Post – 2017-07-29

भारतीय मार्क्सवादी

बात आज से पैंतीस साल पहले की है। वी.एस. पाठक उन दिनों गोरखपुर विश्वविद्यलय में प्राचीन इतिहास और पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष थे। हड़प्पा सभ्यता और ऋग्वेद के लेखन से पहले मेरी जो समझ थी उससे उनको अवगत कराते हुए यह चाहता था कि वह किसी शोधार्थी से अनुसंधान करायें। मैं अपनी पूरी सामग्री और सहयोग उसे देने को तैयार था। उन दिनों मेरी नजर में वहां रीडर के पद पर कार्यरत सच्चिदानन्द श्रीवास्तव थे जो श्रमण संस्कृति पर पाठक जी के निर्देशन में काम कर रहे थे, पर विषय संभल न रहा था। मेरी आरंभ से यह इच्छा थी कि जिन विषयों पर मेरी भिन्न राय है उसके अनुसार उस क्षेत्र में काम करने वाले शोध करें तो वह आधिकारिक भी माना जाएगा और वह लक्ष्य भी पूरा होगा जिसे पूरा करने की सनक मेरी जिन्दगी का दूसरा नाम है। मुझे हर बार यह लगता रहा कि यह काम जिस स्तर का और जिस जिस सलीके से होना चाहिए, वैसा मुझसे सरकारी काम काज की व्यस्तताओं, पुस्तकों, परामर्शदाताओं और किसी विशेषज्ञ के निर्देशन के अभाव के कारण हो न पायेगा। काम कोई करे, श्रेय किसी को मिले, इसकी मुझे, चिन्ता नहीं थी। इसका होना जरूरी है, यह एकमात्र बेचैनी थी।

मुझे समझने में लोग अक्सर कई तरह की गलतियां करते हैं, परन्तु मैं अन्य किसी प्रलोभन की बात तो दूर यशलिप्सा से भी, जो महान पुरुषों की भी दुर्बलता मानी जाती रही है, लगभग विरक्त रहा हूँ। एक बार यह समझ लेने के बाद कि हमारे समाज और इसके इतिहास को जानबूझ कर विकृत किया गया है, मैंने जो संकल्प लिया कि इसको उजागर करके ही रहूँगा, मै इसके लिए अप्रमाद कार्यरत रहा हूं, इसे पूरा करने का सपना मेरे लिए एकमात्र प्रेरणा का स्रोत रहा है।

मार्क्सवाद भी मुझे इसीलिए आकर्षक लगता रहा कि, मेरी अपनी समझ से, यह अन्याय, झूठ और पाखंड को निर्मूल करने का दर्शन है। यदि यह समझ गलत है तो मैं कहूँगा, कभी कभी गलत समझ सही समझ से`अधिक उपयोगी होती है, और ऐसी गलत समझ के बल पर सही मानी जाने वाली समझ की भी धज्जियां उड़ाई जा सकती हैं।

पाठक जी का वैदिक साहि।त्य में दखल है, यह जानने के बाद ही मैं उनसे मिलने गया था, परन्तु इस चर्चा में न वह पूरी तरह मेरी बात समझ पा रहे थे न मैं उनके श्रमण संस्कृति के माध्यम से पश्चिम से सम्पर्क की कल्पना कर पा पा रहा था भाषा और साहित्य सम्बन्धी मेरी जानकारी से वह उत्साहित अवश्य हुए थे जिससे हम देर तक बातचीत करते रहे।

उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि जब विश्वविद्यालयों तक में गहन अध्ययन और शोध की प्रवृत्ति बहुत घट गई है, लोग नियुक्ति या पदोन्नति के लिए अनिच्छापूर्वक शोधकार्य करते हैं, यह आदमी, जिसको अपने शोधकार्य का कोई लाभ नहीं मिलना, वह अध्यापन के पेशे से दूर रहते हुए भी कैसे कर सकता है? इतने कठिन साहित्य और विषय पर शोध क्यों करता रहा? फिर वैदिक जिससे संस्कृतज्ञ भी घबराते हैं उसमें इसकी कैसे रुचि हो सकती है? आश्चर्य उन्हें मेरी स्थापना से तो होनी ही थी कि ऋग्वेद हड़प्पा सभ्यता का साहित्य है और हड़प्पा सभ्यता के उपादान वैदिक जनो के भौतिक जीवन के अवशेष हैं। यदि उसने दशकों का समय लगा कर इतनी लगन से यह शोधकार्य किया भी तो वह अपनी सारी जमा पूंजी दूसरों को सौंपने को क्यों उतारू है? उसी चर्चा में अध्ययनविधि का हवाला आया और मैंने जब बताया कि मैं मार्क्सवादी हूँ तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने कहा, ‘मार्क्सवादी इतिहासकार तो ऐसा मानते हैं, फिर आप मार्क्सवादी कैसे हो सकते हैं?’ तो जो मैंने उत्तर दिया उसका भाव यह था कि जो वैसा मानता है वह मार्क्सवादी हो ही नहीं सकता। वह भाववादी है, वह नस्लवादी है, उसकी सोच उपनिवेशवादी है।

यह अगला आश्चर्य है कि मेरे मार्क्सवादी कहे और माने जाने वाले मित्र अपने तई मुझे कच्चा मार्क्सवादी और कुछ दूर तक दक्षिणपंथी रुझान का मानते रहे और इसे लेकर मेरे मन में उनसे कोई मलाल न था, जब कि मैं उनकी मार्क्सवाद की समझ को गलत मानता रहा जिसे वे कभी स्वीकार कर ही नहीं सकते।

मार्क्सवाद की उनकी एक कसौटी तो यही थी कि यदि मैं मार्क्सवादी हूँ तो मेरी मित्रता ऐसे लोगों से कैसे हो सकती है जो घोषित रूप से दक्षिणपंथी हैं और एक दो तो संघ से भी जुड़े हैं जिसके प्रति उपहास और तिरस्कार के अतिरिक्त दूसरा कोई भाव उनके मन में है ही नहीं । इसे मैं अस्पृश्यता का सबसे गर्हित रूप मानता हूँ जिसमें सामाजिक अस्पृश्यता को वैचारिक और सांस्कृतिक अस्पृश्यता तक पहुंचा दिया गया है। यह मार्क्सवादविरोधी तरीका है । इसे मैं कम्युनिस्टों में मुस्लिम लीग की मानसिकता के आभ्यंतरीकरण का परिणाम मानता हूँ। इसके अतिरिक्त, घृणा नाज़ियों का हथियार रहा है। मार्क्सवादी पिछड़ी चेतना को वैज्ञानिक सोच में बदलने का काम करता है, न की नफरत बांटने का। यह नफरत कैसे , संक्रमित हुई और केवल हिन्दू समाज के लिए हुई इसकी जो पड़ताल नहीं कर सकता वह मेरी समझ में मार्क्सवादी नही हो सकता।

Post – 2017-07-28

अहा! जिंदगी

मैं इस पत्रिका पर काफी पहले ही बात करना चाहता था । जो चाहता हूँ वह अक्सर नहीं हो पाता, जो कहना चाहता हूँ अक्सर उससे अलग और कभी तो उससे उलट कह जाता हूँ। इसपर लज्जित नहीं अनुभव करता। जिन लोगों को अपनी वाणी पर इतना अधिकार होता है कि वे जो कहना या लिखना जानते हैं उसे कह और लिख लेते हैं, और जो कहा उससे संतुष्ट हो लेते हैं, उनके पास अपना कोई विचार होता ही नहीं। वे किसी सिस्टम के डिलीवरी बॉय होते हैं। उत्पादक नहीं वितरक।

विचारक वह लाचार प्राणी होता है जो अपनी विवशता के बाद भी स्वयं अपने चिन्तन या सृजन के क्रम में अपने को जानता, अपनी महिमा के सामने एक तुच्छ प्राणी की तरह करबद्ध हो जाता है, और प्रश्न करता है यह जो हुआ वह मेरे किए हुआ या तुमने किया ओ विराट! इसी विस्मय का उत्तर ढूढ़ते सर्जना की देवी सरस्वती की उद्भावना की गई थी और अन्यथा भी रचनाकार अपने को माध्यम और किसी अदृश्य सत्ता को सर्जक मानते रहे है : कविता करने और कविता के अपने माध्यम से सृजित होने या कविता के कारण कवि बनने – लोग हैं लागि काबित्त बनावत मोहें तो मेरे काबित्त बनावत!

परन्तु मुझे अपनी अकिंचनता पर अवश्य लज्जित अनुभव करना पड़ता है ! कुछ मित्रों को यह भ्रम है कि कुछ विषयों की मेरी जानकारी खासी अच्छी है। वे यदा कदा अनुरोध करते हैं कि मुझे अमुक विषय पर लिखना चाहिए। कई बार प्रकाशकों को भी यह भ्रम हुआ। उन्होंने मुझे अपनी ओर से तय किए गए विषय पर लिखने को इस तरह घेरा कि अपनी असमर्थता का रोना रोने के बाद भी बच कर निकल न सका। महाभिषग, उपनिषदों की कहानियां, पंचतंत्र की कहानियां इसी का परिणाम हैं।

परन्तु यदि कोई समझे, या मैं यह दावा करूं या मेरे किसी कथन से यह भ्रम पैदा हो कि मेरा उपनिषदों का, पंचतन्त्र का, वेदों, वेदांगों का ज्ञान आधिकारिक है तो यह एक छलावा होगा। मैं यह स्पष्टीकरण इसलिए कर रहा हूँ कि मेरे किसी कथन या निष्कर्ष को जांचते हुए पढ़ा जाय. जांचने के बाद मानने पर वह मेरा विचार न रहकर आपका विचार हो जाता है और खोटा पाए जाने पर वह धुल कर मिट जाता है.

अतः किसी भी पाठक के देा काम होते हैं एक तो सूचना या ज्ञान के स्रोत से अपने ज्ञान का विस्तार और दूसरा अपने पहले के ज्ञान से उसका मिलान करते हुए यह देखना कि पहले का ज्ञान कितना सही या गलत था और इस नए स्रोत से उपलब्ध ज्ञान कितना प्रामाणिक है। यह निश्चय करने का एक ही तरीका है कि हम यह जांचते चलें कि किसी भी स्रोत में कितनी अविकलता या अन्तःसंगति या अन्तर्विरोध है और उसी सूचना का उपयोग करने वाले दूसरे क्षेत्रों से उसकी संगति है या विसगति। उन विविध क्षेत्रों में किसी स्थापना के लिए कोई निर्णायक प्रमाण है या नही.

इन बातों की और ध्यान दिलाना आज इसलिए जरूरी हो गया है कि आज, विशेषतः इस संचार माध्यम से अन्यथा सुधी और सतर्क माने जाने वाले भी ऎसी जुमलेबाजी करने लगे हैं जिससे उनकी अधोगति पर खेद होता है. हम गहरे सांस्कृतिक संकट से गुजर रहे हैं! इसमें सभी तरह के स्खलनों से भाषा, विचार, संचार और संस्कृति को बचाना अपने मोर्चे पर खड़े होकर युद्ध करने का पर्याय बन गया है. विचार करना होगा कि क्या सूचना, ज्ञान और चिंतन को एक परिवर्तनकारी अभियान में बदला जा सकता है.

मैं लम्बे समय से अपने लेखन के माध्यम से और अन्यथा भी इस बात को दुहराता रहा हूँ कि बुद्धिजीवी का काम शिक्षक का है, चिकित्सक का है. इसे मेरी निजी सूझ भी नहीं माना जा सकता. समाचार, विचार, और मनोरंजन से जुड़े माध्यम अपराधीकरण और बाजारीकरण से पहले यह काम करते रहे है. हम उस अतीत को जानते हैं और जानते हुए भूल गए हैं. सचेत रूप में उस भूमिका की अवज्ञा करते हैं और यह मानसिकता अधिक डराने वाली है.

मैंने अपनी अल्पज्ञता और अग्यता का स्मरण इसलिए दिलाया कि मुझे ‘अहा! जिन्दगी’ के बारे में पता ही न था. हो सकता है आप में से भी बहुतों को पता न हो जब कि यह पत्रिका दो प्रारूपों में दस साल से निकल रही है और यह अपने वैभव काल के धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवनीत, कादंबरी आदि पत्रिकाओं से आगे ही नहीं है मेरी उस कल्पना को काफी पहले से, कम से कम, आलोक श्रीवास्तव के सम्पादन के बाद से तो निश्चय ही निभाती आ रही है. हाल के दिनों में अनेक संपादकों ने इस गंभीर दायित्व को समझा है. परन्तु उन सभी में यह सबसे पठनीय ही नहीं सबसे सर्जनात्मक पत्रिका है और मै कौसानी न जाता तो आज भी मुझे इसका पता न चलता. मैं इसकी विस्तार से समीक्षा करना चाहता था यह बताते हुए कि इसकी विशेषता क्या है परन्तु जिस आदमी ने कोई काम पूरा किया ही नहीं उसका रिकार्ड ख़राब होने से बच जाय यह भी क्या कम है. आप पढ़ते हैं तो जानते होंगे, नही पढ़ा तो पढ़ कर बताएं कि मैंने कही अतिरंजना से तो काम नही लिया?

इसकी अनेक विशेषताओं मे से एक है मुझे अज्ञात नए लेखकों द्वारा खासा प्रभावकारी लेखन जो यह आशा जगाता है कि आप में से बहुत से लोग यदि संयत भाषा में निषपक्ष , निडर और समर्पित भाव से अपनी जानकारी के विषय पर टिप्पणियां करें तो अच्छा लिख सकतें हैं और संवाद का स्तर और इस मंच की सार्थकता को चार नहीं तो भी एक दो चांद तो लग ही सकते हैं।

Post – 2017-07-27

एक और पूर्वकथन

आज से तीन हफ्ते पहले मैं ऐसे दो मित्रों के साथ जो राजनीतिक सक्रियता के पक्षधर हैं, अपने घर पर ही शाम बिता रहा था. चर्चा में नीतीश कुमार का वह असमंजस था जिससे राह चलता आदमी भी यह अनुमान लगा रहा था कि नीतीश का भाजपा से गठजोड़ होकर रहेगा. प्रश्न यह था कि यदि नीतीश ने ऐसा किया तो उनकी छवि सुधरेगी या ख़राब होगी. मेरे दोनों मित्रों का विचार था छवि ख़राब होगी. मेरा विचार उससे उलटा था. पर ऐसे मामलों में मेरे दोस्त मुझे अनाडी समझते हैं और दबे सुर से मेरे उस दावे में सचाई तलाशने लगते हैं जो मैंने मोदी का वकील बनने के सन्दर्भ में किया था। जो भी हो, नीतीश मुख्य मंत्री बन जायेंगे इस पर न तब संदेह था न अब होना चाहिए। सवाल ही नहीं । पर अधिकाँश लोग यह मान रहे हैं कि बार बार दल और सिद्धांत बदलने के कारण नीतीश की छवि को धक्का लगेगा और इसका राजनीतिक खमियाजा उन्हें अगले चुनाव में झेलना होगा। इसी सन्दर्भ में मैं अपना आकलन प्रस्तुत करना चाहता हूँ.
१. नीतीश बाहुबल, भ्रष्टाचार और धनबल के विरुद्ध स्वच्छ प्रशासन के आश्वासन के बल पर उन हथकंडों का इस्तेमाल करने वालों के विरुद्ध जीते थे। वही उनकी पूंजी है न कि किसी दल का समर्थन या कोई दूसरा सिद्धांत।
२, पीएम की उनकी महत्वाकांक्षा ने उनको भाजपा से नाता तोड़ने और जुमलेबाजी करने को मजबूर किया, पर जनता का किसी विचारधारा से लगाव नही होता, नेता के व्यक्तिगत चरित्र के उस पक्ष से लगाव होता है जो उसे स्वच्छ प्रशासन दे सके और मनमानी न करे। वह जानती है कि नेताओं को मुहावरेबाजी आती है पर वे नैतिकता के आधार पर नहीं व्यावहारिकता के आधार पर फैसले लेते है।
३ बिहार की जनता की नजर में नीतीश कुमार, प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी से अधिक उपयुक्त थे इसलिए उनका पाला बदलना जनता को भी सही लगा।
४. चुनाव आने तक परिस्थितियां इतनी बदलीं कि नीतीश प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तक न बन सके। इससे उनकी छवि को मामूली क्षति हुई।
५, यदि नीतीश ने स्वच्छ और बेदाग़ छवि के मामले में मोदी को अपने से ऊपर मान कर घबराहट में भ्रष्ट लोगों और दलों के साथ गठबंधन का रास्ता न अपनाया होता तो बिहार के भाजपा के शीर्ष सुशील मोदी पर वह इतने भारी थे कि उन्हें भाजपा से कोई खतरा ही न था। सुशासन बाबू के रूप में उन्हें इतना भारी जन समर्थन मिलता कि वह अपने दम पर भारी बहुमत से जीतते।
६, लालू के साथ गठबंधन करके उन्होंने अपनी छवि को नष्ट कर दिया इसलिए उसका उन्हें लाभ न मिला, मिला सिद्धान्तहीन और धनबली और बाहुबली दलों को जिससे लालू को उनसे अधिक अग्रता मिल गई। इससे आगे की कहानी हम जानते है।
७. लालू और कांग्रस से नाता तोड़ने का नीतीश को लाभ मिलेगा। वह भाजपा में नही अपनी पुरानी छवि में वापस लौट रहे हैं जिस के कारण वह भारत के तत्समय, कम से कम बिहारियों के मन में, भावी प्रधानमंत्री के उपयुक्त थे।
२. यदि नीतीश ने अपने मुख्य मुन्त्रित्व पर संकट पैदा किये जाने पर ऐसा किया होता तो इसका लाभ उन्हें न मिलता, उनकी छवि धूमिल होती, निर्णय नैतिक सवाल पर उठाया है इस लिए बिहार को अपना खोया हुआ नीतीश मिल गया. उनकी छवि सुधरेगी।

आप क्या सोचते हैं?

गाली गलौज करने से अच्छा है अपना पक्ष रखते हुए एक ऐसे खेल में शामिल हों जिससे सभी का लाभ होगा । हाँ, हम अपनी आलोचना और खंडन खेलभाव से लें। एक दूसरे को समझें और जो हमारे माध्यम से वस्तु स्थिति को समझते रहे हैं उनका हमारे प्रति खोया हुआ विश्वास लौटे।

Post – 2017-07-27

भारतीय मार्क्सवादी

बात आज से तीस एक साल पहले की है। वी.एस. पाठक उन दिनों गोरखपुर विश्वविद्यलय में प्राचीन इतिहास और पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष थे। हड़प्पा सभ्यता और ऋग्वेद के लेखन से पहले इस विषय में मेरी जो समझ थी उससे उनको अवगत कराते हुए यह चाहता था कि किसी शोधार्थी से अनुसंधान करायें। मैं अपनी पूरी सामग्री और सहयोग उसे दे ने को तैयार था। उन दिनों मेरी नजर में वहां रीडर के पद पर कार्यरत सच्चिदानन्द श्रीवास्तव थे जो श्रमण संस्कृति पर पाठक जी के निर्देशन में काम कर रहे थे, पर विषय संभल न रहा था। मेरी आरंभ से यह इच्छा थी कि जिन विषयों पर मेरी भिन्न राय है उसके अनुसार उस क्षेत्र में काम करने वाले शोध करें तो वह आधिकारिक भी माना जाएगा और वह लक्ष्य भी पूरा होगा। मुझे हर बार यह लगता रहा कि कम जिस स्तर का और जिस प्रविधिगत अखोटता से होना चाहिए, मुझसे हो न पायेगा । मुझे समझने में लोग अक्सर कई तरह की गलतियां करते हैं, परन्तु मैं अन्य किसी प्रलोभन की बात तो दूर यशलिप्सा से भी, जो महान पुरुषों की भी दुर्बलता मानी जाती रही है, झेंपता रहा हूँ । परन्तु एक बार यह समझ लेने के बाद कि हमारे समाज और इसके इतिहास को जानबूझ कर विकृत किया गया है, मैंने जो संकल्प लिया कि इसको उजागर करके ही रहूँगा, मै इसके लिए अप्रमाद कार्यरत रहा हूं। मार्क्सवाद भी मुझे इसीलिए आकर्षक लगता रहा कि यह, मेरी अपनी समझ से, अन्याय, झूठ और पाखंड को निर्मूल करने का दर्शन है।

पाठक जी का वैदिक साहित्य में दखल है, यह जानने के बाद ही मैं उनसे मिला था, परन्तु इस चर्चा में न वह पूरी तरह मेरी बात समझ पा रहे थे न मैं उनके श्रमण संस्कृति के माध्यम से पश्चिम से सम्पर्क को परन्तु भाषा और साहित्य सम्बन्धी मेरी जानकारी से वह बहुत प्रभावित थे। उन्क्की समझ में यह नहीं आरहा था कि जब विश्वविद्यालयों तक में गहन अध्ययन और शोध की प्रवृत्ति बहुत घाट गई है तो मैं जिसको अपने शोध और काम का कोई लाभ नहीं मिलना वह इतने कठिन साहित्य और विषय पर शोध क्यों करता रहा? यदि किया भी तो वह अपनी सारी जमा पूंजी दूसरों को सौंपने को क्यों उतारू है? आश्चर्य उन्हें मेरी स्थापना से तो होनी ही थी कि ऋग्वेद हड़प्पा सभ्यता का साहित्य है और हड़प्पा सभ्यता के उपादान वैदिक जनो के भौतिक जीवन के अवशेष हैं। उसी चर्चा में अध्यन विधि का हवाला आया तो मैंने जब बताया कि मैं मार्क्सवादी हूँ तो उन्हें दुहरा आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा मार्क्सवादी इतिहासकार तो ऐसा मानते हैं, फिर आप मार्क्सवादी कैसे हो सकते हैं? तो उत्तर मैंने दिया उसका भाव यह था कि जो वैसा मानता है वह मार्क्सवादी हो ही नहीं सकता। वह भाववादी है, वह नस्लवादी है, उसकी सोच उपनिवेशवादी है।

यह अगला आश्चर्य है कि मेरे मार्क्सवादी कहे और माने जाने वाले मित्र अपने तई मुझे कच्चा मार्क्सवादी और कुछ दूर तक दक्षिणपंथी रुझान का मानते रहे और इसे लेकर मेरे मन में उनसे कोई मलाल न था, जब कि मैं उनकी मार्क्सवाद की समझ को गलत मानता रहा । उनकी एक कसौटी तो यही थी कि यदि मैं मार्क्सवादी हूँ तो मेरी मित्रता ऐसे लोगों से कैसे हो सकती है जो घोषित रूप से दक्षिणपंथी हैं और एक दो तो संघ से भी जुड़े हैं जिसके प्रति उपहास और तिरस्कार के अतिरिक्त दूसरा कोई भाव उनके मन में है ही नहीं.\

यह हमारी सांस्कृतिक परंपरा के कारण हो या हमारी उपनिवेशवादी जहनियत के कारण हो अथवा भारतीय सामाजिक यथार्थ के कारण होए या इन सभी के मिलेजुले प्रभाव के कारण होए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों की समझ मार्क्सवाद से और दूसरे देशां की कम्युनिस्ट पार्टियों से बहुत हट कर ही नहींए अपितु उनसे उलट रही है। हमने मार्क्स के विचारों और कथनों को भी विकृत करके अपने अनुरूप ढाल लिया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है और उस दुर्भाग्य को कम्युनिस्ट पार्टियां और संगठन ही नहीं भोग रहेए पूरा देश भुगत रहा है। इसे लक्ष्य दूसरे भी करते होंगेए परन्तु इसके प्रति विद्रोह करने वालों में मैं अपने को अकेला पाता हूं और इस कसौटी पर परखें तो या तो दूसरे सभी धड़ों और दलों के मार्क्सवादी मार्क्सवादी हैं ही नहीं या जिस सीमा तक अपने को उनके अनुसार ढाला है केव्ल उस सीमा तक मार्क्सवादी हैं अन्यथा वे स्वयं मार्क्सवाद के नाम पर कंटक हैं और मैं अकेला मार्क्सवादी और उन सभी का विरोधी हूं और इसलिए यदि मार्क्सवादी होने का दावा करता हूं तो उनकी दृष्टि में कंटक हूं और मुझे मिटानेए बदनाम करने या मेरी उपेक्षा करके मुझे परिदृश्य से ओझल करने का उनका प्रयास गलत नहीं माना जा सकता। यह भेद वैचारिक स्तर का है इसलिए जब तक वे तर्क से मुझे निरुत्तर नहीं करते तब तक मैं उनको गलत मानने और अपने लेखन के माध्यम से गलत सिद्ध करने को एक जरूरी काम मानता हूं।

मेरी समझ में मार्क्सवाद की अधिक सही समझ उन लोगों को थी जिन्हें समाजवादी कहा गया और उनके विरुद्ध मार्क्सवादियों द्वारा ही कलुषीकरण अभियान चलाया गया। परन्तु मैं उन समाजवादियों के प्रभाव में मार्क्सवाद की ओर नहीं बढ़ा। मेरी वैचारिक यात्रा कांट मार्क्स और गांधी की दिशा में रही है और सामाजिक संपर्क में मैं समाजवादियों की जगह उन मार्क्सवादियों के ही निकट पहुंचा जिन्हें सबसे गलत मानता हूं। जब निकटता अनुभव की थी तो अनेक मामलों में गलत मानते हुए भी दूसरों की तुलना में उस दल को अधिक अनुकूल पाता था जिसे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट कहा जाता है।

भारतीय कम्यूनिस्ट गांधीवाद के घोर विरोधी रहे हैं और कम्युनिस्टो के प्रति गाँधी जी के मन में उतना ही संदेह हैए फिर भी घोषित लक्ष्यों में समानता होने के कारण गाँधी मानते थे कि यदि साधनों में भी वैसी ही पवित्रता हो तो उन्हें इससे विरोध नहींण् वास्तव में कम्युनिज्म गांधीवाद और तकनीकी कौशल का समन्वय हैए हिंसा का विरोधी हैए सभी प्रकार की हिंसा की समाप्ति के लिए कृतसंकल्प है और राज्य सत्ता का इसलिए विरोधी है कि जब तक राज्य संस्था रहेगी तब तक हिंसा जारी रहेगीण् यह पूंजीवादी उत्पादन पद्धति का भी विरोधी है जिसका चुनाव पूँजीवादी दबाव में समाजवादी देशों को करना पड़ाण्

गांधीवादी तरीके की शक्ति पश्चिम की समझ में उस समय नहीं आ सकती थीए अब कुछ कुछ आती है और यह समझा जाने लगा है कि गांधीवादी तरीके वहां भी कारगर हो सकते हैं। मार्क्सवाद में अल्पकालिक हिंसा एक विवशता है चुनाव नहीं और यह विवशता पश्चिम की हिंसक प्रवृत्ति के कारण है जिसमें गाँधी के प्रयोगों के बाद कुछ बदलाव आया हैण् भारतीय सन्दर्भ में मेरे विचार भारतीय समाजवादियों से मेल खाते हैंए परन्तु ठीक उन जैसे नहीं हैं। मेरी अपनी राजनीतिक दृष्टि समस्याओं से टकराते हुए बनी है और इसलिए दूसरों से अलग भी बनी है जिस पर मुझे विश्वास है फिर भी यदि विश्व के दूसरे कम्युनिस्ट या साम्यवादी देशों के उदाहरण न होते तो मैं अपने को खासा कमजोर या अरक्षणीय अनुभव करता।
अब मैं उन कारणों को गिना सकता हूँ जिनके आधार पर मैं भारतीय कम्युनिस्टों को मार्क्सवाद से भटका हुआ पाता हूँण्

शमशेर जब पार्टी से जुड़े थे तो उन्होंने लिखा था वाम वाम वाम दिशा। दूयाी सारी दिशाएं उनके लिए लुप्त हो गई थीं। बंगला का एक शब्द कहीं उनको सुनाई पड़ा ष्दिशाहाराष् तब शायद उन्हें अपनी गलती महसूस हुई और लिखी वे पंक्तियां जिनके कारण शमशेर मुझे अक्सर याद आते हैंः
हम अपने खयाल को सनम समझे थे
अपने को खयाल से भी कम समझे थे
होना ही था समझना था कहां शमशेर
होना भी वह कहां था जो हम समझे थे।
उसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली और समझा कि रचनाकार की राजनीतिक सक्रियता व्यावहारिक राजनीति से अलग होती है। यह मोहभंग केवल उनका ही न था त्रिलोचनए नागार्जुनए रामविलास शर्माए केदारनाथ सभी के साथ यह बोध अपने अपने ढंग से पैदा हुआ। मुक्तिबोध जिन्हें आजकल बहुत बढ़ चढ़ कर उद्धृत किया जाता है उनको तो प्रगतिशील लोग प्रगतिशील मानने तक से इन्कार करते रहे और श्रीकान्त वर्मा और अशोक वाजपेयी ने चांद का मुंह टेढ़ा है के प्रकाशन की व्यवस्था न की होती तो उनकी कविता भी संभवतः अन्धकार में रह गई होती

Post – 2017-07-26

हजारों दुख हैं गो हमसे अलग हैं
उन्हें सहते हैं जो हमसे अलग हैं
मगर कुछ दुख हमारे बीच भी हैं
हमें हैं जोड़ते गो हम अलग हैं।

Post – 2017-07-26

अलोक भारद्वाज की पोस्ट वीर सावरकर कौन थे, पढ़ें. अवश्य पढ़ें.
उनकी निंदा करनेवालों का पूरा जवाब यह है कि आप उन्हें जानें और यह समझें कि उनकी मर्यादा को नष्ट करने वाले कितने बददिमाग है. मैं उसे शेयर नहीं करता जिसके कुछ कारण हैं, आप कर सकते हैं, करना चाहिए जिससे उनसे पूछ सकें कि आप ने कुछ भी ऐसा किया हो कि आप सावरकर के पांव के कटे हुए नाखून के बराबर हो सकते हो तो मैं आपकी आरती उतारने का समय मांगूंगा. सावरकर के हिन्दू सरोकार बहुत साफ़ हैं, सर सैयद अहमद के मुस्लिम सरोकार उतने ही साफ़ हैं. इन पर इस दृष्टि से पुनर्विचार होना चाहिए, पर इन दोनों में किसी एक को लांछित करने के लिए जिस कद की जरूरत है वह भारत में न तब था जब यह हिंदुस्तान था न अब जब भारत को हिन्दुस्थान में बदल दिया गया.

Post – 2017-07-26

शिक्षा और संस्कृति की दिशा और दशा

मेरे मित्र ने जिस चिन्ता से कातर हो कर अपनी टिप्पणी लिखी थी वह प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति की चिंता का विषय होना चाहिए। समस्या इतनी सीधी और उजागर है कि इसके लिए लाग लपेट की ज़रूरत नहीं । लग लपेट से उसकी तीव्रता घटती है। चिंता यह कि शिक्षा और संस्कृति के सभी पदों पर संघ का कब्ज़ा होता जा रहा है। यह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि मोदी संघ की कार्य योजना को लागू करने वाले हैं। मेरा यह विचार कि वह साम्प्रदायिकता, जातिवाद और क्षेत्रवाद से भारतीय राजनीति को बाहर, सबका साथ सबका विकास की रास्ते पर लेजाना चाहते हैं एक भ्रम है। मेरा अपना भ्रम यह है कि जिन लोगों ने आज तक मोदी की प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण ही अपनाया है वे उन चुनौतियों को समझ नहीं सकते जिनका सामना मोदी को करना पड़ रहा है। इनमें से एक चुनौती उनके असहयोग और उपद्रव से निबटने का है, दूसरा संघ केदबोच से बचते हुए अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को अमल में लाने का है और तीसरी चुनौती उत्तराधिकार में मिली समस्याओं और उनके अपने समय के अन्तर्देशीय और अन्तर्राष्ट्रीय दबाव से निकटने की है।
इन पर पहले मैं कुछ पोस्ट लिख चुका हूं ।.कुछ मामलों में मेरी अपनी प्रतिक्रिया मित्र की प्रतिक्रिया से कुछ अधिक ही उग्र रही होगी जिसमें बाहुबल और बुद्धिबल को परिभाषित करते हुए संघ की कठोर मुहावरों में आलोचना की थी। आलोचनाएं दूसरी सीमाओं को ले कर भी रही हैं जिनकी कुछ बानगी मेरी अपनी टिप्पणियों और मेरी पोस्ट में आए उद्धरणों में मिल सकती हैः

I also felt annoyed when I heard speaker after speaker in RSS gatherings pouring contempt on “intellectuals” who had read books but who knew nothing of the “practical problems”.p.80
One dayA BJS leaderAsked me to write a book presenting the BJS to the West. I said that I knew very little about the BJS, and that it would be better if the job was undertaken by one of their own scholars. He said that the problem was that they had no scholar in their organization.
5 दिसंबर 2016
मुझे इस बात की पीड़ा है कि न तो हिन्दुओं के हित संघ और भाजपा के साथ सुरक्षित हैं न मुसलमानों के हित अपने को सेक्युलर अर्थात् सेक्युलरिस्ट कहने वालों के साथ सुरक्षित हैं क्योंकि इन दोनों का लक्ष्य दोनों समाजों में पिछड़ापन लाते, मध्ययुगीन प्रवृत्तियों को उभारते हुए अपनी रोटी सेंकने की है। वहीं इनके वास्तविक हितों की चिन्ता करने वाली संस्थाओं या संगठनों का ऐेसा अभाव है कि इनके हित रक्षक के रूप में ये ही बच रहते हैं। 21 दिसंबर 2016
संघ से इसका संबंध मन में मध्यकालीन मूल्यों, पंडों, पुजारियों, महंतो और संतों की दखलंदाजी की आशंका पैदा करता था। इसके द्वारा बारह साल पहले कारसेवकों के लिए साबरमती एक्सप्रेस की बोगियां भर कर भेजने की घटना, मन्दिर मस्जिद तनाजे की वापसी लगती थी। शायद इन्हीं सारी आशंकाओं के चलते हमारे कई मित्रों ने मोदी के केन्द्र में प्रवेश को सांप्रदायिकता के अतिरेक और भारत के भावी दुर्भाग्य के रूप में देखा था, परन्तु मेरी आशंकाओं का निवारण चुनाव अभियान का आरंभ होते ही हो चुका था, जब कि उनकी बनी रह गई थीं और वे अपनी हताशा, घबराहट को बहुत तल्ख इबारतों में प्रकट कर रहे थे। 6 अक्टूबर 2016

, संघ से और इसलिए भाजपा से बृहत्तर हिन्दू समाज परहेज सा करता था। यह परहेज गांधी जी की हत्या के बाद पैदा हुआ। संघ भले अभियोग से मुक्त हो गया हो, परन्तु हिन्दू समाज के मन में उसके प्रति मैल बनी रह गई थी। हिन्दू समाज का यह भाषातीत, तर्कातीत, सहज बोध प्रायः अचूक होता है।

संघ ने अपने चरित्र में बदली परिस्थितियों में कोई गुणात्मक परिवर्तन किया ही नहीं और पीछे जो बात हम अपने हिन्दुत्वद्रोही संगठनों के विषय में और मजहबपरस्त मुसलमानों के विषय में कह आए हैं, वही बात संघ पर भी लागू होती है। सर्वोपयुक्त की अतिजीविता के डारविन के नियम से संघ भी अश्मीभूत संस्था बन गई जब कि यही बात मैं मुस्लिम लीग के विषय में नहीं कह सकता। उसने अपनेे लक्ष्य को हासिल करने के लिए जिस तरह की लोच दिखाते हुए कम्युनिस्ट आन्दोलन को अपने अपने कार्यक्रम से जोड़ लिया, कांग्रेस और समाजवादी दलों की धर्मनिरपेक्षता को मुस्लिम वोट बैंक बन कर इस हद तक प्रभावित किया कि यदि हिन्दू अपने देश में ही उत्पीड़ित हों तो, मात्र इस आषंका के कारण ही कि उसे हिन्दू सांप्रदायिकता से ग्रस्त मान लिया जा सकता है, उनकी पीड़ा को मुखर करने तक का साहस किसी को न हो, और किसी मुसलमान का नाखून भी कटे तो उसका गला कटने का प्रयास मान कर आर्तनाद आरंभ हो जाय।

संघ ने स्वतन्त्रता संग्राम में भाग नहीं लिया, ब्रितानी हुकूमत का साथ देता रहा, हामी भरते हुए अपनी ओर से यह भी जड़ा है कि संघ के लोग खादी से और गांधी टोपी से भी परहेज करते थे।
गांधी के विरुद्ध उन दिनों संघ में जिस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा था, उसमें मैं इतना उत्तेजित अनुभव करता था कि यदि गोडसे ने गांधी जी की हत्या न की होती, उसकी जगह मैं होता और मेरे हाथ में पिस्तौल होती तो मैं उन्हें गोली मार सकता था।
23 अक्तूबर 2016

शिक्षा की समस्या मित्र के लिए संघ के कब्जा जमाने से आगे नहीं जाती मेरी चिंता पूरी शिक्षा प्रणाली और शिक्षा की योजना और स्तर को लेकर है जिसे भी बार बार दुहराता आया हूँ. वर्तमान शिक्षा प्रणाली में तकनीकी शिक्षा पर जोर है जिससे मेक इन इंडिया के लिए कुशल और सुयोग्य करमीवर्ग सुलभ हो सके.

तकनीकी शिक्षा आदमी का पेट भरने के काम आती है, सामान्य शिक्षा ज्ञान और ज्ञेय का विस्तार करती है, मानविकी की शिक्षा हमें बेहतर मनुष्य बनाती है। आज की शिक्षा नीति में पहली के लिए पर्याप्त तत्परता दिखाई जा रही है, परन्तु उसका क्रियान्वयन कहां तक हो पा रहा है उसकी जानकारी मुझे नहीं है। दूसरी में जहां तक अनुसंधान और सर्वेक्षण की बात है, हो सकता है विज्ञान के क्षेत्र में स्थिति अधिक बुरी न हो या पहले से कुछ अच्छी हो, मानविकी की स्थिति बहुत आशाजनक नहीं लगती।
इसका एक कारण योग्य व्यक्तियों का अभाव है। यह परंपरा सत्तर के बाद से चली आ रही है कि शिक्षा, अनुसंधान और पाठ्यसामग्री के चयन का काम एक विशेष सोच के तहत किया जाता रहा है, उस सोच से सहमत लोगों को ही पदों पर नियुक्त किया जाता रहा है और उनको उस मान्यता के अनुसार ढलने को विवश किया जाता रहा है।

मेरे मित्र की चिंता के मूल में एक दूसरी बात यह कि इन सभी पदों पर संघ के लोग कब्जा जमाते जा रहे हैं और पूरा प्रशासन एक तरह से संघ के हाथों में सिमटता जा रहा है। शिक्षा, संस्कृति और ज्ञान के उस पक्ष के विषय में यह कथन सही है और संघ में शिक्षा और ज्ञान के प्रति उदासीनता रही है, जैसा मैं कह चुका हूं कि इसमें सचेत रूप में अध्ययन और अनुसंधान को हतोत्साहित किया जाता रहा है। पिछले बीस सक सालों से इसने इतिहास के नाम पर ऐतिहासिक संकलन का काम शुरू अवश्य किया परन्तु उसका स्तर और दिशा संघ की सोच से प्रभावित है। संघ के लोग भारतीय संस्कृति और इतिहास में रुचि नहीं रखते । इसकी उनमें समझ नहीं है। अध्ययन और अनुसंधान करने वालों का उस सीमा तक ही उपयोग करने का प्रयास करते रहे हैं जिस सीमा तक उनके निष्कर्षों का रणनीतिक उपयोग कर सकते हैं। प्राचीन इतिहास का उनका ज्ञान वैदिक काल तक नहीं जाता, उसके केवल एक पक्ष तक जाता है कि भारत पर बाहर से आर्यों का कोई आक्रमण नहीं हुआ था जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि हम तो यहां के मूल निवासी हैं और मुसलमान बाहरी हैं और यह भी भुला दिया जाता है कि इस्लाम मानने को विवश होने वाले भी इसी देश के मूल निवासी हैं.। यह इतिहास का बहुत संकरा और इतिहासविरोधी अध्ययन है जिसके लिए मानना जानने से अधिक उपादेय है।

मेरी अपनी समझ यह है कि संघ अपनी ओर से भाजपा को अपने चंगुल में रखने की कोशिश से कभी बाज नहीं आ सकता और अपने लोगों को पदासीन करने का ही नहीं संघ के प्रति गहरी निष्ठा रखने वालों को ही विश्वसनीय मानता है और तनिक भी उदारता उसे विश्वासघात प्रतीत होती है। इसी कररण वाजपेयी जी संघ को खटकते थे। वे उन्हें नाम को संघ से जुड़ा और विचार से नेहरूवादी मानते थे । इसके बाद भी दूसरे किसी नेता की जनस्वीकार्यता ऐसी न थी जो उनका स्थान ले पाता। वाजपेयी का तीन बार प्रधान मंत्री के पद पर पहुंचना इसी का परिणाम था। अडवानी जी की जिन्ना के विषय में मात्र एक टिपण्णी उनके भविष्य पर भारी पड़ी और उनकी उपेक्षा में संघ की भूमिका थी।

ऐसी स्थिति में गोरक्षकों का गुंडा कह कर उनके साथ दंडात्मक कार्रवाई ही मोदी की मांग, देवालय की तुलना में शौचालय को अधिक वरीयता देने जैसे बयान, एक अलगाववादी तक के साथ सरकार बनाने चुनाव और सबको साथ लेने का नारा उस जनसमर्थन के बल पर हैं न कि संघ की सहमति से जो संभावित चुनाव का साल आने से पहले जनता उनके पक्ष में देने लगी थाी। यहीं संघ की नीति और मोदी की अपनी नीति का अन्तर खड़ा होता है। यहां मेरा आकलन यह है कि मोदी देश को सामंती सोच से आगे पूजीवादी विकास की ओर ले जाना चाहते हैं। संघ का प्रयत्न सांप्रदायिकता का अपना आधार बनाए रखने का अवश्य हो सकता है।

मेरी आपत्ति इस बात से नहीं है कि संघ या भाजपा सरकार की कमियों की ओर ध्यान क्यों दिया जा रहा है। आपत्ति इस बात से है कि मोदी कि ऎसी कोई उपलब्धि उनके आलोचकों को क्यों नहीं दिखाई देती.जब कि मैं उनके अंधविरोध के कारण मोदी के प्रति अपनी घोषित पक्षधरता के बाद भी संघ और स्वयं मोदी की आलोचना करने के अवसर निकाल लेता हूँ। वस्तुपरक कौन है? वे आलोचना की जगह निंदा क्यों करते है। मोदी को सही मानने वालों को गालियां क्यों देते हैं और यह तक भूल जाते हैं की वे पुरे देश को गाली दे रहे हैं। बदजबान लोग बदजबानी के बल पर अभ्व्यक्ति के समस्त अधिकार पर कब्जा ज़माना चाहते हैं और तिलमिलाते हैं कि शोर मचने के एकाधिकार के बाद भी उनकी बात उनके गिरोह से बाहर कोई सुन ही नहीं रहा है। मेरे मित्र को जो अन्यथा खासे सुलझे हैं इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

Post – 2017-07-25

न कांक्षे घालमेलनम्

मैं जो गीता पढ़ता था उसमे एक ऐसा श्लोक था जो किसी अन्य प्रकाशन में नहीं मिलता।
कांक्षे वादं च संवाद अपवादम प्रतिवादनम्
कांक्षे च विजयम् कृष्ण न कांक्षे घालमेलनम्।

मुझे जिस बात ने उद्विग्न किया था और मैं भाषा पर अपना सबसे जरूरी काम छोड़ कर इस दलदल में फँस गया था वह थी सांस्कृतिक क्षरण में बौद्धिकों और संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी.

कालिदास के बारे में एक कथा पढ़ी थी! वह जिस डाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे. पंडितो ने उनकी मूर्खता का लाभ उठाया और जिस विद्योत्तमा ने उन्हें पराजित किया था उसे धूर्तता से परास्त कर के विद्योत्तमा का जीवन नष्ट करना चाहा. वास्तविकता जानने के बाद उसके द्वारा किये गए अपमान की चेतना ने विल्वमंगल को कालिदास बना दिया. लेकिन कालिदास और भरत होने का दावा करने वाले विल्वमंगलों की जमात को आत्मबोध कराने का क्या कोई उपाय हो सकता है जो तथ्यों. तिथियों, सन्दर्भों के घालमेल से जो सिद्ध करना चाहते हैं सिद्ध कर देते हैं, जैसे विल्वमंगल और विद्योत्तमा के वाद में धूर्त पंडितों ने किया था. ऊपर से छाती पीटते हैं कि उनके चीत्कार के बाद भी कोई उनकी बात मानता क्यों नहीं. वे भूल जाते हैं कि पांडित्य के आभाव में भी घालमेल की पहचान हो जाती है और एक बार ऐसे लोगों के फरेबी सिद्ध होने के बाद लोग उन पर कम और अपनी समझ पर अधिक भरोसा रखने लगते हैं.

जीतना एक तुच्छ लक्ष्य है. सही होना और सही बने रहने के लिए उत्सर्ग होना एक पवित्र ध्येय है. जिसमे मरना तक प्रेरणादायक हो सकता है, उसमे हारने का जोखिम उठा कर सत्य पर टिके रहना विजय की परिभाषा बदल देता है. मुझे इसे आज न उठाना होता यदि मैं यह न देखता कि कालिदास होने का दावा करनेवाले विल्वमंगलों को यह याद दिलाने की आज भी जरुरत है कि जैसे खेल के नियम होते हैं वैसे ही विचार श्रृंखला के भी अपने नियम होते है. एक खेल में दूसरे के नियम नही मिलाये जा सकते.

हमने अपने अतीत को समझने की जगह उससे नफरत करने को अधिक गर्व का विषय माना. हमने जो सिद्धांत आज से ढाई हज़ार साल पहले निरूपित किये थे उन्हें पश्चिम ने मात्र दो सौ साल पहले भारत से परिचय के बाद जाना, फिर भी हम हेतुवाद या थ्योरी ऑफ़ काजेसन के सन्दर्भ में जॉन मिल को तो याद करके बिछ जायेंगे पर बुद्ध, और उनके माध्यम से भारतीय वैज्ञानिक चिंतनधारा याद न आएगी. आ गई तो भूलना चाहेंगे क्योंकि इससे हमारे पुनरुत्थानवादी सिद्ध होने का खतरा पैदा हो जाएगा. बुद्ध का हेतुवाद जहाँ तक मुझे याद है:
इमस्मिं सति इदं होति.
इमस्स उप्पादे इदं उपज्जति
इमस्मिं नसति इदं न होति
इमस्स निरोधे इदं निरुज्झति

यह हुआ तो यह होगा
यह पैदा हुआ तो यह पैदा होगा
यह न हो तो यह न होगा
इसका निरोध कर दिया जाय तो यह निरुद्ध हो जाएगा

यही दुःख है, दुःख का कारण है, दुःख का अंत है और दुःख के अंत का उपाय है में भी है.

इसे उन्होंने चार आर्यसत्यों या आज कि भाषा में कहें तो वैज्ञानिक स्थापनाओं की संज्ञा दी थी.
इसकी याद इसलिए आ गई कि मेरे एक प्रबुद्ध और भरोसे के मित्र ने निवर्तमान राष्ट्रपति के भाषण में एक ऐसी पंक्ति अपनी और से जोड़ दी जो उनके भाषण में न रही होगी . यह संघ के चरित्र से सम्बंधित है. इसे मैं उस घालमेल का नमूना मानता हूँ जिसके हम इतने आदी हो गए है की यह तक नही समझ पाते कि हम कर क्या रहे हैं और इसका लाभ किसे मिलेगा.

मुझे बुद्ध का सिद्धाँत इसलिए याद आया कि सम्यक समबुद्धि के लिए यह याद दिला सकूँ कि
मुस्लिम लीग की स्थापना १९०६ में हुई थी.

उसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का जन्म उसके कुकृत्यों के प्रतिवाद और बचाव में हुआ था.

इन दोनों का जन्म अंग्रेजी कूटनीति की सफलता थी क्योंकि मुसलामानों के साथ अब हिन्दू जमीदारों और रजवाड़ों का समर्थक और स्वतंत्रता संग्राम का विरोधी शिविर तैयार हो गया था.

जन्मकुंडली और नाम भले भिन्न हो एक के होने पर दूसरा पैदा होगा.
उसके निरोध पर दूसरा निरुद्ध होगा.
एक को दोष देकर अपने को निर्मल विमल न हमसा कोई गाने से और इस घालमेल से बच कर ही हम अपने समाज को बचा सकते है.

Post – 2017-07-24

तुमने भगवान को देखा है कभी या कि नहीं
वह नामुराद बका करता है जाने क्या क्या !

Post – 2017-07-24

हम अपने खयाल को सनम समझे थे (1)

मेरे मित्र सिन्हा जी की प्रतिक्रिया में कुछ बातें इसलिए भी विचारणीय हैं कि मेरे विषय में अनेक दूसरे लोगों के विचार भी वैसे ही हो सकते हैं। इसका कुछ आभास मुझे कौसानी संवाद में मिला था पर ऐसे अवसरों पर जिन पर गंभीर बहस नहीं हो सकती थी। मेरे एक मित्र (मित्र कहूँ तो कॉटन धावे , क्योंकि फेसबुक फ्रेंड नहीं हैं), फिर भी मित्रोपम, आलोक श्रीवास्तव ने, चाय की चुस्की के साथ कहा, “आप की उम्र कुछ कम होती तो वे आपको किसी बड़े पद पर बैठा देते। आलोक जी उम्र में मुझसे कम हैं पर अनुभव और ज्ञान में मुझसे आगे हैं। इसलिए वह मुश्किल कथ्य का प्रीतिकर पाठ कर सकते हंजिसका अर्थ ध्वनि से ही जाना जा सकता है। वह है ही लिहाज या आतंक के दबाव में जबान बंद लोगों की आवाज। ध्वनि में यह सुविधा होती है कि आप कोई अर्थ निकालें तो दूसरा बचना चाहे तो कहे मैंने तो इस आशय से यह कहा था। यह चोरदरवाजों वाली वह भाषा है जो अप्रिय सत्य के कथन और श्रवण को संभव बनाती है । अतः उनके कथन का एक चोरदरवाजा-पाठ यह बनता है कि आप का लेखन कुछ पाने की अभिलाषा से जुड़ा है।

मैं ध्वनि और व्यंग्य समझ नहीं पाता, समझने में समय लगता है, पर जो जवाब उस कथन को स्वाभाविक वाक्य मान कर देता हूँ वह अभिधा, व्यंजना और ध्वनि सभी का जवाब बन जाता है क्योंकि मैं व्यंग्य और ध्वनि को भी अभिधा मान कर स्पष्टीकरण देता हूँ। मुझे यह खुशफहमी है कि वह मेरे उत्तर से संतुष्ट हो गए होंगे। यदि न होते, या इसका आभास देते तो भी मेरे लिए उनके विचारों का सम्मान इस सीमा तक रहता कि कुछ लोग मेरे बारे में ऎसी राय रखते है। वे अप्रिय राय रखते हैं इसलिए वे मुझे बुरे नहीं लगते, गलत नही लगते, इसलिए कटुता पैदा नहीं होती, पर मुझ पर उनकी राय का प्रभाव नहीं पड़ता। मेरा मानना है कि तक तक अपने ज्ञान, अनुभव और विवेक से कोई किसी बात को सही मानता है, तब तक उसे अपने मंतव्य पर दृढ रहना चाहिए और इसलिए जो लोग यह सोचकर कि ‘सभी लोग तो यह मानते हैं, यदि मैंने वैसा न माना तो मैं कहीं का न रहूँगा’ दूसरों के विचार से अनुकूलित हो जाते हैं , उनके पास दिमाग तो होता है पर उससे काम न लेकर दूसरों के दिमाग से काम लेते हैं और उनके काम के होते हैं जिनके मुहाविरे दुहराते है.। उनका अपना अस्तित्व तक नही होता। वे विचारक नहीं होते. मात्र ढिंढोरची होते है. उनको कान में उंगली लगाकर सुनना कान खोल कर सोचने और समझने की पहली शर्त है.

लेखक को अलग से सफाई देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उसका समग्र लेखन ही अपने विषय के साथ लेखक के भी अन्तर्मन का अघोषित दस्तावेज होता है। उसका कोई कथन या लेखन उसकी समग्रता में ही देखा या समझा जा सकता है जैसे हमारे किसी आचरण को हमारे समग्र व्यक्तित्व के सन्दर्भ में देखा जाता है। परन्तु किसी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह आपके समग्र लेखन से या समग्र पूर्ववृत्त से परिचित हो तभी आप से संवाद करे इसलिए यदा कदा संक्षिप्त स्पष्ट कथन जरूरी हो सकता है।

मेरी यह पक्की राय है कि हमें केवल अपने कार्य और विशेषज्ञता के क्षेत्र में ही अधिकार से कुछ कहने का अधिकार है, उसे हम पूरी निष्ठा से कर सकें तो वह काम अपने से अलग एक सामाजिक और राजनीतिक, यहां तक कि रणनीतिक भूमिका भी निभाता है।

मैंने यह कई बार कई तरह से रेखांकित किया है कि मोदी पहले राजनेता हैं जो मन्दिर और मजहब और किताब और जाति की राजनीति को देश के लिए अहितकर मानते हुए विकास की राजनीति की बात करते हैं। सामरिक तैयारी के स्थान पर आर्थिक विकास को वरीयता देते हैं, और इस कारण संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद से आगे बढ़ कर समग्र देश के उत्थान से जुड़ी राष्ट्रवादिता के प्रवक्ता बन कर केन्द्रीय राजनीति में आए हैं और जो वादे उन्होंने चुनाव से पहले किए थे उन्हें पूरा करने के लिए प्रयत्नशील हैं।

जिन दलों की जमीन खिसक गई वे लगतार उनके कम में बाधा डालते और समस्याएं पैदा करते रहे हैं और उनके सही दिशा में प्रयोगों की भी उलटी व्याख्या करते रहे हैं और इसलिए उन्हें दो तरह की समस्याओं से जूझना पड रहा है. एक वास्तविक, दूसरी इनके द्वारा पैदा की गई. इससे पहले कभी किसी सर्कार को इस तरह के आतंरिक अवरोधों और खुराफातों का सामना नही करना पड़ा. इसके बाद भी उन्हें असाधारण सफलता और स्वीकार्यता मिली है. मैं अर्थशास्त्री नही पर इतनी बात सब को पता है कि पूंजीवादी विकास समस्याएं पैदा करता है. बड़ी मशीन हजारों का रोजगार छीनती है पर दूसरे रस्ते भी तैयार करती है. वहाँ कौशल और निजी पहल की जरुरत होती है. पूंजीवादी विकास में पूंजीपति अधिक धनी और ताकतवर होता है, पीठ पीछे से सरकार भी वही चलाता है. पर सामंती व्यवस्था से आगे बढ़ने का भी वही रास्ता है. समाजवाद उससे बाद की और उसकी विफलता से पैदा अवस्था है. सामंती व्यवस्था में समाजवादी प्रयोग अल्पजीवी होते हैं इसलिए मैं अम्बानी अदानी के नाम पर छाती नही पीटता. समाजवाद की मेरी यही समझ है और इसलिए मैं अपने को अधिक सही समाजवादी मानता हूँ.

मोदी का विरोध करने वाले अराजकतावादी हथकंडे अपना रहे हैं, अपने को जिलाने के लिए देश का अहित करने पर उतारू हैं, इसलिए मैं उनका समर्थन नहीं कर सकता. मार्क्सवादी अराजकतावादी नहीं हो सकता. मोदी लोकतंत्रवादी हैं और अभी तक कोई तानाशाही रुझान नही दिखाया है. बकौल मार्क्स समाजवाद का रास्ता लोकतंत्र से हो कर गुजरता है.