Post – 2019-03-14

नेति नेति अर्थात् शब्दों के जादूगर

जो है वह नहीं है; जो नहीं है वह है। परंतु यह भी नहीं कह सकते कि जो है वह बिल्कुल नहीं है, जैस यह नहीं कह सकते कि जो नहीं है, केवल वही है। मनुष्य परिभाषाएं बदलकर बुद्धि का बुद्धि के विरुद्ध प्रयोग करके ऐसे असंभव काम कर सकता है कि नस्लें मिट जाएं, पर तलाशने पर भी खून का छींटा तक न मिले। वह परिभाषा बदल कर जो सज्जन है उसे वह दुष्ट सिद्ध कर सकता है; जो दुष्ट है उसे लोकोद्धारक सिद्ध कर सकता है। विज्ञान के नाम पर अज्ञान का प्रसार कर सकता है, अज्ञान को मनुष्यता की सर्वोपरि उपलब्धि सिद्ध कर सकता है।

ज्ञान के अभाव में विज्ञान असंभव था। ज्ञान और विज्ञान के अभाव में विश्वास पैदा नहीं हो सकता था। हमारी ज्ञान संपदा दूसरों के ज्ञान और अनुभव पर विश्वास का दूसरा नाम है। इसके अभाव में हम जानवर में बदल जाते, या जानवरों से भी पीछे चले जाते । विश्वास के अभाव में अंधविश्वास संभव ही नहीं था। सोचने पर विचित्र लगता है कि विज्ञान और अंधविश्वास कर-कंगन न्याय से, या एक ही चुंबक में विरोधी ध्रुवों के रूप में परस्पर जुड़े हुए हैं।

जादूगर उसे कहते हैं जो, जहां कोई चीज थी वहां से उसे गायब कर देता है, और जहां उसके होने की संभावना ही नहीं होती वहां से पैदा कर देता है। अपने बुद्धिबल से दूसरों को कुछ भी समझा लेने की अपनी क्षमता पर भरोसा करने वालों से बड़ा जादूगर कोई पैदा नहीं हुआ। जादूगर दूसरों को भ्रम में रखता है, परंतु ऐसे बुद्धिजीवी का जादू केवल जादूगरों की जमात पर असर डालता है, स्वयं उस पर असर डालता है, आगे उसका असर बेकार हो जाता है।

आपने वे नारे पढ़े हैं जिनमें इस बात का प्रचार किया जा रहा था कि ‘युद्ध हरगिज़ नहीं।’ यह युद्ध का विरोध नहीं है। वह जिसने लगातार युद्ध से बचने का, शांति और सद्भाव से रहने का प्रयत्न किया और उसकी भारी कीमत चुकाई है, उसे युद्धोन्मादी, और जिसने उसके इस प्रयत्न को लगातार विफल किया है उसे शांतिप्रेमी सिद्ध करने का अभियान है और है भी उन लोगों द्वारा जिन्हें सबसे प्रबुद्ध और सदाशयी माना जा सकता है। जो होना चाहते है उससे ठीक उल्टा आचरण और उन्हें खुद इसका पता नहीं। इसे कहते हैं दिमाग की सफाई। जेएनयू में यही काम किया जाता रहा। साफ सुथरे दिमाग के लोग, जो भर दिया गया उसका जादू। जादू सर चढ़कर कैसे बोलता है यह मुहावरा नहीं है, सचमुच बोलता है।

वे समझाना किसे चाहते हैं? स्वयं अपने को और अपने जैसों को जो उस जबान में ही ऊंचे बोल बोलना पसन्द करते हैं जिसे आम लोग नहीं जानते। हमने उसका अनुवाद कर दिया पर वे ऐसा तुच्छ काम नहीं कर सकते। अपना माल बेचने वाले व्यापारी देसी भाषाओं में अपने माल का विज्ञापन करते हैं, अपने विचार को जनता तक पहुंचाने का नाटक करने वाले कहते हैं ‘ SAY NO TO WAR. समझदारी पर क्या शक किया जा सकता है?
अंग्रेजी जानने वाला हमारा समझदार और सदाशयी हमारे अपने देश के लोगों से नहीं, अंग्रेजी जानने वाले दुनिया के लोगों से कह रहा है, कि भारत युद्धोन्माद से ग्रस्त हो गया है। पाकिस्तान हमेशा से बातचीत से मसले हल करना चाहता रहा है और आज भी लगातार शान्ति से ही आपसी समस्याओं को सुलझाना चाहता है। यहां तक कि कश्मीर के वे नेता भी जिन्हें अलगाववादी कहा जाता है बातचीत से समस्या के हल की बात करते है। यदि कश्मीर मे अशांति है तो इसलिए कि वहां के लोग आजादी चाहते हैं। भारत सेना के बल पर उन्हें दबा कर रखना चाहता है। जब तक ऐसी स्थिति रहेगी तब तक वहां अशांति रहेगी। पाकिस्तान युद्ध नहीं चाहता, वह केवल कश्मीरी जनता की आजादी की जंग में मदद कर रहा है। जिन्हें आप आतंकवादी कहते हैं वे कश्मीर की आजादी के लिए लड़ने वाले वालंटियर हैं। वे भारत में प्रवेश कर सकें इसके लिए उन्हें कवर देने के लिए पाकिस्तान युद्ध विराम सीमा का उल्लंघन करता और पार से तोप और मिसाइल दागता रहेगा। भले इससे सीमा के निकट रहने वाले नागरिक मारे जाएं, यह असली युद्ध नहीं है। नकली युद्ध है। तब के पाकिस्तान और आज के बांग्ला देश के मुक्ति संग्राम में यदि भारत मुक्तिवाहिनी की सहायता के लिए अपनी सेना भेज सकता था तो कश्मीर की आजादी के लिए लड़ने वालों की मदद के लिए पाकिस्तान क्यों नहीं? चाहे नारा चार शब्दों का ही क्यों न हो पर इसकी पृष्ठभूमि में ये सभी तथ्य हैं और इसका भाष्य यह है कि:
१. कश्मीर के लोग आजादी की जंग लड़ रहे है और इस लड़ाई में वे पत्थर से लेकर बम तक का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं;
२.भारत ने सेना के बल पर कश्मीर पर कब्जा कर रखा है;
३. जिसे हम पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं वह आजाद कश्मीर है जब कि भारतीय कश्मीर भारत-अधिकृत कश्मीर है;
४. पाकिस्तान एक शान्तिप्रेमी और स्वतंत्रता का समर्थक देश है, जिसे कश्मीर को मुक्त कराने के लिए भारत पर बार बार आक्रमण करने पड़े है। वह शान्तिपूर्ण युद्ध करता है; भारत आक्रामक आत्म रक्षा करता है;
५. हम पाकिस्तान के साथ हैं और भारत के युद्धोन्माद का विरोध करते हैं।

परन्तु ये बातें खुलकर कही नहीं जा सकतीं क्योंकि इन संकेतगर्भित दावों का भी सीधा पाठ यह बनता है कि:
१. कश्मीर के भारत में विलय के समय से ही पाकिस्तान की सेना ने या उसके सहयोग से उसके द्वारा प्रशिक्षित जत्थों ने भारत पर आक्रमण किए हैं और भारत को जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर किया है;
२. भारतीय कश्मीर को, जिनकी भी समझदारी से हो, जितनी छूट मिली हुई है उसका कश्मीरी प्रशासन ने दुरुपयोग करते हुए हजारो कश्मीरियों की हत्या और उत्पीड़न करके लाखों को अपने ही घर से पलायन करने पर मजबूर कर दिया क्योंकि वे हिन्दू थे; कश्मीरी कश्मीरी नहीं रह जाता; सिर्फ हिंदू रह जाता है और उसे कश्मीर में रहने का अधिकार नहीं;
३. पाकिस्तान-प्रेरित आक्रमणों और उपद्रवों के बाद भी भारत ने शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए जीते हुए इलाकों और युद्धबन्दियों को वापस कर दिया, जब कि पाकिस्तान ने कब्जा किए हुए कश्मीर का हिस्सा नहीं लौटाया, जिसके बाद ही मतसंग्रह से यह फैसला होना था कि वे क्या चाहते हैं?
४. १९७१ में भारत ने नब्बे हजार युद्धबन्दियों को वापस लौटा दिया परन्तु उसी युद्ध में भारत के १५० युद्धबंदियों को नहीं छोड़ा, वे जेनेवा संधि के विपरीत पाकिस्तानी जेलों में यातना झेलते हुए मर गए या जीवित हैं;
५. बातचीत तो दूर पाकिस्तानी सेना ने लिखित संधियों का भी लगातार उल्लंघन किया है, ऐसी स्थिति में बातचीत मनोरंजन के लिए समय समय पर किया जाने वाला नाटक है;
६. से नो टु वार आंदोलन की पुकार उनको भारत में नहीं, पाकिस्तान में जाकर लगाना चाहिए, क्योंकि भारत लगातार यही बात दुहराता रहा है और तर्क देता रहा है कि गोली चलाते गुए मेल मिलाप की बोली नहीं बोली जा सकती;
७. यह नारा लगाने वाले आतंकवाद के पैरोकार हैं। जो काम वे पत्थर और बम से करते है वह काम ये भ्रम फैलाते हुए सेना से लेकर नागरिकों तक का मनोबल गिरा कर करते हैं। पहली कोटि में हार्डकोर आतंकी आते है, दूसरी मे साफ्टकोर आतंकवादी।
८. ये समस्याएं पैदा करने के पक्षधर हैं, समाधान के नहीं। ये शान्ति के समर्थक नहीं, युद्ध के कारोबारी हैं, इसलिए यदि सचमुच स्थाई शान्ति का तरीका सुझाया जाय तो पागल हो जाएंगे।
(लेखक इस विषय की कामचलाऊ जानकारी ही रखता है इसलिए इसे पढ़ने वालों की जिम्मेदारी है कि आंकड़ों में यदि कहीं चूक मिले तो उसे सुधार कर पढ़ें।)

Post – 2019-03-12

हम जिसको छुपाते हैं, क्या तुमने उसे देखा?
अर्थात्
चूक का मनोविज्ञान

कॉमेडी ऑफ एरर्स किसने लिखी थी आप जानते हैं। उसके आधार पर गुलजार ने एक बहुत सुंदर फिल्म ‘अंगूर’ बनाई थी। इससे भी आप परिचित होंगे। लेकिन आदमी गलतियां करते हुए अपनी असलियत को जाहिर कर देता है, इस सचाई पर जिस आदमी ने रोशनी डाली थी उसका नाम जानते हुए भी शायद याद न आए। उसका नाम फ्रायड था।

वह पहला आदमी था जिसने चेतना के तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल,महातल और पाताल की खोज की थी, परंतु सही नाम नहीं दे सका था। सही नाम मैं भी नहीं दे रहा हूं। परंतु उसने चेतना की उन तलहटियो की खोज की थी जो वाहियात प्रतीत होती हैं, मिथ्या लगती हैं, और इसलिए जिनकी हम उपेक्षा करते हैं। उन पर भरोसा करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

परंतु फ्रायड ने यह सिद्ध करके दुनिया को चौंका दिया कि इनके भीतर से उन सचाइयों को देखा जा सकता है, जिन्हें हम छिपाने का प्रयत्न करते हैं, या जो इतनी कड़वी होती हैं कि उन्हें हमारा चेतन मस्तिष्क सहन नहीं कर सकता इसलिए जिन को दबा हम अपनी ओर से अवचेतन के अंध लोक में पहुंचा देते हैं, परंतु वे वहां पहुंच कर भी हमारे व्यवहार, हमारी मानसिकता, हमारी शांति में हस्तक्षेप करते रहते हैं और अपनी अभिव्यक्ति का प्रयत्न करते हैं । ऐसा कभी चेतन के सहयोग से करते हैं, जिससे कलाकृतियां और जटिल समस्याओे के समाधान निकलते हैं, और कभी ऐसे पाशविक आचरण का रूप लेते हैं जिसकी हमसे अपेक्षा नहीं की जाती। परंतु हर दशा में इस बात का प्रमाण होते हैं कि सजग होने पर आप झूठ बोल सकते हैं, नाटक करते हुए आप जो हैं उससे अलग दीखने का प्रयत्न कर सकते हैं, परंतु अवचेतन की कूटभाषा को यदि समझा जा सके तो वह कभी झूठ नहीं बोलता। केवल परदा उठाता है।

बहुत पहले पढ़े हुए इस पाठ को भूल ही चुका था कि राहुल गांधी ने हाफिज
सईद के लिए सम्मान सूचक ‘जी’ प्रयोग करके इसकी याद ताजा करा दी। मैं इसके लिए उनका आभारी हूँ, भले वह अपने मनोविश्लेषण के लिए अपना आभार न प्रकट कर सकें।

पुलवामा कांड के बाद सूचना तंत्र में चूक हुई जिसके कारण यह दुर्घटना
घटी। उसकी पूरी व्याख्या करने की योग्यता मुझ में नहीं है। मैं आज तक यह न समझ पाया कि हमलावर को उस गाड़ी का पता कैसे था जो सुरक्षा कवच से वचित थी। इसका स्रोत बीएसएफ के भीतर तलाशा जाना चाहिए, जो तलाशा नहीं जा सका है। भारत के दुश्मनों को खोजकर मारना सही हो सकता है, पर सही निदान नहीं हो सकता।

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की जो व्याख्याएं आई थीं उनके दो स्रोत थे। एक
पाकिस्तानी, जिसमें इसे अगले चुनाव के साथ जोड़कर, वर्तमान सरकार का अपराध सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया था। दूसरी ओर कांग्रेस के सुजान लोगों की सावधानी के बावजूद ठीक वही बात कुछ बदले हुए मुहावरों के साथ प्रकट की गई थी। कहा यह गया कि यह राजनीति का फिक्स्ड क्रिकेट मैच था। इमरान खान और नरेंद्र मोदी दोनों के बीच मिली भगत का परिणाम बताया गया था दुर्घटना को।

मिली भगत तो थी, परंतु किसके बीच? किनके द्वारा? किन माध्यमों से? मुझे जिस बात पर आश्चर्य हुआ वह यह कि इसके बाद बहुत सारे कोनों को खंगालने के बाद भी विवेचन में, यहां तक कि प्रवक्ताओं की दलीलों में भी यह बात उभरकर नहीं आ सकी कि चुनाव में मोदी को हत्यारा सिद्ध करने का भी कोई प्रयत्न िन्हीं के द्वारा किया जा सकता है। आसानी से लोग भूल गए कि कुछ दिन पहले तक कांग्रेस के प्रतिष्ठित नेता पाकिस्तान, हाफिज सईद, और तालिबानी गतिविधियों के साथ कितनी देर से खड़े थे, उन को बढ़ावा देने के लिए कितने प्रयत्नशील थे।

उनका यह प्रयत्न कि उनके दुर्भाग्य से देश के एक छोटे से हिस्से को भारत के रूप में बचे रहने के बाद भी उसके टुकड़े कर दिए जायँ। मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहता। परंतु भारत के टुकड़े करने के आकांक्षी किस सीमा तक जा सकते हैं, अपनी बौखलाहट में किन का सहयोग ले सकते हैं, यह सारी कहानी जो आधी पर्दे के बाहर थी और आधी पर्दे के भीतर, उसे राहुल गांधी ने एक चूक से उजागर कर दिया।

हमारे सामने दो नारे हैं:
1. ‘सबका साथ सबका विकास’, जिसे पाखंड तो बताया जा सकता है पर यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि कि इसे लगाने वाले ने कोई ऐसा आचरण किया जिससे इसको पाखंड सिद्ध किया जा सके।

2. ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्ला,इंशा अल्ला’ और इसकी कमी को पूरा
करने वाले आतंकवादियों या भारत को तोड़ने वालों को महिमामंडित करने और उसी राह पर चलने की प्रतिज्ञा वाले नारे। यदि इसे तरुणों का भावावेश कह कर क्षमा किया जा सकता था तो भी सोच समझ कर उनके समर्थन में खड़े होने वाले अनुभवी राजनीतिज्ञों के वक्तव्य को किसी तर्क से क्षम्य नहीं माना जा सकता था। परंतु रियायतें देने के आदी हम यदि यह मान कर इसे भी क्षमा कर दें तो भी क्या आज तक का उनका प्रत्येक कार्य इसकी पुष्टि नहीं करता?

प्रश्न नारों पर दांव लगाने का नहीं है, उन इरादों को पहचानने का है जो
मोदी को विफल सिद्ध करने के लिए रेल दुर्घटनाएं करा सकते हैं,
देशद्रोहियों से सांठगांठ कर सकते हैं और पुलवामा की लड़ी लगाने की योजना पर अमल करने वाले को अपना आत्मीय और सहयोगी मानने के कारण उसके प्रति सम्मान प्रकट कर सकते हैं, उनके हाथों में क्या यह देश सुरक्षित रह सकता है?

चुनाव पोपतंत्र और लोकतंत्र के बीच है।

पुलवामा हो गया और उसकी क्षतिपूर्ति भी हो गई, पर सबसे बड़ी सफलता उस क्रम में घटित होने वाली दो त्रासदियों को घटित होने से बचा लेना है।

आगे क्या हो सकता है, सूचना तंत्र चुनाव तक कितने मोर्चों पर अचूक रह
पाता है, यह आगे के कुछ महीनों में ही पता चलेगा, परन्तु ऊपर के दोनों
नारों और इनसे खुलने वाले दोनों विकल्प तो हमारे सामने हैं। चेतना ही न
रही चढ़ि चित्त सो चाहत मूढ़ चिताहू चढ़्यो रे।

Post – 2019-03-11

पाँव तो हैं जमीन पर लेकिन
आसमां की तलाश करते हैं

आस्तिकता का मोटा अर्थ भौतिकवाद है। जो है (अस्ति) उसका सम्मान करते हुए, उसके अनुरूप आचार, विचार रखना। इसी से हमारे अस्तित्व की भी रक्षा हो सकती है। इसके विपरीत आचरण जगत और प्रकृति, अर्थात् जो है, उसके लिए भी अनिष्टकारी है, और आपके अपने अस्तित्व के लिए भी अनिष्टकारी है।

परंतु यह व्याख्या और समझ ऐसे समाज में सर्वमान्य हो सकती थी जिसमें सभी लोग ईमानदार हों।

ईमानदारी का पैमाना यह है कि वे अपने निर्वाह के लिए आवश्यक उत्पादन करते हो, जो नितांत आदिम समाजों में ही संभव था जिसमें मनुष्य की आवश्यकता पेट भरने और प्रजनन करने से आगे नहीं जा सकती थी। बाद में ईमानदारी उपाय यह था कि आप कुछ ऐसा पैदा करें जिसकी दूसरों को जरूरत हो और वे उसके बदले आपकी जरूरत पूरी करने वाली चीज देते रहें।

यह है आदर्श अवस्था जिसमें कोई किसी का शोषण नहीं करता, कोई किसी का दास नहीं होता। आपसी निर्भरता के बाद भी कोई परजीवी नहीं होता। इसी में लोग भाषा से लेकर आचरण तक ईमानदार रह सकते हैं।

सच कहे तो सत्य और झूठ का अंतर यह है कि पहली स्थिति में कथनी और करनी में अंतर नहीं होता, दूसरी में करनी कथनी के अनुरूप नहीं होती। या तो उससे उलट होती है या उससे दाएं बाएं होती है और इसे मान्य बनाने के लिए परिभाषाएं बदल दी जाती है। जो सच था उसे गलत, जो गलत है उसे सच सिद्ध करने के तरीके निकाले जाते हैं।

मनुष्य ने भाषा का आविष्कार दोनों प्रयोजनों से किया। सचाई को उजागर करने के लिए, और सचाई पर पर्दा डालने के लिए। सच्चाई को उजागर करने के लिए जो औजार तैयार किया गया, धूर्तों ने उसी का प्रयोग बिना कुछ किए करनी का फल पाने के लिए किया।

ईमानदारी शाकाहारी प्राणियों का गुण है। धूर्तता शिकारियों का लक्षण है। ईमानदार अपनी जीविका अपने श्रम के बल पर चलाते हैं। धूर्त उनको ही खाने की युक्ति करते हैं।

आप शक्तिशाली माने जाने वाले शिकारी पशुओं पर ध्यान दें, उनके व्यवहार पर ध्यान दें तो पाएंगे कि वे अधिक शक्तिशाली होने के बाद भी कितने दुबक कर, छिप कर आगे बढ़ते हैं और फिर अपने शिकार पर प्रहार करते हैं। यदि शिकार उनकी तुलना में अधिक शक्तिशाली हुआ तो सीधा सामना नहीं करते, आगे बढ़ते पीछे हटते, उसे थकाने, भ्रमित करने के बाद उसके सबसे कमजोर या थके हुए सदस्य पर आक्रमण करते हैं।

क्या आप मानेंगे हमारे मानवतावादी आदर्श शाकाहार प्रेमी समाज होने के कारण शाकाहारी जीवों से लिए गए हैं और जिसे हम मिलिट्री साइंस कहते हैं, सैन्य विज्ञान कहते हैं, शिकारी जानवरों के दांव पेच से आया हुआ है?

मैं कुछ आगे बढ़ गया।

हमने ऊपर आस्तिकता की जो परिभाषा की वह शाकाहारी परिभाषा है। मनुष्य अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण न तो केवल शाकाहारी रह कर जीवित रह सकता था, न ही शिकार करना नख-दंत-विहीन प्राणी के अनुरूप था।

आदिम समाज में भी दोनों तरह के लोग थे – ।शाकाहारी भी और शिकार भी। भारतीय परिस्थितियों के कारण दोनों का मेल हो गया था। हमारे समाज में, हमारी मूल्य व्यवस्था में, हमारी विश्व दृष्टि में सत्यवादी, अहिंसावादी, शाकाहारी परंपरा के लिए स्थान था, परंतु अभाव के दिनों में शिकार के बिना काम चल नहीं सकता था। खेती का आरंभ होने के बाद तो खेती को नुकसान पहुंचाने वालों वाले जानवरों का शिकार किए बिना यूं भी काम नहीं चल सकता था।

मूल्य व्यवस्था के रूप में देखिए तो यह विचित्र स्थिति है कि भिन्न और परस्पर विरोधी विचार और आचार एक ही समाज में स्थान पाने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं।

हम जब हारे हैं, मारे गए हैं, तब भी दुनिया को बचाने का सूत्र बचाते हुए उपस्थित रहे हैं। जीतने वालों की हिंसा भी समाप्त तो नहीं हुई है, परंतु हिंसा के बल पर कुछ दिनों की चकाचौंध पैदा करने वाले इतिहास में अपनी करनी के अनुरूप छोटे या बड़े, हल्के या गहरे धब्बे बन कर ही दर्ज हैं।

आदत से बाज आता नहीं। भटक गया। कहना चाहता था कि जो कुछ दिखता है उसे स्वीकार करने वाले भौतिकवादी हैं, और उसे नकारते हुए अध्यात्म का आविष्कार करने वाले शिकारियों की परंपरा से जुड़े हुए है। विज्ञान शाकाहारी परंपरा की देन हे. पूँजीवाद जिसने उसको पाला पोसा शिकारियों की परंपरा से आता है। ज्ञान और विज्ञान पर आज भी धूर्तों का कब्जा है।

क्या मैं अपनी बात ठीक ठीक कह पाया? झिझकते हुए नहीं, अपना पक्ष पूरे विश्वास से रखते हुए हमें अपनी चूक समझने में मदद करें।

Post – 2019-03-10

नजर अपनी अपनी खयाल अपना अपना

जो मैं सोचता या कहता हूं उससे जब तक आप असहमत रहते हैं, तभी तक आप सुरक्षित हैं। असहमत होने का प्रयत्न करते हुए भी तार्किक आधार पर अन्य कोई सही कारण न पाने के बाद यदि आप मुझसे सहमत होने से कतराते हैं तो यह आपका सर्वनाश है। दोनों से बचते हुए मुझे पढ़ें।

मेरी सलाह है कि हाल की घटनाओं पर भावाकुल उद्गारों का दौर समाप्त होना चाहिए – चाहे वह छाती फुलाते हुए अपनी उपलब्धियों या अपने कारनामों का बखान हो, या छाती पीटते हुए चीत्कार हो कि हाय देश 50 साल पीछे चला गया, और यदि मोदी दुबारा आ गया और 50 साल पीछे चला जाएगा। इसलिए नहीं कि इनमें से कौन सा उद्गगार गलत या सही है।

इसलिए भी नहीं कि ऐसा सुनना मुझे बुरा लगता है। ईश्वर की कृपा से मैं इतना साधारण व्यक्ति हूं कि मुझे क्या अच्छा या बुरा लगता है इसके अनुसार किसी को अपनी सोच या समझ बदलने की जरूरत नहीं है।

ऐसा उन्हें इसलिए करना चाहिए कि भावावेश में दिमाग काम नहीं करता और बददिमागी में किए गए कामों का परिणाम कर्ता और भोक्ता दोनों के लिए अहितकर होता है। मेरी समझ से वे अपना नुकसान कर रहे हैं, और नुकसान हमें भी भोगना पड़ रहा है।

चुनाव के नजदीक पहुंचने पर लोगों को इस बात का ध्यान तो रखना ही चाहिए कि उनके कहे गए किस वाक्य का अधिकांश लोग क्या अर्थ लेते हैं और उनकी किस भंगिमा से अधिकांश लोगों के मन में कितना लगाव या विलगाव पैदा होता है। मेरी चिंता सत्ता किसके हाथ में आएगी या कौन उससे वंचित हो जाएगा, इसे लेकर नहीं है । मेरी चिंता मेरे अपने क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं। वह है बौद्धिक और सांस्कृतिक क्षेत्र। मैं इस बात से व्यथित अनुभव करता हूं कि पिछले पचास साल से दो अपवादों को छोड़कर प्रत्येक चुनाव के साथ भाषा का स्तर, संवेदना का स्तर, विचार का स्तर राजनीतिज्ञों के उत्साह के कारण निरंतर गिरता आया है। (ये दो अवसर अटट वाजपेयी की जीत और हार के आगे-पीछे उनके और उनके दल की मर्यादा से संबंध रखते हैं जिसे आप भगवा संस्कार कह सकते हैं।)

यदि यह ह्रास सत्ता तक सीमित रह जाता तो मैं खिन्न नहीं अनुभव करता, कारण पूरे इतिहास में सत्ता प्राप्ति के लिए जघन्यतम कृत्य किए गए हैं और सफल होने वालों को सम्मान दिया गया है।

मुझे कष्ट इस बात का है कि लोकतंत्र की महिमा के कारण, हथियारों का स्थान भाषा और प्रस्तुति की कला ने ले लिया है, और इसलिए सत्ता तक सीमित रहने वाले जघन्य का प्रवेश साहित्य, संस्कृति और मूल्य व्यवस्था में भी हो जाता है।

इस विनाशकारी भूमिका के बाद भी मैं सत्ता के लिए संघर्ष करने वालों को नसीहत देने की स्थिति में नहीं आ सकता था। समाज, संस्कृति, सभ्यता, आचार-व्यवहार, मूल्यप्रणाली पर उनके कृत्यों का क्या प्रभाव पड़ता है इसकी उन्होंने कभी चिंता नहीं की।

मैं उनके लिए चिंतित होने के कारण उनको केवल याद दिलाना चाहता हूं कि क्या तुम सही हथियारों का सही औजारों का , सही समय पर, सही ढंग से, और जितने समय के भीतर वे प्रभावशाली है उस सीमा को ध्यान में रखते हुए उनका प्रयोग कर रहे हो।

हमारी चिंता तो यह है कि अराजकता बुरे राजा के शासन से भी बुरी स्थिति होती है।

तानाशाही का डर दिखाने वालों को मैं यह याद दिलाना चाहता हूं कि तानाशाही के कई रूपों की हम उपासना करते हैं और यह भी कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में और उसके बाद भी गांधी और नेहरू सबसे बड़े तानाशाह थे। इंदिरा गांधी उनके सामने ठहरतीं ही नहीं। वे अपनी करने पर आ जाते थे तो किसी की नहीं सुनते थे और विरल अपवादों को छोड़ कर गांधी कभी गलत सिद्ध नहीं हुए, नेहरू कभी सही सिद्ध नहीं हुए, परंतु भारतीय समाज ने इन दोनों को जो सम्मान दिया है वह किसी अन्य को प्राप्त नहीं हुआ और संभव है कोई प्राप्त न कर सके।

मैं यहां यह याद दिलाना चाहता हूं तानाशाही की प्रवृत्ति मोदी में है। “मोदी है तो मुमकिन है” से बड़ा प्रमाण इसका क्या हो सकता है? परंतु क्या पिछले 5 सालों में जो कुछ मुमकिन हुआ है वह मोदी की इस जिद के कारण नहीं हुआ है कि हमें कुछ करके दिखाना है, हमें इस देश को कुछ बनाना है, हमें इसे आगे ले जाना है। हम रुके रह गए, पीछे चले गए, दूसरे देश आगे बढ़ गए, जबकि हमारे भीतर उनसे अधिक बौद्धिक आर्थिक और पारंपरिक संभावनाएं थीं। सड़ते, टूटते, बिखरते समाजों को लोकतंत्र की नहीं, तानाशाहों की जरूरत होती है। 2014 मे देश ने तानाशाह चुना था, आज इतर कारणों से वे ही परिस्थितियां पैदा हो गई हैं और इन्हें अपनी भूमिका का सही निर्वाह न करने वाले विपक्ष ने पैदा किया है।
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यह सच है कि जिस गति से जितने काम, जितनी कल्पनाशीलता से हुआ है वह मोदी के कारण ही संभव हुआ है, परंतु यह अशोभन है कि मोदी की उपस्थिति में ही यह कहा जाए और मोदी इसका बुरा न माने।

मैं उनसे यह नहीं कह रहा हूं कि ‘आप का व्यवहार आदर्श आचार के अनुकूल नहीं है’, मैं यह याद दिला रहा हूं, कि ‘इससे आपका नुकसान होता है।’यदि आप कहं कि मुझसे गलतियां हुई होंगी, मैंने अपनी क्षमता के अनुसार आप की सेवा की है, यदि आप मुझको इस योग्य समझते हैं कि मैं आपकी सेवा आगे भी कर सकूं तो आप मुझे चुन सकते हैं’ तो मोदी के पक्ष में इससे ऊंजी डंके की कोई चाट नहीं हो सकती थी। कारण उसने काम किया है और लोग इसे जानते हैं।

जब अपना कोई मुद्दा न होने के कारण राहुल गांधी चौकीदार चोर है कहते हैं तो उनको यह याद रखना चाहिए सुनने वाले कहीं यह तो नहीं सुन रहे हैं कि चोर चौकीदार को अपनी बिरादरी में शामिल करना चाहता है। प्रचार के सभी सुलभ साधनों का प्रयोग करते हुए यदि यही दोहराया जाए तो भी बोलने वाले जो भी बोले, सुनने वाले क्या सुनेंगे?

जिस मोर्चे पर हथियार काम आते हैं उनमें गलत हथियारों का चुनाव आत्मघाती हो सकता है, जिस मोर्चे पर जबान हथियार का काम करती है, उस पर सही अवसर पर सही शब्दों का चुनाव जो नहीं कर सकते वे विश्व पटल पर देश का सही प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं?

यह सिद्ध करने के लिए, जनता में यह विश्वास पैदा करने के लिए कि मैं अपने पद का दायित्व सही ढंग से निभा सकता हूं, सभी को अपने लाभ के लिए ही सही अपनी आचार संहिता स्वयं निर्धारित करनी चाहिए। लोकतंत्र में शासक का हित जनहित से अलग नहीं हो सकता।

Post – 2019-03-09

बुरा सब कुछ है,अच्छा आज तक माना नहीं मैंने।
बुरे हैं उनको अपना आज तक माना नहीं मैंने।
भले हैं आप इतने हर बुराई से परे भी हैं
वही हैं आप? जाना जिसको, पहचाना नहीं मैने।।

Post – 2019-03-08

#इतिहास_दोबारा_लिखो
प्रवाह की दिशा (1)

एक ही बात को लगातार दुहराते हुए निराधार कल्पना को भी इतना विश्वसनीय बनाया जा सकता है कि उसके विरुद्ध सभी तरह के तर्क और प्रमाण व्यर्थ हो जाएं। धर्म, धर्मग्रन्थ, स्वर्ग. नरक आदि संबंधी विश्वास इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। दंड और पुरस्कार, प्रलोभन और उपेक्षा, शिक्षा पर एकाधिकार आदि के माध्यम से गलत बातों को भी लगातार जारी रखकर सर्वमान्य सत्य के रूप में प्रतिष्ठित किया जा सकता है।

यूरोपीय विद्वानों ने अलग-अलग स्वरों मे पश्चिमी श्रेष्ठता को स्थापित करने और शेष जगत में हीन भावना उत्पन्न करने के लिए इन्हीं युक्तियों का सहारा लिया, और हमारी जहन में यह उतारते रहे कि समस्त ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत पश्चिम था, जब कि एशिया के संपर्क में आने वाले ग्रीस और इटली को छोड़कर इनमें से अधिकांश ईसा के बाद की शताब्दियों में भी सभ्य नहीं हो पाए थे, यह हम पीछे देख आए हैं।

यहां केवल यह याद दिलाना चाहते हैं कि सारी जानकारी के बावजूद दूसरे देशों के शिक्षित लोग भी उनके द्वारा गढ़ी गई कहानियों के इस हद तक शिकार रहे हैं कि वे आज भी मानते हैं कि भाषा संस्कृति सभ्यता सभी का प्रवाह पश्चिम से पूरब की दिशा में होता रहा है।

एक स्वतंत्र देश को राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद आर्थिक स्वतंत्रता और मानसिक स्वतंत्रता का युद्ध लड़ना होता है, क्योंकि दोनों पर उसे गुलाम बनाने वाले अधिकार कर चुके रहते हैं। जो समाज यह युद्ध नहीं लड़ पाते वे दिखावटी स्वतंत्र होते हैं। यह ज्ञान नया नहीं है, पुराना है, और उसको न जानने के कारण हम यह भी नहीं जान पाते कि हम स्वतंत्रता का झंडा लहराते हुए भी किनके हाथ के खिलौने बने हुए हैं। यह बुद्धिजीवियों की अपनी अकर्मण्यता का परिणाम है। पुरानी उपमा है – अपने विषय का यथेष्ट ज्ञान न रखने वाला विद्वान दूसरों के हाथ का वैसा ही खिलौना है जैसे लकड़ी का हाथी और चमड़े का मृग- जो मामूली शब्दभेद से मनुस्मृति, महाभारत और पद्मपुराण में दोहराया गया है, जिसका अर्थ है यह हमारी सामाजिक चेतना का अंग बन चुका था:
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृग: । यश्च विप्रोSनधियान स्त्रयते नाम बिभ्रति । । – मनु २ /१५७.
यथा दारुमयो हस्तीयथा चर्ममयो मृग: । ब्राह्मणश्चानधियानस्त्रयते नाम बिभ्रति । । महा. शांति ३६/४७
यथा दारुमयो हस्ती मृगश्चित्रमयो यथा विद्याहीनो द्विजो विप्र त्रयस्ते नामधारकाः।।। पद्म पुराण 4.16.१०

जिस समय अंग्रेजों ने कांग्रेस को सत्ता सौंपी थी, आधारभूत संरचना के मामले में भारत चीन से बहुत आगे था। आज चीन नागरिक स्वतंत्रता को छोड़कर हमसे दूसरी सभी दृष्टियों से बहुत आगे है। मुझे लगता है, इसका सबसे प्रधान कारण यह है कि पश्चिमी दरिन्दगी का खिलौना बन चुके चीन ने आत्म निरीक्षण से उस विश्वास को अर्जित किया जिससे वह खिलौने से खिलाड़ी बनने की भूमिका में आ गया। इस आत्म निरीक्षण का ही दूसरा नाम है अपने इतिहास का गहन अध्ययन और अतीत की राख में से जीवंत चिनगारियों को सजोना और ज्वाला को उर्जा में बदलना। संचित ऊर्जा से नई ऊंचाइयों पर पहुंचने की कोशिश करना। आपने फीनिक्स की कथा तो पढ़ी होगी, जरूरी नहीं कि उसका अर्थ भी समझा हों। क्योंकि उसके लिए आपको अग्नि पर लिखी गई ऋचाओंं के काव्य सौंदर्य को समझने की जरूरत होगी, जिन्हें आप ब्राह्मणवाद के प्रभाव में कर्मकांड से जोड़कर पढ़ते और अपना सिर धुनते रहे हैं और इसका लाभ उठाकर पश्चिमी विद्वानों ने भी आपको उसी घेरे में बंद करके तीन-तेरह करने की छूट तो दी पर सोचने का अवकाश न दिया। इन ऋचाओं को और उस बौद्धिक पर्यावरण को नए सिरे से समझें:
अवसृजन्नुप त्मना देवान् यक्षि वनस्पते ।
अग्निर्हव्या सुषूदति देवो देवेषु मेधिरः ।। 1.142.11
मातेव यद् भरसे पप्रथानो जनंजनं धायसे चक्षसे च ।
वयोवयो जरसे यद्दधानः परि त्मना विषुरूपो जिगासि ।। 5.15.4
गुहा सतीरुप त्मना प्र यच्च्छोचन्त धीतयः ।
कण्वा ऋतस्य धारया ।। 8.6.8

हमें अपने प्राचीन साहित्य का जो ज्ञान कराया गया है, वह एक तरह का विष-प्रचार है। अर्थात् विष तो वर्णवादी सोच में था, जो आज भी बना हुआ है। इसका लाभ पाश्चात्य विद्वानों ने उठाया और सोच समझ कर उठाया, और हमारे ही हथियारों से हमें परास्त किया और अपनी आंतरिक दुर्बलता के कारण हम उनका प्रतिवाद भी नहीं कर सके। भारतीय सिपाहियों की मदद से अंग्रेजों ने भारत को जीता था, भारतीय चिंताधारा में आई विकृतियों के कारण उनका उपयोग करते हुए पाश्चात्य विद्वानों ने हमारे ऊपर सांस्कृतिक विजय प्राप्त की थी।

यदि आप मेरे मंतव्य से सहमत नहीं है तो भी दुबारा सोचे कि क्या आज भी वर्णवाद से हम मुक्ति पा सके हैं और क्या हम यूरोप और गोरों को जिन बातों के लिए दोष देते हैं उनको स्वयं जिलाने का प्रयत्न नहीं करते? क्या आज भी वे आपकी ही कमजोरियों लाभ उठाकर आप को तोड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं या नहीं? यदि हां, तो ब्राह्मणों को जो भारतीय समाज का मस्तिष्क होने का दावा करते हैं, उनके साथ, उनके आंदोलन में सहयोग करना होगा, जोे आत्म सम्मान और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

यूरोपीय विद्वानों का पूर्वी देशों का अध्ययन उनको समझने के लिए नहीं था, उनको तोड़कर मलबे में बदलकर, स्वयं अपनी हीनता ग्रंथि से ऊपर उठाने के लिए था, जिस पर सभी यूरोपीय विद्वान सहमत रहे हैं, सहमत हैं, और सहमत रहेंगे। उनके दुराग्रह को दूर करने के लिए, अपनी अस्मिता को स्थापित करने के लिए, उन देशों को, उन संस्कृतियों को, इंच इंच पर संग्राम करना होगा जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी मानसिक और आर्थिक दासता से मुक्त नहीं हो सके , न ही जिनमें इसकी इच्छा शक्ति बची रह गई है।

चीन ने इसे संभव किया, और चाइनाज प्रेसिडेंट आमादेर प्रेसिडेंट वाले युग में इन वाक्यों को सुनते हुए, अपमानित अनुभव करते हुए भी यदि यह बोध होता कि चीन ने क्या किया है जो भारत न कर सका, और यदि इस नारे को चाइनाज सरणी(पथ) आमादेर सरणी के रूप में ढाला गया होता तो मैं निश्चित नक्सलवादी हो चुका रहा होता, जिसका में एक दासता से उबरने के बाद दूसरी दासता में जाने के कारण विरोध करता था और बाद में भी करता रहा जबकि समाज को बदलने की उत्कट आकांक्षा के कारण नक्सलवादी अपनी उत्सर्ग भावना के कारण मेरे लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहे।

चीन में साम्यवाद की स्थापना की ही कोशिश नहीं हुई, साम्यवादी चीन ने एक और अपनी सामंतवादी व्यवस्था से बाहर निकलने का दुर्धर्ष प्रयत्न किया, तो दूसरी ओर साम्यवाद की चकाचौंध में सोवियत दादागिरी को भी चुनौती दी और यूरोपीय वर्चस्ववाद को भी न करते हुए अपने अतीत का संबल लेकर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि हम सभ्यता के जनक हैं। तुमने हमारी नकल करते हुए अपने को आगे बढ़ाया है और तुम्हारी कृतघ्नता यह है कि तुम हमारा ऋण तक स्वीकार नहीं करते।

यदि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी कम्युनिस्ट थी हमारे देश की कम्युनिस्ट पार्टी क्या कम्युनलिस्ट नहीं थी जिसने को मुसलमानों को खुश करने के लिए उस दौर की उपलब्धियों को जलाकर राख करने का इरादा किया और इसी पर अमल करते रहे। जहां से प्रेरणा प्राप्त करनी थी, वहां से शर्म, केवल शर्म, जुटाने का प्रयत्न किया। मैं यह नहीं मानता किसी समुदाय को उसकी गलतियों के बावजूद अपराधी सिद्ध किया जाना चाहिए, परंतु मैं यह नहीं मानता जो अपने अतीत के अपराधों को अपने गौरव का विषय मानते हैं उनको प्रसन्न करने के लिए अपने इतिहास और अपनी प्रेरणा के स्रोतों को नष्ट कर दिया जाए।
गलाजत की हदें हैं जिनकी अपनी भी हदें होंगी
कहां पर आप कायम हैं कहां की बात करते है?
हमें कुछ और कहना था, मगर कुछ और कह बैठे
बहक जाते हैं तब भी आप की ही बात करते हैं

Post – 2019-03-08

आप को हम प्यार करते हैं मगर इतना नहींं
दम लगाएं आप, हम केवल चिलम भरते रहें।
आप के जो जी में आए, वह करें, या वह कहें
उसको दुहराते हुए जो कुछ कहा करते रहें।।

Post – 2019-03-07

मैं नहीं कहता हमें बर्बाद होना चाहिए
फिर भी इन बर्बादियों को भी ठिकाना चाहिए।
सिर्फ इतनी इल्तिजा है जो किसी के भी नहीं
अपने घर को उनके ही माफिक बनाना चाहिए।
देश इतना है बड़ा हमको जगह की क्या कमी
सौंप कर घर, घोंसला अपना सजाना चाहिए।
आप ने इसका मजा यदि आज तक जाना नहीं
फिर तो इसका स्वाद पंडित को बताना चाहिए।

Post – 2019-03-07

अगर इसका सियासी कोई मतलब हो खुदा हाफिज।
खुदा के हो रहेंगे और उसके बाद क्या होगा।।

Post – 2019-03-07

हंसो उस नाजनी पर जिसको हँसना तक नहीं आता।
हुनर यह आ गया तो सोचिए दुनिया का क्या होगा।