यदि आप किसी से नफरत करते हैं तो उसे गाली देने वाला या आहत करने वाला आपको दार्शनिक प्रतीत होगा और वह अपना बचाव करना चाहे तो भी वह बचाव प्रहार जैसा लगेगा. पिछले तीस सालों में जाने कितने रूपों में समझाया है कि नफरत करने वाला समझ नहीं सकता. समझदार आदमी किसी से नफरत नहीं कर सकता, उसकी आलोचना कर सकता है.
Post – 2017-09-09
किनहि न व्यापे जगत गति?
इसका जवाब तो आसान नहीं है, पर इसका जवाब मेरे पास है. यदि मै मानू कि मैं तो गलत हो ही नही सकता, कोई कुछ कहे, उसकी आपत्तियों का सटीक जवाब न दे सकूँ, अपनी मान्यता पर दृढ रहूँ तो मैं न चाहूँ तो भी उस कतार में खडा कर दिया जाऊँगा जिसे जगत गति नहीं व्यापती और जिन्हें जगत गति नहीं व्यापती उनके साथ जगत चल ही नहीं सकता ऐसी स्थिति में वह यूथ निष्काषित यूथपति की तरह तब तक ही जीवित रह सकता है जब तक उसके जैव शत्रुओं की नज़र उस पर नहीं पड़ती.
जिस जैव साम्य को दृष्टान्त के लिए पेश किया उसका सार यह है कि यदि नई पीढ़ी मेरी बुजुर्गी का लिहाज कर के मेरी कटु आलोचना न करे तो वह सही विचार की ह्त्या करके एक व्यक्ति को उसकी बुजुर्गी के कारण बचा रही है जिसे कालदेव भी नहीं बचाना पसंद करेंगे. यदि आप विचार की रक्षा करते हैं तो मेरे भी सही विचारों की रक्षा होगी. यदि जहां मुझे गलत पाया गया और किसी लिहाज से अपना विरोध प्रकट करने में ढील दी गयी तो गलत विचारों का विस्तार होगा. परंतु उसी नियम से मैंने आपके विरोध के सामने यह दिखाने के लिए कि मैं विरोध का सम्मान करता हूँ और उनकी आपत्तियों को मान लेता हूँ उनको जांचता नही हूँ तो यह भी एक गलत विरासत होगी इसलिए मैं अपने विचारों को सही सिद्ध करने के लिए अंत तक लडूंगा और उस दिन की प्रतीक्षा करूगा जब यूथपति को चहेंट कर बाहर करने वाला विचार लेकर आने वाला केन्द्रीयता पा लेता है.
मैंने एक पोस्ट को अपने अज्ञान के कारण बहुत समीचीन पाकर कॉपी पेस्ट करते हुए अपनी चिंताएं रखी. उनके समर्थन में बहुत सी नई सूचनाएं आईं और कुछ मित्रों की चिंताएं भी आईं कि मैंने ऐसा सोचा और माना कैसे. जिस सम्मान और आत्मीय भाषा में विरोध और असहमति प्रकट की गई उससे अभीभूत हूँ पर उससे भी अधिक इस बात से कि असहमति और प्रतिरोध को भावुकता ने पूरी तरह ग्रस नही लिया है. सही होना उतना सही नहीं है जितना सही होने का संघर्ष.
अब मैं उन आपत्तियों को अपनी तरफ से खारिज करने की कोशिश करूंगा और असहमति रखने वालों से अपेक्षा करूंगा कि वे तार्किक ढंग से मुझे गलत सिद्ध करें जिससे संवाद तो चले, अभी तलक का हाल यह है कि मैं अमुक शिविर का हूँ, उसकी मान्यता यह है, आप के तर्क और प्रमाण जो भी हों वे हमारे शिविर में मानी नहीं जा सकते.
इस देश में सम्प्रदाय और साम्प्रदायिकता का प्रयोग वैचारिक घरानों के लिए ही होता था. शैव सम्प्रदाय, नाथ सम्प्रदाय, इत्यादि.
आपत्तियों में जो बिंदु उठाये गए है उन्हें सूत्रबद्ध करें तो :
१. क्या आपत्तिजनक कथन के लिए किसी की ह्त्या का समर्थन किया जा सकता है?
२. क्या जिस आपत्तिजनक कथन से आपको आपत्ति है उसके इतिहास से, अर्थात जे एन यू के उस विवाद से आप अवगत हैं जिसमें यह टिप्पणी की गई थी?
३. क्या आप जैसे विचारवान व्यक्ति को इतनी सतही बहस में उतरना चाहये था ?
यदि कोई और आपत्ति छूट गई हो तो उसकी उपेक्षा मेरा इरादा न था. इन सभी आपत्तियों के साथ मैं ‘नही’ को एकमात्र उत्तर मानता हूँ अर्थात आप की सभी बातें सही हैं और यदि मै इनका समर्थन करूँ या ऐसा किया हो तो गलत हूँ.
परन्तु क्या मेरे कथन में, इस पोस्ट में ही नहीं, मेरे पूरे लेखन में इस बात का समर्थन दिखायी देता है कि हमें कानून और व्यवस्था को अपने हाथ में लेकर कौन अपराधी है, कौन दंडनीय इसका फैसला करने को अपना मुख्य कार्यभार मानना चाहिए और पुलिस और न्याय व्यवस्था पर कब्जा कर लेना चाहिये या इस बात पर बल है कि हमें अपना काम अपने क्षेत्र की मर्यादाओं का निर्वाह करते हुए करना चाहिए ताकि दूसरों को अपने कार्यक्षेत्र में काम करने में हमारे कारण बाधा न पड़े. इसका निर्णय मैं असहमत होनेवाले मित्रों पर, उनकी आयु और अनुभव जो भी हो, छोड़ता हूँ पर इसके पीछे मेरी एक चालाकी भी है. इस बहाने वे मेरी दूसरी किताबों को पढ़ेंगे तो सही.
मेरी चिंता के क्षेत्र में कानून और न्याय व्यवस्था आती ही नही, आता है समाज की सोच में आ रहा बदलाव. यदि आप संतुष्ट है कि बदलाव आपकी कारगुजारियों से इच्छित दिशा में जा रहा है तो मुझे कुछ कहने की जगह एक मुहावरा याद दिलाना बाक़ी रह जाता है – हाथ कंगन को आरसी क्या?
जे एन यू के समय मे यदि घबराए हुए ए बी पी की और से कीचड़ की होली आरम्भ हुई थी और आप ने पानी और साबुन का इस्तेमाल करते हुए उसे विफल नही किया और उस होली में शामिल हो गए तो आप यह कैसे कह सकते है कि कीचड़ फेंकने वाले गंदे है? गाली देकर गाली की प्रतियोगिता को समाप्त नहीं किया जा सकता.
अब यदि जो सूचनाएं भिन्न प्रतिक्रया में प्रमाणों के साथ आई हैं वे रिकॉर्ड पर हैंउन पर भी ध्यान दिया जाय तो उनसे साबित होता है कि जिसे आपने शहीद बना दिया वह एक ब्लैकमेलर थी. तात्कालिक प्रतिक्रया में दुश्मन के दुश्मन को अपना मित्र मान कर उसके साथ खड़ा हो जाने वाले यह तय नही करते कि वह दुश्मन है या सुपारी लेने वाला अपराध कर्मी. सभी टिप्पणियों का आलोचनात्मक पाठ करें. इसने एबीवीपी के उस आरोप को कि ये आजादी के नामपर निर्बन्ध कामाचार की,माग कर रहे है तस्दीक करते हुए अपने अख़बार के लिए मसालेदार और भड़काऊ माल बनाते हुए गली गलौज में बदल दिया था. आप उसे विचार मानें मैं घटिया दर्जे का व्यापार मानता हूँ, जब कि इसे कुंठामुक्त वातावरण का नर्शानिक प्रश्न बनाकर स्वस्थ बहस में बदलने का काम आपका था. सोचिये आप में से कितनों ने अपनी मा से वः सवाल पूछा होगा या पूछ सकते हैं जो उसने संघियों से पूछने को कहा था. ऐसा किसी ने किया हो तो बताए.
जंग जारी रहे तो अच्छा.
Post – 2017-09-09
मैंने अभी तरुण बनर्जी की वाल पर संजीत सिंह का लेखअभी जो पढ़ा उसे कापी पेस्ट कर रहा हूं। तय करें कि लंकेश की ऐसी टिप्पणियों को और कन्हैया की भगवा पहने पर अपनी बहन को भी नंगा करने जैसी टिप्पणियों को पढ़नने के बाद एक गैरराजनीतिक हिन्दू की सहानुभूति इनके और इनका पक्ष लेने वालों से होगी या संघ से। विचार करें संघ का जनाधार उसके संगठन की सक्रियता ने बढ़ाया है या नकली मार्क्स वादियों ने।
“आखिर एक हत्या पर लोग खुशी क्यो मनाते हैं –
“गौरी लंकेश जैसे एक कट्टर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता को जिसे मीडिया पत्रकार बनाकर पेश कर रही है आज मैं उन सभी मीडिया वालों को उसकी फेसबुक पोस्ट पर से घृणास्पद गाली दिखा रहा हुं।
“गौरी लंकेश ने यह 25 मई 2016 को 12:12 पर अपने फेसबुक वाॅल पर पोस्ट किया था उसे मैं पहले मुल रूप से ज्यों का त्यों रख रहा हुं—-
sanghis,
if your mother did not have `free sex’ – meaning sex out of free choice – then it means one of two things:
1. you are a product of rape.
or
2. you are the product of a sex worker who did not perform sex for free but for a fee.
sanghis, the choice is yours. you can either say your mother was involved in `free sex’ or accept that you are a result of either one of the two options that i have given above.
इसको हिंदी में अनुवाद करने में भी मेरा हाथ कांप रहा है लेकिन चेहरे पर से नकाब उतारने के लिए जरूरी है तो पेश है इसका हिंदी अनुवाद—-
संघीयों !
अगर ,आपकी मां ने ” मुफ्त सेक्स ” नहीं किया है – तो इसका अर्थ यह है कि एक दो चीजों का अर्थ है:
1. आप बलात्कार का एक प्रोडक्ट हैं ।
या
2. आप एक सेक्स कर्मी के उत्पाद हैं जो मुफ्त के लिए सेक्स करते हैं लेकिन एक फीस के लिए ।
संघियों, पसंद है तुम्हारा । आप या तो कह सकते हैं कि आपकी माँ ‘मुफ्त सेक्स’ में शामिल हो सकती है या यह स्वीकार करें कि आप ऊपर दिए गए दो विकल्पों में से एक का परिणाम है।
….यह पोस्ट कन्हैया के उस ब्यक्तत्व के समर्थन में लिखी गई थी जिसमें उसने फ्रि-सेक्स के पक्ष में पिछले साल अपना भाषण दिया था।
….दुसरी पोस्ट है भारतीय सेना पर जिसमें कन्नड़ में एक लंबा लेख लिखकर भारतीय सेना को ब्लात्कारी बता रही है।.
..एक और पोस्ट है जिसमें हिंदूओं को इडियट बता रही है।एक फोटो पोस्ट और है जिसमें इस्लाम के विचार यानी हरे रंग को असली इंडिया बता रही है और इससे अलग रंग को इजरायल बता रही है।वह एक फोटो के माध्यम से बता रही है 1947 में जब इस देश में इस्लाम यानी हरे रंग का प्रभुत्व था तभी तक वह भारत था 2014 में तो इजरायल बन चुका है।
.. ..सभी का स्क्रिन शाॅट कमेंट बाॅक्स में है।आप देखना मत भुलें अन्यथा विश्वास न हो तो खुद से सर्च कर उसके फेसबुक वाॅल पर पोस्ट देख सकते हैं।यदि समय खर्च नही करना चाहते हैं तो मुझसे इस विषय से संबधित पोस्टों पर आप लिंक भी मांग सकते हैं मै दस मिनट के अंदर उसके मुल पोस्ट को लिंक लाकर आपको उपलब्ध करवा दुंग।
….सवाल उठता है हिंदू धर्म और हिंदूवादीयों को गंदी गाली देकर अपना गुस्सा प्रकट करने इस कुंठीत महिला को पत्रकार मानना कहां तक उचीत है ?””
Sanjeet singh की पोस्ट
Post – 2017-09-08
सरकार गिराने के दूसरे बहुत से प्रयोग फेल हो जाने के बाद लगता है एक नया प्रयोग चल रहा है:
गाड़ियां पटरी से गिराकर भी सरकार गिराई जा सकती है।
गाड़ियों की रफ्तार घटाने पर मजबूर करके भी सरकार की रफ्तार घटाई जा सकती है।
यातायात प्रणाली से जनता का विश्वास भंग करके भी सरकार में जनता का विश्वास भंग किया जा सकता है।
कौन कर रहा है ये प्रयोग? कौन हैं उसके साथ? वे देशवासियों का हित चाहने वाले तो नहीं हो सकते। इसका सामना इंजीनियर या मंत्री बदल कर नहीं हो सकता ।
जिम्मेदारी तय करो। केवल जिम्मेदार व्यक्ति को दंडित करो। आपाधापी मे दंडित किए गए लोगों को बहाल करो।
Post – 2017-09-07
क्या यह सच है कि जिस सिद्दारमैया ने कोरस गाया जो पुलिस की निष्पक्ष जांच को प्रभावित कर सकता था उसी की पुलिस नक्सल कोण की तलाश कर रही है,क्योंकि धमकियां उसी से मिली थीं। यदि ‘हां’ तो क्या हमारे मित्र आगे से अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले धीरज से काम लेंगे कि जन सामान्य जो उन्हें आग लगाने वाली जमालो समझने लगा है सुधी मानने को तैयार हो सके । ऐसा मैं शुद्ध स्वार्थवश लिख रहा हूं क्योंकि लेखक होने के नाते मेरा हित उनके हित से, मेरी साख उनकी साख से, लाख असहमतियों के बाद भी जुड़ी है।
Post – 2017-09-07
मूर्खता माहात्म्य
यूं तो मैं अपनी मूर्खताओं पर आज की अपनी पोस्ट में लिखूंगा, पर उसकी भूमिका के रूप में यह बता दूं कि मूर्ख लोग दुष्ट नहीं होते। दुष्ट व्यक्ति मूर्ख नहीं हो सकता, अपराधी हो सकता है। दोनों में बुनियादी अंतर यह है कि मूर्ख अपना नुकसान करता और उस नुकसान से भी कुछ नहीं सीखता; दुष्ट दूसरों का नुकसान करता है और अपने प्रत्येक अनुभव से सीखता है। मूर्ख अज्ञानी भी नहीं होता। इतना ज्ञान बटोर लेता है कि उसे संभाल तक नही ं पाता, ऊपर से प्रतिभाशाली भी होता है, इसलिए अपनी अक्ल पर इतना भरोसा करता है कि किसी की सुनता ही नहीं, अपने सामने किसी को कुछ समझता भी नहीं, पर उसके सदाशयतापूर्ण कामों से भी देश और समाज और स्वयं उसका जितना नुकसान होता है इसका उसे पता तक नहीं होता।
दो दिन पहले टीचर्स डे था, कल मूर्ख दिवस। टीचर्स डे साल में एक बार आता है, मूर्ख दिवस साल में कितनी बार आ सकता है यह दुर्घटनाओं पर निर्भर करता है। वह इन्हें अवसर समझता है। परन्तु कल मूर्खों को असाधारण टक्कर मूढों से मिली। मूढ़ का मूर्खों से मुख्य भेद यह है कि इनमें न सदाशयता होती है न प्रतिभा पर ढोंग दोनों का करते हैं। दुर्भाग्य इनके लिए अवसर तो होता ही है यह इनके अस्तित्व के लिए इतना जरूरी होता है कि ये स्वयं दुर्भाग्यपूर्णस्थितियां तैयार कर लेते हैं, मूर्ख इस मामले में कुछ पीछे रह जाते हैं।
दोनों में धैर्य का अभाव धड़ल्लेबाजी में परिणत हो जाता है और दोनों मानते हैं कि कानून और न्याय व्यवस्था उन्हें सौंप दी जाए तो ही सबका कल्याण है। इसके लिए इंतजार नही कर पाते, इसे छीन कर अपने हाथ में ले लेते हैं, जिसे अपराधी तय कर देते हैं, पुलिस से अपेक्षा करते हैं कि वह उसे उनके सामने पेश करे। अपराध को देखते अपराधियों की संख्या इतनी अधिक होती है कि पुलिस उन्हें पकड़ ही नहीं सकती। इसका अनुमान करते हुए फर्माते हैं, उस चौपट राजा को हटाओ जिसके राज में ऐसी जघन्य दुर्घटना हुईं। पुलिस इसके लिए सही धाराएं तलाशती रह जाती है और अपराधी पकड़ में आता ही नहीं, यहां तक कि उसकी सही पहचान तक नहीं हो पाती। मुसीबत तब और बढ़ जाती जब राजा भी उसी का निकलता है जिसकी भीड़ होती है। राजा खुद भीड़ की बोली बोलता है। वे पीछे नहीं हटते । गर्जना करते, हैं महाराज को गद्दी से से उतारो। सहानुभूति की कातर पुकार शंखनाद बनने की कोशिश में फुस्सनाद बनकर रह जाती है और हर फुस्स से कुछ और भुस्स होते जाते हैं, पर तरीका नहीं बदलते। भविष्य में इससे बहुत बड़े दुर्भाग्य की प्रतीक्षा करते हैं जब सभी एक साथ मिलकर जोर लगाएंगे और गद्दी छीन कर ही दम लेंगे।
Post – 2017-09-06
जब सभी बोल रहे हों तो कुछ लोगों को चुप रहना और सुनना चाहिए ताकि समझा जा सके कि कौन क्या कह रहा है और क्यो? बोलने वालों को इससे बड़ा सम्मान नहीं मिल सकता । सुनने वाले तब तक चुप रहें जब तक बोलने वाले सुनने की स्थिति में न आ जायं।
Post – 2017-09-06
हम करते रोशनी हैं, पर अंधेरा बढ़ता जाता है
निजामे नौ है, या है यह निगाहे नौ, बताना तो ।
Post – 2017-09-05
होने को बहुत कुछ है मगर देखिए जनाब
हम हैं तो बहुत कुछ है न हों गर तो कुछ नहीं।।
Post – 2017-09-05
एक विकट चुनौती
पहली बार मुझे हाल के खतौली के हादसे में पता चला की मरम्मत हो रही थी, लाइन उखड़ी हुई थी और कोई ऐसी सावधानी नहीं बरती गई जिससे ड्राईवर को इसकी पूर्व सूचना मिल सके। पहली बार ट्रेन के आने के समय पर मरम्मत का काम हो रहा था। पहली बार स्टेशन मास्टर के मना करने पर या उसकी सूचना के बिना काम हो रहा था। पहली बार यह सुनने को मिला कि यदि इंजीनियरिंग स्टाफ को लगे कि लाइन में खराबी है तो वह स्टेशन मास्टर से अनुमति प्राप्त करेगा तब काम करेगा। नहीं जनाब अगर एक केबिन मैन को किसी खराबी का पता चल जाए तो वह उस मुकाम से पहले ही झंडी दिखाकर गाड़ी को रोक सकता है। जाहिर है रिपोर्टरों और समाचार चैनलों को या तो सही स्थिति की जानकारी नहीं दी गई या अपने अपराध को छिपाने के लिए भारी लीपापोती की गई।
अब हम उस सूचना को लें जिसका खंडन नहीं किया गया या जो साक्ष्यों पर आधारित है:
1. इंजीनियरी दल ने स्टेशन मास्टर को सूचित किया कि अमुक स्थल पर पटरी में खराबी है जिसे वह ठीक करने जा रहा है।
2. यह स्टेशन मास्टर की ड्यटी थी कि वह तत्काल इसकी सूचना ट्रैफिक कंट्रोल को देता जो उस पटरी से गुजरने वाली गाड़ियों को पिछले पड़ाव पर या बीच के किसी स्टेशनमास्टर को सूचित करके उसे पहले ही रोकता या किसी अन्य मार्ग से निकालता।
3. यदि स्टेशन मास्टर ने ऐसा नहीं किया तो दुर्घटना की जम्मेदारी उस पर आती है, और यदि उसने ऐसा किया तो उस समय ड्यूटी पर उपस्थित ट्रैफिक कंट्रोलर की या यदि कंट्रोल ने संबंधित स्टेशन मास्टर को उसने निर्देश दे दिया और उसने शिथिलत बरती तो उस पर।
4. एक पेचीदा समस्या उस स्थिति में पैदा होती है जिसमें इंजीनियरी दस्ता स्टेशन मास्टर को सूचना देने पहुंचता है और वह उसे बताता है कि ट्रेन तो पिछले पड़ाव से चल पड़ी है। यही वह स्थिति है जिसमें वह कह सकता है कि रिपेयर का समय तो है ही नहीं परन्तु सच कहें तो रेलवे की परिभाषा में दुर्घटना अब तक घट चुकी है। अब जो काम करना है वह है इससे होने वाले नुकसान को कम करना। यह आपातिक स्थिति है जिसमें स्टेशन मास्टर से लेकर इस दल के लोगों को निम्नलिखित काम करने हैं।
अ. स्टेशन मास्टर ट्रैफिक कंट्रोल को सूचित करना।
ई. आज के उन्नत संचार युग में यदि बीच में कोई केबिन हो तो उसके माध्यम से खतरे की झंडी दिखा कर गाड़ी को रोकना। समय इतना था कि इस जत्थे के लोग खराबी की जगह पर पहुंचने में सफल भी हो गए और ट्रेन को बढ़ते देख जान बचाने के लिए भागे और अपने औज़ार तक समेट न पाए।
यहीं मुझे तोड़ फोड़ या भितरघात का सन्देह निम्न कारणों से होता है:
• मरम्मत के काम का समय ट्रेन आने के समय से कुछ ही समय पहले चुनना। ऐसा नहीं हो सकता कि इंजीनियरिंग दल को ट्रेन का समय न पता रहा हो।
• काम आरंभ करने से पहले कार्यस्थल से इतने आगे खतरे की झंडी गाड़ना जिससे समय रहते प्रभावित स्थल से पीछे ही गाड़ी को रोका जा सके।
• गाड़ी की पटरियों में गाड़ी के आने सै बहुत पहले से कंपन आरंभ हो जाता है उसके बाद एक किलोमीटर की दूरी से गाड़ी नजर आती है, फिर उसकी आवाज सुनाई देती है, अर्थात् घटनास्थल पर जो औज़ार मिले उन्हें संभालने का पर्याप्त समय था। इसलिए तोड़फोड़ करने वालों ने जानबूझकर उन्हें वहीं पड़े रहने दिया। तोड़फोड़ की जगह भी एक बस्ती के निकट चुनी गई जिससे अधिकतम क्षति पहुंच सके। गांव के लोगों को यह पता हो ही न सकता था कि य रेलवे के कर्मचारी हैं या नहीं।
इससे पहले की दुर्घटनाएं जो कानपुर रामपुर आदि में हुई थी वे तोड़फोड़ के कारण हई थी। औजारों तक इनकी पहुंच कैसे हुईं यह खोज का विषय है, औजार भले रेलवे के ही काम में लाये गये हों परन्तु यह सुनियोजित षड्यंत्र था और इसके पीछे किसी आतंकी दल का हाथ था।
यदि नहीं तो यह जानबूझकर की गई आपराधिक कार्रवाई थी और इसके लिए मात्र सस्पेंड करना या नौकरी से हटाना काफी नहीं है, यह इरादतन नर संहार का मामला है जिसके लिए सीधे जिम्मेदार व्यक्तियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए । साथ ही इस बात की पड़ताल की जानी चाहिये कि रेलवे के संवेदनशील विभागों में किन संगठनों और विचारधाराओं के लोगों का किस पैमाने पर प्रवेश हो चुका है। पिछले तीन चार दशकों में इन प्रवृत्तियों को योजनाबद्ध रूप में हिंदू सांप्रदायिकता से लडने के सद्विश्वास से बढावा दिया गया और पुलिस का विभाग भी जिस पर कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी होती है,इसका अपवाद न रहा। आज ऐसे तत्व बाहर से तो लड़ ही रहे हैं भीतर से भी लड़ रहे हों तो क्या आश्चर्य! हड़बडी में जल्ल तू जलाल तू आई बला को टाल तू जपते हुए, मीडिया की तुष्टि के लिए बड़े पैमाने पर बलि देना, वास्तविक अपराधियों को बचाने जैसा है।