Post – 2017-09-24

मुझे खेद है कि ‘पोस्ट कार्ड’ में सुप्रतीक के मोदी के जन्म दिन पर उनके इस कथन को कि मोदी अपनी मौत के एक साल करीब पहुँच गए, मोदी की ह्त्या की योजना के रूप में पेश किया जा रहा है. मैं स्वयं अपने हर जन्म दिन पर कहता हूँ मैं अपनी मृत्यु के एक साल और करीब पहुँच गया और काम अभी इतने करने को बाकी है. इस तरह की भोंडी व्याख्या होती रही तो हास्य, व्यंग्य, विनोद के लिए जगह न बचेगी. मैंं सुप्रतीक को नहीं जानता, उनकी राजनीति को नहीं जानता, पर उनके साथ खड़ा होकर चाहता हूँ उनके खिलाफ जो कार्रवाई की जाय वह मेरे खिलाफ भी हो. वेदिक कवियों के खिलाफ भी हो जो उषा को जिंदगी का एक एक दिन कम करनेवाली कह कर भी याद करते हैं.

Post – 2017-09-24

मां का जाना (2)

हमारा घर आकार में बड़ा था। कभी इसमें तीन संयुक्त परिवार रहते थे। उनकी महिलाओं की चारपाइयां गर्मियों में आंगन में लग जाती थी। आंगन को घेर केर ओसारा और फिर कमरे जिनमें कही कोई खिड़की न थी। वे लंबाई में इतने बड़े थे कि दिन में भी अँधेरा रहता। घुसने पर सुरंग जैसे लगते। अग्नि कोण पर जो कमरा था उसके दरवाजे के सामने तिकोनी दीवार थी, जिसे कोनसिला कहते थे। इसके कारण इसके भीतर अँधेरा इतना गहरा होता कि दिन में भी चिराग लेकर घुसने की जरूरत हो।

रहस्यलोक जैसे इस अंधेरे कमरे में ही प्रसूति ज्वर से माँ की मृत्यु हुई थी। मैं उस कमरे में न जा सकता था, न किसी ने यह बताया था कि हुआ क्या है। मेरे परिवार में कोई दूसरी महिला न थी पर ऐसे अवसर पर पास पड़ोस की महिलाएं भी जुट जाती थी। रोना धोना मचा होगा जिसकी याद नहीं। घर में एक ऐसी भीड़ की याद बहुत सारी परछाइयों और आवाजो-फुसफुसाहटों के आपस में घुलकर अदृश्य और अश्र्य हो जाने की अविश्वसनीय सी याद है। उसे नहलाने, सजाने, के बाद बाहर लाया गया होगा और उस बीच मैं भी उसी में कहीं टकराता बचता डोलता रहा होऊंगा। यह भी मात्र संभावना के रूप में ही याद आता है। पहला ठोस चित्र तब का है जब वह बाहर आकाश की और शिर किये सोई पड़ी थी। मुझे याद आता है की पहली बार मुझे माँ पर गर्व अनुभव हो रहा था कि उसके कारण घर के भीतर और बाहर इतने सारे लोग एकत्र थे और इस गर्व में उसकी तारीफ़ में वे आपस में जो कुछ एक दूसरे से कह रहे थे उसकी भी भूमिका रही हो सकती है। यहाँ जो तस्वीर उभरती है उसमें कई तरह के घालमेल है। बाहर एकत्र भीड़ में बहुत से लोग बंगले के दासे और कुर्सी पर बैठे दिखाई देते है जो बंगला तब तक बना ही नही था। शायद इसमें छोटे बाबा के मरने के समय की भीड़ का दृश्य शामिल हो गया है, पर यह समझ में आने के बाद भी तस्वीर नहीं बदलती। एक दूसरी गड़बड़ी यह कि मां टिकठी नुमा किसी चीज पर सोई दिखाई देती है न कि उल्टी चारपाई पर और दूसरी और बढई दरवाजे से हट कर हरे बांस को काटछांट कर टिकठी बनाने में लगा दिखाई देता है।

मरना क्या होता है मुझे यह मालूम न था, जो कुछ समझ में आया था वह यह की यह एक गहरी नींद है जिससे कोई फिर नहीं जगता। मा को रंगीन साड़ी में सजाया गया था, दुल्हन की तरह। सुहागिन रहते मरने के सौभाग्य के कारण। मांग सिंदूर से इस तरह भरी थी कि काफी सिंदूर चेहरे पर बिखर गया था। आंखें बंद थीं। मुखाकृति फिर भी नही उभरती, पर वह अपरूप (सौंदर्य को भी लज्जित करने वाली सुंदरता से उत्फुल्ल) सुंदर लग रही थी। प्रसूति गृह में जाने से पहले मैं उसके साथ ही सोता रहा हूँगा। इस बीच कहा सोता था, यह याद नहीं। मै एक उससे निकट ओसारे का एक खंभिया अपनी बांहों में लपेटे अपलक उसे ही देख रहा था। यह बोध था कि अब मैं उसके पास कभी न सो पाऊँगा, इसलिए बीच बीच में हुड़क उठती कि जाकर उससे लिपट कर सो जाऊं, पर एक बोध था कि ऐसा करना गलत होगा। इस समझ के साथ इस आवेग को रोकना कितना व्यथित करता था इसकी याद नही, पर मैं अभी तक एक स्थगित वेदना में निर्वेद द्रष्टा बना जो हो रहा था उसे देख रहा था। पर जब माँ की अर्थी उठाई गई और दरवाजे पर एकत्र लोग उसके साथ उठ खड़े हुए तो एकाएक ऐसी व्यग्रता पैदा हुई जिसे विक्षिप्तता का दौरा कहा जाय तो गलत होगा। इस दृश्य में जो कुछ विस्मृत है उसका चित्र नहीं है, पर व्याख्या है। मै चीखता हुआ दौड़ा, ‘माई के संगे हमहूँ जाब’। और एक बुढ़िया ने मुझे पीछे से इतनी कठोरता से पकड़ लिया कि मैं अपनी पूरी ताकत लगा कर भी उसकी पकड़ से छोट न पाया। यह नोहर की मां थी।

पर इस चित्र में जिस खाम्भिया से चिपका था उससे दरवाजे की दूरी आज की समझ से तीन मीटर तो रही होगी। मै ठीक उसके सामने, अर्थात् जहां खड़ा था उससे उतना अलग पकड़ा गया। याद से काम नहीं चलता पर पुनर्विचार से स्थिति समझ में आ जाती है। जिस खंभिया को पकड़े खड़ा था उससे नीचे कुर्सी थी और उससे दो फुट नीचे धरातल। दरवाजे के सामने सीढ़ियां बनी थी। सीधे कूदने का साहस न हुआ, पर दवाजे के सामने की सीढ़ियों से एक बच्चा भी उतर कसकता था। उतरने के लिए मैं उस ओर दौड़ा होऊंगा जिससे पहले भी उतरता रहा होऊंगा।

हुआ जो भी हो, मैं उस क्षण में आवेश में था। कोई भी व्यथा असह्य न थी। मेरे लिए मां निष्प्राण न थी और जो यातना उसे भोगनी पड़ सकती थी, उसे सहने के लिए ही तैयार न था, इसी में जीवन की सार्थकता प्रतीत हो रही थी। यह पता नही था कि मा के साथ क्या किया जाएगा पर यह पता था कि जो कुछ भी किया जाएगा वह अप्रिय होगा। मैंने अपनी कल्पना से जाना कि वे उसे राप्ती नदी की और ले गए है इसलिए उसे पानी में डुबो देंगे। लकड़ी के गट्ठर लेकर जाने वालों को देखा था, परन्तु यह विश्वास न था, न ही किसी ने कहा था, कि उसे जला दिया जायेगा, पर यह पता होता तो मैं उसके साथ जल कर जलने की यंत्रणा भोगने को तैयार था। यह मैं आधी कल्पना और आधी स्मृति के सहारे कह रहा हूँ। भावावेगों के भी अपने स्मृतिबिम्ब हो सकते हैं, पर स्मृति बिम्ब में भी मिलावट हो सकती है, इसे हम देख चुके हैं।

मैं नहीं जानता कब, कितनी देर बाद, जब सबका ध्यान मेरी और से हटा तो, मैं चुपके से निकल पड़ा और उस रास्ते पर चलने लगा जिससे माँ की अर्थी लेकर लोग गए थे। यह मेरे जीवन की सबसे लम्बी यात्रा थी। अपने मकान के सामने की दूरी पार कर जमुना सिंह के दरवाजे को पार करना, शहजादा सिंह का मकान पार करना, चुन्नी धरिकार के सामने से गुजरते हुए रामदास बढई के मकान के पास पहुंचना बस्ती के छोर पर पहुंचना। एक फर्लांग से भी कम की इस दूरी को कितने श्रम से पार किया था यह इतिहास में दर्ज होना चाहिए, पर होगा नही। मुसीबत यह कि इसके आगे जमीन चार पांच फुट नीची थी। किसी जलधारा के कगार जैसी स्थिति। मैं कुछ नहीं कर सकता था सिवाय दूर दिगंत तक निहारने के। उस समय की बेकली की कोई याद नहीं, पर इस निश्चय की याद है कि वहीं बैठा, गए हुए लोगों के लौटने की प्रतीक्षा करूंगा। मै रो नही रहा था. सूनी आँखों से क्षितिज तक आँखें गडाए किसी लौटने वाले की तलाश कर रहा था।

पता नहीं कितने समय बाद किसी का ध्यान इस और गया कि मैं गायब हूँ। पता नहीं कितनी देर बाद मुझे तलाशती दीदी वहा पहुँचीं। तब तक जानेवालों में से कोई लौटा न था ।

Post – 2017-09-23

ममता ने भारतीय सेक्यलरिज्म को केवल उदाहृत किया है। कोई अवरोध नहीं डाला। भाजपा का सौभाग्य है, बंगाल में सक्युलरिज्म ऐक्शन में है। सेक्युलरिस्ट चुप हैं। कल शिकायत करेंगे, हिन्दू कम्युनल हो रहा है । इसका देशव्यापी प्रभाव पड़ना है।

Post – 2017-09-22

मां का जाना (1)

असंख्य प्रयत्नों के बाद मां का कोई चित्र उकेर न पाने के बाद भी मैं उस अर्धसाकार अर्धनिराकार को बहुत प्यार करता, क्योंकि वही मेरा सर्वस्व थी। चाहें तो इसे विवशता कहें, चाहें तो प्यार, या प्यार से बहुत छोटे, पर अधिक पवित्र लगनेवाले आस्था, श्रद्धा, भक्ति का प्रयोग करें।

प्यार दुनिया का सबसे अधिक परिभाषित और सबसे कम समझा गया मनोव्यापार है। यह वह रसायन है जिसके स्पर्श से सत्य की, सौंदर्य की, पवित्रता की, महिमा की परिभाषाएं बदल जाती हैं । यदि नहीं बदलतीं तो वह कुछ और है, आसक्ति, कामातुरता, इच्छापूर्ति, जो विफलता में घृणा, द्वेष, आत्मघात और सर्वसंहार का भी रूप ले सकता है।

प्रेम अपने अभाव की पूर्ति का दूसरा नाम है और हम आजीवन अपने अभावों को दूर के और अपनी अपूर्णता को पूरा करने, का प्रयत्न करते हैं। विरोध का, प्रतिरोध का, हिंसा या प्रतिहिंसा का स्थान बचता ही नहीं। प्रिय की कमियों तक से लगाव पैदा हो जाता है। इसका सबसे स्पष्ट बोध जन्मभूमि से प्रेम में मिलता है जिसमें अनेक असुविधाओं के बाद भी अपने जन्म का भौगोलिक परिवेश ही समस्त सुख सुविधाओं से सज्जित देशों और स्थानों की तुलना में अधिक आत्मीय लगता है। तप्त रेगिस्तान से निकला आदमी भारत जैसे देश में भी खजूर के तले ठंडी ठंडी छाँव के सपने देखता है। भिन्न परिवेश से निकले लोगो को. पपीता, नारियल, खजूर, ताड़, के देश में पाम की जरूरत पड़ती है।

मां मरी तब मैं सवा तीन साल का था। मरना क्या होता है यह नहीं जानता था। उसकी मृत्यु प्रसूत ज्वर से हुई थी। प्रसव की ग्राम्य व्यवस्था ऐसी थी जिसमें शिशु और प्रसूता का मरना अधिक संभव था। बच जाना एक आश्चर्य। इसके बाद भी माताएं और शिशु प्रभु की लीला से प्राय: बच जाते थे । मैं दीदी और भैया और हमारे जन्म के समय मां का बच जाना उन्हीं आश्चर्यों में था और ऐसा ही आश्चर्य माई के साथ घटित हुआ था जिसकी एक संतान को छोड़ कर सभी बच्चे जीवित बच रहे थे और वह पिता जी की मृत्यु के चौदह साल बाद तक जीवित रही। दोनों की आयु में भी लगभग इतना ही अन्तर था।

इस व्यवस्था का पता भी मुझे तब चला जब माई के कभी आसन्न प्रसवा होने की स्थिति में धगरिन को बुलाने जाना पड़ा थ। वह चमाइन थी । वे सूअर पालते थे और उनकी बस्ती इतनी गन्दी थी कि दूर से ही बदबू आती थी। वे इन्हें जानवर कहते। गांव के झुंगे झाड़ी की सफाई इनके जानवरों के चरने से ही होती। उसके नहाने धोने और कपडों की सफाई और आदि की दशा उसके अनुरूप ही थी ।

वह प्रसव में सहायता करती, नार काटने के लिए हंसिये को निर्विष करने के लिए उसे लाल गर्म करती और उस तपते हंसिए की धार से नाल काटती और शिशु की सफाई करती । इसके अलावा वह दो काम और करती। पहला अन्त:स्राव में कमी होने पर पेट पर दबाव डालतीं जिनमें कुछ मामलों में प्रसूता और शिशु दोनों की जान चली जाती। दूसरा काम यह कि यदि मां को दूध न उतरता जो कुपोषण के कारण प्राय: होता, तो वे अपना दूध पिला देतीं और इसलिए हमसे कुछ बाद तक की पीढ़ी की उच्च मानी जाने वाली जातियों की सन्तानों को द्विमाता कहा जा जा सकता है। एक जन्मदात्री माँ, दूसरी धात्री माँ जिसको दुग्धपान कराने का प्रथम अवसर मिलता था, क्योंकि किसी गलतफहमी के चलते गाय, भैंस के प्रथम अमृतोपम दूध को अशुद्ध और अधिक पीने को हानिकर माना जाता था और माँ के प्रथम गाढे दूध को दुह कर बर्वाद कर दिया जाता था । देखें, इतनी देर बाद याद आया कि कुपोषण के कारण दूध न उतरने पर नहीं, इस विश्वास के कारण कि माँ का प्राकृत दूध शिशु के लिए हानिकर है, उसे पिलाया ही नहीं जाता था।

यदि हममें सचमुच मातृभक्ति होती तो स्वयं उच्च वर्णों को अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान चलाना था। गाय की पूजा करने वाले अपनी धगरी (नाभिरज्जु काटने और पहला स्तनपान करानेवाली मां) और उसकी संतानों के घर जलाते हैं।

Post – 2017-09-22

Those who find recent utterances of Raga in America ridiculous, may be oblivious of the fact that he is only maintaining` thentradition. Recall a more ridiculous exercise by entire opposition from both the houses approaching the then president of America ( letter dated November. 2012 made public on 20th July 3013). an extract from the report published in Hindu:

Sixty-four members of Indian Parliament (25 from the Lok Sabha and 39 from the Rajya Sabha) petitioned U.S. President Barack Obama to advise the State Department not to reconsider its 2005 decision to deny Gujarat Chief Minister Narendra Modi an entry visa because of his association with the 2002 riots, in which more than a thousand people, many Muslim, were killed.

Be sure, such desperate exercises serve Modi better and add to their own disaster.

Post – 2017-09-21

कुहासे की चमक से भी नई तस्वीर बनती है

कुहासा घना हो तो सूरज दिखाई नहीं देता, पर कुहासे में एक सुनहली चमक आ जाती है। यह चमक दृश्य को धुंधली रंगीनी से भर देती है, पर यदि हवा का कोई झोंका आए और कुहासे की घनी पर्त उड़ जाय, सामने न होने जैसी पतली झिल्ली रह जाए तो दृश्य एकाएक इतना स्पष्ट हो जाता है कि लगता है आप उसका स्पर्श भी कर सकते हैं और फिर गहराते कुहासे में संशय उत्पन्न हो सकता है कि जो दीखा था उसके मानसबिंब का कितना अंश सच है और कितना काल्पनिक!

मेरे मुंडन का पूरा दृश्य चल चित्र की सी स्पष्टता से आंखों के सामने कई बार उपस्थित हुआ होगा, जांच कभी न की। ननिहाल से लौटने और तीसरा साल पूरा होने से पहले, गर्मियों की कोई सुबह थी। घर से निकलने से मुंडन के समय तक के दृश्य चित्र इतने स्पष्ट कि लगे कुछ भिऩ्न हो ही नहीं सकता और लिखते समय लगे सच तो कुछ और था।

मुंडन समै माई के थान पर होना था, जो घर से दो मिलोमीटर की दूरी पर था। वहां तक जाने के लिए बैलगाड़ी का रास्ता चार किलोमीटर का हो जाता था। यह पहले गांव के फाटक से आगे सड़क से जुड़ता था और फिर मंगल की बाज़ार और इतवार की बाज़ार से होते हुए गजपुर जाने वाले रास्ते पर चल कर समै माई के थान पहुंचता था जहा नीम के एक पेड़ के नीचे एक बड़ी बेदी थी, जिस पर, मिटटी के हाथी घोड़े देवी की सवारी के लिए थे, पर देवी की कोई प्रतिमा न थी। सम्मै माई के नाम ने मुझे बाद में खासी उलझन में रखा, कि ‘समय’ तो पुल्लिंग है, यह माई कैसे हो सकता है, पर ये बहुत बाद की बाते हैं।

माँ यूँ भी पैदल अधिक दूर तक चलने की स्थिति में न थी, परन्तु घर की दीवारों में बंद रहने के कारण हमारे घरों की महिलाओं के पाँव बंध जाते थे। यह पाँव बंधना उस समय की चीनी महिलाओं के पाँव बंधने जैसा तो नही था और घर के भीतर इधर से उधर उन्हें चलना भी काफी होता था, पर बाहर खूली राह पर डग भरते हुए लगता उनके पांव आपस में टकरा जायेंगे. झाड़ू-बर्तन से लेकर चूल्हे चौके, कूटने, पीसने, दलने, तक वे बहुत काम करती थी, जिसमे झपट कर कहीं पहुंचना भी शामिल था, पर सधी चाल से जैसे खेती बारी में हिस्सा लेने वाली ओरतें और पुरुष चलते उस तरह चलना अटपटा लगता था। वैसे बाहर निकलते ही हैसियत का भी ख्याल रहता था, इसलिए उन्हें कहीं जाना होता तो ओहार लगी बैलगाड़ी सजाई जाती जो ठीक निकास के सामने खडी होती और वे उसमे दाखिल हो जातीं।

घर में मोटी साड़ी भले पहनें, पर घर से बहार निकलते समय शादी के समय चढ़ावे में मिली बूटेदार सिल्क की साडी और सलूका, ऊपर से मलमल की झालरदार चादर में लंबा घूँघट निकाले दरवाजे बाहर आतीं और गाड़ी के भीतर घुस जातीं। ये कपड़े उसके बाद फिनायल की गोलियों के साथ संदूक के हवाले कर दिए जाते और मघा नक्षत्र की धूप दिखाने के लिए बाहर निकलते और फिर सहेज कर रख दिए जाते।

उस दिन मां की नारंगी रंग की चमकदार झालर लगी चादर का ध्यान है, चेहरे का नहीं। मैं अपने लंबे बालों को पसंद करता था और यह जानकर कि वे कट जायेंगे घबराया हुआ था। बाबा ने फुसलाने के लिए मंगल की बाज़ार में हलवाई की दूकान से एक बड़ा गट्टा लेकर मुझे थमा दिया होगा पर जो चित्र बनता है वह इतवार की बाज़ार से सटी सड़क पर ओंकार की दूकान का है। चित्र इस जानकारी के बाद भी बदल नहीं पाता कि गजपुर का रास्ता तो उससे पहले ही डुमरी से कुछ आगे सड़क से अलग हो जाता था इसलिए उधर बढ़ने का सवाल ही नही।

ननकिसोर (नन्द किशोर) नाई बूढ़ हो चले थे। उनका छुरा भी बच्चों के सिर को लहूलुहान करने के लिए ही तैयार किया गया था। मेरी लटों को तो तेल और कंघे से साफ कर लिया जाता रहा होगा, परंतु चुपड़े जानेवाले तेल और धूल मिट्टी मे खेलते समय उड़ कर सिर में जमने वाली धूल से बनी पर्त छुरे की धार से ही उतरनी थी। उस्तरे की धार के खुरदरेपन के कारण सर में खरोंचें पड़ने के साथ तिलमिला कर मैं सिर झटकने की कोशिश करता जिससे गर्दन तो न कटती पर खून खराबा तो हो ही सकता था। इसका पूर्वानुमान करके एक ओर तो भुलावे में रखने के लिए मुझे एक बड़ा सा गट्टा पकड़ा दिया गया था और दूसरी ओर मेरे पीछे की ओर से किसी ने मेरा सिर पकड़ रखा था। पकड़ खास ऐसे समय सख्त हो जाती जब मैं सिर झटकने के लिए गर्दन तानने चलता। ननकिशोर का हाथ छुरा लिए अलग हो जाता। ननकिसोर बालों को मुलायम करने के लिए बार-बार पानी से भिगोते। बाल कटने के साथ उसके भीगे हुए लच्छे नीचे गिरते। एक दो गट्टे से चिपक भी जाते। मैं रोता हुआ गट्टे को चाटता जाता। अब याद आया। मैं जमीन पर नहीं बैठा था। मुझे किसी ने गोद में संभाल रखा था। कौन था वह, याद नहीं आता। एक भी बाल जमीन पर न गिरे, इसलिए मां ने अपना आंचल फैला रखा था। आंचल, आंचल में गिरते बालों के लच्छों की पक्की याद है, पर मां के चेहरे का नहीं।

और अंत में आया होगा सबसे तकलीफ देनेवाला क्षण, ऐंटीसेप्टिक लेप, खली, सरसो के तेल और पानी का घोल, जिसकी छरछराहट के बाद के अनुभवों के आधार पर जानकारी तो है, पर इस चित्ररेखा में वह गायब है, हां लपसी बनने की याद है, पूड़ी छनने की नहीं, खाने की बिल्कुल नहीं।

इसमें हुई घाल (वस्तु या सचाई को घटाना) और मेल (जो था ही नहीं उसे मिलाकर पूरा करने या नए रूप में ढालने का प्रयत्न) के विषय में पहले सचेत न था। लिखते समय हम अपने को अधिक अच्छी तरह जान पाते हैं, कयोंकि लिखते समय हम अपने आप से बाहर आकर अपने को एक वस्तु के रूप में देखते हैं। यही हमें लेखक बनाता है। जो ऐसा नहीं कर सकते वे कलमकार हैं, लेखक हो ही नहीं सकते।

विश्वासों से जुड़े लोग, विचारधाराओं से जुड़े लोग, संगठनों से जुड़े लोग, आंदोलनों से जुड़े लोग कलमकार बन कर रह जाते हैं, लेखक बन ही नहीं पाते। लेखन के साथ वही जिम्मेदारी होती है जो न्यायविचार के साथ। कलमकार स्क्रिप्ट राइटर होता है, गलत को भी सही बना कर इतने प्रभावशाली ढंग से पेश कर सकता है और समझा सकता है कि रूसी से बालों को बचाना, फांसी से गर्दन बचाने से अधिक जरूरी है।

इस चित्ररेखा में गट्टे की एक याद का कुछ समय तक बना रहना, तब तक सही लगना और फिर बदल जाना कुछ वैसा ही है जैसे स्वप्न बिंबों में आए बदलाव– जब तकदूसरा स्थान नहीं लेता तब तक सही।

Post – 2017-09-19

कैसे तिनकों का आशियाना था

कितने टूटे अधूरे टुकड़ों को जोड़कर बनाने की कोशिश करता रहा एक कोलाज। इसे तो यादों का मलबा तक नहीं कहा जा सकता। मलबे में तो खंडित अवस्था में इतने टुकड़े वहीं मिल जाते हैं कि उन्हें जोड़ कर मूल का प्रतिरूप तक बनाया जा सकता है। पुरातत्व से जुड़े लोग ऐसा कर भी लेते हैं। परन्तु यहाँ तो आंधी में उधियाए हुए रेशों को पहचानने, पकड़ने और उन्हें मिला और ऐंठ कर, ऐसा तार बनाने की समस्या थी, जिससे यह उम्मीद जगे कभी कहीं पिरोया और जोड़ा बुना जा सकेगा। एक रेशा दृश्य, दूसरा श्रव्य और तीसरा अनुमेय और वे भी अन्तरालों के बाद उपस्थित।

उन दिनों माँ से बच्चों को केवल अपने सम्बन्ध का पता होता था। वे मां का नाम नहीं जानते थे। उन दिनों मर्यादा की एक खास समझ के तहत पत्नी न तो पति का नाम ले सकती थी, न पति पत्नी का। विवाह से पहले जो पूर्ण इकाइयां थीं, वे विवाह के साथ अपनी पूर्णता खोकर अपनी ही तरह अपनी पूर्णता खोकर आधी रह जाने वाली अपूर्णता के साथ मिल कर, एक पूर्णता स्थापित करती थी। विवाह, संवाह या सहजीवन नहीं है, निर्वाह (किसी तरह सम्बन्ध निभाना) नहीं है, परस्पर मिल कर पूर्णता की सिद्धि है, जिसमें पति अर्धांग बना रहता है, और पत्नी अर्धांगिनी। दंपति अर्धनारीश्वर हो जाता है ।

मैं नहीं जानता कि अर्धांगिनी की संकल्पना के पीछे मेरी जल्पनाएं सही हैं या गलत, परन्तु इसमें कोई संदेह नही कि मेरे पिता ने कभी मेरी माँ का नाम न लिया और मां को अपना नाम बताने की जरूरत ही न थी। हम बाद की पीढ़ियों जैसे भाग्यशाली न थे। माता पिता अर्धनारीश्वर हो कर भी एक दूसरे से इतने दूर रहते थे कि भरे परिवार में पति अपनी पत्नी को कई बच्चों की मां बन जाने के बाद भी पहचान नही सकता था। दूसरों के सामने अपनी पत्नी से बात नहीं कर सकता था। दूसरों के बच्चों को भले प्यार कर ले, वह अपने बच्चों को प्यार तक नहीं कर सकता था, कोई चूक होने पर दंड अवश्य दे सकता था।

मैं माँ को जानता था, उसका नाम नहीं जानता था। पिता का नाम जानता था, पर उनसे किसी तरह का लगाव न था और बाद में कभी यह किसी से पूछने का न कोई अवसर आया न साहस हुआ कि पूछूं कि मेरी माँ का नाम क्या था। अवसर आया भी तो तब जब सत्तर साल की उम्र में पहचान के सन्दर्भ में कभी पूछा गया, माँ का नाम? मैं उलझन में पड़ गया। नाम तो मुझे पता नहीं था।

उलझन की उस घड़ी में शैशव से आती एक प्रतिध्वनि सी सुनाई दी रमदुलरिआ। आवाज नाना जी की थी। उस आवाज की खरखराहट भी याद आती है और ममता का स्पर्श थी। किस तर्क से, यह बता नहीं सकता, मुझे स्वयं पता नहीं। इससे पहले कभी यह सवाल क्यों न पैदा हुआ, मैं नही जानता। इतने अरसे वह किस कोने में आवाज़ की खराश और आत्मीयता की मिठास के साथ,बचा रहा, मैं नहीं जानता। मैं इनके विषय में किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता, परन्तु एक प्रश्न अवश्य कर सकता हूं। क्या हमारे गहन रागात्मकता के स्मृतिबिंब किसी विशेष योजना के अनुसार व्यवस्थित होते हें जो ध्यान की किसी विशेष अवस्था में, जैसे सम्मोहन की अवस्था में जाग्रत हो जाते हैं।

ध्वनिबिम्ब का एक दूसरा नमूना। माँ के साथ ननिहाल जाते हुए मैं पहली बार ट्रेन में बैठा था। ट्रेन का, डिब्बे की भीड़ का, इंजिन की बनावट का कोई दृश्य स्मृति में अंकित नहीं। मात्र यह याद है कि गर्मी के मौसम में, आगन में, शाम के धुंधलके में, मै लुढ़का पड़ा था और कोई मुझसे पूछ रहा था, ‘ए बाबू रेलिया कै इंजनवा कैसे बोलेला?’ और मै इंजन के भोंपू की नकल उतारते हुए ‘भौओ’ की आवाज कर रहा था।

मैं मां के साथ ननिहाल गया था और वह मायके। गन्तव्य एक ही, पहचान अलग-अलग। वह अपने तीन जीवित और संभव है एक दो मृत संतानों के बाद, पेट में एक बच्चा और गोद में मुझे लिए पहली बार, जो अन्तिम भी सिद्ध हुआ, अपने स्वजनों से मिलने गई थी। कोई नहीं जान सकता कि इस समय मैं लिख नहीं रहा हूं, बिलख रहा हूं। अंकपटल को दबाती उंगलियों से भी, आंखों से भी, और रोना इस बात पर कि यातना तो है, पर यातना सहने वाली को यह यातना प्रतीत ही नहीं होती या प्रतीत होती भी रही हो तो वह पुत्रवती भव के आशीर्वाद का अपमान नहीं कर सकती थी। मुझे जो यातना लग रही है, उसे उसपर गर्व रहा हो। दोष व्यवस्था का थाः

1. जिसमें दोषपूर्ण व्यवस्था के प्रति सम्मान आत्मसम्मान का हिस्सा बन जाता था और यातना के विविध रूप गर्व के विविध रूप प्रतीत होते थे।

2. इसमें पति पत्नी को नहीं जानता, वह अपनी मनुष्यता खो कर एक वस्तु में बदल जाती है, उससे प्रजावृद्धि हो सकती है, संवाद नहीं।

3. शिशु मां को जानता है, पिता को जानता है, समझ नहीं पाता। मां का संतति-स्नेह संभाल में बदल जाता है और सभी को संभाल नहीं सकती इसलिए किसी एक पर केंद्रित हो जाती है जो उसकी हुर्दशा से उसे उबार सके और यह उसका पहला पुत्र ही हो सकता था जो उसकी पहली पुत्रबधू लाकर उसके श्रम भार को हल्का कर सके।

कमियों की तालिका बनाई जा सकती है। अपने को जानने के लिए हम परंपरा की पूजा न करें. उसकी समीक्षा करें।

Post – 2017-09-18

Those who shower abuses on Modi,serve him better by publicly advertising that they are a dirty lot, raising him in public estimation on the one hand and countering their own hype that they have no freedom of expression. But they can not restrain themselves as they have lost their wits in desperation. This is a sad development as it further erodes the possibility of a sustainable opposition. Our democracy is getting uni polar which frustrates the very essence of democracy.

Post – 2017-09-18

कॆांग्रेस पार्टी नीचे से ऊपर तक ऐसे लोगों से भर गई है जो खुद अपना परिचय देते रहते हैं। उसके समर्थक बुद्धजीवियों का क्या होगा?

Post – 2017-09-16

हम यह नही कहते कि कायनात है हमसे
क्या हमने बचाया है ज़माना इसे समझे .

[मै आत्मकथा को सामाजिक विमर्श में बदलने का प्रयोग कर रहा हूँ। शायद यह बात मेरे मित्रों में कुछ की समझ में आये। मेरे अपने जीवन में तो कुछ है ही नहींृ जिसके लिए अपने पाठकों का कीमती समय बर्वाद करूं.]

जब माता या पिता के साथ संतानों के गहन लगाव की बात आती है तो हम प्रायः ईडिपस कंप्लेक्स या फिक्सेशन की बात करने लगते हैं, और विकृति के कुछ मामलों में इसे सही भी पाया जा सकता है, परन्तु दो भिन्न संस्कृतियों की मनोरचना को उनमें से किसी एक को प्रमाण मानकर नहीं समझा जा सकता। उदाहरण के लिए पश्चिमी समाजों में प्राकृतिक कारणों से हिंसा की प्रवृत्ति इतनी प्रबल रही है कि वे क्रूरता को वीरता से अभिन्न मानते रहे और अहिंसा को कायरता बताते रहे। इतिहास गवाह है कि भारतीय योद्धाओं को आमने सामने की ल़ड़ाई में शायद ही कभी हार का मुंह देखना पड़ा हो। हमें एक पाशविक समाज में, समय से पहले सभ्य होने के कारण उनसे पराजित होना पड़ा जो प्रेम और युद्ध में किसी तरह के आचरण को उचित मानते थे। आज हम युद्ध में भौतिक लाभ को भी जोड़ लें। वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से अकल्पनीय प्रगति के बाद भी यदि विश्व मानवता विनाश के कंगार पर खड़ी है तो इसलिए कि युद्ध, लाभ और प्रेम में कुछ किया जा सकता है वाली मूल्य प्रणाली सार्वभौम हो गई है जिसमे जो काम्य है उसकी किसी भी तरह प्राप्ति, श्रेयस्कर हो जाती है।

इसमें शौर्य अर्थात् जो रक्षणीय है उसकी प्राणपण से अर्थात् प्राण की बाजी लगा कर भी रक्षा करने का संकल्प अपनी जान बचाते हुए, धोखे से, चोरी से, विश्वासघात करते हुए, जो दुर्बल हैं, निहत्थे है उन पर प्रहार करके जीतना शौर्य की कसौटी बना दिया गया. कमीनेपन और कायरता का पर्याय है मिलिट्री साइंस।और इसे हमें भी अपनाना पडा। जानवरों से लड़ते हुए आप उन्हें दर्शन बघार कर नियंत्रित नही कर सकते। आपके पास सींग नहीं है तो डंडा हाथ में लेना पड़ता है।

पर किसी भी कीमत पर सफलता सभ्याचार नहीं हैं, पाशविक व्यवहार है इसे समझने के लिए आखेट करने वाले पशुओं के व्यवहार पर ध्यान देना होगा। जिन्हे हम शौर्य का प्रतीक मानते है उन जानवरों में भी क्या इतना दम होता है कि जिस पर वह आक्रमण कर रहा है उसको चुनौती दे सके कि मैं तुमसे सभी दृष्टियों से श्रेष्ठ हूँ।. वह इसका निर्वाह नहीं करता। चोरी से, छिपकर पास पहुंचता है और एकाएक जब आक्रमण करता है तो उसके हाथ उस दल का कोई बीमार, पहले से घायल या नवजात ही पकड़ में आता है. यह प्राकृतिक बाध्यता है और इसलिए विचारातीत। परन्तु यदि विज्ञान प्रकृति पर विजय है तो यह प्रयोग यहाँ हुआ था और उस समय हुआ था जब विज्ञान और तकनीक अल्प विकसित थे। आज जब विज्ञान और तकनीक ने प्राकृतिक बाध्यताओं पर विजय पाकर उन क्षेत्रो को जिनमें लोग किसी तरह जीवन यापन करते थे, आबादी के अल्पतम दबाव के कारण अधिक आकर्षक बना दिया, यह उनका कर्तव्य था कि वे उन मानवीय मूल्यों की रक्षा करते हुए शौर्य के नए कीर्तिमान रखते जिनमें कुछ नायकों ने हमें निराश नहीं किया है। वे उन्नति के बाद भी अधोगति के मूल्यों को सार्वभौम बनाने पर कटिबद्ध है
जिसमें लाभ लोभ में बदल जाता है । इससे उत्पन्न दुष्परिणामों की तालिका पेश करना हमारा उद्देश्य नही।

इसमें प्रेम बलात्कार का पर्याय बन जाता है, बहुपत्नीत्व या हरम का समर्थन करता है!

मैं नही कहता कि हमारी मूल्य व्यवस्था श्रेयस्कर है। कहता हूँ , यह भिन्न है और मानवजाति का भविष्य इसके निर्वाह पर निर्भर है।

मनोरचना से जुड़े दूसरे सवालों पर भी पश्चिम आगे है इसलिए अनुकरणीय है इससे बचते हुए यह समझना होगा कि हमारी मूल्य व्यवस्था भिन्न है, और एक उन्नत अवस्था की उपज है। इसको समझते हुए हमें अपनी कमियों को भी समझना है और रक्षणीय तत्वों बचाना है। आज की दुनिया को वैज्ञानिक मानवमूल्य प्रदान करने में हम एक सीमा तक सहायक हो सकते हैं। अपने जीवन मूल्यों को समर्पित करने के बाद हम कचरे में बदल जायेंगे और हमारे साथ वही व्यवहार किया जाएगा जो कचरे के साथ किया जाता है.