बनने वाले हैं। एक दूसरी बात खादिजा के संदर्भ में उल्लेखनीय है। उनके पहले से कुछ एकेश्वरवादियों से संपर्क थे जो बहुदेववाद और मूर्तिपूजा से परहेज करते थे। इन्हें हनीफ (अडिग श्रद्धालु) कहा जाता था। कुरान में हनीफ विशेषण का प्रयोग इब्राहिम के लिए हुआ है। उनके संपर्क का भी मोहम्मद साहब के विचारों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

उनके पैगंबर बनने से एक तपस्या भी जुड़ी हुई है। मक्का से पांच किलोमीटर दूर हिरापहाड़ की गुफाओं में भारत की तरह एकांतवास और साधना की परंपरा भी प्रचलित थी।[]

[] क्या आप ने कभी कहानियों के उस तोते के नाम पर ध्यान दिया हैं जिसमें मानवभक्षी दैत्य के प्राण बसते थे, जिसका रहस्य किसी को मालूम था तो राक्षस की लड़की को। उसे असंभव को संभव करने को निकले राजकुमार से प्रेम हो जाता है। वह उसे छिपा कर रखती है. और अंत में उस दैत्य के मरने का उपाय भी बता देती है। उस तोते का नाम हिरामन तोता है जिसका एक अर्थ हिरा पर्वत की कंदरा में ध्यानस्थ व्यक्ति हो सकता है।[]

इसे रमजान के बाद तहन्नुफ या आत्मशुद्धि के लिए किया जाता था। मुहम्मद साहब ने भी यह साधना की। उनके लिए इसका एक आकर्षण यह भी था कि उसी पहाड़ पर ज़ैद बिन अम्र भी साधना करते थे जिनके लिए उनके मन में बहुत आदर था। एक बार उनके सपने में मनुष्य के वेश में फरिश्ता जिब्रील (Gabriel) प्रकट हुए और उनसे एक सूरा पढ़ने को कहा। उन पर पहली बार सूरा के आयत होने का इतना गहरा असर हुआ कि वह लगभग विक्षिप्त से होकर गुफा से बाहर निकल गए। लगा वह आत्महत्या कर लेंगे। इस तरह वह मुहम्मद बन कर गुफा में गए थे, रसूल बन कर बाहर निकले।

जैसे ब्राह्मणों को यह खयाल था कि वेद सृष्टि के आदि से हैं उसी तरह मुसलमानों का भी यह खयाल है कि कुरान अल्लाह के मुंह से निकला वचन है जो अनश्वर तख्ते पर लिखा था। उसे जिब्रील ने सातवें आसमान से लेकर सबसे निचले आसमान में अज्मत के मंदिर में संग्रहीत कर दिया और उसी के सूरे वह साल-दर-साल समय समय पर मुहम्मद साहब को सुनाते रहे।

अब यहां एक समस्या खड़ी होती है। यदि कुरान अल्लाह का आदिकाल का वचन है, ईश्वर का सबसे नया संदेश कैसे हो गया? वैदिक ऋषियों को मंत्रों का रचनाकार न मानकर मंत्रों का द्रष्टा, धर्म का साक्षात्कार करनेवाला करने वाला कहा गया हा है। वसिष्ट ने अपने किसी पूर्व जन्म में असाधारण विद्युत ज्योति प्राप्त की थी (विद्युतो ज्योतिः परि संजिहानं मित्रावरुणा यदपश्यतां त्वा । तत्ते जन्मोतैकं वसिष्ठागस्त्यो यत्त्वा विशाजभार । 7.33.10) और मूसा सिनाई पर्वत पर दश महादेशों का साक्षात्कार करते है, जिब्रील उन्हें अज्मत के मंदिर में लाकर इकट्ठा करते और जरूरते नागहानी मुहम्मद साहब को सुनाते हैं। एक ही ईंट गारा से मामूली फेरबदल से अपने मत को आप्तता देने के लिए प्रयोग में आता है। ऋग्वेद के सृष्टि के आदि में रचे जाने के विश्वास की व्याख्या संभव है। अन्यत्र इसका प्रयत्न भी किया है। परन्तु सामी परंपराओं में विचार के लिए जगह ही नहीं है।

अपने निजी जीवन में वह सामान्य जनों जैसे ही थे। उन्हें खादिजा से छह संतानें प्राप्त हुईं। पहला पुत्र कासिम 2 साल की उम्र में मर गया। चार बेटियों – जैनब, रुकैया, फातिमा और उम्म खुल्तून – के बाद उनका सबसे छोटा पुत्र आबिद मिनाफ पैदा हुआ जो शैशव में ही चल बसा। जिंदगी के सुख दुख में वह दूसरों से अलग नहीं थे।

काबा के पत्थर के प्रति पैगंबर के आदर पर ताबिश सिद्दीकी, (इस्लाम का इतिहास) की टिप्पणी निम्न प्रकार है:

“सबसे पहली बात जो इसमें ध्यान देने योग्य है, वो ये कि इस पत्थर का कोई भी ज़िक्र कुरान में नहीं आया है. ये सबसे अहम् हिस्सा है, जिस पर सबसे पहले गौर करना चाहिए. इसका ज़िक्र कुरान में न होना इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि इस पत्थर को पूज्य या तो पैगंबर के इस दुनिया से जाने के कुछ ही दिनों पहले के दिनों में बनाया गया या फिर जाने के बाद. इसका ज़िक्र कुरान में न होकर सिर्फ हदीसों में मिलता है. और हदीसें बस कही-कहाई बातें हैं, जिनका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है. इसी वजह से हदीसों में क्या सच है, क्या झूठ कोई बिलकुल दावे से नहीं बता सकता है.”

इसके बाद वह उन कहानियों का जिक्र करते हैं जो हदीसों में इस संबंध में दी गई हैं। उस विस्तार में जाने का साहस हम अपनी सीमा के कारण नहीं कर सकते , परंतु यह सवाल कर सकते हैं कि इस्लाम से पहले के ज्ञान के सभी स्रोतों को नष्ट कर दिए जाने के बाद लोगों की याददाश्त में और दूसरे मजहबों और परंपराओं में जो कुछ बचा रह गया था उसके आधार पर और पुरातत्व की सहायता से इस्लाम पूर्व अरब को समझने प्रयत्न किया गया है। कुरान की आप्तता पर आंख मूंदकर विश्वास करने वाला, इस बात का प्रमाण नहीं दे सकता कि इसका लेखन मोहम्मद साहब के जीवन काल में हुआ था। वर्तमान कुरान मुहम्मद साहब से इंतकाल के बाद तीसरे खलीफा खलीफा उस्मान के समय में तैयार किया गया माना जाता है [The Quran as it is known in the present, was first compiled into book format by Zayd ibn Thabit and other scribes under the third caliph Uthman (r. 644–56, Wikipedia, Histroy of Quran]

महत्वपूर्ण बात चह है कि मुहम्मद साहब ने अरब समाज की अधिकांश ऐसी रीतियों और विश्वासों के साथ छेड़छाड़ नहीं की थी जिनमें अधिकांश अरबों की श्रद्धा थी, जिनमें आत्मशुद्धि के लिए रोजा, रमजान माह की पवित्रता, हज आदि आते हैं । काले पत्थर के साथ भी ऐसा ही था। काबा की पवित्रता उससे जुड़ी थी। पहले दीवार ऊंची न थी इसलिए परिक्रमा करते हुए उसे आसानी से देखा जा सकता था। दीवार ऊंची की जाने लगी तो इस बात को लेकर झगड़ा हो गया और इसे मुहम्मद साहब ने ही निपटाते हुए पूरब के कोने की दीवार में रखवाया था।

यह संभव है कि जैसे हमारे तीर्थ तीर्थ स्थानों पर जैसे कई तरह के कदाचार पनपते रहे हैं उसी तरह की स्थिति मक्का की भी रही हो जिसे इस्लाम से पहले की अधोगति को दर्शाने के लिए अतिरंजित रूप में दिखाया जाता
है। जिस सच्चाई को छुपाया जाता है, वह यह कि अरब में धार्मिक कट्टरता का अभाव था जिसका आरंभ इस्लाम के साथ हुआ, परंतु हुआ यहूदियों और ईसाइयों की नकल करने के कारण। यहूदियों को पश्चिमी जगत में मजहब का ही जन्मदाता नहीं, मजहबी कट्टरता अभी जन्मदाता कहा जा सकता है।

सामी, या इब्रानी मजहबों की प्रेरणा का सर्वमान्य स्रोत एक है। इनकी मूल्य व्यवस्था तथा विधि विधान तथा पुराण कथाओं मे भी गहरी समानताएं हैं। यहां तक कि एक किंबदंती के अनुसार स्वयं मोहम्मद साहब इब्राहिम के पुत्र इस्माइल के पुत्र सिद्ध किए जाते रहे हैं। इन समानताओं में बकरीद (ईदुल अजहा) जैसे त्योहारों और हिजाब की पाबंदी, खतना, जालीदार टोपी (स्कल कैप) के साथ अपने को छोड़ कर शेष जगत को जाहिल, कुरीतियो से ग्रस्त, अधम मानने की प्रवृत्ति भी शामिल है। ईसाई और यहूदी विश्वासों की बहुत सी बातें हैं प्रचारकों के माध्यम से उनके विश्वास का हिस्सा बन चुकी थीं।

आधुनिक जगत में मजहब को लेकर सारे कलह, फसाद और युद्ध सबसे पहले इब्रानी मजहबों के बीच हुए और बाद मे भी सबसे उग्र इन्हीं के बीच बने रहे, यद्यपि खुदाई किताब पर विश्वास करने के कारण ये एक दूसरे को अपने निकट मानते रहे हैं। दूसरे मत-मतातरों के लोगों के साथ टकराव और फसाद इन्हीं के विस्तार की सनक के परिणाम हैं। पांचवी शताब्दी से आरंभ होने वाले लगभग 1000 साल में पोप तांत्रिक ईसाइयत यहूदियों से भी आगे बढ़ गई। हमने 3 जनवरी 2016 को फेसबुक पर अपनी पोस्ट में ईसाई कट्टरता के कारण यूरोप में आए अंधकार युग के विषय में विस्तार से लिखा था। 15वीं और 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली मिशनरियों के द्वारा जो अत्याचार किए गए, इसकी चर्चा अन्यत्र कर आए हैं। उसी दौर में इसी पागलपन में स्पेनी ईसाइयों ने अमेरिका की माया सभ्यता का सर्वनाश कर दिया।

इससे या प्रकट होता है स्वयं मोहम्मद साहब के जीवन, आदर्श और व्यवहार में यहूदियों और ईसाइयों का बहुत गहरा प्रभाव रहा है, और इस्लाम की अधिकांश विकृतियां, जिन पर मुसलमान गर्व करते रहे हैं, उन्हीं के कारण पैदा हुईं। इस पृष्ठभूमि को समझे बिना हम न तो मोहम्मद साहब की जीवन को समझ सकते हैं नहीं कुरान के अंतर्विरोध को न ही इस्लाम के द्वारा आधुनिक विश्व में चलते रहने वाले उपद्रवों को।

Post – 2019-06-02

वह आदमी ही आदमी कुछ कुछ लगा मुझको
कहता था जो इंसानियत से दूर बहुत हूँं।

Post – 2019-06-01

जिन्हें हम देख कर डरते थे, अब पहचान लेते हैं

यह दुर्भाग्य की बात है कि हम एक राष्ट्र के रूप में #स्मृतिलोप की उस अवस्था में पहुंच गए हैं, जिसमें हम दूसरों से पूछते हैं कि हम कौन हैं? हमारा नाम क्या है? जो कुछ सुनते हैं उस पर विश्वास नहीं कर पाते। जो कुछ देखते हैं, वह बेतरतीब लगता है। जो कुछ अपनी धुंधली चेतना से याद करते हैं, वह अविश्वसनीय लगता है।

गुलामों की #प्रतिरोध-क्षमता को नष्ट करने के लिए, उन पर राज करने वालों को उनकी चेतना को नष्ट करना होता है। इतिहास को विकृत करते हुए हमारे साथ यही किया गया।

गुलामों को कोड़ा मारने वाले गुलाम और हाथियों का शिकार करने वाले हाथी पाल-पोस कर रखे जाते हैं, उनका रुतबा ऊंचा होता है, परंतु वे मालिकों के काम के होते हैं अपनी बिरादरी के काम के नहीं।

यही हाल हमारे बुद्धिजीवियों का है। उनको जिस भाषा में, जिस ज्ञानाभासी शिक्षा सामग्री और शिक्षा प्रणाली के द्वारा अपने उपयोग के लिए मालिकों ने तैयार किया और विदा होते हुए, जिसे अपने स्वामिभक्त गुलामों को सौंप कर चले गए, वे भी उसी पद्धति पर काम करते रहे। उनका ही ज्ञान जगत पर साम्राज्य है, वे अपने समाज की याददाश्त की वापसी से घबराते है। वे अपने इतिहास को जानने से घबराते हैं।

उनकी सूचना बहुलता के आतंक में शिक्षित व्यक्तियों से उस इतिहास की बात करो जो आपकी अपनी पहचान और आत्माभिमान को वापस ला सकता है, जिनका प्रमाण आपके पास है और अपने पवित्र अज्ञान के कारण इसका खंडन नहीं कर सकते, तो आपका खंडन करने का एक उपयोगितावादी तर्क तलाश लेते हैं, ‘मान लिया आप जो कहते हैं वह सही है, परंतु हमें इससे आज क्या लाभ जब पश्चिम हमारे गौरव काल से इतना आगे बढ़ चुका है जितना तिल से ताड़?’

आप यह भूल जाते हैं कि यही प्रश्न स्मृतिलोप के शिकार हुए व्यक्ति से करने वाले को आप उस शठयंत्र का हिस्सा मानेगे या नहीं जिसकी दवाओं में मिले जहर से उसका स्मृतिह्रास और स्मृतिलोप हुआ है।

जब तक आप ऐसा नहीं कर पाते हैं तब तक आपको ऐसे लोगों से निवेदन करना चाहिए, ‘ हुजूर, आप बजा फरमाते हैं। पर मुझे समझाइए ताड़ बन चुके देशों के लोग ताड़ से उतर कर तिल का सूक्ष्मदर्शी लगाकर अध्ययन करने का प्रयत्न क्यों करते हैं , सूक्ष्मदर्शी को दूरदर्शी चेहरे पर लगाकर क्यों देखते हैं? इस शरारत की ओर आपका ध्यान क्यों नहीं जाता कि जिनके पास , आप की तुलना में उनके भौगोलिक क्षेत्र में अपार अवसर उपलब्ध हैं वे पिछड़ी दुनिया को समझने के लिए क्यों निकल पड़ते हैं और आप अपने को समझने से इतना घबराते क्यों है?

कहना चाहिए कि आप आजाद होने से डरते हैं। आजादी का रास्ता इतिहास के गहन अध्ययन और बोध से खुलता है, अपनी याददाश्त वापस लाने से खुलता है, और उधार ली हुई अक्ल से काम लेने पर बन्द हो जाता है।

एक दूसरा हीनता बोध उसी चेतना के अंतर्गत पनपाया गया है । यह है अपने प्राचीन ऐतिहासिक सत्य को उद्घाटित करने वालों की विश्वसनीयता को समाप्त करना और यह आरोप लगाना कि वे अपनी आत्मासक्ति के कारण, अन्य सभ्यताओं के योगदान को समझ नहीं पाते और सभी विकासों का उद्भव भारत को सिद्ध करना चाहते हैं और कृतियों तथा घटनाओं की काल रेखा को पीछे खिसका कर अधिक प्राचीनता का दम भरना चाहते हैं।

ये दोनों अर्धसत्य हैं। अर्धसत्य न सही होता है न गलत होता है, वह चुनिन्दा तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर रचा गया एक भ्रम या प्रतीति होता है। हमारा मानसिक पर्यावरण इसी से निर्मित हुआ।

इतिहास पर लिखते हुए मेरी अंतश्चेतना में यह पर्यावरण लगातार उपस्थित रहता है, और इसलिए समय-समय पर मुझे इतिहास और इतिहासबोध के महत्व को याद दिलाना पड़ता है जो एक टेक सा बन गया है।

जब मैं प्राचीन अरब के विषय में बात करते हुए यह याद दिला रहा था कि हड़प्पा के व्यापारियों का लघु एशिया पर्यंत भू भाग पर गहरा असर था, और यह लगातार 17 वीं शताब्दी तक बना रहा था तो आप में से कुछ को अतिरंजना की आशंका हुई होगी और कुछ को ‘गई भैंस पानी में’ का मुहावरा याद आया होगा।

मुझे एक साथ आपके सिखाए हुए ज्ञान की सीमा से भी लड़ना होता है, और प्रमाण के साथ अपनी बात कहने के बाद भी आपके अविश्वास से भी लड़ना होता है जिसे वस्तुपरक ज्ञान का निकष बना दिया गया है। इसलिए यहां दो तथ्यों की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं।

अरब जहां से इतिहास में याद किए जाने लगते हैं, वे बहुत सफल सौदागरों के रूप में याद किए जाते हैं। मक्का का जो व्यापारिक आधार हमने अपनी पिछली पोस्ट में चित्रित किया है उसमें भी वह सौदागरों के रूप में दिखाए गए हैं। आपको यह सवाल तो अपने आप से पूछना ही चाहिए कि अरब में खजूर को छोड़कर क्या पैदा होता था जिसे दूर दूर तक वे पहुंचाते थे ? यदि इसमें विविधता थी तो यह कहां का माल था जिसके अरब में दाखिल होने पर उस पर आयात कर भी लगाया जाता था? वह कहां से आता था? जिधर जाता था उधर से तो नहीं आता रहा होगा। जो व्यापारिक मार्ग सक्रिय दिखाई देता है, भारत की ओर से आता है यह नतीजा निकालने में आपको अपना दिमाग अधिक खरोंचना नहीं पड़ेगा।

दूसरा उदाहरण लीजिए। आपने अलिफ लैला की हजार दास्तान, या अरैबिएन नाइट्स का नाम तो सुना होगा और यह भी जानते होंगे कि यह पंचतंत्र की प्रेरणा से, किस्से में से किस्सा गढ़ने का प्रयोग था। आपने सिंदबाद और हिंद बाद की कहानियां भी सुनी होंगी। कभी यह सोचा यह दोनों नाम सिंध के साथ क्यों जुड़े हैं। सौदागरों के भाग्य का सारा खेल भारत पहुंचने और भारतीय समृद्धि से लाभान्वित होने तक ही क्यों सिमटा है?

इतिहास की खोज, उसकी सच्चाई तक पहुंचने का प्रयास, इतने धागों से जुड़ने की मांग करता है जिसकी ओर किताबी ज्ञान रखने वालों का ध्यान नहीं जाता।

हमारे प्रख्यात इतिहासकारों का किताबी ज्ञान सराहनीय है, परंतु उनके पास यह समझ नहीं है कि उसका कितना कूड़ा और योजनाबद्ध रूप में तैयार किया और कितनी सावधानी से पैक किया गया है। पैकिंग के ऊपर बारीक अक्षरों में लिखा है, ‘केवल भारत के लिए।’

Post – 2019-05-31

ः#इस्लामपूर्व_अरब_और_भारत

मुहम्मद साहब अब्दुल्ला की पत्नी अमीना के पुत्र थे। पिता की मृत्यु उनके जन्म से पहले ही हो गई थी। अपने पीछे एक मकान, कुछ ऊंट, और एक गुलाम लड़की छोड़ गए थे। उनका जन्म 20 अगस्त 570 को हुआ। इसकी सूचना उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब को मिली तो वह उन्हें काबा में देवताओं को धन्यवाद के लिए ले गए और उनका नाम वहीं पर मुहम्मद रखा। उन दिनों शरीफ घरों की महिलाएं अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाती थीं, इसके लिए दाई का इंतजाम किया जाता था। उनको बानी सईद कबीले की हलीमा नाम की दाई ने पाला पोसा। दो साल की उम्र के बाद जब मुहम्मद को वह उनकी मां के पास लेकर गई तो उनके स्वास्थ्य को देखते हुए मां को इतनी प्रसन्नता हुई कि उन्होंने आगे के पालन पोषण के लिए उसी के हवाले कर दिया। दो साल और गुजरने के बाद हलीमा बच्चे को लेकर फिर मक्का आई। मां ने उसे फिर रेगिस्तानी जिंदगी के लिए उसके हवाले कर दिया। 1 साल और बीत जाने के बाद वह तीसरी बार बच्चे को लेकर मक्का, अमीना के पास आई। छह साल की उम्र होने पर मां के साथ अपने ननिहाल, मदीना आए और उस मकान में जिसमें उनके पिता की मृत्यु हुई थी, 1 माह का समय बिताया। वहां से लौटते समय उनकी माता की रास्ते में ही अबवा में मौत हो गई। उनके पिताजी का दासी उन्हें लेकर अब्दुल मुत्तलिब के पास आई जिनकी उम्र इस समय तक 80 हो गई थी। 2 साल तक उनकी देख रेख में वही दासी देखभाल करती रही। इसके बाद दादाजी का भी इंतकाल हो गया। मौत से पहले उन्होंने मुहम्मद की देखभाल की जिम्मेदारी उनके चाचा अबू तालिब को सौंप दी थी जिसे उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाया। बारह साल की उम्र में वह अपने चाचा के साथ एक सौदागरी पर सीरिया गए। जैसा कि सभी अवतारी पुरुषों के साथ होता है मुहम्मद साहब के जीवन में भी बचपन से लेकर अंततक चमत्कारपूर्ण किंबदंतियाँ जुड़ी हुई है।

एक बार कुरैश कबीले और बानी हवाजीन कबीले के बीच 4 साल तक खूनी जंगे फिज्र भी चली जिसमें अपने चाचा के साथ मुहम्मद साहब भी पहुंचे तो पर किसी ओर से भाग नहीं लिया। [ कुरेशी बानी किनान के ही खानदान के थे। बानी किनान की छह संतानों में एक का नाम फिह्र था जिनकी सौदागरी में रुचि थी इसलिए उनका उपनाम कुरेश (करश का अर्थ है आवागमन, चलन्तू। सं. भाषियों के उत्तरी अरब में प्रभाव के कारण अरबी शब्दभंडार पर संस्कृत का काफी गहरा प्रभाव पड़ा है। चर>कर, कार> फा. कारवांां> कारूं का खजाना )।]

इसी कुरैशी वंश में जो मक्का का स्थाई निवासी था, जिसकी माली हालत काफी अच्छी थी, मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था, यद्यपि उनके परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती।

तकरार के खत्म होने के बाद आपसी झगड़े फसाद निपटाने, बेकसूर को बचाने और अन्याय करने वाले को दंडित करने तथा शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए हिल्फुल-फुजूल नाम का एक संगठन बना।

यह जानना उपयोगी हो सकता है कि इस समय तक जब मुहम्मद साहब ने अपने लिए किसी नई भूमिका की कल्पना भी नहीं की थी, मक्का की, और पूरे अरब की, जिसे बाद में जाहिलिया से ग्रस्त बताया जाता रहा, क्या दशा थी।

मक्का में कई तरह के व्यापार चलते थे, आयात पर कर वसूल किया जाता था और व्यापारियों के काफिले दूर-दूर तक यात्रा करते थे। मुहम्मद साहब ऐसी यात्राओं पर समय-समय पर जाते रहे और औपचारिक शिक्षा के बिना भी तरह तरह के लोगों के संपर्क में आने के कारण उनको बहुत सी ऐसी जानकारियां सुलभ थीं जो पढ़े लिखे लोगों को प्राप्त नहीं हो पातीं।
[उनके आरंभिक जीवन की परिस्थितियों और उपलब्ध विवरणों से लगता है, वह सचमुच निरक्षर थे। काफिलों के साथ जुड़े रहने के कारण अनेक देशों और समुदायों के सभी स्तरों के लोगों से और उनकी विविध गतिविधियों परिचय ने उनको तत्वज्ञानी बना दिया था।]

कहें, वह भले कागज के कोरे रहे हों पर लोकानुभव और व्यवहार बुद्धि में प्रखर थे। पुरानी पीढी के भारतीय व्यापारी गिनती, जोड़, गुणा और अक्षरज्ञान से आगे की शिक्षा को अधिक महत्व नहीं दिया करते थे और व्यवहार बुद्धि का हाल यह कि वे राजतंत्र के समानांतर अर्थतंत्र चलाते थे। यह नियम अरबों पर भी लागू माना जा सकता है।

व्यापारियों की हालत अच्छी थी और मक्का के लोग खुशहाल थे । लोग भूत-प्रेत में विश्वास करते थे। भूत-प्रेत और देवी-देवताओं से ऊपर एक परमेश्वर की अवधारणा थी, जिसे वे अल्लाह कहते थे। परंतु वे पैगंबरों के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। मूर्ति पूजा करने वाले मूर्ति में किसी देवता की प्रतिष्ठा मानते थे, फिर भी यह मानते थे कि समस्त सृष्टि का कर्ता एक है।

इस्लाम से पहले की अरब की धार्मिक मान्यताएं और नीतियां भारत से कितनी समानता रखती थीं इसके विस्तार में स्वयं न जाकर हम अपने पाठकों का ध्यान नीचे की टिप्पणी की ओर दिलाना और इनसे मिलते जुलते भारतीय प्रतिरूपों से इनका मिलान करने का अनुरोध करेंगे। लोगों को किसी भी मजहब को अपनाने, किसी भी देवता-देवी को मानने की आजादी थी। ईसाइयों और यहूदियों को अपने मजहब और रीति रिवाज का पालन करने की पूरी छूट थी और किसी को, किसी मत और मान्यता से शिकायत नहीं थी।
[The Arabs adored many gods. The belief in the influence of jinn was common, yet call above the jinn, above all the gods in the Kaaba, there was the Supreme One, Allah, the God. Masudi tells us that in the days of Ignorance, as the pre-Islamic times are called, some of the Quraish also proclaimed the unity of God, affirmed the existence of one Creator, and believed in the resurrection, whilst others denied the existence of Prophets and were attached to idolatry. Many of the people Look upon the idols as intercessors with one God. Still the doctrine of unity of God was not altogether unknown to the Arabs. Cannon Sell, 1913, The Life of Muhammad, www. muhammadism.org. 2003]

हम कह सकते हैं अरब समाज भारत से इतना मिलता जुलता था कि यदि कोई सोचना चाहे कि यह समानता भारतीय प्रभाव के कारण थी तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। कारण, जैसे सुमेरी सभ्यता की प्रेरणा से बेबिलोनिया/ मेसोपोटामिया, मिस्र, लघु एशिया, ग्रीस, रोम और आज की सभ्यताओं का जन्म हुआ था उसी तरह सुमेरी सभ्यता का उत्थान ही भारतीय पहल से हुआ था। इसमें भारतीय परंपरा के अनुसार, जिसकी पुष्टि पश्चिमी परंपरा से भी होती है, प्रमुख भूमिका देवों (आर्यों) की नहीं, असुरों की थी, जो तकनीकी दृष्टि से कृषिकर्मियों से बहुत आगे बढ़े हुए थे और उनके कारण ही देवों के भी अपने नगर बसें। सबसे पहले नगर सभ्यता का आरंभ आर्य भूमि से निष्कासित हुए असुरों ने किया था, और उसके बाद उनकी ही सहायता से देवों (आर्यों) ने अपने नगर बसाए थे, परंतु उत्पादक श्रम से परहेज करने के कारण, असुर स्वयं कृषि और वाणिज्यिक गतिविधियों में आगे नहीं बढ़ सके।

भारत में भी भूत-प्रेत में विश्वास, जादू टोने में विश्वास, बालवध उन्हीं में प्रचलित था। सुमेर में पहुंचने के बाद भी वे स्थानीय आबादी को भ्रमित और नियंत्रित करके खेती बागवानी आदि का सारा काम उनसे कराते रहे और स्वयं अपने जादू टोने के बल पर पुरोधा बनकर उन पर शासन करते रहे। उनके अत्याचार की कहानियां दहलाने वाली हैं।

हमने एक अन्य प्रसंग में यह कहा है इन असुरों के देव समाज में प्रवेश करने के बाद ब्राह्मणवाद का वह रूप सामने आया जिसकी विकृतियों की आलोचना होती है और यही ब्राह्मणवाद के सबसे प्रबल समर्थक भी बने रहे, यद्यपि इनको उच्च कोटि का ब्राम्हण नहीं स्वीकार किया गया।
सुमेर में अपनी विशेष सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने ऊंचे मंदिर और निवास (जिगुरात/ जिग्गुरात) बनाए । भारतीय व्यापारियों ने असुरों की सहायता से ही उद्योग, शिल्प और नगर निर्माण के क्षेत्र में प्रगति की और भारत से बाहर भी अपने लिए सुरक्षित प्राकारयुक्त बस्तियों का निर्माण किया।

हम यहां इसके विस्तार में नहीं जा सकते, परंतु इस तथ्य को रेखांकित कर सकते हैं अन्य सभ्यताओं की उन्नत अवस्था में भी भारत का बहुत गहरा प्रभाव था। इसका सही आकलन करने में कृपणता और कपट से काम लिया गया। सुमेरी काल से लेकर 18 वीं शताब्दी तक यूरोप से लेकर बीच के सभी प्रदेशों का अर्थतंत्र भारतीय व्यापार से इस तरह जुड़ा था कि उन्हे भारतीय सभ्यता का आश्रित कहा जा सकता है। प्राचीनतम सुमेरी अभिलेखों से पता चलता है कि जिन स्थानों के जहाज वहां अपना माल लेकर पहुंचते थे, वे थे:
1. मेलुक्खा (Meluḫḫa ) [Meluḫḫa or Melukhkha ((Me-luh-haKI 𒈨𒈛𒄩𒆠) is the Sumerian name of a prominent trading partner of Sumer during the Middle Bronze Age. Its identification remains an open question, but most scholars associate it with the Indus Valley Civilization. Wikipedia,Meluḫḫa.]
2. माकन (Magan, Makkan) [Trade between the Indus Valley and Sumer took place through Magan, although that trade appears to have been interrupted.Wikipedia, Magan.]
3. दिलमुन (Dilmun/ Tilmun)[ it was located in the Persian Gulf, on a trade route between Mesopotamia and the Indus Valley Civilisation, close to the sea and to artesian springs
4. पंत (Punt), /पुंत [The exact location of Punt is still debated by historians. Most scholars today believe Punt was situated to the southeast of Egypt, most likely in the coastal region of modern Djibouti, Somalia, northeast Ethiopia, Eritrea, and the Red Sea littoral of Sudan].
5. सुतकागेन दोर (Sutkagan Dor) [Sokhta Koh is a Harappan site on the Makran coast, near the city of Pasni, in the Balochistan … A similar site at Sutkagen-dor (also spelt Sutkagan Dor) lies about 48 km (30 mi) inland, astride Dasht River, north of Jiwan]i.

महत्वपूर्ण बात केवल यह नहीं है कि इन सभी अड्डों से सुमेरियन सभ्यता का संपर्क था, बल्कि यह कि इन सभी से भारतीय माल या भारत-विशिष्ट पशुओं, पक्षियों, वन्य और कृषिलभ्य उत्पादों की ही नहीं, यदा-कदा शिल्पियों की आपूर्ति की जाती थी, और सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है ये अड्डे भारतीय क्षेत्र से आरंभ होकर खाड़ी क्षेत्र, पूर्वी अरब, और इथियोपिया तक फैले थे, अर्थात प्राचीन सभ्यताओं का सीधा और परोक्ष संबंध केवल भारत से था। प्राचीन सभ्य संसार का मतलब था भारत और इसका संपर्क क्षेत्र जिस पर भारतीय व्यापारियों का लगभग एकाधिकार 4000 साल तक बना रहा। इसने अपने प्रभाव क्षेत्र की भाषा, संस्कृति और समाजव्यवस्था को प्रभावित न किया होता तो ही विस्मय की बात थी। ऐसी स्थिति में जब प्रमाण भी उपलब्ध हों तो इस सचाई को नकारना दुसाहस की बात होगी।

Post – 2019-05-30

आपको सच में याद करते हैं
मरने के बाद याद करते हैं।
यही दस्तूर है जमाने का,
है नहीं उसको याद करते हैं।।