Post – 2015-10-22

“तो तुम्हारा कहना है, दुनिया में जो कुछ अच्छा है वह सब भारत से गया हुआ है? भारत जगद्गुरु है?”
“मैं यह कहता हूँ की सभ्यता का चरित्र वैश्विक है, इसलिए भारत में जो कुछ है वह पूरी मानवता का है. और यह कहना चाहता हूँ कि इसे जितनी स्पष्टता से भारत ने समझा था, उतनी स्पष्टता से पूरे इतिहास में कभी किसी दूसरे ने नहीं समझा. आजतक.
“तुम तो पेंग भरते रहते हो. उछलते तो ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ गाने लगते हो और पीर पीछे लौटते हो तो ‘न हमने कुछ कहा न हमने कुछ किया का राग. पर अगले ही क्षण पेंग आगे और जैकारा शुरू.”
“गाने तुम गा रहे. जो समझते नही वे गाने गाते हैं. वह “सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ ” हो या ” मो सम कौन कुटिल खल कामी हो.’ मैं तुम्हे सिर्फ इतना बता रहा हूँ की दूसरी सभ्यताओं के सपूतों ने अपने इतिहास को नकार दिया. उसका सत्यानाश कर दिया और हमारे ऊपर कटाक्ष करते रहे कि हमारे पास न इतिहास है न इतिहास बोध जब कि हम अकेले हैं जिन्होंने अपने इतिहास को बचाया और…”
“तुम कहो, हमने इतिहास को पूजा और उससे बाहर निकल ही नही सके, न ही निकालना चाहते है.”
“तुममे सुनने का धीरज तो होना चाहिए. हम अकेले हैं जिन्होंने इतिहास की गति और गतिकी को समझा और उसे सूत्रबद्ध किया. तुमने वह नीति वाक्य सुना है, ‘चक्रार पंक्तिरिव गच्छति भाग्य पंक्तिः’ जानते हो यह कितना पुराना है? नहीं जानते. यह ऋग्वेद से लिया हुआ है.”
“ऋग्वेद से?” उसे चौंकना ही था.
“हाँ, ऋग्वेद की इबारत अधिक स्पष्ट है, “ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रा अन्यम् अन्यम् उपगच्छन्ति राय: ‘ अरे ये धन-वैभव तो आज एक के पास है कल दूसरे के पास चला जाएगा. कहीं टिकता नहीं. पहिये के अरों की तरह घूमता रहता है. कभी एक अरा ऊपर आता है तो कभी दूसरा. पश्चिम ज्ञान और विज्ञान में सबसे अग्रणी होने का दावा करता है पर अहंकारवश इस सूत्र को जानते हुए भी समझने और मानने को तैयार नहीं होता. अपने या गोरी जाति के शाश्वत-वर्चस्व-सिंड्रोम से बहार निकल ही नही पाता.”
मैं सोच रहा था वह बीच में टोकेगा, परन्तु वह पहली बार ध्यान से सुन रहा था.
“जो इतिहास को जानता है वह इतिहास से बंधता नहीं है. इसीलिए यह हज़ारों साल पहले से युगधर्म की बात करता आया है. जो कभी चलन में था, दूसरे युग और या भिन्न देश में वर्ज्य हो सकता है. जो वर्ज्य था वह व्यवहार्य हो सकता है. परन्तु विश्व-गुरु-सिंड्रोम से यह भी ग्रस्त रहा है यह भी मानना होगा क्योंकि सबसे पुराने विश्वविद्यालय यहीं थे और उनमें पढने के लिए दूर दूर से लोग खतरे उठाकर आया करते थे. ”
“जब तुम इतिहास को बचाने की बात कर रहे थे तब मैं सोच रहा था कि तुम्हें चीन क्यों भूल गया.”
“देखो, चीन पुराना देश है. उसकी संस्थाओं और उपलब्धियों को उस निषेधवादी विचार से नहीं गुजरना पड़ा जिस में धर्मोदय के साथ अपने ही इतिहास और अपने ही पुरखों को नकार नही दिया जाता है, उन्हें गर्हित, अंधकारपूर्ण ही नही बताया जाता है, अपितु उन्हें नारकीय यातना का पात्र तक मान लिया जाता है. उन्हें शैतान की गिरफ्त में मान लिया जाता है. और वह बुद्ध धर्म क़े संपर्क में आने क़े बाद भी.
“बुद्ध धर्म तो किसी को शैतान कहता नही.”
मैं मुस्कराता हुआ कुछ देर तक उसकी हैरानी का मज़ा लेता रहा. जब उसे खीझ होने लगी तो कहा, “देखो अभी तक तो तुम इस बात से घबराये हुए थे की मैं प्राचीन जगत के एक दौर की उपलब्धियों का ही श्रेय भारत को दे रहा हूँ तो तुम मानने को तैयार नही. परन्तु अब जब मैं कहने जा रहा हूँ कि दुनिया की अनेक बुराइयों की जड़ भी यहाँ तलाशी जा सकती है तो तुम झटपट मन लोगे, क्योंकि यही वह चीज़ है जिसे लोग बिना जाँचे परखे मान लेते हैं.”
“तुम यह क्यों सोचते हो की मैं क्या मानूँगा, क्या नहीं. मैंने तो सिर्फ इतना कहा कि बौद्धमत में”
“मत मत कहो. धर्म कहो. पहली बार एक व्यापक और आज की शब्दावली में कहें तो सेक्युलर और वैज्ञानिक शब्द को बुद्ध ने संकीर्ण अर्थ में लेते हुए अपने मत तो धर्म की संज्ञा दी.”
“चलो वही सही. पर मेरा प्रश्न..”
“आता हूँ उस पर. तुम यह तो मानोगे कि बौद्ध धर्म दुनिया का पहला मिशनरी धर्म है.”
वह आश्चर्य से मुझे देखने लगा तो, मैंने अपनी भूल सुधारी. मुझसे चूक हुई, पहला नहीं. मिशनरी धर्म जिसे तब धर्म नहीं, व्रत कहते थे और जो अपने आदर्श मूल्यों और मानों के प्रसार को समर्पित था, ऋग्वेद क़े समय में ही अस्तित्व में आ गया था. आखिर ‘सूर्यम दिवि रोहयन्त: सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तः अधिक्षमि’ और ‘कृणवामो विश्वमार्यम’ क़े पीछे तो मिशनरी भावना ही है.
“और मिशनरी धर्मों का एक अनिवार्य लक्षण है अपनी धर्मसीमा से बहार क़े लोगों क़े प्रति घृणा पैदा करके दूसरों को अपने धर्म में दीक्षित होने को बाध्य करना.”
“ऋग्वेद में भी है यह?”
“क्यों नहीं है. अनीन्द्र (इंद्रा को न माननेवाले), अदेवयूं (देवों को न मानने वाले), अन्यव्रत और अनार्य (आर्य जीवनपद्धति न अपनाने वाले) लोगों क़े प्रति घृणा तो ऋग्वेद में भी है. पूरे भारोपीय क्षेत्र में उससे पहले का कोई धर्म, विश्वास बचा दिखाई देता है.”
वह भौचक. संभलने में कुछ समय लगा, “परन्तु, बौद्धधर्म तो अहिंसा का प्रचारक है.”
“अहिंसक भी हिंसकों से घृणा कर सकते हैं न? जितनी अहिंसा को उचित मानते हैं उससे आगे बढ़ी अहिंसा से घृणा कर सकते हैं न. जिनमे हिंसा पूर्णतः वर्जित नहीं है उनका कुत्सित चित्रण कर सकते हैं न?”
“लगा उसे मेरी बात समझ में नही आ रही है. मैंने कहा, “यदि तुम देखो कि बुद्ध महावीर की कितनी निंदा करते हैं और महावीर बुद्ध को कितनी खोटी खरी सुनाते हैं तो दांतों टेल उंगली दबा लोगे. और यह जो बौद्ध साहित्या में मिलता है की यज्ञ में अनगिनत गायों की बलि दी जाती थी, वह बौद्धधर्म के कारण बंद हुआ, या बौद्ध मत में दीक्षित होने से पहले अशोक चांडाशोक था और अपने आठ भाइयों का वध कर दिया था और कलिंग युद्ध में लाखों का संहार हुआ था, या अंगुलिमाल नामक डाकू का हृदय परिवर्तन हुआ था इन्हे ज़रा सोचते समझते हुए पढ़ना चाहिए. कम-से-कम इतनी समझ तो होनी ही चहिये कटी उँगलियों की सड़ांध उसे पसंद न रही होगी. मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि अपने को स्वीकार्य बंनाने कि लिए मिशनरी धर्म दूसरे धर्मों, और अपने उदय से पहले के विचारों और लोगों की निंदा करने के लिए उनमें बुराइयों का आरोपण करते और प्रचलित बुराइयों की अतिरंजना करते है.”
“लेकिन सनातन धर्म में तो किसी को अपनाने की प्रवृत्ति ही नहीं रही है. वे तो अपने सीमित दायरे से बाहर के भूभागों को भी अशुद्ध मानते रहे है.”
“तब तक जब तक की उसे जीतकर या उसके शासक को मनाकर उसमें वर्णव्यवस्था लागू न कर दी जाय.”
“परन्तु भारत से बाहर तो वर्णव्यवस्था पाई नहीं जाती.”
“पाई नहीं जाती, क्योंकि प्रभाव क्षीण पड़ने के बाद वह मंद पड़ते-पड़ते लुप्त हो गई, परन्तु वर्णव्यवस्था का प्रसार भी किया गया था और ईरानियों, गालों, रोमनों आदि में लम्बे समय तक बनी रही. दस्तूर भी तो आखिर ब्राह्मण ही हैं न.”
उसे विश्वास नहीं हो रहा था तो मुझे मेधातिथि की टीका का एक अंश दुहराना पड़ा, “यदि कश्चिद् क्षत्रियादि जातीयो राजा साध्वाचरणो म्लेच्छान पराजयेत् चातुर्वर्ण्यं वासयेत्, म्लेच्छान च आर्यावर्त इव व्यवस्थापयेत् सो अपि स्यात् यज्निया:, यतो भूमि: न स्यात् दुष्टा संसर्गात् हि दुष्यति. (यदि कोई क्षत्रिय या किसी अन्य जाति का सदाचारी म्लेच्छों को पराजित करके वर्णव्यवस्था स्थापित करे तो वह क्षेत्र भी यज्ञ के उपयुक्त हो जाएगा, क्योंकि धरती स्वयं दूषित नहइन् होती संसर्ग से दूषित होती है).
उसे सब कुछ नया नया सा लग रहा था. मैंने आगे जोड़ा, “तो यह जो मिशनरी धर्म की बीमारी है, जीत सेमेटिक कह कर एक दरबे में दाल दिया जाता है, उसकी जड़ भी भारत ही है. यह वहां दो खेपों में पहुंची. पहला खेप वैदिक, दूसरा खेप बौद्ध.
और दूसरी बुराई जुआ और सट्टेबाज़ी. यहीं से निर्यात हुई
और तीसरी रेस-कोर्स. हाँ इसमें इतना और जोड़ दो कि रेस में पहले रासभ ही जोए जाते थेय. आखिर रास, रासभ, रेस, रैश में ध्वनि साम्य तो है ही.

Post – 2015-10-21

“तुम कहाँ की बात को कहाँ पहुँचा देते हो. मैं तो एक सीधा सवाल करना चाहता था कि वेद में…” वह रुक गया.
“तुम जानते हो कि कुछ प्रश्न सीधे नही किये जा सकते. संवेदनशील मामलों में जो लोग धड़ल्ले से बात कर लेते हैं वे यन्त्रमानव होते हैं और उनको कोई दूसरा चला रहा होता है.”
“चला तो उन्हें भी कोई और होता है जो कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील होते हैं और बात-बात में भड़क उठते हैं.”
“तुम ठीक कहते हो आवेग की प्रबलता और आवेग का अभाव दोनों स्थितियों में मनुष्य मनुष्य नहीं रह जाता. आवेग की प्रबलता हो तो वह पशु हो जाता है, विवेकशून्य – जुगुप्सु या डरावना या दयनीय प्राणी. यदि बुद्धि की इतनी प्रबलता हो जाय कि उसमें भावनाओं के लिए स्थान ही न रह जाय तो वह यन्त्रमानव बन जाता है.”
वह मुस्कराने लगा, “यन्त्रमानवों के बिना तो हमारा काम चल ही नहीं सकता.”
“चल तो पशुओं के बिना भी नहीं सकता. मैं मनुष्य की मनुष्यता की रक्षा की बात कर रहा हूँ. उसकी निजता की रक्षा की बात कर रहा हूँ.”
“तुम बातों को उलझा देते हो यार. साफ साफ क्यों नहीं बोलते?”
“देखो सभी जीवधारी सामाजिक या समूहबद्ध. यह उनके अस्तित्व रक्षा से जुड़ा प्रश्न है. इसी तकाजे से मनुष्य ने संस्थाएँ बनाई. सबके हित के लिए. परन्तु कुछ संस्थाएँ ऎसी होती हैं जिनके उद्देश्य उसके हित और आकांक्षाओं से भिन्न होते हैं. वे अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए लोगों को कई बहनों से अपने से जोड़ कर रखती हैं – अपने औज़ार के रूप में उनका इस्तेमाल करने के लिए. इनमें से कुछ संस्थाएं और व्यवस्थाये उन्हें पशु बनने को प्रोत्साहित करती हैं तो कुछ दूसरी यंत्रमानव बनाने का प्रयत्न करती हैं. मनुष्य बनाने में इनमें से किसी की दिलचस्पी नहीं. यह जिम्मेदारी मनुष्य को खुद उठानी पड़ती है- आत्मना उद्धरेत् आत्मानम् नात्मानम् अवसीदयेत्. और इसके लिए उसे पहले ऎसी संस्थाओं, व्यवस्थाओं और दलों से अलग होना पडेगा जो उसका एकांगी विकास करके अपना उपकरण बनाती हैं, परन्तु मनुष्य नही रहने देतीं.”
“तुम भटक रहे हो,” उसने कुछ खीझ कर कहा.
मैं अपनी ही रौ में बोलता रहा, “हमारे बुद्धिजीवियों की सबसे बड़ी समस्या है कि वे इन्ही संस्थाओं और दलों से चिपके रहे है या इनसे जुड़े किसी व्यक्ति द्वारा अनुग्रहीत रहे हैं. उन्ही के अनुसार अपने को स्वयं ढालते रहे हैं. उनके विषाद ज्ञान और अध्ययन के बाद भी उनके पशु या रोबोट बनाने की विडम्बना का कारण यही है. और यही कारण है कि एक बहुत कम पढ़े-लिखे और यहां तक कि अनपढ व्यक्ति के मुकाबले ये अधिक मूर्खता की बातें करते हैं क्योंकि वह मनुष्य है और इन्होने अपनी मनुस्यता खो दी है.
इसके चलते, जनता और बुद्धिजीवी के बीच की दूरी बढती जाती है और इसी अनुपात में साहित्यकार और बुद्धिजीवी की शक्ति घटती जाती है और वह सत्ता के केन्द्रों और संगठनों पर अधिक निर्भर होता जाता है. अब गर्व करने को उसके पास उससे मिले सत्कार और पुरस्कार और नेताओं और नौकर्शाहों से निकटता ही रह जाती है जब कि उसकी हैसियत अपने विचार और जनता में अपनी पहुँच के बल पर ऎसी होनी चाहिए कि राजनेता और नौकरशाह उससे या उसकी पुस्तकों से परिचित होने पर गर्व करेंi उन्हें गर्व करने के लिए विदेशी लेखकों और विचारको के पास दौड़ना पड़ता है. और हमारा लेखक विदेशी लेखकों जैसा बनने की कोशिश में न घर का रहता है न घाट का.
“देखो, मुझे डर है कि तुम आज फिर बहक जाओगे. मैं पूछता हूँ कि वेद में …”
“देखो, मैं चालीस साल से वेद पर काम कर रहा हूँ और यह जानता हूँ कि मैं अभी तक उसकी ऊपरी पापड़ी तक ही पहुँच सका हूँ और साथ ही यह भी जानता हूँ कि मुझसे पहले मेरी जानकारी में कोई दूसरा वहाँ तक भी नहीं पहुँचा था. ऋग्वेद विश्व सभ्यता के प्रथम शिखर की साहित्यिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक ऊर्जा की अभिव्यक्ति के नितांत क्षुद्र अंश का संग्रह है, फिर भी इसकी इतनी तरह की व्याख्याएँ हो सकती हैं कि इसमें से हीरे से लेकर कंकड़ तक कुछ भी निकाला जा सकता है. यही नहीं उसी को एक हीरा बता सकता है दूसरा कंकड़.”
“यार ऋग्वेद का नाम आते ही तुम इतने भावुक हो जाते हो कि जो कुछ नही जानता उसे भी लगता है इसका महिमामंडन किया जा रहा है.”
“जो कुछ नहीं जानता वही ऎसी बात कर सकता है और जो कुछ जानना नहीं चाहता वही उसको प्रमाण मान सकता है. अंधे अँधा ठेलियाँ दोऊ कूप पडंत. हमारे बुद्धिजीवी समाज में …अरे रुको. बुद्धिजीवी का मतलब जानते हो या नहीं?”
वह हंसने लगा, जानता हूँ . तुम्ही ने एक दिन बताया था, “बुद्धि बेचकर खा जाने वाले.”
“हाँ इन अक़्ल के धनी लोगों के पास अक़्ल होती तो है पर उसे इतनी तेज़ी से बेचते हैं कि उनके पास बचती ही नहीं. किसी से उधार लेने में शर्म भी आती है. ऐसे ही लोगों से तुम्हारा पाला पड़ा है. भई, यदि किसी विषय को नहीं जानते हो तो उसपर चुप तो रहो. सुनने की आदत तो डालो. ये वेद को क्या समझेंगे, मैंने जो लिखा है उसे तक नहीं समझ पाते फिर भी मुँह खोलने से बाज़ नहीं आते. विद्वान को जानना चाहिए कि कब और कहाँ चुप रहना चाहिए. यह बोलने से अधिक ज़रूरी है.”
“गई भैंस पानी में .” वह खीझ कर बोला. “तुम सीधे विषय पर क्यों नहीं आते?”
“विषय पर ही बात कर रहा हूँ. पहले वेद के विषय में जो उच्चाटन मंत्र लगातार दुहराया जाता रहा है उसे तो उतार दूँ कि तुम सुनने और समझने की स्थिति में आओ. पहले यह तो बता दू कि तथ्य कथन भी इतना अविश्वसनीय हो सकता है कि वह अतिरंजना लगे. कोई कहे कि प्रशांत महासागर में कुछ ऐसी गहराइयाँ हैं कि कैलाश पर्वत को भी उसमें डालो तो डूब जाये, इसे जो प्रशांत महासागर को नही जनता उसे यह अतिरंजना लगेगा और जिसने अपने गांव के पोखर को छोड़ कुछ देखा ही नही उसकी तो बात ही नहीं.”
वह भड़क उठा. हद करते हो. कौन सा तथ्य है तुम्हारे पास जो मेसोपोटामियन और मिस्री सभ्यताओं के रहते ऋग्वेद काल को प्राचीन सभ्यताओं का शिखर सिद्ध कर दे?”
“इसकी भाषा जो सीधे और कुछ टेढ़े भारत से युरोप तक फ़ैल गई जब कि उनकी भाषाएँ उनके दायरे में सिमटी रह गईं. इसकी रीतियाँ नीतियाँ, पोशाक विचार, स्वच्छता के सरोकार, यहां तक कि इसके मुहावरे जो भारत से ग्रीस तक फ़ैल गए.
हद करते हो यार. लगता है विषय पर बात आज भी नही हो पायेगी. ये तुम हर चीज़ को उलट क्यों देते हो. तुम तो उनमें से लगते हो जो कहते हैं कि पिरामिडों के ज्यामितीय सूत्र भी भारत से मिस्र पहुँचे.”
“मैं नही जानता वे क्या और किस आधार पर ऐसा कहते हैं पर प्रभाव विस्तार तो इस देश से ही हो रहा है. भाषा और संस्कृति की बात तुम्हारी समझ में नहीं आएगी, पर यह तो समझ में आ जानी चाहिए कि अनसिले वस्त्र से तन ढकने का प्रसार यूरोप से भारत की और नहीं हुआ हो सकता, भारत से यूनान की तरफ अवश्य हुआ है और इसमें मिस्र भी लिपट आता है. मैं उलटता नहीं हूँ. इतनी मेहनत से जिसे हज़ारों इतिहासकारों, भाषाशास्त्रियों और अनुसंधान संस्थानों द्वारा उलटा गया,उसे एक अकेले ही सीधा कर देता हूँ तो वे सभी ज़मीन पर आजाते हैं और घबराहट में चीखते हैं उधर मत देखना उधर मत देखना, देखोगे तो नंगा हो जाऊँगा. अपनी आँखों देखता हूँ. तुम भी देखो और अपनी आँखों देखने की आदत डालो.

Post – 2015-10-20

‘ अच्छा यह बताओ कि तुम किसी आदमी को बचाओगे या जानवर को.”
मैंने कहा “दोनों को”.
“यदि दोनों को न बचाया जा सके तो?”
“देखूँगा कौन मेरा है.”
“कोई तुम्हारा ने हो तो?”
“देखूँगा कौन संकट में है.”
“संकट का कारण आदमी हो और संकट में जानवर हो तो?”
“तो कहूँगा उसे छोड़ दो.”
“यदि वह न माने तो?”
“मेरे वश में होगा तो मैं जानवर को संकट से बचाने के लिए जो कुछ करना पड़े करूँगा, नहीं तो वहां से हट जाऊँगा.
“तुम तो पक्के जैन निकले: न हिंसा करूँगा, न करवाऊँगा, न तो उसे होते हुए देख सकूँगा. ‘न करेम, न कारवेम. करन्तम ‘पि न पस्सेम.’
“”तुम जानवर को बचाने के लिए मनुष्य पर बलप्रयोग कर सकते हो?”
“जानवर को बचाने के लिए नहीं, अंतरात्मा को बचाने के लिए.”
“कुछ समझा नहीं.”
“मैं तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ. एक बार लिंकन सूट बूट में सजे अपने क्लब जा रहे थे. रस्ते में एक गीज़र पड़ता था. तुम जानते हो, गीज़र के आसपास दलदल बन जाती है और उसमे कोई फँस गया तो बाहर निकल नहीं सकता. लिंकन ने देखा एक सूअर उसमें फँस गया है और छटपटाता हुआ निकलने की कोशिश में और फंसता जा रहा है. लिंकन ने घोड़े से उतरे पेट के बल फैल गए. सूअर की पूँछ पकड़ कर उसे बहार खींचा और फिर कीचड़ सने कपड़ों में क्लब पहुंचे तो उनकी हालत पर सवाल तो होने ही थे. उन्होंने पूरी घटना का उल्लेख किया तो सुनने वाले हंसने लगे, “आपने एक सूअर की जान बचने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी?”
“लिंकन ने जवाब दिया. सूअर को बचाने के लिए नहीं, अपनी अंतरात्मा को बचने के लिए. यदि मैं उसे उस तरह तड़पता छोड़कर चला आता तो मैं अपने को क्षमा नहीं कर सकता था.” मैं कुछ रुका परन्तु वह स्वयं कहीं खो गया था. मैंने कहा, “और सुनो., लिंकन पोर्क कहते थे.”
आज के माहौल में इस सीधी सी बात को समझना कितना कठिन है कि पशुवध और पशुवध के प्रदर्शन में अंतर है और इस अंतर का ध्यान रखा जाना चाहिए. जीवदया और जीवदया की आड़ में मनुष्य के उत्पीड़न में अंतर है और इस अंतर का सम्मान किया जाना चाहिए.”
10/20/2015 :9.45AM

Post – 2015-10-19

“वह कौन सा वेद है जिसमें गोवध पर मृत्युदंड का विधान है?” समाचार आज ही छपा था, और जिस पत्र में इस आशय का लेख छपा था उसका नाम भी दिया था . मैंने इसे पढ़ा था तो हँसी आई थी अब जब वह पूछ रहा था तो गुस्सा आरहा था. मैंने उसे झिड़का “कोई और विषय नहीं है बात करने को?”
“मैं तो नाम पूछ रहा हूँ और तुम नाराज़ हो रहे हो.”
“पाञ्चजन्य वेद.”
“अभी तक तो मैं चार ही वेदों को जानता था. यह पाँचवाँ वेद कहाँ से ढूँढ लाये, भाई.”
“तुम्हारी जानकारी चार ही वेदों की है तो मैं क्या कर सकता हूँ. तुमने क्या सूक्ष्म वेद का भी नाम नहीं सुना जिसकी जानकारी का दावा कबीर साहब करते थे.”
वह गड़बड़ा गया, “कबीर भले कहें “बेद कत्तेब को गम्म नाहीं’ परन्तु उनके चेलों ने जान लिया कि वेद क़े ज्ञान क़े बिना कोई प्रमाण पुरुष नहीं बन सकता इसलिए सूक्ष्म वेद का आविष्कार कर लिया. ज़रूरत पड़ने पर चार वेद से सोलह वेद बन जाते हैं यह तो तुम जानते ही होगे.”
उसे यह भी पता नहीं था.
“एक मूर्ख राजा था और उसी क़े दरबार में उसी के योग्य एक राज पंडित था. उसका ऐलान था कि जो कोई उसे बहस में हरा देगा वह उसके प्राण ले सकता है, परन्तु यदि हार गया तो उसे प्राणदंड मिलेगा. निर्णायक राजा था. जो भी पंडित आता उससे वह एक ही सवाल करता. ‘वेद कितने हैं?’ तुम्हारी तरह वे भी कहते, ‘चार’. वह कहता, ‘वेद आठ हैं.’ पंडित कहता, ‘यह हो ही नहीं सकता.’ वह, सवाल करता, ‘वेद स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग?’ उत्तर मिलता, ‘पुल्लिंग.’ वह राजा को समझाता, ‘जब चार वेद हैं तो चार वेदनियाँ भी तो हुईं. अब कुल संख्या आठ हुई या नहीं.’ राजा उसे विजेता घोषित कर देता और उस पंडित को फांसी दे दी जाती. राजा को गर्व था कि दूसरे विद्वान सिर्फ चार वेदों की जानकारी रखते है, जब कि उसका दरबारी पंडित आठ वेद जानता है. बात फैली तो आया एक नया पंडित. प्रश्न पूछा गया, ‘वेद कितने हैं.’ उसने कहा, ‘ सोलह’. राजा का माथा ठनका, ‘यह तो उसके पंडित से भी बड़ा पंडित लगता है.’ उसके राजपंडित ने कहा, ‘आठ’. नए पंडित ने पूछा, “कैसे?” उसने चार वेद और चार वेदिनियों का तर्क दुहराया.
नया पंडित राजा की ओर मुडा, ‘महाराज, जब चार वेद और चार वेदनियाँ साथ रहेंगे तो उनके लड़का और लड़की भी तो होंगे. इस तरह सोलह वेद हुए या नहीं. राजा को बात जाँच गई. उसने सोलह वेदों के जानकर तो अपना दरबारी पंडित बना लिया और पुराने पंडित को फाँसी चढ़ा दिया.
“तो जरुरत पड़ने पर लोग जितने वेद चाहें निकाल सकते हैं. पाँचवें वेद की बात तो बहुत पहले से लोग करते आए है. किसी कि लिए नाट्यशास्त्र पाँचवाँ वेद था तो किसी कि लिए कामशास्त्र, किसी तीसरे कि लिए महाभारत. इटली का सबसे पहला पादरी जो मदुरै आया था, नोबिलि, उसने पहले तो ईसाई बने तमिल ब्राह्मणों से संस्कृत सीखी और फिर बाइबिल कि चुने हुए अंशों का संस्कृत में अनुवाद किया और घोषित किया कि वह समुद्र पार से वह पाँचवाँ वेद लेकर आया है जो खो गया था, और इसी पाँचवें वेद का अनुवाद जब वाल्तेयर भी मुर्ख बन गए. और जानते हो इसका भी दोष मक्डोनल ने ब्राह्मणो के ऊपर दाल दिया. तो यदि इतनी बार पाँचवाँ वेद पैदा हो सकता है तो आज की ज़रूरत से पाञ्चजन्य वेद पैदा नहीं किया जा सकता?.” पूरी बात उसकी समझ में आई तो वह छतफाड़ ठहाके भरने लगा, एक दौरे कि बाद एक.

Post – 2015-10-18

“अरे, तुम तो अपनी खोल उतार कर पूरी तरह मोदी के साथ खड़े हो गए. मैंने फेस बुक पर तुम्हारी कबिताई पढ़ी तो दंग रह गया. कुछ दिन पहले तो तुम कह रहे थे साहित्यकार को सत्ता के निकट नहीं जनता के निकट पहुँचना चाहिए. तुम्हारा तो कायाकल्प हो गया.”
वह बोलता रहा और मैं मुस्कराता हुआ सुनता रहा. चुप हुआ तो पूछ, “कुछ और?”
“अब इसके बाद कहने को बचा ही क्या रह जाता है?”
“कहने को न इससे पहले तुम्हारे पास कुछ था, न अब है, न आगे हो सकता है. तुम ट्विटर युग के तोते हो. आदमी की आदतें भूल गए हो. जानते हो आज का साहित्यकार किस से अपनी भाषा सीख रहा है?”
“तुम्हारी मानें तो तोतों से.”
“तोतों से नहीं मक्कारों से. हमारे युग की शासिका भाषा एड्वर्ल्ड की भाषा है जिसमे माल बेचने वाले ऐसी फंतासी तैयार करते हैं जिसे सुनते समय तुम जानते हो यह झूठ है. इसकेलिए उनके लोभ का इस्तेमाल किया जाता है जिनकी कलाबाज़ी के पीछे तुम पागल रहते हो. इसकी स्क्रिप्ट लिखने वाला जानता है कि वह झूठ लिख रहा, परन्तु वह इस बात पर गर्व करता है कि वह अपनी प्रतिभा से सच को झूठ और झूठ को सच बना सकता है.इसे सुर देने वाला गायक जनता है कि वह पैसे के लिए अपनी तड़प उस इबारत में भर रहा है जिसका एक एक शब्द मक्कारी से भरा है, इसके लिए अपनी अदा समर्पित करने वाला जानता है कि वह उनके साथ धोखा कर रहा है जो उसकी एक झलक के लिए जोखिम मोल ले लेते हैं और यह भी जनता है कि वे इस धोखाधड़ी को भांप लेंगे.कहो इनके उत्पादक, प्रायोजक, लेखक, कवि, कलाबाज सभी को यह पता होता है कि इसे बार-बार दुहरा कर अवचेतन में उतार देने के बाद इस धोखे को भाँपने वाले इस धोखाधड़ी से अपने को बचा नहीं सकेंगे. वे एक रूसी की समस्या को इस तरह उछाल सकते हैं कि उसके सामने महामारी भी तुच्छ लगे, ऐसी समस्या कि जिसके सुलझे बिना जीवन ही व्यर्थ हो जाये. भाषा का इतना कमाल कि ज़रूरत पड़ने पर यह भी समझा सकें कि रूसी को बढ़ने दो, रूसी क्रांति रूसी बढ़ने से ही हुई थी. तुम इन लफ़्फ़ाज़, लोभियों को कला और साहित्य या साहित्यकार की चिंता से कातर समझ बैठते हो, तुम उन्हें बुद्धिजीवी मान बैठते हो जो सम्मान बटोरने की कला भी जानते हैं और सम्मान उछालने की भी कला जानते हैं और इस जुनून में सम्मान देनेवाली संस्था तक का सम्मान नष्ट कर देते हैं? तुम नही बुद्धिमान मान लेते हो जो जानते हैं कि यह धोखाधड़ी है पर दर जाते हैं कि वे उन्हें सम्मान का लोभी न मान बैठें और अपने विवेक को त्याग कर कहते हैं चलो भाई हमने भी फ़ेंक दिया. इसका भी जस बटोरलो.”
“मैं सोचता हूँ कि…” उसने कुछ कहने की भूमिका बनाई ही थी कि मैंने उसे दबोच लिया, “सोचना कब से शुरू कर दिया तूने. यह खतरनाक काम है. पहले मानने की आदत छोडो, समझने की कोशिश करो, फिर सोचने भी लगोगे. अभी तो मेरे समझाने के बाद भी तुम तोहमत लगाने की आदत तक नही छोड़ पाये. उस तुकबंदी तक को नही समझ पाये जिसके साथ एक चित्र और इबारत भी दी गई थी.”
“पर कविता तो…”
“पहले उस कविता में उठाये गए सवालों के जवाब तलाशो. जो बात तुम्हें अज्ञात कारणों से गलत और मुझे ज्ञात कारणों से सही लगती है उसे कहने की मुझे आज़ादी दो. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सबसे बड़ा शत्रु कौन है? जो तर्क और प्रमाणों के आधार पर कुछ कहता है वह या वह जो अभियोगों और लांछनों की भाषा से ऎसी उत्तेजना पैदा करता है कि संवाद संभव ही न रह जाय. संवेदनहीन कौन है जो दुखद घटनाओं को लुकाठा बनाकर आग लगाने और ऐसी संस्थाओं को भस्म करने को दौड़ पड़ता है जिनके बनाने में युग लगा जाते हैं या वह जो उन मर्मान्तक घटनाओं पर स्तब्ध रह जाता है?”

Post – 2015-10-17

मैं चाहता हूँ कि तुम खुश रहो पर खुश हो क्या.
अच्छे दिन आने थे, आये हैं, मगर खुश हो क्या?
अगर नाखुश हो बताओ तो नाखुशी की वज़ह
बुरे दिनों की वापसी हो तो तुम खुश को क्या?
क्या कहा तुमने ‘बुरे दिन उन्हें कहा ही नहीं’
जो कहा करते थे, करते थे उससे खुश हो क्या?
तुम किनके साथ थे वे कर रहे थे क्या उस वक़्त
उनके हमराज और हमदर्द बन के खुश हो क्या?
तुम भी भगवान बका करते हो जाने क्या क्या
आईना लेकर घूमते हो मगर खुश हो क्या?
inspired by a comment by a veteran politician

Post – 2015-10-17

“भाई देखो, जब तुमसे बात करता हूँ तो तुम क़ायल कर देते हो. फिर मन में दुविधा पैदा हो जाती है. भाजपा की करतूतों से ऊब कर दूसरे साहित्यकार उससे अलग हो रहे हैं ..”
मैंने बीच ही में टोक दिया, “अलग तो हो ही नहीं सकते.”
“क्या बकते हो?”, वह खीझ उठा.
मैंने कहा, “अलग तो वह हो सकता है जो पहले लगा रहा हो. तुम कह सकते हो जो कांग्रेस के राज में सत्ता से लगे जुड़े थे, वे अब उसके सत्ता से बाहर हो जाने के बाद सत्ता से अलग-थलग पड़ गए हैं.”
“चलो वही सही. मुहावरे का फेर है. वे अलग-थलग पड़ गए हैं और इस मौके का फ़ायदा उठा कर उससे जुड़ गए हो. गलत कहा?”
“तुम ग़लत तो हो ही नही सकते. मूर्ख कभी गलत हो ही नही सकते, क्योंकि वे कुछ कहते ही नही. केवल तोहमत लगाते हैं.”
“इतने सारे जो लोग हैं क्या वे मूर्ख हैं.”
“मैं तुम्हे मूर्ख कह रहा हूँ, तुमने इतने सारे लोगों को समेट लिया.”
“वे भी तो बिना कुछ कहे तोहमत ही लगाते रहे हैं. प्रतिभा में अनेक तुमसे ऊपर ही पड़ेंगे.”
“अनेक नहीं सभी. परन्तु तुम जानते हो संस्कृत में लाइलाज मूर्खता की कहानियाँ पंडितों को लेकर ही मिलाती हैं. अज्ञानी गलती करता है. मुझसे बहुत गलतियां होती हैं. ज्ञानी लोग मूर्खताएं करते हैं. जब कोई ज्ञानी लोभ, मोह, क्रोध, जलन, दम्भ, भय आदि में कुछ करता है तो मूर्खताएँ ही करता है.”
“पर…” वह कुछ कहने को हुआ. मैंने उसे रोक दिया, .”जब कोई यह सोच कर कुछ करता है कि दूसरे क्या सोचेंगे, तब वह नहीं सोचता, उसकी कल्पना में दूसरे जो कुछ सोचेंगे उसे वह अपना सोचा मान लेता है. खाप की मानसिकता. इसमें सच को झूठ और झूठ को सच मान लिया जाता है. जब कोई सोचता है तब वह इस बात पर ध्यान नहीं देता कि दूसरे क्या सोचते हैं या क्या सोचेंगे या पहले क्या सोचा या माना जाता रहा है. वह केवल वस्तुस्थिति पर ध्यान देता है. सत्य का सीधा साक्षात्कार. वह तत्वद्रष्टा होता है, क्रांतदर्शी हो जाता है. ऋषि हो जाता है. इसकी शक्ति उसे अपनी आँखों पर भरोसा करने से मिलती है. वह एक ख़ास माने में त्रिकालदर्शी हो जाता है, भूत, वर्तमान, भविष्य तीनों को देख लेता है.”
“और तुम वही हो.” उसने व्यंग से हँसते हुए कहा.
“पहली बार तुमने एक सही बात कही है. चलो अभी दिखाता हूँ इसका प्रमाण.” मैं उसे खींच कर घर तक लाया और अपनी किताब ‘भारत: तब से अबतक’ सामने रख दी.” देखो इसमें तीनों काल आगये न.”
उसने इतने ज़ोर का ठहाका लगाया कि रसोई में रखे बर्तन तक खड़खड़ा उठे, “इस नाम से ही तुम त्रिकालदर्शी हो गये?” .
मैंने कहा, यह लेख पढ़ो. यह किताब १९९६ में छापी थी. यह लेख पहले ‘तीसरी दुनिया’ में छापा था. पता नही कितने साल पहले. शीर्षक तुम देख रहे हो ‘खुदा वह वक़्त न लाये कि सोगवार हो तू’. आज जो लोग शोक मना रहे हैं उन्हें आज से पचीस साल पहले मैंने चेताया था कि जो नाटक चला रहा है उसका परिणाम क्या होगा. इसके लिए तुम ज़िम्मेदार होगे. इसमें जो कुछ कहा गया था वह आगे चलकर अक्षरशः सत्य हुआ.” लंबा लेख, १९ पन्नों का. वह उसमें डूब गया और मैं चाय के इंतज़ाम में. चाय लाकर रख दी वह बीच बीच में चुस्की लेता हुआ उसी में खोया रहा. और जब मेरी और रुख किया तो आँखों में विस्मय. मेरा ही लेख एक ख़ास पन्ने पर खोल कर मेरे सामने रख दिया:

Post – 2015-10-16

जो चले जाते हैं अक्सर वे चले जाते हैं
“साकिने कूचए दिलदार इधर आते हैं”
यह भी हो सकता है सोचा ही नहीं था पहले
यह भी कर सकते हो यह सोच कर घबराते हैं
गो मुहब्बत में अदावत की जगह थी पहले
अब अदावत में मुहब्बत के सुर मिलाते हैं
परदे के पीछे तो हुंकार ही हुंकार ही है
मंच पर सादा आप ज़्यादा नज़र आते हैं.
‘एक औज़ार है नफ़रत भी’ कहा था किसने
आप उसके ही सर्वहारा नज़र आते हैं
मैंने भगवान से पूछ कि यार चुप क्यों है
बोला हम सच नहीं अफ़साना नज़र आते हैं .
10/16/2015 8:29:07 PM

Post – 2015-10-16

“तुम क्या यह नहीं मानते कि आज की सबसे बड़ी समस्या सामाजिक सौहार्द को बनाये रखने की है?”
हम लड़ सकते हैं पर बात करने से भाग नही सकते. मैंने कहा, “क्या तुम इसे समस्या मानते हो?”
“क्यों? भई क्यों नहीं मानूँगा?”
“तब यह भी जानते होगे कि किसी समस्या पर विचार करने के लिए किन चीज़ों की ज़रूरत होती है?”
“किन चीज़ों की ज़रूरत होती है, तुम्ही बताओ.”
“एक, ठन्डे दिमाग की, उत्तेजित मन से विचार नहीं किया जा सकता, भावनाएं अवश्य भड़काई जा सकती है जो समस्या को समझने में ही बाधक होंगी. दो, सही आंकड़ों की. तीन, धैर्य की, क्योंकि तत्काल जो सूचनाएँ मिलती हैं वे सच और अफवाह के बीच होती हैं और अधूरी होती हैं. चार, कार्य-कारण- कर्ता की सही पहचान की. पांच, सही अनुपात के निर्वाह की; छह, राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होने की; और अंतिम है सही माहौल में विचार करने की और अपने को सही सिद्ध करने की मानवीय दुर्बलता पर काबू पाने की. क्या तुम इससे सहमत हो?”
“पूरी तरह नहीं.”
“मसलन?”
“मसलन सही माहौल और सही टाइम को खींच कर समस्या को ठन्डे बस्ते में भी डाला जा सकता है. और जो तुम राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होने की बात कर रहे हो उसमें उसके विषय में जो पहले से मिली जानकारियां हैं उन्हें नकारने का मतलब है सूचना और विचार के एक महत्वपूर्ण हिस्से को काटकर अलग कर देना.”
“मैं न तो विचार को स्थगित करने जा रहा हूँ, न ही किसी राजनीतिक संगठन के विषय में सही जानकारी को कम करने की बात कर रहा हूँ. मैं विचार करते समय तटस्थता के निर्वाह की बात कर रहा हूँ.”
“एक उत्तेजक स्थिति में तटस्थता का क्या मतलब? तटस्थता का एक नमूना इतहास में मिलता है. रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था. तुम्हारी स्थिति नीरो वाली है. जब आग लगी हो तो तटस्थ नही रहा जा सकता.”
मैं हंसने लगा, “अरे भाई, तू बैताल की तरह घूम फिर कर एक ही सवाल पर क्यों आजाता है. सुनो, आग लगने के समय नीरो की तरह तटस्थ हो कर बांसुरी नहीं बजाई जा सकती. उस पर पानी बालू जो हाथ लगे डालना होगा. सक्रियता के नाम पर उसपर घी या तेल या ईंधन नही डाला जा सकता. उत्तेजना को बढ़ाकर नई उत्तेजना के नही पैदा की जा सकती.”
वह कुछ बोलने को हुआ. मैंने उसकी परवाह नही की, “और सुनो, जब मैं कहा रहा था कि ” धैर्य से, उचित माहौल में ही समस्या पर विचार किया जा सकता है तो यही कह रहा था कि जब आग लगी हो तो आग लगाने के कारणों, लगाने के तरीकों, लगाने वालों पर विचार नही किया जा सकता न ही बिना पूरी पड़ताल के किसी को उसी समय दोषी बता कर एक नई आग लगा कर फैलाया और पहले ही लगी आग की और से ध्यान हटाया जा सकता है. यह नीरो के बाँसुरी बजाने से भी अधिक बड़ी नृशंशता है.”
10/16/2015 10:47:07 AM

Post – 2015-10-15

“हाँ अब अपने ‘परन्तु’ की कड़ी आगे बढ़ा सकते हो.” मैंने बेंच पर बैठते हुए स्वयं उसे उकसाया.
“आज भी जल्दी में हो क्या? आराम से बैठो तो सही.” फिर कुछ सकुचाते हुए बोला, “कड़ी बढ़ाने जैसी कोई बात नहीं है. मुझे तुम्हारी बातों से लग रहा था कि साहित्यकारों के बारे में तुम्हारी राय अच्छी नहीं है.”
“तुम्हे यदि ऐसा लग रहा था तो गलत नहीं था.”
“तब तो तुम्हारी राय अपने बारे में भी अच्छी नही होगी.” उसने मुझे घेरना चाहा.
“अपने बारे में ही नही, भारतीय बुद्धिजीवियों के बारे में ही मेरी राय खराब है. हम बौद्धिक परजीवी हैं. पश्चिमी प्रचारतंत्र का हिस्सा, और मज़े की बात यह कि हम इसे जानते तक नही.”
“तुम चौंकाने के लिए ऎसी बात कर रहे हो या सचमुच गंभीर हो?”
मैं अपनी ही रौ में बोलता रहा, “हम अपने ज़मीनी पड़ताल के लिए आज भी उनके तथ्यसंग्रह और शोधकार्यों पर निर्भर हैं पुराना लिखा भण्डार तो नब्बे प्रतिशत उनका ही है. जो बुनियादी काम करेगा वह बड़ी मासूमियत से अपने इरादों के अनुसार तुम्हारा इस्तेमाल कर लेगा. तुम समझोगे ज्ञान बटोर रहे हो और वह तुम्हारी पीठ थपथपा रहा है. हमारे बुद्धिजीवी सोचते नहीं हैं सोचे हुए का मंचन करते हैं. हम बौद्धिक नहीं हैं बौद्धिक की भूमिका करने वाले ऐसे पात्र हैं जो वैचारिकता का भ्रम पैदा कर लेते हैं. हम न तो अपनी समस्याओं को समझ पाते हैं न ही उनके समाधान की योग्यता रखते हैं. हमारी सारी शक्ति अपने को दूसरों से आगे रखने मैं चली जाती है.”
“अब देखो साहित्य के नाम पर इतना लिखा जा रहा है और हमारे पास अपना साहित्य है ही नहीं.”
“यह तुम्हारा नया मायावाद है. जो है वह होकर भी नहीं है और जो परम सत्य है वह पकड़ आ ही नहीं सकता.”
” जिसे हम अपना साहित्य कहते हैं वह हमारी भाषा में उनका साहित्य है. उनका साहित्य भी नहीं, उनका साहित्यलिखने की कोशिश मात्र है जो न हमारे लोगों के काम का है न उनके. हाँ यदि उसमे इस बात का चित्रण है कि हम कितने गर्हित हैं तो इस पर वे तालियां बजाना नहीं भूलते. इसे हमारे लेखक दाद समझ लेते हैं और अपना जीवन सार्थक मान लेते हैं. हमने औपनिवेशिक मानसिकता के कारण अग्रणी देशों जैसा बनने की कोशिश में उनकी नक़ल की. उनसे सीखा नहीं. नक़ल की. और यह नक़ल माइकेल मधुसूदन दत्त से ही आरम्भ हो गया था. उनके जैसा बनने, उनके जैसे छंद और कलविधान में लिखते हुए उनके बराबर आने की छटपटाहट. छटपटाहट से आरम्भ और छटपटाहट में अंत.. अपने अंतिम दिनों में मधुसूदन दत्त को तो अपनी चूक समझ में आगई पर बंकिम बाबू और रबिन्द्र नाथ के माध्यम से वह पुरे हिंदुस्तान में छा गई.”
“”शरतच्चन्द्र के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है?”
“शरत और देवकीनन्दन खत्री और प्रेमचंद में हमारी पुरानी किस्सागोई और पाश्चात्य कथशिल्प का अपने अपने ढंग का मिश्रण है. द्विवेदी जी ने भी कोशिश की. ऐसे प्रयोग इधर हाल में असगर वज़ाहत ने किये हैं. कविता में उर्दू वालों ने इसे बचाया लेकिन उसका सबसे आधुनिक शायर ईरानियों जैसा होने की कोशिश में लग गया और भाषा की सामत आगई वह अपने ही जनसमाज से दूर जाने लगी. हमारे लेखकों ने पश्चिम का जो भी चर्चित लेखक हुआ उसकी रचनाओं को पढ़कर, उसकी संवेदनाओं को आत्मसात करते हुए वैसा लिखने को अपनी उपलब्धि मान ली. वे लेखक अपने समाज के मिजाज के अनुसार अपनी संवेदना और शिल्प को पैना करते रहे और हम अपनी भाषा में उनके जैसा लिख कर किसी विदेशी भाषा में अनूदित होने को अपने ही समाज में पहुँच बनाने से अधिक महत्व देने लगे.”
“तुम किसी भी बात को इतना फैला देते हो कि लगता है क्लास ले रहे हो.”
“मैं उस व्याधि को समझा रहा था जिसके चलते लिखा बहुत कुछ जा रहा है पर समाज तक नहीं पहुँच रहा है और लेखक पुरस्कारों को पाने और खोने को, अनूदित होने और न होने को लेखकीय सफलता की कसौटी मानने लगे हैं. हमें अपने पुराने कलारूपों में आज की चुनौतियों के अनुसार कुछ निखार लाना था और इस दिशा में प्रयोग करते हुए एक नया सौंदर्यशास्त्र विकसित करना था, वह नही किया. राजनीति करने लगे. राजनीतिक घटियापन को साहित्यिक चुनौतियों से अधिक प्राथमिकता देने लगे.”
“तुम्हारा मतलब है, यह जो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए लेखकों का आक्रोश है वह घटियापन है?”
“तुम अभी वहीँ पर खड़े रहा गए हो जहां कल थे.”
“खड़ा मैं नहीं हूँ. मैं डटा हुआ हूँ. खड़े हो रहे हो तुम फासिस्टों के साथ.”
“तुम मूर्ख नही जड़ हो. तुमसे बात करने का लाभ? तुम्हे यह तक नहीं दिखाई देता ये साहित्य के बल पर नहीं गठजोड़ के बल पर राजनीतिज्ञों की कृपा पर पलने वाले लोग हैं जिनमें इतनी भी समझ नहीं कि यदि राजनीति ही करनी है तो सीधे राजनीति में उतारो. अपने को इस देश का प्रथम घराना मानने वाले कहते हैं कि सत्ता उनके हाथ में नही रहेगी तो संसद नहीं चलने देंगे. विकास नहीं होने देंगे. उनकी कृपा पर पलने वाले पुरस्कार विजेता कहते हैं सत्ता हमारे कृपालुओं के हाथ में नहीं रहेगी तो साहित्य और कला की संस्थाओं को नष्ट कर देंगे. तर्क नही है. इसे अराजकता कहते हैं विरोध नहीं.”
मैं क्षोभ में उठ खड़ा हुआ. वह, ‘रुको रुको. अभी तो बात पूरी हुई ही नहीं’, कहता रहा पर मैंने उसकी ओर ध्यान ही न दिया.
10/14/2015 9:57:14 AM