Post – 2017-09-12

वह ज़िंदगी तो थी नहीं मगर गले लगा लिया

अपनी सनक में पूरी जिन्दगी विविध प्रकार की मूर्खताएं करता रहा, पर सिवाय एक के, एक तरह की मूर्खता दुबारा नहीं की। एक मात्र मूर्खता जिसे मैं बार-बार करता रहा, वह थी लोगों से धोखा खाना और फिर भी अपरिचितों तक पर विश्वास कर लेना। पिछले अनुभवों के कारण यह जानते हुए भी कि धोखा हो सकता है, मैं यह खतरा उठा कर भी, जिसे बचाना चाहता था, वह था मनुष्यता में विश्वास।

ओछेपन से जब भी पाला पड़ा, उसे व्याधि या विवशता मानता रहा। सबसे गिरे हुए लोग मुझे सिद्धांतवादी तेवर अपनाने वाले वकीलों में मिले। जीतने के लिए अपराधियों को सलाह देते और उसकी तरकीबें बैठाते उनकी नैतिक चेतना का इतना ह्रास हो जाता है कि उनमें से अनेक अपराधियों से आगे बढ़ जाते हैं फिर भी अपनी शिक्षा, आय और बुद्धिकौशल के बल पर बाह्य आचार व्यवहार में संभ्रांत दीखने के कारण वे गॉड फादर के प्रतिरूप बन जाते हैं। उससे कुछ ही कम राजनीतिक आकाक्षाओं से जुड़े लोग। परिस्थितियां और आकांक्षाएं जो भी बनाएं, आदमी प्रकृति से अधम हो सकता है, यह बात आजतक गले उतर नहीं पाई । मुझे लगता रहा, अपने को जोखम से बचाने के लिए अतिरिक्त सतर्कता बरतते हुए जिस दिन मनुष्यमात्र की मनुष्यता में विश्वास खो गया, लोगों को शक की नजर से देखने लगूंगा, उस दिन कुछ न बचेगा, वह आग भी मंद पड़ जायेगी जो शब्दों में ढलती है और जिसके बल पर अपने को लेखक मानता हूँ।

यह मेरी उदारता नहीं विवशता है कि मैं किसी से नफ़रत नहीं कर पाता। उससे भी नहीं किया जिसने धोखा दिया या नुकसान पहुँचाया। उससे भी नहीं जिससे मुझे इतनी यातना मिली कि यातना ही मेरे शैशव का पर्याय बन गयी। जिन्होंने क्षति पहुंचाई उनके प्रति भी मन में करुणा उपजती है, वे शत्रु नहीं रुगण लगते हैं।

यह मेरे ज्ञान, अध्ययन या किसी सत्संग से उपजा भाव नहीं है। यह उस समय ही विद्यमान था जब एक ओर मैं विमाता के उत्पीड़न से बचना चाहता था और दूसरी ओर उसे अन्य विमाताओं की तुलना अथिक दयालु पाता था।

रुकिए, वे कौन सी विमाताएं थीं जिनसे तुलना करने पर मैं उसे अधिक सदय पाता था? उसके अतिरिक्त तो किसी अन्य विमाता को जानता तक न था।

लीजिए, जो मेरे लिए आज तक एक समस्या बनी हुई थी उसका रहस्य इस प्रश्न के साथ ही खुल गया। वे कहानियों की विमाताएं थीं और इसके साथ ही एक मिनट पहले लिखा मेरा ही कथन गलत हो गया। यह उन कहानियों का असर था जिन्हें सुनने बचानी की मां के पास शाम को जाया करता था।

ऐसी कहानियाँ वह स्वयं भी सुनाती थी। मैं सोता उसी के साथ था। अकेले में डर लगता था। सो यह कहना गलत था कि इसका बोध मुझे किसी बाहरी स्रोत से न हुआ था। ये कहानियाँ सीत-बसन्त की, रानी केतकी की, और ऐसी विमाता रानियों की होती थीं जो सौतेले बच्चों को बधिकों के हवाले कर के दूर जंगल में उनका वध करके उनका कलेजा लाने का आदेश देती थीं और वधिक उन पर तरस खाकर, उनको जीवित छोड़ देते थे । उनका पालन वन के जीव जंतु करते थे। वधिक अपने प्राण की रक्षा के लिए किसी जानवर का शिकार करके उसका कलेजा रानी को सौंप देते थे।

जब तक उसे अपना पुत्र नहीं हुआ था तब तक हमारे लिए जिउतिया (जीवित पुत्रिका ) का निर्जला व्रत रखती। यह व्रत पूर्वी उत्तरप्रदेश और पश्चिमी बिहार में स्त्रियां अपने पुत्र के आरोग्य और शत्रु पर विजय के लिए रखती हैं। इसमें एक थाल में फूल आदि सजाकर बरियार के एक नितांत अनाकर्षक पौदे की तलाश करते हुए जाती हैं और उसका पूजन करते हुए गाती हैं :
ए अरियार
का बरियार
रामजी से जा के कहिह अमुक के माई जिउतिया भुक्खल बाटी
हमार पूत मारि आवें, मरा न आवें ।

इस यात्रा में जुते हुए खेत से होकर जाना मना है। जुती भूमि तो घायल है इसलिए अशुभ।
इससे जुडी एक विमाता की क्रूरता की कहानी थी, जो भी उसी ने सुनाई थी:

एक विमाता ने जिउतिया व्रत रखा था। वह बरियार पूजने चली तो उसका सौतेला बेटा भी साथ था। रास्ते में एक खेत पड़ा जिसमें एक हलाई का निशान था। उसे पार किया नही जा सकता था। इसलिए उसने सौतेले बेटे को उस पर लिटा दिया और उसकी छाती पर पाँव रख कर उसे पार कर लिया।

वह मुझे अक्सर धमकाती कि किसी दिन जहर देकर मार डालेगी। मुझे लगता वह ऐसा कर सकती है। सौतेली माताएं तो ऐसा करती ही हैं, पर जहर दिया नहीं, जिसके कारण मैं ये इबारतें लिख पा रहा हूं और जो दिया वह भी किसी कारण अमृत में बदलता गया। मै जिउतिया व्रत में बरियार की तलाश में उसके पीछे पीछे चला जाता। रास्ते में हलाई पड़ती तो पता नहीं क्या होता? कभी पड़ी नहीं, छाती पर कोई घाव नहीं।

असाधारण क्रूरता की ये कहानियां उसके क्रूर व्यवहार को सह्य और दूसरी विमाताओं की तुलना में उसे अधिक दयालु सिद्ध करतीं। ऐसी कहानियां सुनाते हुए उसके मन में क्या भाव होता, यह कभी न जान पाया। यह कह सकता हूं कि मुझे आतंकित करने का भाव नहीं होता, क्योंकि उसके स्वर में व्यथा होती। मैं कहानी को भी समझता था, उस स्वर को भी समझता था। यह मेरी कोईअलग विशेषता नहीं थी। बच्चे भाषा जानने से पहले ही भाषातीत का आशय ग्रहण करने में दक्ष हो जाते हैं।

तब तो नहीं कह सकता था पर आज कह सकता हूं, सौतेले बच्चों की यातनाओं के विवरणों की लोक साहित्य से से लेकर शिष्ट साहित्य तक कोई कमी नहीं, परन्तु अपने समवयस्क किसी युवक के सपने देखने वाली बालिका के किन्ही कारणों से विवाह के साथ ही अनेक सन्तानों की मां बन जाने,, और एक क्रूर निर्णय के कारण ऐसे पुरुष से बंध जाने की त्रासदी को, जो उसे अधूरा मिला हो, जिसका स्नेह पूर्वपत्नी, जो मर कर भी अपनी संतानों में जिन्दा हो, और उसके बीच बंटा हो, उसे पूरा पाने के कितना संघर्ष करना पड़ता है, उसे समाज की नजरों में कैसे पिशाचिनी बना दिया जाता है, उसे एक शिशुजो उसी पर पूरी तरह निहो, अपना शत्र्भरु समझ कर उससे क्ररूरता करते हुए किन यातनाओं से गुजरना पड़ता इस पर, मेरे परिचित विश्व साहित्य में कहीं कुछ नहीं मिलता । क्यों?

शैशव में मैं अपने दुख पर रोता रहा कि मुझे मातृस्नेह नहीं मिला, आजीवन विमाता के उस संघर्ष और उस पीड़ा को समझने में लगाया जो मेरी विमाता को अपना पूरा पति पाने के लिए करना पड़ा और वह फिर भी न मिला। पूरा पति मिलने का अर्थ था सपत्नी का निश्शेष होना, उसका नाम निशान मिट जाना, उसकी संतानों की समग्र उपेक्षा. उनका स्वामित्व के सभी रूपों से बेदखल हो जाना, उनकी जिन्दगी को नरक बना देना। कितने गहन अंतर्द्वंद्व से गुजरना पड़ता है एक संवेदनशील युवती को जिसे विमाता की भूमिका में डाल दिया
जाता है कि वह अपनी लड़ाई भी पूरे आवेग से नहीं लड़ सकती. स्त्री के अधिकारों का हंगामा मचाने वाली महिलाओं में से कोई विमाता के इस अन्तर्द्वन्द्व पर लिखेगा?

मेरी समझ में यह न आता कि भाई साहब उसकी कोई बात नहीं मानते। पकड़ने को दौडाती तो भाग खड़े होते। दीदी उसका कहा मानती नहीं। उलटे दोनों बाबा से शिकायत कर देते। बाबा लाठी पर ठेंगते हुए घर में प्रवेश करते और उसे फटकार लगाते।

मैं ही उसके छोटे मोटे हुक्म बजाता। कभी बाबा से शिकायत न की। शिकायत न करने का एक कारण यह था कि भाई तो भाग कर बच जाते मैं उतना तेज भाग नहीं सकता था। पकड़ में आ जाता और वह इतनी निर्ममता से कान उमेठती और पिटाई करने के साथ धमकाती कि रोया और किसी से कहा तो और पीटूंगी। मैं बिना रोये पिटता, बाहर निकलते हुए आंसू पोछ लेता। फिर कोई एकांत कोना तलाश कर अहक अहक कर रोता, कलेजा फटने वाली रुलाई और बाहर आने से पहले आंसुओं को पोंछ और सुखा लेता कि किसी दूसरे को पता न चले। चेहरे का भाव तक मानो मन में कोई क्लेश न हो।

कोई दूसरा पूछता तुम्हारी मैभा सताती तो नही, तो एक तो यह सोच कर कि यदि कोई शिकायत की और इसकी खबर उसे लग गई तो मेरी खैर नहीं। दूसरे मन में कुछ गुरूर भी था। यातना सहूंगा पर दैन्य नहीं प्रकट करूंगा।

कहता वह बहुत प्यार करती है। मेरा ऐसा कहना धीरे धीरे उसकी ख्याति में बदल गया। लोग उदाहरण पेश करते, ‘मैभा हो तो उस जैसी।’

मैं सोचता इससे उसकी क्रूरता में कमी आयेगी पर इससे उसके व्यवहार के सामाजिक या दिखावटी और निजी दो रूप हो गए थे। एक में वह मेरा नाम बड़े प्यार से जी लगाकर पुकारती और सुनने वाले प्रशंसा से गदगद होकर लौटते । दूसरे में मुझे गबडघूईस कहती और व्यवहार बदल जाता। इस शब्द का प्रयोग मैंने किसी दूसरे से सुना नहीं। घूस या छिपा कर अनुचित लेन देन और गड़बड़ जिसका प्रयोग वहां विकट के आशय में हुआ लगता है.।इसका अर्थ उसके बाद प्रयोग में आने वाले मुहावरे से स्पष्ट होता, ‘चरहा भरहा के अंत है घुइसे के अंत नाहीं।’

Post – 2017-09-11

एक राज की बात

मेरे मित्रों में जो मेरी आलोचना करते हैं वे मुझे अपने से अधिक समझदार प्रतीत होते हैं और इसलिए यदि आप इज्जत पाना चाहते हैं तो मेरी आलोचना करें, यह सहमत होने से अच्छा विकलप है और तारीफ से कई गुना अच्छा।

एक विगत सन्दर्भ में पता चला कि कुछ लोग मुझे विद्वान भी समझते हैं और इसलिए, कम से कम मुझसे, उस तरह की मूर्खताओं की उम्मीद नहीं करतेथे जिसका नमूना मैंने प्रस्तुत किया। ऐसे लोग झूठ बोलते हैं, क्योंकि असली विद्वान् तो वे स्वयम् है। मैं उनके जैसा सोचता तो वह मूर्खता न करता। जैसा होता है और होना ही चाहिए मूर्ख अपनी इज्जत बचाने के लिए समझदारों से डरते हैं और समझदार लोग मूर्खों से बचते हैं। वे समझदार तो होते ही हैं, सही भी इतने होते हैं कि किसी को अपने से असहमत होने का अधिकार नहीं देते और इसके बावजूद शिकायत करते है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी अन्य के कारण खतरे में है, जब कि मुझे लगता है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वे किसी को न दे सकते हैं, न उसे सहन कर सकते हैं।

मैं उन विरल मूर्ख़ों में आता हूँ जो जो स्वयं लोगों को आगाह करते हैं कि कभी मेरी बात में न आना। मेरा लिखा विचार, तब तक किसी विषय को देखने समझने के अनेक प्रयत्नों में से एक है, जब तक तुम्हारी जानकारी और सोच विचार से वह सही नहीं लगता। इस विचार प्रक्रिया से गुजरने और आत्मसात् किये जाने के बाद वह मेरा विचार रह ही नही जाता। वह तुम्हारा हो चुका रहता है। इसी प्रक्रिया से हम भाषा सीखते है, ज्ञान अर्जित करते और आत्मसात करते है, अन्न ग्रहण करते और उसे पचा कर अपने रक्त और रस में बदलते है. ग्रहीत आत्मसात होने के बाद हमारा हो जाता है । अंतत: हम अपनी बुद्धि और विवेक से ही काम लेते है और ऐसा करना ही हमारे हित में है।

इस मूर्खता के कारण ही मेरा उन बुद्धिजीवियों से विरोध है जिनके पास इतना सही ज्ञान, विचार या दर्शन है, ऐसा बंधा हुआ नज़रिया है, जिससे अलग जाने की अनुमति किसी को नहीं देते, ऐसा करने वाले पर हल्ला बोल देते है, और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की भी बात करते हैं। स्वयम्, जो रास न आये उसे ख़त्म करने का अभियान चलाते हैं और असुरक्षित भी अनुभव करते हैं। मैं अपनी मूर्खता में सोचता हूँ जो आज़ादी वे अपने लिए चाहते हैं, वह सबको हासिल हो, इसे सहन नही कर पाते। कुछ चीजें सिर्फ उनके लिए बनी हैं, उनके पास ही होनी चाहिये, क्योंकि सब कुछ अपने पाद होने बाद ही वे सर्वहारा का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। वे कबीर को पढ़ते हैं और उनकी उलटवाँसियों पर मुग्ध हो जाते हैं, मैं कबीर की नजर रखता हूँ तो उन्हें डरावना लगता हूँ।

मैं पाता हूँ उनकी जिनसे लड़ाई है वे भी ठीक उन जैसे ही है। पक्के औरे दुरुस्त विचारों और मान्यताओं वाले। उनके होने से ही पता चलता है कि सही विचार एक दूसरे के उलटे भी हो सकते हैं और सही विचार का कारोबार करनेवालों की नजर में जो गलत है वह बिना उलटे पलटे सही काम कर सकता है। सही विचारों के दो आढ़ती हैं, कारोबार एक जैसा है. दोनों दूसरे को मिटा कर पूर्ण सत्य पर एकाधिकार करना चाहते है। पूर्ण सत्य के इन आढ़तियों को एक ही कारोबार से जुड़े होने के कारण एक दूसरे का विरोधी नहीं, एक ही खेल के मैदान के भिन्न पालों से गोल करने और गोल होने वाला खिलाड़ी मानता हूँ। विरोधी पक्षों के खिलाड़ियों के लिए एक ही संज्ञा का प्रयोग होता है। यहाँ नाम भिन्न पर क्रिया एक है और जैसा मानता आया हूँ, एक का अस्तित्व दूसरे पर टिका है।

संघ, मुस्लिम लीग, एक ही स्थिति और परिस्थिति की उपज है। इनके अनेक छद्मनाम हैं पर कार्यक्रम एक दूसरे को ही मिटाने का ही नही है, अपितु एक जिस चीज और मूल्य प्रणाली से जुड़ा है उसे भी मिटाने का है। यहीं पता चलता है कि विविध अच्छे नामो और एक जैसे बुरे इरादों के होने के कारण हम नाम पर न जाकर इरादों और कारनामों से ही इन्हें पहचान सकते है और यदि हमारे इरादे भी उन जैसे नहीं हैं तो यह प्रयत्न कर सकते हैं कि वे अपना नज़रिया बदलें, अपना पुनराविष्कार करें, अपना उद्धार करें तो सबका उद्धार हो।

अभी एक जगह पढ़ा यदि संघ को मिटा दिया जाय तो ही यह देश बच सकता है। यह शुभ संकल्प मुझे बहुत पसंद आया । देश को बचाने के लिए मैं इसमें सहयोग करने को तुरत तैयार हो गया। पर फिर सोचने लगा तो पाया कि लीग के कार्यक्रम पर चल कर ये लीग को बचायेंगे, देश को नही।

देश को बचाने की चिंता न लीग को थी न संघ को। दोनों अपने-अपने संप्रदाय अर्थात मुसलमानों और हिन्दुओं को बचाने की चिंता करते थे ।

किससे पैदा हुए खतरे से किसका जन्म हुआ इसका आज कोई मतलब नही, पर इस बात से मतलब है कि ये दोनों अपने समुदाय के हित की जो समझ रखते आये हैं उसके अनुसार दूसरे को आहत करना अपने समुदाय को खुश करना और दूसरे को मिटाना अपने समाज को बचाना है।

एक को अपने समुदाय का आदमी आदमी लगता है दूसरे का आदमी आंकड़ा। एक को चोट पहुंचे तो वह तड़प उठता है, दूसरे की जान भी चली जाय तो ध्यान नहीं देता या और दिलाने पर कहता है ऐसा तो हो ही जाता है या इसका कारण दूसरे के किसी कृत्य में तलाश लेता है।

आहत करने का सबसे सरल तरीका है दूसरे के मूल्यों, मानों, विश्वास, व्यवस्था, इतिहास पर चोट करना और अपने उन्हीं मूल्यों मानों, विश्वासों, व्यवस्था और इतिहास पर तनिक भी खरोंच न आने देना। ये काम सुधार के नाम पर भी किये जा सकते हैं, सत्य की खोज के नाम पर भी, आलोचना या भर्त्सना के रूप में भी।

इस कसौटी पर ही हम समझ सकते हैं कौन किसकी भूमिका में है और किसके विरोध में। तटस्थ, वस्तुपरक या निष्पक्ष होने का दावा वह तभी कर सकता है, जब, जो भी काम करे, भेदभाव से मुक्त रह कर करे। नाम नही नीयत और काम से पता चलता है कि आप लीग के कार्यक्रम पर काम कर रहे हैं या संघ के अथवा निरपेक्ष चिन्तक, विचारक, सुधारक या सर्जक के रूप में।

आत्मालोचन करें, अपने नाम को नही सोच को बदलें, अपनी संज्ञा को चरितार्थ करें। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नाम अच्छा है इसकी समझ और राष्ट्र की परिभाषा गलत है। इसकी प्रेरक और जननी मुस्लिम लीग का नाम भी गलत था और काम भी किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं था और भारत विभाजन के बाद धर्म प्रेम के नाम पर जिन्होंने देश को बांटा था घर-परिवार, जमीन-जायदाद, अनिशिचत वर्तमान और उससे भी अधिक विपन्न भविष्य के बीच धर्म की सापेक्षता में देश का महत्त्व समझ आया और वे यहीं रह गए पर चेहरा उजागर न कर सकते थे
इसलिए समर्थन के भूखे संगठनौं में परकाय प्रवेश के जादू से प्रवेश कर गए ।

प्रसंग वश, अपनी भाषा और अभिव्यक्ति के रूप को ऐसा रखे जिससे आग न भड़के, रोशनी पैदा हो। समझ में बदलाव आये। जिसे बदलना चाहते हैं वह ध्यान से सुने, समझे, अपमानित न अनुभव करे। उसमें सोच पैदा हो, आवेश नही।

पर लीगी अंतरात्मा के प्रभावमें यदि आप का इरादा उसे आहत करने का हो और वह आहत न हो तो आपका प्रयत्न व्यर्थ गया। यदि आप अपने इरादे में सफल हो गए, वह आहत हुआ तो सौ आहत और अपमानित होने वालों में कोई एक कुछ ऐसा भी कर सकता है कि आपको नुक्सान पहुंचे। पर्याप्त भड़कावे के बाद आपराधिक काम तक की गुरुता कम हो जाती है और अदालतें इसका भी संज्ञान लेती हैं।

Post – 2017-09-10

आराम बड़ी चीज है अब चल कर सोइय़े
बस मशहरी लगाइये और तन कर सोइये।

Post – 2017-09-10

मुझे यहाँ से देखिये, मुझे इधर से देखिये
पसंद हो न यह तो चाहिये जिधर से देखिये ।।
न फेरिये नज़र असर फिरी नज़र का देखिये
हज़ार बार ना सही पर एक बार देखिये।।
बुरा नहीं हूँ चाहिये बुरी नज़र से देखिये
लगा के आँख या कि यूँ बचाके आँख देखिए ।।
चश्मे हों पास जिस भी रंग के लगाकर देखिये
मगर हुजूर आप बंद कर न आँख देखिये।।

Post – 2017-09-10

जैसी थी मेरी ज़िंदगी वह ज़िंदगी तो थी नहीं
मगर गले लगा लिया तो आसमान कम पड़ा ।।

Post – 2017-09-10

अपने अपने हीरो अपने अपने खलनायक

आज समाचार छपा है “कश्मीर में दो आतंकी ढेर, पुलिस का एक जवान शहीद।” किसी अदृश्य अखबार में यही खबर इस तरह छपी है “कश्मीर में दो स्वतन्त्रता सेनानी शहीद, एक सिपाही ढेर। सुख और शान्ति से भरे एक आदर्श मानवीय समाज में शहीद या ढेर होने की जगह तीनों को हंसते मुस्कराते जीना चाहिए था । एक बिगड़े हुए माहौल में ढेर किए जाने वाले को जीवित रहने देना असंख्य जिन्दगियों को बर्वाद करने की छूट देने जैसा है। हमारी मूल्यप्रणाली की कसौटी हम है, मानवता की परिभाषा हमारे निजी, साुदायिक या राष्ट्रीय हितों के अनुसार बदलती है, वीरता और कायरता की परिभाषाएं भी । हमारा सैनिक वीरतापूर्वक शत्रुओं को मारता और दुश्मनों द्वारा कायरतापूर्वक मार दिया जाता है। विभाजित हितों वाले समाजों मे एक का हीरो दूसरे का खलनायक होता है । कोई भी विचार सबके लिए सही नहीं होता । निष्पक्ष रहें तो किसी वस्तुव्यापार के तथ्यों को अंकित किया जा सकता है, सत्य तक पहुंचा नहीं जा सकता। वह सापेक्ष होता है ।

Post – 2017-09-10

यदि आप किसी से नफरत करते हैं तो उसे गाली देने वाला या आहत करने वाला आपको दार्शनिक प्रतीत होगा और वह अपना बचाव करना चाहे तो भी वह बचाव प्रहार जैसा लगेगा. पिछले तीस सालों में जाने कितने रूपों में समझाया है कि नफरत करने वाला समझ नहीं सकता. समझदार आदमी किसी से नफरत नहीं कर सकता, उसकी आलोचना कर सकता है.

Post – 2017-09-09

किनहि न व्यापे जगत गति?

इसका जवाब तो आसान नहीं है, पर इसका जवाब मेरे पास है. यदि मै मानू कि मैं तो गलत हो ही नही सकता, कोई कुछ कहे, उसकी आपत्तियों का सटीक जवाब न दे सकूँ, अपनी मान्यता पर दृढ रहूँ तो मैं न चाहूँ तो भी उस कतार में खडा कर दिया जाऊँगा जिसे जगत गति नहीं व्यापती और जिन्हें जगत गति नहीं व्यापती उनके साथ जगत चल ही नहीं सकता ऐसी स्थिति में वह यूथ निष्काषित यूथपति की तरह तब तक ही जीवित रह सकता है जब तक उसके जैव शत्रुओं की नज़र उस पर नहीं पड़ती.

जिस जैव साम्य को दृष्टान्त के लिए पेश किया उसका सार यह है कि यदि नई पीढ़ी मेरी बुजुर्गी का लिहाज कर के मेरी कटु आलोचना न करे तो वह सही विचार की ह्त्या करके एक व्यक्ति को उसकी बुजुर्गी के कारण बचा रही है जिसे कालदेव भी नहीं बचाना पसंद करेंगे. यदि आप विचार की रक्षा करते हैं तो मेरे भी सही विचारों की रक्षा होगी. यदि जहां मुझे गलत पाया गया और किसी लिहाज से अपना विरोध प्रकट करने में ढील दी गयी तो गलत विचारों का विस्तार होगा. परंतु उसी नियम से मैंने आपके विरोध के सामने यह दिखाने के लिए कि मैं विरोध का सम्मान करता हूँ और उनकी आपत्तियों को मान लेता हूँ उनको जांचता नही हूँ तो यह भी एक गलत विरासत होगी इसलिए मैं अपने विचारों को सही सिद्ध करने के लिए अंत तक लडूंगा और उस दिन की प्रतीक्षा करूगा जब यूथपति को चहेंट कर बाहर करने वाला विचार लेकर आने वाला केन्द्रीयता पा लेता है.

मैंने एक पोस्ट को अपने अज्ञान के कारण बहुत समीचीन पाकर कॉपी पेस्ट करते हुए अपनी चिंताएं रखी. उनके समर्थन में बहुत सी नई सूचनाएं आईं और कुछ मित्रों की चिंताएं भी आईं कि मैंने ऐसा सोचा और माना कैसे. जिस सम्मान और आत्मीय भाषा में विरोध और असहमति प्रकट की गई उससे अभीभूत हूँ पर उससे भी अधिक इस बात से कि असहमति और प्रतिरोध को भावुकता ने पूरी तरह ग्रस नही लिया है. सही होना उतना सही नहीं है जितना सही होने का संघर्ष.

अब मैं उन आपत्तियों को अपनी तरफ से खारिज करने की कोशिश करूंगा और असहमति रखने वालों से अपेक्षा करूंगा कि वे तार्किक ढंग से मुझे गलत सिद्ध करें जिससे संवाद तो चले, अभी तलक का हाल यह है कि मैं अमुक शिविर का हूँ, उसकी मान्यता यह है, आप के तर्क और प्रमाण जो भी हों वे हमारे शिविर में मानी नहीं जा सकते.

इस देश में सम्प्रदाय और साम्प्रदायिकता का प्रयोग वैचारिक घरानों के लिए ही होता था. शैव सम्प्रदाय, नाथ सम्प्रदाय, इत्यादि.

आपत्तियों में जो बिंदु उठाये गए है उन्हें सूत्रबद्ध करें तो :
१. क्या आपत्तिजनक कथन के लिए किसी की ह्त्या का समर्थन किया जा सकता है?
२. क्या जिस आपत्तिजनक कथन से आपको आपत्ति है उसके इतिहास से, अर्थात जे एन यू के उस विवाद से आप अवगत हैं जिसमें यह टिप्पणी की गई थी?
३. क्या आप जैसे विचारवान व्यक्ति को इतनी सतही बहस में उतरना चाहये था ?
यदि कोई और आपत्ति छूट गई हो तो उसकी उपेक्षा मेरा इरादा न था. इन सभी आपत्तियों के साथ मैं ‘नही’ को एकमात्र उत्तर मानता हूँ अर्थात आप की सभी बातें सही हैं और यदि मै इनका समर्थन करूँ या ऐसा किया हो तो गलत हूँ.

परन्तु क्या मेरे कथन में, इस पोस्ट में ही नहीं, मेरे पूरे लेखन में इस बात का समर्थन दिखायी देता है कि हमें कानून और व्यवस्था को अपने हाथ में लेकर कौन अपराधी है, कौन दंडनीय इसका फैसला करने को अपना मुख्य कार्यभार मानना चाहिए और पुलिस और न्याय व्यवस्था पर कब्जा कर लेना चाहिये या इस बात पर बल है कि हमें अपना काम अपने क्षेत्र की मर्यादाओं का निर्वाह करते हुए करना चाहिए ताकि दूसरों को अपने कार्यक्षेत्र में काम करने में हमारे कारण बाधा न पड़े. इसका निर्णय मैं असहमत होनेवाले मित्रों पर, उनकी आयु और अनुभव जो भी हो, छोड़ता हूँ पर इसके पीछे मेरी एक चालाकी भी है. इस बहाने वे मेरी दूसरी किताबों को पढ़ेंगे तो सही.

मेरी चिंता के क्षेत्र में कानून और न्याय व्यवस्था आती ही नही, आता है समाज की सोच में आ रहा बदलाव. यदि आप संतुष्ट है कि बदलाव आपकी कारगुजारियों से इच्छित दिशा में जा रहा है तो मुझे कुछ कहने की जगह एक मुहावरा याद दिलाना बाक़ी रह जाता है – हाथ कंगन को आरसी क्या?

जे एन यू के समय मे यदि घबराए हुए ए बी पी की और से कीचड़ की होली आरम्भ हुई थी और आप ने पानी और साबुन का इस्तेमाल करते हुए उसे विफल नही किया और उस होली में शामिल हो गए तो आप यह कैसे कह सकते है कि कीचड़ फेंकने वाले गंदे है? गाली देकर गाली की प्रतियोगिता को समाप्त नहीं किया जा सकता.

अब यदि जो सूचनाएं भिन्न प्रतिक्रया में प्रमाणों के साथ आई हैं वे रिकॉर्ड पर हैंउन पर भी ध्यान दिया जाय तो उनसे साबित होता है कि जिसे आपने शहीद बना दिया वह एक ब्लैकमेलर थी. तात्कालिक प्रतिक्रया में दुश्मन के दुश्मन को अपना मित्र मान कर उसके साथ खड़ा हो जाने वाले यह तय नही करते कि वह दुश्मन है या सुपारी लेने वाला अपराध कर्मी. सभी टिप्पणियों का आलोचनात्मक पाठ करें. इसने एबीवीपी के उस आरोप को कि ये आजादी के नामपर निर्बन्ध कामाचार की,माग कर रहे है तस्दीक करते हुए अपने अख़बार के लिए मसालेदार और भड़काऊ माल बनाते हुए गली गलौज में बदल दिया था. आप उसे विचार मानें मैं घटिया दर्जे का व्यापार मानता हूँ, जब कि इसे कुंठामुक्त वातावरण का नर्शानिक प्रश्न बनाकर स्वस्थ बहस में बदलने का काम आपका था. सोचिये आप में से कितनों ने अपनी मा से वः सवाल पूछा होगा या पूछ सकते हैं जो उसने संघियों से पूछने को कहा था. ऐसा किसी ने किया हो तो बताए.

जंग जारी रहे तो अच्छा.

Post – 2017-09-09

मैंने अभी तरुण बनर्जी की वाल पर संजीत सिंह का लेखअभी जो पढ़ा उसे कापी पेस्ट कर रहा हूं। तय करें कि लंकेश की ऐसी टिप्पणियों को और कन्हैया की भगवा पहने पर अपनी बहन को भी नंगा करने जैसी टिप्पणियों को पढ़नने के बाद एक गैरराजनीतिक हिन्दू की सहानुभूति इनके और इनका पक्ष लेने वालों से होगी या संघ से। विचार करें संघ का जनाधार उसके संगठन की सक्रियता ने बढ़ाया है या नकली मार्क्स वादियों ने।

“आखिर एक हत्या पर लोग खुशी क्यो मनाते हैं –

“गौरी लंकेश जैसे एक कट्टर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता को जिसे मीडिया पत्रकार बनाकर पेश कर रही है आज मैं उन सभी मीडिया वालों को उसकी फेसबुक पोस्ट पर से घृणास्पद गाली दिखा रहा हुं।

“गौरी लंकेश ने यह 25 मई 2016 को 12:12 पर अपने फेसबुक वाॅल पर पोस्ट किया था उसे मैं पहले मुल रूप से ज्यों का त्यों रख रहा हुं—-

sanghis,
if your mother did not have `free sex’ – meaning sex out of free choice – then it means one of two things:
1. you are a product of rape.
or
2. you are the product of a sex worker who did not perform sex for free but for a fee.
sanghis, the choice is yours. you can either say your mother was involved in `free sex’ or accept that you are a result of either one of the two options that i have given above.

इसको हिंदी में अनुवाद करने में भी मेरा हाथ कांप रहा है लेकिन चेहरे पर से नकाब उतारने के लिए जरूरी है तो पेश है इसका हिंदी अनुवाद—-

संघीयों !
अगर ,आपकी मां ने ” मुफ्त सेक्स ” नहीं किया है – तो इसका अर्थ यह है कि एक दो चीजों का अर्थ है:
1. आप बलात्कार का एक प्रोडक्ट हैं ।
या
2. आप एक सेक्स कर्मी के उत्पाद हैं जो मुफ्त के लिए सेक्स करते हैं लेकिन एक फीस के लिए ।
संघियों, पसंद है तुम्हारा । आप या तो कह सकते हैं कि आपकी माँ ‘मुफ्त सेक्स’ में शामिल हो सकती है या यह स्वीकार करें कि आप ऊपर दिए गए दो विकल्पों में से एक का परिणाम है।

….यह पोस्ट कन्हैया के उस ब्यक्तत्व के समर्थन में लिखी गई थी जिसमें उसने फ्रि-सेक्स के पक्ष में पिछले साल अपना भाषण दिया था।

….दुसरी पोस्ट है भारतीय सेना पर जिसमें कन्नड़ में एक लंबा लेख लिखकर भारतीय सेना को ब्लात्कारी बता रही है।.

..एक और पोस्ट है जिसमें हिंदूओं को इडियट बता रही है।एक फोटो पोस्ट और है जिसमें इस्लाम के विचार यानी हरे रंग को असली इंडिया बता रही है और इससे अलग रंग को इजरायल बता रही है।वह एक फोटो के माध्यम से बता रही है 1947 में जब इस देश में इस्लाम यानी हरे रंग का प्रभुत्व था तभी तक वह भारत था 2014 में तो इजरायल बन चुका है।

.. ..सभी का स्क्रिन शाॅट कमेंट बाॅक्स में है।आप देखना मत भुलें अन्यथा विश्वास न हो तो खुद से सर्च कर उसके फेसबुक वाॅल पर पोस्ट देख सकते हैं।यदि समय खर्च नही करना चाहते हैं तो मुझसे इस विषय से संबधित पोस्टों पर आप लिंक भी मांग सकते हैं मै दस मिनट के अंदर उसके मुल पोस्ट को लिंक लाकर आपको उपलब्ध करवा दुंग।

….सवाल उठता है हिंदू धर्म और हिंदूवादीयों को गंदी गाली देकर अपना गुस्सा प्रकट करने इस कुंठीत महिला को पत्रकार मानना कहां तक उचीत है ?””

Sanjeet singh की पोस्ट

Post – 2017-09-08

सरकार गिराने के दूसरे बहुत से प्रयोग फेल हो जाने के बाद लगता है एक नया प्रयोग चल रहा है:
गाड़ियां पटरी से गिराकर भी सरकार गिराई जा सकती है।
गाड़ियों की रफ्तार घटाने पर मजबूर करके भी सरकार की रफ्तार घटाई जा सकती है।
यातायात प्रणाली से जनता का विश्वास भंग करके भी सरकार में जनता का विश्वास भंग किया जा सकता है।

कौन कर रहा है ये प्रयोग‍? कौन हैं उसके साथ? वे देशवासियों का हित चाहने वाले तो नहीं हो सकते। इसका सामना इंजीनियर या मंत्री बदल कर नहीं हो सकता ।

जिम्मेदारी तय करो। केवल जिम्मेदार व्यक्ति को दंडित करो। आपाधापी मे दंडित किए गए लोगों को बहाल करो।