Post – 2016-09-22

प्रयोग – 11
किं कर्मं किमकर्मेति कवयोप्‍यत्र मोहिता:

पार्क में बच्‍चों के लिए पैरलल बार, ढेकी राड, मंकी बार, सरक पट्टे, झूले थे। इनका सही नाम क्‍या है यह मैंने जानने की कभी कोशिश नहीं की। इन्‍हें पांच से दस बारह साल के बच्‍चों के लिए बनाया गया था, जो टहलने घूमने आने वाले मां बाप के साथ आते थे। मजदूरों के शैशव से स्‍वावलंबी बना दिए गए बच्‍चे इधर उधर भटकते पार्क में कदम पड़ते ही जिस उल्‍लास से हाथ फैलाए इनकी ओर दौड़ते उसे देख कर फर्राटे भरते पक्षियों की याद आ जाती। कुछ देर तक एक पर, फिर स्‍वाद बदलने के लिए दूसरे पर और जाहिर है आनन्‍द को पूरा आनन्‍द बनाने के लिए किलकारियां। उनकी इस क्रीड़ा को खड़ा हो कर देखना भी प्राकृतिक लीला के अवलोकन जैसा लगता।

परन्‍तु मुस्‍तंडाें का एक दूसरा वर्ग था। जिनके आयुवर्ग के लिए पैरलल बार, मंकीबार लगे जिससे वे व्‍यायाम कर सकते थे। परन्‍तु इनमें से अधिकांश काे छोटे बच्‍चों के लिए बने उपकरण अधिक पसन्‍द आते, इनको तोड़ने में उन्‍हें जितना आनन्‍द आता था, उतना खेलने में नहीं। इसके साथ कई तरह की मानसिकताएं काम करतीं।

यह पार्क इन अपेक्षाकृत ‘खुशहाल लोगों का’ है अत: इसे नुकसान पहुंचाना उनसे बदला लेने जैसा है। सामाजिक-आर्थिक भेद अपने से ठीक ऊपर वालों के प्रति आक्रोश पैदा करता है जिसे कई बन्‍धनों के कारण लोग सीधे व्‍यक्‍त नहीं कर या बड़े भोलेपन से अमल में लाते हैं। किसी कम्‍युनिस्‍ट से पूछें तो कहेगा ये क्रान्तिकारी शक्तियां है, जिन्‍हें एक बार संगठित होने का अवसर मिल जाय तो ‘आकाआें की हड्डियां तक चबा सकते हैं।’ उन्‍हें भी हड्डियॉं चबाने की क्रिया क्रान्ति से अधिक जरूरी लगती है, पर यह भूल जाते हैं कि उनके सभी नेता उसी जमात में शामिल हैं जिनकी हड्डियां सबसे पहले चबाई जाएंगी क्‍योंकि निकट पड़ोस में अल्‍पतम सुरक्षित वे ही मिलेंगे।

शिशुओं और बालकों के सरकने के लिए बने स्‍लाइड बोर्ड पर ये बड़े बच्‍चे कुछ दूर से दौड़ते हुए आते और उल्‍टे सिरे से जूता पहने ऊपर तक पहुंचने का प्रयत्‍न करते। कुछ ही समय बाद उसमें गढ्ढे पड़ जाते, फिर वह फटने लगता और सरकने के काम का न रह जाता । एक एक कर उन्‍होंने तीन की यही गति की थी। इसमें एक दबी चुनौती भी थी।

झूलों पर एक साथ दो दो, तीन तीन मुस्‍तंड खड़े हो कर झूलने लगते, सी-सा पर एक साथ कई उसके राड तक पर बैठ जाते। इसमें कालेज के लड़के लड़कियां किसी से पीछे नहीं रहते जो शगल के लिए विचित्र लगने वाली कई दूसरे तरह के कारनामे भी करते रहते थे। नतीजा क्‍या होगा इसकी चिन्‍ता नहीं।

जिन बच्‍चों के लिए झूले बने थे उनको धक्‍का दे कर खुद एक साथ दो तीन चढ़ जाते और ऊंची पेंगे भरते । कई बार बच्‍चे दौड़े मेरे पास आते। मैं अखबार पढ़ रहा हूं या किताब, उनकी बात सुनूंगा ही, यह विश्‍वास लिए, ”अंकल वहां वो लड़के हम लोगों को झूलने नहीं दे रहे हैं।” उनकी नजर में मैं यहां का छोटा मोटा सुपरवाइजर बन चुका था। किताब संभाले छड़ी टेकता, पहुंचता। उनको आवाज दे कर पास बुलाता, समझाता, अगर आना कानी करते तो फटकारता, ”यह इन बच्‍चों के लिए है। तुम्‍हारे लिए पैरलल बार और मंकीबार है। उतरो, भागो यहां से।” एक बार को छोड़ कर यह आदेश कभी विफल नहीं हुआ और उस बार मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इसे समझाऊं तो कैसे, ”तुम्‍हारे पास अक्‍ल नहीं है।” ”नहीं है।” ”मैं तो नहीं उतरता, आप चाहे पुलिस बुला लो।” ”पुलिस बुलाऊंगा तो मैं ही हार जाऊंगा, अभी तुम उतर जाओ तो तुम भी जीत जाओगे, मैं भी ये बच्‍चे भी।” मैं किसी से उलझा हूं यह देख कर लोग इकट्ठा हुए तो बड़े अनमने पन से हटा । यह धमकी देते हुए कि कल फिर आएगा, देखें कौन भगाता है।” अगले दिन क्रिकेट की टीम बना कर आया। मैंने उसकी उपेक्षा कर दी, यह भी नहीं समझाया कि यह खेलने की जगह नहीं है। उसका अहं तुष्‍ठ हो गया, शायद । उसके बाद न वह दीखा न उसका दल ।

पर झूलने का प्रलोभन तो छोटे बच्‍चों जैसा ही चौकाबर्तन करने वाली महिलाओं से कुछ उपर की हैसियत रखने वाली अधेड़ औरतों में होती। वे घूमने आतीं, मौका पा कर उस पर लद जातीं। बचपन से अतृप्‍त आकांक्षाएं। झूले के गीत तो उन्‍होंने जितने भी गाए हों, झूलने का अवसर शायद ही मिला हो। पेंग बढ़ा कर नभ को छू लें वाली पेंग भरने लगती। क्‍या कर सकते हैं आप। जो होना हो सो हो। और पहले उसका पटरा टूटता और जंजीर रह जाती फिर जंजीर बांध कर उस पर खड़े हो कर झूलते और उसे तोड़ कर ही दम लेते।

अगर विफलता का लेखा रखना हो तो इसमें तीन बार उसी अनुभव से गुजरना पड़ा। पहले डीडीए ने लगवाए थे जिनकी गुणवत्‍ता भी अच्‍छी थी। फिर शिकायत करने पर एमसीडी ने लगवाए जो घटिया थे और इनके टूटने के बाद एक बार अनुरोध करने पर एमसीडी ने फाइबर की सीट वाले झूले और फाइवर के ही घुमावदार स्लिपबोर्ड लगवाए, परन्‍तु जब उसको भी तोड़ डाला गया तो मैंने तय कर लिया था कि अपनी ओर से छोटे बच्‍चों के मनोरंजन के लिए कोई उपकरण लगाने पर जोर नहीं डालूंगा। पर लीजिए इस संकल्‍प के साथ ही, ‘हम छोड़ आए वो गलियॉं’ और गार्डन के पड़ोस से हटकर गार्डेनिया में पहुंच गए जहां गमले दिखाई देते हैं, पेड़ नहीं ।
2
समस्‍यायें पहले से होती हैं। जब तक उनसे अधिक गंभीर समस्‍यायें हमारा ध्‍यान खींचती रहती हैं, तब तक हम उनको देख नहीं पाते। हम कभी समग्र को नहीं देख पाते, उदग्र को ही देखते हैं और मान लेते हैं हम समग्र को जानते हैं। इस इलाके की संस्‍कृति और वस्‍तुव्‍यापार जैसा था, उसमें जब यह पार्क उजाड़ सा था उस समय भी स्‍कूल जाने वाली बालिकाएं इससे हो कर ही गुजरती थीं। उस दौर में वे यहां किसी न किसी बहाने ठहरती थीं या नहीं इस पर कभी ध्‍यान नहीं दिया जब कि आदतन आते तो चक्‍कर लगाने उस समय भी थे।

जब लक्ष्‍य किया तब वे या उनमें से बहुतेरी इस प्रतीक्षा में टहलती रहतीं कि उनका कोई दोस्‍त आएगा और उसके साथ घूमेंगी। कुछ अपने मित्र के साथ आतीे। इनको उतनी छोटी आयु में भी किसी लड़के के साथ की अपेक्षा करना मुझे विस्मित नहीं करता क्‍योंकि मनोविज्ञान में अपनी कुछ गति होने के कारण जानता था कि काम भावना और स्‍पर्शानुभूति बहुत कम उम्र में ही पैदा हो जाती है जिसे माताएं अपनी सन्‍तान के माध्‍यम से जानती है, पुरुष अपने बारे में भी मूर्ख रह जाता है। परन्‍तु यहॉं उनकी आयु का अन्‍तर कभी कभी विचलित करता। आप देखते हुए भी, बहुत कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं कर सकते। जीवन में सर्वत्र यह हाेता है। देवालयों और न्‍यायालयों में भी। मकतबों और मद्रसों में भी। शायद वहां सबसे अधिक जहां हम इसकी अपेक्षा नहीं करते इसलिए उसकी पड़ताल नहीं करते। मैं अपने हस्‍तक्षेप को हस्‍तक्षेप न मान कर एक प्रयोग मानता था इसलिए यह जानना चाहता था कि यदि इसमें ऐसा किया जाय तो परिणाम क्‍या होगा। बीच में कूद पड़ता, स्‍कूल जाओ तुम लोग। यहां क्‍यों चक्‍कर लगा कर अपना समय बर्वाद कर रहे हो। वे खिसक लेते और उनमें एकाध जो कहतीं, स्‍कूल एक घंटे बाद लगेगा तो फटकारता, ‘तो यहां समय क्‍यों बर्वाद कर रहे हो जाओ अपने घर।’

इसका असर पड़ता। वे भाग खड़े होते। जो रुके रह जाते उनका फोटो लेने का अभिनय करता, क्‍योंकि दिन की रोशनी में मुझे मोबाइल के संकेत तक दिखाई न देते, पर इसका असर होता और वे भाग खड़ी होतीं।

जब कालेजों के लड़के लड़कियां मौज मस्‍ती के लिए आने लगे उनके पारस्‍पर्य के प्रचार के बाद इन लड़कियों में भी यह अधिकार बोध जागा कि हम अपने फ्रेंड के साथ क्‍यों नहीं घूम सकते और मेरा पुराना प्रभाव कम हुआ । खाप पंचायतों के प्रभाव की तरह।

पर इसका एक सबसे चिन्‍ताजनक रूप यह उभरा कि शाम से ही आवारा लड़कों और लड़कियों का जमावड़ा आरंभ हो गया जो पहले नहीं था। वे आ कर उन बेंचों पर बैठ जाते जिन पर हम टहलने के बाद आराम के लिए बैठते थे। उन्‍हें मैं उठा देता, ‘यह आप लोगों के लिए नहीं है।’ वे चुप उठते और मुझे यह जानने की जरूरत न होती कि वे कहां गए, क्‍योंकि वे वहां बैठे ही इसलिए थे कि सघन वृक्ष की छांव में उन्‍हें जगह न मिल पाती थी।’

हाल इससे बुरा था गुलशन का । पता चला कि इसे प्रेमीजन जोड़ापार्क कहने लगे हैं। और इसे समझने के क्रम में पता चला कि यहां कुछ लड़कियां धन्‍धा करने के लिए बैठने लगी हैं और तकलीफदेह यह कि उनमें कुछ अल्‍पवय बालिकाएं भी थी जो सज संवर कर आतीं और ग्राहक की प्रतीक्षा में बैठी रहती।

ऐसी विक्षोभकारी स्थितियों के समर्थन में नारी संगठन या नारी मुक्ति या नारी स्‍वातन्‍त्र्य के समर्थक क्‍या कहेंगे यह मैं जानता हूँ क्‍योंकि मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलें विरंचि सम । वे मुहावरे बोलते हैं और मुहावरों के माध्‍यम से यथार्थ का निर्माण करते है, परन्‍तु यदि उन्‍हें भी इसका सामना करना पड़े तो उनमें कोई इतना जाहिल नहीं है कि वह उन्‍हीं नतीजों और चिन्‍ताओं के आसपास न पहुंचे जिस पर मैं पहुंचा था।

समस्‍या एक और थी जो पहले लक्ष्‍य नही की गई थी, और जिसके लक्षण पहले देखने में न आए थे। रात के अंधेरे में यहां जो कारोबार चलता था उसका पता फटी हुई चोलिया, टूटी हुई जूतियां, और छोड़ी हुई चद्दरों, शराब की खाली बोतलों, सोडा की बोतलों और खान पान के कुछ के जूठनों से मिलता जिनको गन्‍दगी का हिस्‍सा मान कर अपने को सम पर रखा जाता, क्‍योंकि इस सचाई का साक्षात्‍कार करने का साहस किसी में न था। मैं नहीं जानता कि पेशेवर लड़कियों का जमा होना इससे कितना प्रेरित था, पर बैठने वालों की ऐसी गतिविधियां बढ़ गई थीं और संचार माध्‍यमों की चीख के बीच किं कर्मं किं अकर्मेति कवयोप्‍यत्र मोहिता वाली स्थिति में थे ।

Post – 2016-09-22

अपने को जो बहुत समझते हैं ।
हम भी कुछ कुछ उन्‍हें समझते हैं ।
जरा सा फर्क है मगर सोचें
उनको क्‍या हम भी कुछ समझते हैं ?

Post – 2016-09-21

जिन्हें अपना समझते हैं उन्हें भी देखिए साहब
बुलाते हैं करीब आओ मगर अपना नहीं सकते ।
पले नफरत के साये में बढ़े अपनों को ठुकराते
उसी से मुक्ति पानी है मगर हम पा नहीं सकते ।

Post – 2016-09-21

भगवान तुझे क्‍या हुआ तू खुद ही रो पड़ा
मैंने तो जमाने की शिकायत भी न की थी।
21.9.16 : 15:47

Post – 2016-09-21

मैं कौन हूं, रहता कहां हूॅ, देश कहां है

पहले इस इलाके में खेती बहुत मुश्किल से होती थी। जमीन रेतीली है। जमुना के कछार की जब तब डूब जाने वाली। आगे पास ही चिल्‍ला स्‍पोर्ट्स काम्‍प्‍लेक्‍स है और पीछे नाले और नहर के पार चिल्‍ला गांव। चिल/सिल/जिल/ गिल, या चल/सल/जल/गल या इनके अन्‍त्‍य लकार के रकार बनने से बने चिर/सिर/जिर/गिर या चर/सर/जर/गर शब्‍दों का अर्थ होता है पानी। और आप फुर्सत में हो तो इकार की जगह उकार लगाकर जो शब्‍द बनाएंगे उसका भी एक अर्थ होता है पानी और उसके बाद तो उस ध्‍वनि या शब्‍द का किसी खाद्य, पेय, धन, आदि के लिए प्रयोग में आ सकता है, जैसे गर का गरल के लिए और गडुआ, गडुवी के लिए और गल का गलन, ग्‍लानि, गलका आदि के लिए। इसलिए यदि आप किसी गांव का नाम चिलवां सुनें तो समझ लें किसी धारा या तालाब के किनारे होगा। चिल्‍ला की भी स्थिति यही है । अनुमान लगाना चाहें तो यह समझ सकते हैं कि बहुत पुराने समय में यहां जो आदिम जन रहते या विचरते थे उनको तालब्‍य ध्‍वनियों से प्रेम था। जमुना उफान पर आती है तो समाचार आता है पानी चिल्‍ला तक पहुंच गया। गरज कि इसमें कास घास अधिक आसानी से उगती थी, खेती नाममात्र को होती थी।

इसी भूखंड का अधिग्रहण करके और विकसित करके भूमि ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों को आबंटित की गई थी जिस पर पूरे वसुन्‍धरा एन्‍क्‍लेव में बहुमंजिली इमारतों का निर्माण कुछ इस‍ तरह किया गया कि उनके बीच में एक छोटा सा टुकड़ा पार्कों के नाम पर छोड़ दिया गया और उसकी चारदीवारी से सटी इन सोसायटियों का प्‍लाट जिससे इन सभी की सीधी पहुंच उस खुली साझी जगह तक हो सकें जहां वे चहलकदमी कर और खुले में सांस ले सकें। दिल्‍ली में यह डीडीए का एक नया प्रयोग था।

जमीन जिन गूजरों की थी उनको इस इलाके के अधिग्रहण के एवज में जो धनराशि मिली उसके कारण अब वे पहले खेती, भैंस पालन और दूध का कारोबार जो कुछ भी करते थे उससे फुर्सत मिली तो वे निठल्‍लों की जमात में बदल गए। पैसा है, करने को कुछ नहीं। अधिकांश ने लालडोरा क्षेत्र में अपनी जमीन पर मजदूरों के लिए बहुमंजिले मकान बना लिए जिनके कमरे नोयडा के मजदूरों, घरों में मदद के लिए काम करने वाली महिलाओं और ड्राइवरों, चौकीदारों, बेलदारों आदि किराये पर लेकर गुजर इस गांव की आबादी को बहुगुना और बहुरूप बना दिया। किराये से होने वाली आमदनी के बाद अब न तो जीविका की चिन्‍ता रह गई न कोई योग्‍यता हासिल करने की लालसा। आश्‍चर्य कि इस इलाके में कोई पुराना स्‍कूल तक नहीं है। जो हैं वे डीडीए के अधिग्रहण के बाद के, फिर भी कुछ प्रतिशत नौजवान कुछ पढ़ लिख गए। शेष शिक्षा से विमुख परन्‍तु सोसायटियों में बसे शिक्षित मध्‍यवर्ग की जीवनशैली और अपनी पुरानी ऐंठ के बीच असमंजस में दिखाई देते हैं।

जिन्‍होंने उन पैसों को मौजमस्‍ती में उड़ा दिया वे आज भी भैंसों की सेवा करते पालते और दूध बेच कर काम चलाते हैं और उनकी कुछ महिलाएं पार्क की बढ़ी हुई घास को काट कर इसे फूस का जंगल बनने से बचाए रखने में मदद करती थी। माेअर का प्रबन्‍ध हो जाने के कारण, वे कुछ ही दिनों तक इसका लाभ उठा पाती हैं। महिलाएं घास काटने आएंगी और उसके दो तीन घंटे बाद उनके परिवार का कोई नौजवान सायकिल लिए आएगा और घास को उस पर लाद कर ले जाएगा। घास काटने का काम शायद स्त्रियों का काम माना जाता है। गूजर मूलत: मातृप्रधान रहे लगते हैं।

अशिक्षित, अल्‍पशिक्षित और सीमित आय वाले मजदूरों में अधिकांश अपना परिवार नहीं रख पाते। जो रखते हैं उनकी पत्नियॉं इन फ्लैटों में चौका बर्तन करके निर्वाह करती हैं। बच्‍चों के लिए माता पिता में किसी के पास समय नहीं होता, फिर भी प्रकृति के नियम से बच्‍चे होते हैं और वे इधर उधर भटकते हुए आपस में बहुत कुछ सीखते समझते बड़े होते हैं। इनमें कितने गायब कर दिए जाते होंगे और अंगप्रत्‍यारोपण व्‍यवसाय की जरूरतें पूरी करते होंगे इसका हिसाब किसी के पास न होगा।

दुर्भाग्‍य से हमारा पार्क दल्‍लूपुरा से अधिक निकट पड़ता यद्यपि दूरी आधे किलोमीटर की तो हो ही जाती है और बहुमिश्र आबादी का दबाव इस ऊजड़ क्षेत्र के पार्क में बदलते जाने के क्रम में हमारे पार्क पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ा। बच्‍चे इसी से हो कर स्‍कूल जाते हैं और मजदूर इसी का एक बाजू पकड़े अपने काम की जगहों को इसलिए दूसरे पार्कों के विपरीत हमारे पार्क और इससे आगे के पार्क की निजता भंग हो जाती है और ये दोनों सार्वजनिक पार्कों में बदल जाते हैं। लड़कियों की क्‍लास उसी इमारत में पूर्वान्‍ह में लगती है और लड़कों की अपरान्‍ह में इसलिए दोपहर काे इनके आने जाने के क्रम में कुछ दूसरे तरह की समस्‍यायें पैदा होती हैं जिसमें हमारे हस्‍तक्षेप की अावश्‍यकता नहीं परन्‍तु इनकी क्रीड़ा और विनोद में छोटे पौधों और फूल की क्‍यारियों की ही दुर्गत नहीं होती, कई बार इनके किल्‍लाल में पेड़ों की डालियां टूट कर गिरी मिलती हैं।

इन सोसायटियों का चरित्र उन क्षेत्रों और दूसरी सोसायटियों से अलग है जिनका मुझे अब तक अनुभव है। इनकी प्र‍कृति सार्वदेशिक है। मेरी अपनी सोसायटी में हिन्‍दू, मुसलिम, ईसाई, कश्‍मीरी, उत्‍तरांचली, बंगाली, असमी, ओडि़या, मद्रासी, मलयाली, मराठी, पंजाबी, हरयाणवी, पश्चिमी और पूर्वी उत्‍तरप्रदेशी, बिहारी पृष्‍ठभूमि के लोग रहते हैं। घरेलू सेवा में लगी महिलाओं में पहले कुछ बांग्‍लादेशी भी हुआ करती थीं।

मैं भारत में नहीं रहता हूं। इतने बड़े क्षेत्र में रह भी नहीं सकता। वह संकल्‍पना के रूप में मेरा देश है, पर मैं भारत के उस छोटे से हिस्‍से में रहता हूँ जिसकी सामाजिक संरचना यह है और ठीक यही स्थिति आप सभी की होगी। पुराने जमाने में देश का एक अर्थ अपना विशिष्‍ट क्षेत्र हुआ करता था और उसकी कुछ उदार परिभाषा करें तो मेरी सोसायटी में दर्जनों देशों के लोग बसे हुए हैं। इनसे ही बने अपने छोटे से सामाजिक परिवेश में या नवनिर्मित देश में मैं रहता हूं और आसन्‍न रूप में इसकी स्थिति से चिन्तित रहता हूँ।

हमारे बच्‍चों को कैसे रहना है कि वे सुरक्षित रहें, बिगड़ने न पाएं, उनको कोई क्‍लेश न हो यह मुझे तय करना होगा, उन चैनेलों को नहीं जो विज्ञापनजगत के पैसे पर पलते और उनके सिखाए हुए मुहावरे बोलते और शोर मचाते हुए जिसके जी में जो आए वह करे वाली आजादी का प्रचार करते हैं और इनकी इस मनमानी के कारण उनके सामने आने वाली आपदाओं के लिए पुलिस को उत्‍तरदायी मानते हैं। यदि पुलिस इस मनमानी को सामाजिक हित में न पाकर उसे नियंत्रित करती है तो इसे मारल पोलिसिंग कह कर उसका विरोध ही नहीं करते हैं अपितु इतनी हुड़दंग मचाते हैं कि सुधारात्‍मक कदम उठाने वाले अधिकारी या कर्मचारी को दंडित होना पड़े। मनमानी करने को सभी स्‍वतंत्र हैं परन्‍तु उनके परिणामों के लिए पुलिस उत्‍तरदायी है जिसे उस मनमानी को नियन्त्रित करने का अधिकार नहीं। माता पिता को स्‍वयं अपने बच्‍चों की मनमानी को रोकने का अधिकार नहीं। ये निर्वात में कल्पित समाज की समस्‍याओं के निर्वात में तैयार किए हुए समाधान हैं जिनको यथार्थ सापेक्ष्‍य बनाया जाना चाहिए। जो भी हो, हमारे लिए ही बना यह भीतरी पार्क है, पर जब तक दललूपुरा के खिलाडि़यों का हुड़दंग था, तब तक इसको घेर कर बनी सोसायटियों में से किसी के बच्‍चे या महिलाएं पार्क में नहीं आती थीं। आते थे कुछ बुढ़भस रिटायर्ड लोग जिनकी जमात का मैं भी था। जब हुड़दंग थमी तो एक एक कर सभी के कुछ बच्‍चे, महिलाएं, यहां तक कि हिजाबबन्‍द महिलाएं भी, टहलने घूमने के लिए आने लगीं और फिर जिस तरह का मोड़ आया था उसमें उनको कुछ परेशानी अनुभव होने लगी इसकी चर्चा हम प्रयोग – 11 में करेंगे जिसकी यह पृष्‍ठभूमि है।

हमारे समाचार और विचार माध्‍यम,यदि कोई संस्‍था वेश और व्‍यवहार की कोई मर्यादा तय करे तो उसे तालिबानी बताते हैं, परन्‍तु यही बातें यदि हिन्‍दू से इतर कोई संस्‍था या संगठन करे तो उस पर चुप लगा जाते हैं। एेसा कहने वाले हिन्‍दू हित का दावा करने वाले संगठनों में भी मिल जाएंगे कि यह देश विभाजित होने के बाद हिन्‍दू देश उसी न्‍याय से बन गया जिसमें मुसलमानों ने इस आधार पर कि वे हिन्‍दुओं के साथ शान्ति से नहीं रह सकते हैं इसका विभाजन किया, भले वे उस देश में गए या नहीं। मैं ऐसा दावा करने वालों के तर्क को तो मानता हूं पर जो कुछ भी तार्किक है वह सदा न्‍याय्य भी होता है, इससे सहमत नहीं हो पाता। हम सभी गलतियां करते हैं, और बहकावों के शिकार होते हैं और लगभग सभी ने बहुत अक्षम्‍य गलतियां कीं इसे समझने के बाद मैं मानता हूं जो भी जिस देश में रहता है वही उसका देश है।

परन्‍तु जब हमारे समाचार और विचार माध्‍यम, हमारे मुखर बुद्धिजीवी केवल हिन्‍दू समाज, हिन्‍दू संगठनों, हिन्‍दू मान्‍यताओं, हिन्‍दू ग्रंथों, हिन्‍दू रीतियों के प्रति ही चिन्‍ता प्रकट करते हैं और यह अपेक्षा करते हैं कि हिन्‍दू यदि ऐसा करता है तो उसे दंडित किया जाना चाहिए और शेष पर चुप रहते हैं तो क्‍या वे स्‍वयं चीख चीख कर यह नहीं कहते कि यह हिन्‍दू देश है। वे क्‍या उन पिछड़ी या अवरुद्ध चेतना के लोगों का समर्थन नहीं करते जिनका विरोध करने के नाम पर उनका कारोबार चलता है ।

क्‍या वे व्‍यंजना में यह नहीं कहते कि दूसरे समुदाय भाड़ में जायं, हम हिन्‍दुओं को मानवीय आदर्शों के अनुसार बचाने की चिन्‍ता करेंगे। नहीं, वे कुछ नहीं कहते, क्‍योंकि वे जानते ही नहीं कि वे किसके पढाए सिखाए के अनुसार कुछ बकते रहते हैं परन्‍तु पूरे समाज पर उसका क्‍या असर होगा इसकी ओर उन्‍होंने कभी ध्‍यान ही न दिया।

Post – 2016-09-20

वह दिल अपना नहीं था फिर भी था तो
किसी का हो गया था फिर भी था तो।
किसी ने पोस दी तो उसको लपका
जमीर अपनी गंवां कर फिर भी था तो ।

Post – 2016-09-20

यदि तुम्‍हें लगे कि ‘भविष्‍य का रास्‍ता इतिहास से हो कर गुजरता है’ एक वाग्‍वृत्ति है तो देखो, आधुनिक विज्ञान की नवीनतम खोजों का आलोक उस विश्‍वब्रह्मांड के आदि और विकास की पहेली को समझने के प्रयत्‍नों से मिल रहा है और इस ऊहापोह से हमारे चिन्‍तक ऋग्‍वेद के समय में गुजर रहे थे – नासदीय सूक्‍त। यह नहीं कहूंगा कि उनकी सोच आज की खोज के कितना निकट है, परन्‍तु मैं अपनी कृतियों में कई बार कई तरह से यह प्रमाणित कर चुका हूं कि ऋग्‍वेद के ओजस्‍वी दौर में भारत जिस ऊंचाई पर पहुंच चुका था उस तक फिर कभी नहीं पहुंचा और इसका कारण हमारा वर्णविभाजन और योग्‍यताओं और अभिरुचियों का सीमांकन और उससे बाहर की प्रतिभाओं के योगदान का निषेध था। इसलिए यदि भारत को पुन: अपने उत्‍कर्ष पर पहुंचना है तो सभी को इस दिशा में प्राणपण से अवर्ण समाज के निर्माण के लिए प्रयत्‍न करना चाहिए और जो ऐसा किसी कारण से न कर सके उसे राष्‍ट्रनिष्‍ठा से शून्‍य और आज का अन्‍त्‍यज मानना चाहिए। इसमें ऐसे दलित भी आ सकते हैं जो तात्‍कालिक और तुच्‍छ लाभ के लिए वर्णवाद को जारी रखना चाहते हैं और अपने ही समाज के वंचितों और पिछड़ों से विश्‍वासघात करते हैं साथ ही पुरातनपंन्‍थी ब्राह्मण भी जो अपने खोखले और स्‍वपोषित दंभ के कारण इसके महत्‍व को समझ नहीं पाते। दलित, अस्‍पृश्‍य और ब्राह्मण कभी एक दूसरे के इतने हमराज, हमदम और हमसुखन कभी न रहे होंगे जितने आज हैं। जो इसे नहीं समझता वह भारतीय यथार्थ और यथार्थवाद को नहीं समझ सकता पर बुद्धिजीवी का हंटर फिर भी पकड़े रहेगा।

Post – 2016-09-20

जो इतिहास भूल जाते हैं वे बदहवास हो जाते हैं। जो इतिहास गढ़ते हैं वे समाज को नशेड़ी बनाते हैं। जो सही इतिहास लिखते हैं वे वर्तमान की नीव रखते हैं। जो इतिहास की खोज करते हैं वे भविष्‍य का निर्माण करते हैं। भविष्‍य का रास्‍ता इतिहास से हो कर गुजरता है।

Post – 2016-09-20

प्रयोग 10
समस्‍या और समाधान का सहअस्तित्‍व

हम पहले की बता चुके हैं कि पार्क का आकार इतना छोटा कि किसी के जी में आये तो उठा कर अपनी जेब में रख ले और फिर भी यह एक छोटामोटा जंगल है। अभी अपने पूरे उरूज पर नहीं आया है। जब आएगा तो अन्‍धेरगर्दी किसे कहते हैं, इसे समझने के लिए लोग यहॉं आया करेंगे।

पिलखल अर्थात् पकड़ी के तेरह पेड
कदंब का एक
बरगद के दस बारह
सप्‍तपर्णी के पांच
अर्जुन के छह पेड़,
शीशम के दो
सहजन का एक
नीम का एक
अमलतास के सात आठ
कीकर का एक वृहदाकार पेड़ सबसे ऊंचा
पीपल के पांच
गुलमुहर के पांच
जामुन का एक
इसके अलावा पन्‍द्रह बीस पेड़ एक ऐसे जिनके फल तो छोटे आकार के रुद्राक्ष जैसे और जिसके पुष्‍पगुच्‍छ स्‍तवक की कुछ इंच से लेकर एक फुट सवा फुट तक लंबे नुकीले, जिसका पौधा मझोले कद का होता है पर दुर्भाग्‍य कि उसका ही नाम याद नहीं, संख्‍या तेरह चौदह पन्‍द्रह
मौलिश्री सहित फाइकस के तीस पौधे
फुटपाथ किनारे पेंडुलस के बीसेक पौधे
मैं यह गिनती यादों के सहारे दे रहा हूं इसलिए कुछ छूट गया भी हो सकता है पर इसमें कुछ घट नहीं सकता।
इतने सारे पौधों के होने से चार समस्‍यायें एक साथ पैदा होती हैं। पर हम केवल पहली की बात यहां करेंगे, शेष का आगे।
पतझड़ के कारण गिरी हुई पत्तियों का जमाव होता वह पानी की फुहार और बच्‍चों की उछल कूद से दब तो जाता, फिर भी टीला बन जाता। कई बार हटा भी लिया जाता। विनोद कुमार के काउंसलर रहते और इसकी उपयो‍गिता समझते उसे हटाने की ओर ध्‍यान भी दिया जाता। इसके लिए उन्‍होंने कहने पर अपने कांउसलर निधि से बुग्गियों का प्रबन्‍ध किया था।
फिर भी इतना बचा रह जाता कि साल में एक दाे बार आग पकड़ ही लेती और वह जलती तो दावाग्नि का खतरा पैदा हो जाता। कुशल यह कि दो तीन पेड़ों का एक हिस्‍सा जला पर शेष बचा रहा। कारण ऊपरी पर्त जलने के बाद लपट कम हो कर धुँए में बदल जाती और हफ्ते दस दिन तक सुलगती रहती। इसे मूसलाधार बरसात भी शान्‍त न कर पाती। प्रयोग – 10
आग लगती है तो बढ़ने दो बुझाते क्‍यों हो
जलने का एेसा

हम पहले की बता चुके हैं कि पार्क का आकार इतना छोटा कि किसी के जी में आये तो उठा कर अपनी जेब में रख ले और फिर भी यह एक छोटामोटा जंगल है। अभी अपने पूरे उरूज पर नहीं आया है। जब आएगा तो अन्‍धेरगर्दी किसे कहते हैं, इसे समझने के लिए लोग यहॉं आया करेंगे।

पिलखल अर्थात् पकड़ी के तेरह पेड
कदंब का एक
बरगद के दस बारह
सप्‍तपर्णी के पांच
अर्जुन के छह पेड़,
शीशम के दो
सहजन का एक
नीम का एक
अमलतास के सात आठ
कीकर का एक वृहदाकार पेड़ सबसे ऊंचा
पीपल के पांच
गुलमुहर के पांच
जामुन का एक
इसके अलावा पन्‍द्रह बीस पेड़ एक ऐसे जिनके फल तो छोटे आकार के रुद्राक्ष जैसे और जिसके पुष्‍पगुच्‍छ स्‍तवक की कुछ इंच से लेकर एक फुट सवा फुट तक लंबे नुकीले, जिसका पौधा मझोले कद का होता है पर दुर्भाग्‍य कि उसका ही नाम याद नहीं, संख्‍या तेरह चौदह पन्‍द्रह
मौलिश्री सहित फाइकस के तीस पौधे
फुटपाथ किनारे पेंडुलस के बीसेक पौधे
मैं यह गिनती यादों के सहारे दे रहा हूं इसलिए कुछ छूट गया भी हो सकता है पर इसमें कुछ घट नहीं सकता।
इतने सारे पौधों के होने से चार समस्‍यायें एक साथ पैदा होती हैं। पर हम केवल पहली की बात यहां करेंगे, शेष का आगे।
पतझड़ के कारण गिरी हुई पत्तियों का जमाव होता वह पानी की फुहार और बच्‍चों की उछल कूद से दब तो जाता, फिर भी टीला बन जाता। कई बार हटा भी लिया जाता। विनोद कुमार के काउंसलर रहते और इसकी उपयो‍गिता समझते उसे हटाने की ओर ध्‍यान भी दिया जाता। इसके लिए उन्‍होंने कहने पर अपने कांउसलर निधि से बुग्गियों का प्रबन्‍ध किया था।
फिर भी इतना बचा रह जाता कि साल में एक दाे बार आग पकड़ ही लेती और वह जलती तो दावाग्नि का खतरा पैदा हो जाता। कुशल यह कि दो तीन पेड़ों का एक हिस्‍सा जला पर शेष बचा रहा। कारण ऊपरी पर्त जलने के बाद लपट कम हो कर धुँए में बदल जाती और हफ्ते दस दिन तक सुलगती रहती। इसे मूसलाधार बरसात भी शान्‍त न कर पाती।
आक्‍सीजन की तलब, इस छोटे से कोने को पार्क से जंगल बनाने की जिद कि इससे दावाग्नि की नौबत आ जाय, और कुछ दिनों के लिए यह कार्बन आक्‍साइड का स्रोत बन जाय!
मैं यदि अपने तई संतुष्‍ट होता कि इसमें अपराध किसका है, पेड़ों का, या पत्तियों का, या मौसम का या माली का या जगह की कमी का तो उसके विरुद्ध कुछ करता
या कुछ न होता तो ग्रीन ट्रिब्युनल को ही शिकायत करता । दोष व्‍यवस्‍था था जिसके पास पार्क की सफाई और उसके निपटान का कोई इन्‍तजाम न था। मैंने उससे अनुरोध किया कि कंपोस्‍ट तैयार करने के लिए एक गड्ढा ऐसी खुली जगह में बनाया जाय जो ट्रैक से दूर हो और जिसके ऊपर पेड़ न लटके हो। खुली जगह में यह देखने में भदद्यदा लगेगा इस‍े सुंदर बनाने के लिए इसके चारों ओर तीन फुट ऊंचा घेरा बनाया जाय जिससे भूल चूक से भी कोई बच्‍चा उसमें गिर न जाय। उस चारदीवार के साथ एेसे पौधों की फेंस लगाई जाए कि उनकी हरियाली भीतर की कुरूपता को ढक दे।
प्रस्‍ताव पसन्‍द किया गया पर हुआ यह कि जहॉं पहले अग्निकांड होते थे वहीं, एक गड्ढा खोद दिया गया और समस्‍या अपनी जगह बनी रह गई।

Post – 2016-09-20

प्रयोग 10
समस्‍या और समाधान का सहअस्तित्‍व

हम पहले की बता चुके हैं कि पार्क का आकार इतना छोटा कि किसी के जी में आये तो उठा कर अपनी जेब में रख ले और फिर भी यह एक छोटामोटा जंगल है। अभी अपने पूरे उरूज पर नहीं आया है। जब आएगा तो अन्‍धेरगर्दी किसे कहते हैं, इसे समझने के लिए लोग यहॉं आया करेंगे।

पिलखल अर्थात् पकड़ी के तेरह पेड
कदंब का एक
बरगद के दस बारह
सप्‍तपर्णी के पांच
अर्जुन के छह पेड़,
शीशम के दो
सहजन का एक
नीम का एक
अमलतास के सात आठ
कीकर का एक वृहदाकार पेड़ सबसे ऊंचा
पीपल के पांच
गुलमुहर के पांच
जामुन का एक
इसके अलावा पन्‍द्रह बीस पेड़ एक ऐसे जिनके फल तो छोटे आकार के रुद्राक्ष जैसे और जिसके पुष्‍पगुच्‍छ स्‍तवक की कुछ इंच से लेकर एक फुट सवा फुट तक लंबे नुकीले, जिसका पौधा मझोले कद का होता है पर दुर्भाग्‍य कि उसका ही नाम याद नहीं, संख्‍या तेरह चौदह पन्‍द्रह
मौलिश्री सहित फाइकस के तीस पौधे
फुटपाथ किनारे पेंडुलस के बीसेक पौधे
मैं यह गिनती यादों के सहारे दे रहा हूं इसलिए कुछ छूट गया भी हो सकता है पर इसमें कुछ घट नहीं सकता।
इतने सारे पौधों के होने से चार समस्‍यायें एक साथ पैदा होती हैं। पर हम केवल पहली की बात यहां करेंगे, शेष का आगे।
पतझड़ के कारण गिरी हुई पत्तियों का जमाव होता वह पानी की फुहार और बच्‍चों की उछल कूद से दब तो जाता, फिर भी टीला बन जाता। कई बार हटा भी लिया जाता। विनोद कुमार के काउंसलर रहते और इसकी उपयो‍गिता समझते उसे हटाने की ओर ध्‍यान भी दिया जाता। इसके लिए उन्‍होंने कहने पर अपने कांउसलर निधि से बुग्गियों का प्रबन्‍ध किया था।
फिर भी इतना बचा रह जाता कि साल में एक दाे बार आग पकड़ ही लेती और वह जलती तो दावाग्नि का खतरा पैदा हो जाता। कुशल यह कि दो तीन पेड़ों का एक हिस्‍सा जला पर शेष बचा रहा। कारण ऊपरी पर्त जलने के बाद लपट कम हो कर धुँए में बदल जाती और हफ्ते दस दिन तक सुलगती रहती। इसे मूसलाधार बरसात भी शान्‍त न कर पाती।

आक्‍सीजन की तलब, इस छोटे से कोने को पार्क से जंगल बनाने की जिद कि इससे दावाग्नि की नौबत आ जाय, और कुछ दिनों के लिए यह कार्बन आक्‍साइड का स्रोत बन जाय!

मैं यदि अपने तई संतुष्‍ट होता कि इसमें अपराध किसका है, पेड़ों का, या पत्तियों का, या मौसम का या माली का या जगह की कमी का तो उसके विरुद्ध कुछ करता
या कुछ न होता तो ग्रीन ट्रिब्युनल को ही शिकायत करता । दोष व्‍यवस्‍था था जिसके पास पार्क की सफाई और उसके निपटान का कोई इन्‍तजाम न था। मैंने उससे अनुरोध किया कि कंपोस्‍ट तैयार करने के लिए एक गड्ढा ऐसी खुली जगह में बनाया जाय जो ट्रैक से दूर हो और जिसके ऊपर पेड़ न लटके हो। खुली जगह में यह देखने में भदद्यदा लगेगा इस‍े सुंदर बनाने के लिए इसके चारों ओर तीन फुट ऊंचा घेरा बनाया जाय जिससे भूल चूक से भी कोई बच्‍चा उसमें गिर न जाय। उस चारदीवार के साथ एेसे पौधों की फेंस लगाई जाए कि उनकी हरियाली भीतर की कुरूपता को ढक दे।

प्रस्‍ताव पसन्‍द किया गया पर हुआ यह कि जहॉं पहले अग्निकांड होते थे वहीं, एक गड्ढा खोद दिया गया और समस्‍या अपनी जगह बनी रह गई।