आप की नजरे इनायत, हम परेशां हो गए
पहले तिनके घोंसला थे तिनका तिनका हो गए
आप का जी खुश है तो फिर है खुशी कायम कहीं
आप भी नासाज हैं तो सोचिए क्या हो गए।
Month: March 2019
Post – 2019-03-22
एसपीजी की शिकायत
हम खार हैं खूंखार नहीं ऐ गुले नादाँ
तुझ पर मरे मिटे हैं कभी यह तो याद कर।।
Post – 2019-03-21
कहने को कुछ न हो तो शिकायत ही कीजिए
सुनते हैं इस अदा से कई काम बने हैं।
Post – 2019-03-21
रोशनी घट रही है बढ़ते जा रहे हैं चिराग
इस अंधेरे केअगिन आफताब है शायद।
आप हैं हम हैं और हम से करोड़ों की कतार
हमारे तंत्र का यह यह राष्ट्रगान है शायद।।
Post – 2019-03-20
बातचीत का रास्ता ( समाहार)
कश्मीर के लाखो लोग कश्मीर से बाहर शरणार्थियों जैसी स्थिति में रहने को बाध्य हैं। कश्मीर से उन्हें निर्वासित करने वाले लोग मनमानी की इतनी छूट होते हुए भी आजादी चाहते हैं। उन्होंने हिंदुओं को इसलिए कश्मीर से बाहर कर दिया मुसलमान हिंदुओं के साथ शांति से नहीं रह सकता। भारत में प्रबुद्ध कहे जाने वाले मुसलमानों में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है? असुरक्षा की भावना का कारण यह है कि भारत में हिंदू बहुमत में हैं। हिंदुओं के बहुमत में होने पर मुसलमान सुरक्षित नहीं अनुभव कर सकते। और कश्मीर के उदाहरण से सिद्ध है कि मुसलमानों का बहुमत होने पर हिंदू सुरक्षित नहीं रह सकते।
विभाजन का आधार था, मुसलमानों का यह मानना कि हिंदुओं के साथ दूसरे सभी धर्मों के लोग शांति से रह सकते हैं परंतु मुसलमान शांति से नहीं रह सकते। जिस बात को वे जानते थे पर मानने को तैयार नहीं थे, वह यह कि एक मत के मुसलमान दूसरे मुसलमानों के साथ भी शांति नहीं रह सकते।
इस्लाम के संस्थापक के अपने निजी विचार क्या थे इसे जानने का हमारे पास कोई विश्वसनीय आधार नहीं है। कुरान उन्होंने नही लिखा, न हदीस लिखा। जिन्होंने लिखा उन्होंने उनका इस्तेमाल किया। उनके नाम पर जो कुछ हुआ वह हिंसा और क्रूरता के अतिरिक्त कुछ नहीं था।
हमारे देश का विभाजन भी तर्क के स्थान पर हिंसा का प्रयोग करते हुए किया गया। मुसलमान मुसलमानों के साथ रह सकते हैं या नहीं यह उनकी समस्या है। जिस जनमत संग्रह से विभाजन का निर्णय हुआ उसमें वर्तमान भारतीय भूभाग के मुसलमानों में लगभग सभी की सहमति थी। ऐसा मत वर्तमान पाकिस्तान के कुछ मुसलमानों का नहीं था, परंतु उनको मुसलमान होने के नाते पाकिस्तान में ही रहने को बाध्य किया गया।
यह तय है कि जब तक मुसलमान पक्का मुसलमान होने का प्रयत्न करेगा तब तक उसके साथ किसी दूसरे मजहब या विश्वास का व्यक्ति शांति से नहीं रह सकता।
विभाजन से पहले मुसलमान जितने मुसलमान थे उसकी तुलना में आज के मुसलमान अधिक कट्टर मुसलमान और हिंदू जितने हिंदू थे उससे नरम हिंदू होते चले गए हैं। विभाजन से पहले दक्षिणपंथी हिंदू जिस तल्ख भाषा में बात करते थे उसमें लोकतांत्रिक भागीदारी के कारण नरमी आई है। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दर्शकों में आर्य समाज का शुद्धि आंदोलन समाप्त हो गया। घर वापसी की विरल घटनाएं जब तब सुनने को मिलती हैं, परंतु उनमें कुछ ही समय पहले प्रलोभन आदि के द्वारा ईसाई बनाए गए आदिवासियों को उनकी परंपरा की याद दिला कर वापस लाने का प्रयत्न होता है जिसका मुस्लिम समाज पर प्रभाव नहीं पड़ता।
हिंदुओं में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जो परंपरावादी सोच और जीवन शैली से दूरी बनाकर रहना अपने लिए गौरव की बात मानते हैं। मुस्लिम समुदाय में ऐसे लोगों की संख्या नदारद है। ऐसे लोगों की संख्या भी बहुत कम है जो अपने को सेकुलर कहते हैं, पर वे भी मुसलमानों की कट्टरता पर परदा डालने या उधर से ध्यान हटाने का काम करते हुए भ्रम पैदा करने का प्रयत्न करते हैं कि मुस्लिम समाज में कोई समस्या नहीं है यदि है तो हिंदू समुदाय के उन लोगों के कारण है जो मुसलमानों की तरह ही कट्टर हैं। मुस्लिम कट्टरता उसका स्थाई भाव नहीं है, हिंदू कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया है। इसलिए उनकी साहित्यिक रचनाओं में, उनके लेखों, व्याख्यानों और कलाकृतियों में प्रच्छन्न रूप से वह पर्यावरण तैयार किया जाता है जिसमें इस्लामिक कट्टरता का बचाव किया जा सके। मुस्लिम पक्के हैं तो कट्टर मुस्लिम हैं और उदार या धर्मनिरपेक्ष हैं तो बिना पावर ऑफ अटॉर्नी के उनके वकील हैं , जो बिना फीस उनका बचाव करते हैं। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण यथार्थ है जिसका सामना नहीं किया जा सकता, सामना कर सकें तो भी बयान नहीं किया जा सकता, इस दहशत के कारण कि यदि ऐसा किया तो चरित्र हनन हो जाएगा।
मनुष्य आत्म सम्मान की रक्षा के लिए प्राण देने को तैयार हो जाता है इसलिए चरित्र हनन का डर उसे इतना भयभीत कर देता है कि वह जिस सच्चाई को देख चुका है उसे भी बयान नहीं कर पाता।
मैंने यह रास्ता चरित्र हनन का जोखिम उठाते हुए अपनाया। सत्य की रक्षा आत्मरक्षा से अधिक जरूरी है। वह बचा रहे और आप का कलंक भी बचा रहे तो उससे यह कलंक भी धुल जाएगा, आपका पुनर्वास भी हो जाएगा । अपने अनुभव-सत्य पर टिके रहने के लिए इतना ही आश्वासन पर्याप्त है और इसी के बल पर मैं वर्तमान यथार्थ को और हमारी समस्याओं के स्थाई समाधान को प्रस्तुत करने का साहस जुटा पाया हूं।
मुस्लिम समुदाय का प्रेरणा स्रोत हिंसा, उपद्रव, जहालत का रहा है। एक कौम को छोड़कर सभी को मिटा दो या उसका उनके सामने सभी को झुका दो। एक किताब को छोड़कर सभी को नष्ट कर दो। एक विचार को छोड़कर दूसरा कोई विचार पनपने मत दो। एक विश्वास को छोड़कर दूसरे विश्वासों के लिए जगह मत छोड़ो। जो किताब का हुक्म है, तामील करो। बहाने करने का, बचने का, किसी तरह की ढील बरतने का मतलब है शिर्क, सबसे बड़ा गुनाह । इसलिए सच्चे मुसलमान के साथ मुसलमान तक शांति से नहीं रह पाता, दूसरा कोई तो शांति और अमन से रह ही नहीं सकता।
भारत पर हमला करने वाले मुसलमान जैसे भी थे, हिंदुओं के संसर्ग में रहने के बाद उनकी कट्टरता में कमी आई थी। जिन मुसलमानों ने जिन्ना के सिद्धान्त को मानते हुए कि हिंदुओं के साथ सम्मान के साथ रहने को असंभव मानते हुए एक अलग देश का समर्थन किया था, वे इतने कट्टर नहीं थे जितने आज हो चुके हैं। मैं जिस स्कूल में पढ़ता था उसमें मुस्लिम बच्चे भी पढ़ते थे। धर्म के आधार पर उनका कोई स्कूल नहीं था। मुझे अपने गांव जाने पर यह देख कर हैरानी हुई कि हमारे गांव की मस्जिद में मुसलमानों के लिए एक अलग सरकारी स्कूल चलता है। विभाजन के दुर्भाग्यपूर्ण दिनों में भी हमारे गांव में किसी मुस्लिम को न तो अपमानित होना पड़ा था न ही किसी तरह की खरोंच आई थी, न मस्जिद में नमाज पढ़ने से आगे या पीछे किसी को यह समस्या आई थी कि वे हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते।
जो लोग पहले अपने हितों के लिए सही प्रतिनिधित्व के अभाव की चिंता से ग्रसित थे, वे अब एक नई चिंता से ग्रस्त हो गए कि हिंदुओं के साथ किसी तरह का संपर्क ही नहीं रख सकते।
इसे भारतीय मुसलमानों ने नहीं पैदा किया। इसे सेक्युलरवादी राजनीति ने पैदा किया। जो तुम नहीं चाहते हो वह भी हम तुम्हें दे कर जो तुम नहीं बनना चाहते हो वह भी हम तुम्हें बनाने का प्रयत्न करेंगे, जिससे हमारा शासन कायम रहे।
जो लोग किसी के साथ बैठ कर पढ़ नहीं सकते, वे किसी व्यवस्था में एक साथ मिलकर काम कैसे कर सकते हैं? करें तो काम से अधिक समस्यायें पैदा करेंगे। यदि इसके कारण उनके साथ भेदभाव हो जाए तो इसके लिए केवल शिकायत नहीं करनी चाहिए, यह भी देखना चाहिए इसकी जड़ें कितनी गहरी हैं। उनकी विश्वसनीयता को कौन लोग कम कर रहे हैं? उनसे बचाव का क्या तरीका हो सकता है? मुस्लिम समाज में जागरूकता कम हुई है। पहले भी नहीं थी पर इतनी कम भी नहीं थी।
विभाजन से पहले की तुलना में मुस्लिम कट्टरता को बढ़ाने वाले जो अन्य घटक मुझे दिखाई देते हैं वे निम्न हैंः
1. पहले अरब देशों के तेल भंडार का दोहन आरंभ नहीं हुआ था। उनमें वह समृद्धि नहीं आई थी कि वे अय्याशी के इतने आदी हो जाएं छोटे-मोटे कामों के लिए उन्हें दूसरे देशों से कामगार बुलाने पड़े। मुस्लिम देश होने के कारण मुसलमानों के लिए वरीयता थी परंतु उसका लाभ उठाने वालों को अपने को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने की बाध्यता भी थी।
2. देश के विभाजन से पहले पैन-इस्लामियत एक खयाल थी, बाद के दौर में यह एक सचाई में बदल गयी। मुसलमान होने के कारण मुस्लिम देशों में मुसलमानों के लिए कुछ अधिक रियायत और मुसलमान सिद्ध होने के लिए कुछ अधिक कठोर शर्ते और उनके लौटने के बाद भारत में उन के माध्यम से मजहबी पाबंदी के नाम पर कट्टरता का विस्तार। वहां से पैसा कमाकर लौटने के बाद मुसलमान वही मुसलमान नहीं रह जाता जो वहां कमाने गया था।
2. नव धनाढ्य जैसे परिपक्वता के अभाव में अपनी जड़ें मजबूत करने की जगह, धन की बर्बादी शेखी बघारने में करता है, उसी तरह अरबों ने मुस्लिम देशों का नेता बनने की कोशिश में अपने धन की बर्बादी इस्लाम की कट्टरता के विस्तार में किया, इसके इतने नमूने भारत में देखने में आते हैं कि उनकी गणना करने की योग्यता मुझ में नहीं है।
3. तेल भंडार पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए अमेरिका ने अरब देशों की संपत्ति को इनके विकास पर खर्च होने और अपने लिए ही संकट मोल लेने की जगह, उनको पिछड़ा रखने के लिए उनकी धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दिया और उनकी सलाह पर पेट्रो डॉलर का दूसरों की नजर से अपार परंतु डॉलर की उल्टी करने वाले देशों की नजर से एक मामूली रकम का प्रयोग दूसरे देशों की मुस्लिम आबादी में कट्टरता बढ़ाने के लिए किया गया, जो दिखाई तो देता है परंतु जिसे हम देख नहीं पाते।
4. सेक्युलर राजनीति की आड़ में भारतीय लोकतंत्र में मुस्लिम कट्टरता को कितने रूपों में बढ़ावा दिया गया, उनका अनुमान हम सभी को है, परंतु उनका सही लेखा देने के लिए जो आंकड़े चाहिए वह मेरे पास नहीं है।
इन विविध कारणों से पहले का मुसलमान यदि हिंदुओं के साथ रहने में कोई ऐसी असुविधा नहीं अनुभव करता था जिसके कारण हिंदुओं के साथ शांति से रह ही न सके ताे आज के मुसलमान के लिए हिंदुओं के साथ शांति से रह पाना असंभव लगता है। इस कथन को उलट कर रखें तो वह अधिक सही होगा। सार यह कि विभाजन से पहले अपने सामाजिक, आर्थिक और भूभौतिक ताने-बाने के कारण हिंदू और मुसलमान अलग रह नहीं सकते थे और आज साथ रहने के लिए तैयार ही नहीं हैं। असंतोष अनेक रूपों में प्रकट होता है। अल्पसंख्यक मुसलमानों को भी समायोजित करने के लिए जिन मांगों की पूर्ति की जानी चाहिए वे भारतीय संविधान की परिधि में संभव नहीं है इसलिए उन्हें अतिसांवेधानिक रियायतें देनी होती है।
मुहम्मद अली जिन्ना को भारतीय इतिहास में खलनायक के रूप में पेश किया जाता रहा है जिसमें यह समझना कठिन है कि वह नेहरू और गांधी से अधिक यथार्थवादी थे और इन दोनों से कम मानवतावादी नहीं थे। हम उन्हें समझदार नहीं कह सकते, क्योंकि उन्होंने जिस सोच को आगे बढ़ाया था वह भारतीय सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक जटिलताओं के कारण व्यावहारिक नहीं था। परंतु इसका समाधान उनके पास था –
विभाजन के बाद आबादी का शांतिपूर्ण अदला-बदली।
गांधी और नेहरू स्वप्नजीवी थे, जिन्ना यथार्थवादी थे। उनकी पाकिस्तान में नहीं चली, हिंदुस्तान में उसे चलने नहीं दिया गया। परंतु समस्या बातचीत की नहीं है, जो बात हुई थी, जो अपेक्षाएं पूरी करनी थीं वे पूरी नहीं की गईं।
बातचीत हो चुकी है। उस पर अमल करने की जरूरत है। परंतु क्या इसका साहस कोई कर सकता है। मुस्लिम बहुल कश्मीर हिंदुओं को सहन नहीं कर सकता। उसे पाकिस्तान में होना चाहिए। शेष भाग भारत का अभिन्न अंग हैं क्योंकि वहां हिंदू अधिसंख्य हैं।
शेष भारत में मुसलमान असुरक्षित अनुभव करते हैं। उन्हें सुरक्षित वातावरण में जाना चाहिए। पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं को भारतीय भूभाग में बसाया जाना चाहिए। समस्या बातचीत की नहीं है। बातचीत हो चुकी है। समस्या उसको लागू करने की है। जब तक उसे लागू नहीं किया जाता तब तक भारत और पाकिस्तान न तो शांति से रह सकते हैं, न अपना विकास कर सकते हैं। परंतु क्या है किसी में ऐसा साहस जो बातचीत से जो तय हुआ था उसे कार्य रूप में परिणत कर सके?
Post – 2019-03-19
प्यार
देखिए वह मुकाम आ ही गया
आप हैं हम हैं और कोई नहीं।
होंगे पर और किसी दुनिया में
इस समय हम हैं और कोई नहीं।।
Post – 2019-03-19
बातचीत का रास्ता (2)
बातचीत से किसी समस्या का स्थाई समाधान तभी हो सकता है जब समाज अपने व्यावहारिक जीवन में नैतिकता के उच्चतम आदर्शों का निर्वाह करे। सभ्यता के विकास के क्रम में आदर्श और व्यवहार की दूरी उसी अनुपात में बढ़ती गई जिस अनुपात में विषमता का विस्तार हुआ। सतयुग के सम्मोहन और कलियुग की गिरावट का काल्पनिक खाका इसी सामाजिक यथार्थ पर आधारित है।
परंतु उस आदर्श अवस्था में भी विभिन्न जत्थों के बीच बातचीत से काम नहीं चलता था। उनमें आपसी टकराव होता था। ऐसे भी चरण आए जिनमें शिकार पर पलने वाले समुदायों को अन्य जानवरों की तुलना में मनुष्य का शिकार करना आसान लगता था। ऐसे समुदाय भारत में भी थे, इसे हम प्रतीकात्मक अवशेषों में देख सकते हैं। उनके साथ संवाद से काम नहीं चल सकता था। भिन्न इरादे रखने वालों के साथ संवाद की विफलता की सबसे पुरानी शिकायतें ऋग्वेद में मिलती हैं,
न यः संपृच्छे न पुनर्हवीतवे न संवादाय रमते ।
तस्मान्नो अद्य समृतेरुरुष्यतं बाहुभ्यां न उरुष्यतम् ॥ 8.101.4
जो न सीधे मुंह बोलता है, न किसी की सुनता है न ही जिसे बातचीत पसंद है आज उसी से पाला पड़ा है। हे मित्र और वरुण अपने बाहबल से उससे हमारा उद्धार करो।
नाम भले देवों का लिया जाए, बाहुबल तोअपना ही काम में आता रहा होगा।
ऐसी दूसरी भी अनेक ऋचाएं हैं। उनके विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है पर यह बताना प्रासंगिक हो सकता है कि उनमें कुछ ऐसी भी हैं जिनमें यह कामना की गई है कि शत्रु के पाषाण हृदय पर लौह लेखनी से प्रेम संदेश लिखकर उसे हमारे प्रति कोमल बनाएं।
आ रिख किकिरा कृणु पणीनां हृदया कवे । अथेमस्मभ्यं रन्धय ॥
यां पूषन्ब्रह्मचोदनीमारां बिभर्ष्याघृणे । तया समस्य हृदयमा रिख किकिरा कृणु ॥ 3-53.7-८
इन उद्धरणों से हमारा विमर्श किंचित बोझिल हो जाता है, फिर भी यह याद दिलाना जरूरी लगता है कि जिन वैदिक जनों को क्रूर, युद्धोन्मादी, उपद्रवी और बर्बर सिद्ध किए जाने वाले लिख इतिहास लिखे जाते रहे वे केवल अपने शांति पाठ में ही शांतिप्रेमी नहीं थे अपितु एक बर्बर और असभ्य परिवेश में शांति और संवाद और न्याय के आधार पर दूसरों को बदलते हुए एक सांस्कृतिक क्रांति कर रहे थे।
जिन जनों से उनका पाला पड़ता था वे इस देश के भी बर्बर और असभ्य समुदाय थे। देशांतर में तो इन्हीं से ही पाला पड़ता था। युद्ध और हिंसा की अपेक्षा संवाद से, भाईचारे से टकराव को कम करने का हमारा इतिहास बहुत पुराना है और वह हमारी चेतना का अंग बना हुआ है। यह केवल परंपरावादियों में ही नहीं है, उससे विद्रोह करने, उससे अलग जाने वाले, उसको नष्ट करने वाले उपद्रवकारियों में भी है जो उपद्रव को क्रांति की संज्ञा देते हैं। परंतु उन्हें परंपरा का पूरा ज्ञान नहीं है। और वह परंपरा का किसी रूप में पालन करने के लिए तैयार नहीं होते हैं।
हिंसा और युद्ध संवाद की संभावना के अभाव और संवाद की विफलता के परिणाम हैं। पशुओं से संवाद संभव नहीं, उनका सामना होने पर दो ही विकल्प रह सकते हैं – भागकर बचा जा सकता हो तो बचना और यदि शक्ति हो तो प्रतिघात करना। परंतु यह पशुओं का चुनाव है जो हर दशा में अपने बचाव चिंता करता है, उसके पास इससे ऊपर का कोई मूल्य नहीं होता। पशुओं के साथ हम यही व्यवहार करते हैं। मनुष्य के साथ, उसके जीवन से अधिक उसकी गरिमा की रक्षा जरूरी होती है। इसलिए अन्य कोई विकल्प न होने के बाद वह अपमानित होकर जीने की अपेक्षा स्वाभिमान की रक्षा करते हुए मर जाना पसंद करता है।
संवाद की विफलता के बाद युद्ध के लाभ और हानि का विचार गौण हो जाता है, आत्मसम्मान, देशाभिमान की रक्षा, मनुष्यों के बीच, मनुष्य होकर जीने की प्रमुख शर्त बन जाती है। भारत ने इसका पालन किया है यह उपभोक्तावादी और सुविधाजीवी क्रान्तिकारियों को भूल जाता है।
हमारे देश में विद्रोह कम हुए हैं, आत्म चिंतन अधिक हुआ है, परंतु आज का हमारा आचरण हमारे प्राचीन जातीय आचरण के ठीक विपरीत हो चला है। हमने अपनी पहल से अपनी समस्याओं को समझने का प्रयत्न नहीं किया, यहां तक कि हमने स्वयं अपनी पहल से अपनी समस्याएं तक नहीं पैदा कीं। क्या विचित्र संयोग है कि समस्याएं पैदा करने वाला हमें समस्याओं के समाधान की सलाह देता है, उनके तरीके बताता है और हम उन पर अमल करते हैं। यह तक नहीं सोच पाते कि कहीं समस्याएं पैदा करने वाला समाधान के नाम पर समस्याओं के समाधान को अधिक जटिल न बना रहा हो। हमारी अधिकांश सामाजिक समस्याएं दूसरों के इरादों और उनकी फितरत से पैदा की गई हैं, यह समझ तक हमारे भीतर नहीं है।
Post – 2019-03-19
अपनी खबर
मैं अपने काम के बाद केवल अपने पाठकों की चिंता करता हूँ।
बारे मेे कोई लेखक या आलोचक क्या कहता है इसकी ओर ध्यान नहीं दे पाता। उसकी फुर्सत नहीं मिलती। इधर मेरे पुत्र को मेरे बारे में जानने और बताने की याद आई तो उन्होंने मुझे https://www.rachanakar.org/ में प्रकाशित हृदयेश जी का एक लंबा संस्मरण मेल कर दिया जिसमें मेरा कुछ विस्तार से उल्लेख है।
कहानीकार के रूप में मैं हृदयेश जी का बहुत आदर करता हूं और उन पर लिखने की बड़ी इच्छा थी। न लिख पाने का मन में मलाल भी है। एक व्यक्ति के रूप में भी मैं उनको सरल -सहज-आत्मीय ही मानता हूं इसलिए यह समझ में न आया कि उन्होंने कुछ बातें खिन्नता के कारण गढ़ लीं या यायदाश्त ने साथ न दिया और उनको उन्होंने कल्पना से उन्हें गढ़ लिया। पहले मैं केवल आदर करता था, अब उनकी दशा पर सहानुभूति भी अनुभव करता हूँ।
इसमें सबकी रुचि तो न होगी परंतु जिनकी रुचि हो उनके लिए और रेकार्ड दुरुस्त करने के लिए गलत अंशों को [ ] चिन्हित करते हुए अपनी टिप्पणी के साथ देना जरूरी समझता हूं।
उन्होंने यह भी कहा था कि उनके मित्र आयकर अधिकारी विनोद कुमार श्रीवास्तव ने, जो उनके लेखकीय व्यक्तित्व का आदर करते हैं, उन पर उस सम्मान आयोजन में भाग लेने का दबाव बनाया था. [इसके साथ वह गोपनीय सूचना भी दी थी कि उस वर्ष के सम्मान की दौड़ में काशीनाथ सिंह भी शामिल थे, किन्तु जूरी के सदस्यों ने बहुमत से उनके नाम की संस्तुति की थी.]
टि. यह सूचना उन्हें कहीं और से मिली होगी, या मन में काशीनाथ सिंह से अपने को महत्वपूर्ण सिद्ध करने की दबी लालसा होगी।
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[ भगवान सिंह ने बताया था कि आम खिलाने के वास्ते वह साथ में नामवर सिंह को भी लाना चाहते थे. बात तय हो चुकी थी. किन्तु नामवर सिंह के इस बीच एकाएक बन गए कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के कारण उनका यहाँ आना रद्द हो गया. नामवर सिंह जाते तो वह उनकी भी उनसे भेंट-मुलाकात कराते. नामवर सिंह की बौद्धिकता उनकी कद्दावर शख्सियत को लेकर हृदयेश में आतंक था. नामवर सिंह से मिलते, बात करते हुए वह सहज नहीं रह पाते]
टि. यह इतनी हास्यास्पद कल्पना है कि इस पर टिप्पणी की भी आवश्यकता। संभव है पीड़ा यह हो कि नामवर जी ने उन पर कुछ नहीं लिखा। परंतु मेरी न सही नामवर जी के स्वभाव का पता होना चाहिए था।
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उनको अपना वह विचार कुछ समय के लिए स्थगित करने की सलाह दी थी, ‘मेरा किताबघर से नयी कहानियों का संग्रह दो-एक माह में आने वाला है. कृपया इस संग्रह की कहानियों पर भी आप पहले नजर डाल लें.’
उत्तर आया, ‘लिखने का ताप मुझमें अभी है. ताप ठंडा नहीं होना चाहिए. आप प्रकाशक से कहकर मुझे संग्रह की डमी तुरन्त भिजवा दें.’
[डमी उनको भिजवा दी गयी.
हृदयेश ने उससे पूर्व नेशनल पब्लिशिंग हाउस से निकला संग्रह ‘नागरिक’ भी प्रकाशक को लिखकर भिजवा दिया. फिर अपनी चार-पाँच प्रतिनिधि कहानियों की छाया प्रतियाँ भी. उनका मानना था कि सही और पूर्ण मूल्यांकन के लिए पर्याप्त सामग्री सामने होनी चाहिए.]
टि. इस तरह की ढेर सारी सामग्री उन्होंने पहल सम्मान से पहले भेजी थी। उसका प्रसंग ही अलग था।
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भगवान सिंह के सान्निध्य से प्राप्त अपने अनुभवों के आधार पर वह उनको सहज ही ईमानदार मान सकते थे बतौर एक लेखक और व्यक्ति दोनों. उनके व्यवहार में खरेपन की खुरखुराहट थी, पर साथ ही वहां बनी पारदर्शिता उस खुरखुराहट को महसूस नहीं होने देती थी. प्रदीप सक्सेना में भी यों ये ही विशेषताएँ थीं, पर स्थितियाँ जन्य विवशताएँ वहां बड़ी बन गयी थीं. भगवान सिंह अपनी वचनबद्धता निभाएंगे, उनसे ऐसी आशा अधिक थी. इसलिए भी कि ढांचों में वही अंतिम व्यक्ति थे.
भगवान सिंह को यथास्थिति जानने के लिए पत्र डाला गया. उत्तर आया, ‘ताप जाता रहा है. उसके वापस आने की प्रतीक्षा है.’
एक बड़े वक्फे के बाद फिर पत्र ाला, ‘ताप वापस आया या अभी दूरस्थ है?’
उत्तर, ‘इधर एक पुस्तक की समीक्षा करने को आ गई थी. दो-एक लेख भी लिखने पड़े. आ गया दूसरा काम पहले वाले काम को पीछे ठेल देता है.’
एक और बड़े वक्फे के बाद फिर पत्र डाला. इस बार उत्तर की बजाय खामोशी. नारायण बाबू ने कहा कि हो सकता है आपका पत्र कहीं रास्ते में गुम हो गया हो. आपको मुद्दे पर सीधे लिखते हुए अगर संकोच होता हो तो दीपावली, नववर्ष पर शुभकामनाएँ भेजिए. ये शुभकामनाएँ भी उनको आप वाले काम का स्मरण कराती रहेंगी.
टि. यहां जिस को देखने के बाद लिखने का उनका प्रस्ताव था वह संग्रह भी किताबघर से नहीं नेशनल पब्लिशिंग से आने वाला था। वह काफी विलंब से आया था। इस बीच मैं किसी दूसरे काम पर लग गया था इसलिए ताप चुक जाने की बात सही है। इसका नतीजा यह हुआ कि एक बार जब नेशनल पब्लिंग हाउस ने कोई पुस्तक प्रकाशनार्थ देने को कहा तो मैंने हृदयेश जी के कहानीसंग्रह के प्रकाशन में हुए विलंब का हवाला देते हुए मना कर दिया था।
भेजी गयी शुभकामनाओं की एवज में कभी प्रतिशुभकामनाएँ आ जाती थीं, कभी वे भी नहीं.
चन्द्रमोहन दिनेश ने भगवान सिंह को फोन किया था. भगवान सिंह के शाहजहाँपुर प्रवास के दिनों में चन्द्रमोहन प्रायः उनके साथ भगवान सिंह से मिलने जाते थे और उनका बताया हुआ कोई काम भी सोत्साह कर देते थे. वह जिलाधीश के वैयक्तिक सचिव थे. उन्होंने यह फोन अपनी ओर से किया था, यो ही हालचाल लेने के लिए. उनको इस बात का इल्म भी नहीं था कि भगवान सिंह ने कोई लेख लिखने का वादा हृदयेश से कर रखा है. फोन पर हुई बातचीत में भगवान सिंह ने चन्द्रमोहन से कहा कि वह हृदयेश जी को बता दें कि उनपर उनको लेख लिखना है, पर वह लेख कब लिखा जाएगा इसे वह स्वयं भी नहीं जानते हैं.
संदेश पाने पर मन बसा रहे दूध से दही बन गया. भगवान सिंह ने फोन के चोंगे के पीछे उनकी उपस्थिति पायी थी.
नहीं, उन्होंने फिर पत्र लिखा ता, कई माह बाद और एक दूसरे संदर्भ में. रवीन्द्र वर्मा का उपन्यास ‘पत्थर ऊपर पानी’ पूरा का पूरा ‘कथादेश’ के एक अंक में प्रकाशित हुआ था. भगवान सिंह ने पत्रिका में पाठकीय प्रतिक्रिया स्वरूप उस उपन्यास की जमकर प्रशंसा की थी. उतनी प्रशंसा उनको सही नहीं लगी थी. उन्होंने पत्रिका को न लिखकर सीधे भगवान सिंह को लिखा था कि वह उनकी धारणा से असहमत हैं क्योंकि उपन्यास में दर्शन की बघार ज्यादा है. इसने उसे पाठकीय स्वाद की दृष्टि से कुछ बेस्वाद कर दिया है. भगवान सिंह ने उत्तर देते हुए लिखा था कि कृति में दर्शन का होना बुरा नहीं होता है. असल में जैसे हमारी रुचि, प्रकृति, अनुभव, की भिन्नता हमारी सर्जना को प्रमाणित करती है और हमें एक खास तरह का लेखक बनाती है, उसी तरह हमें एक खास तरह का पाठक भी बनाती है. फिर इसी पत्र में उन्होंने उनपर न लिख सकने का स्वतः स्पष्टीकरण दिया था कि वह अभी निष्क्रियता के दौर से गुजर रहे हैं. उनपर जो कुछ लिखना शुरू किया था वह अभी वहीं ठहरा हुआ है जहाँ व्यवधान आया था. लिखा हुआ अंश वह साथ में भेज रहे हैं. पर यह इस बात का संकेत नहीं कि इसकी यहीं इतिश्री है. संकेत यह कि इसे लिखने की भीतर से उठी उमंग अभी स्थगित है.
उनपर लिखा वह अंश पाँच-छह सौ शब्दों का था. शीर्षक दिया गया था ‘मिट्टी के भी होते हैं अलग-अलग रंग.’ भगवान सिंह ने लेख की शुरूआत यह बताते हुए की थी कि हृदयेश हिन्दी के उन रचनाकारों में हैं जिनका अपना रंग है और इसके बाद भी वह बहुतों के इतने करीब पड़ते हैं कि उनका अलग रंग पहचान में नहीं आता. इस प्रसंग में अन्य रचनाकारों के साथ प्रेमचंद का नाम भी लिया गया है. यदि हृदयेश किसी परम्परा में आने का प्रयत्न करते तो वह हृदयेश नहीं हो सकते थे. खुदा जैसा बनने का प्रयत्न करने पर खुदी को गंवाना पड़ता है.
फिर उन्होंने हृदयेश की ओर लोगों का उचित ध्यान न देने के लिए इसका एक कारण उनके शहर शाहजहाँपुर का बताया था जो भारत के मुख्य भू-भाग से अलग छिटके हुए एक द्वीप जैसा है. यह भी संभावना उनके नाम के आधार पर प्रकट की थी कि उन्होंने अपने लेखन का प्रारम्भ कविता से किया होगा.
टि. मैंने उन पर लिखना आरंभ किया था, इसकी सूचना मिलने पर उन्होने अपने नए संग्रह को भी देखने के बाद लिखने का उनका प्रस्ताव था वह संग्रह भी किताबघर से नहीं नेशनल पब्लिशिंग से आने वाला था। वह काफी विलंब से आया था। इस बीच मैं किसी दूसरे काम पर लग गया था इसलिए ताप चुक जाने की बात सही है। इसका नतीजा यह हुआ कि एक बार जब नेशनल पब्लिशिंग हाउस ने कोई पुस्तक प्रकाशनार्थ देने को कहा तो मैंने हृदयेश जी के कहानीसंग्रह के प्रकाशन में हुए विलंब का हवाला देते हुए मना कर दिया था।
फिर इसके आगे यह बताते हुए कि हृदयेश ने बीच-बीच में आने वाले तमाम आंदोलनों को गुजर जाने दिया बिना अपने लेखकीय तेवर या प्रकृति में बदलाव लाए हुए, कि वह चुनाव पूर्वक अपनी जमीन पर टिके रहे न दैन्यं न पलायनम्, कि हृदयेश एक साथ कई परम्पराओं से जुड़ते हैं क्योंकि प्रत्येक रचानाकार अपने वरिष्ठों, समवयस्कों, यहाँ तक कि अल्पवयस्कों की कृतियों के प्रभाव को अपनी अनवधानता में सोख लेता है जैसे पौधे की जड़ें खाद के रस को सोख लेती हैं, लेख को असमाप्त छोड़ दिया था, कोई व्यवधान आ जाने के कारण.
Post – 2019-03-16
बातचीत का रास्ता
हिंसा और युद्ध, हिंसा और युद्ध का ही पर्यावरण तैयार करते हैं। जो बोया सो ऊपजा। कुछ समय के लिए शक्तिशाली व्यक्ति अमानवीय क्रूरता का सहारा लेते हुए दूसरों पर हावी हो जाए तो भी उस दौर में वह चैन से नहीं रह पाता। जिनको दबा कर में रखता है वे तो चैन से रह ही नहीं सकते।
क्रूर व्यक्ति कायर भी होता है। अपने आसपास के लोगों से अपने सगे संबंधियों से भी डरा रहता है। वह अपने से कमजोरों की हत्या करता है, बराबर के लोगों से धोखाधड़ी करता है । शौर्य की कसौटी पर तुच्छ सिद्ध होता है।
पराजित व्यक्ति या समाज अपनी लाचारी के होते हुए भी प्रति हिंसा के लिए छटपटाता रहता है, और कई बार यह छटपटाहट दबी हुई ऊर्जा का इतना बड़ा भंडार तैयार कर लेती है, कि उसका उन्मोचन भूगर्भीय लावा की तरह इतना विस्फोटक हो जाता है कि वह सत्ता की अभेद्य प्रतीत होने वाली चट्टानों को तोड़ देता है। औरंगजेब के सामने शिवाजी की हैसियत क्या थी। अरबों से धर्मयुद्धों में लगातार पराजित होने वाला यूरोप का ईसाई जगत क्या था। परंतु इस अपमान बोध ने ऐसी ऊर्जा पैदा की कि उसका छोटा से छोटा देश जीने मरने के संकल्प से भर गया। इसका सही गणित क्या है हमें पता नहीं, क्योंकि हर मामले में ऐसा नहीं होता है।
परंतु युद्ध और हिंसा से कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हुआ। युद्ध और हिंसा के कारण मानव समाज को अकल्पनीय त्रासदियों से गुजरना पड़ता है, मनुष्यता के कल्याण के लिए बहुत परिश्रम और लंबी योजना के बाद तैयार की गई निर्मितियों का भी ध्वंस होता है। युद्ध की तैयारी, उसके साधनों की व्यवस्था आयुधों के उत्पादन, सेना पर व्यय किए जाने वाले मानव श्रम की सकल बर्बादी का यदि मानवता के हित में उपयोग किया जा सका होता तो मरने के बाद स्वर्ग के कल्पना लोक में सपने देखने की जगह विज्ञान से हुई प्रगति का के बल पर धरती पर स्वर्ग उतारा जा सकता थ। इस दृष्टि से युद्ध की तैयारी और युद्ध की पहल करने वाले या तो पागल हो सकते हैं, या जड़।
दूसरी ओर भाषा और विचार से बड़ा और क्रांतिकारी हथियार आज तक न तैयार हुआ है न ही आगे तैयार हो सकता है। मनुष्य सृष्टि के सबसे दुर्बल प्राणियों में से एक था। भाषा के आविष्कार के बाद अनुपस्थित लोगों के साथ भी संपर्क करने के साधन का आविष्कार करने के बाद वह इतना शक्तिशाली हो गया की खतरनाक से खतरनाक, शक्तिशाली से शक्तिशाली जानवर का शिकार कर सके। भाषा और विचार ने ही उसमें हथियारों के आविष्कार से नैसर्गिक दुर्बलता को पूरा करने की योग्यता भी पैदा की। हथियार से भाषा पैदा नहीं हुई,भाषा और विचार से हथियार और औजार पैदा हुए। औजार जो सृष्टि करता है; हथियार जो विनाश करता है, दोनों भाषा की संततियां हैं।
विनाशकारी हथियार अपने आप नहीं चलता, उसे मनुष्य चलाता है। भाषा और विचार के माध्यम से उसका दिमाग बदला जा सकता है। बदला जाता रहा है। उसी हथियार का उनके विरुद्ध प्रयोग किया जा सकता है जिन्होंने दूसरों पर प्रयोग करने के लिए हथियार का आविष्कार किया।
मुहावरे में शांति और अहिंसा इसलिए भी सम्मोहक लगते हैं कि मनुष्य के समस्त निर्माण कार्य और मनुष्यता की सारी प्रगति शांति के दौर में ही संभव हुई है यद्यपि पूर्ण शांति हमें अपने निजी जीवन में भी बहुत कम प्राप्त होता है सामाजिक जीवन में इसके दौर कम रहे हैं। हमने अधूरी प्रगति की है, क्योंकि हमने अधूरी शांति के दौर ही देखे हैं।
निष्कर्ष यह कि भाषा और विचार में सृजन और विनाश की, जोड़ने और तोड़ने की, सत्य को उद्घाटित करने और सत्य पर पर्दा डालने की परस्पर विरोधी क्षमताएं है। भाषा में सर्वनाश की ही नहीं आत्म हत्या की क्षमता भी है, जिसका दूसरा नाम झूठ है। भाषा की निर्माणकारी भूमिका और कार्य के बीच भेद न रहने से पैदा हो
ती है; विनाशकारी भूमिका असत्य का सहारा लेने से पैदा होती। सत्य और असत्य नैतिक श्रेणियां नहीं है, अपितु इनके अमल से होने वाले निर्माण और विनाश के कारण इनको नैतिक और अनैतिक कोटियों में रखने की बाध्यता उत्पन्न हुई। नैतिक वह है जो मनुष्य मात्र के लिए कल्याणकारी है, और परम नैतिक वह है जो समग्र सृष्टि के लिए कल्याणकारी है। अनैतिक को सत्य का विलोम समझ सकते हैं।
यदि भाषा में हथियारों से भी अधिक संहार शक्ति है तो झूठ के लिए भाषा का प्रयोग करते हुए से उससे बड़ी हिंसा की जा सकती है जो हथियारों से संभव है। यही कारण है कि परमाणु आयुधों आविष्कार करने के बाद भी प्रचारतंत्र को अधिक शक्तिशाली माना जाता है।
यहां हम एक भेद करते हुए आगे बढ़ें कि सही जानकारी का विस्तार , वह जिस भी माध्यम से क्यों न हो, शिक्षा है। और जानकारी को किसी स्वार्थ के कारण ऐंठ- मरोड़ कर अर्धसत्य मैं बदल कर जिस भी माध्यम से क्यों न हो, संचारित करना, प्रचार है।
इसलिए यह आत्मवंचना है कि बातचीत के रास्ते हथियारों के प्रयोग से अधिक अहिंसक होते हैं। हिंसा के एक लंबे दौर से गुजरने के बाद भारत इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अहिंसा परम धर्म या सर्वोपरि आचार है- अहिंसा परमो धर्मः । परंतु इसके बाद जो दूसरा विकल्प भाषा का बचता था उसमें भी हिंसा की संभावना देखते हुए इस नतीजे पर पहुंचा था कि सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं है, इससे बडा कोई ज्ञान नहीे है और असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं हो सकता ‘नहि सत्यात परो धर्मों नानृतात् पातकं परम। नहि सत्यात परं ज्ञानं तस्मात सत्यं विशिषते।’ असत्य का सामना होने के बाद अहिंसा का पालन संभव नहीं हो सकता, इसलिए अहिंसा परमो धर्मा के आगे हिंसा को भी धर्म मानने को बाध्य होना पड़ा। अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च l”
सनातन परंपरा और जैन तथा बौद्ध मत में प्रधान अंतर यह है सनातन एक लंबे ऐतिहासिक अनुभव की उपज है, जबकि जैन और बौद्ध धर्म युद्ध और अहिंसा के विरुद्ध विचार को हथियार बनाने की विश्वास से पैदा हुए मत हैं। सत्य और अहिंसा के प्रति सम्मान दोनों में देखने में आता है, परंतु जहां सत्य का निर्वाह न हो रहा हो वहां भी उसका निर्वाह करते हुए हिंसकों को अहिंसक बनाया जा सकता है, इस विश्वास का दूसरा नाम जैन और बौद्ध मत है। बौद्ध मत में दूसरे देशों में जरूरी सुधार कर लिए गए। जैन मत भारत तक सिमटा रह गया इसलिए इसने अपने एकांगी प्रयोगों से कुछ नहीं सीखा।
गांधी जैन परंपरा में पले बढ़े थे। अपने एकांगी प्रयोग लगातार विफलताओं के बाद भी इसआशा में करते रहे किअपने आचरण के माध्यम से दूसरों के व्यवहार को बदला जा सकता है। उनका महान प्रयोग विफल हुआ। न
केवल वह हिंसा को रोक नहीं पाए, अपने अतिवादी प्रयोगों के कारण हिंदू समाज का भी पूरा हृदय परिवर्तन नहीं कर सके और स्वयं भी हिंसा के शिकार हुए।
वैज्ञानिक सोच में पिछले प्रयोगों की विफलता से सीखा जाता है हम कितने आस्थावादी हैं कितने विचारशील इसका प्रमाण हमारे बुद्धिजीवी वर्ग को देना चाहिए था। गांधी जी के महान प्रयोग की विफलता से भी हमने कुछ सीखा नहीं । उस प्रयोग का निष्कर्ष यह है की सामरिक शक्ति अर्जित करने के बाद ही शांति की पहल की जा सकती है और भाषा के माध्यम से पैंतराबाजी करनेवालों को सही जबान का इस्तेमाल करने को बाध्य किया जा सकता है।
Post – 2019-03-15
सुनो !
हम हँस नहीं सकते
हमारे नाम पर हंसना,
ठठाकर इस तरह
सब लोग समझें
हंस रहे हैं हम।